
Tirtha Mahatmya
This section is oriented to sacred-place glorification (māhātmya) and locates the episode in the Ānarta region (आनर्तविषय), described as a hermitage-forest landscape populated by ascetics and marked by a distinctive ethic of non-hostility among animals—an idealized purāṇic ecology used to frame ritual authority, transgression, and restoration.
279 chapters to explore.

हाटकेश्वरलिङ्गप्रतिष्ठा — Establishment of the Hāṭakeśvara Liṅga
अध्याय 1 में मुनि पूछते हैं कि अन्य देव-रूपों की अपेक्षा शिवलिंग की विशेष पूजा क्यों की जाती है। सूत आनर्त-वन की कथा सुनाते हैं—सती-वियोग से शोकाकुल त्रिपुरान्तक शिव दिगम्बर, कपाल-पात्र धारण किए भिक्षा माँगते हुए तपोवन में प्रवेश करते हैं। उन्हें देखकर आश्रम की स्त्रियाँ मोहित होकर अपने नित्यकर्म छोड़ देती हैं; पुरुष तपस्वी इसे आश्रम-धर्म का उल्लंघन मानकर शिव को शाप देते हैं, जिससे उनका लिंग पृथ्वी पर गिर पड़ता है। गिरा हुआ लिंग धरती को भेदकर पाताल में चला जाता है और तीनों लोकों में कम्पन, उत्पात तथा अनिष्ट संकेत फैल जाते हैं। देवता ब्रह्मा के पास जाते हैं; ब्रह्मा कारण जानकर उन्हें शिव के पास ले जाते हैं। शिव कहते हैं कि जब तक देवता और द्विजजन परिश्रमपूर्वक लिंग की पूजा नहीं करेंगे, वे उसे पुनः स्थापित नहीं करेंगे। देवता उन्हें आश्वस्त करते हैं कि सती हिमालय की पुत्री गौरी के रूप में पुनर्जन्म लेंगी। तब ब्रह्मा पाताल में लिंग की पूजा करते हैं; विष्णु और अन्य देव भी पूजन करते हैं। प्रसन्न होकर शिव वर देते हैं और लिंग को पुनः प्रतिष्ठित करते हैं; ब्रह्मा स्वर्ण का लिंग बनाकर स्थापित करते हैं, जो पाताल में ‘हाटकेश्वर’ नाम से प्रसिद्ध होता है। अंत में कहा गया है कि श्रद्धा से नित्य लिंग का स्पर्श, दर्शन और स्तुति सहित पूजन करना समस्त महान तत्त्वों का सम्मान है और शुभ आध्यात्मिक फल देता है।

त्रिशङ्कु-तत्त्वप्रश्नः तथा तीर्थस्नान-प्रभावः (Triśaṅku’s Inquiry and the Efficacy of Tīrtha Bathing)
इस अध्याय में सूत जी एक अद्भुत तीर्थ-प्रसंग बताते हैं। एक लिङ्ग के उखड़ जाने पर उसी मार्ग से पाताल से जह्नवी (गङ्गा) का जल प्रकट हुआ, जिसे सर्वपावन और कामना-पूर्ति करने वाला कहा गया। उसी तीर्थ में स्नान करके चाण्डाल-भाव को प्राप्त राजा त्रिशङ्कु ने फिर राजोचित शरीर प्राप्त किया—यह लोक-विस्मयकारी घटना है। ऋषि त्रिशङ्कु के पतन का कारण विस्तार से पूछते हैं। सूत प्राचीन, पवित्र आख्यान का वचन देकर त्रिशङ्कु की वंश-परम्परा और गुण बताते हैं—सूर्यवंश में जन्म, वसिष्ठ के शिष्य, अग्निष्टोम आदि यज्ञों का नियमित अनुष्ठान, पूर्ण दक्षिणा, विशेषतः योग्य और दीन ब्राह्मणों को उदार दान, व्रत-पालन, शरणागत की रक्षा और सुव्यवस्थित शासन। फिर राजसभा में त्रिशङ्कु वसिष्ठ से ऐसा यज्ञ कराने की प्रार्थना करता है जिससे वह इसी शरीर सहित स्वर्ग जा सके। वसिष्ठ असम्भव कहकर मना करते हैं और कहते हैं कि स्वर्ग-प्राप्ति कर्मफल से देहान्तर के बाद होती है; वे देह सहित स्वर्गारोहण का कोई दृष्टान्त भी पूछते हैं। त्रिशङ्कु मुनि-शक्ति पर आग्रह करता है, अन्य पुरोहित खोजने की धमकी देता है; वसिष्ठ हँसकर उसे अपनी इच्छा से करने की छूट दे देते हैं।

Triśaṅku’s Curse, Social Degradation, and Renunciation (त्रिशङ्कु-शापः अन्त्यजत्वं च वनप्रवेशः)
सूता बताते हैं कि राजा, पहले वसिष्ठ से निवेदन कर चुका होने पर, अब उनके पुत्रों के पास जाकर देह सहित स्वर्ग-प्राप्ति हेतु यज्ञ कराने की प्रार्थना करता है। ऋषि इसे अनुचित मानकर अस्वीकार करते हैं। राजा जब किसी अन्य पुरोहित को नियुक्त करने की धमकी देता है, तब वे कठोर वचन कहकर उसे शाप देते हैं कि वह अन्त्यज/चाण्डाल हो जाए। शाप से उसके शरीर में विकार-चिह्न प्रकट होते हैं और समाज उसे अपमानित कर बहिष्कृत करता है; लोग उसे सताते हैं। राजा कुल-मर्यादा के पतन पर विलाप करता है, परिवार और आश्रितों के सामने जाने से डरता है, और अपनी महत्वाकांक्षा के दुष्परिणाम सोचकर आत्मविनाश तक का विचार करता है। रात में वह सुनसान नगर-द्वार पर लौटकर पुत्र और मंत्रियों को बुलाता है तथा शाप का वृत्तांत सुनाता है। सभा शोकाकुल होती है, ऋषियों की कठोरता की निंदा करती है और राजा के भाग्य में सहभागी होने की बात कहती है। त्रिशंकु अपने ज्येष्ठ पुत्र हरिश्चंद्र को राज्य-उत्तराधिकारी ठहराकर, देह सहित स्वर्गारोहण या मृत्यु—किसी एक को पाने का संकल्प लेकर वन को प्रस्थान करता है; मंत्री शंख-भेरी के मंगल-नाद के साथ हरिश्चंद्र का राज्याभिषेक कर देते हैं।

त्रिशङ्कु-विश्वामित्र-तीर्थयात्रा तथा हाटकेश्वरशुद्धिः (Triśaṅku and Viśvāmitra: Pilgrimage Circuit and Purification at Hāṭakeśvara)
सूत जी कहते हैं—वसिष्ठ के पुत्रों के शाप से त्रिशंकु चाण्डाल-स्थिति में गिर पड़ा। तब उसने निश्चय किया कि अब केवल विश्वामित्र ही उसका एकमात्र आश्रय हैं। वह कुरुक्षेत्र पहुँचा और नदी-तट पर विश्वामित्र का आश्रम पाया; देह-चिह्नों के कारण शिष्यों ने उसे पहचान न पाकर डाँटा, तब त्रिशंकु ने अपना परिचय देकर सारा विवाद बताया—देह सहित स्वर्गारोहण कराने वाले यज्ञ की याचना अस्वीकार हुई, उसे त्याग दिया गया और फिर शाप मिला। वसिष्ठ-वंश से प्रतिस्पर्धा रखने वाले विश्वामित्र ने उसे शुद्ध कर पुनः वैदिक अधिकार दिलाने हेतु तीर्थ-यात्रा का उपाय बताया। कुरुक्षेत्र, सरस्वती, प्रभास, नैमिष, पुष्कर, वाराणसी, प्रयाग, केदार, श्रवणा नदी, चित्रकूट, गोकर्ण, शालिग्राम आदि अनेक तीर्थों का परिभ्रमण हुआ, पर त्रिशंकु की अशुद्धि दूर न हुई, जब तक वे अरवुद (आबू) न पहुँचे। वहाँ मार्कण्डेय ने अनर्त-प्रदेश में पाताल से जुड़े और जाह्नवी-जल से पवित्र हाटकेश्वर लिंग का मार्ग बताया। भूमिगत पथ में जाकर त्रिशंकु ने विधिपूर्वक स्नान किया और हाटकेश्वर के दर्शन से चाण्डालत्व से मुक्त होकर पुनः तेजस्वी हो गया। तब विश्वामित्र ने उसे सम्यक् दक्षिणा सहित यज्ञ करने की आज्ञा दी और देह सहित स्वर्गारोहण के यज्ञ-स्वीकार हेतु ब्रह्मा से प्रार्थना की; ब्रह्मा ने मर्यादा बताई कि उसी शरीर के साथ यज्ञबल से स्वर्ग नहीं मिलता—वैदिक विधि में सामान्य नियम देह-त्याग का ही है।

Triśaṅku’s Dīrghasatra under Viśvāmitra: Ritual Authority, Public Yajña, and the Quest for Svarga
सूत कहते हैं—ब्रह्मा के वचनों से प्रेरित होकर महातपस्वी विश्वामित्र ने अपने तपोबल की महिमा दिखाने के लिए त्रिशंकु के हेतु विधिपूर्वक वैदिक यज्ञ-दीर्घसत्र कराने का संकल्प किया। उन्होंने शुभ वन-प्रदेश में यज्ञ-वेदी और यज्ञशाला बनवाकर अध्वर्यु, होता, ब्रह्मा, उद्गाता तथा अन्य अनेक कर्मकुशल ऋत्विजों को नियुक्त किया, जिससे यज्ञ की पूर्णता और शास्त्रीय मर्यादा प्रकट हुई। यह यज्ञ एक महान सार्वजनिक उत्सव बन गया—विद्वान ब्राह्मण, तर्कशास्त्री, गृहस्थ, निर्धन जन और नट-कलाकार तक आए; दान और भोजन-वितरण के जयघोष गूँजते रहे। अन्न के ‘पर्वत’, स्वर्ण-रजत-रत्न की समृद्धि, तथा असंख्य गायें, घोड़े और हाथी दान हेतु तैयार किए गए। परंतु एक दिव्य तनाव भी दिखता है—देवता स्वयं आहुतियाँ ग्रहण नहीं करते; केवल अग्नि, देवताओं के मुख रूप में, हवि स्वीकार करते हैं। बारह वर्षों तक सत्र चलने पर भी त्रिशंकु का अभीष्ट फल सिद्ध नहीं हुआ। अवभृथ-स्नान के बाद यथोचित दक्षिणा देकर त्रिशंकु ने लज्जित किंतु श्रद्धापूर्वक विश्वामित्र को धन्यवाद दिया कि उन्होंने उसका मान लौटाया और चाण्डाल-भाव दूर किया; फिर भी वह सशरीर स्वर्गारोहण न होने का शोक करता है। उसे भय है कि लोग हँसेंगे और वसिष्ठ का कथन सत्य ठहरेगा कि केवल यज्ञ से देह सहित स्वर्ग-प्राप्ति नहीं होती। अंततः वह राज्य त्यागकर वन में जाकर तपस्या करने का निश्चय करता है—इस प्रकार अध्याय यज्ञ-मार्ग से तपो-मार्ग की ओर शिक्षात्मक मोड़ दिखाता है।

Viśvāmitra’s Hymn to Śiva and the Resolve to Create a New Sṛṣṭi (Triśaṅku Episode)
इस अध्याय में सूत के कथन के भीतर राजर्षियों का संवाद आगे बढ़ता है। त्रिशंकु की दशा सुनकर विश्वामित्र उसे ढाढ़स बँधाते हैं और प्रतिज्ञा करते हैं कि वे उसे उसी शरीर सहित स्वर्ग तक पहुँचाएँगे। यहाँ असाधारण संकल्प-शक्ति और यज्ञ/अनुष्ठान के अधिकार को लेकर उठने वाला विवाद स्पष्ट होता है। फिर विश्वामित्र देव-व्यवस्था को चुनौती देते हुए अपने तपोबल से अपनी ही नई सृष्टि आरम्भ करने की क्षमता का उद्घोष करते हैं। इसी मोड़ पर कथा भक्ति-तत्त्व की ओर मुड़ती है। विश्वामित्र शिव (शंकर, शशिशेखर) के पास जाकर विधिपूर्वक प्रणाम करते हैं और स्तुति करते हैं, जिसमें शिव को अनेक देवताओं और विश्व-कार्य-रूपों में एक ही परम तत्त्व के रूप में पहचाना गया है। शिव प्रसन्न होकर वर देते हैं; विश्वामित्र शिव-कृपा से “सृष्टि-माहात्म्य” (सृष्टि की सामर्थ्य/ज्ञान) माँगते हैं। शिव वर देकर अंतर्धान होते हैं; विश्वामित्र ध्यानस्थ रहकर प्रतिस्पर्धा-भाव से चतुर्विध सृष्टि रचने में प्रवृत्त होते हैं—जहाँ भक्ति, शक्ति और ब्रह्माण्डीय प्रयोग तीर्थ-कथा के ढाँचे में जुड़ते हैं।

Viśvāmitra’s Secondary Creation and the Resolution of Triśaṅku’s Ascent (विश्वामित्र-सृष्टि तथा त्रिशङ्कु-प्रकरण)
सूता बताते हैं कि विश्वामित्र ने घोर तप और दृढ़ संकल्प से जल में प्रवेश कर ‘युग्म संध्या’ (द्वितीय संध्या) की रचना की, जो आज भी प्रत्यक्ष कही जाती है। फिर उन्होंने देवगण, आकाशचारी, तारे-ग्रह, मनुष्य, नाग, राक्षस, वनस्पति तथा सप्तर्षि और ध्रुव तक—सबका एक समानान्तर सृष्टि-समूह उत्पन्न कर दिया। इससे दो सूर्य, दो निशापति, और दुगुने ग्रह-नक्षत्र प्रकट हुए, और दोनों आकाश-व्यवस्थाओं के कारण लोकों में बड़ा भ्रम फैल गया। इन्द्र (शक्र) भयभीत होकर देवों सहित कमलासन ब्रह्मा के पास पहुँचे और वैदिक शैली के स्तोत्रों से उनकी स्तुति कर निवेदन किया कि यह नई सृष्टि पुरानी व्यवस्था को दबा देगी। ब्रह्मा ने विश्वामित्र से सृष्टि रोकने को कहा, ताकि देवों का विनाश न हो। विश्वामित्र ने शर्त रखी कि त्रिशंकु को अपने वर्तमान शरीर सहित दिव्य लोक में प्रवेश मिले। ब्रह्मा ने स्वीकार कर त्रिशंकु को ब्रह्मलोक/त्रिविष्टप तक पहुँचाया और विश्वामित्र के अद्वितीय कर्म की प्रशंसा की, पर यह भी कहा कि यह निर्मित व्यवस्था स्थिर तो रहेगी, किन्तु यज्ञादि कर्मों के लिए पात्र नहीं होगी। अंत में ब्रह्मा त्रिशंकु सहित प्रस्थान करते हैं और विश्वामित्र अपने तपोस्थान में प्रतिष्ठित रहते हैं।

Hāṭakeśvara-māhātmya and the Nāga-bila: Indra’s Purification Narrative (हाटकेश्वर-माहात्म्य)
सूत जी त्रिलोकों में प्रसिद्ध एक तीर्थ की उत्पत्ति का वर्णन करते हैं, जिसका संबंध विश्वामित्र के प्रयास से त्रिशंकु के अद्भुत आरोहण से है। कहा गया है कि इस स्थान पर कलि का दुष्प्रभाव नहीं पड़ता और भारी पाप भी यहाँ निष्फल हो जाते हैं। इस तीर्थ में स्नान तथा वहीं देहत्याग शिवलोक-प्राप्ति का साधन है; यहाँ तक कि पशु-पक्षी भी इसके पुण्यफल के अधिकारी बताए गए हैं। कालांतर में लोग केवल एक ही कर्म—तीर्थ-स्नान और लिंग-भक्ति—पर निर्भर हो जाते हैं, जिससे यज्ञ, तप और अन्य विधियाँ घटने लगती हैं। देवताओं को यज्ञ-भाग रुकने की चिंता होती है; तब इन्द्र धूलि डालकर तीर्थ को अवरुद्ध कराने का आदेश देते हैं। आगे वही स्थान वल्मीकरूप होकर ‘नाग-बिल’ बन जाता है, जिससे नाग पाताल और पृथ्वी के बीच आवागमन करते हैं। फिर वृत्र के छलपूर्वक वध से इन्द्र पर ब्रह्महत्या का दोष आता है; वृत्र के तप, वरदान और देव-विरोध की पृष्ठभूमि भी कही गई है। इन्द्र अनेक तीर्थों में घूमकर भी शुद्ध नहीं होते, तब दिव्य वाणी उन्हें नाग-बिल मार्ग से पाताल ले जाती है। वहाँ पाताल-गंगा में स्नान कर और हाटकेश्वर की पूजा करके वे तुरंत निर्मल होकर तेजस्वी बन जाते हैं। अंत में आदेश है कि अनियंत्रित आवागमन रोकने हेतु उस मार्ग को फिर से बंद किया जाए, और भक्तिपूर्वक सुनने-पढ़ने वालों के लिए परम फल की फलश्रुति कही गई है।

Nāga-bila-pūraṇa and Raktaśṛṅga-sthāpanā at Hāṭakeśvara-kṣetra (नागबिलपूरणं रक्तशृङ्गस्थापनं च)
यह अध्याय हाटकेश्वर-क्षेत्र में स्थित भयावह भूमिगत मार्ग ‘महान् नाग-बिल’ के भरने और पवित्रीकरण की कथा कहता है। सूत बताते हैं कि इन्द्र ने संवर्तक वायु को आदेश दिया कि वह गड्ढे को धूल से भर दे; पर वायु ने मना कर दिया और पूर्व प्रसंग सुनाया—लिङ्ग को ढँक देने के कारण उसे शाप मिला, जिससे वह मिश्रित गन्धों का वाहक बन गया और त्रिपुरारि शिव के भय से वह फिर ऐसा कर्म नहीं करना चाहता। इन्द्र विचार में पड़े, तब देवेञ्ज्य (बृहस्पति) ने हिमालय के तीन पुत्रों का उपाय बताया—मैनाक (समुद्र में छिपा), नन्दिवर्धन (वसिष्ठाश्रम के पास अधूरी दरार से जुड़ा), और रक्तशृङ्ग (उपलब्ध); इनमें केवल रक्तशृङ्ग ही नाग-बिल को दृढ़ता से बन्द कर सकता है। इन्द्र हिमालय से प्रार्थना करते हैं, पर रक्तशृङ्ग मनुष्यलोक की कठोरता और अधर्म-व्याप्ति से तथा इन्द्र द्वारा अपने पंख कटवाए जाने की स्मृति से जाने से इनकार करता है। इन्द्र उसे बाध्य करते हुए वचन देते हैं कि वहाँ वृक्ष, तीर्थ, देवालय और ऋषियों के आश्रम प्रकट होंगे; और पापी मनुष्य भी रक्तशृङ्ग के सान्निध्य से शुद्ध होंगे। तब रक्तशृङ्ग को नाग-बिल में नासिका तक डुबोकर स्थापित किया जाता है, उस पर वनस्पति और पक्षियों की शोभा छा जाती है। इन्द्र वर देते हैं—भविष्य में एक राजा उसके शिर पर ब्राह्मण-कल्याण हेतु नगर बसाएगा; चैत्र कृष्ण चतुर्दशी को इन्द्र हाटकेश्वर की पूजा करेगा; और शिव देवताओं सहित एक दिन वहाँ निवास कर त्रिलोकी में उसकी कीर्ति फैलाएँगे। अंत में कहा गया है कि उस बन्द स्थल के ऊपर सचमुच तीर्थ, मन्दिर और तपोवन विकसित हो गए।

Śaṅkhatīrtha-prabhāvaḥ (The Efficacy of Śaṅkhatīrtha) — Chapter 10
सूत जी बताते हैं कि आनर्त-देश के राजा चमत्कार एक बार शिकार पर गए। उन्होंने एक वृक्ष के नीचे हिरनी को अपने शावक को निश्चिन्त होकर दूध पिलाते देखा और उत्साह में आकर उसे बाण मार दिया। मृत्यु के निकट हिरनी ने कहा—मुझे अपने मरने का उतना दुःख नहीं, जितना दूध पर निर्भर मेरे असहाय बच्चे का; और उसने क्षत्रिय-धर्म की मर्यादा बताई कि जो प्राणी मैथुनरत हो, सो रहा हो, दूध पिला रहा/खिला रहा हो, निर्बल हो या जल से जुड़ा हो, उसे मारना पाप का कारण बनता है। इसी आधार पर उसने राजा को शाप दिया कि उसे तुरंत कुष्ठ-सदृश रोग हो जाएगा। राजा ने प्रतिवाद किया कि प्रजा-रक्षा हेतु वन्यजीवों का नियंत्रण भी राजधर्म है; हिरनी ने सामान्य बात मानते हुए भी इस प्रसंग में नियम-भंग और अधर्म को स्पष्ट किया। हिरनी के मरते ही राजा रोगग्रस्त हो गया; उसने इसे दैवी संकेत मानकर तप, शिव-पूजा, मित्र-शत्रु में समभाव और तीर्थ-यात्रा का व्रत लिया। अंततः ब्राह्मणों के उपदेश से वह हाटकेश्वर-क्षेत्र के प्रसिद्ध शंखतीर्थ पहुँचा, जहाँ स्नान करते ही उसका रोग नष्ट हो गया और वह तेजस्वी बन गया—इस अध्याय में तीर्थ-प्रभाव के साथ संयम की नीति भी प्रतिपादित है।

शंखतीर्थोत्पत्तिमाहात्म्य एवं चमत्कारभूपतिना ब्राह्मणेभ्यो नगरदानवर्णनम् (Origin and Glory of Śaṅkhatīrtha; the King Camatkāra’s Gift of a Town to Brahmins)
ऋषियों ने सूत से पूछा कि राजा चमत्कार कुष्ठ से कैसे मुक्त हुआ, उसे मार्ग दिखाने वाले ब्राह्मण कौन थे, और शंखतीर्थ कहाँ है तथा उसकी शक्ति क्या है। सूत कहते हैं कि राजा अनेक तीर्थों में भटका, औषधि और मंत्र भी आजमाए, पर कोई उपचार न मिला। एक अत्यंत पुण्य प्रदेश में सादगी से रहते हुए उसे तीर्थयात्री ब्राह्मण मिले; उसने मानव या दैवी—किसी भी उपाय से रोग-नाश का मार्ग पूछा। ब्राह्मणों ने निकट स्थित शंखतीर्थ को सर्वरोग-नाशक बताया, विशेषकर चैत्र मास की चतुर्दशी को, जब चंद्रमा चित्रा नक्षत्र में हो, उपवास सहित स्नान करने से महान फल मिलता है। फिर उन्होंने तीर्थ की उत्पत्ति सुनाई—तपस्वी भाई लिखित और शंख की कथा। लिखित के खाली आश्रम से शंख ने फल लिया और दोष अपने ऊपर ले लिया; क्रोध में लिखित ने उसका हाथ काट दिया। शंख ने कठोर तप किया; शिव प्रकट हुए, उसके हाथ पुनः प्रदान किए और शंख के नाम से तीर्थ स्थापित कर स्नान करने वालों को शुद्धि-नवजीवन तथा उसी रात्रि में श्राद्ध करने से पितरों की तृप्ति का वर दिया। ब्राह्मणों के निर्देश से राजा ने नियत समय पर स्नान किया, रोग दूर हुआ और वह तेजस्वी बन गया। कृतज्ञ होकर उसने राज्य-धन दान करना चाहा, पर ब्राह्मणों ने शास्त्रानुसार प्राकार और खाई से सुरक्षित, विद्वान गृहस्थों के लिए अध्ययन-यज्ञकर्मयुक्त बसाहट माँगी; राजा ने सुव्यवस्थित नगर बनाकर दान-वितरण किया और अंत में वैराग्य व तपोन्मुख जीवन की ओर बढ़ा।

Śaṅkha-tīrtha: Brāhmaṇa-nagarī-nivedana and Rakṣaṇa-upadeśa (शंखतीर्थे ब्राह्मणनगरनिवेदन-रक्षणोपदेशः)
सूत जी कहते हैं कि राजा वसुधापाल ने इन्द्र की पुरन्दरपुरी के समान एक अत्यन्त वैभवशाली नगरी बनवाई। उसमें रत्न-जटित गृह, कैलास-शिखरों के तुल्य स्फटिक-प्रासाद, ध्वज-पताकाएँ, स्वर्ण-द्वार, मणिमय सीढ़ियों वाले सरोवर, उद्यान, कुएँ और नगर-उपकरण सब सुसज्जित थे। फिर उसने इस पूर्ण-सम्पन्न ब्राह्मण-नगरी को श्रेष्ठ ब्राह्मणों को निवेदित कर अपना कर्तव्य पूर्ण माना। शंखतीर्थ में स्थित होकर उसने पुत्रों, पौत्रों और सेवकों को बुलाकर शासनादेश दिया कि दान में दी गई इस नगरी की निरन्तर प्रयत्न से रक्षा की जाए, जिससे सभी ब्राह्मण सन्तुष्ट रहें। जो राजा भक्तिभाव से ब्राह्मणों की रक्षा करता है, वह ब्राह्मण-कृपा से अद्भुत तेज, अजेयता, समृद्धि, दीर्घायु, आरोग्य और वंश-वृद्धि पाता है; और जो द्वेष करता है, वह दुःख, पराजय, प्रिय-वियोग, रोग, निन्दा, वंश-क्षय तथा अन्ततः यमलोक-गमन का भागी होता है। अंत में राजा तपस्या में प्रवृत्त हुआ और उसके वंशजों ने उसके उपदेश का पालन कर रक्षण-धर्म की परम्परा को स्थिर किया।

अचलेश्वर-प्रतिष्ठा-माहात्म्य (The Māhātmya of Acaleśvara: Establishment and Proof-Sign)
सूतजी कहते हैं—एक राजा ने अपना राज्य और नगर पुत्रों को सौंपकर, द्विजों को एक बस्ती दान दी और महादेव को प्रसन्न करने हेतु कठोर तप किया। वह क्रमशः फलाहार, फिर सूखे पत्तों का आहार, फिर केवल जल, और अंत में वायु-आहार पर दीर्घकाल तक रहा; उसके तप से महेश्वर प्रसन्न हुए और प्रकट होकर वर देने लगे। राजा ने प्रार्थना की कि हाटकेश्वर से संबद्ध परम-पुण्य क्षेत्र भगवान के स्थायी निवास से और भी पवित्र हो जाए। महादेव ने वहाँ अचल रूप से रहने की स्वीकृति दी और कहा कि वे तीनों लोकों में “अचलेश्वर” नाम से प्रसिद्ध होंगे तथा जो भक्तिभाव से दर्शन करेगा उसे स्थिर समृद्धि देंगे। माघ शुक्ल चतुर्दशी को लिंग पर “घृत-कंबल” अर्पित करने का व्रत बताया गया, जिससे जीवन की सभी अवस्थाओं में किए पाप नष्ट होते हैं। राजा को लिंग-प्रतिष्ठा करने की आज्ञा मिली; देव अंतर्धान हुए तो राजा ने सुंदर मंदिर बनवाया। आकाशवाणी से प्रमाण-चिह्न मिला कि उस लिंग की छाया स्थिर रहेगी और सामान्यतः दिशाओं के अनुसार नहीं चलेगी; राजा ने यह अद्भुत संकेत देखकर कृतार्थता पाई, और कहा गया कि वह छाया आज भी दिखती है। एक और प्रमाण बताया गया कि जिसकी मृत्यु छह मास के भीतर निश्चित हो, वह उस छाया को देख नहीं सकता। अंत में कहा गया कि चमत्कारपुर के निकट महादेव अचलेश्वर रूप में सदा विराजते हैं; यह तीर्थ कामना-पूर्ति और मोक्ष देने वाला है, और इसकी महिमा इतनी प्रबल है कि विघ्नरूप दोष-देवताएँ भी लोगों को वहाँ जाने से रोकने के लिए प्रेरित की जाती हैं।

Cāmatkārapura-pradakṣiṇā-māhātmya (Theological Account of Circumambulation at Cāmatkārapura)
इस अध्याय में सूत एक उपदेशात्मक कथा कहते हैं। जन्म से वैश्य, मूक और निर्धन एक व्यक्ति ग्वाला बनकर जीवन चलाता है। चैत्र मास की कृष्णपक्ष चतुर्दशी को उसकी एक पशु अनजाने में खो जाती है। मालिक उसे दोषी ठहराकर तुरंत पशु लौटाने को कहता है। भय से वह बिना भोजन, हाथ में डंडा लिए वन में खोजने निकलता है। खुरों के निशान पकड़ते-पकड़ते वह पूरे चामत्कारपुर की परिधि का चक्कर लगा देता है—यह अनजाने में हुई प्रदक्षिणा बन जाती है। रात के अंत में पशु मिल जाता है और वह उसे लौटा देता है। ग्रंथ बताता है कि उस काल-विशेष में देवता तीर्थों पर एकत्र होते हैं, इसलिए ऐसे कर्मों का पुण्य बढ़ जाता है। आगे चलकर वह ग्वाला (उपवास, मौन और अस्नान की अवस्था में) तथा वह पशु दोनों अपने-अपने समय पर मरते हैं। ग्वाला दशार्ण नरेश के पुत्र रूप में जन्म लेता है और पूर्वजन्म की स्मृति रखता है। राजा बनकर वह हर वर्ष मंत्री के साथ पैदल, उपवास और मौन का पालन करते हुए चामत्कारपुर की प्रदक्षिणा जानबूझकर करता है। विश्वामित्र-संबद्ध पापहरण तीर्थ पर आए ऋषि उसकी इस विशेष साधना पर प्रश्न करते हैं कि इतने तीर्थ-देवालय होते हुए वह इसी विधि को क्यों मानता है। राजा अपना पूर्वजन्म-वृत्तांत सुनाता है। ऋषि उसकी प्रशंसा कर स्वयं प्रदक्षिणा करते हैं और ऐसी सिद्धि पाते हैं जो जप, यज्ञ, दान तथा अन्य तीर्थ-सेवाओं से भी दुर्लभ कही गई है। अंत में राजा और मंत्री दिव्य रूप पाकर आकाश में तारकाकार दिखाई देते हैं—यह प्रदक्षिणा-माहात्म्य का फल-प्रमाण है।

Vṛndā’s Rescue, Māyā-Encounter with Hari, and the Etiology of Vṛndāvana (तुलसी-वृंदावन-प्रादुर्भाव)
नारद द्वारा वर्णित इस अध्याय में हरि/नारायण तपस्वी-वेष धारण कर एक राक्षस का संहार करते हैं और संकट में पड़ी स्त्री वृन्दा (वृन्दारिका) की रक्षा करते हैं। फिर वे उसे भयावह वन से ले जाकर एक अद्भुत आश्रम में पहुँचाते हैं, जहाँ स्वर्ण-वर्ण पक्षी, अमृत-सी नदियाँ और मधु-रस बहाते वृक्ष तीर्थ की अलौकिक शोभा प्रकट करते हैं। आगे “चित्रशाला” में दिव्य माया से वृन्दा को अपने पति-सदृश पुरुष का दर्शन होता है; निकटता के कारण वह भ्रम में पड़ जाती है। तब हरि अपना स्वरूप प्रकट कर शिव और हरि की परम तत्त्व में अभिन्नता बताते हैं और जालन्धर के वध का समाचार देते हैं। वृन्दा इसे अधर्म मानकर कठोर वचन कहती है और शाप देती है कि जैसे तपस्वी की माया से वह मोहित हुई, वैसे ही हरि भी समान मोह के अधीन होंगे। अंत में वृन्दा तप का संकल्प लेकर योग-समाधि में देह त्याग करती है; उसके अवशेषों का विधिपूर्वक संस्कार होता है। जहाँ उसने शरीर छोड़ा वही गोवर्धन के निकट “वृन्दावन” कहलाया और उसके रूपान्तरण से उस क्षेत्र की पवित्रता स्थापित हुई।

रक्तशृङ्गसांनिध्यसेवनफलश्रैष्ठ्यवर्णनम् (Exposition on the Supremacy of the Fruits of Serving the Proximity of Raktaśṛṅga)
इस सोलहवें अध्याय में सूत कहते हैं कि हाटकेश्वर-सम्भव पवित्र क्षेत्र में रक्तशृङ्ग के सान्निध्य की भक्ति-सेवा सर्वोच्च फल देने वाली है। बुद्धिमानों को अन्य कार्यों का त्याग कर उसी स्थान की उपस्थिति में रहकर आराधना करने की प्रेरणा दी गई है। दान, कर्मकाण्ड, पूर्ण दक्षिणा सहित अग्निष्टोम आदि यज्ञ, चान्द्रायण और कृच्छ्र जैसे कठोर व्रत, तथा प्रभास और गङ्गा जैसे प्रसिद्ध तीर्थ—इन सबके पुण्य की तुलना करके कहा गया है कि वे इस क्षेत्र के पुण्य के सोलहवें भाग के भी बराबर नहीं हैं। दृष्टान्त रूप में बताया गया है कि पूर्वकाल के राजर्षियों ने वहीं सिद्धि पाई; और समय के वश से मरे हुए पशु, पक्षी, सर्प तथा हिंसक जीव भी उस स्थान के सम्बन्ध से दिव्य धाम को प्राप्त होते हैं। तीर्थ निवास से शुद्ध करते हैं, पर हाटकेश्वर-क्षेत्र स्मरण से भी, और दर्शन व विशेषतः स्पर्श से अधिक पवित्र करता है—ऐसी देह-स्पर्शित पावनता की शिक्षा दी गई है।

चमत्कारपुर-क्षेत्रप्रमाण-वर्णनम् तथा विदूरथ-नृपकथा (Chamatkārapura Kṣetra Boundaries and the Tale of King Vidūratha)
इस अध्याय में ऋषि सूत से चमत्कारपुर-क्षेत्र का ठीक-ठीक प्रमाण और वहाँ के पुण्य तीर्थों व देवालयों का विवरण पूछते हैं। सूत बताते हैं कि यह क्षेत्र पाँच क्रोश तक विस्तृत है—पूर्व में गयाशिर, पश्चिम में हरि का पादचिह्न, और दक्षिण तथा उत्तर में गोकर्णेश्वर के पवित्र स्थान इसकी सीमाएँ माने जाते हैं। वे यह भी कहते हैं कि इसका पूर्व नाम हाटकेश्वर था और यह स्थान पाप-नाशक के रूप में प्रसिद्ध है। फिर ब्राह्मणों के आग्रह पर सूत राजा विदूरथ की कथा आरम्भ करते हैं। शिकार करते-करते राजा का पीछा भयानक बन जाता है; काँटों से भरे, जलहीन, छायाहीन वन में तीव्र गर्मी और हिंसक पशुओं का भय उसे घेर लेता है। सेना से बिछुड़कर वह अत्यन्त थक जाता है और संकट बढ़ता जाता है; अंत में उसका घोड़ा गिर पड़ता है—जो आगे चलकर इस क्षेत्र की पवित्रता और नैतिक अर्थ के उद्घाटन की भूमिका बनता है।

प्रेतसंवादः — विदूरथस्य प्रेतैः सह संवादः तथा जैमिन्याश्रमप्रवेशः (Dialogue with Pretas and Entry into Jaimini’s Āśrama)
इस अध्याय में दो क्रम जुड़े हुए हैं। पहले, कठिन वन में भूख-प्यास से व्याकुल राजा विदूरथ को तीन भयानक प्रेत मिलते हैं। वे संवाद के माध्यम से अपने कर्म-नाम बताते हैं—मांसाद, विदैवत, कृतघ्न—और समझाते हैं कि निरन्तर अधर्म, पूजा-उपासना की उपेक्षा, कृतघ्नता, अतिथि का अपमान, अशौच आदि से प्रेत-योनि प्राप्त होती है। फिर गृहस्थ-धर्म और श्राद्ध-आचार का व्यावहारिक उपदेश आता है—अशुभ समय में श्राद्ध, अपर्याप्त दक्षिणा, वैश्यदेव का त्याग, अतिथि-सत्कार में कमी, भोजन की अशुद्धि/दूषण, घर में अमंगल आदि स्थितियों में प्रेतों के ‘भोग’ लेने की बात कही गई है। परस्त्रीगमन, चोरी, निन्दा, विश्वासघात, परधन का दुरुपयोग, ब्राह्मण-दान में बाधा, निर्दोष पत्नी का त्याग आदि प्रेतत्व के कारण बताए गए हैं; और इनके विपरीत परस्त्री को मातृवत् देखना, दान, समता, करुणा, यज्ञ-तीर्थपरायणता तथा कुएँ-तालाब जैसे लोकहित-कार्य रक्षक गुण हैं। प्रेत गयाश्राद्ध को निर्णायक प्रायश्चित्त मानकर याचना करते हैं। दूसरे भाग में राजा उत्तर दिशा में जाकर सरोवर-तट के शांत जैमिनि-आश्रम में पहुँचता है। वहाँ ऋषि जैमिनि और तपस्वियों से मिलकर जल-फल पाता है, अपनी विपत्ति सुनाता है और सायंकालीन कर्मों में सहभागी होता है; रात्रि के वर्णन में नैतिक चेतावनी के रूप में निशा के भय और सावधानियाँ भी आती हैं।

सत्योपदेशः—गयाशीर्षे श्राद्धेन प्रेतमोक्षणम् (Instruction on Truthfulness—Preta-Liberation through Śrāddha at Gayāśiras)
सूता बताते हैं कि राजा विदूरथ दुःखी सेवकों से पुनः मिलकर ऋषियों के वन में विश्राम करता है और फिर माहिष्मती की ओर लौटते हुए गयाशीर्ष तीर्थ की यात्रा करता है। वहाँ वह श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है। स्वप्न-दर्शन में ‘मांसाद’ नामक एक प्रेत दिव्य रूप में प्रकट होकर कहता है कि राजा के श्राद्ध से उसे प्रेत-योनि से मुक्ति मिल गई। इसके बाद ‘कृतघ्न’ नामक दूसरा प्रेत—अकृतज्ञ तथा सरोवर-धन की चोरी से जुड़ा—अब भी पाप के कारण पीड़ित दिखाई देता है और बताता है कि सत्य ही मोक्ष का मूल उपाय है। वह सत्य की महिमा गाता है—सत्य परम ब्रह्म है, सत्य तप है, सत्य ज्ञान है, और सत्य से ही जगत का धर्म टिका है; सत्य के बिना तीर्थ-सेवा, दान, स्वाध्याय और गुरु-सेवा निष्फल हो जाते हैं। फिर वह स्थान-निर्देश देता है: हाटकेश्वर-क्षेत्र के चामत्कारपुर में गयाशीर्ष रेत के नीचे छिपा है; प्लक्ष-वृक्ष के नीचे दर्भ, वन-शाक और वन्य तिल के साथ शीघ्र श्राद्ध करो। विदूरथ छोटा कुआँ खोदकर जल निकालता है और विधिपूर्वक श्राद्ध पूर्ण करता है; तत्क्षण कृतघ्न प्रेत दिव्य देह पाकर विमान से प्रस्थान करता है। अंत में उस कुएँ की कीर्ति पितरों के लिए नित्य कल्याणकारी बताई गई है। प्रेत-पक्ष की अमावस्या को कालशाक, वन्य तिल और कटा दर्भ लेकर वहाँ श्राद्ध करने से ‘कृतघ्न-प्रेत-तीर्थ’ का पूर्ण फल मिलता है; अनेक पितृगण वहाँ सदा उपस्थित माने गए हैं, इसलिए उचित समय पर या विशेष अवसरों के बाहर भी वहाँ श्राद्ध करना पितृ-तृप्ति हेतु प्रशंसित है।

Pitṛ-kūpikā-śrāddha, Gokarṇa-gamana, and Bālamaṇḍana-tīrtha Śuddhi (पितृकूपिका-श्राद्धम्, गोकर्णगमनम्, बालमण्डनतीर्थशुद्धिः)
सूत जी कहते हैं कि वनवास के समय श्रीराम सीता और लक्ष्मण के साथ ‘पितृ-कूपिका’ नामक स्थान पर पहुँचे। संध्याकालीन कर्मों के बाद राम ने स्वप्न में प्रसन्न और अलंकृत दशरथ को देखा। ब्राह्मणों से पूछने पर उन्होंने इसे पितरों की ओर से श्राद्ध की याचना बताया और वन में उपलब्ध निवारा, शाक, मूल तथा तिल आदि से तपस्वी-विधि के अनुसार श्राद्ध करने का विधान बताया। राम ने आमंत्रित ब्राह्मणों के साथ विधिपूर्वक श्राद्ध सम्पन्न किया। श्राद्ध के समय सीता लज्जावश अलग हो गईं। बाद में उन्होंने कहा कि उन्हें ब्राह्मणों में ही दशरथ और अन्य पितृगण प्रत्यक्ष प्रतीत हुए, इसलिए उनके मन में संकोच हुआ। राम ने उनके शुद्ध भाव और धर्मसम्मत उद्देश्य को स्वीकार कर उस दुविधा का समाधान किया। इसके बाद लक्ष्मण को अपने ऊपर सेवक-भाव का भार लगने से क्रोध आया और वे मन में अनुचित विचार करने लगे; फिर परस्पर समझौते से संबंधों की मरम्मत हुई। तभी मुनि मार्कण्डेय आए और तीर्थ-शुद्धि का उपदेश देकर अपने आश्रम के निकट बालमण्डन-तीर्थ में स्नान का विधान किया, जो मन से किए गए बड़े दोषों को भी धो देता है। वे वहाँ स्नान कर पितामह के दर्शन पाकर दक्षिण दिशा की ओर आगे बढ़े—इस प्रकार स्थान, श्राद्ध और नैतिक शुद्धि एक सूत्र में जुड़ते हैं।

बालसख्यतीर्थप्रादुर्भावः — Origin of Bālasakhya Tīrtha and Brahmā’s Grace to Mārkaṇḍeya
अध्याय का आरम्भ ब्राह्मणों के प्रश्न से होता है—मार्कण्डेय कहाँ रहते थे, ब्रह्मा की प्रतिष्ठा का स्थान कौन-सा है और ऋषि का आश्रम कहाँ था। सूत बताते हैं कि चमत्कारपुर के निकट मृकण्डु मुनि तपोवन में रहते थे; वहीं तेजस्वी पुत्र मार्कण्डेय का जन्म हुआ। एक सामुद्रिक-विद्या जानने वाला ब्राह्मण आया और बोला कि बालक छह मास में मर जाएगा। तब मृकण्डु ने उसे नियम-धर्म सिखाया और विशेषकर यह बताया कि घूमते हुए ब्राह्मणों और ऋषियों को आदरपूर्वक प्रणाम करना चाहिए। बालक के बार-बार प्रणाम करने पर अनेक ऋषियों ने उसे “दीर्घायु” का आशीर्वाद दिया; पर वसिष्ठ ने सत्य की रक्षा हेतु कहा कि तीसरे दिन ही मृत्यु निश्चित है—इससे आशीर्वचन और सत्य के बीच संकट खड़ा हो गया। सब ऋषियों ने निश्चय किया कि नियत मृत्यु को केवल पितामह ब्रह्मा ही टाल सकते हैं। वे ब्रह्मलोक गए, वेद-मंत्रों से ब्रह्मा की स्तुति की और सारी बात निवेदित की। ब्रह्मा ने बालक को जरा-मरण से रहित होने का वर दिया और यह भी कहा कि पिता पुत्र-दर्शन से पहले शोक से न मरे। ऋषि लौटकर अग्नितीर्थ के पास आश्रम-समीप बालक को छोड़कर तीर्थयात्रा में आगे बढ़ गए। इधर मृकण्डु और उनकी पत्नी बालक को खोया मानकर और भविष्यवाणी स्मरण कर शोक में आत्मदाह को उद्यत हुए, तभी बालक लौट आया और ऋषियों की यात्रा तथा ब्रह्मा के वर का समाचार सुनाया। कृतज्ञ मृकण्डु ने ऋषियों का सत्कार किया; उन्होंने प्रतिदान के रूप में उसी स्थान पर ब्रह्मा की स्थापना कर पूजा करने का विधान बताया। यह तीर्थ “बालसख्य” कहलाया—बालकों के लिए हितकारी, रोग-शमन, भय-नाशक तथा ग्रह-भूत-पिशाच बाधा से रक्षक। फलश्रुति में कहा गया है कि श्रद्धा से स्नान मात्र भी उच्च गति देता है; ज्येष्ठ मास में स्नान करने से वर्षभर क्लेश नहीं रहता।

बालमण्डनतीर्थोत्पत्तिः — Origin of the Bālamaṇḍana Tīrtha and the Śakreśvara Observance
ऋषि पूछते हैं—वह कौन-सा तीर्थ है जहाँ लक्ष्मण और इन्द्र को स्वामिद्रोह (स्वामी/अधिकार-भंग) के पाप से मुक्ति मिली? सूत जी उसकी उत्पत्ति-कथा सुनाते हैं। दक्ष की वंशावली में कश्यप की दो प्रमुख पत्नियाँ—अदिति और दिति—से देवों और अधिक बलवान दैत्यों का जन्म, तथा दोनों के संघर्ष का वर्णन आता है। दिति देवों से श्रेष्ठ पुत्र पाने हेतु कठोर व्रत करती है; शिव प्रसन्न होकर वर देते हैं। भविष्यवाणी से भयभीत इन्द्र दिति की सेवा करता है और व्रत-भंग का अवसर खोजता है। प्रसव-समय दिति के सो जाने पर इन्द्र गर्भ में प्रवेश कर भ्रूण को सात भागों में, फिर प्रत्येक को सात में काट देता है—इस प्रकार उनचास शिशु उत्पन्न होते हैं। दिति इन्द्र की सत्य स्वीकारोक्ति सुनकर परिणाम को कल्याणकारी बनाती है—वे बाल ‘मरुत’ कहलाते हैं, दैत्य-भाव से मुक्त होकर इन्द्र के सहायक और यज्ञ-भाग के अधिकारी बनते हैं। यह स्थान ‘बालमण्डन’ कहलाता है; गर्भवती स्त्रियों के लिए वहाँ स्नान और प्रसव-काल में उस जल का पान रक्षक माना गया है। अपने स्वामिद्रोह के प्रायश्चित्त हेतु इन्द्र वहाँ शिवलिङ्ग की स्थापना कर ‘शक्रेश्वर’ की सहस्र वर्षों तक आराधना करता है। शिव इन्द्र का पाप हरते हैं और मनुष्यों को भी वहाँ स्नान-दर्शन-पूजन से पापक्षय का वर देते हैं। आश्विन शुक्ल दशमी से पूर्णिमा (पञ्चदशी) तक श्राद्ध करने से समस्त तीर्थ-स्नान का फल, यहाँ तक कि अश्वमेध-सदृश पुण्य मिलता है; उस समय इन्द्र की विशेष उपस्थिति से मानो सभी तीर्थ वहीं एकत्र हो जाते हैं। अंत में नारद-प्रोक्त दो श्लोक उद्धृत हैं—बालमण्डन में स्नान और आश्विन-व्रत के अवसर पर शक्रेश्वर-दर्शन से पापों से मुक्ति होती है।

मृगतीर्थमाहात्म्य (Mṛgatīrtha Māhātmya — The Glory of the Deer-Tīrtha)
सूत जी पश्चिम दिशा में स्थित एक परम पवित्र तीर्थ ‘मृगतीर्थ’ का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि जो व्यक्ति श्रद्धा सहित चैत्र शुक्ल चतुर्दशी के दिन सूर्योदय के समय वहाँ स्नान करता है, वह भारी पापों से ग्रस्त होने पर भी पशु-योनि में नहीं गिरता; तीर्थ-स्नान से शुद्धि और उन्नति होती है। ऋषि उससे इसकी उत्पत्ति और विशेष फल पूछते हैं। सूत कथा सुनाते हैं—एक घने वन में शिकारी हिरनों के झुंड का पीछा करते हैं। बाणों से घायल और भयभीत हिरन एक गहरे जलाशय में कूद पड़ते हैं। उस जल के प्रभाव से वे मनुष्य-भाव को प्राप्त हो जाते हैं; केवल स्नान से ही उनके बाह्य लक्षणों में भी सभ्यता और सौष्ठव प्रकट हो जाता है। फिर कारण बताया जाता है कि यह जल पूर्वोक्त ‘लिंग-भेद-उद्भव’ से सम्बद्ध है। धूल से ढँका हुआ यह स्रोत दैवी विधान से बाँबी (वल्मीक) के छिद्र से पुनः प्रकट हुआ और धीरे-धीरे उसी स्थान पर प्रसिद्ध हुआ। एक उदाहरण में त्रिशंकु, जो हीन अवस्था में था, वहाँ स्नान करके दिव्य रूप को पुनः प्राप्त करता है। इसलिए शिकारी और हिरन—दोनों—इस तीर्थ में स्नान से पाप-मल से मुक्त होकर श्रेष्ठ गति पाते हैं।

विष्णुपद-तीर्थमाहात्म्यम् (The Māhātmya of the Viṣṇupada Tīrtha)
इस अध्याय में सूत जी ‘विष्णुपद’ नामक तीर्थ का माहात्म्य बताते हैं, जो परम शुभ और समस्त पापों का नाशक है। दक्षिणायन और उत्तरायण के संधिकाल में जो भक्त श्रद्धा और एकाग्रता से विष्णु के पादचिह्न की पूजा करके ‘आत्म-निवेदन’ करता है, उसे विष्णु का परम पद प्राप्त होता है। ऋषि उस तीर्थ की उत्पत्ति तथा दर्शन, स्पर्श और स्नान के फल पूछते हैं। सूत त्रिविक्रम प्रसंग सुनाते हैं—विष्णु ने बलि को बाँधा और तीन पगों से तीनों लोकों को व्याप्त किया; उसी समय दिव्य, निर्मल जल का अवतरण हुआ, जो आगे चलकर गंगा कहलाया और ‘विष्णुपदी’ के नाम से स्मरण की गई, जिससे वह प्रदेश पवित्र हुआ। विधिपूर्वक स्नान के बाद पादचिह्न का स्पर्श परमगति देता है; वहाँ किया गया श्राद्ध गया के समान फलदायक है; माघ-स्नान प्रयाग के तुल्य फल देता है; दीर्घ साधना और अस्थि-विसर्जन भी मोक्ष में सहायक बताए गए हैं। नारद-प्रोक्त गाथा के आधार पर कहा गया है कि विष्णुपदी जल में एक बार स्नान करने से अनेक तीर्थों, दानों और तपों के संयुक्त फल की प्राप्ति होती है। अंत में अयन-व्रत हेतु मंत्र दिया गया है—यदि छह मास के भीतर मृत्यु हो जाए तो विष्णु का पादचिह्न ही मेरी शरण हो; फिर ब्राह्मण-पूजन और सामूहिक भोजन को कर्म की धर्मपूर्ण समाप्ति बताया गया है।

विष्णुपदीगङ्गाप्रभावः — The Efficacy of the Viṣṇupadī Gaṅgā
सूता जी गंगा-माहात्म्य के रूप में एक शिक्षाप्रद प्रसंग सुनाते हैं। चमत्कारपुर का संयमी ब्राह्मण चण्डशर्मा युवावस्था के आसक्तिभाव में पड़ जाता है। एक रात प्यास लगने पर वह जल समझकर एक गणिका के हाथ से मदिरा पी लेता है, क्योंकि उसने भी उसे पानी ही मान लिया था। ब्राह्मण के लिए इस अपराध का बोध होते ही वह प्रायश्चित्त पूछने विद्वान ब्राह्मणों की सभा में जाता है; वे धर्मशास्त्र के अनुसार उतनी ही मात्रा में अग्निवर्ण घृत पीने का विधान बताते हैं जितनी मदिरा पी गई थी। प्रायश्चित्त की तैयारी में उसके माता-पिता आ पहुँचते हैं। पिता शास्त्र देखकर कठोर उपायों पर विचार करता है और दान तथा तीर्थयात्रा जैसे विकल्प भी बताता है; पर पुत्र नियत विधि (मौञ्जी-होम आदि का उल्लेख) करने पर अडिग रहता है। माता-पिता भी पुत्र के साथ अग्नि में प्रवेश करने का संकल्प कर लेते हैं। इसी संकट में तीर्थयात्रा करते हुए महर्षि शाण्डिल्य आते हैं और कहते हैं कि जहाँ गंगा सुलभ हो वहाँ अनावश्यक मृत्यु क्यों; कठोर तप तो गंगा-रहित प्रदेशों के लिए बताए गए हैं। वे सबको विष्णुपदी गंगा ले जाते हैं; आचमन और स्नान मात्र से चण्डशर्मा तत्काल शुद्ध हो जाता है, और दिव्य वाणी (भारती) उसकी शुद्धि की पुष्टि करती है। अध्याय पश्चिम सीमा पर स्थित इस तीर्थ को ‘पापनाशिनी’ बताकर गंगा के सर्वपापहर प्रभाव का सिद्धान्त स्थापित करता है।

हाटकेश्वरक्षेत्रमाहात्म्योपदेशः (Instruction on the Glory of Hāṭakeśvara Kṣetra)
अध्याय में सूत जी कथा का आरम्भ करते हुए दक्षिण–उत्तर सीमा-प्रसंग का संकेत देते हैं। मथुरा में यमुना-तट पर ‘गोकर्ण’ नाम के दो प्रतिष्ठित ब्राह्मणों का वर्णन आता है। यमराज की आज्ञा से दूत भ्रमवश जिस ब्राह्मण को लाता है वह दीर्घायु होता है; तब यमराज त्रुटि सुधारकर धर्म और न्याय पर ब्राह्मण से संवाद करते हैं। दरिद्रता से पीड़ित ब्राह्मण मृत्यु की इच्छा प्रकट करता है और कर्मफल, निष्पक्षता तथा दण्ड-व्यवस्था का रहस्य पूछता है; साथ ही नरकों का भेद जानना चाहता है। यमराज वैतरणी आदि इक्कीस नरकों का क्रम से निरूपण करते हैं और चोरी, विश्वासघात, झूठी गवाही, हिंसा आदि पापों के अनुसार उनके फल बताते हैं। फिर उपदेश दण्ड-वर्णन से हटकर आचार-मार्ग पर आता है—तीर्थयात्रा, देव-पूजन, अतिथि-सत्कार, अन्न-जल-आश्रय का दान, संयम, स्वाध्याय तथा लोक-कल्याण के कार्य (कुएँ, तालाब, देवालय आदि) रक्षक साधन कहे जाते हैं। अन्त में यमराज एक ‘गोपनीय’ तारक उपदेश देते हैं—आनर्त देश के हाटकेश्वर क्षेत्र में शिव-भक्ति थोड़े समय के लिए भी महान पापों का शमन कर शिवलोक प्रदान करती है। दोनों गोकर्ण वहाँ पूजा कर सीमा पर लिंग-प्रतिष्ठा करते हैं, तप करते हैं और दिव्य गति पाते हैं। चतुर्दशी की रात्रि-जागरण की विशेष प्रशंसा है, जो संतान, धन और अंततः मोक्ष तक फल देती है। क्षेत्र में निवास, खेती, स्नान और पशुओं की मृत्यु तक को पुण्यदायक कहा गया है, जबकि धर्म-विरोधी जन शुभ अवस्था से बार-बार गिरते बताए गए हैं।

युगप्रमाण-स्वरूप-माहात्म्यवर्णनम् (Yuga Measures, Characteristics, and Their Theological Significance)
इस अध्याय में चारों युगों का प्रमाण (काल-मान), स्वरूप (लक्षण) और उनका धर्म-नीति सम्बन्धी माहात्म्य क्रम से बताया गया है। ऋषि सूत से पूछते हैं कि कृत, त्रेता, द्वापर और कलि—इन सबका पूर्ण वर्णन करें। सूत एक प्राचीन प्रसंग सुनाते हैं: देवसभा में इन्द्र (शक्र) देवों सहित बैठे बृहस्पति से युगों की उत्पत्ति और मानदण्डों के विषय में विनयपूर्वक प्रश्न करते हैं। बृहस्पति कृतयुग का वर्णन करते हैं—धर्म चार पादों पर पूर्ण, आयु दीर्घ, यज्ञ-आचार सुव्यवस्थित, रोग, नरक-भय और प्रेत-स्थिति जैसे दुःख नहीं; लोग निष्काम भाव से कर्म करते हैं। त्रेतायुग में धर्म तीन पादों का रह जाता है, स्पर्धा और काम्य-धर्म बढ़ता है; ग्रन्थ के अनुसार मिश्र-विवाहों से समाज में अनेक संकर-समूहों की उत्पत्ति का वर्गीकरण भी बताया जाता है। द्वापर में धर्म और पाप बराबर (दो-दो) हो जाते हैं, संशय बढ़ता है और कर्मफल अधिकतर संकल्प/भाव के अनुसार मिलता है। कलियुग में धर्म एक पाद का, विश्वास टूटता है, आयु घटती है, प्रकृति और नैतिकता में अव्यवस्था बढ़ती है तथा धार्मिक संस्थाएँ भी क्षीण होती हैं। अंत में फलश्रुति है—इस युग-उपदेश का पाठ या श्रवण जन्म-जन्मान्तर के पापों का नाश करता है।

Hāṭakeśvara-kṣetra: Tīrthānāṃ Kali-bhaya-śaraṇya (Hāṭakeśvara as a refuge of tīrthas from Kali)
यह अध्याय सूतजी द्वारा ऋषियों की सभा में कहा गया है। देवसभा में प्रभास आदि देहधारी तीर्थ कलियुग के आरम्भ से भयभीत होकर निवेदन करते हैं कि अशुद्ध संस्पर्श के कारण उनका प्रभाव नष्ट न हो; इसलिए वे ऐसे सुरक्षित आश्रय-स्थान की याचना करते हैं जो कलिदोष से अछूता रहे। करुणामय शक्र (इन्द्र) बृहस्पति से पूछते हैं कि तीर्थों के लिए ‘कली से अप्रभावित’ सामूहिक शरण कहाँ है। बृहस्पति विचार करके हाटकेश्वर नामक अनुपम क्षेत्र बताते हैं, जो शूलधारी शिव के लिंग के ‘पतन’ से प्रकट माना गया है, और जहाँ त्रिशंकु के लिए विश्वामित्र ने तप किया था। प्रसंग में त्रिशंकु का कलंकित अवस्था का त्याग और देह सहित स्वर्ग-प्राप्ति स्मरण कराई जाती है, जिससे यह स्थान नैतिक व वैदिक-क्रिया के उलटफेर/उद्धार का तीर्थ बनता है। रक्षा-व्यवस्था भी कही गई है—इन्द्र की आज्ञा से संवरतक वायु ने तीर्थ को धूल से भर दिया; कलियुग में नीचे हाटकेश्वर और ऊपर अचलेश्वर रक्षा करते हैं। पाँच क्रोश की सीमा वाला यह क्षेत्र कली की पहुँच से परे घोषित है; इसलिए तीर्थ अपने-अपने अंश रूप में वहाँ निवास करते हैं। अंत में असंख्य तीर्थों की उपस्थिति बताकर आगे नाम, स्थान और फल का विवरण देने की भूमिका बनती है; तथा फलश्रुति में कहा है कि इन तीर्थों का श्रवण, ध्यान, स्नान, दान और स्पर्श भी पापहर है।

Siddheśvara-liṅga Māhātmya and the Śaiva Ṣaḍakṣara: Longevity, Release from Curse, and Ahiṃsā-Instruction
अध्याय 29 में सूत जी एक ऐसे प्रसिद्ध क्षेत्र का वर्णन करते हैं जहाँ ऋषि, तपस्वी और राजा तप व सिद्धि के लिए एकत्र होते हैं। हाटकेश्वर-क्षेत्र में स्थित सिद्धेश्वर-लिंग का माहात्म्य बताया गया है—उसका स्मरण, दर्शन और स्पर्श भी सिद्धि देने वाला माना गया है। फिर दक्षिणामूर्ति-संदर्भ से जुड़ा शैव षडक्षर मंत्र प्रस्तुत होता है और जप की संख्या से आयु-वृद्धि होने की बात सुनकर ऋषि विस्मित हो जाते हैं। सूत जी वत्स नामक ब्राह्मण का प्रत्यक्ष दृष्टांत सुनाते हैं—अत्यधिक वर्षों का होते हुए भी वह युवक-सा दिखता है। वह बताता है कि सिद्धेश्वर के निकट निरंतर षडक्षर-जप से उसकी युवावस्था स्थिर रही, ज्ञान बढ़ा और स्वास्थ्य बना रहा। इसके बाद अंतर्कथा आती है: एक धनवान युवक शिवोत्सव में विघ्न डालता है, शिष्य के वचन से सर्प-रूप का शाप पाता है; फिर उसे बताया जाता है कि षडक्षर मंत्र भारी दोषों को भी शुद्ध कर सकता है। वत्स के जल-सर्प पर प्रहार करते ही दिव्य रूप प्रकट होता है और शाप से मुक्ति मिलती है। अध्याय आगे नीति-उपदेश देता है—सर्प-वध का त्याग, अहिंसा को परम धर्म मानना, मांसाहार के तर्कों की आलोचना और हिंसा में सहभागी होने के भेद। अंत में श्रवण-पाठ और मंत्र-जप को रक्षक, पुण्यदायक और पाप-नाशक साधना बताकर फलश्रुति दी गई है।

Siddheśvara at Camatkārapura: Hamsa’s Tapas, Liṅga-Pūjā, and Ṣaḍakṣara-Mantra Phala
अध्याय 30 में ऋषि पूछते हैं कि उस स्थान पर सिद्धेश्वर कैसे प्रसन्न हुए। सूत पूर्वकथा सुनाते हैं—हंस नामक एक सिद्ध पुत्रहीनता और बढ़ती आयु से व्याकुल था। वह उपाय जानने के लिए आंगिरसपुत्र बृहस्पति के पास गया और तीर्थ, व्रत या शांति-कर्म में से कौन-सा साधन संतान-प्राप्ति के लिए श्रेष्ठ है, यह पूछता है। विचार करके बृहस्पति उसे चमत्कारपुर क्षेत्र में जाकर तप करने की आज्ञा देते हैं और कहते हैं कि वहीं वंश को धारण करने वाला योग्य पुत्र मिलेगा। हंस वहाँ पहुँचकर विधिपूर्वक लिंग-पूजन करता है और दिन-रात नियमपूर्वक भक्ति करता रहता है—पुष्प, नैवेद्य, गीत-वाद्य तथा कठोर तप के साथ। वह चांद्रायण, कृच्छ्र, प्राजापत्य/पराक आदि व्रत और मास-पर्यंत उपवास भी करता है। सहस्र वर्ष पूर्ण होने पर महादेव उमा सहित प्रकट होकर दर्शन देते हैं और वर माँगने को कहते हैं। हंस वंश-स्थापन हेतु पुत्रों की याचना करता है। शिव उस लिंग की स्थायी प्रतिष्ठा का विधान करते हैं और सार्वभौम प्रतिज्ञा बताते हैं—जो वहाँ भक्तिपूर्वक पूजन करेगा, उसे इच्छित फल मिलेगा; और जो लिंग के दक्षिण भाग से जप करेगा, उसे षडक्षर मंत्र की प्राप्ति तथा दीर्घायु और पुत्र-लाभ आदि फल मिलेंगे। फिर शिव अंतर्धान हो जाते हैं; हंस घर लौटकर पुत्रों को प्राप्त करता है। अंत में कठिन साध्य कामनाओं के लिए स्पर्श, पूजन, प्रणाम और षडक्षर के प्रभावी जप की सावधानीपूर्वक विधि बताई गई है।

Nāgatīrtha–Nāgahṛda Māhātmya (श्रावणपञ्चमी-व्रत, नागपूजा, श्राद्ध-फलश्रुति)
अध्याय 31 में नागतीर्थ ‘नागह्रद’ की महिमा कही गई है। यहाँ स्नान करने से सर्प-भय दूर होता है। विशेष रूप से श्रावण मास की कृष्ण-पक्ष पंचमी को स्नान करने से वंश-पर्यन्त सर्पदंश आदि संकटों से रक्षा बताई गई है। इसके पीछे की कथा में शेष आदि प्रमुख नागों का वर्णन है, जो माता के शाप-प्रेरित होकर तप करते हैं और उनकी संतति बढ़कर मनुष्यों के लिए उपद्रव बन जाती है। पीड़ित प्राणी ब्रह्मा की शरण जाते हैं। ब्रह्मा नौ नाग-नायकों को संतान-निग्रह का उपदेश देते हैं; जब यह न हो सका, तब वे पाताल-निवास का विधान और पृथ्वी पर आने के लिए पंचमी का समय-नियम स्थापित करते हैं। साथ ही धर्म-नियम बताते हैं कि निर्दोष मनुष्यों, विशेषकर मंत्र-औषधि से रक्षित जनों को हानि न पहुँचाई जाए। फिर कर्म-फल कहा गया है—श्रावण पंचमी को नाग-पूजा से अभीष्ट सिद्धि होती है और वहीं किया गया श्राद्ध अत्यन्त फलदायी है; पुत्र-प्राप्ति चाहने वालों तथा सर्पदंश-मृतकों के लिए भी। कहा गया है कि ऐसे मृतक का प्रेतत्व तब तक बना रह सकता है, जब तक इस तीर्थ में विधिवत श्राद्ध न हो। उदाहरण में राजा इन्द्रसेन सर्पदंश से मरते हैं; पुत्र अन्यत्र श्राद्ध करके भी फल नहीं पाता, स्वप्नादेश से चमत्कारपुर/नागह्रद में श्राद्ध करता है। श्राद्ध-भोजी ब्राह्मण मिलना कठिन होता है, अंततः देवशर्मा स्वीकार करते हैं और आकाशवाणी पिता की मुक्ति की पुष्टि करती है। अंत में फलश्रुति—पंचमी को इसका श्रवण-पाठ सर्पभय हरता है, भक्षणजन्य आदि पाप घटाता है, गया-श्राद्ध के समान फल देता है; तथा श्राद्ध-काल में इस माहात्म्य के पाठ से द्रव्य, व्रत या कर्ता-सम्बन्धी दोष भी शांत होते हैं।

सप्तर्ष्याश्रम-माहात्म्य तथा लोभ-निरोधोपदेशः (Glory of the Saptarṣi Āśrama and Instruction on Restraining Greed)
सूता जी शुभ क्षेत्र में स्थित प्रसिद्ध सप्तर्षि-आश्रम का माहात्म्य बताते हैं। श्रावण पूर्णिमा/पंद्रहवीं को स्नान करने से मनोवांछित फल मिलता है, और वन के सरल फल‑मूल आदि से किया गया श्राद्ध भी महान सोमयज्ञों के समान पुण्यदायक कहा गया है। भाद्रपद शुक्ल पंचमी को क्रमशः पूजन का विधान दिया है, जिसमें अत्रि, वसिष्ठ, कश्यप, भरद्वाज, गौतम, कौशिक (विश्वामित्र), जमदग्नि और अरुंधती के नामों सहित मंत्रोच्चार से आराधना होती है। फिर बारह वर्ष के दुर्भिक्ष का प्रसंग आता है—वर्षा न होने से लोकाचार टूटने लगते हैं, पर भूख से पीड़ित ऋषि भी अधर्म की ओर नहीं जाते। राजा वृषादर्भि उन्हें प्रतिग्रह (राज-दान स्वीकार) के लिए उकसाता है, किंतु वे उसे नैतिक रूप से संकटकारी मानकर अस्वीकार करते हैं। राजा सोने से भरे उदुम्बर रखकर परीक्षा लेता है; ऋषि छिपे धन को ठुकराकर अपरिग्रह, संतोष और बढ़ती हुई कामना के स्वभाव पर उपदेश देते हैं। चमत्कारपुर-क्षेत्र में उन्हें कुत्ते-मुख वाला भिक्षुक मिलता है (जो बाद में इन्द्र/पुरन्दर प्रकट होता है)। वह उनके जुटाए कमल-नाल छीनकर उनकी प्रतिज्ञा और धर्म-निष्ठा की परीक्षा करता है; फिर इन्द्र अपनी लीला बताकर उनके अलोभ की प्रशंसा करता और वर देता है। ऋषि अपने आश्रम को नित्य पावन, पाप-नाशक तीर्थ बनाने का वर मांगते हैं; इन्द्र कहता है कि वहाँ श्रावण में किया श्राद्ध अभीष्ट सिद्ध करेगा और निष्काम कर्म मोक्ष देगा। वे वहीं तप करते हुए अमरत्व-सदृश पद पाते हैं, शिवलिंग की स्थापना करते हैं; उसके दर्शन-पूजन से शुद्धि और मुक्ति का फल बताया गया है। अंत में फलश्रुति में इस आश्रम-कथा को आयुष्यवर्धक और पापहारी कहा गया है।

अगस्त्याश्रम-माहात्म्य तथा विंध्य-निग्रहः (Agastya’s Hermitage: Sanctity, the Vindhya Episode, and the Solar Observance)
सूता बताते हैं कि अगस्त्य के पवित्र आश्रम में महादेव की आराधना होती है। चैत्र शुक्ल चतुर्दशी को दिवाकर (सूर्य) वहाँ आकर शंकर की पूजा करते हैं। जो भक्तिभाव से वहाँ शिव-पूजन करते हैं, वे दिव्य सान्निध्य पाते हैं; और उचित श्रद्धा से किया गया श्राद्ध पितरों को वैसे ही तृप्त करता है जैसे विधिवत् पितृकर्म। ऋषि पूछते हैं कि सूर्य अगस्त्याश्रम की परिक्रमा क्यों करते हैं। सूता विंध्य की कथा कहते हैं—सुमेरु से स्पर्धा के कारण विंध्य ने सूर्य का मार्ग रोक दिया, जिससे काल-गणना, ऋतुएँ और यज्ञ-चक्र बिगड़ने लगे। सूर्य ब्राह्मण-वेश में अगस्त्य की शरण लेते हैं; अगस्त्य विंध्य से कहते हैं कि अपनी ऊँचाई घटाकर मेरे दक्षिण-गमन तक वैसे ही स्थिर रहो। फिर अगस्त्य एक लिंग की स्थापना करते हैं और सूर्य को आदेश देते हैं कि उसी तिथि पर प्रतिवर्ष उसका पूजन करें; जो मनुष्य उस चतुर्दशी को उस लिंग की पूजा करता है, वह सूर्यलोक तथा मोक्षाभिमुख पुण्य प्राप्त करता है। अंत में सूता वहाँ सूर्य के आवर्तन का स्मरण कर आगे प्रश्न करने को कहते हैं।

अध्याय ३४ — देवासुरसंग्रामे शंभोः परित्राणकथनम् (Chapter 34: Śambhu’s Intervention in the Deva–Dānava Battle)
अध्याय 34 में ऋषि सूत से पहले कही गई कथा—एक मुनि और क्षीरसागर (पयसां-निधि) के प्रसंग—के बारे में पूछते हैं। सूत तब एक पुराने संकट का वर्णन करते हैं, जब कालेय/कालिकेय नामक प्रबल दानव उत्पन्न होकर देवताओं के तेज को दबाने लगे और तीनों लोकों की व्यवस्था डगमगा दी। देवों की पीड़ा देखकर विष्णु महेश्वर से निवेदन करते हैं कि अब तत्काल प्रतिकार आवश्यक है। विष्णु, रुद्र और इन्द्र के नेतृत्व में देवसेना युद्ध के लिए एकत्र होती है और भयंकर संग्राम छिड़ जाता है। विशेष प्रसंग में इन्द्र का सामना दानव कालप्रभ से होता है—वह इन्द्र का वज्र छीन लेता है और भारी गदा से इन्द्र को गिरा देता है; भय और अव्यवस्था में देव पीछे हटते हैं। तब गरुड़ारूढ़ विष्णु अस्त्र-जालों को काटते हुए दानवों को तितर-बितर करते हैं, पर कालखञ्ज विष्णु और गरुड़ को घायल कर देता है। विष्णु सुदर्शन चक्र छोड़ते हैं, जिसे दानव सीधे रोकने का प्रयास करता है, जिससे विष्णु का संकट बढ़ता है। इसी समय त्रिपुरान्तक शिव निर्णायक रूप से प्रकट होकर शूल-प्रहार से उस दानव आक्रान्ता का वध करते हैं और कालप्रभ आदि ‘काल’-उपाधि वाले प्रमुख दानव-नायकों को परास्त कर देते हैं। नेतृत्व टूटते ही इन्द्र और विष्णु धैर्य पाकर महादेव की स्तुति करते हैं; देव शेष दानवों को खदेड़ देते हैं। घायल और नायकविहीन दानव भागकर वरुण के धाम में शरण लेते हैं। अध्याय का संदेश है—देवों की संयुक्त क्रिया से धर्म की पुनर्स्थापना होती है और शम्भु का संरक्षण त्रैलोक्य को स्थिर करता है।

अगस्त्येन सागरशोषणं तथा कालेयदानवनिग्रहः (Agastya Dries the Ocean and the Suppression of the Kāleya Asuras)
इस अध्याय में कालेय दैत्य समुद्र में शरण लेकर रात्रि में ऋषियों, यज्ञ करने वालों और धर्मनिष्ठ जनसमुदायों पर आक्रमण करते हैं, जिससे पृथ्वी पर यज्ञ-धर्म का प्रवाह टूट जाता है। यज्ञभाग न मिलने से देवगण अत्यन्त व्याकुल हो उठते हैं और समझते हैं कि समुद्र की आड़ में छिपे शत्रुओं का दमन संभव नहीं। तब वे चामत्कारपुर के पवित्र क्षेत्र में स्थित महर्षि अगस्त्य की शरण लेते हैं। अगस्त्य देवों का सत्कार कर वर्षांत में विद्या-बल और योगिनी-शक्ति के आश्रय से समुद्र को शोषित करने का वचन देते हैं। वे पवित्र पीठों की स्थापना कर योगिनी-गणों की, विशेषतः कन्या-रूपिणियों की, विधिवत पूजा करते हैं; दिक्पालों और क्षेत्रपालों का सम्मान करते हैं तथा ‘शोषिणी’ विद्या से सम्बद्ध आकाशगामिनी देवी को प्रसन्न करते हैं। देवी सिद्धि देकर अगस्त्य के मुख में प्रवेश करती है और अगस्त्य समुद्र का पान कर लेते हैं; समुद्र स्थल के समान हो जाता है। तब देवगण प्रकट हुए दैत्यों का संहार करते हैं, शेष पाताल में भाग जाते हैं। देवों के जल-स्थापन निवेदन पर अगस्त्य बताते हैं कि आगे चलकर सगर के साठ हजार पुत्रों के खोदने और भगीरथ द्वारा गंगा के अवतरण से समुद्र पुनः भर जाएगा। अंत में अगस्त्य प्रार्थना करते हैं कि चामत्कारपुर के पीठ सदा स्थिर रहें; अष्टमी और चतुर्दशी की पूजा से अभीष्ट फल मिले—देव ‘चित्रेश्वर’ नामक पीठ की स्थापना कर, पापभार से युक्त जनों को भी शीघ्र सिद्धि का आश्वासन देते हैं।

चित्रेश्वरपीठ-मन्त्रजप-माहात्म्य (Glorification of Mantra-Japa at the Citreśvara Pīṭha)
अध्याय 36 में ऋषि अगस्त्य-प्रतिष्ठित चित्रेश्वरपीठ की मर्यादा और प्रभाव पूछते हैं। सूत उस तीर्थ की महिमा का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन करते हुए बताते हैं कि वहाँ किया गया मन्त्र-जप योगियों को सिद्धि देता है और साधकों की अनेक कामनाएँ पूर्ण करता है—पुत्र-प्राप्ति, रक्षा, कष्ट-निवारण, समाज व राजसत्ता में अनुकूलता, धन-समृद्धि, यात्रा-सफलता तथा रोग, ग्रहपीड़ा, भूतबाधा, विष, सर्प, वन्य पशु, चोरी, विवाद और शत्रुओं से रक्षा। फिर ऋषि पूछते हैं कि जप प्रभावी कैसे होता है। सूत पिता से सुनी परम्परा और दुर्वासा-सम्बन्धी संवाद के आधार पर विधिपूर्वक क्रम बताते हैं—पहले लक्ष-जप, फिर अतिरिक्त जप, और जप का दशांश होम; शान्ति-पौष्टिक जैसे सौम्य कर्मों के अनुसार आहुतियाँ भी निर्धारित होती हैं। युगानुसार (कृत, त्रेता, द्वापर, कलि) साधना-मान बदलता है। अंत में नियमबद्ध अनुष्ठान की पूर्णता से साधक की क्षमता बढ़ती है और सिद्धि को नियंत्रित, शास्त्रीय पद्धति के रूप में स्थापित किया जाता है, न कि आकस्मिक चमत्कार की तरह।

Durvāsā, Suśīla, and the Establishment of the Duḥśīla-Prāsāda (Śiva Shrine Narrative)
इस अध्याय में विद्वान ब्राह्मणों की सभा का वर्णन है, जो वेद-व्याख्या, कर्मकाण्ड-चर्चा और वाद-विवाद में डूबी रहती है। वहाँ आए महर्षि दुर्वासा शिव-आयतन/प्रासाद की स्थापना हेतु उपयुक्त स्थान पूछते हैं, पर विद्या-गर्व और विवाद-आसक्ति के कारण सभा उत्तर नहीं देती। दुर्वासा ज्ञान, धन और कुल—इन तीन प्रकार के मद को देखकर उन्हें सामाजिक कलह का कारण बताकर शाप देते हैं। तब वृद्ध ब्राह्मण सुशील मुनि के पीछे जाकर क्षमा माँगते हैं और मंदिर-निर्माण के लिए भूमि अर्पित करते हैं। दुर्वासा उसे स्वीकार कर शुभ संस्कार करते हुए शिव-प्रासाद का निर्माण कराते हैं। पर अन्य ब्राह्मण सुशील के एकतरफा दान से क्रुद्ध होकर उसका बहिष्कार करते हैं और मंदिर-कार्य को बदनाम करते हुए उसे कीर्ति और नाम में ‘अपूर्ण’ कहकर ‘दुःशील’ नाम से पुकारते हैं। फिर भी अंत में वही धाम प्रसिद्ध हो जाता है—कहा गया है कि उसके दर्शन मात्र से पाप नष्ट होते हैं। विशेषतः शुक्लाष्टमी को मध्य-लिंग का दर्शन और मनन करने वाला नरक-लोकों का दर्शन नहीं करता। अध्याय का संदेश नम्रता और प्रायश्चित्त की महिमा तथा गुटबाजी-गर्व की निन्दा के साथ, प्रतिष्ठा और लिंग-दर्शन की आध्यात्मिक शक्ति को स्थापित करता है।

धुन्धुमारेश्वर-माहात्म्य (The Māhātmya of Dhundhumāreśvara)
इस अध्याय में सूत–ऋषि संवाद के माध्यम से धुन्धुमारेश्वर क्षेत्र का माहात्म्य कहा गया है। राजा धुन्धुमार लिङ्ग की स्थापना कर रत्नजटित प्रासाद बनवाता है और निकट के आश्रम में कठोर तप करता है। पास ही एक वापी/कुण्ड स्थापित होता है, जो शुद्ध, मंगलमय और सर्वतीर्थ-सम माना गया है; वहाँ स्नान करके धुन्धुमारेश्वर के दर्शन करने वाला यमलोक के नरकीय कष्टों और ‘दुर्ग’ बाधाओं का सामना नहीं करता—ऐसी फलश्रुति दी गई है। ऋषियों के प्रश्न पर सूत राजा की सूर्यवंशी परम्परा, ‘कुवलयाश्व’ नाम से उसका सम्बन्ध, तथा मरु-प्रदेश में दैत्य धुन्धु का वध करके प्राप्त की हुई कीर्ति का वर्णन करता है। अंत में गौरी और गणों सहित भगवान शिव प्रत्यक्ष होकर वर देते हैं; राजा लिङ्ग में नित्य सन्निधि की प्रार्थना करता है। शिव उसे स्वीकार कर चैत्र शुक्ल चतुर्दशी को विशेष पुण्यकाल बताकर स्थायी निवास प्रदान करते हैं। उपसंहार में कहा गया है कि लिङ्ग पर स्नान-पूजा से शिवलोक की प्राप्ति होती है और राजा मोक्षाभिमुख होकर वहीं स्थित रहता है।

चमत्कारपुर-क्षेत्रमाहात्म्यं तथा ययाति-लिङ्गप्रतिष्ठा (Cāmatkārapura Kṣetra-Māhātmya and Yayāti’s Liṅga Consecration)
इस अध्याय में सूत के मुख से वर्णन आता है कि धुन्धुमारेश्वर के उत्तर में चमत्कारपुर नामक पुण्य-क्षेत्र है, जहाँ राजा ययाति ने अपनी रानियों देवयानी और शर्मिष्ठा के साथ एक “उत्तम लिंग” की प्रतिष्ठा की। वह लिंग सर्वकामफल-प्रद कहा गया है—भक्ति से पूजन करने पर मनोवांछित फल देने वाला। भोगों से तृप्त होकर ययाति ने राज्य पुत्र को सौंप दिया और उच्च कल्याण की खोज में विनयपूर्वक मुनि मार्कण्डेय के पास पहुँचे। उन्होंने सभी तीर्थों और क्षेत्रों में सबसे प्रधान तथा परम पावन स्थान का विवेकयुक्त वर्णन माँगा। मार्कण्डेय ने चमत्कारपुर को “सर्वतीर्थों से अलंकृत” क्षेत्र बताया, जहाँ विष्णुपदी गंगा पापहरिणी है और दिव्य सत्ताओं का निवास माना जाता है। अध्याय में एक पवित्र चिह्न भी आता है—पितामह द्वारा द्विजों के आनंद हेतु छोड़ा गया बावन हस्त का शिलाखण्ड। साथ ही यह विशेषता कही गई है कि जो फल अन्यत्र एक वर्ष में मिलता है, वह यहाँ एक दिन में भी प्राप्त हो जाता है। यह सुनकर ययाति रानियों सहित वहाँ गए, शूलधारी शिव के लिंग की प्रतिष्ठा कर श्रद्धा से पूजन किया और अंत में किन्नर-चारणों द्वारा स्तुत, बारह सूर्यों के समान तेजस्वी दिव्य विमान से स्वर्गारोहण को प्राप्त हुए—यही फलश्रुति है।

Brahmī-Śilā, Sarasvata-Hrada, and the Ānandeśvara Sthala Narrative (ब्रह्मीशिला–सारस्वतह्रद–आनन्देश्वरकथा)
ऋषि मोक्षदायिनी और पाप-नाशिनी ब्राह्मी-शिला के विषय में पूछते हैं कि वह कैसे स्थापित हुई और उसका प्रभाव क्या है। सूत बताते हैं कि स्वर्ग में विधिवत कर्माधिकार न होने और पृथ्वी पर त्रि-संध्या-आचरण की आवश्यकता को देखकर ब्रह्मा एक विशाल शिला को पृथ्वी पर फेंकते हैं; वह चामत्कारपुर के पुण्य-क्षेत्र में आकर ठहरती है। कर्म के लिए जल आवश्यक जानकर ब्रह्मा सरस्वती को बुलाते हैं; मनुष्य-स्पर्श के भय से वह खुले रूप में पृथ्वी पर चलने से मना करती हैं, तब ब्रह्मा उनके निवास हेतु दुर्गम महाह्रद बनाते हैं और नागों को नियुक्त करते हैं कि कोई मानव-स्पर्श न हो। वहाँ मङ्कणक ऋषि आते हैं; सर्पों से बँधे होने पर भी वे ज्ञान से विष का प्रभाव शांत कर स्नान, पितृतर्पण आदि करते हैं। बाद में हाथ में चोट लगने पर वनस्पति-रस के बहने को सिद्धि का लक्षण मानकर वे उन्मत्त होकर नृत्य करने लगते हैं, जिससे जगत विचलित होता है। तब शिव ब्राह्मण-वेश में आकर भस्म-प्रकट होने का श्रेष्ठ संकेत दिखाते हैं, तप के लिए हानिकारक नृत्य रोकने की शिक्षा देते हैं और वहीं नित्य सन्निधि प्रदान कर ‘आनन्देश्वर’ कहलाते हैं; स्थान का नाम ‘आनन्द’ पड़ता है। इस कथा से जल-सर्पों के निर्विष होने की उत्पत्ति, सरस्वत-ह्रद में स्नान तथा चित्र-शिला के स्पर्श की तारक महिमा बताई जाती है। आगे यम के कथन से अत्यधिक सरल स्वर्गारोहण की चिंता होने पर इन्द्र द्वारा ह्रद को धूल से भर देने का प्रसंग भी आता है। अंत में वहाँ तप से सिद्धि की संभावना और मङ्कणक-स्थापित लिंग की पूजा—विशेषतः माघ शुक्ल चतुर्दशी को—का महान फल पुनः प्रतिपादित होता है।

अशून्यशयन-व्रतं तथा जलशायी-जनार्दन-माहात्म्यम् | Ashūnyaśayana Vrata and the Māhātmya of Jalaśāyī Janārdana
इस अध्याय में सूत, ऋषियों के प्रश्न पर, “जलशायी” (जल में शयन करने वाले विष्णु) के प्रसिद्ध उत्तरी तीर्थ का माहात्म्य कहते हैं। यह क्षेत्र पाप-बाधाओं का नाश करने वाला बताया गया है और यहाँ हरि के शयन–बोधन के साथ उपवास तथा भक्ति-पूर्वक पूजा का विधान है। कृष्ण पक्ष की द्वितीया, “अशून्यशयना” नाम से, जलशायी जनार्दन को अत्यन्त प्रिय तिथि कही गई है। उत्पत्ति-कथा में दैत्यराज बाष्कलि इन्द्र और देवताओं को पराजित करता है। तब देवगण श्वेतद्वीप में विष्णु की शरण लेते हैं, जहाँ वे शेषनाग पर योगनिद्रा में लक्ष्मी सहित विराजमान हैं। विष्णु इन्द्र को “चामत्कारपुर” नामक क्षेत्र में कठोर तप करने का आदेश देते हैं और श्वेतद्वीप-सम जलाशय की स्थापना कराते हैं। अशून्यशयना द्वितीया से आरम्भ कर चार मास (चातुर्मास्य) तक वहाँ विष्णु-पूजन करने से इन्द्र में तेज की वृद्धि होती है। फिर विष्णु सुदर्शन को इन्द्र के साथ भेजते हैं; बाष्कलि का वध होता है और धर्म-व्यवस्था पुनः स्थापित होती है। फलश्रुति में कहा गया है कि लोक-कल्याण हेतु भगवान उस सरोवर में सदा सन्निहित रहते हैं; जो श्रद्धा से, विशेषकर चातुर्मास्य में, जलशायी की आराधना करते हैं, वे उच्च गति और इच्छित फल प्राप्त करते हैं; कथा-प्रसंग में इस तीर्थ का द्वारका से भी सम्बन्ध बताया गया है।

Viśvāmitra-kuṇḍa Māhātmya and Household-Ethics Discourse (विश्वामित्रकुण्डमाहात्म्य तथा स्त्रीधर्मोपदेशः)
इस अध्याय में दो भागों में धर्म का निरूपण है। पहले सूत विश्वामित्र से सम्बद्ध एक परम पवित्र कुण्ड का माहात्म्य बताते हैं—वह कामनापूरक और पापहर है। चैत्र शुक्ल तृतीया को वहाँ स्नान करने से अद्भुत सौन्दर्य और सौभाग्य मिलता है; स्त्रियों के लिए संतान-प्राप्ति और शुभ-समृद्धि का विशेष फल कहा गया है। आगे बताया गया कि वहाँ पहले से एक दिव्य स्रोत है जहाँ गङ्गा स्वयंसिद्ध रूप से प्रतिष्ठित हैं; उसमें स्नान करने से तत्काल पापों से मुक्ति होती है। वहाँ पितृ-तर्पण आदि कर्म अक्षय फल देते हैं, तथा दान, होम, अर्पण और जप-पाठ से अनन्त पुण्य प्राप्त होता है। फिर दृष्टान्त आता है—शिकारी के बाण से घायल एक हिरणी जल में प्रवेश कर वहीं प्राण त्याग देती है; उस जल-प्रभाव से वह मेनका नाम की दिव्य अप्सरा बन जाती है और वही तिथि-योग आने पर पुनः वहाँ स्नान करने लौटती है। इसके बाद अध्याय गृहस्थ-नीति की ओर मुड़ता है: मेनका ऋषि विश्वामित्र से स्त्रीधर्म और आदर्श दाम्पत्य-आचरण के विषय में पूछती है। उत्तर में पति-भक्ति, मधुर व सत्य वाणी, सेवा-नियम, शौच, संयमित आहार, आश्रितों की देखभाल, गुरु-आदर, शास्त्र-परम्परा का पोषण और उचित संगति का विवेक—इन सबका विस्तृत उपदेश दिया गया है।

ब्रह्मचर्य-रक्षा संवादः (Dialogue on Protecting Brahmacarya and Śaiva Vow-Discipline)
इस अध्याय में धर्म-आश्रित तीर्थ-परिसर में एक संक्षिप्त किन्तु गम्भीर धर्म-तत्त्व संवाद आता है। मेनका अपने को दिव्य अप्सराओं/वेश्या-गण में बताकर एक ब्राह्मण-तपस्वी से कामना प्रकट करती है; उसे कामदेव-सदृश कहती है और आकर्षण से उत्पन्न देह-मन के विकारों का वर्णन करती है। वह दबावपूर्ण दुविधा रखती है—यदि तपस्वी उसे स्वीकार न करे तो वह मर जाएगी, और तब स्त्री-हिंसा का पाप व निन्दा तपस्वी पर आएगी। तपस्वी शिवाज्ञा के अधीन व्रतधारी समुदाय की ओर से उत्तर देता है। वह कहता है कि ब्रह्मचर्य सभी व्रतों की जड़ है, विशेषतः शिव-भक्तों के लिए; पाशुपत-व्रत में एक बार का भी काम-संस्पर्श दीर्घ तपस्या को नष्ट कर सकता है। वह स्त्री-संग के रूप—स्पर्श, दीर्घ संसर्ग, यहाँ तक कि बातचीत—को भी व्रत-रक्षा की दृष्टि से जोखिमपूर्ण बताता है; यह व्यक्तियों की निन्दा नहीं, बल्कि व्रत-शुद्धि की रक्षा है। अंत में वह मेनका को शीघ्र चले जाने और अन्यत्र अपना अभिलषित पाने की सलाह देता है, जिससे तपस्वी का नियम और तीर्थ का धर्ममय वातावरण सुरक्षित रहे।

Viśvāmitrakunda-utpatti and Viśvāmitreśvara-māhātmya (विश्वामित्रकुण्डोत्पत्ति–विश्वामित्रेश्वरमाहात्म्य)
इस अध्याय में सूत के मुख से धर्मोपदेशात्मक संवाद आता है। मेनका विश्वामित्र के मत को चुनौती देती है, तब विश्वामित्र व्रतधारियों के लिए विशेषतः विषयासक्ति और काम-संग के घोर दुष्परिणामों पर कठोर चेतावनी देते हैं। इसके बाद परस्पर शाप का प्रसंग होता है—मेनका उन्हें अकाल वृद्धावस्था के लक्षणों से शाप देती है और विश्वामित्र भी वैसा ही प्रत्युत्तर देते हैं। फिर तीर्थ का अद्भुत माहात्म्य प्रकट होता है: उस कुंड के जल में स्नान करते ही दोनों अपने पूर्व रूप में लौट आते हैं, जिससे उसकी शुद्धि और पुनर्स्थापन-शक्ति सिद्ध होती है। महिमा जानकर विश्वामित्र ‘विश्वामित्रेश्वर’ नामक शिवलिंग की स्थापना कर तप करते हैं। कहा गया है कि यहाँ स्नान और लिंग-पूजा से शिवधाम व देवलोक की प्राप्ति तथा पितरों के साथ सुख-भोग मिलता है। अंत में तीर्थ की लोक-लोकांतर में कीर्ति और पाप-नाशक सामर्थ्य का संक्षेप में प्रतिपादन है।

पुष्करत्रयमाहात्म्यं (The Māhātmya of the Three Puṣkaras)
यह अध्याय “पुष्कर-त्रय” के तीर्थ-परिचय और महिमा का वर्णन करता है। सूत कहते हैं कि कार्त्तिक मास में कृत्तिका-योग के शुभ अवसर पर मुनि विश्वामित्र दूर स्थित मुख्य पुष्कर तक न पहुँच सके, इसलिए उन्होंने समान पुण्य देने वाले स्थान की खोज की। आकाशवाणी ने तीन पुष्करों की पहचान बताई—ऊपर की ओर मुख किए कमल ज्येष्ठ-पुष्कर, तिरछे मुख वाले मध्यम-पुष्कर और नीचे मुख वाले कमल कनिष्ठ-पुष्कर के चिह्न हैं। फिर प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल तीनों में स्नान-व्रत तथा दर्शन-स्पर्श की महान शुद्धि-शक्ति कही गई है। इसके बाद राजा बृहद्बल की कथा आती है। शिकार करते हुए वे जल में उतरे और योग-समय में प्रकट हुए अद्भुत कमल को पकड़ लिया; तभी दिव्य ध्वनि हुई, कमल लुप्त हो गया और राजा को कुष्ठ हो गया। यह दोष उच्छिष्ट/अशुद्ध अवस्था में पवित्र वस्तु के स्पर्श से हुआ—ऐसा जानकर विश्वामित्र ने सूर्य-उपासना का प्रायश्चित्त बताया। राजा ने सूर्य-प्रतिमा स्थापित कर विशेषतः रविवारों को नियमपूर्वक पूजन किया; एक वर्ष में रोगमुक्त होकर अंत में सूर्यलोक को प्राप्त हुए। फलश्रुति में कहा है कि कार्त्तिक में पुष्कर-स्नान ब्रह्मलोक देता है, स्थापित सूर्य के दर्शन से आरोग्य व अभीष्ट सिद्धि होती है, पुष्कर में वृषोत्सर्ग महायज्ञ-फल देता है, और इस अध्याय का पाठ-श्रवण उन्नति व कामना-पूर्ति करता है।

सारस्वततीर्थमाहात्म्य — Glory of the Sārasvata Tīrtha (Sarasvatī Tirtha)
अध्याय का आरम्भ ऋषियों के इस अनुरोध से होता है कि तीर्थों का अधिक क्रमबद्ध और विस्तृत वर्णन किया जाए। सूत हाटकेश्वरज-क्षेत्र के प्रसिद्ध सारस्वत तीर्थ का माहात्म्य बताते हैं—यहाँ स्नान करने से वाणी-दोष या गूंगापन भी दूर होकर व्यक्ति विवेकपूर्ण वक्ता बनता है, और इच्छित फल से लेकर उच्च लोकों की प्राप्ति तक होती है। फिर राजकथा आती है। राजा बलवर्धन का पुत्र अम्बुवीचि जन्म से मूक था। राजा के युद्ध में मारे जाने पर मंत्रियों ने उसी मूक बालक को सिंहासन पर बैठाया; परिणामतः राज्य में अव्यवस्था फैल गई और बलवान दुर्बलों को सताने लगे। मंत्री वसिष्ठ के पास गए; उन्होंने हाटकेश्वरज-क्षेत्र के सारस्वत तीर्थ में स्नान कराने का विधान बताया। स्नान करते ही राजा की वाणी तुरंत खुल गई। राजा ने नदी की शक्ति जानकर तट की मिट्टी से चतुर्भुजा सरस्वती की प्रतिमा बनाई, शुद्ध शिला पर स्थापित कर धूप-गंध-अनुलेपन से पूजा की और वाणी, बुद्धि, ज्ञान तथा इन्द्रिय-बोध में व्याप्त देवी की दीर्घ स्तुति की। देवी प्रकट होकर वर देती हैं, प्रतिमा में निवास का वचन देती हैं और कहती हैं कि अष्टमी व चतुर्दशी को स्नान-पूजन, विशेषतः श्वेत पुष्पों और नियम-भक्ति सहित, करने वालों की मनोकामनाएँ पूर्ण होंगी। फलश्रुति में कहा है कि भक्त जन्म-जन्मान्तर में वाग्मी और मेधावी होते हैं, कुल मूढ़ता से सुरक्षित रहता है; देवी के सामने धर्म-श्रवण से दीर्घ स्वर्गफल मिलता है, तथा ग्रंथ-दान, धर्मशास्त्र-दान और उनके सान्निध्य में वेदाध्ययन का फल अश्वमेध व अग्निष्टोम जैसे महायज्ञों के तुल्य है।

महाकाल-जागर-माहात्म्य (Glory of the Mahākāla Night-Vigil in Vaiśākhī)
इस अध्याय में तीर्थ-माहात्म्य के रूप में वैशाखी रात्रि में महाकाल के जागरण की महिमा विस्तार से कही गई है। ऋषि सूत से महाकाल की महानता पूछते हैं, तब सूत इक्ष्वाकुवंशी राजा रुद्रसेन का आदर्श आचरण बताते हैं—राजा हर वर्ष थोड़े से सेवकों के साथ चमत्कारपुर-क्षेत्र जाकर महाकाल के सामने रात्रि-जागरण करता है। वह उपवास रखता है, भजन-कीर्तन, नृत्य-गान, जप और वेद-अध्ययन करता है; प्रातः स्नान-शुद्धि के बाद ब्राह्मणों, तपस्वियों और दुःखी-निर्धनों को प्रचुर दान देता है। ग्रंथ बताता है कि इस भक्ति-आचरण से राज्य में समृद्धि होती है और शत्रु-बल का क्षय होता है—भक्ति को नीति-धर्म का स्थिर आधार माना गया है। विद्वान ब्राह्मणों की सभा राजा से जागरण का कारण और फल पूछती है। राजा पूर्वजन्म की कथा सुनाता है—विदिशा में दीर्घ अकाल के कारण वह दरिद्र वैश्य अपनी पत्नी सहित सौराष्ट्र की ओर निकलता है और चमत्कारपुर के पास कमलों से भरे सरोवर तक पहुँचता है। भोजन हेतु कमल बेचने का प्रयास असफल होता है; वे टूटे मंदिर में शरण लेते हैं और पूजा के शब्द सुनकर महाकाल-जागरण का पता चलता है। वे व्यापार छोड़ कमलों से पूजन करते हैं; भूख और परिस्थिति से रात भर जागते रहते हैं। भोर में व्यापारी की मृत्यु हो जाती है और पत्नी सती-गमन करती है। उसी भक्ति के प्रभाव से वह कान्ती का राजा बनकर जन्म लेता है और पत्नी पूर्वस्मृति वाली राजकुमारी होकर स्वयंवर में उससे पुनः मिलती है। अंत में ब्राह्मणों की स्वीकृति से वार्षिक जागरण की परंपरा स्थापित होती है और फलश्रुति में इसे पाप-नाशक तथा मुक्ति-समीप फल देने वाला कहा गया है।

Hariścandra-āśrama and Umā–Maheśvara Pratiṣṭhā (Harishchandra’s Austerity, Boon, and Pilgrimage Merit)
सूता बताते हैं कि राजा हरिश्चन्द्र के प्रदेश में अनेक वृक्षों की छाया से युक्त एक प्रसिद्ध आश्रम था, जहाँ राजा ने तप किया और ब्राह्मणों को मनोवांछित दान देकर संतुष्ट किया। वे सूर्यवंश के आदर्श नरेश थे; उनके राज्य में प्रजा-सुख, नगर-व्यवस्था और प्रकृति-समृद्धि थी, पर एक ही कमी थी—पुत्र का अभाव। वंश-रक्षा हेतु उन्होंने चामत्कारपुर के क्षेत्र में कठोर तप किया और भक्तिपूर्वक शिवलिङ्ग की प्रतिष्ठा की। शिव गौरी तथा गणों सहित प्रकट हुए। देवी के प्रति उचित आदर में हुई त्रुटि से विवाद उठा और देवी ने शाप दिया कि पुत्र बाल्यावस्था में भी मृत्युजन्य शोक का कारण बनेगा। फिर भी हरिश्चन्द्र ने पूजा, उपवास-नियम, अर्घ्य-उपहार और दान को निरन्तर बढ़ाया। पुनः शिव-पार्वती प्रकट हुए; देवी ने स्पष्ट किया कि वचन अटल है—बालक मरेगा, पर उनकी कृपा से शीघ्र जीवित होकर दीर्घायु, विजयी और योग्य वंशधर बनेगा। अध्याय में इस स्थान का माहात्म्य भी कहा गया है—जो वहाँ उमामहेश्वर की आराधना करता है, विशेषतः पञ्चमी को, उसे इच्छित संतान और अन्य कामनाएँ प्राप्त होती हैं। हरिश्चन्द्र ने निरविघ्न राजसूय-सिद्धि भी माँगी; शिव ने वर दिया। राजा लौटकर उस प्रतिष्ठा को आगे के भक्तों के लिए आदर्श रूप में स्थापित करता है।

Kalaśeśvara-māhātmya: Kalaśa-nṛpateḥ Durvāsasaḥ śāpena vyāghratva-prāptiḥ (कलेशेश्वरमाहात्म्य—कलशनृपतेर्दुर्वाससः शापेन व्याघ्रत्वप्राप्तिः)
सूत जी नागर खण्ड में सरोवर-तट पर स्थित कलेशेश्वर तीर्थ का वर्णन करते हैं, जिसे ‘समस्त पापों का नाशक’ कहा गया है और जिसके दर्शन से पाप-मुक्ति बताई गई है। इसी महिमा के साथ एक कारण-कथा आती है। यदुवंशी राजा कलश यज्ञ-निपुण, दानशील और प्रजा-हितैषी थे। चातुर्मास्य-व्रत पूर्ण करके महर्षि दुर्वासा उनके यहाँ आए। राजा ने स्वागत, दण्डवत् प्रणाम, पाद्य-सेवा, अर्घ्य आदि से अतिथि-सत्कार किया और अपनी सम्पत्ति अर्पित कर उनकी इच्छा पूछी। दुर्वासा ने पारण हेतु भोजन माँगा। राजा ने विविध व्यंजन परोसे, जिनमें मांस भी था। भोजन के बाद दुर्वासा को मांस का स्वाद/गन्ध ज्ञात हुआ; उन्होंने इसे व्रत-नियम का उल्लंघन मानकर क्रोध में राजा को शाप दिया कि वह भयंकर बाघ बनेगा। राजा ने निवेदन किया कि यह सब भक्ति से हुआ, अनजाने में दोष हो गया—कृपा कर शमन करें। तब दुर्वासा ने धर्म-नियम स्पष्ट किया कि श्राद्ध और यज्ञ जैसे विशेष प्रसंगों के अतिरिक्त व्रतस्थ ब्राह्मण को, विशेषकर चातुर्मास्य-समाप्ति पर, मांस नहीं खाना चाहिए; ऐसा करने से व्रत निष्फल हो जाता है। फिर उन्होंने शाप-निवृत्ति का उपाय दिया—राजा की नन्दिनी नामक गाय उसे पूर्व-पूजित ‘बाणार्चित’ लिङ्ग दिखाएगी; उसके दर्शन से शीघ्र मुक्ति होगी। ऋषि चले गए; राजा बाघ बनकर सामान्य स्मृति खो बैठा, जीवों पर आक्रमण करता हुआ घने वन में चला गया। मंत्रीगण राज्य की रक्षा करते हुए शाप-समाप्ति की प्रतीक्षा करने लगे। इस प्रकार अध्याय तीर्थ-शक्ति, अतिथि-सत्कार की सावधानी, व्रत-धर्म और लिङ्ग-दर्शन से होने वाली मुक्ति को जोड़ता है।

नन्दिनी-धेनोः सत्यव्रतं तथा लिङ्ग-स्नापन-माहात्म्यम् (Nandinī’s Vow of Truth and the Significance of Bathing the Liṅga)
इस अध्याय में गोप-गोकुल के समीप वन में घटित धर्म-नीति से युक्त प्रसंग आता है। शुभ लक्षणों वाली नन्दिनी नामक गाय वन-छोर पर जाती है और बारह सूर्यों के समान दीप्तिमान शिव-लिङ्ग का दर्शन करती है। वह एकान्त में भक्ति से उसके समीप ठहरकर प्रचुर दूध से लिङ्ग-स्नापन करती है। कुछ समय बाद एक भयानक बाघ आ पहुँचता है और भाग्यवश नन्दिनी उसकी दृष्टि में आ जाती है। नन्दिनी अपने प्राणों के लिए नहीं, बल्कि गोकुल में बँधे अपने बछड़े के लिए विलाप करती है, जिसका पोषण उसके लौटने पर निर्भर है। वह बाघ से प्रार्थना करती है कि उसे थोड़ी देर के लिए जाने दे—वह बछड़े को दूध पिलाकर/सौंपकर फिर लौट आएगी। बाघ को संदेह होता है कि मृत्यु के मुख से कौन वापस आता है। तब नन्दिनी सत्यव्रत को दृढ़ करते हुए गंभीर शपथें लेती है—यदि वह न लौटे तो ब्रह्महत्या, माता-पिता से छल, अपवित्र/अनुचित आचरण, विश्वासघात, कृतघ्नता, गौ-कन्या-ब्राह्मण हिंसा, व्यर्थ पकाना और अधर्मरूप मांसाहार, व्रतभंग, असत्य, कटुवचन और दुष्कर्म—इन सब महापापों का दोष उसे लगे। अध्याय का संदेश है कि शिव-भक्ति और सत्य एक-दूसरे से अविभाज्य हैं; संकट में भी नैतिक सत्यनिष्ठा ही पूजा की सच्ची कसौटी है।

कलशेश्वर-लिङ्गमाहात्म्ये नन्दिनी-सत्यव्रत-व्याघ्रमोक्षः (Kalāśeśvara Liṅga Māhātmya: Nandinī’s Vow of Truth and the Tiger’s Liberation)
सूता एक धर्म-नीति से भरी, पवित्र-क्षेत्र से जुड़ी कथा सुनाते हैं। वन में एक बाघ नन्दिनी गौ-माता को पकड़ लेता है; वह वत्स को दूध पिलाने और उसकी रक्षा करने के लिए सत्य-शपथ लेकर थोड़ी देर की अनुमति माँगती है। नन्दिनी वत्स के पास जाकर संकट बताती है और मातृभक्ति तथा वन-आचरण की शिक्षा देती है—लोभ, प्रमाद और अति-विश्वास से बचने की चेतावनी देती है। वत्स माँ को परम आश्रय मानकर साथ चलने को कहता है, पर नन्दिनी उसे झुंड के हवाले कर अन्य गायों से क्षमा माँगती है और अपने अनाथ होने वाले वत्स की सामूहिक देखभाल का दायित्व सौंपती है। गायें आपत्ति-काल में शपथ तोड़ने को ‘निर्दोष असत्य’ कहकर स्वीकार करना चाहती हैं, पर नन्दिनी सत्य को धर्म की जड़ मानकर बाघ के पास लौट जाती है। उसकी सत्यनिष्ठा देखकर बाघ पश्चात्ताप करता है और हिंसा-आधारित जीवन में भी आत्मकल्याण का उपाय पूछता है। नन्दिनी कलियुग में दान को प्रधान साधन बताकर कलशेश्वर-लिंग का निर्देश देती है और नित्य प्रदक्षिणा व प्रणाम करने को कहती है। दर्शन से बाघ मुक्त होकर शापग्रस्त हैहयवंशी राजा कलाशा के रूप में प्रकट होता है और स्थान को चमत्कारपुर-क्षेत्र, सर्वतीर्थमय व कामद बताता है। अंत में फलश्रुति है—कार्तिक में दीपदान और मार्गशीर्ष में भक्ति-नृत्य/गीत आदि करने से पापक्षय व शिवलोक; इस माहात्म्य का पाठ भी वही फल देता है।

Rudrakoṭi–Rudrāvarta Māhātmya (Kapilā–Siddhakṣetra–Triveṇī Context)
इस अध्याय में सूत एक तीर्थ-केन्द्रित सूक्ष्म भूगोल का वर्णन करते हैं। एक राजा उमामहेश्वर की प्रतिष्ठा कर मंदिर बनवाता है और सामने निर्मल सरोवर स्थापित करता है। फिर दिशानुसार पुण्यस्थलों का उल्लेख होता है—पूर्व में अगस्त्यकुण्ड के पास अत्यन्त पावन वापी, दक्षिण में कपिला नदी जहाँ कपिल मुनि की सांख्य-जन्य सिद्धि का प्रसंग जुड़ा है, तथा सिद्धक्षेत्र जहाँ असंख्य सिद्धों ने सिद्धि प्राप्त की। चार-कोनी वैष्णवी शिला को पाप-नाशिनी कहा गया है। गंगा और यमुना के बीच सरस्वती की स्थिति तथा सामने बहती त्रिवेणी का माहात्म्य बताया गया है, जो लोक-कल्याण और मोक्ष दोनों देती है। त्रिवेणी पर दाह-संस्कार/अन्त्येष्टि करने से मुक्ति का फल, विशेषतः ब्राह्मणों के लिए, कहा गया है; स्थानीय प्रमाण के रूप में गोष्पद-सा चिह्न दिखने की बात आती है। अंत में रुद्रकोटि/रुद्रावर्त की कथा है—दर्शन में अग्रता चाहने वाले दक्षिणदेशीय ब्राह्मणों के सामने महेश्वर ‘कोटि’ रूपों में प्रकट होते हैं और स्थान-नाम की स्थापना होती है। चतुर्दशी (विशेषकर आषाढ़, कार्तिक, माघ, चैत्र) को दर्शन, श्राद्ध, उपवास व रात्रि-जागरण, योग्य ब्राह्मण को कपिला-गौदान, षडाक्षर-जप व शतरुद्रीय-पाठ, तथा गीत-नृत्य जैसे भक्तिपूर्ण अर्पणों को पुण्यदायक बताया गया है।

Ujjayinī-Mahākāla Pīṭha and the Bhṛūṇagarta Tīrtha: Expiation Narrative of King Saudāsa
यह अध्याय दो तीर्थ-प्रधान धाराओं को एक साथ पिरोता है। पहले उज्जयिनी को सिद्धों से सेवित पीठ बताया गया है, जहाँ महादेव महाकाल रूप में विराजते हैं। वैशाख में श्राद्ध, दक्षिणामूर्ति-भाव से पूजन, योगिनियों की आराधना, उपवास और पूर्णिमा की रात्रि-जागरण को महापुण्यदायक कहा गया है; इससे पितरों का उद्धार तथा जरा-मृत्यु के बंधन से मुक्ति का फल बताया गया है। दूसरे भाग में विशाल पापनाशक भृूणगर्त तीर्थ का वर्णन है और राजा सौदास की प्रायश्चित्त-कथा आती है। ब्राह्मण-भक्त राजा के दीर्घ यज्ञ में एक राक्षस ने विघ्न डाला; निषिद्ध मांस का छलपूर्ण अर्पण हुआ और वसिष्ठ के शाप से राजा राक्षस बन गया। फिर उसने ब्राह्मणों और यज्ञकर्मों पर हिंसा की; अंततः क्रूरबुद्धि राक्षस का वध करके वह मानव रूप में लौटा, पर ब्रह्महत्या-सदृश मलिनता के चिह्न—दुर्गंध, तेज की हानि और लोक-परिहार—उसके साथ रहे। तीर्थयात्रा और संयम का उपदेश पाकर वह एक क्षेत्र में जल-भरे गर्त में गिरा और वहीं से दीप्तिमान, शुद्ध होकर निकला; आकाशवाणी ने तीर्थ-प्रभाव से उसकी मुक्ति की पुष्टि की। आगे भृूणगर्त की उत्पत्ति शिव के गूढ़ निवास से जोड़ी गई है और विशेषतः कृष्ण-चतुर्दशी के श्राद्ध को अत्यंत फलदायक बताकर स्नान-दान सहित यत्नपूर्वक आचरण से पितरों के उद्धार का उपदेश दिया गया है।

नलनिर्मितचर्ममुण्डामाहात्म्यवर्णनम् / The Māhātmya of Carmamuṇḍā Established by Nala
इस अध्याय में सूतजी के कथन से हाटकेश्वर-क्षेत्र में निवास करने वाली देवी चर्ममुण्डा का माहात्म्य कहा गया है, जिनकी स्थापना भक्त-राजा नल ने की थी। निषध के धर्मपरायण राजा नल के गुण, दमयन्ती से विवाह, और कलि के प्रभाव से जुए द्वारा राज्य-नाश का संक्षिप्त वर्णन आता है। वन में दमयन्ती से वियोग होकर नल वन-वन भटकते हुए अंततः हाटकेश्वर-क्षेत्र पहुँचते हैं। महानवमी के पावन अवसर पर साधनों के अभाव में वे मिट्टी की देवी-प्रतिमा बनाकर फल-मूल से पूजा करते हैं और अनेक नामों से युक्त विस्तृत स्तोत्र द्वारा देवी की सर्वव्यापक तथा उग्र-रक्षक शक्ति का गुणगान करते हैं। देवी प्रसन्न होकर प्रकट होती हैं, वर देती हैं; नल निष्कलंक पत्नी से पुनर्मिलन की याचना करते हैं। अंत में फलश्रुति है कि जो कोई इस स्तोत्र से देवी की स्तुति करता है, उसे उसी दिन इच्छित फल प्राप्त होता है। अध्याय का उपसंहार नागरखण्ड के हाटकेश्वर-क्षेत्र-माहात्म्य के अंतर्गत किया गया है।

नलेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् (Naleśvara Māhātmya: The Glory of Naleśvara)
अध्याय 55 में नलेश्वर का माहात्म्य कहा गया है। सूत बताते हैं कि राजा नल द्वारा स्थापित यह शिव-स्वरूप निकट ही सुलभ है; श्रद्धापूर्वक दर्शन करने से पापों का क्षय होता है और मोक्षाभिमुख फल की प्राप्ति मानी गई है। मंदिर के सामने निर्मल जल वाला एक कुंड है, जिसमें स्नान करके दर्शन करने से कुष्ठ आदि चर्मरोग तथा उनसे जुड़े अनेक कष्ट शांत होते हैं; कुंड कमलों और जलचरों से सुशोभित बताया गया है। आगे संवाद में, प्रतिष्ठा से प्रसन्न भगवान शिव नल को वर देने को कहते हैं। नल लोककल्याण हेतु शिव की स्थायी उपस्थिति और रोग-निवारण का वर मांगते हैं। शिव विशेष रूप से सोमवारे प्रात्यूषकाल में सुलभ होने का विधान बताते हैं और क्रम निर्धारित करते हैं—श्रद्धा से कुंड-स्नान के बाद दर्शन, सोमवार की रात्रि-समाप्ति पर कुंड की मिट्टी का शरीर पर लेपन, तथा निष्काम भाव से पुष्प, धूप और गंधादि से पूजा। अंत में शिव अंतर्धान होते हैं, नल अपने राज्य लौटते हैं, ब्राह्मण पीढ़ी-दर-पीढ़ी पूजा का व्रत लेते हैं; और स्थायी कल्याण चाहने वालों को विशेषकर सोमवार को दर्शन को प्रधान मानने की आज्ञा देकर अध्याय समाप्त होता है।

Vaṭāditya (Sāmbāditya) Darśana and Saptamī-Vrata Phala — “वटादित्यदर्शन-सप्तमीव्रतफलम्”
इस अध्याय में सूत जी तीर्थ-महात्म्य के प्रसंग में साम्बादित्य/सुरेश्वर के दर्शन की महिमा बताते हैं। कहा गया है कि जो भक्तिभाव से देव का दर्शन करता है, उसे मनोवांछित फल मिलता है; विशेषतः माघ शुक्ल सप्तमी को यदि रविवार पड़े, तो उस दिन दर्शन-पूजन करने वाला नरकगति से बच जाता है। फिर उदाहरण के रूप में गालव नामक ब्राह्मण-ऋषि की कथा आती है। वे स्वाध्यायनिष्ठ, शांत आचरण वाले, कर्मकुशल और कृतज्ञ थे; पर वृद्धावस्था तक संतान न होने से वे शोकाकुल हो गए। गृह-चिंता त्यागकर उन्होंने उसी स्थान पर सूर्य-उपासना आरम्भ की, पाञ्चरात्र-विधि से प्रतिमा स्थापित की और ऋतु-नियम, इन्द्रिय-निग्रह तथा उपवास सहित दीर्घ तप किया। पंद्रह वर्ष बाद वटवृक्ष के निकट सूर्यदेव प्रकट हुए, वर दिया और सप्तमी-व्रत से संबद्ध वंशवर्धक पुत्र प्रदान किया। वट के पास जन्म होने से पुत्र का नाम वटेश्वर पड़ा। आगे चलकर उसने सुंदर मंदिर बनवाया और देवता ‘वटादित्य’ के नाम से संतान-प्रदाता रूप में प्रसिद्ध हुए। अंत में फलश्रुति है—सप्तमी/रविवार को उपवास सहित विधिपूर्वक पूजन करने से गृहस्थ को उत्तम पुत्र मिलता है; और निष्काम भाव से की गई उपासना मोक्ष की ओर ले जाती है। नारद-प्रोक्त गाथा भी संतान-प्राप्ति हेतु इस भक्ति को अन्य साधनों से श्रेष्ठ बताती है।

Bhīṣma at Śarmiṣṭhā-tīrtha: Expiation, Śrāddha Eligibility, and Shrine-Foundation
सूत कहते हैं कि इस क्षेत्र में भीष्म ने ब्राह्मणों की अनुमति से आदित्य की प्रतिमा स्थापित की। अध्याय में परशुराम के साथ भीष्म का पूर्व संघर्ष और अम्बा की प्रतिज्ञा स्मरण कराई जाती है, जिससे भीष्म अपने वचन और कर्म के नैतिक परिणामों को लेकर चिंतित होते हैं। वे मुनि मार्कण्डेय से पूछते हैं कि क्या केवल वाणी से उकसाने पर किसी के प्राण त्यागने में पाप लगता है; मुनि बताते हैं कि जब किसी के कर्म या उकसावे से स्त्री या ब्राह्मण आदि जीवन त्याग दें, तब दोष उसी को लगता है, इसलिए ऐसे जनों को क्रोधित करना वर्जित है। आगे स्त्री-वध के पाप को अत्यन्त भारी, ब्राह्मण-हिंसा के समान बताया गया है और कहा गया है कि दान, तप, व्रत जैसे सामान्य उपाय पर्याप्त नहीं, तीर्थ-सेवा ही श्रेष्ठ प्रायश्चित्त है। भीष्म गयाशिर में श्राद्ध करना चाहते हैं, पर दिव्य वाणी उन्हें स्त्री-हत्या-संबंध के कारण अयोग्य बताकर वरुण-दिशा में स्थित निकटवर्ती शर्मिष्ठा-तीर्थ जाने को कहती है। कृष्णाङ्गारक-षष्ठी (मंगलवार युक्त षष्ठी) को वहाँ स्नान करने से उस पाप से मुक्ति का विधान बताया जाता है। भीष्म स्नान कर श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करते हैं और वाणी—जो शान्तनु के रूप में प्रकट होती है—उन्हें शुद्ध घोषित कर कर्तव्य-पथ पर लौटने की आज्ञा देती है। तब भीष्म आदित्य, विष्णु-संबंधी प्रतिमा, शिवलिङ्ग और दुर्गा के अनेक देवालय स्थापित कर ब्राह्मणों को नित्य-पूजा सौंपते हैं तथा सूर्य-सप्तमी, शिव-अष्टमी, विष्णु के शयन-जागरण और दुर्गा-नवमी आदि उत्सव-तिथियाँ, भजन-कीर्तन और उत्सव-परंपरा चलाकर नियमित भक्तों के लिए उच्च फल का आश्वासन देते हैं।

शिवगंगामाहात्म्यवर्णनम् (Śiva-Gaṅgā Māhātmya: Theological Discourse on the Sanctity of Śiva-Gaṅgā)
इस अध्याय में हाटकेश्वर-क्षेत्र के प्रसंग में शिवगंगा का माहात्म्य और तीर्थ-नीति का उपदेश आता है। पहले देवचतुष्टय की प्रतिष्ठा के बाद शिवलिंग के समीप ‘त्रिपथगामिनी’ गंगा की विधिपूर्वक स्थापना की जाती है। भीष्म फलश्रुति कहते हैं—जो वहाँ स्नान करके उन्हें (कथानायक/प्रमाण-वक्ता) देखता है, वह पापों से मुक्त होकर शिवलोक को प्राप्त होता है; पर उसी तीर्थ पर झूठी शपथ लेने वाला शीघ्र यमलोक को जाता है, क्योंकि तीर्थ सत्य-असत्य दोनों का फल तीव्र कर देता है। फिर चेतावनी-रूप दृष्टान्त दिया है—शूद्रकुल में जन्मा पौण्ड्रक नामक युवक हँसी में मित्र की पुस्तक चुरा लेता है, फिर इंकार करता है और भागीरथी में स्नान करके शपथ भी लेता है। ‘शास्त्र-चौर्य’ और असत्य वाणी के कारण उसे शीघ्र कुष्ठ, समाज-त्याग और शारीरिक विकलता भोगनी पड़ती है। अंत में शिक्षा है कि हल्केपन या मज़ाक में भी, विशेषकर पवित्र साक्षियों के सामने, शपथ नहीं करनी चाहिए; तीर्थयात्रा का धर्म संयमित वाणी और शुद्ध आचरण है।

विदुरकृत-देवत्रयप्रतिष्ठा तथा अपुत्रदुःख-प्रशमनम् (Vidura’s Triadic Consecration and the Remedy for Childlessness)
सूत एक परंपरा सुनाते हैं जिसमें हस्तिनापुर से जुड़े विदुर अपुत्र (बिना पुत्र) व्यक्ति की परलोक-स्थिति के विषय में मार्ग पूछते हैं। ऋषि गालव धर्मशास्त्र में माने गए ‘पुत्र’ के बारह प्रकार बताते हैं और कहते हैं कि यदि किसी भी रूप में पुत्र-संतति न हो तो परलोक में क्लेशदायक परिणाम भोगने पड़ते हैं। यह सुनकर विदुर अत्यंत व्याकुल हो जाते हैं। गालव उन्हें रक्तशृंग और हाटकेश्वर क्षेत्र के निकट एक परम पुण्यस्थल पर ‘पुत्र-वृक्ष’ के रूप में विष्णु-स्वरूप अश्वत्थ स्थापित करने की आज्ञा देते हैं। विदुर अश्वत्थ की स्थापना कर उसे पुत्र-प्रतिनिधि मानकर प्रतिष्ठा-विधि करते हैं; फिर वट के नीचे माहेश्वर लिंग और अश्वत्थ के नीचे विष्णु की स्थापना कर सूर्य-शिव-विष्णु का त्रय-धाम बनाते हैं। वे स्थानीय ब्राह्मणों को नित्य-पूजा का दायित्व सौंपते हैं, और वे इसे वंश-परंपरा से निभाने का वचन देते हैं। अध्याय में काल-विशेष पूजा बताई गई है—माघ शुक्ल सप्तमी के रविवार को सूर्य-पूजन, सोमवार को तथा विशेषतः शुक्ल पक्ष अष्टमी को शिव-पूजन, और विष्णु के शयन-प्रबोधन व्रतों में सावधानीपूर्वक आराधना। आगे कहा गया है कि इंद्र (पाकशासन) के कारण लिंग मिट्टी से ढक जाता है; एक अशरीरी वाणी स्थान बताती है। विदुर क्षेत्र का उद्धार कर प्रासाद-निर्माण, दान और ब्राह्मणों के लिए वृत्ति-व्यवस्था करके अपने आश्रम लौट जाते हैं।

Narāditya-pratiṣṭhā and the Mahitthā Devatā: Installation, Worship-Times, and Phala
इस साठवें अध्याय में ऋषि ‘महित्था/महित्था’ क्षेत्र की स्थापना और उसके प्रादुर्भाव का कारण पूछते हैं। सूत एक परंपरा सुनाते हैं जिसमें अगस्त्य से संबद्ध और अथर्वण-मंत्राधिकार से युक्त ‘शोषणी विद्या’ का प्रयोग होता है; उसी के प्रभाव से ‘चमत्कारपुर’ नामक क्षेत्र में वरदायिनी महित्था देवता का प्राकट्य बताया गया है। इसके बाद अध्याय तीर्थ-मार्गदर्शिका की भाँति प्रतिष्ठित देवताओं और उनके फलों का वर्णन करता है—सूर्य ‘नरादित्य’ रूप में रोग-शमन और रक्षा देते हैं; जनार्दन ‘गोवर्धनधर’ रूप में समृद्धि और गो-कल्याण प्रदान करते हैं; नरसिंह, विघ्नहर्ता विनायक तथा नरा-नारायण की भी स्थापना बताई गई है। द्वादशी और चतुर्थी जैसे विशेष तिथियों में दर्शन-पूजन, विशेषकर कार्तिक शुक्ल पक्ष में, अत्यन्त फलदायी कहा गया है। उदाहरण रूप में अर्जुन की तीर्थयात्रा आती है—हाटकेश्वर-संबद्ध क्षेत्र में वह सूर्य आदि देवताओं को मनोहर मंदिर में प्रतिष्ठित करता है, स्थानीय ब्राह्मणों को धन दान देता है और निरंतर स्मरण-पूजन का दायित्व उन्हें सौंपता है। अंत में इस माहात्म्य के श्रवण को पाप-क्षयकारी कहा गया है तथा चतुर्थी को मोदक आदि अर्पण करने से इच्छित फल और विघ्नों से मुक्ति का फल बताया गया है।

विषकन्यकोत्पत्तिवर्णनम् (Origin Narrative of the Viṣakanyā) — Śarmiṣṭhā-tīrtha Context
अध्याय में ऋषि ‘शर्मिष्ठा-तीर्थ’ की उत्पत्ति और फल के विषय में पूछते हैं। सूत सोमवंशी राजा वृक का प्रसंग सुनाते हैं—वह धर्मनिष्ठ और प्रजाहितैषी था। उसकी पत्नी ने अशुभ लग्न में एक कन्या को जन्म दिया। राजा ने ज्योतिष-विद्या में निपुण ब्राह्मणों से परामर्श किया; उन्होंने उसे ‘विषकन्या’ बताकर कहा कि उसका होने वाला पति छह मास के भीतर मर जाएगा और जिस घर में वह रहेगी वहाँ दरिद्रता छा जाएगी; मायका और ससुराल दोनों का नाश होगा। राजा कन्या को त्यागने से इंकार करता है और कर्म का दृढ़ सिद्धान्त रखता है—पूर्वकृत कर्म अवश्य फल देता है; बल, बुद्धि, मंत्र, तप, दान, तीर्थ-सेवन या केवल संयम से कर्मफल को पूरी तरह टाला नहीं जा सकता। वह उदाहरण देता है कि जैसे बछड़ा अनेक गायों में अपनी माँ को ढूँढ़ लेता है और जैसे तेल समाप्त होने पर दीपक स्वयं बुझ जाता है, वैसे ही कर्म के क्षय होने पर दुःख भी शांत हो जाता है। अंत में दैव और पुरुषार्थ पर लोकोक्ति के साथ यह नीति दी जाती है कि धर्म में रहकर प्रयत्न करो, पर पूर्वकर्म की बंधन-श्रृंखला और उत्तरदायित्व को स्वीकार करो।

शर्मिष्ठातीर्थमाहात्म्य (Śarmiṣṭhā-tīrtha Māhātmya) — The Glory of Śarmiṣṭhā Tīrtha
अध्याय 62 तीर्थमाहात्म्य के प्रसंग में शर्मिष्ठा-तीर्थ की उत्पत्ति और उसकी मोक्षदायिनी शक्ति का वर्णन करता है। सूत कहते हैं—एक राजा मंत्रियों की सलाह के बावजूद “विषकन्या” कही जाने वाली कन्या को स्वीकार नहीं करता। तभी शत्रु आक्रमण करते हैं, राजा युद्ध में मारा जाता है और नगर में हाहाकार मच जाता है। लोग विपत्ति का कारण उसी कन्या को मानकर उसके वध और निर्वासन की माँग करते हैं; लोकनिंदा सुनकर वह वैराग्य-सा संकल्प लेकर हाटकेश्वर से जुड़े पवित्र क्षेत्र में पहुँचती है, जहाँ उसे पूर्वजन्म की स्मृति होती है। पूर्वजन्म में वह उपेक्षित स्त्री थी; भीषण ग्रीष्म की प्यास में उसने करुणा से एक तृषित गाय को अपना अल्प जल दे दिया—यही पुण्यबीज बना। पर “विषकन्या” होने का दूसरा कर्मसूत्र भी बताया गया है—उसने कभी गौरी/पार्वती की स्वर्ण-प्रतिमा को स्पर्श कर तोड़-फोड़कर बेचने हेतु खंडित किया, जिससे दुष्कर्म का विपाक हुआ। शांति के लिए वह ऋतु-ऋतु में दीर्घ तप, नियमोपवास, पूजन और अर्पण करती है। परीक्षा हेतु शची (इंद्राणी) वर देने आती है, पर वह उसे ठुकराकर केवल परम देवी पार्वती की शरण स्वीकार करती है। अंत में शिव सहित पार्वती प्रकट होकर उसकी स्तुति स्वीकारती हैं, वर देती हैं, उसे दिव्य रूप प्रदान करती हैं और उस स्थान को अपना आश्रम घोषित करती हैं। फलश्रुति में कहा है कि माघ शुक्ल तृतीया को यहाँ स्नान करने से विशेषतः स्त्रियों को अभीष्ट फल मिलता है; स्नान-दान आदि से भारी पाप भी शुद्ध होते हैं, तथा इस अध्याय का पाठ-श्रवण शिवलोक की निकटता देता है।

सोमेश्वर-प्रादुर्भावः (Someshvara Liṅga: Origin Narrative and Observance)
यह अध्याय सोमेश्वर तीर्थ की उत्पत्ति और उसके व्रत का माहात्म्य बताता है। सूत जी उस प्रसिद्ध शिवलिंग का वर्णन करते हैं जिसे चन्द्रमा (सोम) ने स्थापित किया था। एक वर्ष तक प्रत्येक सोमवार को पूजा करने का विधान कहा गया है, जिससे क्षय (यक्ष्मा) सहित घोर और दीर्घकालिक रोगों से मुक्ति मिलती है। कथा में सोम के रोग का कारण बताया गया है—सोम ने दक्ष की सत्ताईस कन्याओं (नक्षत्रों) से विवाह किया, पर रोहिणी के प्रति विशेष आसक्ति रखी। अन्य पत्नियों की शिकायत पर दक्ष ने धर्म की दृष्टि से सोम को समझाया; सोम ने सुधार का वचन दिया, पर फिर वही पक्षपात किया। तब दक्ष ने उसे क्षय-रोग का शाप दे दिया। सोम ने अनेक उपचार और वैद्य खोजे, पर लाभ न हुआ। वैराग्य लेकर तीर्थयात्रा करते हुए वह प्रभास-क्षेत्र पहुँचा और वहाँ ऋषि रोमक से मिला। रोमक ने कहा कि शाप सीधे नहीं टल सकता, पर शिव-भक्ति से उसका प्रभाव शांत होता है—सोम को अड़सठ तीर्थों में लिंग स्थापित कर श्रद्धा से पूजन करना चाहिए। शिव प्रकट होकर दक्ष से मध्यस्थता करते हैं और शाप की सत्यता बनाए रखते हुए चन्द्रमा के बढ़ने-घटने (पक्ष) का नियम स्थापित करते हैं। सोम के आग्रह पर शिव सोमवार को विशेष सान्निध्य प्रदान करते हैं, और अंत में विभिन्न तीर्थों में सोमेश्वर-प्रादुर्भाव का प्रतिपादन होता है।

Chamatkārī Devī—Pradakṣiṇā-Phala and the Jātismara King
अध्याय 64 में सूत जी तीर्थ-प्रधान देवी-माहात्म्य सुनाते हैं। चमत्कारिणी देवी की स्थापना एक “चमत्कार-नरेन्द्र” ने श्रद्धा से नव-स्थापित नगर और उसकी प्रजा, विशेषकर भक्त ब्राह्मणों की रक्षा हेतु की थी। कहा गया है कि महा-नवमी के दिन देवी-पूजन करने से पूरे वर्ष भय-रहितता मिलती है—दुष्ट प्राणियों, शत्रुओं, रोग, चोर आदि से रक्षा होती है। शुक्लाष्टमी को शुद्ध भक्त एकाग्र होकर पूजे तो अभीष्ट सिद्धि पाता है; निष्काम साधक को देवी-कृपा से सुख और मोक्ष का वर मिलता है। उदाहरण में दशार्ण के राजा चित्ररथ का वर्णन है, जो शुक्लाष्टमी को बड़ी प्रदक्षिणा करता है। ब्राह्मणों के पूछने पर वह पूर्वजन्म बताता है—वह देवी-स्थान के पास रहने वाला तोता था; घोंसले में आते-जाते अनजाने में रोज प्रदक्षिणा हो जाती थी, वहीं मृत्यु हुई और वह जातिस्मर राजा बनकर जन्मा। इससे शिक्षा मिलती है कि प्रदक्षिणा अनायास भी फल देती है, और श्रद्धा से की जाए तो अधिक फलदायी होती है। अंत में कहा गया है कि भक्तिपूर्वक प्रदक्षिणा पापों का नाश करती है, मनोवांछित फल देती है, मोक्ष-लक्ष्य को पुष्ट करती है; जो एक वर्ष तक यह अभ्यास रखे, वह तिर्यक् योनियों में पुनर्जन्म नहीं पाता।

Ānarteśvara–Śūdrakeśvara Māhātmya (Merit of the Ānarteśvara and Śūdrakeśvara sites)
सूत जी बताते हैं कि देवताओं द्वारा निर्मित एक सरोवर के तट पर राजा आनर्त (जिसे सुहय भी कहा गया) ने ‘आनर्तेश्वर’ नामक लिंग की स्थापना की। कहा गया है कि अङ्गारक-षष्ठी के दिन वहाँ स्नान करने से वैसी ही सिद्धि मिलती है जैसी राजा को प्राप्त हुई थी; ऋषि पूछते हैं कि यह सिद्धि कैसे उत्पन्न हुई। तब एक दृष्टान्त आता है—सिद्धसेन नामक व्यापारी का कारवाँ चलते-चलते थक गए एक शूद्र सेवक को निर्जन मरुभूमि में छोड़ देता है। रात में वह शूद्र एक ‘प्रेत-राज’ को अपने अनुचरों सहित देखता है; वे अतिथि-सत्कार माँगते हैं, वह उन्हें अन्न-जल देता है, और यह क्रम कई रातों तक चलता रहता है। प्रेत-राज बताता है कि गंगा-यमुना संगम के पास हाटकेश्वर क्षेत्र में रहने वाले एक महाव्रतधारी कठोर तपस्वी के प्रभाव से उसे रात्रि में यह समृद्धि मिलती है; वह तपस्वी कपाले (खोपड़ी-पात्र) से रात्रिकालीन शुद्धि करता है। मुक्ति के लिए प्रेत-राज निवेदन करता है कि उस कपाले को पीसकर संगम में प्रवाहित किया जाए और गयाशिर तीर्थ में पत्र में लिखे नामों के अनुसार श्राद्ध किया जाए। शूद्र को छिपा धन मिल जाता है, वह कपाल-विधि और श्राद्ध सम्पन्न करता है, जिससे प्रेतों की परलोक-गति सुधरती है। अंत में वह शूद्र उसी क्षेत्र में रहकर ‘शूद्रकेश्वर’ लिंग की स्थापना करता है। फलश्रुति में कहा गया है कि स्नान और पूजा से पाप नष्ट होते हैं, दान व ब्राह्मण-भोजन से पितरों को दीर्घ तृप्ति मिलती है, थोड़ा सा स्वर्ण-दान भी महान यज्ञों के समान फल देता है, और उस स्थान पर उपवासपूर्वक देह-त्याग पुनर्जन्म से मुक्ति का साधन माना गया है।

रामह्रद-माहात्म्यम् (Glory of Rāmahrada) — Jamadagni, the Cow of Plenty, and Ancestral Tarpaṇa
अध्याय 66 में सूत जी ‘रामह्रद’ नामक प्रसिद्ध तीर्थ-सरोवर का वर्णन करते हैं, जहाँ रक्त (रुधिर) से जुड़े अर्पण द्वारा पितरों के तृप्त होने की बात कही गई है। ऋषि इस पर आपत्ति करते हैं कि पितृ-तर्पण तो शुद्ध जल, तिल आदि से होता है; रक्त का संबंध अन्य, अनुष्ठान-विरुद्ध प्राणियों से बताया गया है—फिर जामदग्न्य (परशुराम) ने ऐसा क्यों किया? सूत जी बताते हैं कि यह व्रत और क्रोध से उत्पन्न प्रसंग है, जिसका मूल कारण है हैहय राजा सहस्रार्जुन (कार्तवीर्य अर्जुन) द्वारा महर्षि जमदग्नि का अन्यायपूर्ण वध। कथा आगे बढ़ती है—जमदग्नि राजा को अतिथि मानकर सम्मान देते हैं और दिव्य ‘होमधेनु/कामधेनु-सदृश’ गाय के द्वारा राजा तथा उसकी सेना के लिए अद्भुत आतिथ्य-सत्कार की व्यवस्था करते हैं। राजा उस गाय को राज्य-बल और सैन्य-लाभ के लिए पाने की लालसा करता है; जमदग्नि मना करते हैं और कहते हैं कि साधारण गाय भी अवध्य है, गाय को वस्तु बनाकर लेना-देना घोर अधर्म है। तब राजा के लोग जमदग्नि की हत्या कर देते हैं; गाय की शक्ति से पुलिंद रक्षक प्रकट होकर राजसैन्य को परास्त करते हैं। राजा गाय छोड़कर लौट जाता है और चेतावनी मिलती है कि जमदग्नि-पुत्र राम आने वाले हैं—इस प्रकार तीर्थ-माहात्म्य को धर्म, अतिथि-सत्कार और तपस्वी-हिंसा की सीमा से जोड़ा गया है।

हैहयाधिपतिवधः पितृतर्पणप्रतिज्ञा च (Slaying of the Haihaya lord and the vow concerning ancestral offering)
सूता बताते हैं कि परशुराम अपने भाइयों सहित लौटे तो आश्रम उजड़ा हुआ मिला और कुल-धेनु घायल थी। ऋषियों से ज्ञात हुआ कि उनके पिता की हत्या कर दी गई है और माता अनेक शस्त्र-घावों से अत्यन्त पीड़ित हैं। परशुराम शोक करते हुए वैदिक विधि से पिता का अन्त्येष्टि-कर्म सम्पन्न करते हैं। ऋषि उन्हें पितृतर्पण हेतु जलांजलि देने को कहते हैं, पर वे प्रतिशोध-धर्म पर आधारित प्रतिज्ञा करते हैं—निर्दोष पिता-वध और माता के घोर घावों का प्रतिकार किए बिना यदि मैं पृथ्वी को ‘क्षत्रिय-शून्य’ न करूँ तो मुझे दोष लगेगा। वे कहते हैं कि पिता को जल से नहीं, अपराधियों के रक्त से तृप्त करूँगा। इसके बाद हैहय सेना और वन्य सहयोगियों के साथ महायुद्ध होता है। दैववश हैहय राजा धनुष, खड्ग, गदा कुछ भी चला नहीं पाता; दिव्यास्त्र और मंत्र भी निष्फल हो जाते हैं। परशुराम उसके भुजाएँ काटकर शिरच्छेद करते हैं, रक्त एकत्र कराते हैं और हाटकेश्वर-क्षेत्र में तैयार गड्ढे में उसे अर्पित करने का आदेश देते हैं—इस प्रकार तीर्थ-सम्बद्ध पितृतर्पण का कारण और प्रतिज्ञाबद्ध कर्म का आदर्श स्थापित होता है।

पितृतर्पण-प्रतिज्ञापूरणम् (Fulfilment of the Vow through Ancestral Oblations)
Chapter 68 continues the transmitted discourse with Sūta as narrator. The episode describes the aftermath of Bhārgava (Paraśurāma) establishing a kṣatriya-less order through violent retribution, after which blood is gathered and conveyed to a pit (garta) associated with ancestral origin (paitṛkī / pitṛ-sambhavā). The narrative then shifts from martial action to ritual resolution: Bhārgava bathes in the blood, prepares abundant sesame (tila), and performs pitr̥-tarpaṇa with the apasavya orientation, in the presence of brahmins and other ascetics as direct witnesses, thereby fulfilling a stated pledge and becoming “free from sorrow” (viśoka). Subsequently, in a world described as bereft of kṣatriyas, he performs an aśvamedha and gives the entire earth as dakṣiṇā to brahmins. The brahmins respond with a governance principle—‘one ruler is remembered’—and instruct him not to remain on their land. A further exchange culminates in a threat to dry the ocean with a fire-weapon; hearing this, the ocean, fearful, withdraws as desired. The chapter thus interweaves ethical tension (violence and authority), ritual technology (tarpaṇa, aśvamedha, dāna), and cosmological geography (ocean’s retreat) as an explanatory charter for place and practice.

रामह्रद-माहात्म्य (Rāmahrada Māhātmya: The Glory of Rāma’s Sacred Lake)
सूता बताते हैं कि जब क्षत्रियों का अभाव हो गया, तब क्षत्रिय स्त्रियों से ब्राह्मणों द्वारा क्षेत्रज पुत्र उत्पन्न हुए और वही नए शासक बने। वे बलवान होकर ब्राह्मणों को दबाने लगे। पीड़ित ब्राह्मण भृगुवंशी राम (परशुराम) के पास जाकर अश्वमेध-प्रसंग में दी गई भूमि की पुनः प्राप्ति और अत्याचारी क्षत्रियों से रक्षा की प्रार्थना करते हैं। क्रोधित राम शबर, पुलिंद, मेद आदि सहायकों के साथ जाकर क्षत्रियों का संहार करते हैं; बहुत-सा रक्त एक गड्ढे में भरकर पितृ-तर्पण करते हैं, फिर भूमि ब्राह्मणों को लौटाकर समुद्र की ओर प्रस्थान करते हैं। कहा गया है कि पृथ्वी इक्कीस बार (सात-सात की तीन आवृत्तियों में) क्षत्रिय-शून्य हुई और तर्पण से पितर तृप्त हुए। इक्कीसवें तर्पण पर एक अशरीरी पितृवाणी उन्हें निंदित कर्म रोकने को कहती है, तृप्ति प्रकट कर वर देती है। राम वर मांगते हैं कि यह तीर्थ उनके नाम से प्रसिद्ध हो, रक्त-दोष से रहित रहे और तपस्वियों द्वारा सेवित हो। पितर घोषणा करते हैं कि यह तर्पण-कुंड तीनों लोकों में ‘रामह्रद’ के नाम से विख्यात होगा; यहाँ पितृ-तर्पण करने से अश्वमेध-सदृश फल और उत्तम गति मिलती है। भाद्रपद कृष्ण चतुर्दशी को शस्त्र से मरे हुए लोगों के लिए भक्तिपूर्वक श्राद्ध करने से प्रेत-योनि या नरक में पड़े जीव भी उन्नत होते हैं। सर्पदंश, अग्नि, विष, बंधन आदि अकाल-मृत्यु वालों का श्राद्ध भी यहाँ मुक्ति देता है। इस अध्याय के पाठ-श्रवण का फल गया-श्राद्ध, पितृमेध और सौत्रामणि के समान बताया गया है।

Śakti-prakṣepaḥ and Tārakāsura Narrative (Kārttikeya-Śakti and the Origin-Logic of a Purifying Kuṇḍa)
इस अध्याय में सूत कार्त्तिकेय से सम्बद्ध पाप-नाशिनी ‘शक्ति’ तथा उसी शक्ति के प्रसंग से उत्पन्न एक विशाल, निर्मल जल वाले कुण्ड का वर्णन करते हैं। वहाँ स्नान और पूजन को जीवनभर के पापों से तत्काल मुक्ति देने वाला और मोक्षदायक कहा गया है। ऋषि शक्ति का समय, प्रयोजन और प्रभाव पूछते हैं। तब सूत तारकासुर की उत्पत्ति-कथा सुनाते हैं। हिरण्याक्ष के वंश का दानव तारक गोकर्ण में घोर तप करता है; शिव प्रकट होकर उसे ऐसा वर देते हैं कि वह देवताओं से लगभग अजेय हो जाए, पर शिव स्वयं उसे न मारें—यह निहित मर्यादा रहती है। वर पाकर तारक देवताओं पर दीर्घ युद्ध छेड़ देता है; उनके उपाय और अस्त्र-शस्त्र निष्फल हो जाते हैं। इन्द्र बृहस्पति से परामर्श करते हैं। बृहस्पति तत्त्व-न्याय बताते हैं कि शिव अपने वरद को नष्ट नहीं करेंगे, इसलिए शिव का पुत्र ही सेनापति बनकर तारक का वध करेगा। शिव पार्वती सहित कैलास में निवृत्त होते हैं; देवता भयवश वायु को भेजकर गर्भाधान में विघ्न डालते हैं। शिव अपने तेजस्वी वीर्य को रोककर स्थान पूछते हैं; अग्नि धारण करता है, पर असह्य होने से उसे पृथ्वी पर शर-स्तम्ब (सरकण्डों) में रख देता है। छह कृत्तिकाएँ उस बीज की रक्षक बनती हैं—यहीं से स्कन्द/कार्त्तिकेय के जन्म और तारक-वध की भूमिका बनती है। इस प्रकार तीर्थ-कुण्ड की पवित्रता को दिव्य शक्ति के संचार और कार्त्तिकेय के उद्धारक कार्य से जोड़ा गया है।

स्कन्दाभिषेकः तारकवधश्च — Consecration of Skanda and the Slaying of Tāraka; Stabilization of Raktaśṛṅga
सूता नागरखण्ड में कौमार-तत्त्व से जुड़ी कथा कहते हैं। स्कन्द अद्भुत तेज से उत्पन्न होते हैं; कृतिकाएँ आकर उन्हें स्तन्यपान कराती और आलिंगन करती हैं, तब उनका रूप अनेक मुखों और अनेक भुजाओं वाला विस्तार पाता है। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र आदि देवगण एकत्र होकर गीत-वाद्य-नृत्य सहित उत्सव करते हैं; देव उन्हें “स्कन्द” नाम देते हैं, अभिषेक करते हैं और शिव उन्हें सेनापति नियुक्त करते हैं। स्कन्द को अचूक विजय-शक्ति, मयूर वाहन तथा अनेक देवताओं से दिव्य आयुध प्राप्त होते हैं। स्कन्द के नेतृत्व में देव तारक से युद्ध करते हैं। घोर संग्राम के अंत में स्कन्द अपनी शक्ति छोड़कर तारक का हृदय विदीर्ण कर देते हैं और दैत्य-भय का अंत हो जाता है। विजय के बाद वे रक्तचिह्नित शक्ति को ‘पुरोत्तम’ में प्रतिष्ठित करते हैं, जिससे रक्तशृङ्ग स्थिर और सुरक्षित होता है। फिर पर्वत के हिलने से चमत्कारपुर को क्षति पहुँचती है और ब्राह्मणों की हानि होती है; वे शाप देने को उद्यत होते हैं। स्कन्द सबके कल्याण का कारण बताकर उन्हें शांत करते हैं, अमृत से मृत ब्राह्मणों को जीवित करते हैं, शिखर पर शक्ति स्थापित कर चार दिशाओं में चार देवियों—आम्बवृद्धा, आम्रा, माहित्था, चमत्करी—को नियुक्त कर पर्वत को अचल कर देते हैं। ब्राह्मण वर देते हैं कि यह नगर स्कन्दपुर (और चमत्कारपुर) के नाम से प्रसिद्ध हो, स्कन्द व चारों देवियों की पूजा हो, तथा चैत्र शुक्ल षष्ठी को शक्ति की विशेष वंदना हो। फलश्रुति में कहा है कि उस दिन भक्तिपूर्वक पूजा से स्कन्द प्रसन्न होते हैं और विधिवत पूजा के बाद शक्ति से पीठ रगड़ने/स्पर्श करने पर एक वर्ष तक रोगमुक्ति होती है।

हाटकेश्वरक्षेत्रमाहात्म्ये कौरवपाण्डवतीर्थयात्रा (Hāṭakeśvara-Kṣetra Māhātmya: The Kaurava–Pāṇḍava Pilgrimage Episode)
इस अध्याय में सूत ऋषियों के प्रश्न का उत्तर देते हैं कि धृतराष्ट्र ने हाटकेश्वर-क्षेत्र में लिंग की स्थापना कब और कैसे की। पहले वंश-वैवाहिक प्रसंग आता है—शुभ लक्षणों और सद्गुणों से युक्त बाणुमती का विवाह धृतराष्ट्रवंश में होता है; यदुवंश का संकेत और विष्णु-स्मरण भी प्रसंगवश आता है। फिर कौरव (भीष्म, द्रोण आदि सहित) और पाँचों पांडव अपने-अपने अनुचरों के साथ द्वारावती की ओर प्रस्थान करते हैं। वे समृद्ध आनर्त-प्रदेश में प्रवेश कर हाटकेश्वर-देव से संबद्ध, पापहरण करने वाले प्रसिद्ध क्षेत्र में पहुँचते हैं। भीष्म उस स्थान की विशेष महिमा बताते हुए पाँच दिन ठहरने की सलाह देते हैं, अपने घोर पाप से मुक्ति का उदाहरण देकर तीर्थों और आयतनों के दर्शन का अवसर बताते हैं। धृतराष्ट्र कर्ण, शकुनि, कृप आदि सहित अनेक पुत्रों के साथ सेना को नियंत्रित रखता है ताकि तपोवन में विघ्न न हो; वेदपाठ और यज्ञधूम से चिह्नित, तपस्वियों से भरे क्षेत्र में प्रवेश होता है। अध्याय में तीर्थयात्रा के नियम बताए गए हैं—नियमित स्नान, दीनों व साधुओं को दान, तिलमिश्रित जल से श्राद्ध-तर्पण, होम-जप-स्वाध्याय, तथा ध्वज, शुद्धि, मालाएँ और विविध उपहारों सहित देवालय-पूजन; पशु, वाहन, गौ, वस्त्र और स्वर्ण आदि का दान भी। अंत में सब शिविर लौटकर तीर्थों, मंदिरों और अनुशासित तपस्वियों को देखकर विस्मित होते हैं; आरंभ में कहा गया है कि इस लिंग का दर्शन दुर्योधन सहित सबके पापों का नाश कर मोक्ष का कारण बनता है।

धृतराष्ट्रादिकृतप्रासादस्थापनोद्यमवर्णनम् (Preparations for Palace-Temples and Liṅga Installation by Dhṛtarāṣṭra and Others)
इस अध्याय में द्वारवती में दुर्योधन–भानुमती के राजविवाह का भव्य उत्सव वर्णित है—वाद्य-गान, नृत्य, वेदपाठ और जन-हर्ष से नगर आनंदित हो उठता है। नवें दिन कौरव–पाण्डवों के वृद्धजन भगवान विष्णु (पुण्डरीकाक्ष/माधव) से स्नेहपूर्वक निवेदन करते हैं कि वे जाना नहीं चाहते, पर एक आवश्यक कार्य के कारण प्रस्थान करना है। वे बताते हैं कि अनर्त प्रदेश की यात्रा में उन्होंने अद्भुत हाटकेश्वर-क्षेत्र देखा, जहाँ तेजस्वी और विविध शिल्प-रूपों वाले अनेक लिंग प्रतिष्ठित हैं, जो महान वंशों और दिव्य सत्ताओं से संबद्ध हैं। उसी पुण्यभूमि में वे अपने-अपने लिंग स्थापित करना चाहते हैं, इसलिए अनुमति माँगते हैं और पुनः दर्शन हेतु लौटने का वचन देते हैं। माधव उस क्षेत्र को परम पुण्यदायक बताकर उनके साथ दर्शन और लिंग-प्रतिष्ठा के लिए चलने को स्वीकार करते हैं। वहाँ पहुँचकर कौरव, पाण्डव और यादव ब्राह्मणों को बुलाकर भूमि-स्वीकृति तथा प्रतिष्ठा-विधि में आचार्यत्व का अनुरोध करते हैं। ब्राह्मण क्षेत्र की सीमितता और पूर्व-निर्मित दिव्य प्रासादों पर विचार करते हुए भी यह निश्चय करते हैं कि धर्मकार्य हेतु महान जनों की याचना अस्वीकार नहीं की जानी चाहिए। वे क्रमबद्ध रूप से प्रत्येक राजा को अलग-अलग सुंदर प्रासाद बनाने और लिंग-प्रतिष्ठा करने की अनुमति देते हैं; अंत में धृतराष्ट्र आदि नियत क्रम से निर्माण-कार्य आरम्भ करते हैं।

कौरवपाण्डवयादवकृतलिङ्गप्रतिष्ठावृत्तान्तवर्णनम् (Account of Liṅga Consecrations Performed by the Kauravas, Pāṇḍavas, and Yādavas)
हाटकेश्वर-क्षेत्र-माहात्म्य के प्रसंग में सूत लिङ्ग-प्रतिष्ठा का यह वृत्तान्त सुनाते हैं। सौ पुत्रों वाले राजा धृतराष्ट्र ने वहाँ 101 शिवलिङ्गों की स्थापना की। पाण्डवों ने मिलकर पाँच लिङ्ग प्रतिष्ठित किए; साथ ही द्रौपदी, कुन्ती, गान्धारी और भानुमती द्वारा भी लिङ्ग-स्थापन का वर्णन है, जिससे राजपरिवारों में व्यापक भक्ति-भागीदारी प्रकट होती है। इसके बाद महाभारत-परिसर के प्रमुख पात्र—विदुर, शल्य, युयुत्सु, बाह्लीक, कर्ण, शकुनि, द्रोण, कृप और अश्वत्थामा—‘परमा भक्ति’ से, ‘वर-प्रासाद’ नामक विशिष्ट मंदिर-रचना में, अपने-अपने लिङ्ग की स्थापना करते हैं। फिर विष्णु भी शिखरयुक्त ऊँचे प्रासाद में एक लिङ्ग प्रतिष्ठित करते हैं। तत्पश्चात सात्वत/यादव—साम्ब, बलभद्र, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध आदि—श्रद्धा से दस प्रधान लिङ्गों की स्थापना करते हैं। अंत में सब संतुष्ट होकर दीर्घकाल तक वहाँ निवास करते हैं, धन-धान्य, गाँव, खेत, गौएँ, वस्त्र, सेवक आदि का व्यापक दान करते हैं और आदरपूर्वक विदा लेते हैं। फलकथन है कि इन लिङ्गों की भक्तिपूर्वक पूजा से इच्छित फल मिलता है; विशेषतः धृतराष्ट्र का लिङ्ग पाप-नाशक कहा गया है।

Hāṭakeśvara-liṅga-pratiṣṭhā and the Devayajana Merit-Statement (हाटकेश्वरलिङ्गप्रतिष्ठा तथा देवयजनमाहात्म्यम्)
सूता एक प्राचीन पुण्य-इतिहास सुनाते हैं—रुद्र ने ब्रह्मा को एक अनुपम क्षेत्र प्रदान किया, जहाँ हाटकेश्वर नामक लिंग की प्रतिष्ठा हुई। फिर शम्भु ने कलियुग के दोषों से पीड़ित ब्राह्मणों की रक्षा हेतु उस क्षेत्र को षण्मुख (स्कन्द/कार्त्तिकेय) को सौंप दिया। ब्रह्मा के आग्रह पर और पिता की आज्ञा के अनुसार गाङ्गेय (कार्त्तिकेय) वहीं निवास करने लगे। कार्त्तिक मास में कृत्तिका-योग के समय भगवान के दर्शन करने से अनेक जन्मों का पुण्य मिलता है और मनुष्य विद्वान व समृद्ध ब्राह्मण के रूप में जन्म पाता है—ऐसा काल-नियम कहा गया है। आगे महसेन का भव्य प्रासाद/मंदिर ऊँचा और अत्यन्त शोभायमान बताया गया है। यह सुनकर देवता कौतूहल से वहाँ आए, परम पावन नगरी का दर्शन किया और उत्तर-पूर्व प्रांगणों में यज्ञ करके यथाविधि दक्षिणा दी। वही स्थान ‘देवयजन’ कहलाया, और कहा गया कि वहाँ विधिपूर्वक किया गया एक यज्ञ अन्यत्र किए गए सौ यज्ञों के फल के तुल्य है।

Bhāskara-traya Māhātmya (The Glory of the Three Solar Manifestations: Muṇḍīra, Kālapriya, and Mūlasthāna)
इस अध्याय में सूत ‘भास्कर-त्रय’ का वर्णन करते हैं—मुण्डीर, कालप्रिय और मूलस्थान—ये तीन मंगलमय सूर्य-स्वरूप हैं, जिनके दर्शन से मुक्ति तक का फल कहा गया है। इनके साथ समय-विशेष का संबंध बताया गया है: रात्रि-समाप्ति पर मुण्डीर, मध्याह्न में कालप्रिय और संध्या/रात्रि-प्रवेश पर मूलस्थान। ऋषि हाटकेश्वरज-क्षेत्र में इनके स्थान-विन्यास और उत्पत्ति के विषय में पूछते हैं। सूत एक दृष्टांत सुनाते हैं—एक ब्राह्मण भयंकर कुष्ठ से पीड़ित है; उसकी पतिव्रता पत्नी अनेक उपचार करती है, पर लाभ नहीं होता। तभी एक पथिक अतिथि अपने अनुभव से बताता है कि उसने तीन वर्षों तक क्रमशः इन तीनों भास्करों की उपासना की—उपवास, संयम, रविवार-व्रत, जागरण और स्तुति सहित—और रोग से मुक्त हुआ। स्वप्न में सूर्यदेव प्रकट होकर कर्म-कारण (स्वर्ण-चोरी) बताते हैं, रोग हरते हैं और चोरी न करने तथा सामर्थ्य के अनुसार दान करने की शिक्षा देते हैं। इससे प्रेरित होकर ब्राह्मण-पत्नी मुण्डीर की ओर चल पड़ते हैं। मार्ग में ब्राह्मण अत्यन्त दुर्बल होकर मृत्यु का विचार करता है, पर पत्नी उसे छोड़ने से इनकार करती है। जब वे चिता की तैयारी करते हैं, तब तीन तेजस्वी पुरुष प्रकट होते हैं—वे ही तीन भास्कर—और रोग दूर कर देते हैं। वे कहते हैं कि यदि भक्त तीन मंदिर स्थापित करे तो वे वहीं त्रिकाल-दर्शन हेतु निवास करेंगे। ब्राह्मण रविवार (हस्तार्क-संदर्भ) में तीनों रूपों की स्थापना कर पुष्प-धूप से तीनों संधियों में पूजन करता है और अंत में भास्कर-धाम को प्राप्त होता है। फलश्रुति में कहा गया है कि समयानुसार त्रय-दर्शन कठिन कामनाएँ भी पूर्ण करता है और यह कथा नैतिक सुधार—चोरी-त्याग व दान—को प्रधान मानती है।

हाटकेश्वर-क्षेत्रे शिव-सती-विवाहकथनम् (Śiva–Satī Marriage Narrative at Hāṭakeśvara-kṣetra)
इस अध्याय में ऋषि सूत से पूछते हैं कि शिव–उमा की वेदिमध्य में प्रतिष्ठा कही जाती है, फिर उनका विवाह पहले ओषधिप्रस्थ में और विस्तार से हाटकेश्वर-क्षेत्र में कैसे स्मरण किया जाता है। सूत पूर्व मन्वन्तरों के प्राचीन प्रसंग का संकेत देकर, फिर दक्ष से सम्बद्ध विवाह-कथा का क्रम बताकर इस विरोध का समाधान करते हैं। दक्ष विवाह की भव्य तैयारी करता है। चैत्र शुक्ल त्रयोदशी, भग नक्षत्र और रविवार के शुभ मुहूर्त में शिव देव-गन्धर्व-यक्ष-राक्षस आदि विशाल गणों सहित पधारते हैं। यज्ञ में एक नैतिक-धार्मिक प्रसंग आता है—काम से अभिभूत ब्रह्मा सती के घूंघट में छिपे मुख को देखने का प्रयास करते हैं; यज्ञाग्नि से उठे धुएँ के माध्यम से वे देख लेते हैं, तब शिव उन्हें कठोर उपदेश देकर प्रायश्चित्त बताते हैं। गिरा हुआ बीज वाळखिल्य नामक अँगूठे-भर तपस्वियों की उत्पत्ति का कारण बनता है; वे शुद्ध तप-स्थान माँगकर वहीं सिद्धि पाते हैं। अंत में शिव सती सहित वेदिमध्य में प्राणियों की शुद्धि हेतु निवास स्वीकार करते हैं; नियत समय पर दर्शन से पाप नष्ट होते हैं और सौभाग्य, विशेषतः विवाह-संस्कारों की मंगलता, प्राप्त होती है। फलश्रुति में कहा है कि जो श्रद्धा से सुनकर वृषभध्वज की पूजा करते हैं, उनके विवाहादि कर्म निर्विघ्न पूर्ण होते हैं।

रुद्रशीर्षतीर्थमाहात्म्यम् (Rudraśīrṣa Tīrtha Māhātmya)
इस अध्याय में ऋषि पूछते हैं कि वह कौन-सा स्थान है जहाँ ब्रह्मा और वलखिल्य ऋषियों ने तप किया। सूत दिशा-विशेष में स्थित पवित्र क्षेत्र का वर्णन करते हुए रुद्रशीर्ष-पीठ और उससे संबद्ध कुण्ड का माहात्म्य बताते हैं, जहाँ तीर्थ-शक्ति विशेष रूप से प्रकट है। फिर एक नैतिक-आनुष्ठानिक प्रसंग आता है—परपुरुष-संबंध के आरोप में पकड़ी गई एक ब्राह्मणी अपनी निर्दोषता सिद्ध करने हेतु वृद्धों और देवताओं के साक्ष्य में “दिव्य-ग्रह” (लोक-समक्ष परीक्षा) करती है। अग्निदेव स्पष्ट करते हैं कि शुद्धि उस कर्म की स्वीकृति से नहीं, बल्कि रुद्रशीर्ष-तीर्थ और कुण्ड-जल की प्रभावशक्ति से हुई; समाज पति की कठोरता की निंदा भी करता है। साथ ही आगे के वर्णन में चेतावनी दी जाती है कि काम-मोह से प्रेरित होकर वहाँ दाम्पत्य-धर्म का पतन बढ़ता है—अनुशासन के बिना तीर्थ-शक्ति भी विपथगामी को ढील दे सकती है। दूसरे उदाहरण में राजा विदूरथ क्रोधवश कुण्ड को पाट देता और संरचना को क्षति पहुँचाता है; प्रत्युत्तर में शाप/वचन होता है कि जो कुण्ड और मंदिर का पुनर्निर्माण करेगा, वह वहाँ हुए काम-दोषों का कर्मभार भी ग्रहण करेगा—यह एक नैतिक निरोध और तीर्थ की “पुण्य-पाप” अर्थव्यवस्था का संकेत है। अंत में फलश्रुति है: माघ शुक्ल चतुर्दशी को “रुद्रशीर्ष” का 108 बार जप और पूजन करने से अभीष्ट फल, दैनिक पापों से शुद्धि और परम गति प्राप्त होती है।

Vālakhilya-Muni-Avajñā, Garuḍotpatti, and the Liṅga–Kuṇḍa Phala (वालखिल्यमुन्यवज्ञा–गरुडोत्पत्तिः–लिङ्गकुण्डफलम्)
यह अध्याय सूतजी द्वारा जिज्ञासु ऋषियों को सुनाया गया है। पवित्र क्षेत्र के दक्षिण भाग में स्थित एक प्रसिद्ध लिंग का वर्णन है, जो पापों का शोधन करने वाला कहा गया है। उसके समीप स्थित कुंड में होम करने से विशेष पुण्य और फल की प्राप्ति बताई गई है। दक्ष के सुव्यवस्थित यज्ञ में सहायता हेतु वालखिल्य मुनि समिधाएँ लेकर जा रहे थे। मार्ग में जल से भरे गड्ढे के कारण वे रुककर कष्ट में पड़ गए। उसी समय शक्र (इन्द्र) यज्ञ की ओर जाते हुए उन्हें देखकर भी गर्व और कौतुकवश उस बाधा को लाँघ गया, जिससे मुनियों का अपमान हुआ। मुनियों ने अथर्वण मंत्रों से, मंडल में स्थापित पवित्र कलश के द्वारा, एक ‘शक्र’ के समान प्रतिरूप उत्पन्न करने का संकल्प किया; तब इन्द्र के लिए अशुभ संकेत प्रकट हुए। बृहस्पति ने इन्हें तपस्वियों के अपमान का फल बताया। इन्द्र ने दक्ष से शरण माँगी; दक्ष ने मुनियों से समझौता कर उस मंत्रजन्य शक्ति को नष्ट न करके उसे इस प्रकार मोड़ा कि उत्पन्न होने वाला तेज गरुड़ बने—विष्णु का वाहन—न कि इन्द्र का प्रतिद्वन्द्वी। अंत में मेल-मिलाप होता है और फलश्रुति में कहा गया है कि इस लिंग की पूजा तथा कुंड में होम, श्रद्धा से या निष्काम भाव से भी, इच्छित फल और दुर्लभ आध्यात्मिक सिद्धि प्रदान करता है।

Suparṇākhyamāhātmya (The Glory of Suparṇa/Garuḍa) — Garuḍa’s Origin, Pilgrimage Quest, and Vaiṣṇava Audience
अध्याय 80 में ऋषि पूछते हैं कि अद्भुत तेज और वीर्य से युक्त गरुड़ का जन्म “ऋषियों के होम” से कैसे कहा गया। सूत बताते हैं कि यह एक विधि-कारण से हुआ—अथर्ववेद के मंत्रों से अभिमंत्रित, वलखिल्य ऋषियों की शक्ति से संपन्न एक पवित्र कलश कश्यप लाते हैं और विनता को आदेश देते हैं कि वह मंत्र-शुद्ध जल पिए, जिससे महाबली पुत्र उत्पन्न हो। विनता के तत्काल पान से गर्भधारण होता है और सर्पों के लिए भयङ्कर गरुड़ जन्म लेते हैं; आगे चलकर वे वैष्णव सेवा में प्रतिष्ठित होते हैं—विष्णु के वाहन और रथ-ध्वज के चिह्न के रूप में। फिर दूसरा प्रश्न उठता है—गरुड़ के पंख कैसे कटे, कैसे लौटे, और महेश्वर कैसे प्रसन्न हुए। कथा में भृगुवंशी एक ब्राह्मण मित्र आता है, जो अपनी पुत्री माधवी के लिए योग्य वर खोज रहा है। गरुड़ उन्हें पृथ्वी पर दूर-दूर तक ले जाते हैं; इस यात्रा में केवल रूप, कुल, धन आदि को ही मानदंड मानने की, और समग्र सद्गुण से रहित चयन की, शिक्षा-रूप आलोचना प्रकट होती है। यात्रा पवित्र भूगोल की ओर मुड़ती है। वैष्णव प्रभाव वाले प्रदेश में नारद मिलते हैं और हाटकेश्वर-क्षेत्र का मार्ग बताते हैं, जहाँ जनार्दन नियत काल तक जलशायी रूप में विराजते हैं। प्रबल वैष्णव तेज के कारण गरुड़ और नारद ब्राह्मण को दूर रहने की सावधानी देते हैं; वे प्रणामादि कर दर्शन पाते हैं। नारद पृथ्वी की व्यथा ब्रह्मा तक पहुँचाते हैं—कंस आदि दुष्ट शक्तियों के दंड-तुल्य भार से पृथ्वी पीड़ित है, इसलिए विष्णु से अवतरण की प्रार्थना होती है। विष्णु सहमति देते हैं और अंत में गरुड़ से उनके आगमन का प्रयोजन पूछते हैं—यहीं आगे की कथा का सूत्र पड़ता है।

माधवी-शापकथा तथा शाण्डिली-ब्रह्मचर्य-प्रसङ्गः (Mādhavī’s Curse Episode and the Śāṇḍilī Brahmacarya Discourse)
अध्याय 81 संवादों की परतों में आगे बढ़ता है। गरुड़ भृगुवंशी एक ब्राह्मण मित्र और उसकी पुत्री माधवी का वर्णन करते हैं, जिसके लिए योग्य वर नहीं मिल पाता। गरुड़ विष्णु को ही रूप‑गुण में सर्वश्रेष्ठ मानकर निवेदन करते हैं। विष्णु कहते हैं कि कन्या को प्रत्यक्ष दर्शन हेतु लाया जाए, ताकि दिव्य तेज के कारण होने वाली शंका भी दूर हो। इसी बीच गृह‑अनुष्ठान के वातावरण में तनाव उठता है। लक्ष्मी कन्या के निकट आने को प्रतिस्पर्धा समझकर शाप देती हैं कि वह ‘अश्वमुखी’ (घोड़े‑मुख वाली) हो जाएगी। इससे जनसमुदाय में भय फैलता है और ब्राह्मणों में रोष होता है। तब एक ब्राह्मण तर्क देता है कि केवल वाणी से किया गया निवेदन विवाह नहीं होता; इसलिए शाप की सीमा और उसका फल भविष्य‑जन्मों के संबंधों में प्रकट होने की बात कही जाती है। फिर गरुड़ विष्णु के पास एक अद्भुत वृद्धा को देखते हैं। विष्णु बताते हैं कि वह शाण्डिली है—ज्ञान और ब्रह्मचर्य में प्रसिद्ध। गरुड़ स्त्रियों और युवावस्था की कामना पर संदेहपूर्ण वचन कह बैठते हैं, और तत्काल दंडस्वरूप उनके पंख लुप्त हो जाते हैं। यह प्रसंग वाणी‑संयम, पूर्वाग्रह त्याग और तपस्विनी के प्रति आदर का नैतिक संकेत देता है।

Garuda’s Atonement and the Merit of Worship at the Supaṛṇākhyā Shrine (गरुडप्रायश्चित्तं सुपर्णाख्यदेवमाहात्म्यं)
इस अध्याय में तीन चरणों में कथा चलती है। विष्णु गरुड़ को अचानक दुर्बल देखते हैं—उसके पंख गिर गए हैं—और वे समझते हैं कि कारण केवल शारीरिक नहीं, कोई सूक्ष्म नैतिक-आध्यात्मिक कारण है। तपस्विनी शाण्डिली से संवाद होता है। वह बताती है कि स्त्रियों की सामान्य निंदा के प्रतिकार में उसने तपःशक्ति से केवल मन के संकल्प द्वारा गरुड़ का निग्रह किया, कोई शारीरिक हिंसा नहीं की। विष्णु मेल-मिलाप चाहते हैं, पर शाण्डिली उपाय बताती है—शंकर की आराधना; पुनर्स्थापन शिव-कृपा पर निर्भर है। गरुड़ दीर्घकाल तक पाशुपत भाव से व्रत-अनुष्ठान करता है—चांद्रायण व अन्य कृच्छ्र, त्रिकाल स्नान, भस्म-नियम, रुद्र-मंत्र जप और विधिवत पूजन-नैवेद्य। अंत में महेश्वर प्रसन्न होकर वर देते हैं—लिंग के पास निवास, पंखों की तत्काल वापसी और दिव्य तेज। फलश्रुति में कहा है कि पापाचारी भी सतत उपासना से ऊँचा उठता है; सोमवार को केवल दर्शन भी पुण्यदायक है; और सुपर्णाख्य धाम में प्रायोपवेशन करने से पुनर्जन्म का अंत बताया गया है।

सुपर्णाख्यमाहात्म्यवर्णनम् (The Māhātmya of the Supaṇākhya Shrine)
सूता पुराण-परंपरा में सुरक्षित एक अद्भुत प्रसंग सुनाते हैं। सूर्यवंशी राजा वेणु निरंतर अधर्म में लिप्त था—यज्ञ-पूजा में बाधा डालता, ब्राह्मणों के दान-ग्रहण छीनता, निर्बलों को सताता, चोरों को बचाता, न्याय उलट देता और स्वयं को सर्वोच्च मानकर अपनी ही आराधना करवाता। कर्मफल से उसे भयंकर कुष्ठ हो गया, वंश नष्ट हुआ; वह निरपत्य, निराश्रित होकर राज्य से निकाला गया और भूख-प्यास से पीड़ित अकेला भटकता रहा। अंततः वह पवित्र क्षेत्र के सुपर्णाख्य प्रासाद/मंदिर में पहुँचा और अत्यंत थककर वहीं प्राण त्याग दिए; यह देहत्याग अनायास उपवास-सा हो गया। उस स्थान के माहात्म्य से उसे दिव्य देह मिला, वह विमान में आरूढ़ होकर शिवलोक पहुँचा और अप्सराओं, गंधर्वों, किन्नरों द्वारा सम्मानित हुआ। पार्वती ने शिव से पूछा कि यह कौन है और किस कर्म से इसे यह गति मिली; शिव ने कहा—इस शुभ प्रासाद में देह छोड़ना, विशेषतः प्रायोपवेशन/अशन-त्याग जैसी अवस्था में, अत्यंत फलदायी है; यहाँ मरने वाले कीट-पतंग, पक्षी और पशु भी उद्धार पाते हैं। यह सुनकर पार्वती विस्मित हुईं; तब से मोक्ष-कामी श्रद्धा से दूर-दूर से आकर प्रायोपवेशन करते और परम सिद्धि पाते हैं। अध्याय का उपसंहार इसे श्रीहाटकेश्वर-क्षेत्र माहात्म्य में ‘सर्वपाप-नाशक’ कथा बताकर करता है।

Mādhavī’s Transformation at Hāṭakeśvara-kṣetra (माधवी-रूपपरिवर्तन-प्रसङ्गः)
ऋषि विष्णु से जुड़ी बहन-स्वरूपा माधवी का विस्तृत वृत्तांत पूछते हैं—उसे अश्वमुखी रूप कैसे मिला और उसने तपस्या कैसे की। सूत बताते हैं कि नारद-संबंधित दिव्य संदेश पाकर विष्णु देवताओं के साथ विचार करते हैं कि पृथ्वी का भार हल्का करने और अत्याचारी शक्तियों का नाश करने हेतु अवतार लेना है। द्वापर-काल में वसुदेव के घर जन्म-वृत्तांत आता है—देवकी से भगवान, रोहिणी से बलभद्र, और सुप्रभा से माधवी का जन्म होता है; पर वह अश्वमुखी विकृत रूप में प्रकट होती है, जिससे परिवार और नगर में शोक फैलता है और कोई वर उसे स्वीकार नहीं करता। विष्णु उसके दुःख को देखकर बलदेव सहित उसे हाटकेश्वर-क्षेत्र ले जाते हैं और नियमपूर्वक उपासना कराते हैं। व्रत, दान और ब्राह्मण-तर्पण से ब्रह्मा प्रसन्न होकर वर देते हैं कि माधवी शुभमुखी होकर ‘सुभद्रा’ नाम से प्रसिद्ध होगी, पति की प्रिय और वीरों की जननी बनेगी। माघ मास की द्वादशी को गंध, पुष्प और लेप से पूजन का विधान बताया गया है; विशेषतः परित्यक्ता या निःसंतान स्त्रियाँ यदि तीन दिनों के क्रम में भक्तिपूर्वक पूजन करें तो कल्याणफल पाती हैं। अंत में फलश्रुति है कि इस अध्याय का श्रद्धा से पाठ या श्रवण एक दिन में उत्पन्न पाप तक का नाश कर देता है।

Mahalakṣmī’s Restoration from the Gajavaktra Form (गजवक्त्रा-महालक्ष्मी-माहात्म्य / Narrative of Curse, Tapas, and Boon)
इस अध्याय में ऋषि सूत से पूछते हैं कि पद्मा द्वारा माधवी को दिए गए शाप का फल क्या हुआ, और क्रुद्ध ब्राह्मण के शाप से कमला/लक्ष्मी कैसे गजवक्त्रा (हाथी-मुख) रूप में आईं तथा फिर उनका शुभ मुख कैसे लौटा। सूत शाप का तत्काल प्रभाव बताते हैं और हरि की आज्ञा सुनाते हैं कि द्वापर-युग के अंत तक लक्ष्मी उसी रूप में रहेंगी, फिर दैवी शक्ति से उनका उद्धार होगा। लक्ष्मी उस क्षेत्र में त्रिकाल-स्नान करके, दिन-रात बिना थके ब्रह्मा की आराधना करते हुए कठोर तप करती हैं। वर्ष के अंत में प्रसन्न ब्रह्मा वर देते हैं; लक्ष्मी केवल अपने पूर्व शुभ रूप की पुनः प्राप्ति मांगती हैं। ब्रह्मा उनका रूप लौटा देते हैं और उस स्थल-प्रसंग में उन्हें ‘महालक्ष्मी’ नाम से प्रतिष्ठित करते हैं। फलश्रुति में कहा है—जो गजवक्त्रा रूप में उनकी पूजा करता है, वह ऐश्वर्य पाकर गजाधिपति-सा राजा बनता है; और जो द्वितीया तिथि को ‘महालक्ष्मी’ का आवाहन कर श्रीसूक्त से पूजन करता है, उसे सात जन्मों तक दरिद्रता से मुक्ति मिलती है। अंत में देवी केशव के धाम में लौट जाती हैं, वैष्णव भाव को पुष्ट करती हुईं और तीर्थ में ब्रह्मा के वरदत्व को भी मान्यता देती हैं।

सप्तविंशतिका-दुर्गा माहात्म्यम् (Glory of Saptaviṃśatikā Durgā and the Regulation of Lunar Fortune)
इस अध्याय में सप्तविंशतिका देवी का तीर्थ-माहात्म्य बताया गया है। सूत कहते हैं कि दक्ष की सत्ताईस कन्याएँ—जो नक्षत्रों के रूप में मानी जाती हैं—चन्द्रदेव (सोम) से विवाहित थीं; परन्तु रोहिणी पर सोम का विशेष अनुराग देखकर अन्य कन्याएँ दुःखी हुईं और अपने सौभाग्य के क्षीण होने तथा पति-परित्याग के भय से पीड़ित रहीं। तब उन्होंने उस क्षेत्र में तप किया, दुर्गा की स्थापना कर निरन्तर अर्पण और पूजा की। प्रसन्न होकर देवी ने वर दिया कि उनका सौभाग्य पुनः स्थिर होगा और पति-वियोग/परित्याग का दुःख दूर होगा। इसके बाद व्रत-विधान आता है—चतुर्दशी को उपवास और भक्ति से पूजा, एक वर्ष तक एकाग्र साधना, तथा व्रत की दृढ़ता के लिए क्षार/लवण आदि का त्याग। विशेष रूप से आश्विन शुक्ल पक्ष की नवमी को मध्यरात्रि में पूजन करने से तीव्र और दीर्घकालिक सौभाग्य की प्राप्ति कही गई है। आगे चन्द्र-पुराण प्रसंग में शूलपाणि सोम के राजयक्ष्मा के विषय में दक्ष से पूछते हैं; दक्ष अपने शाप का कारण बताते हैं; और शिव जगत्-संतुलन हेतु सोम को सभी पत्नियों के प्रति समान व्यवहार का आदेश देते हैं, जिससे शुक्ल-कृष्ण पक्ष का बढ़ना-घटना प्रकट होता है। अंत में कहा गया है कि देवी इस क्षेत्र में नित्य विराजमान होकर स्त्रियों को सौभाग्य देती हैं, और अष्टमी को शुद्ध होकर पाठ करने से सौभाग्य-सिद्धि होती है।

Somaprāsāda-māhātmya (Glory of the Lunar Temple)
इस अध्याय में सूत जी सोम (चन्द्रमा) के एक अत्यन्त शुभ प्रासाद/तीर्थ का वर्णन करते हैं, जिसके केवल दर्शन से भी पातक नष्ट हो जाते हैं। ऋषि पूछते हैं कि चन्द्रमा देवताओं में सबका समान आश्रय कैसे है। सूत उत्तर देते हैं कि जगत ‘सोममय’ माना गया है; औषधियाँ और अन्न-धान्य सोम-रस से परिपूर्ण हैं; देवता सोम से तृप्त होते हैं, इसलिए अग्निष्टोम आदि सोम-सम्बन्धी यज्ञ इसी सिद्धान्त पर प्रतिष्ठित हैं। फिर सोमप्रासाद के निर्माण की आचार-नीति बताई जाती है—सोमवार तथा अन्य शुभ लक्षणों वाले समय में, श्रद्धा से शुद्ध संकल्प करके निर्माण करने से महान पुण्य बढ़ता है; पर विधि-विरुद्ध निर्माण से अनिष्ट फल होने की चेतावनी दी जाती है। अंत में अम्बरीष, धन्धुमार और इक्ष्वाकु द्वारा निर्मित कुछ ही सोमप्रासादों का उल्लेख कर उनकी दुर्लभता बताई जाती है और श्रवण-पाठ से पाप-नाश का फल कहा जाता है।

अम्बावृद्धामाहात्म्यवर्णनम् / The Māhātmya of Ambā-Vṛddhā (Protective Goddesses of Hāṭakeśvara-kṣetra)
इस अध्याय में ऋषि सूत से पूछते हैं कि चार स्थानीय रक्षक देवताओं में जिन अम्बा‑वृद्धा का उल्लेख हुआ था, उनका माहात्म्य, उनकी यात्रा‑व्रत की उत्पत्ति और प्रभाव विस्तार से बताइए। सूत कहते हैं कि जब राजा चमत्कार ने नगर बसाया, तब हाटकेश्वर‑क्षेत्र की रक्षा हेतु चार देवताओं की विधिपूर्वक स्थापना की गई। उसी राजवंश में अम्बा और ‘वृद्धा’ नाम की दो स्त्रियाँ वैदिक रीति से काशी‑नरेश से विवाह करती हैं। कालयवनों के साथ युद्ध में राजा के मारे जाने पर दोनों विधवाएँ पति‑शत्रुओं के विनाश और संरक्षण‑भाव से हाटकेश्वर‑क्षेत्र जाकर दीर्घकाल तक देवी‑आराधना और तप करती हैं। उनके यज्ञाग्नि से उग्र शक्ति प्रकट होती है और फिर अनेक मुख‑भुजाओं, आयुधों, वाहनों और स्वभावों वाली असंख्य ‘मातृ’ शक्तियों का विशाल समुदाय प्रादुर्भूत होता है। वे शत्रु‑सेनाओं को परास्त कर भक्षण करते हुए उनके राज्य को उजाड़ देते हैं और फिर अपने स्थान पर लौट आते हैं। मातृगण निवास और आहार माँगते हैं; तब अम्बा‑वृद्धा कुछ धर्म‑नियम और निषेध बताती हैं—अधर्म, पापाचार, देव‑ब्राह्मण‑द्रोह आदि करने वाले ‘भक्ष्य’ माने जाएँगे—इस प्रकार मानव‑आचरण की मर्यादा निर्धारित होती है। अंत में राजा देवियों के लिए भव्य निवास बनवाता है। फलश्रुति में कहा है कि प्रातः उनके मुख‑दर्शन, कार्यों के आरंभ‑अंत में पूजन तथा विशेष तिथियों पर अर्पण से रक्षा, इच्छित सिद्धि और ‘काँटारहित’ अर्थात अविघ्न जीवन प्राप्त होता है।

Śrīmātuḥ Pādukā-māhātmya (Glory of the Divine Pādukās in Hāṭakeśvara-kṣetra)
इस अध्याय में हाटकेश्वर-क्षेत्र में एक संकट का वर्णन है। ब्राह्मणों के घरों में रात को बच्चे गायब होने लगते हैं; देवगण उस “छिद्र” (भेद) को खोजते हैं जिससे यह अनिष्ट हो रहा है। ब्राह्मण श्रद्धापूर्वक अम्बा के पास जाकर रात्रिकालीन अपहरण की बात कहते हैं और रक्षा की याचना करते हैं; सहायता न मिलने पर वे स्थान-त्याग की बात भी रखते हैं। करुणामयी अम्बा पृथ्वी पर प्रहार कर एक गुहा प्रकट करती हैं और उसमें अपनी दिव्य पादुकाएँ स्थापित करती हैं। वे सीमा-नियम देती हैं कि परिचारक देवता भीतर ही रहें; जो चंचलता से सीमा लाँघेंगे वे देवत्व से गिरेंगे। देव पूछते हैं कि पूजा कौन करेगा और नैवेद्य क्या होगा; अम्बा कहती हैं कि योगी और भक्त पूजा करेंगे, तथा पादुकाओं को मांस-मद्य आदि सहित अर्पण-क्रम बताकर दुर्लभ सिद्धि का वर देती हैं। इस उपासना के फैलने से अग्निष्टोम आदि वैदिक यज्ञ घटने लगते हैं; यज्ञ-भाग कम होने से देव व्याकुल होकर महेश्वर से प्रार्थना करते हैं। शिव अम्बा की अवध्यता स्वीकार कर एक “सुलभ उपाय” करते हैं—एक तेजस्विनी कन्या प्रकट कर उसे मंत्र-विधि और परम्परा द्वारा पादुका-पूजा चलाने की आज्ञा देते हैं। अंत में फलश्रुति है कि विशेषतः कन्या के हाथ से की गई पूजा तथा चतुर्दशी और अष्टमी को श्रद्धापूर्वक श्रवण करने से लोक-सुख, परलोक-कल्याण और अंततः परम पद की प्राप्ति होती है।

वह्नितीर्थोत्पत्तिः (Origin of Vahni/Agni Tīrtha) — Chapter 90
ऋषियों ने सूत से अग्नितीर्थ और ब्रह्मतीर्थ की उत्पत्ति तथा महिमा पूछी। सूत ने शान्तनु के राज्य में पड़े भीषण अनावृष्टि का वर्णन किया—इन्द्र ने उत्तराधिकार में अनियमितता समझकर वर्षा रोक दी, जिससे अकाल फैल गया और यज्ञ-धर्म का प्रवाह टूटने लगा। भूख से व्याकुल विश्वामित्र ने कुत्ते का मांस पकाया; निषिद्ध भक्षण से अपना संबंध होने के भय से अग्नि लोक से अंतर्धान हो गया। देवताओं ने अग्नि को खोजा; हाथी, तोता और मेंढक ने उसके छिपने के स्थान बताए, इसलिए उन्हें शाप मिला और उनकी वाणी/जीभ में विकार आ गया। अंततः अग्नि हाटकेश्वर-क्षेत्र के एक गहरे जलाशय में जा छिपा; उसकी उष्णता से जलचर प्राणी नष्ट होने लगे। तब ब्रह्मा ने आकर अग्नि को समझाया कि वह जगत के लिए अनिवार्य है—यज्ञ से सूर्य, सूर्य से वर्षा, वर्षा से अन्न और अन्न से प्राणी टिकते हैं। ब्रह्मा ने इन्द्र से मेल कर वर्षा पुनः चलवाई और वर दिया कि वही जलाशय ‘वह्नितीर्थ/अग्नितीर्थ’ के नाम से प्रसिद्ध हो। इस अध्याय में प्रातः स्नान, अग्निसूक्त-जप और भक्तिपूर्वक दर्शन को अग्निष्टोम-यज्ञ के तुल्य पुण्यदायक तथा संचित पापों के नाशक बताया गया है। साथ ही ‘वसोः-धारा’ (अविच्छिन्न घृताहुति) को शान्ति, पौष्टिक और वैश्वदेव कर्मों की पूर्णता के लिए आवश्यक, अग्नि-तोषक और दाता की इच्छित सिद्धि देने वाला कहा गया है।

अग्नितीर्थप्रशंसा (Agni-tīrtha Praise and the Devas’ Consolation)
सूता बताते हैं कि पितामह ब्रह्मा ने क्रुद्ध पावक (अग्नि) को शांत किया और फिर स्वयं लौट गए। इसके बाद शक्र, विष्णु, शिव आदि देवगण अपने-अपने धामों को चले गए। अग्रणी द्विजों के अग्निहोत्र में अग्नि प्रतिष्ठित हुए, विधिपूर्वक आहुतियाँ ग्रहण करने लगे और वहीं एक परम अग्नितीर्थ प्रकट हुआ। इस तीर्थ का फल कहा गया है कि जो प्रातःकाल वहाँ स्नान करता है, वह दिन से उत्पन्न (दिनज) पापों से मुक्त हो जाता है। देवों के प्रस्थान के समय गजेन्द्र, शुक और मण्डूक दुःखी होकर आए और बोले कि “आपके कारण अग्नि ने हमें शाप दिया है; हमारी जिह्वा के विषय में उपाय बताइए।” देवों ने उन्हें सांत्वना दी—जिह्वा में विकार होने पर भी उनकी क्षमता बनी रहेगी और राजसभाओं में भी स्वीकार्यता मिलेगी। मण्डूक, जिसे अग्नि ने ‘विजिह्व’ कर दिया था, उसके लिए भी विशेष ध्वनि-प्रकार के दीर्घकाल तक बने रहने का वर दिया गया। करुणा प्रदान कर देवगण विदा हो गए।

ब्रह्मकुण्डमाहात्म्यवर्णनम् | Brahmakuṇḍa Māhātmya (Glorification of Brahma-Kuṇḍa)
इस अध्याय में सूत जी अग्नितीर्थ के प्रसंग से आगे बढ़कर ब्रह्मकुण्ड की उत्पत्ति और महिमा का वर्णन करते हैं। कहा गया है कि ऋषि मार्कण्डेय ने वहाँ पद्मयोनि ब्रह्मा की प्रतिष्ठा की और निर्मल जल से भरा एक पवित्र कुण्ड स्थापित किया। फिर व्रत-विधान आता है—कार्तिक मास में जब चन्द्रमा कृत्तिका नक्षत्र में हो (कृत्तिका-योग), तब भीष्म-व्रत/भीष्म-पञ्चक करना चाहिए; शुभ जल में स्नान करके पहले ब्रह्मा की, फिर जनार्दन/पुरुषोत्तम विष्णु की पूजा करनी चाहिए। फलश्रुति में कहा है कि इससे जन्म और लोक की उन्नति होती है—शूद्र भी श्रेष्ठ जन्म पाता है और ब्राह्मण इस व्रत से ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है। उदाहरण में एक ग्वाला मार्कण्डेय का उपदेश सुनकर श्रद्धा से व्रत करता है; समय आने पर देह त्यागकर वह जातिस्मर ब्राह्मण कुल में जन्म लेता है। पूर्व माता-पिता के प्रति स्नेह रखते हुए वह अपने पूर्व पिता का श्राद्ध करता है; संबंधियों के पूछने पर वह अपने पूर्वजन्म और व्रत-प्रभाव से हुए परिवर्तन का कारण बताता है। अंत में उत्तर दिशा में ब्रह्मकुण्ड की प्रसिद्धि कही गई है और यह भी कि वहाँ बार-बार स्नान करने से साधक ब्राह्मण को बार-बार उच्च जन्म/विप्रत्व प्राप्त होता है।

गोमुखतीर्थमाहात्म्यवर्णनम् (Gomukha Tīrtha Māhātmya—Account of the Glory of Gomukha)
इस अध्याय में हाटकेश्वर-क्षेत्र के भीतर गोमुख-तीर्थ की उत्पत्ति, गुप्तता और पुनः प्रकट होने की कथा कही गई है। एक शुभ तिथि-योग में प्यास से व्याकुल गाय घास का गुच्छा उखाड़ देती है, तभी वहाँ से जलधारा फूट पड़ती है और देखते-देखते बड़ा कुंड बन जाता है, जिसमें अनेक गायें जल पीती हैं। रोगग्रस्त ग्वाला उस जल में उतरकर स्नान करता है और तुरंत रोगमुक्त होकर तेजस्वी देह वाला हो जाता है; यह चमत्कार प्रसिद्ध होकर स्थान “गोमुख” नाम से विख्यात हो जाता है। ऋषियों के पूछने पर सूत अम्बरीष राजा का प्रसंग सुनाते हैं। उनके पुत्र को कुष्ठ था, जो पूर्वजन्म में ब्राह्मण-वध (ब्रह्महत्या) के कर्मफल से माना गया—अतिथि को घुसपैठिया समझकर ब्राह्मण का वध हो गया था। विष्णु प्रसन्न होकर सूक्ष्म छिद्र से पातालस्थ जाह्नवी (गंगा) का जल प्रकट करते हैं और स्नान का उपदेश देते हैं; पुत्र स्वस्थ हो जाता है और वह छिद्र फिर छिपा दिया जाता है। बाद में वही जल गोमुख-घटना से पृथ्वी पर पुनः प्रकट बताया गया है। भक्ति सहित स्नान को पाप-नाशक और कुछ रोगों का निवारक कहा गया है। हाटकेश्वर क्षेत्र में श्राद्ध करने से पितृ-ऋण उतरता है; विशेषतः रविवार की प्रभात-स्नान को विशिष्ट उपचार-फलदायक बताया गया है, तथा अन्य दिनों में भी श्रद्धा से किया स्नान फलदायी माना गया है।

लोहयष्टिमाहात्म्य (The Glory of Paraśurāma’s Iron Staff)
इस अध्याय में सूत ऋषियों के प्रश्न का उत्तर देते हुए पवित्र क्षेत्र में स्थित अत्यन्त तेजस्वी लोहयष्टि (लोहे की छड़ी) का माहात्म्य बताते हैं। वे कहते हैं कि पितृतर्पण आदि कर्म करके समुद्र-स्नान हेतु जाते हुए परशुराम (राम भार्गव) को वहाँ के मुनि और ब्राह्मण कुट्हार (परशु) त्यागने की सलाह देते हैं—हाथ में शस्त्र रहने तक क्रोध की संभावना बनी रहती है, और व्रत-समाप्त पुरुष के लिए यह उचित नहीं। परशुराम कहते हैं कि यदि मैं परशु छोड़ दूँ तो कोई दूसरा उसे उठा कर दुरुपयोग कर सकता है; तब उसे दण्ड का भागी बनना पड़ेगा, और मैं अपराध सह नहीं पाऊँगा। तब ब्राह्मणों के आग्रह पर वे परशु को तोड़कर उससे लोहे की यष्टि बनाते हैं और संरक्षण हेतु उन्हें सौंप देते हैं। ब्राह्मण उसकी रक्षा और पूजा का व्रत लेते हैं तथा फलश्रुति बताते हैं—राज्य से वंचित राजा पुनः राज्य पाते हैं, विद्यार्थी/ब्राह्मण उच्च ज्ञान और सर्वज्ञता तक प्राप्त करते हैं, निःसंतान को संतान मिलती है; विशेषकर आश्विन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को उपवास सहित पूजा करने से महान पुण्य होता है। परशुराम के प्रस्थान के बाद वे एक देवालय बनाकर नियमित पूजा स्थापित करते हैं और इच्छाएँ शीघ्र पूर्ण होती हैं। अंत में कहा गया है कि परशु का मूल निर्माण विश्वकर्मा ने अविनाशी लोहे से, रुद्र के अग्नितेज से संयुक्त करके किया था।

अजापालेश्वरीमाहात्म्यवर्णनम् (Ajāpāleśvarī Māhātmya: The Glory of the Goddess Installed by King Ajāpāla)
अध्याय 95 में सूत जी अजापालेश्वरी-पूजा की उत्पत्ति और उसके प्रभाव का धर्मपूर्ण तीर्थ-प्रसंग सुनाते हैं। राजा अजापाल प्रजा पर अत्यधिक कर-भार से होने वाली सामाजिक पीड़ा से व्याकुल हैं, पर प्रजा-रक्षा हेतु राजकोष की आवश्यकता भी समझते हैं। वे कर-वसूली के स्थान पर तपस्या द्वारा “काँटारहित” (अपराध-रहित) राज्य स्थापित करने का संकल्प लेते हैं और वसिष्ठ से पूछते हैं कि कौन-सा तीर्थ शीघ्र फल देता है, जहाँ महादेव और देवगण प्रसन्न होते हैं। वसिष्ठ उन्हें हाटकेश्वर-क्षेत्र बताते हैं, जहाँ चण्डिका तुरंत संतुष्ट होती हैं। राजा ब्रह्मचर्य, शौच, संयमित आहार और दिन में तीन बार स्नान आदि नियमों से देवी की आराधना करते हैं। देवी उन्हें ज्ञानयुक्त अस्त्र-शस्त्र और मंत्र प्रदान करती हैं, जिनसे अपराध दबते हैं, पर-स्त्रीगमन जैसे घोर अधर्म रुकते हैं और रोगों पर नियंत्रण होता है; फलतः भय घटता है, पाप कम होता है और जन-कल्याण बढ़ता है। पाप और रोग घटने से यम का कार्य मानो निष्क्रिय-सा हो जाता है और देवताओं में विचार-विमर्श होता है। तब शिव व्याघ्र-रूप धारण कर राजा की परीक्षा लेते हैं; राजा रक्षा हेतु तत्पर होता है, फिर शिव अपना स्वरूप प्रकट कर राजा के अद्वितीय धर्म-शासन की प्रशंसा करते हैं। शिव आज्ञा देते हैं कि राजा रानी सहित पाताल में हाटकेश्वर के पास जाए और नियत समय पर देवी-कुण्ड के जल में प्राप्त अस्त्र-मंत्रों का समर्पण करे। अंत में कहा गया है कि अजापाल वहीं जरा-मरण से रहित होकर हाटकेश्वर की पूजा करते रहते हैं और देवी की प्रतिष्ठा स्थायी तीर्थ-आधार बनती है; शुक्ल चतुर्दशी को पूजा तथा कुण्ड-स्नान को विशेष रक्षा और रोग-निवारणकारी बताया गया है।

अध्याय ९६ — दशरथ-शनैश्चरसंवादः, रोहिणीभेद-निवारणम्, राजवापी-माहात्म्यम् (Chapter 96: Daśaratha–Śanaiścara Dialogue; Prevention of Rohiṇī-Disruption; Glory of Rājavāpī)
इस अध्याय में सूत ऋषियों को राजवंश, तीर्थ-प्रतिष्ठा और लोक-कल्याण से जुड़ी कथा सुनाते हैं। अजपाल के रसातल गमन के बाद उसका पुत्र राजा बनता है और देव-सान्निध्य तथा जगत्-स्थैर्य के लिए प्रशंसित होता है; उसे शनैश्चर पर ‘विजय’ प्राप्त करने वाला भी कहा गया है। उसी सत्क्षेत्र में विष्णु/नारायण के प्रसन्न होने से एक भव्य निर्माण और ‘राजवापी’ नामक प्रसिद्ध वापी/कूप की स्थापना बताई गई है। राजवापी पर पंचमी तिथि, विशेषकर प्रेतपक्ष में, श्राद्ध करने से बड़ा पुण्य और सामाजिक-आध्यात्मिक प्रतिष्ठा मिलती है। फिर ऋषि पूछते हैं कि रोहिणी के शकट-भेद को रोकने हेतु शनैश्चर को कैसे रोका गया। ज्योतिषियों के अनुसार रोहिणी-पथ भंग होने पर बारह वर्ष का भयंकर अकाल-दुर्भिक्ष, समाज-व्यवस्था का पतन और वैदिक यज्ञ-परंपरा का अवरोध होता। तब सूर्यवंशी दशरथ (अज के पुत्र) मंत्र-शक्ति से युक्त दिव्य बाण लेकर शनैश्चर का सामना करते हैं और धर्म व जनहित के आधार पर उसे रोहिणी मार्ग छोड़ने की आज्ञा देते हैं। शनैश्चर विस्मित होकर अपनी दृष्टि के उग्र प्रभाव का रहस्य बताता है और वर देता है; दशरथ वर मांगते हैं कि शनैश्चरवार को तेलाभ्यंग करने वाले, यथाशक्ति तिल व लोहे का दान करने वाले, तथा उसी दिन तिल-होम, समिधा और तंडुल से शांति-कर्म करने वाले पीड़ा से सुरक्षित रहें। अंत में फलश्रुति है कि इस अध्याय का नित्य पाठ/श्रवण शनैश्चरजन्य कष्टों का शमन करता है।

दशरथकृततपःसमुद्योगवर्णनम् (Daśaratha’s Resolve for Austerities to Obtain Progeny)
सूत कहते हैं कि राजा दशरथ के एक अद्भुत कर्म से प्रसन्न होकर इन्द्र (शक्र) स्वयं आए, उनकी अनुपम सिद्धि की प्रशंसा की और वर माँगने को कहा। दशरथ ने धन या विजय नहीं, बल्कि सभी धर्मों में स्थिर रहने वाली इन्द्र से चिरस्थायी मित्रता और सख्य-बंधन माँगा। इन्द्र ने यह वर दिया और उन्हें देवसभा में नित्य उपस्थित रहने का आग्रह किया। दशरथ संध्याकर्म के बाद प्रतिदिन देवसभा में जाते, वहाँ दिव्य संगीत-नृत्य का आनंद लेते और देवरषियों से धर्मोपदेश तथा पवित्र कथाएँ सुनते। एक नियम यह था कि दशरथ के लौटते समय उनके आसन पर जल छिड़का जाता (अभ्युक्त्षण)। नारद ने इसके कारण का संकेत दिया तो दशरथ को शंका हुई कि कहीं यह किसी छिपे पाप का चिह्न तो नहीं। उन्होंने ब्राह्मणों को कष्ट, अन्याय, प्रजा में अव्यवस्था, भ्रष्टाचार, शरणागतों की उपेक्षा और यज्ञ-क्रियाओं में त्रुटि जैसे संभावित दोष गिनाए। इन्द्र ने कहा—तुम्हारे शरीर, राज्य, वंश, गृह या सेवकों में कोई वर्तमान दोष नहीं; परंतु पुत्रहीनता ही पितृऋण के रूप में आने वाला दोष है, जो उच्च गति में बाधा बनता है। इसलिए यह जल-छिड़काव पितरों से संबंधित निवारक विधि है। इन्द्र ने पुत्र-प्राप्ति के लिए प्रयत्न कर पितृऋण से मुक्त होने की प्रेरणा दी। तब दशरथ अयोध्या लौटे, मंत्रियों को राज्य-भार सौंपा और पुत्रार्थ तपस्या का संकल्प लिया। उन्हें यह भी परामर्श मिला कि कार्त्तिकेयपुर जाएँ, जहाँ उनके पिता ने पूर्व में तप करके अभीष्ट सिद्धि पाई थी।

राजस्वामिराजवापीमाहात्म्यवर्णनम् (The Māhātmya of the Royal Well ‘Rājavāpī’ and its Merit-Discourse)
सूता बताते हैं कि मंत्रियों द्वारा तिरस्कृत होकर राजा दशरथ हाटकेश्वर-क्षेत्र में आए और भक्तिपूर्वक परिक्रमा की। उन्होंने पिता द्वारा स्थापित देवी की पूजा की, पुण्य जल में स्नान किया, प्रमुख देवालयों के दर्शन किए, अनेक तीर्थों में स्नान कर दान दिए। फिर उन्होंने चक्रधारी विष्णु के लिए मंदिर बनवाया, वैष्णव प्रतिमा की स्थापना की और साधुओं द्वारा प्रशंसित निर्मल जल वाली एक सुंदर वापी/सीढ़ीदार कुआँ बनवाया। उसी जल-स्थल से संबद्ध कठोर तप करते हुए दशरथ ने सौ वर्षों तक तपस्या की। तब गरुड़ पर आरूढ़, देवगणों से घिरे जनार्दन प्रकट हुए और वर माँगने को कहा। दशरथ ने वंश-वृद्धि हेतु पुत्रों की याचना की; विष्णु ने वचन दिया कि वे चार रूपों में उनके घर जन्म लेंगे और उन्हें धर्मपूर्वक राज्य करने का उपदेश देकर लौटने को कहा। वह वापी ‘राजवापी’ नाम से प्रसिद्ध हुई। कहा गया कि पंचमी तिथि को स्नान-पूजन करके और एक वर्ष तक श्राद्ध करने से निःसंतान को भी पुत्र-प्राप्ति होती है। अंत में इसी वरदान से दशरथ के चार पुत्र—राम, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न—उत्पन्न हुए; एक कन्या लोमपाद को दी गई, तथा राम-स्मृति से जुड़े रामेश्वर, लक्ष्मणेश्वर और सीता-प्रतिष्ठा आदि का भी उल्लेख आता है।

Rāma–Lakṣmaṇa Saṃvāda, Devadūta-Sandeśa, and Durvāsā-Āgamanam (Chapter 99)
इस अध्याय में ऋषि सूत से एक प्रतीत होने वाले विरोध का समाधान पूछते हैं—पहले कहा गया कि राम, सीता और लक्ष्मण साथ आए और साथ ही वन को गए, फिर यह भी कहा गया कि “वहीं” राम ने रामेश्वर आदि की प्रतिष्ठा कराई। सूत भिन्न-भिन्न दिनों/अवसरों का भेद बताकर बात स्पष्ट करते हैं और कहते हैं कि उस क्षेत्र की पवित्रता नित्य है, उसका क्षय नहीं होता। इसके बाद कथा अयोध्या के राजप्रसंग में आती है। लोक-निन्दा से प्रभावित होकर राम संयमयुक्त शासन करते हैं; ब्रह्मचर्य का भी स्पष्ट उल्लेख है। तभी इन्द्र का संदेश लेकर एक देवदूत गुप्त रूप से आता है और कहता है कि रावण-वध का कार्य पूर्ण होने पर राम को दिव्यलोक लौटना है। इसी बीच व्रत के कारण भूखे दुर्वासा मुनि आ पहुँचते हैं। लक्ष्मण के सामने धर्मसंकट होता है—राजा की गोपनीय आज्ञा निभाएँ या मुनि के क्रोध से वंश पर शाप का भय टालें। वे राम को सूचना देकर मुनि को भीतर लाते हैं। राम देवदूत को बाद में उत्तर देने का वचन देकर विदा करते हैं, दुर्वासा को अर्घ्य-पाद्य से सत्कार करते हैं और विविध अन्न-भोज्य से तृप्त करते हैं—इस प्रकार राजधर्म, देवाज्ञा और तपस्वी के अधिकार का संतुलन आतिथ्य-धर्म से दिखाया गया है।

Lakṣmaṇa-tyāga at Sarayū and the Ethics of Royal Truthfulness (लक्ष्मणत्यागः सरयूतटे)
इस अध्याय में सूत धर्म-संकट का वर्णन करते हैं। दुर्वासा ऋषि के चले जाने पर लक्ष्मण तलवार लेकर श्रीराम के पास आते हैं और कहते हैं कि राम की पूर्व-प्रतिज्ञा तथा राजधर्म की सत्यनिष्ठा बनी रहे, इसलिए उन्हें दण्ड देकर वध कर दिया जाए। श्रीराम अपने स्वकृत व्रत को स्मरण कर भीतर से व्याकुल होते हैं और मंत्रियों तथा धर्मवेत्ता ब्राह्मणों से परामर्श करते हैं; निर्णय होता है कि प्रत्यक्ष वध नहीं, बल्कि त्याग/निर्वासन ही दण्ड है—साधुओं के लिए त्याग को मृत्यु के समान मानकर राम लक्ष्मण को तत्काल राज्य छोड़ने और फिर कभी न मिलने की आज्ञा देते हैं। लक्ष्मण बिना परिवार से बोले सरयू-तट पर जाते हैं, शुद्धि करते हैं, योगासन में स्थित होकर ‘ब्रह्मद्वार’ से अपने तेज/प्राण का योगिक त्याग करते हैं; उनका शरीर तट पर निश्चेष्ट गिर पड़ता है। श्रीराम अत्यन्त विलाप करते हैं और वन में लक्ष्मण की सेवाओं व रक्षा को स्मरण करते हैं। मंत्री अन्त्येष्टि की बात करते हैं, तभी आकाशवाणी कहती है कि ब्रह्मज्ञान-निष्ठ संन्यासी के लिए अग्निहोत्र/दाह उचित नहीं; लक्ष्मण योग-निर्गमन से ब्रह्मधाम को प्राप्त हुए हैं। राम लक्ष्मण के बिना अयोध्या लौटने से इनकार करते हैं, कुश को राज्य-भार देने का विचार करते हैं और विभीषण तथा वानरों सहित सहयोगी राजाओं से परामर्श कर भविष्य के अव्यवस्था-निवारण की योजना बनाते हैं; इस प्रकार सरयू-तीर्थ, राजसत्य-व्रत और संन्यासी-धर्म की मर्यादा एक साथ प्रकट होती है।

सेतुमध्ये श्रीरामकृतरामेश्वरप्रतिष्ठावर्णनम् (Rāma’s Installation of the Rāmeśvara Triad in the Midst of the Setu)
सूत जी कहते हैं—रात्रि बिताकर प्रभात में श्रीराम पुष्पक-विमान से सुग्रीव, सुषेण, तारा, कुमुद, अंगद आदि प्रमुख वानरों के साथ शीघ्र लंका पहुँचे और पूर्व युद्ध-स्थलों को फिर से देखकर स्मरण किया। राम के आगमन को जानकर विभीषण मंत्रियों और सेवकों सहित आगे बढ़े, साष्टांग प्रणाम किया और लंका में आदरपूर्वक उनका स्वागत किया। विभीषण के महल में विराजमान राम को विभीषण ने राज्य और गृह-व्यवस्था का पूर्ण समर्पण कर आज्ञा माँगी। लक्ष्मण-वियोग के शोक से व्याकुल और दिव्य-लोक प्रस्थान के अभिप्राय से श्रीराम ने राजधर्म की नीति बताई—राज्य-लक्ष्मी मद उत्पन्न करती है, इसलिए अहंकार से रहित रहो; इन्द्र आदि देवताओं का सम्मान करो; और ऐसी सीमा-व्यवस्था करो कि राक्षस राम-सेतु लाँघकर मनुष्यों को कष्ट न दें, क्योंकि मनुष्य राम की शरण में हैं। विभीषण ने कलियुग में दर्शनार्थ आने वाले यात्रियों तथा स्वर्ण-लोभ के कारण होने वाले उपद्रव की आशंका कही। तब राक्षसों के अतिक्रमण और दोष-निवारण हेतु श्रीराम ने सेतु के मध्य-प्रदेश की प्रसिद्ध रचना को बाणों से काटकर मार्ग को अगम्य कर दिया; एक चिह्नित शिखर और लिंग-धारी उन्नति समुद्र में गिर पड़ी। दस रात्रियाँ वहाँ रहकर युद्ध-कथाएँ सुनाकर श्रीराम नगर की ओर चले; सेतु के अंत में महादेव की स्थापना की और श्रद्धापूर्वक सेतु के आरम्भ, मध्य और अंत में ‘रामेश्वर-त्रय’ की प्रतिष्ठा कर दी—जिससे तीर्थयात्रा और पूजन की मर्यादा स्थिर हो गई।

Hāṭakeśvara-kṣetra-prabhāvaḥ (The Glory of Hāṭakeśvara and the Foundations of Rāmeśvara–Lakṣmaṇeśvara)
सूत जी कहते हैं—राम पुष्पक-विमान से अपने निवास की ओर जा रहे थे कि सहसा विमान स्थिर हो गया। कारण पूछने पर राम ने वायुसुत हनुमान को जाँच के लिए भेजा। हनुमान ने बताया कि नीचे परम पावन हाटकेश्वर-क्षेत्र है, जहाँ ब्रह्मा की सन्निधि मानी जाती है और आदित्य, वसु, रुद्र, अश्विन तथा अन्य सिद्धगण निवास करते हैं; इसी दिव्य-घनत्व के कारण पुष्पक उससे आगे नहीं बढ़ता। राम वानरों और राक्षसों सहित उतरकर तीर्थों व देवायतनों का दर्शन करते हैं, स्नान करते हैं और कामना-पूर्ति करने वाले कुण्ड का उल्लेख आता है। वे शुद्धि करके पितृतर्पण करते हैं और क्षेत्र के अद्भुत पुण्य पर विचार करते हैं। पूर्व-परंपरा (केशव से जुड़ी) के अनुसार लिंग-प्रतिष्ठा का संकल्प लेते हैं, स्वर्गगामी लक्ष्मण की स्मृति में लक्ष्मणेश्वर का भाव रखते हैं, तथा सीता सहित शुभ, प्रत्यक्ष रूप की अभिलाषा करते हैं। राम भक्तिपूर्वक पाँच प्रसाद/देवालय स्थापित करते हैं और अन्य लोग भी अपने-अपने लिंग स्थापित करते हैं। अंत में फलश्रुति है—प्रातःकाल नियमित दर्शन से रामायण-श्रवण का फल मिलता है, और अष्टमी व चतुर्दशी को रामचरित का पाठ करने से अश्वमेध-यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है।

Ānarttīya-taḍāga Māhātmya and Kārttika Dīpadāna (आनर्त्तीयतडाग-माहात्म्यं तथा कार्तिकदीपदानम्)
इस अध्याय में ऋषि सूत से पूछते हैं कि इस क्षेत्र में वानरों और राक्षसों द्वारा स्थापित शिवलिंगों का क्या माहात्म्य है और उनसे कौन-सा फल मिलता है। सूत दिशा-क्रम से वर्णन करते हैं—बालमण्डनक में स्नान करके सुग्रीव मुख-लिंग की स्थापना करते हैं, अन्य वानर-समूह भी मुख-लिंग स्थापित करते हैं; पश्चिम में राक्षस चतुर्मुख लिंग रखते हैं; पूर्व में श्रीराम पाँच-प्रासादों वाला पाप-नाशक पुण्य-धाम स्थापित करते हैं। दक्षिण में आनर्त्तीय-तड़ाग के पास विष्णु-कूपिका है; वहाँ दक्षिणायन में किया गया श्राद्ध अश्वमेध-तुल्य पुण्य देता है और पितरों का उत्थान करता है। कार्त्तिक में दीपदान नरकों में पतन रोकता है और जन्म-जन्मांतर की अंधता आदि क्लेशों का नाश करता है। ऋषियों के आग्रह पर सूत आनर्त्तीय-तड़ाग की अपार महिमा बताते हुए राम-अगस्त्य संवाद का प्रसंग लाते हैं। अगस्त्य अपने रात्रि-दर्शन का वर्णन करते हैं—आनर्त्त देश का पूर्व राजा श्वेत दिव्य विमान में होकर भी दीपोत्सव की रातों में तड़ाग से अपना सड़ा हुआ शरीर बार-बार खाता है और फिर कुछ समय के लिए दृष्टि पा लेता है; यह कर्मफल का जीवंत संकेत है। राजा स्वीकार करता है कि उसने दान नहीं किया, विशेषतः अन्नदान से विमुख रहा; रत्नों का लोभपूर्वक हरण किया और प्रजा-रक्षा में प्रमाद किया। ब्रह्मा बताते हैं कि इन्हीं दोषों से उसे उच्च लोकों में भी भूख और अंधत्व भोगना पड़ता है। अगस्त्य उपाय बताते हैं—रत्नजटित कंठाभरण को ‘अन्न-निष्क्रय’ रूप में अर्पित करना, दामोदर को कार्त्तिक में रत्न-दीप अर्पित करना, यम/धर्मराज की पूजा, तिल और उड़द का दान तथा ब्राह्मण-तर्पण। इससे राजा की भूख मिटती है, दृष्टि शुद्ध होती है और तीर्थ-प्रभाव से वह ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है। अंत में कहा गया है कि जो कार्त्तिक में इस तड़ाग में स्नान कर दीपदान करते हैं, वे पापमुक्त होकर ब्रह्मलोक में सम्मानित होते हैं; यह स्थान आनर्त्तीय-तड़ाग तथा विष्णु-कूपिका के नाम से प्रसिद्ध है।

Rākṣasa-liṅga-pratiṣṭhā, Kuśa–Vibhīṣaṇa-saṃvāda, and the Tri-kāla Worship of Rāmeśvara
अध्याय 104 तीर्थ-वर्णन के भीतर शासन और यात्रा का एक प्रसंग प्रस्तुत करता है। ऋषि सूत से पूछते हैं कि राक्षसों द्वारा भक्ति से स्थापित लिंगों का महत्त्व और उनका प्रभाव क्या है। सूत बताते हैं कि लंका के शक्तिशाली राक्षस हाटकेश्वरराज क्षेत्र के पश्चिम भाग में बार-बार आकर यात्रियों और निवासियों को खा जाते हैं और आतंक फैलाते हैं। शरणार्थी अयोध्या में राजा कुश को बताते हैं कि राक्षस-मंत्रों से स्थापित चार-मुखी लिंग हिंसक आक्रमणों को आकर्षित करते हैं; यहाँ तक कि उनका अनजाने में पूजन भी तत्काल विनाश का कारण माना जाता है। ब्राह्मण कुश को प्रमाद के लिए धिक्कारते हैं; कुश दोष स्वीकार कर विभीषण को कठोर संदेश भेजते हैं। दूत सेतु-प्रदेश पहुँचता है और जानता है कि पुल टूटने से आगे जाना रुक गया है। वहीं लोग विभीषण की कठोर भक्ति-चर्या बताते हैं—वह दिन में तीन बार रामेश्वर के रूपों की पूजा करता है: प्रातः द्वार-देवालय में, मध्याह्न में जल के बीच सेतु के खंड पर, और रात्रि में। विभीषण आता है, शिव की गूढ़ स्तुति करता है—शिव को सर्वदेवमय और सर्वभूतों में अंतर्व्याप्त बताता है, जैसे काष्ठ में अग्नि और दही में घी। वह पुष्प, आभूषण, वाद्य-गान सहित विस्तृत पूजा कर कुश के आरोप सुनता है, अनजाने में हुई हानि स्वीकार करता है, दोषी राक्षसों से पूछताछ कर उन्हें शाप देता है कि वे भूख और दीनता में गिरें, और आगे संयम का वचन देता है। इसके बाद दूत उन खतरनाक लिंगों को उखाड़ने का आग्रह करता है, पर विभीषण राम के सामने किए व्रत और धर्म-नियम का स्मरण कराता है कि लिंग—अच्छी या बुरी अवस्था में भी—स्थानांतरित नहीं किया जाना चाहिए। कुश व्यावहारिक समाधान देता है: लिंगों को ‘हटाए’ बिना उनके स्थानों को मिट्टी से भरकर/ढँक दिया जाए, जिससे हानि शांत हो और निषेध भी न टूटे। कुश शापित प्राणियों के लिए श्राद्ध-भंग, दान-दोष और अनुचित भक्षण से जुड़े नैतिक परिणाम भी बताता है, और विभीषण से कठोर वचन के लिए क्षमा माँगकर विश्वास पुनः स्थापित करता है। अंत में दान, मेल-मिलाप और नियत पूजा से क्षेत्र की पवित्र व्यवस्था फिर स्थिर हो जाती है।

राक्षसलिङ्गच्छेदनम् (Rākṣasa-liṅga-cchedanam) — “The Episode of the Severed/Damaged Rākṣasa Liṅgas”
सूत जी कहते हैं—तुला राशि में सूर्य के स्थित होने के समय एक प्राचीन पवित्र भूमि, जहाँ लिंग-प्राकट्य हुए थे, धूल और जमाव से भरकर ढँक गई। लिंगों के छिप जाने से उस क्षेत्र में एक प्रकार का ‘क्षेम’ (सुरक्षा) फिर से स्थापित हुआ, मानो दृश्य चिह्न लुप्त होने से अन्य लोकों तक भी शांति फैल गई। बाद के युग-चक्र में शाल्व-देश से राजा बृहदश्व वहाँ आए। विस्तृत भूमि को प्रासाद-रहित देखकर उन्होंने निर्माण का निश्चय किया और अनेक कारीगर बुलाकर गहरी खुदाई व सफाई का आदेश दिया। खुदाई में असंख्य चतुर्मुख लिंग प्रकट हुए; भूमि की उस तीव्र शक्ति को देखकर राजा और उपस्थित कारीगर उसी क्षण मृत्यु को प्राप्त हो गए। तभी से हाटकेश्वर-क्षेत्र के उस तीर्थ में कोई मनुष्य न वहाँ महल बनाता है, न तालाब या कुआँ खोदता है—भय और श्रद्धा से; यही स्थानीय निषेध इस पावन कथा की स्मृति बन गया।

Luptatīrthamāhātmya-kathana (Theological Account of Lost Tīrthas)
ऋषि पूछते हैं कि धूल से भरी पृथ्वी और प्रेतों के उपद्रव के कारण कौन-कौन से तीर्थ और लिंग ‘लुप्त’ (छिपे/अदृश्य) हो गए। सूत बताते हैं कि असंख्य पवित्र स्थल ढँक गए, फिर प्रमुख उदाहरण देते हैं—चक्रतीर्थ, जहाँ विष्णु ने अपना चक्र स्थापित किया, और मातृतीर्थ, जहाँ स्कन्द/कार्त्तिकेय ने दिव्य मातृशक्तियों की प्रतिष्ठा की। साथ ही अनेक राजवंशों और ऋषि-परम्पराओं के आश्रम तथा लिंग भी कालक्रम में गुप्त हो जाने का उल्लेख आता है। फिर भूमि-प्रबन्ध का संकट उठता है—प्रेत धूल-वृष्टि करके धरती भरना चाहते हैं, पर मातृदेवियों की रक्षाशक्ति से सम्बद्ध प्रचण्ड वायु धूल उड़ा देती है। प्रेत राजा कुश के पास जाते हैं; राजा रुद्र की आराधना करता है। रुद्र बताते हैं कि यह क्षेत्र मातृगण द्वारा संरक्षित है; कुछ लिंग राक्षस-मन्त्रों से स्थापित हैं, जिनका स्पर्श या दर्शन भी अनिष्टकारी हो सकता है, इसलिए वे निषिद्ध-प्रदेश हैं। शास्त्रीय मर्यादा के कारण प्रतिमाओं को उखाड़ना उचित नहीं, और लिंग स्वभावतः स्थिर माने गए हैं। तपस्वियों और ब्राह्मणों की रक्षा हेतु रुद्र मातृदेवियों को वर्तमान स्थान छोड़ने की आज्ञा देते हैं। माताएँ कहती हैं कि वे स्कन्द द्वारा प्रतिष्ठित हैं, अतः इसी क्षेत्र में समान पवित्र निवास चाहती हैं। रुद्र उन्हें अष्टाषष्टि (68) रुद्र-क्षेत्रों में अलग-अलग आवास देकर उच्च पूजन का वर देते हैं। माताओं के हटते ही प्रेत निरन्तर धूल से भूमि भर देते हैं और रुद्र अन्तर्धान हो जाते हैं। यह नागरखण्ड के हाटकेश्वर-क्षेत्र-माहात्म्य में अध्याय 106 का सार है।

हाटकेश्वरक्षेत्रमाहात्म्ये ब्राह्मणचित्रशर्मलिङ्गस्थापनवृत्तान्तवर्णनम् (Hāṭakeśvara-kṣetra Māhātmya: Account of Brāhmaṇa Citraśarman’s Liṅga Installation)
अध्याय का आरम्भ ऋषियों के प्रश्न से होता है—शिव से सम्बद्ध प्रसिद्ध ‘अष्टाषष्टि’ (अड़सठ) पवित्र क्षेत्र एक ही स्थान पर कैसे स्थित हुए? सूत जी वत्स-वंशीय ब्राह्मण चित्रशर्मा का पूर्ववृत्त बताते हैं, जो चमत्कारपुर में रहता था। वह भक्ति से प्रेरित होकर पाताल में प्रतिष्ठित माने गए हाटकेश्वर-लिङ्ग को प्रकट कराने/लाने हेतु दीर्घ तप करता है। शिव प्रसन्न होकर प्रकट होते हैं, वर देते हैं और लिङ्ग-स्थापना का आदेश देते हैं; चित्रशर्मा भव्य प्रासाद बनाकर शास्त्रोक्त विधि से नित्य पूजन करता है, जिससे लिङ्ग की कीर्ति फैलती है और तीर्थयात्री आने लगते हैं। चित्रशर्मा की बढ़ती प्रतिष्ठा देखकर अन्य ब्राह्मणों में प्रतिस्पर्धा जागती है। वे भी कठोर तप करते-करते निराश होकर अग्नि-प्रवेश (आत्मदाह) तक का निश्चय कर लेते हैं। तब शिव उन्हें रोककर वर माँगने को कहते हैं; वे चाहते हैं कि सभी क्षेत्र/लिङ्गों का समूह वहीं प्रकट हो जाए, ताकि उनका असंतोष मिटे। चित्रशर्मा विरोध करता है, पर शिव मध्यस्थ बनकर बताते हैं कि कलियुग में तीर्थों पर संकट आएगा, इसलिए ये क्षेत्र यहाँ शरण लेंगे; दोनों पक्षों को सम्मान मिलेगा। चित्रशर्मा को श्राद्ध-तर्पण आदि में वंश-नाम की स्थायी प्रतिष्ठा मिलती है, और अन्य ब्राह्मण गोत्र-गोत्र के अनुसार प्रासाद बनाकर लिङ्ग स्थापित करते हैं; इस प्रकार अड़सठ दिव्य धाम बनते हैं। अंत में शिव संतोष प्रकट करते हैं और इस स्थान को क्षेत्रों का स्थिर आश्रय तथा ‘अक्षय’ श्राद्ध-फल देने वाला बताते हैं।

अष्टषष्टितीर्थवर्णनम् (Enumeration and Definition of the Sixty-Eight Tīrthas)
अध्याय 108 में ऋषि जिज्ञासा और उपयोगी सूची के लिए सूत से निवेदन करते हैं कि पहले बताए गए ‘अड़सठ’ क्षेत्र-तीर्थों के नाम फिर से क्रम से कहें। सूत कैलास पर शिव–पार्वती के संवाद का आधार लेकर बताता है कि कलियुग में अधर्म के बढ़ने से तीर्थ मानो पाताल में लीन हो जाते हैं; तब प्रश्न उठता है कि पवित्रता का अर्थ और उसका आश्रय कैसे समझा जाए। शिव ‘तीर्थ’ की व्यापक परिभाषा देते हैं—माता-पिता, सत्संग, धर्म-चिंतन, यम-नियम, तथा पुण्य-कथाओं का श्रवण-स्मरण भी तीर्थ हैं। दर्शन, स्मरण या स्नान मात्र से भी बड़े पापों का शोधन होता है—यह सिद्धान्त कहा गया है; पर स्नान भक्ति और एकाग्र मन से, महेश्वर-पूजा की भावना से करना चाहिए। अंत में प्रमुख तीर्थों/क्षेत्रों की सर्वदेशीय नामावली दी जाती है, जो आगे के विस्तृत वर्णन की भूमिका बनती है।

Tīrthas and the Kīrtana of Śiva’s Localized Names (तीर्थेषु शिवनामकीर्तनम्)
यह अध्याय शैव संवाद के रूप में है। ईश्वर कहते हैं कि उन्होंने ‘तीर्थसमुच्चय’ का सार प्रकट किया है और देवताओं व भक्तों के कल्याण हेतु वे सभी तीर्थों में सदा विद्यमान हैं। जो मनुष्य तीर्थ में स्नान करके देव-दर्शन करे और उस तीर्थ से संबद्ध शिव-नाम का कीर्तन करे, उसे मोक्षाभिमुख फल प्राप्त होता है। श्री देवी प्रत्येक तीर्थ पर किस नाम का जप करना चाहिए—इसकी पूर्ण सूची माँगती हैं। तब ईश्वर अनेक पवित्र स्थलों को शिव के विशेष नामों/रूपों से जोड़कर बताते हैं—जैसे वाराणसी में ‘महादेव’, प्रयाग में ‘महेश्वर’, उज्जयिनी में ‘महाकाल’, केदार में ‘ईशान’, नेपाल में ‘पशुपालक’, श्रीशैल में ‘त्रिपुरान्तक’ आदि। अंत में फलश्रुति है कि इस सूची का श्रवण-कीर्तन पापों का नाश करता है। बुद्धिमान साधक इसे प्रातः, मध्याह्न और सायं—तीनों समय जपें, विशेषतः शिव-दीक्षित। घर में इसे लिखकर रखने मात्र से भी भूत-प्रेतजन्य उपद्रव, रोग, सर्प-भय, चोर-भय तथा अन्य बाधाएँ शांत होती हैं।

अष्टषष्टितीर्थमाहात्म्यवर्णनम् (Glorification of the Sixty-Eight Tīrthas; the Supreme Eightfold Tīrtha Cluster)
इस अध्याय में देवी मनुष्यों के लिए, चाहे दीर्घायु हों, दूर-दूर के तीर्थों की यात्रा की कठिनता पूछती हैं और तीर्थों का ‘सार’ जानना चाहती हैं। ईश्वर उत्तर देते हैं कि एक ‘अनुत्तम’ तीर्थाष्टक है—नैमिष, केदार, पुष्कर, कृमिजङ्गल, वाराणसी, कुरुक्षेत्र, प्रभास और हाटकेश्वर—जिनमें श्रद्धा से स्नान करने पर समस्त तीर्थों का फल प्राप्त होता है। देवी कलियुग में उपयुक्तता पूछती हैं। तब ईश्वर हाटकेश्वर-क्षेत्र को इन आठों में सर्वोपरि बताते हैं और कहते हैं कि कलियुग में भी वहीं सभी क्षेत्र और अन्य तीर्थ दिव्य विधान से उपस्थित माने जाते हैं। अंत में सूत फलश्रुति कहते हैं कि इस माहात्म्य का श्रवण या पाठ भी स्नानजन्य पुण्य के समान फल देता है, जिससे ग्रंथ-श्रवण/पाठ स्वयं एक पवित्र साधना बन जाता है।

दमयन्त्युपाख्याने—दमयन्त्या विप्रशापेन शिलात्वप्राप्तिः (Damayantī Episode—Petrification by a Brāhmaṇa’s Curse)
इस अध्याय में ऋषि सूत से शिव-क्षेत्रों से जुड़े ब्राह्मणों के गोत्रों, उनकी संख्या और विवरण पूछते हैं। सूत पूर्व उपदेश का स्मरण कराते हुए आनर्त-देश के राजा की कथा कहते हैं—राजा कुष्ठ से पीड़ित था, पर शंख-तीर्थ में स्नान करते ही तीर्थ-प्रभाव और शिव-कृपा से तत्काल रोगमुक्त हो गया। राजा कृतज्ञता में तपस्वियों को दान देना चाहता है, किंतु वे अपरिग्रह-व्रत के कारण भौतिक उपहार स्वीकार नहीं करते। तब यह नीति-वाक्य उभरता है कि कृतघ्नता अत्यन्त भारी दोष है, जिसका प्रायश्चित्त सहज नहीं। राजा के मन में उपकार-प्रतिदान की चिंता बनी रहती है। कार्त्तिक में ऋषियों के पुष्कर-यात्रा पर जाने पर वह दमयन्ती से कहता है कि ऋषि-पत्नियों को आभूषण देकर सेवा कर दे, जिससे तपस्वियों के नियम न टूटें। कुछ तपस्विनियाँ प्रतिस्पर्धा से आभूषण ले लेती हैं, पर चार स्त्रियाँ अस्वीकार करती हैं। ऋषि लौटकर आश्रम को आभूषणों से ‘विकृत’ देखकर क्रोधित होते हैं और शाप देते हैं; दमयन्ती तत्काल शिला बन जाती है। राजा शोक में डूबकर क्षमा और समाधान का उपाय खोजता है। अध्याय का संदेश है—भक्ति-भाव से दिया गया दान भी यदि आसक्ति, स्पर्धा या व्रत-भंग का कारण बने, तो वह धर्म-सीमा लाँघकर अधर्म बन जाता है।

Ūṣarotpatti-māhātmya (The Māhātmya of the Origin of the Barren Tract) — Damayanty-upākhyāna Continuation
इस अध्याय में सूतजी के कथन के माध्यम से धर्म और आचरण का सुसंगठित उपदेश आता है। अड़सठ थके हुए ब्राह्मण तपस्वी पैदल लौटते हैं और घर पहुँचकर देखते हैं कि उनकी पत्नियाँ दिव्य वस्त्रों और आभूषणों से सजी हैं। भूख और आशंका से वे पूछते हैं कि तपस्या-धर्म के विरुद्ध यह सज्जा कैसे हुई; तब स्त्रियाँ बताती हैं कि रानी दमयन्ती राज-दान देने वाली की भाँति आईं और ये वस्त्राभूषण दे गईं। तपस्वी ‘राज-प्रतिग्रह’ को विशेष दोष मानकर क्रोध में हाथों में जल लेकर राजा और राज्य को शाप देने को उद्यत होते हैं। तब पत्नियाँ प्रतिवचन करती हैं कि गृहस्थाश्रम भी ‘उत्तम’ मार्ग है, जो लोक-परलोक दोनों का साधन है; वे अपने दीर्घकालीन दारिद्र्य का स्मरण कराकर राजा से भूमि और आजीविका की व्यवस्था माँगती हैं, अन्यथा आत्महानि की चेतावनी देती हैं, जिससे ऋषियों पर भारी पाप लगेगा। यह सुनकर ऋषि शाप-जल को भूमि पर छोड़ देते हैं; वह जल धरती के एक भाग को जला देता है और वहाँ स्थायी लवणयुक्त ऊसर प्रदेश बन जाता है, जहाँ खेती नहीं होती और जन्म भी नहीं होता कहा गया है। अंत में फलश्रुति है कि फाल्गुन मास की उस पूर्णिमा को जो रविवार को पड़े, वहाँ किया गया श्राद्ध अपने कर्मों से घोर नरकों में पड़े पितरों का भी उद्धार करता है।

अग्निकुण्डमाहात्म्यवर्णनम् (Agni-kuṇḍa Māhātmya: Account of the Glory of the Fire-Pond) — त्रिजातकविशुद्धये (for the purification/verification regarding Trijāta)
इस अध्याय में सूत जी बहु-दृश्यात्मक धर्मकथा कहते हैं। पहले एक राजा गृहस्थ-जीवन में स्थित ब्राह्मणों के पास आदर से जाता है और उनकी प्रार्थना पर दुर्गयुक्त बस्ती बसाकर घर, दान-भोग और संरक्षण की व्यवस्था करता है, जिससे समाज में स्थिरता और मर्यादा स्थापित होती है। फिर कथा आनर्त के राजा प्रभञ्जन के पूर्व प्रसंग पर आती है। राजकुमार के जन्म के समय ज्योतिषी अशुभ ग्रहयोग बताते हैं और सोलह ब्राह्मणों द्वारा बार-बार शान्ति-यज्ञ कराने का विधान करते हैं। यज्ञ होने पर भी रोग, पशुहानि और राज्य पर संकट बढ़ता जाता है। तब अग्नि देव पुरुषरूप में प्रकट होकर बताते हैं कि यज्ञ में ‘त्रिजात’ (विवादित/अन्य-जन्म) ब्राह्मण के सम्मिलित होने से कर्म दूषित हो गया है। सीधा दोषारोपण न हो, इसलिए अग्नि अपने स्वेद-जल से एक कुण्ड बनाकर सोलहों को उसमें स्नान कराते हैं; जो अशुद्ध होता है, उसके शरीर पर विस्फोटक जैसे चिह्न उभर आते हैं। इसके बाद नियम बनता है कि यह अग्निकुण्ड ब्राह्मणों की शुद्धि-परीक्षा का स्थायी तीर्थ होगा; अयोग्य स्नान करने वाले चिन्हित होंगे और स्नान से प्राप्त दृश्य-शुद्धि द्वारा सामाजिक-याज्ञिक वैधता सिद्ध होगी। अंत में राजा शुद्धि के साथ तुरंत स्वस्थ हो जाता है और फलश्रुति में कार्त्तिक-स्नान आदि से पापक्षय व निर्दिष्ट दोषों से मुक्ति का प्रतिपादन किया जाता है।

नगरसंज्ञोत्पत्तिवर्णनम् / Origin Narrative of the Name “Nagara” (Hāṭakeśvara-kṣetra Māhātmya)
सूत जी बताते हैं कि मातृ-दोष के कारण समाज में अपमानित ब्राह्मण तपस्वी त्रिजात ने अपने मान की पुनःस्थापना हेतु जल-स्रोत के निकट कठोर तप और शिव-पूजा की। भगवान शंकर प्रकट हुए और वर दिया कि आगे चलकर वह चामत्कारपुर के ब्राह्मणों में प्रतिष्ठित होगा। फिर कथा चामत्कारपुर में आती है। देवरात का पुत्र क्रथ गर्व और आवेग में श्रावण कृष्ण-पंचमी को नाग-तीर्थ के पास रुद्रमाला नामक नाग-शिशु को मार देता है। नाग-शिशु के माता-पिता और समस्त नाग-समुदाय एकत्र होते हैं; शेषनाग के नेतृत्व में वे प्रतिशोध लेते हुए क्रथ को निगल जाते हैं और नगर को उजाड़ देते हैं। क्षेत्र जन-शून्य होकर नागों का निवास बन जाता है और मनुष्यों के प्रवेश पर रोक लग जाती है। भयभीत ब्राह्मण त्रिजात की शरण में जाते हैं। त्रिजात शिव से नाग-विनाश की प्रार्थना करता है, पर शिव निर्दोष नाग-शिशु की हत्या और श्रावण-पंचमी के दिन नाग-पूजा के विधान का स्मरण कराते हुए अंध-दंड से मना करते हैं। वे त्रिजात को सिद्ध मंत्र देते हैं—“न गरं न गरं” (त्र्यक्षर), जिसके जप से विष शांत होता है और नाग दूर भागते हैं; जो न हटें वे निर्बल होकर वश में आ जाते हैं। त्रिजात बचे हुए ब्राह्मणों के साथ लौटकर मंत्र का उच्चारण करता है; नाग पलायन करते हैं और नगर पुनः बसता है। तभी से वह स्थान “नगरा” नाम से प्रसिद्ध हुआ। फलश्रुति है कि इस आख्यान का पाठ करने वालों को सर्प-जन्य भय नहीं सताता।

त्रिजातेश्वरस्थापनं गोत्रसंख्यानकं च (Establishment of Trijāteśvara and the Enumeration of Gotras)
इस अध्याय में ऋषि सूत से त्रिजात के विषय में पूछते हैं—उसका नाम, उत्पत्ति, गोत्र और ‘त्रिजात’ कहे जाने पर भी वह आदर्श क्यों है। सूत बताते हैं कि वह साङ्कृत्य ऋषि की वंश-परंपरा में उत्पन्न हुआ; उसका प्रसिद्ध नाम प्रभव है, उसे ‘दत्त’ भी कहा जाता है, और उसका संबंध निमि की वंश-रेखा से बताया गया है। त्रिजात ने उस क्षेत्र को उन्नत कर शिव का शुभ मंदिर ‘त्रिजातेश्वर’ नाम से स्थापित किया और निरंतर उपासना से देह सहित स्वर्ग को प्राप्त हुआ। फिर एक विधि कही जाती है—जो भक्तिभाव से देव का दर्शन करें और विषुव के समय देव का स्नान कराएँ, उनके कुल में ‘त्रिजात’ जन्म की पुनरावृत्ति नहीं होती और वे संरक्षण पाते हैं। इसके बाद संवाद समुदाय-परंपरा की पुनर्स्थापना की ओर मुड़ता है। ऋषि उन गोत्रों के नाम पूछते हैं जो नष्ट हो गए थे और फिर स्थापित हुए; सूत कौशिक, काश्यप, भारद्वाज, कौण्डिन्य, गर्ग, हारित, गौतम आदि अनेक गोत्र-समूहों का गणनापूर्वक वर्णन करते हैं, तथा नागज के भय से हुई अव्यवस्था और इसी स्थान पर पुनः एकत्रीकरण का उल्लेख करते हैं। फलश्रुति में कहा गया है कि इस गोत्र-वृत्तांत और ऋषि-स्मरण का पाठ/श्रवण वंशच्छेद रोकता है, जीवन-क्रम में उत्पन्न पापों का शमन करता है और प्रिय-वियोग से रक्षा करता है।

अम्बरेवती-माहात्म्य (Ambarevatī Māhātmya): स्थापना, शाप-वर, नवमी-पूजा-फल
इस अध्याय में ऋषि सूत से प्रसिद्ध देवी अम्बरेवती की उत्पत्ति, स्वरूप और पूजा-फल पूछते हैं। सूत नागों के नगर-विनाश हेतु आदेश और उससे उत्पन्न रेवती (शेष की प्रिया) के शोक का वर्णन करते हैं। पुत्र-वध के प्रतिशोध में रेवती एक ब्राह्मण-गृह को निगल लेती है; तब उस ब्राह्मण की तपस्विनी बहन भाट्टिका शाप देती है कि रेवती को निंदित मानव-जन्म, पति और वंश-जन्य दुःख भोगना होगा। रेवती का तपस्विनी को हानि पहुँचाने का प्रयास विफल होता है; उसके विषैले दाँत भी नहीं चुभते—तप-बल प्रकट हो जाता है। अन्य नाग भी असफल होकर भय से लौट जाते हैं। मानव-गर्भ और नाग-रूप के नाश की आशंका से व्याकुल रेवती उसी क्षेत्र में रहकर अम्बिका की गंध-पुष्प, नैवेद्य, गीत-वाद्य और भक्ति से आराधना करती है। देवी वर देती हैं—रेवती का मानव-जन्म दिव्य प्रयोजन हेतु होगा, वह फिर राम-रूप शेष की पत्नी बनेगी, उसके दाँत लौट आएँगे, और उसके नाम से की गई पूजा कल्याणकारी होगी। रेवती उस स्थान में अपने नाम से स्थायी निवास माँगती है और नाग-संबद्ध पूजा का व्रत करती है, विशेषतः आश्विन शुक्ल पक्ष की महानवमी को। अंत में फलश्रुति है कि विधिपूर्वक, शुद्ध श्रद्धा से अम्बरेवती-पूजन करने पर एक वर्ष तक कुल-जन्य विपत्ति नहीं आती और ग्रह, भूत, पिशाच आदि बाधाएँ शांत हो जाती हैं।

भट्टिकोपाख्यानम् (Bhaṭṭikā’s Legend) and the Origin of a Tīrtha at Kedāra
इस अध्याय में प्रश्नोत्तर रूप से धर्म-तत्त्व का विवेचन है। ऋषि सूत से पूछते हैं कि भट्टिका के शरीर से विषधर सर्पों के दाँत क्यों झड़ गए—क्या इसका कारण तप है या मंत्र। सूत बताते हैं कि भट्टिका अल्पायु में विधवा होकर केदार में निरंतर भक्ति करती रही; वह प्रतिदिन देवता के सम्मुख मधुर गीत गाती और तपस्या में स्थिर रहती। उसके गीत की भक्तिमय शक्ति से तक्षक और वासुकि ब्राह्मण-वेश में वहाँ आए; बाद में तक्षक भयानक नाग-रूप धारण कर उसे पाताल ले गया। भट्टिका ने नीति और आत्मबल से किसी दबाव को स्वीकार नहीं किया और शर्त सहित शाप उच्चारित किया, जिससे तक्षक को मेल-मिलाप का मार्ग लेना पड़ा। ईर्ष्या से प्रेरित नाग-पत्नियों के कारण संघर्ष हुआ; रक्षा-विद्या का प्रयोग किया गया और एक नागिन के दंश से उसके दाँत झड़ गए—यही आरंभिक प्रश्न का कारण बना। भट्टिका ने आक्रामक नागिन को शाप देकर मनुष्य बना दिया और भविष्य-विधान किया कि तक्षक सौराष्ट्र में राजा के रूप में जन्म लेगा तथा भट्टिका आगे चलकर ‘क्षेमंकारी’ नाम से मनुष्य-रूप में उससे पुनर्मिलन करेगी। केदार लौटने पर समाज ने उसकी शुद्धि पर संदेह किया। भट्टिका स्वेच्छा से अग्नि-परीक्षा में प्रविष्ट हुई; अग्नि जल में बदल गई, पुष्प-वृष्टि हुई और दिव्य दूत ने उसे निष्कलंक घोषित किया। अंत में उसके नाम पर एक तीर्थ की स्थापना होती है; विष्णु के शयन/बोधन व्रतों के अवसर पर वहाँ स्नान करने वालों को उच्च आध्यात्मिक फल का आश्वासन दिया जाता है। भट्टिका आगे भी तप-पूजा करती रही—उसने त्रिविक्रम की प्रतिमा और बाद में महेश्वर-लिंग तथा मंदिर की स्थापना की।

Kṣemaṅkarī–Raivateśvara Utpatti and Hāṭakeśvara-kṣetra Māhātmya (क्षेमंकरी-रैवतेश्वर-उत्पत्तितीर्थमाहात्म्यवर्णन)
ऋषियों ने सूतजी से पूछा कि सौराष्ट्र/आनर्त से जुड़ी इस राजकथा की उत्पत्ति क्या है और हिमालय-प्रसंग में केदार-तुल्य पवित्रता कैसे प्रकट हुई। सूतजी ने क्षेमंकारी के जन्म और नामकरण का वर्णन किया—कलह और निर्वासन के समय राज्य में ‘क्षेम’ अर्थात कल्याण का उदय हुआ, इसलिए उसका नाम क्षेमंकारी पड़ा। फिर राजा रैवत और क्षेमंकारी के दाम्पत्य का प्रसंग आता है—समृद्धि तो थी, पर संतान न होने से वंश और जीवन को लेकर चिंता बढ़ी। दोनों ने मंत्रियों को राज्य सौंपकर तप किया, कात्यायनी (महिषासुरमर्दिनी) की स्थापना-पूजा की; देवी ने वर देकर क्षेमजित नामक पुत्र प्रदान किया, जो वंशवर्धक और शत्रुनाशक बताया गया। उत्तराधिकारी को राज्य में प्रतिष्ठित कर रैवत हाटकेश्वर-क्षेत्र गए, आसक्ति त्यागकर शिवलिंग की स्थापना की और मंदिर-समूह बनाया। वह लिंग ‘रैवतेश्वर’ कहलाया, जिसका केवल दर्शन ‘सर्वपातकनाशन’ कहा गया। क्षेमंकारी ने वहीं पूर्वस्थापित दुर्गा के लिए भी मंदिर बनवाया; देवी क्षेमंकारी नाम से प्रसिद्ध हुई। चैत्र शुक्ल अष्टमी को देवी-दर्शन से इच्छित सिद्धि मिलती है—यह व्रत बताया गया; अध्याय तीर्थ-माहात्म्य और भक्ति-नीति के उपदेश के साथ पूर्ण होता है।

Mahīṣa-śāpa, Hāṭakeśvara-kṣetra-tapas, and the Tīrtha-Phala Discourse (महिषशाप-हाटकेश्वरक्षेत्रतपः-तीर्थफलप्रसङ्गः)
अध्याय का आरम्भ ऋषियों के प्रश्न से होता है—देवी कात्यायनी ने महिषासुर का वध क्यों किया, और वह असुर भैंसे के रूप में कैसे आया। सूत बताते हैं कि ‘चित्रसम’ नाम का एक रूपवान् और पराक्रमी दैत्य भैंसों पर सवारी करने का आसक्त हो गया और अन्य वाहनों को छोड़ बैठा। जह्नवी (गंगा) के तट पर घूमते हुए उसकी भैंस ने ध्यानस्थ मुनि को रौंद दिया, जिससे मुनि की समाधि भंग हुई। क्रोधित मुनि ने उसे शाप दिया कि वह जीवन-पर्यन्त महिष (भैंसा) ही बना रहे। उपाय पूछने पर वह शुक्राचार्य के पास गया। शुक्र ने उसे हाटकेश्वर-क्षेत्र में महेश्वर की एकनिष्ठ भक्ति और तप करने को कहा—यह क्षेत्र विपरीत युगों में भी सिद्धि देने वाला बताया गया है। दीर्घ तपस्या के बाद शिव प्रकट हुए; शाप हट नहीं सकता, पर शिव ने ‘सुखोपाय’ दिया कि अनेक भोग और प्राणी उसके शरीर में आकर मिलेंगे। अभेद्यता का वर शिव ने अस्वीकार किया; अंत में दैत्य ने यह वर माँगा कि उसका वध केवल स्त्री के हाथ से हो। शिव ने तीर्थ-स्नान और दर्शन का फल भी कहा—श्रद्धा से स्नान-दर्शन करने पर सर्वकार्य-सिद्धि, विघ्न-नाश, तेज की वृद्धि होती है और ज्वर-व्याधियाँ शांत होती हैं। फिर दैत्य दानवों को संगठित कर देवताओं पर चढ़ आया। दीर्घ दिव्य युद्ध के बाद इन्द्र की सेना दुर्बल होकर हट गई और अमरावती कुछ समय के लिए सूनी हो गई। दैत्य वहाँ प्रवेश कर उत्सव मनाते हैं और यज्ञ-भागों पर अधिकार कर लेते हैं। आगे महान लिंग की प्रतिष्ठा और कैलास-सदृश देवालय-रचना का उल्लेख आता है, जिससे इस अध्याय में तीर्थ-केन्द्रित पावनता और भी दृढ़ होती है।

कात्यायनी-प्रादुर्भावः (Manifestation of Kātyāyanī and the Devas’ Armament Bestowal)
सूत जी कहते हैं—शक्र (इन्द्र) के नेतृत्व में देवगण युद्ध में पराजित हो गए और असुर महिष ने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया। उसने जो-जो श्रेष्ठ समझा—वाहन, धन, रत्न और प्रिय वस्तुएँ—सब छीन लीं, जिससे जगत में अधर्म और अव्यवस्था बढ़ गई। देवता उसके वध का उपाय सोचने को एकत्र हुए; तभी नारद आए और महिष के अत्याचार, प्रजा-पीड़न तथा परधन-हरण का विस्तार से वर्णन किया, जिससे देवों का रोष और प्रज्वलित हो उठा। उनके क्रोध से ऐसी दाहक ज्योति निकली कि दिशाएँ मानो अँधकार से ढँक गईं। उसी समय कार्त्तिकेय (स्कन्द) आए, कारण पूछा; नारद ने असुरों के उन्मत्त अहंकार और लूट-खसोट की बात कही। देवों और स्कन्द के संयुक्त क्रोध-तेज के परिपाक से शुभलक्षणा एक दिव्य कन्या प्रकट हुई; कारणवश उसका नाम ‘कात्यायनी’ प्रसिद्ध हुआ। देवताओं ने उसे वज्र, शक्ति, धनुष, त्रिशूल, पाश, बाण, कवच, खड्ग आदि समस्त आयुध और रक्षक उपकरण प्रदान किए। उसने बारह भुजाएँ धारण कर सब शस्त्र सँभाले और देवों को आश्वासन दिया कि वह उनका कार्य सिद्ध करेगी। देवों ने बताया कि महिष किसी प्राणी से, विशेषतः पुरुषों से, अजेय है; केवल एक स्त्री के हाथों उसका वध संभव है, इसलिए उसी हेतु उसका प्रादुर्भाव हुआ। फिर उन्होंने उसे विन्ध्य पर्वत पर घोर तप करने को भेजा ताकि उसका तेज बढ़े; तत्पश्चात उसे अग्रणी बनाकर महिष का संहार कर देव-राज्य की पुनर्स्थापना की आशा की।

महिषासुरपराजय–कात्यायनीमाहात्म्यवर्णनम् (Defeat of Mahīṣa and the Māhātmya of Kātyāyanī/Vindhyavāsinī)
इस अध्याय में सूत विन्ध्य-प्रदेश की एक दिव्य कथा कहते हैं। देवी इन्द्रियों को संयमित कर महेश्वर का ध्यान करते हुए कठोर तप करती हैं; तप बढ़ने से उनका तेज और सौन्दर्य और भी प्रखर हो जाता है। यह अद्भुत तपस्विनी कन्या देखकर महिषासुर के गुप्तचर समाचार देते हैं। काम से मोहित महिषासुर सेना सहित आता है, राज्य देने और विवाह का प्रस्ताव रखकर समझाने का प्रयास करता है, पर देवी अपने दिव्य उद्देश्य—उसके अत्याचार का अंत—स्पष्ट कर देती हैं। फिर युद्ध होता है। देवी बाणों से असुर-सेना को तितर-बितर करती हैं, महिष को घायल करती हैं और अपने भयानक हास से सहायक योद्धा-गण प्रकट करती हैं, जो दैत्यबल का संहार कर देते हैं। महिषासुर स्वयं आक्रमण करता है; देवी युद्ध में उस पर चढ़कर सिंह की सहायता से उसे जकड़ देती हैं। देवता तत्काल वध की प्रार्थना करते हैं और देवी तलवार से उसकी मोटी गर्दन काटकर देवताओं को संतुष्ट करती हैं। इसके बाद एक करुण प्रसंग आता है—महिष देवी की स्तुति कर शाप-मुक्ति का दावा करते हुए दया माँगता है। देवता लोक-हानि का भय बताते हैं। देवी उसे फिर से मारने के स्थान पर सदा के लिए वश में रखने का संकल्प करती हैं। देवता देवी की ‘विन्ध्यवासिनी/कात्यायनी’ के रूप में भावी कीर्ति और विशेषतः आश्विन शुक्ल पक्ष में पूजन-विधान बताते हैं, जिससे रक्षा, आरोग्य और सफलता मिलती है। अंत में जगत में व्यवस्था पुनः स्थापित होती है और आगे राजाओं की भक्ति तथा दर्शन-उत्सव के फल का संकेत दिया जाता है।

केदार-प्रादुर्भावः (Kedāra Manifestation and the Kuṇḍa Rite)
अध्याय 122 सूत–ऋषि संवाद के रूप में है, जिसमें पूर्व की दैत्य-वध कथाओं से हटकर केदार-केन्द्रित पाप-नाशिनी कथा आती है। ऋषि पूछते हैं कि हिमालय में गंगाद्वार के निकट प्रसिद्ध केदार कैसे प्रतिष्ठित हुआ। सूत बताते हैं कि शिव का ऋतु-नियम है—वे दीर्घकाल हिमालय में निवास करते हैं, पर हिमपात के महीनों में स्थान दुर्गम हो जाता है, इसलिए अन्यत्र भी उनके निवास और पूजा की व्यवस्था की गई। कथा में इन्द्र, दैत्य हिरण्याक्ष और उसके सहयोगियों से पदच्युत होकर गंगाद्वार में तप करता है। शिव महिष (भैंसे) के रूप में प्रकट होकर इन्द्र की प्रार्थना स्वीकारते हैं और उन प्रमुख दैत्यों का संहार करते हैं; उनके अस्त्र-शस्त्र शिव को हानि नहीं पहुँचा पाते। इन्द्र के आग्रह पर शिव लोक-रक्षा हेतु उसी रूप में ठहरते हैं और स्फटिक-सा निर्मल एक कुण्ड स्थापित करते हैं। शुद्ध भक्त कुण्ड के दर्शन कर निर्दिष्ट हाथ/दिशा-विन्यास के साथ तीन बार जल पीता है और मातृ-पितृ-वंश तथा आत्म-सम्बन्धी मुद्राओं द्वारा देह-क्रिया को दिव्य विधि से जोड़ता है। इन्द्र निरन्तर पूजा की स्थापना करता है, देव का नाम ‘केदार’ रखता है (विदारक/छेदक अर्थ से) और भव्य मंदिर बनवाता है। फिर चार महीनों में जब हिमालय का मार्ग बंद रहता है, सूर्य के वृश्चिक से कुम्भ तक रहने पर शिव आनर्त देश के हाटकेश्वर-क्षेत्र में निवास करते हैं—वहाँ रूप-प्रतिष्ठा, मंदिर-निर्माण और नियमित पूजा का विधान है। फलश्रुति में कहा है कि चार मास की उपासना शिव-पथ की ओर ले जाती है; ऋतु के बाहर भी भक्ति पाप हरती है; विद्वान गीत-नृत्य से स्तुति करते हैं। नारद-उद्धृत वचन में केदार-जलपान और गया में पिण्डदान को ब्रह्मज्ञान तथा पुनर्जन्म-मुक्ति से जोड़ा गया है; सुनना, पढ़ना या पढ़वाना भी पाप-राशि नष्ट कर कुल का उद्धार करता है।

शुक्लतीर्थमाहात्म्य — The Glory of Śuklatīrtha (Purificatory Water-Site)
इस अध्याय में सूतजी श्वेत दर्भ-चिह्नों से पहचाने जाने वाले ‘अनुपम’ शुक्लतीर्थ का माहात्म्य कहते हैं। चामत्कारपुर के पास एक रजक, जो प्रमुख ब्राह्मणों के वस्त्र धोता था, भूल से बहुमूल्य ब्राह्मण-वस्त्र नीलिकुण्डी (नीली) के रंग-ताल में डाल देता है। दण्ड (बंधन/मृत्यु) के भय से वह रात में भागने की तैयारी करता है; तब उसकी बेटी अपनी दाश-कन्या सखी से जाकर अपराध बताती है, और वह उसे पास के कठिन-प्रवेश वाले जलाशय का उपाय बताती है। रजक वहाँ वस्त्र धोकर देखता है कि वे तुरंत स्फटिक-से श्वेत हो जाते हैं, और स्नान करते ही उसके काले बाल भी सफेद हो जाते हैं। वह वस्त्र ब्राह्मणों को लौटा देता है; ब्राह्मण स्वयं जाँचकर तीर्थ-प्रभाव जानते हैं कि काली वस्तुएँ और केश भी श्वेत हो जाते हैं, और श्रद्धा से स्नान करने पर वृद्ध-युवा सभी को बल व मंगल प्राप्त होता है। आगे कहा गया है कि मनुष्यों के दुरुपयोग के भय से देवता तीर्थ को धूल से ढँकना चाहते हैं, पर वहाँ जो भी उगता है वह जल-शक्ति से श्वेत ही हो जाता है। इस तीर्थ की मिट्टी का लेप और स्नान समस्त तीर्थ-स्नान का फल देता है; दर्भ और वन-तिल से तर्पण करने पर पितर तृप्त होते हैं और यह महान यज्ञ/श्राद्ध के तुल्य फलदायक कहा गया है। अंत में सिद्धांत बताया गया कि विष्णु ने श्वेतद्वीप को यहाँ स्थापित किया, ताकि कलि के प्रभाव में भी इसकी श्वेतता नष्ट न हो।

मुखारतीर्थोत्पत्तिवर्णनम् (Origin Narrative of Mukharā Tīrtha)
इस अध्याय में सूत मुखरा-तीर्थ की उत्पत्ति का वर्णन धर्मोपदेश के साथ करते हैं। मुखरा को ‘श्रेष्ठ तीर्थ’ कहा गया है, जहाँ तीर्थयात्रा पर आए सप्तर्षि (मारीचि आदि) एक डाकू से मिलते हैं। वह लोहमजंघ नामक माण्डव्य-वंशी ब्राह्मण था—माता-पिता और पत्नी का भक्त, परन्तु दीर्घकालीन सूखे से उत्पन्न अकाल में जीवन-रक्षा हेतु चोरी की ओर प्रवृत्त हो गया। ग्रंथ भूख-भय को दुष्टता से अलग बताता है, फिर भी चोरी को निंदनीय कर्म मानता है। सप्तर्षियों को देखकर लोहमजंघ उन्हें धमकाता है; ऋषि करुणापूर्वक उसे कर्मफल की जिम्मेदारी समझाते हैं और कहते हैं कि वह अपने घरवालों से पूछे—क्या वे उसके पाप का भाग स्वीकार करेंगे? वह पिता, माता और पत्नी से पूछता है; वे बताते हैं कि कर्मफल प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं ही भोगना पड़ता है। इससे उसे गहरा पश्चात्ताप होता है और वह उपदेश माँगता है। पुलह ऋषि उसे ‘जाटघोटेति’ मंत्र देते हैं; वह निरंतर जप करता हुआ समाधि में लीन हो जाता है और उसका शरीर वल्मीकों (चींटी के टीले) से ढक जाता है। बाद में ऋषि लौटकर उसकी सिद्धि पहचानते हैं; वल्मीक-संबंध से उसका नाम ‘वाल्मीकि’ पड़ता है और वही स्थान मुखरा-तीर्थ के रूप में प्रतिष्ठित होता है। अंत में फलश्रुति है—श्रावण मास में श्रद्धा से वहाँ स्नान करने पर चोरी से उत्पन्न पाप धुलते हैं; वहाँ स्थित सिद्ध-पुरुष की भक्ति से काव्य-शक्ति बढ़ती है, विशेषतः अष्टमी तिथि को।

सत्यसन्धनृपतिवृत्तान्तवर्णनम् — The Account of King Satyasaṃdha (and the Karṇotpalā/Gartā Tīrtha Frame)
सूता करṇोत्पalā-तीर्थ का माहात्म्य बताता है—यह प्रसिद्ध पावन स्थल है, जहाँ स्नान से मनुष्य-जीवन में ‘वियोग’ का भय शान्त होता है। फिर कथा इक्ष्वाकु-वंश के राजा सत्यसन्ध और उनकी अद्भुत गुणों वाली पुत्री करṇोत्पalā की ओर मुड़ती है। योग्य मानव वर न मिलने पर राजा ब्रह्मा से परामर्श हेतु ब्रह्मलोक जाते हैं; वहाँ ब्रह्मा की सन्ध्या-काल-सेवा के बाद उन्हें सिद्धान्तपूर्ण उत्तर मिलता है कि अत्यन्त दीर्घ काल बीत जाने से अब कन्या का विवाह नहीं करना चाहिए, और देवता मनुष्य-स्त्री को पत्नी नहीं बनाते। वापसी पर राजा और कन्या को काल-विस्थापन का अनुभव होता है—वे वृद्ध हो जाते हैं और समाज उन्हें पहचान नहीं पाता; इससे पुराणों की काल-नीति और सांसारिक प्रतिष्ठा की नश्वरता प्रकट होती है। वे गर्ता-तीर्थ/प्राप्तिपुर के निकट पहुँचते हैं, जहाँ लोक-परम्परा से तथा आगे चलकर राजा बृहद्बल द्वारा उनका वंश पहचाना जाता है। तब सत्यसन्ध ब्राह्मणों को ऊँचा बसाव/भूमि दान कर स्थायी धर्म-कीर्ति बढ़ाने का संकल्प करते हैं और हाटकेश्वर-क्षेत्र में वृषभनाथ से सम्बद्ध पूर्व-स्थापित लिङ्ग की पूजा कर तप करते हैं; करṇोत्पalā भी तपस्या कर गौरी-भक्ति स्थापित करती है। अध्याय के अंत में दान-ग्राम से आजीविका की चिंता और राजा की वैराग्य-सी मर्यादा का उल्लेख होकर दान, संरक्षण और तप-धर्म की नीति स्पष्ट होती है।

मर्यादास्थापनम्, गर्तातीर्थद्विज-नियुक्तिः, तथा कार्तिक-लिङ्गयात्रा (Establishment of Communal Boundaries, Appointment of Gartātīrtha Brahmins, and the Kārttika Liṅga Procession)
सूता बताते हैं कि चमत्कारपुर से जुड़े ब्राह्मण एक ऐसे राजा के पास आते हैं जिसने युद्धबल त्याग दिया है और संदेह व विवादों के बीच पराजय की स्थिति में है। वे कहते हैं कि अहंकार और झूठे पद-प्रतिष्ठा के दावों से सामाजिक व्यवस्था बिगड़ गई है; इसलिए उनकी परंपरागत आजीविका-दान (वृत्ति) की रक्षा और स्थिर मर्यादाओं की पुनर्स्थापना आवश्यक है। राजा विचार करके गर्तातीर्थ से उत्पन्न, विद्वान और वंशपरंपरा से जुड़े ब्राह्मणों को नियुक्त करता है कि वे अनुशासित प्रशासक व निर्णायक बनकर मर्यादा बनाएँ, शंकाएँ दूर करें, विवाद निपटाएँ और राजकार्य में निर्णय दें; समुदाय की उन्नति हेतु उन्हें ईर्ष्या रहित पोषण भी दिया जाए। इससे नगर में धर्मवर्धक सीमाएँ/मर्यादाएँ स्थापित होती हैं और समृद्धि बढ़ती है। फिर राजा तपस्या द्वारा स्वर्गारोहण की घोषणा करता है और अपने वंश से संबद्ध एक लिंग प्रकट कर उसकी पूजा, विशेषतः रथयात्रा, कराने का अनुरोध करता है। ब्राह्मण इसे स्वीकार कर बताते हैं कि यह पहले पूजित 27 लिंगों के बाद 28वाँ लिंग है, और कार्तिक मास में प्रतिवर्ष नैवेद्य, बलि, वाद्य तथा पूजन-सामग्री सहित विधिवत् उत्सव-पूजा करनी चाहिए। फलश्रुति में कहा गया है कि जो श्रद्धा से कार्तिक भर स्नान/अभिषेक करके पूजा करें, या एक वर्ष तक सोमव्रत के दिन विधिपूर्वक पूजन करें, वे मोक्ष को प्राप्त होते हैं।

कर्णोत्पलातीर्थमाहात्म्यवर्णनम् (Glorification of Karnotpalā Tīrtha)
ऋषियों ने पहले उल्लिखित कर्णोत्पला का पूरा वृत्तांत पूछा। सूत जी कहते हैं—गौरी के चरणों से जुड़े स्थान पर तप करती हुई उस स्त्री की भक्ति से प्रसन्न होकर देवी गिरिजा प्रकट हुईं और वर माँगने को कहा। कर्णोत्पला ने अपनी पीड़ा बताई—उसके पिता राजवैभव से गिरकर शोक में, वैराग्य-भाव से रहने लगे हैं; और वह स्वयं वृद्धा होकर भी अविवाहित है। इसलिए उसने अत्यन्त सुन्दर पति और पुनः यौवन का वर माँगा, ताकि पिता को भी सुख लौट आए। देवी ने विधि बताई—माघ मास की तृतीया, शनिवार को, वासुदेव-संबद्ध नक्षत्र में, पवित्र जल में स्नान करते हुए सौन्दर्य और यौवन का ध्यान करना। उस दिन जो भी स्त्री स्नान करती है, उसे भी वैसा ही सौन्दर्य प्राप्त होता है। नियत समय आने पर कर्णोत्पला मध्यरात्रि में जल में उतरी और दिव्य देह व यौवन पाकर बाहर निकली; सब लोग विस्मित रह गए। गौरी की प्रेरणा से कामदेव (मनोभव) उसे पत्नी रूप में माँगने आए और बताया कि आगे उसका नाम “प्रीति” होगा, क्योंकि वे प्रेम सहित आए हैं। कर्णोत्पला ने कहा कि पहले वे उसके पिता से विधिवत् याचना करें। वह स्वयं पिता के पास जाकर तप और गौरी-कृपा से प्राप्त यौवन बताती है और विवाह की अनुमति माँगती है। फिर कामदेव ने प्रार्थना की; पिता ने अग्नि को साक्षी मानकर ब्राह्मणों की उपस्थिति में कन्यादान किया। वह “प्रीति” नाम से प्रसिद्ध हुई और तीर्थ भी उसी नाम से विख्यात हुआ। फलश्रुति में कहा है—माघ भर स्नान करने से प्रयाग का फल मिलता है; मनुष्य रूपवान्, समर्थ होता है और बंधुओं से वियोग का दुःख नहीं पाता।

Aṭeśvarotpatti-māhātmya (Origin and Glory of Aṭeśvara) | अटेश्वरोत्पत्तिमाहात्म्य
इस अध्याय में दो जुड़े हुए प्रसंग आते हैं। पहले, सत्यसंध लिंग के दक्षिण भाग के पास योगासन करके प्राणों का संहार करते हैं। ब्राह्मण अंत्येष्टि की तैयारी करते हैं, पर शरीर अचानक अदृश्य हो जाता है; इससे सब विस्मित होकर लिंग की पूजा-विधि और नियमों को और दृढ़ करते हैं। यह तीर्थ निरंतर वर देने वाला और भक्तों के पाप-मल को हरने वाला बताया गया है। फिर वंश-क्षय के कारण राज्य-शून्यता से “मत्स्य-न्याय” जैसी अव्यवस्था का भय मंत्री और ब्राह्मण प्रकट करते हैं। सत्यसंध पुनः राजधर्म में लौटने से इनकार करते हैं और पूर्व-प्रसिद्ध उपाय बताते हैं—परशुराम द्वारा क्षत्रियों के विनाश के बाद क्षत्रिय-पत्नियों ने संतान हेतु ब्राह्मणों का आश्रय लिया और ‘क्षेत्रज’ राजा उत्पन्न हुए। इसी क्रम में वसिष्ठ-कुंड नामक पुत्र-प्रद तीर्थ का वर्णन है, जहाँ नियत समय पर स्नान से गर्भ-धारण फलित होता है। अंत में प्रसिद्ध राजा अट (अटोन) का जन्म होता है; राजपथ पर गमन के समय दिव्य आकाशवाणी से उसके नाम की व्युत्पत्ति बताई जाती है। अट अटेश्वर-लिंग की स्थापना करता है; माघ-चतुर्दशी को पूजन और पुत्र-प्रद कुंड में स्नान को संतान और कल्याण का सिद्ध साधन कहा गया है।

याज्ञवल्क्यसमुद्रव-आश्रममाहात्म्य (The Māhātmya of Yājñavalkya’s Sacred Water-Site and Āśrama)
सूता याज्ञवल्क्य से संबद्ध एक प्रसिद्ध आश्रम और पवित्र जल-तीर्थ का वर्णन करते हैं, जो अल्पज्ञ या अशिक्षित को भी सिद्धि देने वाला कहा गया है। ऋषि पूछते हैं कि याज्ञवल्क्य के पूर्व गुरु कौन थे और किस प्रसंग में वेदों का हरण होकर पुनः प्राप्ति हुई। सूत शाकल्य नामक विद्वान ब्राह्मण आचार्य और राजपुरोहित का परिचय देकर राजसभा की घटना सुनाते हैं, जहाँ याज्ञवल्क्य को राजा के शान्तिकर्म हेतु भेजा गया। राजा उन्हें अनुचित अवस्था में देखकर आशीर्वाद लेने से इंकार करता है और पवित्र जल को लकड़ी के स्तम्भ पर फेंकने की आज्ञा देता है। याज्ञवल्क्य वैदिक मंत्र से जल का प्रक्षेप करते हैं और तत्काल स्तम्भ में पत्ते, फूल और फल प्रकट हो जाते हैं—मंत्र-शक्ति का प्रमाण और राजा की विधि-अज्ञानता का उद्घाटन। राजा अभिषेक चाहता है, पर याज्ञवल्क्य कहते हैं कि मंत्र का फल उचित होम और विधि से ही बँधा है, इसलिए वे अभिषेक नहीं करेंगे। शाकल्य के पुनः जाने के आग्रह पर याज्ञवल्क्य धर्म-न्याय बताते हैं कि अहंकारी और कर्तव्य-विमूढ़ गुरु का त्याग किया जा सकता है। क्रुद्ध शाकल्य अथर्वण मंत्रों और जल से याज्ञवल्क्य से सीखी हुई विद्या का प्रतीकात्मक त्याग कराते हैं; याज्ञवल्क्य स्वतंत्रता घोषित कर अधीत ज्ञान का विसर्जन करते हैं। सिद्धि-क्षेत्रों की खोज में उन्हें हाटकेश्वर-क्षेत्र का निर्देश मिलता है, जहाँ फल व्यक्ति के अंतःकरण-भाव के अनुसार मिलता है; वहाँ वे तप और सूर्योपासना करते हैं। भास्कर प्रसन्न होकर वर देते हैं—कुंड में सरस्वती-सदृश मंत्र प्रतिष्ठित होते हैं; स्नान और जप से वेद-विद्या तुरंत धारण हो जाती है और तत्त्वार्थ कृपा से स्पष्ट होता है। याज्ञवल्क्य मानवीय गुरु-बंधन से मुक्ति माँगते हैं; सूर्य उन्हें लघिमा-सिद्धि देकर वाजिकर्ण (दिव्य अश्व-रूप) के माध्यम से सीधे वेद-ज्ञान ग्रहण करने का उपदेश देते हैं। अंत में फलश्रुति है कि उस तीर्थ में स्नान, सूर्य-दर्शन और निर्दिष्ट ‘नादबिंदु’ जप मोक्षाभिमुख सिद्धि प्रदान करता है।

Kātyāyanī–Śāṇḍilī Upadeśa and the Hāṭakeśvara-kṣetra Tṛtīyā Vrata (कात्यायनी-शाण्डिली-उपदेशः)
इस अध्याय में ऋषि सूत से याज्ञवल्क्य के पारिवारिक प्रसंग पूछते हैं। सूत उनकी दो पत्नियों—मैत्रेयी और कात्यायनी—का नाम बताते हैं तथा उनसे जुड़े दो तीर्थ/कुण्डों का वर्णन करते हैं, जिनमें स्नान करने से शुभ फल प्राप्त होने की बात कही गई है। इसके बाद मैत्रेयी के प्रति याज्ञवल्क्य के अनुराग को देखकर कात्यायनी को सपत्नीदुःख होता है; वह स्नान, भोजन और हास्य से विरक्त होकर शोक में डूब जाती है। उपाय की खोज में वह दाम्पत्य-सौहार्द की आदर्श शाण्डिली के पास जाकर गुप्त उपदेश माँगती है, जिससे पति का स्नेह और सम्मान प्राप्त हो सके। शाण्डिली कुरुक्षेत्र में अपने जीवन-वृत्तांत के साथ नारद के बताए व्रत का उपदेश देती है—हाटकेश्वर-क्षेत्र में गौरी से संबंधित पञ्चपिण्ड-पूजन को एक वर्ष तक दृढ़ श्रद्धा से करना चाहिए, विशेषकर तृतीया तिथि को। अध्याय में देवी-देव संवाद द्वारा शिव के मस्तक पर गंगा-धारण का लोक-हितकारी कारण भी बताया गया है—वर्षा, कृषि, यज्ञ और जगत-संतुलन की रक्षा इसी से होती है।

Īśānotpatti–Pañcapīṇḍikā-Gaurī Māhātmya and Vararuci-sthāpita Gaṇapati Māhātmya (ईशानोत्पत्तिपंचपिंडिकागौरीमाहात्म्य–वररुचिस्थापितगणपतिमाहात्म्य)
इस अध्याय में संध्या-उपासना का तात्त्विक कारण और एक स्थानीय व्रत-परंपरा साथ-साथ बताई गई है। शिव कहते हैं कि संध्या के समय कुछ विरोधी/क्रूर शक्तियाँ सूर्य को बाधित करती हैं; सावित्री-मंत्र सहित अर्घ्य का जल दिव्य अस्त्र की भाँति उन्हें दूर करता है—इसी से संध्या-जला का नैतिक-वैदिक आधार स्पष्ट होता है। आगे ‘संध्या’ के प्रति शिव के आदर को देखकर पार्वती व्यथित होकर व्रत का संकल्प करती हैं; शिव के सूक्ष्म मंत्र-ज्ञान और ईशानाभिमुख पूजन से अंततः उनका समाधान और मेल हो जाता है। फिर गौरी के पञ्चपीण्डमय (पाँच पिंड) स्वरूप की विधिवत भक्ति-मार्ग बताया गया है—विशेषकर तृतीया तिथि को, एक वर्ष तक। इससे दाम्पत्य-सुख, इच्छित वर, संतान-लाभ मिलता है; और निष्काम भाव से करने पर उच्च आध्यात्मिक सिद्धि प्राप्त होती है। नारद–शाण्डिल्य–सूत के माध्यम से परंपरा का वर्णन आता है; कात्यायनी के वर्ष-व्रत से याज्ञवल्क्य से विवाह और योग्य पुत्र की प्राप्ति होती है। अंत में वररुचि-स्थापित गणपति का माहात्म्य कहा गया है, जिनकी पूजा विद्या, अध्ययन और वेद-प्रवीणता बढ़ाती है।

वास्तुपदोत्पत्तिमाहात्म्यवर्णनम् (Vāstupada-Utpatti Māhātmya: The Glory of the Origin of Vāstupada)
यह अध्याय प्रश्नोत्तर रूप में चलता है। ऋषि सूत से पूछते हैं कि कात्यायन से जुड़ा तीर्थ पहले क्यों नहीं बताया गया और उस महात्मा ने कौन-सी पवित्र प्रतिष्ठा की। सूत कहते हैं कि कात्यायन ने ‘वास्तुपद’ नामक तीर्थ की स्थापना की, जो सर्वकामदायक है, और वहाँ देवताओं के निश्चित समूह (त्रिचालीस और पाँच) की विधिपूर्वक पूजा का विधान बताया। फिर उत्पत्ति-कथा आती है—पृथ्वी से एक भयंकर प्राणी निकला, जो शुक्राचार्य के उपदेश से प्राप्त दैत्य-मंत्रबल के कारण अवध्य हो गया। देवता उसे मार नहीं सके और संकट में पड़ गए। तब विष्णु ने नियम-बन्धन द्वारा उसे वश में किया: उसके शरीर पर जहाँ-जहाँ देवता स्थित हैं, वहाँ पूजा करने से वह तृप्त होता है; और पूजा की उपेक्षा करने पर मनुष्यों को हानि पहुँचती है। शान्त होने पर ब्रह्मा ने उसका नाम ‘वास्तु’ रखा और विष्णु ने विश्वकर्मा को पूजा-विधि का संहिताकरण करने की आज्ञा दी। याज्ञवल्क्य के पुत्र ने हाटकेश्वर-क्षेत्र में इसी विधान से आश्रम-स्थान स्थापित करने हेतु विश्वकर्मा से प्रार्थना की। विश्वकर्मा ने निर्देशानुसार वास्तु-पूजा करके स्थान की स्थापना की और कात्यायन ने लोक-कल्याण के लिए इन कर्मों का विस्तार किया। फलश्रुति में कहा है कि इस क्षेत्र के संसर्ग से पाप नष्ट होते हैं तथा गृह-दोष, शिल्प-दोष, कुपद और कुवास्तु शांत होते हैं; वैशाख शुक्ल तृतीया, रोहिणी नक्षत्र में विधिवत पूजा करने से समृद्धि और राज्य-लाभ का फल मिलता है।

अजागृहोत्पत्तिमाहात्म्यवर्णनम् | Ajāgṛhā: Origin Narrative and Site-Glory
अध्याय 133 हाटकेश्वर-क्षेत्र में अजागृहा के उद्भव और माहात्म्य का वर्णन करता है। सूत मुनि बताते हैं कि अजागृहा नामक देवता/देवी दुःख-रोगों के शमन के लिए प्रसिद्ध हैं। एक ब्राह्मण तीर्थयात्री थककर बकरियों के झुंड के पास सो जाता है और जागने पर तीन रोगों—राजयक्ष्मा, कुष्ठ और पामा—से पीड़ित हो जाता है। तभी एक तेजस्वी पुरुष प्रकट होकर स्वयं को राजा अज (अजपाल) बताता है और कहता है कि वह बकरी-रूप में प्रतीकित क्लेशों को नियंत्रित करके लोगों की रक्षा करता है। रोग स्वयं कहते हैं कि उनमें से दो ब्रह्मशाप से बंधे हैं, इसलिए सामान्य औषधि-मंत्र से सहज नहीं मिटते; तीसरा मंत्र और औषधि से शांत हो सकता है। वे यह भी चेतावनी देते हैं कि उस स्थान की भूमि का स्पर्श भी समान पीड़ा पहुँचा सकता है। तब राजा दीर्घकाल तक होम और भक्ति-विधि करता है—अथर्ववेद-प्रधान जप, क्षेत्रपाल और वास्तु-स्तुतियों सहित—जिससे पृथ्वी से क्षेत्रदेवता प्रकट होते हैं। देवता स्थान को रोग-दोष से शुद्ध घोषित कर उपचार-क्रम बताते हैं: देवता का पूजन, चन्द्रकूपिका और सौभाग्यकूपिका में स्नान, खण्डशिला का दर्शन/समीपगमन, तथा रविवार को अप्सरासां कुण्ड में स्नान करके पामा का शमन। ब्राह्मण विधि का पालन कर क्रमशः रोगमुक्त होकर स्वस्थ लौटता है; अंत में कहा गया है कि नियम और श्रद्धा से वहाँ पूजन करने वालों पर अजागृहा सदा कृपा करती हैं।

खण्डशिलासौभाग्यकूपिकोत्पत्तिमाहात्म्यवर्णनम् | Origin-Glory of Khaṇḍaśilā and the Saubhāgya-Kūpikā
अध्याय 134 श्रीहाटकेश्वर-क्षेत्र/कामेश्वरपुर की पवित्र भूमि में सूत–ऋषि संवाद के रूप में है। ऋषि कामदेव के कुष्ठ-रोग का कारण तथा दो स्थानीय पावन चिह्नों—शिलाखण्डा/खण्डशिला देवी और सौभाग्य-कूपिका—की उत्पत्ति पूछते हैं। सूत हरित नामक ब्राह्मण तपस्वी की कथा सुनाते हैं: उसकी अत्यन्त पतिव्रता पत्नी अनजाने में काम के बाणों से क्षणभर मन में विचलित हुई; यह जानकर हरित ने धर्म-न्यायपूर्वक शाप दिया—कामदेव को कुष्ठ और लोक-विरक्ति मिली, और पत्नी शिला-रूप हो गई। इसके बाद पाप की त्रिविधता (मानसिक, वाचिक, कायिक) बताकर मन को मूल कारण कहा गया है। कामदेव के दुर्बल होने से प्रजनन-क्रम बाधित हुआ, तब देवताओं ने उपाय पूछा। उन्हें खण्डशिला की पूजा, स्नान तथा उससे जुड़े जल-स्थल पर स्पर्शादि विधि बताई गई, जिससे वह तीर्थ त्वचा-रोगों का नाश करने वाला और सौभाग्य देने वाला प्रसिद्ध हुआ। अंत में त्रयोदशी को खण्डशिला और कामेश्वर की व्रतवत् पूजा का विधान है, जिससे अपवाद से रक्षा, रूप-लावण्य/भाग्य की पुनःप्राप्ति और गृह-कल्याण का फल कहा गया है।

दीर्घिकातीर्थमाहात्म्य — The Glory of Dīrghikā Tīrtha and the Pativratā Narrative
Sūta describes a celebrated lake named Dīrghikā, renowned as a destroyer of sins. Bathing there at sunrise on the fourteenth lunar day (caturdaśī) of the bright fortnight of Jyeṣṭha is presented as especially efficacious for release from sins. The chapter then narrates an exemplum: a learned brāhmaṇa, Vīraśarman, has a daughter marked by unusual bodily proportions, leading to social rejection due to a stated social-ritual fear regarding marriage. She adopts severe austerities and regularly attends Indra’s assembly, where a purity-related sprinkling of her seat prompts her inquiry; Indra explains a perceived impurity due to remaining unmarried despite reaching maturity and advises marriage to restore ritual acceptability. She publicly seeks a husband; a brāhmaṇa afflicted with leprosy agrees to marry her on the condition of lifelong obedience. After marriage, he requests bathing in sixty-eight tīrthas; she constructs a portable hut and carries him on her head across pilgrimage sites, and his body gradually regains radiance. Exhausted at night near the Hāṭakeśvara region, she accidentally disturbs the impaled sage Māṇḍavya, who curses that her husband will die at sunrise; she counters with a truth-act (satya) that the sun will not rise if her husband must die. The sun’s rise is halted, producing social and cosmic disruption: criminals and libertines rejoice, while ritualists and devas suffer due to suspended yajña and dharmic routines. Devas petition Sūrya, who cites fear of the pativratā’s power; they negotiate with the woman, offering compensations. She permits sunrise; her husband dies upon sun-contact but is revived by the devas and restored to youthful form, and she too is transformed into an idealized youthful figure. Māṇḍavya is released from suffering, and the episode concludes as a demonstration of tīrtha merit, satya potency, and the theological valuation of pativratā-dharma within a sacred-geographic frame.

दीर्घिकोत्पत्तिमाहात्म्यवर्णनम् (The Māhātmya of the Origin of Dīrghikā)
इस अध्याय में कर्म और न्याय के अनुपात का धर्मशास्त्रीय विवेचन है। माण्डव्य ऋषि दीर्घकाल तक मृत्यु न आने के कारण असह्य पीड़ा भोगते हुए धर्मराज से अपने दुःख का कारण पूछते हैं। धर्मराज बताते हैं कि पूर्वजन्म में बालक अवस्था में माण्डव्य ने एक बगुले (बक) को तीखे शूल पर चुभो दिया था; उसी छोटे कर्म का फल आज यह वेदना है। माण्डव्य दण्ड को असंगत मानकर धर्मराज को शाप देते हैं कि वे शूद्र-योनि में जन्म लेकर सामाजिक कष्ट भोगेंगे; पर शाप सीमित रहेगा—उस जन्म में संतान नहीं होगी और फिर वे अपना पद पुनः प्राप्त करेंगे। उपाय भी बताया जाता है कि धर्मराज इसी क्षेत्र में त्रिलोचन शिव की आराधना करें, जिससे शीघ्र मुक्ति-रूप मृत्यु प्राप्त हो। देवगण आगे वर माँगते हैं और शूलिका को पावन स्पर्श-वस्तु बना देते हैं—प्रातः उसे छूने से पाप नष्ट होता है। एक पतिव्रता स्त्री प्रार्थना करती है कि खोदी गई सरोवर/खाई तीनों लोकों में ‘दीर्घिका’ नाम से प्रसिद्ध हो; देवता वर देते हैं और कहते हैं कि वहाँ प्रातः स्नान करने से तत्क्षण पाप दूर होते हैं। अंत में काल-निर्देश आता है—सूर्य के कन्या-राशि में होने पर पंचमी तिथि को दीर्घिका-स्नान करने से वन्ध्यत्व दूर होकर संतान-लाभ होता है। बाद में वह पतिव्रता अपने तीर्थ की भक्ति करती है, और फलश्रुति में कहा गया है कि दीर्घिका की कथा सुनने मात्र से भी पाप से मुक्ति मिलती है।

माण्डव्य-मुनिशूलारोपण-प्रसङ्गः (Mandavya Muni and the Episode of Impalement)
ऋषियों ने पूछा कि महान तपस्वी माण्डव्य मुनि को शूला (खूँटे) पर क्यों चढ़ाया गया। सूत कहते हैं—तीर्थयात्रा में लगे माण्डव्य श्रद्धापूर्वक इस पुण्य प्रदेश में आए और विश्वामित्र-परम्परा से जुड़े एक महापावन तीर्थ पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने पितृ-तर्पण किया और सूर्य-व्रत का पालन करते हुए ‘विभ्राट्’ पद से युक्त भास्कर-प्रिय स्तोत्र का जप किया। उसी समय एक चोर लोपत्र (गठरी) चुराकर लोगों से पीछा किए जाने पर मौनव्रती मुनि को देखकर उनकी निकटता में वह गठरी डाल गया और स्वयं एक गुफा में छिप गया। पीछा करने वाले आए, मुनि के सामने गठरी देखकर चोर के भागने का मार्ग पूछने लगे। माण्डव्य चोर का ठिकाना जानते हुए भी मौन-व्रत के कारण कुछ न बोले। लोगों ने बिना विचार किए उन्हें ही छिपा हुआ चोर मान लिया और वन-प्रदेश में शीघ्र ही शूला पर चढ़ा दिया। कथा यह संकेत देती है कि वर्तमान में निर्दोष होने पर भी पूर्वकर्म-विपाक से कठोर फल प्रकट हो सकता है; साथ ही यह व्रत-निष्ठा, नैतिक निर्णय और कारण-कार्य की जटिलता पर विचार कराती है।

धर्मराजेश्वरोत्पत्तिवर्णनम् (Origin Account of Dharmarāja’s Manifestation as Vidura)
ऋषि सूत से पूछते हैं कि माण्डव्य ऋषि के शाप को शांत करने हेतु धर्मराज ने कौन-सा तप और ध्यान किया। सूत कहते हैं—शाप से व्याकुल धर्मराज ने एक पुण्य-क्षेत्र में तप किया और कपर्दी (शिव) के लिए मन्दिर-प्रासाद जैसा स्थान बनवाकर पुष्प, धूप और चन्दन-लेप से श्रद्धापूर्वक पूजन किया। प्रसन्न होकर महादेव ने वर माँगने को कहा। धर्मराज ने निवेदन किया कि अपने धर्म का पालन करने पर भी उन्हें शूद्र-योनि में जन्म का शाप मिला है; इससे होने वाले दुःख और कुल-नाश का भय है। शिव ने कहा—ऋषि-वचन टल नहीं सकता; तुम शूद्र-योनि में जन्म लोगे, पर संतान नहीं होगी। तुम अपने बन्धुओं का विनाश देखोगे, फिर भी शोक से दबोगे नहीं, क्योंकि वे तुम्हारे निषेध नहीं मानेंगे, इसलिए शोक का भार भी कम होगा। आगे उपदेश है कि सौ वर्ष तक तुम धर्मनिष्ठ रहकर अपने कुटुम्ब के हित के लिए अनेक शिक्षाएँ दोगे, चाहे वे श्रद्धाहीन और आचरणहीन हों। सौ वर्ष पूर्ण होने पर ब्रह्म-द्वार से देह त्यागकर मोक्ष पाओगे। अंत में सूत बताते हैं कि यही धर्मराज का विदुर रूप में अवतरण है—व्यास (पाराशर्य) की व्यवस्था से दासी के गर्भ से जन्म लेकर माण्डव्य के वचन को सत्य किया। इस प्रसंग का श्रवण पाप-नाशक कहा गया है।

धर्मराजेश्वर-माहात्म्य (Dharmarājeśvara Māhātmya) — The Glory of Dharmarājeśvara and the Hāṭakeśvara-kṣetra Liṅga
सूता धर्मराज (यम) का प्रसिद्ध पावन प्रसंग सुनाते हैं। काश्यप-वंशी विद्वान ब्राह्मण-उपाध्याय के छोटे पुत्र की मृत्यु हो जाती है; शोक और क्रोध में वह यमलोक पहुँचकर कठोर शाप देता है—यम ‘पुत्रहीन’ होंगे, लोक-पूजा घटेगी, और शुभ कर्मों में यम-नाम लेने से विघ्न होंगे। अपने नियत धर्म का पालन करते हुए भी यम ब्रह्म-शाप से भयभीत होकर ब्रह्मा की शरण लेते हैं; इन्द्र भी कहता है कि मृत्यु नियत समय पर होती है, अतः ऐसा उपाय हो जिससे यम का कार्य भी चले और लोक-दोष भी न लगे। ब्रह्मा शाप को मिटा नहीं सकते, इसलिए एक व्यवस्था करते हैं—व्याधियाँ (रोग) प्रकट होकर नियत समय पर प्राणहरण का कार्य करें, ताकि लोक-आरोप यम पर न आए। यम हाटकेश्वर-क्षेत्र में ‘उत्तम लिंग’ की स्थापना करते हैं, जो सर्व-पातक-नाशक है; जो भक्त प्रातः इसका दर्शन करें, उन्हें यमदूत न छुएँ। फिर यम ब्राह्मण के पुत्र को ब्राह्मण-रूप में लौटा देते हैं और मेल हो जाता है। ब्राह्मण शाप को शिथिल करता है—यम को एक दिव्य-जन्मा पुत्र और एक मानव-जन्मा पुत्र होगा, जो बड़े राजयज्ञों से यम का ‘उद्धार’ करेगा; पूजा बनी रहेगी, पर पूर्व वैदिक विधान के स्थान पर मानव-उद्भूत मंत्रों से। फलश्रुति में कहा है कि निर्दिष्ट मंत्र से यम-प्रतिमा की पूजा, विशेषतः पञ्चमी को, एक वर्ष तक पुत्र-शोक से रक्षा करती है; पञ्चमी का जप अपमृत्यु और पुत्र-शोक दोनों को हरता है।

धर्मराजपुत्राख्यानवर्णनम् | Account of Dharmarāja’s Son (Yudhiṣṭhira) and Pilgrimage-Linked Merit
यह अध्याय प्रश्न–उत्तर के रूप में चलता है। ऋषि धर्मराज (यम) से जुड़े मानवावतारी पुत्र के विषय में पूछते हैं, तब सूत बताते हैं कि वह पाण्डु के वंश/क्षेत्र में उत्पन्न युधिष्ठिर हैं, जो क्षत्रियों में श्रेष्ठ और धर्मनिष्ठ माने गए हैं। उनके आदर्श राजधर्म का वर्णन होता है—उन्होंने पूर्ण दक्षिणा सहित राजसूय यज्ञ किया और पाँच अश्वमेध भी विधिपूर्वक पूर्ण किए, जिससे वे यज्ञ-सम्पूर्णता और धर्मराज्य के प्रतिमान बनते हैं। फिर एक मूल्य-निर्णायक वचन आता है—पुत्र अनेक चाहें, पर पिता के कर्तव्य-पूर्ति के लिए एक ही पुत्र पर्याप्त है, यदि वह गया जाकर पितृकर्म करे, या अश्वमेध सम्पन्न करे, या नील-वृषभ (नीला बैल) का उत्सर्ग/मोचन करे। सूत इसे धर्म-वृद्धि करने वाली शिक्षा बताकर समाप्त करते हैं, जहाँ राजकीय आदर्श और तीर्थ-सम्बद्ध पुण्य का तुलनात्मक महत्व एक साथ रखा गया है।

मिष्टान्नदेश्वरमाहात्म्य (Glory of Miṣṭānneśvara, the ‘Giver of Sweet Food’)
सूत बताते हैं कि हाटकेश्वर-क्षेत्र में ‘मिष्टान्नदेश्वर’ नामक देवता विराजते हैं, जिनके मात्र दर्शन से मिष्टान्न (मधुर, पोषक अन्न) की प्राप्ति कही गई है। आनर्त देश के राजा वसुसैन रत्न, वाहन और वस्त्र आदि का बड़े उत्साह से दान करते थे, विशेषकर संक्रांति, व्यतीपात और ग्रहण जैसे पुण्यकालों में; पर वे अन्न और जल के दान को तुच्छ समझकर छोड़ देते थे। मृत्यु के बाद दान-फल से स्वर्ग पाकर भी उन्हें वहाँ तीव्र भूख-प्यास सताती है और स्वर्ग उन्हें नरक-सा प्रतीत होता है; वे इन्द्र से निवेदन करते हैं। इन्द्र समझाते हैं कि लोक-परलोक में स्थायी तृप्ति के लिए अन्न और जल का नियमित दान, उचित पात्र और अवसर के साथ, अनिवार्य है; अन्य दानों की संख्या उसकी पूर्ति नहीं कर सकती। वसुसैन की शांति उनके पुत्र सत्यसेन द्वारा पिता के नाम से अन्न-जल दान करने पर निर्भर है, पर आरम्भ में पुत्र ऐसा नहीं करता। तब नारद आते हैं, सब जानकर पृथ्वी पर जाकर सत्यसेन को उपदेश देते हैं; सत्यसेन ब्राह्मणों को मिष्टान्न कराता है और विशेषकर ग्रीष्म में जल-वितरण की व्यवस्था करता है। फिर बारह वर्ष का भयंकर अकाल-जनक सूखा पड़ता है, जिससे दान में बाधा आती है; स्वप्न में पिता अन्न-जल अर्पण की प्रार्थना करते हैं। सत्यसेन शिव-पूजा कर लिंग की स्थापना करता है, व्रत-नियमों से तप करता है; शिव प्रसन्न होकर प्रचुर वर्षा और अन्नोत्पत्ति का वर देते हैं और कहते हैं कि उस लिंग का प्रातः दर्शन करने वाला अमृत-तुल्य मिष्टान्न पाएगा, तथा निष्काम भक्त शूलिन (शिव) के धाम को प्राप्त होगा—यह महिमा कलियुग में भी फलदायी है।

Heramba–Gaṇeśa Prādurbhāva and the Triple Gaṇapati: Svargada, Mokṣada, and Martyadā
इस अध्याय में ऋषि सूत से उस “त्रिविध गणपति” के विषय में पूछते हैं जिसकी शक्ति क्रमशः स्वर्ग देने वाली, मोक्ष-साधना में सहायक, और मर्त्य-जीवन की रक्षा करने वाली कही गई है। आरम्भ में गणेश को विघ्नहर्ता तथा विद्या, यश आदि पुरुषार्थों के दाता रूप में वर्णित किया गया है। फिर मनुष्यों की आकांक्षाओं का भेद—उत्तम (मोक्ष-प्रार्थी), मध्यम (स्वर्ग व सूक्ष्म भोग चाहने वाले), अधम (विषयों में आसक्त)—बताकर यह प्रश्न उठता है कि “मर्त्यदा” गणपति की कामना क्यों की जाती है। सूत देव-संकट का प्रसंग कहते हैं: तप से सिद्ध मनुष्यों के स्वर्ग में बढ़ते आगमन से देवता दबाव में आते हैं और इन्द्र शिव की शरण लेते हैं। पार्वती गजमुख, चतुर्भुज, विशिष्ट लक्षणों वाले गणेश-रूप को प्रकट कर स्वर्ग/मोक्ष हेतु कर्मकाण्ड करने वालों के लिए विघ्न उत्पन्न करने का दायित्व देती हैं—यह विघ्न जगत-नियमन का धर्म बन जाता है। अनेक गण उनके अधीन किए जाते हैं, और देवता शस्त्र, अक्षय पात्र, वाहन तथा ज्ञान, बुद्धि, श्री, तेज और प्रभा आदि वर प्रदान कर बहुदेव-अनुमोदन स्थापित करते हैं। अन्त में क्षेत्र में तीन प्रतिष्ठाओं का वर्णन है—ईशान से सम्बद्ध मोक्षद गणपति (ब्रह्मविद्या-साधकों हेतु), स्वर्गद्वार-प्रद हेरम्ब (स्वर्गकामियों हेतु), और मर्त्यदा गणपति जो स्वर्ग से पतितों को नीच योनियों में गिरने से बचाते हैं। फलश्रुति में कहा है कि शुक्ल माघ चतुर्थी की पूजा से एक वर्ष तक विघ्न नहीं आते, और इस कथा का श्रवण भी बाधाओं का नाश करता है।

जाबालिक्षोभण-नाम अध्यायः (Chapter on the Disturbance of Jābāli) / Jābāli’s Temptation and the Local Merit of Cītreśvara
सूत बताते हैं कि चित्रपीठ के मध्य में स्थित देवता श्री चित्रेश्वर ‘चित्र-सौख्य’ (विशिष्ट कल्याण) देने वाले हैं। उनके दर्शन, पूजन और स्नान से कामजन्य गंभीर दोषों का शमन होता है; विशेष रूप से चैत्र शुक्ल चतुर्दशी को वहाँ की उपासना अत्यन्त फलदायी कही गई है। इसी क्षेत्र में पूर्व शाप के कारण राजा चित्राङ्गद, ऋषि जाबालि और उस प्रसंग से जुड़ी एक कन्या भी लोकदृष्टि में रहने वाले, विचित्र और प्रसिद्ध रूप में उपस्थित माने गए हैं। ऋषि इस कथा का कारण पूछते हैं। सूत कहते हैं—ब्रह्मचारी तपस्वी जाबालि ने हाटकेश्वर-क्षेत्र में कठोर तप किया, जिससे देवगण विचलित हो उठे। इन्द्र ने उनके ब्रह्मचर्य को भंग करने हेतु रम्भा को वसन्ता के साथ भेजा; उनके आगमन से ऋतु-परिवर्तन जैसा वातावरण बन गया। रम्भा स्नान के लिए जल में उतरी; उसे देखकर जाबालि के भीतर क्षोभ उठा और मंत्र-ध्यान टूट गया। रम्भा ने मधुर वचनों से स्वयं को उपलब्ध बताकर उन्हें रिझाया, और जाबालि एक दिन के लिए काम-धर्म में प्रवृत्त हो गए। बाद में उन्होंने संयम लौटाकर शुद्धि की और तप में पुनः स्थित हुए; रम्भा देवताओं के पास लौट गई। इस प्रकार अध्याय तप, प्रलोभन और प्रायश्चित्त के साथ तीर्थ की महिमा और नैतिक सावधानी को स्थापित करता है।

Phalavatī–Citrāṅgada Narrative and the Establishment of Citreśvara-pīṭha (फलवती–चित्राङ्गदोपाख्यानम् / चित्रेश्वरपीठनिर्णयः)
इस अध्याय में सूत जी फलवती–चित्राङ्गद की कथा और चित्रेश्वर-पीठ की स्थापना का कारण बताते हैं। जाबालि ऋषि से जुड़े प्रसंगों के बाद अप्सरा रम्भा एक कन्या को जन्म देती है, जिसे ऋषि को सौंप दिया जाता है और उसका नाम ‘फलवती’ रखा जाता है। आश्रम में बड़ी होने पर गन्धर्व चित्राङ्गद उसे देख कर गुप्त रूप से संग करता है; इससे जाबालि क्रोधित होकर कन्या पर कठोरता करते हैं और चित्राङ्गद को शाप देते हैं, जिससे वह भयंकर रोग से ग्रस्त होकर चलने-फिरने और उड़ने की शक्ति खो देता है। फिर कथा शैव-योगिनी-परिसर में आती है। चैत्र शुक्ल चतुर्दशी को शिव गणों और उग्र योगिनियों सहित चित्रेश्वर-पीठ पर आते हैं; योगिनियाँ बलि/उपहार की मांग करती हैं। चित्राङ्गद और फलवती पूर्ण शरणागति के रूप में अपना ‘मांस’ अर्पित करने को तत्पर होते हैं। शिव उनके दुःख का कारण पूछकर उपाय बताते हैं—पीठ पर शिवलिंग की स्थापना कर एक वर्ष तक विधिपूर्वक पूजन करो; इससे रोग क्रमशः दूर होगा और चित्राङ्गद का दिव्य पद पुनः प्राप्त होगा। फलवती उसी पीठ की योगिनी के रूप में प्रतिष्ठित होती है; वह नग्न-स्वरूपा मानी जाकर पूज्या बनती है और भक्तों को इच्छित फल देती है। आगे जाबालि और फलवती के बीच स्त्रियों के नैतिक मूल्य पर शास्त्रार्थ होता है, जो अंततः मेल-मिलाप में परिणत होता है। उपदेश दिया जाता है कि फलवती, जाबालि और चित्राङ्गदेश्वर—इन तीनों की आराधना निरंतर सिद्धि देती है; और फलश्रुति में यह कथा लोक-परलोक में ‘सर्वकामदायिनी’ कही गई है।

अमराख्यलिङ्गप्रादुर्भावः (The Manifestation of the Amara Liṅga and the Māgha Caturdaśī Vigil)
ऋषियों ने सूत से पूछा कि पूर्व प्रसंग में एक युवती पर प्रहार होने पर भी उसकी मृत्यु क्यों नहीं हुई। सूत ने बताया कि अमरेश्वर नामक तीर्थ में, विशेषकर माघ मास की कृष्ण-चतुर्दशी को, मृत्यु का प्रभाव क्षेत्र-सीमा में शिथिल हो जाता है; वहाँ अकाल मृत्यु का भय हट जाता है। दैत्य-देव संघर्ष में देवताओं की पराजय के बाद कश्यप की पत्नी, प्रजापति की पुत्री अदिति (दिति के साथ) ने दीर्घ तप किया। तप के फल से पृथ्वी से शिवलिङ्ग प्रकट हुआ। तब आकाशवाणी ने वर दिया—युद्ध में जो उस लिङ्ग का स्पर्श करें वे एक वर्ष तक अजेय रहें; और जो मनुष्य माघ कृष्ण-चतुर्दशी की रात्रि जागरण करें, वे वर्ष भर रोगमुक्त रहें तथा अकाल मृत्यु से सुरक्षित हों; मृत्यु स्वयं उस तीर्थ-परिसर से दूर हट जाती है। अदिति ने लिङ्ग का माहात्म्य देवताओं को बताया; वे बलवान होकर दैत्यों को जीत गए। दैत्य भी इस व्रत का अनुकरण न कर लें, इसलिए देवताओं ने उसी तिथि पर लिङ्ग की रक्षा-व्यवस्था की। केवल दर्शन से ही मृत्यु-निवारण होने के कारण इसका नाम ‘अमर’ पड़ा। अंत में लिङ्ग के निकट पाठ का फल, अदिति द्वारा निर्मित समीपस्थ कुण्ड में स्नान, तथा स्नान-लिङ्गदर्शन-जागरण—इन तीनों को मुख्य साधन कहा गया है।

अमरेश्वरकुण्डमाहात्म्यवर्णन — Description of the Glory of Amareśvara Kuṇḍa
इस अध्याय में ऋषि सूत से पूछते हैं कि आदित्य, वसु, रुद्र और अश्विन—इन देवसमूहों के नामों की ठीक-ठीक गणना बताइए, और इस क्षेत्र में उपासना का दिन-क्रम भी निर्धारित कीजिए। सूत उत्तर देते हैं—वृषध्वज, शर्व, त्र्यम्बक आदि रुद्र; ध्रुव, सोम, अनिल, अनल, प्रभास आदि आठ वसु; वरुण, सूर्य, इन्द्र, अर्यमन्, धाता, भग, मित्र आदि बारह आदित्य; तथा नासत्य और दसर—ये दोनों दिव्य वैद्य अश्विन-कुमार। फिर कहा जाता है कि ये तैंतीस देवाधिपति सदा इस क्षेत्र में धर्म-रक्षा हेतु उपस्थित रहते हैं। रुद्रों की पूजा अष्टमी और चतुर्दशी को, वसुओं की दशमी को (विशेषतः अष्टमी को), आदित्यों की षष्ठी और सप्तमी को, तथा रोग-निवारण के लिए अश्विनों की पूजा द्वादशी को बताई गई है। इस नियमबद्ध भक्ति से अकाल मृत्यु (अपमृत्यु) का नाश, स्वर्ग या उच्च लोकों की प्राप्ति और आरोग्य-लाभ का फल प्रतिपादित है।

Vatikēśvara-Māhātmya and the Discourse on Śuka’s Renunciation (वटिकेश्वरमाहात्म्य–शुकवैराग्यसंवादः)
अध्याय 147 में सूत जी वटिकेश्वर नामक शिव-स्वरूप का परिचय देते हैं, जो पुत्र देने वाले और पाप हरने वाले हैं। ऋषि पूछते हैं कि ‘वटिका’ का क्या माहात्म्य है और व्यास के वंश में कपिंजल/शुक नामक पुत्र कैसे प्राप्त हुआ। सूत बताते हैं कि शांत और सर्वज्ञ होते हुए भी व्यास ने धर्म-पालन हेतु विवाह का आश्रय लिया और जाबाली की पुत्री वटिका (वटिका/वटिका) से उनका विवाह हुआ। वटिका के गर्भ में बालक बारह वर्ष तक रहा; गर्भस्थ रहते हुए उसने वेद-वेदाṅग, स्मृतियाँ, पुराण और मोक्ष-शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया, पर माता को अत्यंत कष्ट भी हुआ। फिर व्यास और गर्भस्थ शिशु का संवाद होता है। शिशु पूर्वजन्म-स्मृति, माया से विरक्ति और सीधे मोक्ष-मार्ग पर जाने की इच्छा प्रकट करता है तथा वासुदेव को ‘प्रतिभू’ (जमानत/साक्षी) बनाने की प्रार्थना करता है। व्यास श्रीकृष्ण से विनती करते हैं; वासुदेव प्रतिभू बनकर जन्म का आदेश देते हैं। बालक लगभग युवावस्था-सा रूप लेकर जन्म लेता है और तुरंत वन-प्रव्रज्या की ओर झुक जाता है। इसके बाद व्यास और शुक के बीच संस्कारों व आश्रम-क्रम बनाम तत्काल संन्यास पर दीर्घ धर्म-दर्शन चर्चा होती है—आसक्ति, लोक-कर्तव्य और संसार-सुख की अनिश्चितता पर तर्क-वितर्क चलता है। अंत में शुक वन को चला जाता है; व्यास और माता शोकाकुल रह जाते हैं, जिससे वंश-धर्म और मोक्ष-वैराग्य के बीच का तनाव उजागर होता है।

Vāpī-Snāna and Liṅga-Pūjā Phala: Pingalā’s Tapas and Mahādeva’s Boons
इस अध्याय में सूत एक सुव्यवस्थित तीर्थ-कथा सुनाते हैं। पुत्र-शोक से व्याकुल पिंगला एक ऋषि (संदर्भतः व्यास) से अनुमति लेकर महेश्वर को प्रसन्न करने हेतु तपस्या करने निकलती है। निर्दिष्ट क्षेत्र में पहुँचकर वह शंकर की स्थापना करती है और शुद्ध जल से भरी एक विशाल वापी बनवाती है, जिसे पाप-नाशक स्नान-तीर्थ के रूप में प्रतिष्ठित किया जाता है। तब त्रिपुरांतक महादेव प्रकट होकर उसकी तपस्या से संतुष्ट होते हैं और उसे कुल-वर्धक, सद्गुणी पुत्र का वर देते हैं। आगे इस स्थान का माहात्म्य सार्वभौम रूप से बताया गया है—विशेषकर शुक्ल पक्ष की कुछ तिथियों में जो स्त्रियाँ वहाँ स्नान कर स्थापित लिंग की पूजा करती हैं, उन्हें उत्तम पुत्र प्राप्त होते हैं; दुर्भाग्य से पीड़ित लोग स्नान-पूजा से एक वर्ष के भीतर सौभाग्य पा लेते हैं। पुरुषों के लिए यह स्नान-पूजा इच्छाओं की पूर्ति करती है, और निष्काम जनों को मोक्ष देती है। अंत में महादेव अंतर्धान होते हैं, वचनानुसार कपिंजल नामक पुत्र जन्म लेता है, तथा केलीवरी देवी की पूर्व-प्रतिष्ठा का संक्षिप्त उल्लेख सर्वतोमुखी सिद्धि देने वाली के रूप में आता है।

Keliśvarī Devī-prādurbhāva and Andhaka-upākhyāna (केलीश्वरी देवीप्रादुर्भावः तथा अन्धकोपाख्यानम्)
इस अध्याय में ऋषि प्रश्न करते हैं और सूत उत्तर देते हैं कि देवी एक ही आद्य शक्ति हैं, जो लोक-कल्याण और उपद्रवकारी शक्तियों के दमन हेतु अनेक रूपों में प्रकट होती हैं। कात्यायनी (महिषासुर-वध), चामुण्डा (शुम्भ-निशुम्भ-वध) और श्रीमाता आदि प्रसिद्ध प्राकट्यों का स्मरण कराकर, आगे केलिश्वरी रूप का प्रसंग आता है। अन्धक के उपद्रव में, जिसने देवताओं को पदच्युत कर दिया था, शिव अथर्वण-शैली के मन्त्रों से परम शक्ति का आवाहन करते हैं। देवी की स्तुति में कहा जाता है कि समस्त स्त्री-रूप उसी की विभूतियाँ हैं। शिव देवी से अन्धक-निग्रह के लिए सहायता माँगते हैं। ‘केलि-मय’ (लीलामय, बहुरूपी) भाव धारण कर अग्नि-सन्निधि में आवाहित होने के कारण वह त्रिलोकी में ‘केलिश्वरी’ नाम से विख्यात होती हैं—यह नाम-व्युत्पत्ति भी दी गई है। अष्टमी और चतुर्दशी को केलिश्वरी-पूजन से अभीष्ट फल की प्राप्ति बताई गई है; तथा युद्धकाल में राजा का दूत यदि उनका स्तव पाठ करे तो अल्प सेना से भी विजय का फल कहा गया है। आगे अन्धक की वंशकथा और स्वभाव-विकास आता है—हिरण्यकशिपु की परम्परा से सम्बन्ध, ब्रह्मा की तपस्या द्वारा वर-याचना, पूर्ण अमरत्व का निषेध, और फिर प्रतिशोध से देवताओं से युद्ध। संग्राम में दिव्यास्त्रों का आदान-प्रदान, शिव का आगमन, मातृ-योगिनी शक्तियों का प्राकट्य, ‘पुरुष-व्रत’ मानकर स्त्रियों पर प्रहार न करने का अन्धक का आग्रह, और अंत में तमोऽस्त्र का प्रयोग—इनसे युद्ध का धार्मिक-नैतिक स्वर उभरता है।

Kelīśvarī Devī: Amṛtavatī Vidyā, Devotional Authority, and Phalaśruti
इस अध्याय में सूत क्रमबद्ध रूप से कथा कहते हैं। दैत्य-पुरोहित शुक्र हाटकेश्वर से संबद्ध सिद्धि-प्रद क्षेत्र में जाकर अथर्वणीय रौद्र मंत्रों से होम करते हैं और त्रिकोण कुण्ड बनाते हैं। अनुष्ठान से प्रसन्न होकर देवी केलीश्वरि प्रकट होती हैं और आत्म-विनाशकारी बलि को रोककर कल्याणकारी वर देने की बात करती हैं। शुक्र युद्ध में मरे दैत्यों के पुनर्जीवन की याचना करते हैं; देवी नव-भक्षित तथा ‘योगिनी-मुख’ में प्रविष्ट कहे गए दैत्यों सहित सबको जीवित करने का वचन देती हैं। वह ‘अमृतवती विद्या’ नामक ज्ञान-शक्ति प्रदान करती हैं, जिससे मृतक फिर जी उठते हैं। शुक्र यह संदेश अंधक को देकर विशेषतः अष्टमी और चतुर्दशी को निरंतर भक्ति-पूजन का उपदेश करते हैं और सिद्धांत बताते हैं कि जगत में व्याप्त परम शक्ति बल से नहीं, केवल भक्ति से प्राप्त होती है। अंधक अपने पूर्व क्रोध का पश्चात्ताप कर प्रार्थना करता है कि जो भक्त इस रूप का ध्यान करें और प्रतिमा स्थापित करें, उन्हें मनोवांछित सिद्धि मिले। देवी प्रतिमा-स्थापक को मोक्ष, अष्टमी/चतुर्दशी के उपासकों को स्वर्ग, और केवल दर्शन-ध्यान करने वालों को राजसुख का वर देती हैं। देवी के अंतर्धान के बाद शुक्र दैत्यों को जीवित करते हैं और अंधक पुनः राज्य पाता है; परंपरा में व्यासवंशज द्वारा वहाँ स्थापना का उल्लेख है। फलश्रुति में कहा है—पाठ/श्रवण से भारी संकट दूर होता है; अष्टमी को सुनने से पतित राजा भी निष्कंटक राज्य पाता है; और युद्धकाल में श्रवण विजय देता है।

Andhaka–Śaṅkara Saṃvāda: Śūlāgra-stuti, Gaṇatā-prāpti, and Hāṭakeśvara-Bhairava Upāsanā
इस अध्याय में दो भागों में धर्म-तत्त्व का निरूपण है। पहले भाग में शक्ति-वृद्धि से उन्मत्त अन्धक कैलास में दूत भेजकर शिव से दर्पपूर्ण और बाध्यकारी माँग करता है। शिव वीरभद्र, महाकाल, नन्दी आदि प्रमुख गणों को भेजते हैं, पर वे आरम्भ में पराजित हो जाते हैं; तब स्वयं शंकर रण में उतरते हैं। शस्त्रों का युद्ध निष्फल होने पर मल्लयुद्ध होता है; अन्धक क्षणभर शिव को दबा लेता है, फिर शिव दिव्य अस्त्र-बल से उसे वश में कर त्रिशूल पर वेधकर शूलाग्र पर स्थिर कर देते हैं। त्रिशूलाग्र पर स्थित अन्धक दीर्घ स्तुति करता है और शत्रु से पश्चात्तापी भक्त बन जाता है। शिव उसे मृत्यु नहीं देते; दैत्य-भाव को शुद्ध कर उसे गणत्व प्रदान करते हैं। अन्धक वर माँगता है कि जो भी मनुष्य उसी रूप में—भैरव शिव और त्रिशूल पर वेधित अन्धक की प्रतिमा सहित—प्रतिष्ठा करके पूजन करे, उसे मोक्ष मिले; शिव इसकी स्वीकृति देते हैं। दूसरे भाग में सुरथ राजा का दृष्टान्त है। राज्य से वंचित सुरथ वसिष्ठ के पास जाता है; वे उसे सिद्धि-प्रद हाटकेश्वर क्षेत्र में उपासना का निर्देश देते हैं। वहाँ सुरथ भैरव-रूप महादेव की उसी त्रिशूल-चिह्नित प्रतिष्ठा करता है और नारसिंह-मन्त्र से लाल (रक्तवर्ण) अर्पणों सहित, शुद्धि-नियमों का पालन करते हुए पूजा करता है। जप-संख्या पूर्ण होने पर भैरव उसे राज्य-प्राप्ति का वर देते हैं और उसी विधि से उपासना करने वालों के लिए भी सिद्धि का आश्वासन देते हैं; इस प्रकार मिथक, प्रतिमा-प्रतिष्ठा, मन्त्र-साधना और शुद्धाचार एक स्थान-आधारित साधना-क्रम में जुड़ते हैं।

चक्रपाणिमाहात्म्यवर्णनम् | Cakrapāṇi Māhātmya (Glorification of Cakrapāṇi)
इस अध्याय में ऋषि सूत से पूछते हैं कि कौन-से तीर्थ केवल दर्शन या स्पर्श से ही पूर्ण और इच्छित फल देते हैं। सूत तीर्थों और लिंगों की अनंतता बताकर क्षेत्र के विशेष विधान कहते हैं—शंख-तीर्थ में स्नान, विशेषतः एकादशी को, सर्वपुण्यदायक है; एकादश-रुद्र का दर्शन सभी महेश्वरों के दर्शन के समान है; नियत तिथि पर वटादित्य का दर्शन सूर्य-रूपों के दर्शन तुल्य है; तथा गौरी-दुर्गा आदि देवी और गणेश का दर्शन उनके-अपने देववर्ग के समग्र दर्शन का फल देता है। फिर ऋषि पूछते हैं कि चक्रपाणि का माहात्म्य क्यों नहीं कहा गया और उनका दर्शन कब करना चाहिए। सूत बताते हैं कि इस क्षेत्र में अर्जुन ने चक्रपाणि की स्थापना की; स्नान करके भक्तिपूर्वक दर्शन करने से ब्रह्महत्या आदि महापाप भी नष्ट हो जाते हैं। कृष्ण–अर्जुन को नर–नारायण रूप मानकर धर्म-स्थापन हेतु इस प्रतिष्ठा का उद्देश्य भी बताया गया है। एक नीति-निर्देश भी आता है—जो शुभ चाहता हो, वह किसी व्यक्ति को पत्नी सहित एकांत में, विशेषकर अपने संबंधी को, न देखे; यह संयम और मर्यादा का नियम है। आगे अर्जुन द्वारा ब्राह्मण की चोरी हुई गायों की रक्षा-प्राप्ति, तीर्थ-यात्रा, वैष्णव मंदिर का निर्माण व प्रतिष्ठा, तथा चैत्र में विष्णु-वासर पर हरि के शयन-बोधन के उत्सवों की स्थापना वर्णित है। अंत में फलश्रुति कहती है कि एकादशी-चक्र में निरंतर पूजा करने वाले भक्त विष्णुलोक को प्राप्त होते हैं।

Apsaraḥ-kuṇḍa / Rūpatīrtha Utpatti-Māhātmya (Origin and Glory of the Apsaras Pond and Rūpatīrtha)
सूत जी रूपतीर्थ का माहात्म्य बताते हैं—यहाँ विधिपूर्वक स्नान करने से अरूपता भी रूप में बदल जाती है। फिर इसकी उत्पत्ति-कथा आती है: ब्रह्मा तिलोत्तमा नाम की अत्यन्त सुन्दरी अप्सरा की रचना करते हैं। वह शिव का पूजन करने कैलास जाती है। उसके प्रदक्षिणा करने पर शिव के मुख उसकी दिशा के अनुसार प्रकट होते हैं; पार्वती के मन में क्षोभ उठता है और नारद लोक-व्यवहार की कटु व्याख्या करके उस क्षोभ को और तीव्र कर देते हैं। पार्वती शिव के नेत्र रोक देती हैं, जिससे जगत में विनाशकारी असंतुलन का भय उत्पन्न होता है। सृष्टि की रक्षा हेतु शिव तीसरा नेत्र प्रकट करते हैं और “त्र्यम्बक” कहलाते हैं। इसके बाद पार्वती तिलोत्तमा को विकृत रूप का शाप देती हैं; तिलोत्तमा शरण माँगती है, तब पार्वती अपने द्वारा स्थापित तीर्थ में स्नान का विधान बताती हैं—विशेषतः माघ शुक्ल तृतीया तथा आगे चलकर चैत्र शुक्ल तृतीया के मध्याह्न स्नान से तिलोत्तमा का रूप लौट आता है। तिलोत्तमा शुद्ध जल का विशाल अप्सरा-कुण्ड बनाती है। फलश्रुति में स्त्रियों के लिए सौभाग्य, मनोहरता और श्रेष्ठ सन्तान, तथा पुरुषों के लिए अनेक जन्मों तक रूप और श्री-समृद्धि का वर्णन है।

Citreśvarīpīṭha–Hāṭakeśvarakṣetra Māhātmya (चित्रेश्वरीपीठक्षेत्रमाहात्म्यवर्णनम्)
इस अध्याय में सूत हाटकेश्वर-क्षेत्र की विधिपूर्वक पवित्र भू-रचना का माहात्म्य बताते हैं। गौरी-कुण्ड के निकट स्थित विशेष कुण्डों में स्नान और पार्वती के दर्शन को शुद्धि तथा जन्म-मरण के कष्टों से मुक्ति का साधन कहा गया है। स्त्रियों के लिए विशेष फल बताए गए हैं—नियत तिथियों में स्नान से सौभाग्य, दाम्पत्य-कल्याण, संतान-प्राप्ति तथा बाँझपन जैसे दोषों की निवृत्ति। ऋषि तीर्थों की सिद्धि-तर्कना पूछते हैं, तब सूत एक गूढ़ साधना-मार्ग बताते हैं—लिंगों के समूह के बीच उपासना, विशेषकर चतुर्दशी का अनुष्ठान, और साधक की दृढ़ता की परीक्षा हेतु गणेश का भयानक रूप में प्रकट होना। इसके साथ ब्राह्मणोचित सात्त्विक विकल्प भी रखा गया है—स्नान, शास्त्रानुसार आचरण, प्रातः तिल-दान आदि, तथा संयमित उपवास/वैराग्य जो मोक्षाभिमुख है। अंत में फलश्रुति है कि इस कथा का श्रवण-पाठ, व्यास/गुरु का सम्मान और सावधान ग्रहण—सब व्यापक पवित्रता और उन्नति प्रदान करते हैं।

हाटकेश्वरक्षेत्रे वसवादिदेवपूजाविधानम् तथा पुष्पादित्य-माहात्म्ये मणिभद्रवृत्तान्त-प्रस्तावः (Hāṭakeśvara Kṣetra: Rites for Vasus–Ādityas–Rudras–Aśvins and the Puṣpāditya Māhātmya with the Maṇibhadra Narrative Prelude)
इस अध्याय में हाटकेश्वर क्षेत्र की देव-व्यवस्था और पूजा-तत्त्व का वर्णन है। यहाँ निवास करने वाले देव-समूह—आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य और अश्विनीकुमार—गिनाए गए हैं, और फिर पंचांग-समयों के अनुसार उनकी उपासना की विधि बताई गई है। स्नान-शुद्धि, स्वच्छ वस्त्र, कर्म-क्रम (पहले द्विजों को तर्पण, फिर देवपूजा) तथा मंत्रयुक्त नैवेद्य, धूप और आरार्तिका आदि अर्पण का विधान आता है। विशेष व्रतों में मधु-मास की शुक्ल अष्टमी को वसुओं की पूजा, सप्तमी—विशेषतः रविवार—को पुष्प, गंध और लेपन से आदित्यों की पूजा, चैत्र शुक्ल चतुर्दशी को शतरुद्रीय के जप सहित रुद्र-पूजन, और आश्विन पूर्णिमा को अश्विनी-सूक्त से अश्विनों की आराधना कही गई है। इसके बाद पुष्पादित्य का माहात्म्य आरम्भ होता है—याज्ञवल्क्य द्वारा प्रतिष्ठित यह देवता दर्शन-पूजन से अभीष्ट फल देता, पाप हरता और अंततः मुक्ति का भी मार्ग दिखाता है। फिर समृद्ध नगर में मणिभद्र की कथा-भूमिका आती है—उसका अपार धन, कंजूसी, शरीर का क्षय और विवाह की अभिलाषा; और अंत में उपदेश कि धन ही अनेक सामाजिक संबंधों और कर्म-प्रवृत्तियों को आकार देता है।

मणिभद्रकृतपुष्पब्राह्मणविडंबनवर्णनम् (Humiliation of the Brāhmaṇa Puṣpa by Maṇibhadra)
सूत जी मणिभद्र की कथा सुनाते हैं, जिसने कामवश होकर एक क्षत्रिय कन्या से अशुभ समय (जब भगवान विष्णु शयन कर रहे थे) में विवाह किया। धन के लोभ में पिता ने अपनी पुत्री का विवाह कर दिया। मणिभद्र ने अपनी पत्नी को प्रताड़ित किया और घर पर कड़ा पहरा लगा दिया। वह ब्राह्मणों को भोजन के लिए आमंत्रित करता था, लेकिन शर्त रखता था कि कोई उसकी पत्नी की ओर न देखे। पुष्प नामक एक वेदपाठी ब्राह्मण ने भोजन के दौरान जिज्ञासावश उसकी पत्नी को देख लिया। क्रोधित मणिभद्र ने उसे बुरी तरह पिटवाकर चौराहे पर फिंकवा दिया। दयालु नागरिकों ने उसकी सहायता की और पुष्प ने राजा के न्याय की कमी पर शोक व्यक्त किया।

सूर्यसकाशात्पुष्पब्राह्मणस्य वरलब्धिवर्णनम् (The Account of Puṣpa Brāhmaṇa Receiving Boons from Sūrya)
इस अध्याय में सूत कहते हैं कि पुष्प नामक ब्राह्मण दुःखी और क्रोधित होकर, अपने माने हुए दोष का प्रायश्चित्त पाए बिना भोजन न करने का निश्चय करता है और शीघ्र फल देने वाले देवता/मंत्र की खोज करता है। लोग उसे चामत्कारपुर के सूर्य-मन्दिर का पता बताते हैं, जिसे याज्ञवल्क्य ने प्रतिष्ठित किया माना जाता है—रविवार को सप्तमी तिथि में हाथ में फल लेकर 108 प्रदक्षिणाएँ करने से अभीष्ट सिद्धि होती है; साथ ही काश्मीर की शारदा देवी को उपवास से सिद्धि देने वाली कहा जाता है। पुष्प चामत्कारपुर पहुँचकर स्नान करता है, 108 प्रदक्षिणाएँ करता है और दीर्घ स्तुति-पूजन करता है। फिर वह कुशाण्डिका आदि विधि से होम आरम्भ करता है—मंत्रोच्चार, न्यास, आहुतियाँ और विविध क्रियाएँ करते-करते वह तामसिक आग्रह में आकर सिद्धि के लिए अपना मांस तक अर्पित करने को उद्यत हो जाता है। तभी सूर्य प्रकट होकर उसे रोकते हैं, श्वेत और कृष्ण दो गोलियाँ देते हैं जिनसे वह कुछ समय के लिए रूप बदलकर फिर अपने स्वरूप में लौट सके, और वैदीशा के धनिक मणिभद्र से सम्बन्धित ज्ञान भी प्रदान करते हैं। पुष्प पूछता है कि 108 प्रदक्षिणाओं का ‘तत्काल फल’ क्यों नहीं मिला; सूर्य समझाते हैं कि तामस भाव से किया कर्म निष्फल हो जाता है—केवल बाह्य विधि की शुद्धता दूषित नीयत की पूर्ति नहीं कर सकती। सूर्य उसके घाव भरकर अन्तर्धान हो जाते हैं; उपदेश यही कि कर्मफल का मूल नियामक ‘भाव’ है।

मणिभद्रोपाख्याने मणिभद्रनिधनवर्णनम् (Maṇibhadra-Upākhyāna: Account of Maṇibhadra’s Death)
सूत जी नगरखण्ड में मणिभद्र-उपाख्यान सुनाते हैं। पुष्प नामक व्यक्ति एक अद्भुत गुटिका पाकर मणिभद्र के समान रूप धारण कर लेता है और उसी के बल पर नगर में छल-भेष से उपद्रव फैलाता है। द्वारपाल षण्ड को आदेश मिलता है कि आने वाले नकली मणिभद्र को रोके; पर द्वार पर असली मणिभद्र पर ही प्रहार हो जाता है और जनता में हाहाकार मच जाता है। तभी पुष्प फिर मणिभद्र के रूप में प्रकट होकर पहचान का घोर भ्रम बढ़ा देता है। विवाद राजसभा तक पहुँचता है। राजा प्रश्नोत्तर से सत्य की जाँच करता है और अंत में मानव-साक्ष्य के लिए मणिभद्र की पत्नी को बुलाता है। वह अपने पति के वास्तविक लक्षण पहचानकर धर्मयुक्त पति को अलग करती है और छद्मधारी को उजागर कर देती है। राजा धोखेबाज़ को दण्ड देने की आज्ञा देता है; दण्ड के समय वह अपराधी कामना के संकट, छल के सामाजिक दुष्परिणाम और कंजूसी की कठोर निन्दा करते हुए लंबा उपदेश देता है। वह कहता है कि धन की तीन गतियाँ हैं—दान, भोग या नाश; जो केवल संग्रह करता है, उसके हिस्से निष्फल तीसरी गति ही आती है। अध्याय का उपसंहार हाटकेश्वर-क्षेत्र-माहात्म्य में इस प्रसंग को पवित्र भूगोल से जुड़ा नीतिदृष्टान्त बताकर करता है।

पुष्पविभवप्राप्तिवर्णनम् (Account of Puṣpa’s Attainment and Distribution of Prosperity)
सूत जी बताते हैं कि क्षेत्र के देवालय-परिसर में मणिभद्र के निवास पर पुष्प अपने स्वजनों के साथ हर्षपूर्वक आता है। शंख-भेरी और ढोल-नगाड़ों के मंगलनाद के बीच यह समृद्धि भास्कर (सूर्यदेव) की कृपा से प्राप्त हुई—ऐसा प्रसंग में कहा गया है। पुष्प अपने कुटुम्बियों को बुलाकर लक्ष्मी के चंचल स्वभाव पर विचार करता है और अपने पूर्व के दीर्घ कष्टों को स्मरण करता है। धन की अस्थिरता समझकर वह सत्य-व्रत का संकल्प लेकर व्यापक दान का निश्चय करता है। वह संबंधियों को उनके पद और योग्यता के अनुसार वस्त्र-आभूषण बाँटता है, वेदज्ञ ब्राह्मणों को श्रद्धा से धन और वस्त्र देता है, कलाकारों/वादकों को भी अन्न-वस्त्र प्रदान करता है, और विशेष रूप से निर्धन तथा अंधों का पालन-पोषण करता है। अंत में वह पत्नी के साथ भोजन करके एकत्र जनसमुदाय को विदा करता है और प्राप्त धन के साथ आगे व्यवस्थित, मर्यादित जीवन जीता है। अध्याय यह सिखाता है कि समृद्धि का धर्मसम्मत उपयोग दान, सेवा और समुदाय-कल्याण से ही पवित्र होता है।

हाटकेश्वरक्षेत्रमाहात्म्ये पुष्पस्य पापक्षालनार्थं हाटकेश्वरक्षेत्रगमन-पुरश्चरणार्थ-ब्राह्मणामन्त्रणवर्णनम् (Puṣpa’s Journey to Hāṭakeśvara for Sin-Removal and the Invitation of Brāhmaṇas for Puraścaraṇa)
इस अध्याय में सूत जी तीर्थ-माहात्म्य के भीतर एक चेतावनीपूर्ण, नैतिक कथा सुनाते हैं। चमत्कारपुर में सूर्य-उपासना आदि के प्रसंग से ब्राह्मण पुष्प ने मनोहर रूप धारण किया था। तब माहि नाम की स्त्री उससे पूछती है कि यह रूप-परिवर्तन माया से है, मंत्र-सिद्धि से या देव-कृपा से। पुष्प सत्य स्वीकार करता है और मणिभद्र के साथ किए गए छल, उसकी पत्नी का अनुचित हरण, तथा उसी असत्य आधार पर बने गृहस्थ जीवन और संतान-परंपरा का वर्णन करता है। भोग-विलास के बाद वृद्धावस्था में उसे गहरा पश्चात्ताप होता है। अपने पाप को जानकर वह शुद्धि हेतु हाटकेश्वर-क्षेत्र जाने और प्रायश्चित्त-रूप पुरश्चरण करने का निश्चय करता है। वह पुत्रों में धन बाँटकर, जहाँ पहले सिद्धि मिली थी वहाँ सूर्य से संबंधित एक भव्य निर्माण कराता है और शुद्धि के लिए चातुश्चरण (चार प्रकार की पाठ-यज्ञ व्यवस्था) हेतु ब्राह्मणों को विधिपूर्वक आमंत्रित करता है। इस प्रकार अध्याय व्यक्तिगत नैतिकता, स्वीकारोक्ति और क्षेत्र-परंपरा की कर्म-व्यवस्था को एक सूत्र में बाँधता है।

Puṣpāditya-māhātmya (Glorification of Pushpāditya and allied rites)
इस अध्याय में सूत ब्राह्मणों की सभा में हुए विचार-विमर्श का वर्णन करते हैं। पुष्प अपनी पत्नी सहित श्रद्धापूर्वक द्विजों के पास जाकर भास्कर (सूर्य) के लिए मंदिर-निर्माण की घोषणा करता है और उसकी कीर्ति तीनों लोकों में फैलाने हेतु देव का नाम “पुष्पादित्य” रखने का प्रस्ताव करता है। ब्राह्मण पूर्व-प्रतिष्ठा और परंपरा की रक्षा की बात उठाते हैं तथा शुद्धि के लिए प्रायश्चित्त-विधान बताते हैं—विशेषतः “लक्ष” संख्या का महाहोम। पुष्प उनसे निवेदन करता है कि वे निरंतर उसी नाम से देव की कीर्ति-गान करें और स्थल से संबद्ध देवी-नाम देकर उसकी पत्नी का भी सम्मान हो। अंततः निर्णय होता है कि देव “पुष्पादित्य” कहलाएगा और देवी “माहिका/माही” नाम से पूजित होगी। फलश्रुति में कलियुग के लाभ बताए गए हैं—पुष्पादित्य-भक्ति से रविवार के पाप का नाश; रविवार को सप्तमी के संयोग में 108 तक फल अर्पित कर प्रदक्षिणा करने से मनोवांछित फल; “माहिका” दुर्गा के नियमित दर्शन से कष्टों का निवारण; और चैत्र शुक्ल चतुर्दशी की पूजा से वर्षभर अनिष्ट से रक्षा।

पुरश्चरणसप्तमीव्रतविधानवर्णनम् (Puraścaraṇa-Saptamī Vrata: Procedure and Rationale)
अध्याय 162 एक नैतिक-आनुष्ठानिक कथा के रूप में आरम्भ होकर विस्तृत व्रत-विधान पर समाप्त होता है। सूत बताते हैं कि पुष्प ने मणिभद्र-वध से जुड़े विवादित कर्म किए, जिससे समाज में निन्दा हुई और ब्राह्मणों ने उसे कठोर शब्दों में धिक्कारा; संवाद में उस पर महापातक, यहाँ तक कि ब्रह्मघ्न का आरोप भी लगाया गया। उसके दुःख को देखकर नागर ब्राह्मण शास्त्र, स्मृति, पुराण और वेदान्त का विचार करते हैं कि शुद्धि का प्रमाणित उपाय क्या हो; तब चण्डशर्मा नामक ब्राह्मण स्कन्दपुराण में वर्णित ‘पुरश्चरण-सप्तमी’ को प्रायश्चित्त बताता है। पुष्प उस व्रत का आचरण करता है और एक वर्ष के अंत में शुद्ध कहा गया है। इसके बाद पुराना उपदेश-संवाद आता है—राजा रोहिताश्व मुनि मार्कण्डेय से पूछते हैं कि मन, वाणी और शरीर से किए पाप कैसे नष्ट हों। मुनि बताते हैं: मानसिक दोषों का क्षय पश्चात्ताप से, वाचिक दोषों का शमन संयम/असम्प्रयोग से, और शारीरिक दोषों का प्रायश्चित्त ब्राह्मणों के समक्ष स्वीकार कर या राजदण्ड-नियम से होता है। अंत में वे सूर्य-केन्द्रित ‘पुरश्चरण-सप्तमी’ का विधान देते हैं—माघ शुक्ल पक्ष में, सूर्य के मकर में होने पर, रविवार को उपवास, शुद्धाचार, प्रतिमा-पूजन, लाल पुष्प व उपहार, लाल चन्दनयुक्त अर्घ्य, ब्राह्मण-भोजन व दक्षिणा, तथा पञ्चगव्य आदि शुद्धिकारक सेवन। मास-दर-मास सामग्री का क्रम वर्ष भर बताया गया है; अंत में षष्ठांश सहित दान देकर व्रती की पूर्ण शुद्धि का फल कहा गया है।

ब्राह्मनागरोत्पत्तिवृत्तान्तवर्णनम् (Account of the Brahma-Nāgara origin narrative and communal expiation discourse)
अध्याय 163 ब्रह्मस्थान में घटित एक समुदाय-न्याय और कर्म-नीति का प्रसंग प्रस्तुत करता है। कुछ नागर ब्राह्मणों को धन से भरा पात्र मिलता है; वे सभा बुलाकर लोभ से प्रेरित अनुचित ग्रहण और प्रायश्चित्त-प्रक्रिया में हुई त्रुटि पर निर्णय करते हैं। सामूहिक विचार-विमर्श के बिना, एक व्यक्ति द्वारा प्रायश्चित्त दिलाए जाने के कारण चण्डशर्मा को समाज से ‘बाह्य’ मानकर अपमानित किया जाता है। पुष्प धन देकर क्षतिपूर्ति करना चाहता है, पर सभा स्पष्ट करती है कि निर्णय धन-लालसा से नहीं, बल्कि स्मृति-पुराण के प्रमाण और उचित संस्थागत विधि से प्रेरित है। वे कहते हैं कि प्रायश्चित्त अतिरिक्त आचार्यों/ऋत्विजों के साथ, परामर्शपूर्वक और विधिवत् ही दिया जाना चाहिए। दुःख में पुष्प कठोर आत्म-पीड़ा को अर्पण-रूप में करने लगता है; तभी भास्वान सूर्य प्रकट होकर उसे रोकते हैं और वर देते हैं—चण्डशर्मा शुद्ध होकर ‘ब्राह्म-नागर’ के रूप में प्रसिद्ध होगा, उसके वंशज व सहचर सम्मान पाएँगे, और पुष्प का शरीर पुनः स्वस्थ हो जाएगा। इस प्रकार अध्याय लोभ-नियंत्रण, सामुदायिक अधिकार और प्रायश्चित्त की वैध प्रक्रिया का धर्मोपदेश देकर दिव्य अनुमोदन से पुनर्स्थापित मर्यादा दिखाता है।

Nāgareśvara–Nāgarāditya–Śākambharī Utpatti-varṇanam (Origin and Establishment Narratives)
सूत बताते हैं कि पुष्प नामक भक्त ने आत्म-त्यागमय संकल्प से सूर्य की आराधना करके दुःखी ब्राह्मण चण्डशर्मा को ढाढ़स दिया और मार्ग दिखाया। उसने भविष्यवाणी की कि चण्डशर्मा का शरीर-पतन नहीं होगा और नागरों में उसका वंश विशेष प्रतिष्ठा पाएगा। दोनों पवित्र सरस्वती के तट पर जाकर दक्षिण किनारे आश्रम-सदृश निवास बनाकर रहने लगे। चण्डशर्मा ने अपने पूर्व-व्रत का स्मरण कर सत्ताईस लिङ्गों से जुड़ा कठोर अनुष्ठान आरम्भ किया—सरस्वती-स्नान, शौच-नियम, षडाक्षर मन्त्र का जप, लिङ्ग-नामों का उच्चारण और साष्टाङ्ग प्रणाम। वह कर्दम (मिट्टी) से लिङ्ग बनाकर पूजता रहा और यह धर्म निभाता रहा कि चाहे लिङ्ग अनुचित स्थान पर हों, उन्हें भी विचलित न किया जाए; इस प्रकार उसने प्रतिदिन करते-करते सत्ताईस लिङ्ग पूर्ण किए। उसकी अतिभक्ति से प्रसन्न शिव ने पृथ्वी से एक लिङ्ग प्रकट कर कहा कि इसकी पूजा से सत्ताईस लिङ्गों का सम्पूर्ण फल मिलता है; जो भी भक्तिभाव से इसकी आराधना करेगा, वह भी वही फल पाएगा। चण्डशर्मा ने प्रासाद बनाकर उस लिङ्ग की ‘नागरेश्वर’ नाम से स्थापना की और नगर के लिङ्गों की स्मृति से उसका नाम जोड़ा; अंत में वह शिवलोक को प्राप्त हुआ। पुष्प ने सरस्वती तट पर ‘नागरादित्य’ नामक सूर्य-प्रतिमा स्थापित की और वर पाया कि वहाँ की पूजा से चामत्कारपुर के द्वादश सूर्य-रूपों का पूर्ण फल मिलता है। कथा में चण्डशर्मा की पत्नी शाकम्भरी का भी वर्णन है, जिसने शुभ तट पर दुर्गा की स्थापना की; देवी ने कहा कि भक्तिपूर्वक पूजने वालों को त्वरित फल मिलेगा, विशेषतः आश्विन शुक्ल की महानवमी को, और देवी शाकम्भरी नाम से प्रसिद्ध हुई। अध्याय का निष्कर्ष है कि समृद्धि के बाद की पूजा आगे की वृद्धि में विघ्नों को रोकती है।

अश्वतीर्थोत्पत्तिवर्णनम् (Origin Account of Aśvatīrtha)
इस अध्याय में सूत बताते हैं कि सरस्वती के शुभ तट का पहले बाहरी जनसमूहों और नगरवासियों में बड़ा मान था। फिर विश्वामित्र के शाप से सरस्वती रक्तवाहिनी हो जाती है; उसके तट पर राक्षस, भूत, प्रेत और पिशाच जैसे सीमांत प्राणी विचरने लगते हैं। भय से मनुष्य उस क्षेत्र को छोड़कर अधिक सुरक्षित पुण्य-प्रदेशों की ओर, विशेषतः मार्कण्डेय के आश्रम के निकट नर्मदा-तट पर, चले जाते हैं। ऋषि शाप का कारण पूछते हैं और सूत इसे विश्वामित्र–वसिष्ठ के दीर्घ वैर तथा क्षत्रिय से ब्राह्मणत्व प्राप्त करने की आकांक्षा के प्रसंग में रखते हैं। फिर उत्पत्ति-कथा में भृगुवंशी ऋषि ऋचीक कौशिकी के पास भोजकट में आते हैं। वे गाधि की पुत्री को (गौरी-पूजा से संबद्ध) देखकर ब्राह्म-विवाह से मांगते हैं। गाधि कन्या-शुल्क में एक-एक काले कान वाले सात सौ वेगवान घोड़े मांगते हैं। ऋचीक कान्यकुब्ज जाकर गंगा-तट पर ‘अश्वो वोढा’ मंत्र का छंद-ऋषि-देवता-विनियोग सहित जप करते हैं; नदी से वे घोड़े प्रकट हो जाते हैं। इसी से अश्वतीर्थ की कीर्ति होती है; वहाँ स्नान को अश्वमेध-यज्ञ के फल के समान कहा गया है, जिससे यज्ञ का पुण्य तीर्थ-सेवा द्वारा सुलभ बनता है।

परशुरामोत्पत्तिवर्णनम् / Account of the Origins of Paraśurāma’s Line
इस अध्याय में ऋचीक और ‘त्रैलोक्य-सुन्दरी’ कही गई कन्या के विवाह से जुड़ा वंश-निर्माण प्रसंग वर्णित है। विवाह के बाद ऋचीक वरदान देकर ‘चरु-द्वय’ का विधान करता है, ताकि ब्राह्म्य तेज और क्षात्र तेज का भेद बना रहे। वह दोनों चरुओं के साथ प्रतीकात्मक आचरण भी जोड़ता है—एक के लिए अश्वत्थ का आलिंगन, दूसरे के लिए न्यग्रोध का—जिससे विधि और होने वाली संतान के गुणों का संबंध स्पष्ट हो। परन्तु माता की प्रेरणा से चरु-भागों और वृक्ष-आलिंगन की क्रिया में अदला-बदली हो जाती है और विधि-भंग का परिणाम गर्भ-लक्षणों में प्रकट होता है। पत्नी के दोहद और रुचियाँ राजकीय तथा युद्ध-प्रवृत्त हो उठती हैं, तब ऋचीक समझता है कि कर्म उलट गया है। फिर समझौता होता है कि तत्काल जन्म लेने वाला पुत्र ब्राह्मण-स्वरूप ही रहे, पर तीव्र क्षात्र तेज पौत्र में प्रवाहित हो। अंततः जमदग्नि का जन्म होता है और आगे उसी वंश में राम (परशुराम) प्रकट होते हैं; उनका पराक्रम पूर्वकृत अनुष्ठान-तेज और पूर्वजों की दी हुई व्यवस्था का फल बताकर, कर्म-कारण, विधि-शुद्धि और वंश-भाग्य को एक साथ जोड़ा गया है।

विश्वामित्रराज्यपरित्यागवर्णनम् (Viśvāmitra’s Renunciation of Kingship)
सूता विश्वामित्र के जन्म और प्रारम्भिक जीवन का वर्णन करते हैं। वे राजवंश में उत्पन्न हुए; उनकी माता तपस्विनी और तीर्थयात्रा-परायण बताई गई है। पिता गाधि ने उन्हें राज्य पर प्रतिष्ठित किया; विश्वामित्र वेदाध्ययन करते हुए और ब्राह्मणों का सम्मान रखते हुए प्रजा का पालन करते रहे। समय बीतने पर वे वन-शिकार में आसक्त हो गए और एक दिन मध्याह्न में भूख-प्यास से व्याकुल होकर महात्मा वसिष्ठ के पुण्य आश्रम पर पहुँचे। वसिष्ठ ने अर्घ्य-मधुपर्क आदि से उनका सत्कार किया और विश्राम व भोजन का आग्रह किया। राजा को अपनी भूखी सेना की चिंता हुई; तब वसिष्ठ ने कामधेनु नन्दिनी के द्वारा क्षणभर में सैनिकों और पशुओं के लिए अपार अन्न-पान प्रकट कर दिया। यह देखकर विश्वामित्र नन्दिनी को पहले याचना से, फिर बलपूर्वक लेने का प्रयास करते हैं और राजाधिकार का तर्क देते हैं। वसिष्ठ धर्म-स्मृति के अनुसार कामधेनु जैसी गौ को वस्तु बनाकर लेने-देने का निषेध बताते हैं। जब राजपुरुष नन्दिनी को पकड़कर मारते हैं, तब वह शबर, पुलिन्द, म्लेच्छ आदि शस्त्रधारी समूह उत्पन्न कर राजसेना का विनाश कर देती है। वसिष्ठ करुणा से आगे की हिंसा रोकते हैं, राजा की रक्षा करते हैं और मायिक बन्धन से मुक्त कर देते हैं। अपमानित विश्वामित्र समझते हैं कि क्षत्रिय-बल ब्रह्म-बल के सामने अल्प है; वे राज्य त्यागकर पुत्र विश्वसह को गद्दी पर बैठाते हैं और ब्राह्मण-तेज प्राप्त करने हेतु महान तप करने का संकल्प लेते हैं।

धारोत्पत्तिमाहात्म्यवर्णनम् (Origin and Glory of Dhārā in Hāṭakeśvara-kṣetra)
इस अध्याय में हाटकेश्वर-क्षेत्र के अंतर्गत ‘धारा’ देवी की उत्पत्ति और महिमा का वर्णन है। सूत कहते हैं कि विश्वामित्र ने हिमालय में अत्यन्त कठोर तप किया—आकाश में शयन, जल में निवास, पञ्चाग्नि-साधना, क्रमशः उपवास करते-करते अंत में वायु-भक्षण तक। उनके तप से भयभीत इन्द्र ने वर देने का प्रस्ताव रखा, पर विश्वामित्र ने राज्य-ऐश्वर्य आदि सब ठुकराकर केवल ब्राह्मण्य (ब्राह्मणत्व) की ही याचना की, जिससे आध्यात्मिक सिद्धि की श्रेष्ठता प्रकट होती है। ब्रह्मा भी वर देने आते हैं; विश्वामित्र वही एक वर दोहराते हैं। ऋचीक बताते हैं कि विश्वामित्र के ब्रह्मर्षि-भाव के लिए ब्राह्मण-मंत्र और संस्कारित चरु-आहुति पहले से नियोजित थी; इसलिए ब्रह्मा उन्हें ब्रह्मर्षि घोषित करने के अधिकारी हैं। वसिष्ठ क्षत्रिय-जन्म वाले के ब्राह्मण बनने को अनुचित कहकर विवाद करते हैं और अनर्त देश में शङ्खतीर्थ, ब्रह्मशिला तथा सरस्वती के समीप चले जाते हैं। क्रुद्ध विश्वामित्र सामवेद-विधि से अभिचार कर भयंकर कृत्या उत्पन्न करते हैं। वसिष्ठ दिव्यदृष्टि से उसे जानकर अथर्व-मंत्रों से स्तम्भित कर देते हैं; वह केवल उनके शरीर को स्पर्श कर गिर पड़ती है। तब वसिष्ठ उसे शान्त कर चैत्र शुक्ल अष्टमी को उसकी पूजा का विधान करते हैं और भक्तों को वर्षभर रोग-रहित रहने का वर देते हैं। यही शक्ति ‘धारा’ नाम से प्रसिद्ध होकर नागर-पूजा की विशेष परम्परा सहित क्षेत्र-माहात्म्य में प्रतिष्ठित होती है।

धारानामोत्पत्तिवृत्तान्तः तथा धारादेवीमाहात्म्यवर्णनम् (Origin of Dhārā-nāma and the Māhātmya of Dhārā-devī)
ऋषि पूछते हैं कि तुष्टि देने वाली शक्ति का विशेष संबंध नागर समुदाय से क्यों है और वह पृथ्वी पर ‘धारा’ नाम से कैसे प्रसिद्ध हुई। सूत बताते हैं कि चामत्कारपुर में नागरी ब्राह्मणी धारा की तपस्विनी अरुंधती से मित्रता हुई। अरुंधती वसिष्ठ के साथ शंखतीर्थ में स्नान हेतु आईं तो उन्होंने धारा को कठोर तप करते देखा और उसका परिचय व उद्देश्य पूछा। धारा ने अपना नागर वंश, अल्पायु में वैधव्य और शंखेश्वर के माहात्म्य को सुनकर उसी तीर्थ में निवास-व्रत लेने की बात कही। अरुंधती उसे सरस्वती-तट स्थित अपने आश्रम में, जहाँ निरंतर शास्त्र-चर्चा होती है, रहने का निमंत्रण देती हैं। फिर कथा में विश्वामित्र और वसिष्ठ के संघर्ष से जुड़ी एक दिव्य शक्ति का वर्णन आता है, जिसे वसिष्ठ ने स्थिर कर रक्षक देवी के रूप में पूज्य बनाया। धारा ने रत्नों से सुसज्जित प्रासाद-सा मंदिर बनाकर देवी की स्तुति की—उसे जगत् का आधार और लक्ष्मी, शची, गौरी, स्वाहा, स्वधा, तुष्टि, पुष्टि आदि अनेक रूपों वाली कहा। दीर्घकाल तक नित्य पूजा के बाद चैत्र शुक्ल अष्टमी को स्नान-पूजन और नैवेद्यादि अर्पित करने पर देवी प्रकट हुईं, वरदान दिए और उसी मंदिर में ‘धारा’ नाम स्वीकार किया। आचार-विधान बताया गया—जो नागर तीन प्रदक्षिणा करें, तीन फल चढ़ाएँ और स्तोत्र का पाठ करें, उन्हें एक वर्ष तक रोगों से रक्षा मिलती है। स्त्रियों के लिए भी फल कहा गया—वंध्या को संतान, दुर्भाग्य-निवारण, स्वास्थ्य और कल्याण की प्राप्ति। अंत में फलश्रुति है कि इस उत्पत्ति-वृत्तांत का पाठ या श्रवण पापों से मुक्त करता है; विशेषतः नागरों को भक्ति से इसका अध्ययन करना चाहिए।

धारातीर्थोत्पत्तिमाहात्म्यवर्णनम् (Dhārā-tīrtha Origin and Its Sacred Merit)
सूत जी विश्वामित्र और वसिष्ठ के प्रसंग में एक और अद्भुत घटना सुनाते हैं। विश्वामित्र द्वारा वसिष्ठ पर छोड़ी गई शत्रु-शक्ति को वसिष्ठ अथर्वण मंत्र-बल से रोककर शांत कर देते हैं। इसके बाद वसिष्ठ के शरीर से स्वेद उत्पन्न होता है और उसी स्वेद से शीतल, स्वच्छ, पावन जल प्रकट होकर उनके चरणों से बहता हुआ पृथ्वी को भेदकर निर्मल धारा बन जाता है—गंगाजल के समान निष्कलंक तीर्थ। इस धारा-तीर्थ में स्नान करने से संतानहीन कही गई स्त्रियों को भी तत्काल संतान-प्राप्ति का फल बताया गया है, और जो भी स्नान करे उसे समस्त तीर्थों का फल मिलता है। स्नान के बाद देवी का विधिपूर्वक दर्शन करने से धन, धान्य, संतान तथा राजसुख से जुड़ा सौभाग्य प्राप्त होता है। चैत्र शुक्ल अष्टमी की मध्यरात्रि में नैवेद्य और बलि-पिंडिका अर्पण का विधान है; उस पिंडिका को ग्रहण करने या पाने से वृद्धावस्था में भी विशेष सिद्धि-फल की प्रशंसा की गई है। अंत में देवी को अनेक नागर कुलों की कुलदेवी कहा गया है और यात्रा की पूर्णता के लिए नागरों की सहभागिता अनिवार्य बताई गई है।

वसिष्ठविश्वामित्रयुद्धे दिव्यास्त्रनिवर्तनवर्णनम् (Restraint of Divine Weapons in the Vasiṣṭha–Viśvāmitra Conflict)
सूता वसिष्ठ–विश्वामित्र संघर्ष के बढ़ते उग्र रूप का वर्णन करते हैं। अपनी शक्ति निष्फल होने से क्रुद्ध विश्वामित्र दीक्षित दिव्यास्त्रों—यहाँ तक कि ब्रह्मास्त्र—का प्रक्षेप करता है। उससे उल्का-सदृश प्रहार, अस्त्रों की वृद्धि, समुद्रों का कंप, पर्वत-शिखरों का टूटना और रक्त-वृष्टि जैसी घटनाएँ होती हैं, जिन्हें प्रलय-लक्षण माना जाता है। देवगण भयभीत होकर ब्रह्मा के पास जाते हैं; ब्रह्मा बताते हैं कि यह दिव्यास्त्र-युद्ध का दुष्परिणाम है और वे देवों सहित रणभूमि में पहुँचते हैं। ब्रह्मा जगत्-विनाश रोकने हेतु युद्ध-निवृत्ति का आग्रह करते हैं। वसिष्ठ कहते हैं कि वे प्रतिशोध से नहीं, केवल मंत्र-बल से रक्षार्थ आए अस्त्रों को निष्प्रभावी कर रहे हैं। ब्रह्मा विश्वामित्र को अस्त्र-प्रयोग रोकने का आदेश देते हैं और वाणी द्वारा समाधान चाहते हुए वसिष्ठ को ‘ब्राह्मण’ कहकर संबोधित करते हैं। विश्वामित्र का क्रोध मान-सम्मान और मान्यता से जुड़ा है; पर वसिष्ठ उसे क्षत्रिय-जन्मा मानकर ‘ब्राह्मण’ पद नहीं देते और ब्रह्मतेज की श्रेष्ठता प्रतिपादित करते हैं। अंततः ब्रह्मा शाप-भय दिखाकर दिव्यास्त्र त्यागने को बाध्य करते हैं। ब्रह्मा के प्रस्थान के बाद मुनि सरस्वती-तट पर रहते हैं। अध्याय का संदेश संयम, उचित वाणी और विनाशकारी शक्ति को धर्म-सीमा में बाँधने का है।

सारस्वतजलस्य रुधिरत्व-प्रसङ्गः (The Episode of the Sarasvata Water Turning to Blood)
सूत कहते हैं—वसिष्ठ को हानि पहुँचाने के लिए ‘छिद्र’ खोजते हुए विश्वामित्र ने सरस्वती की महान धारा का आवाहन किया। नदी स्त्री-रूप में प्रकट होकर उपदेश पूछती है। विश्वामित्र आदेश देता है कि जब वसिष्ठ स्नान करें, तब तू वेग से बढ़कर उन्हें मेरे निकट ले आ, ताकि मैं उनका वध कर सकूँ। सरस्वती मना करती है—महात्मा वसिष्ठ के प्रति द्रोह नहीं करूँगी; ब्राह्मण-वध अधर्म है। वह धर्मवचन सुनाती है कि ब्राह्मण-हत्या का मन में भी संकल्प हो तो कठोर प्रायश्चित्त चाहिए, और ऐसी हत्या का वचन-समर्थन भी शुद्धिकर्म से ही शुद्ध होता है। क्रोध में विश्वामित्र उसे शाप देता है—मेरी आज्ञा न मानने से तेरा जल रक्त-प्रवाह बन जाएगा। वह सात बार जल का अभिमंत्रण कर उसे नदी में डालता है; तुरंत शंख-श्वेत, परम पुण्यदायी सरस्वती-जल भी रक्त बन जाता है। भूत-प्रेत-निशाचर इकट्ठे होकर पीते और उन्मत्त होते हैं; तपस्वी और स्थानीय लोग भय से दूर चले जाते हैं। वसिष्ठ अरावली के अर्बुद पर्वत की ओर प्रस्थान करते हैं। विश्वामित्र चामत्कारपुर जाकर हाटकॆश्वर-क्षेत्र में घोर तप करता है और सृष्टि-शक्ति में ब्रह्मा के तुल्य होने लगता है। अध्याय का निष्कर्ष यही है कि विश्वामित्र के शाप से सरस्वती का जल रक्त हुआ और चण्डशर्मा आदि ब्राह्मणों ने स्थान-परिवर्तन किया।

सरस्वती-शापमोचनं तथा साभ्रमत्युत्पत्तिवृत्तान्तः (Release of Sarasvatī from the Curse and the Origin Account of Sābhramatī)
अध्याय 173 में ऋषियों के प्रश्न का उत्तर देते हुए सूत बताते हैं कि विश्वामित्र की मंत्र-सिद्धि से जुड़े शाप-प्रभाव के कारण सरस्वती का जल रक्त-सदृश हो गया और वह रक्ता-प्रवाह जैसी प्रतीत होने लगी। पीड़ित सरस्वती वसिष्ठ के पास जाकर अपनी दशा कहती है—उसका प्रवाह रक्तौघ बन गया है, तपस्वी उसे त्याग देते हैं और विघ्नकारी प्राणी वहाँ विचरते हैं। वह प्रार्थना करती है कि उसे फिर से शुद्ध सलिल-रूप में स्थापित किया जाए। वसिष्ठ अपनी शक्ति का आश्वासन देकर प्लक्ष-वृक्ष से चिह्नित स्थान पर समाधि में प्रवेश करते हैं, वरुण-संबंधी मंत्र से पृथ्वी को भेदकर प्रचुर जल प्रकट करते हैं। दो धाराएँ निकलती हैं—एक से सरस्वती पुनः निर्मल होकर वेग से रक्त-दोष को बहा ले जाती है; दूसरी धारा अलग नदी बनकर ‘साभ्रमती’ नाम से प्रवाहित होती है। अंत में फलश्रुति है कि इस सारस्वत-वृत्तांत का पाठ या श्रवण सरस्वती की कृपा से बुद्धि-प्रखरता बढ़ाता है।

Pippalāda-utpatti-varṇana and Kaṃsāreśvara-liṅga Māhātmya (पिप्पलादोत्पत्तिवर्णनं; कंसारेश्वरलिङ्गमाहात्म्यम्)
इस अध्याय में हाटकेश्वर-क्षेत्र के माहात्म्य के अंतर्गत सूत जी प्रश्नोत्तर-रूप तीर्थकथा कहते हैं। वे पिप्पलाद द्वारा स्थापित ‘कंसारेश्वर’ नामक शिवलिंग का परिचय देते हैं और बताते हैं कि इसके दर्शन, नमस्कार और पूजा से क्रमशः पाप-क्षय, अशुद्धि-नाश और महान पुण्य की प्राप्ति होती है। ऋषि पिप्पलाद का परिचय और लिंग-प्रतिष्ठा का कारण पूछते हैं। सूत जी जन्मकथा सुनाते हैं—याज्ञवल्क्य की बहन कंसारी अनजाने में वस्त्र-संबंधी शुक्र-मिश्रित जल के स्पर्श से गर्भवती हो जाती है। लज्जा से वह गुप्त रूप से प्रसव कर अश्वत्थ (पिप्पल) के नीचे शिशु को रखकर रक्षा की प्रार्थना करती है। दिव्यवाणी बताती है कि यह बालक उतथ्य के शाप से बृहस्पति का पृथ्वी पर अवतार है और पिप्पल-रस से पोषण पाने के कारण इसका नाम ‘पिप्पलाद’ होगा। कंसारी लज्जा से प्राण त्याग देती है और बालक पिप्पल के पास ही बढ़ता है। नारद मुनि बालक से मिलकर उसका वृत्तांत बताते हैं और अथर्ववेद-सम्बद्ध साधना/जीवन-मार्ग का संकेत देते हैं। आगे पिप्पलाद के क्रोध से शनैश्चर गिर पड़ता है; नारद के मध्यस्थ होने पर स्तोत्र होता है और धर्मयुक्त नियम तय होते हैं—विशेषतः आठ वर्ष तक के बालकों की रक्षा, तेल-लेपन, दान और पूजा-विधि। अंत में नारद पिप्पलाद को चमत्कारपुर ले जाकर याज्ञवल्क्य को सौंपते हैं; इस प्रकार वंश, स्थान और कंसारेश्वर-लिंग का माहात्म्य जुड़ता है।

याज्ञवल्क्येश्वरोत्पत्तिमाहात्म्यवर्णनम् (Origin and Glory of Yājñavalkyeśvara Liṅga)
इस अध्याय में सूत के कथन के माध्यम से याज्ञवल्क्य और ब्रह्मा का संवाद आता है। याज्ञवल्क्य मन की व्यथा और चित्त-शुद्धि की चाह से ऐसा प्रायश्चित्त पूछते हैं जो आत्मिक स्पष्टता दे। ब्रह्मा उन्हें उपाय बताते हैं—अत्यन्त पुण्यदायक हाटकेश्वर-क्षेत्र में शूलिन शिव का लिङ्ग स्थापित करो; यह क्षेत्र संचित पापों का नाश करने वाला और शुद्धि देने वाला है। यहाँ प्रायश्चित्त का सिद्धान्त स्पष्ट किया गया है कि अज्ञान से हो या जान-बूझकर, पाप का प्रतिकार शिव-मन्दिर निर्माण और लिङ्ग-केन्द्रित उपासना से होता है; जैसे सूर्योदय रात्रि के अन्धकार को दूर कर देता है। कलियुग में अनेक तीर्थों के निष्प्रभाव होने की चिंता भी कही गई है, पर हाटकेश्वर-क्षेत्र को उसका अपवाद बताकर विशेष फलदायी माना गया है। ब्रह्मा के प्रस्थान के बाद याज्ञवल्क्य लिङ्ग की प्रतिष्ठा करते हैं और अष्टमी तथा चतुर्दशी को श्रद्धा सहित लिङ्गाभिषेक (स्नापन) का व्रत घोषित करते हैं, जिससे दोष धुलते हैं और पवित्रता लौट आती है। यही लिङ्ग आगे चलकर हाटकेश्वर-क्षेत्र में “याज्ञवल्क्येश्वर” नाम से प्रसिद्ध होता है।

कंसारीश्वर-उत्पत्तिमाहात्म्य-वर्णनम् (Origin and Glory of Kaṃsārīśvara)
सूता जी एक तीर्थ-उत्पत्ति का प्रसंग सुनाते हैं, जहाँ याज्ञवल्क्य से संबद्ध होकर मातृ-शुद्धि के हेतु एक लिंग की स्थापना होती है। पिप्पलाद मुख्य कर्ता बनकर श्रुति-अध्ययन और यज्ञकर्म में निपुण ब्राह्मणों को बुलाते हैं और बताते हैं कि उनकी माता कंसारी का देहांत हो गया है; उनकी स्मृति में उन्होंने लिंग का अभिषेक-प्रतिष्ठा की है और अब उनके परामर्श से सार्वजनिक मान्यता चाहते हैं। वे गोवर्धन को नागर समाज को नियमित पूजा में प्रवृत्त करने का निर्देश देते हैं—नित्य पूजा से कुल-समृद्धि बढ़ती है और उपेक्षा से हानि होती है। ब्राह्मण सभा देवता का नाम “कंसारीश्वर” निश्चित करती है। आगे पाठ-श्रवण तथा देव-सन्निधि में भक्ति-आचरण के फल बताए गए हैं—अष्टमी और चतुर्दशी को स्नान, नीलरुद्र तथा अन्य रुद्र-मंत्रों का जप, और देवालय में अथर्ववेद का पाठ। इन साधनों से भारी पापों का शमन, राजकीय व प्राकृतिक संकटों में रक्षा, शत्रुओं पर विजय, समय पर वर्षा, रोग-दुःख से राहत और धर्मयुक्त शासन का उदय—ये फल पिप्पलाद की प्रतिज्ञा और क्षेत्र-माहात्म्य के आधार पर घोषित किए गए हैं।

पञ्चपिण्डिकोत्पत्तिमाहात्म्यवर्णनम् (The Māhātmya of the Origin of Pañcapinḍikā)
इस अध्याय में सूत ऋषियों से संवाद के रूप में तीर्थ‑व्रत का विधान बताते हैं। गौरी को “पञ्चपिण्डिका” कहा गया है, जिनकी पूजा ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में, सूर्य के वृष राशि में होने पर, स्त्रियाँ देवी के ऊपर जलयंत्र (जल‑धारा का उपकरण) स्थापित करके करती हैं। इसे अनेक कठिन व्रतों का संक्षिप्त विकल्प और गृहस्थ‑सौभाग्य देने वाला पुण्यकर्म कहा गया है। फिर ऋषि “पाँच पिण्ड” के तात्त्विक आधार के विषय में प्रश्न करते हैं। सूत बताते हैं कि देवी सर्वव्यापिनी पराशक्ति हैं, जो सृष्टि और संरक्षण हेतु पंचतत्त्व—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—के रूप में पाँच प्रकार से प्रकट होती हैं; इस रूप में उपासना से पुण्य कई गुना बढ़ता है। इसके बाद लक्ष्मी काशी के राजा और प्रिय रानी पद्मावती की कथा सुनाती हैं—पद्मावती जल‑स्थल पर मिट्टी से बनी पञ्चपिण्डिका की नित्य पूजा कर सौभाग्य बढ़ाती है, जिससे सह‑पत्नियाँ रहस्य पूछती हैं। पद्मावती पंचतत्त्व‑सम्बद्ध “पञ्च‑मंत्र” बताती है और मरुभूमि‑संकट में रेत से पूजा कर देवी‑कृपा पाती है, फिर समृद्धि प्राप्त करती है। अंत में पंच‑मंत्र (तत्त्व‑नमस्कार) स्पष्ट रूप से दिए गए हैं, हाटकेश्वर‑क्षेत्र में लक्ष्मी की प्रतिष्ठा का उल्लेख है, और फलश्रुति में कहा गया है कि वहाँ पूजा करने वाली स्त्रियाँ पति‑प्रिय और पाप‑मुक्त होती हैं।

Pañcapinḍikā-Gauryutpatti Māhātmya (The Glory of the Emergence of Pañcapinḍikā Gaurī) | पञ्चपिण्डिकागौर्युत्पत्तिमाहात्म्यम्
इस अध्याय में अनेक वाचकों के माध्यम से धर्म-तत्त्व का संवाद है। लक्ष्मी अपनी व्यथा कहती हैं—गौरी-पूजन से राजलक्ष्मी तो मिली, पर संतान न होने से क्लेश बना रहता है। चातुर्मास्य में आनर्त-राजा के भवन पर दुर्वासा मुनि आते हैं; उत्तम आतिथ्य और शुश्रूषा से प्रसन्न होकर वे बताते हैं कि देवता लकड़ी, पत्थर या मिट्टी में अपने-आप नहीं होते, मंत्र से संयुक्त भाव-भक्ति से ही दिव्य सान्निध्य प्रकट होता है। दुर्वासा रात्रि के प्रहरों के अनुसार चार रूपों वाली गौरी की रचना-विन्यास कर धूप, दीप, नैवेद्य, अर्घ्य आदि से पूजन तथा विशेष आवाहन सहित एक नियमबद्ध व्रत बताते हैं; प्रातः ब्राह्मण दंपति को दान और अंत में वाहन-प्रेषण व निक्षेप का समापन-विधान भी कहते हैं। आगे देवी का संशोधन आता है—चारों रूपों का जल में विसर्जन न करें, बल्कि हाटकेश्वर-क्षेत्र में प्रतिष्ठा करें, जिससे स्त्रियों के कल्याण हेतु अक्षय फल मिले। लक्ष्मी वर मांगती हैं—बार-बार मानवी गर्भधारण से मुक्ति और विष्णु के साथ स्थायी एकत्व; फलश्रुति में श्रद्धालु पाठकों के लिए स्थिर लक्ष्मी और दुर्भाग्य-निवारण का आश्वासन है।

Puṣkara-trayotpatti and Yajña-samārambha in Hāṭakeśvara-kṣetra (पुष्करत्रयोत्पत्ति–यज्ञसमारम्भः)
इस अध्याय में सूतजी हाटकेश्वर-क्षेत्र में स्थित ‘पुष्कर-त्रय’ का माहात्म्य बताते हैं। कहा गया है कि इसके दर्शन, स्पर्श या नाम-स्मरण मात्र से पाप वैसे ही नष्ट हो जाता है जैसे सूर्य के उदय से अंधकार मिट जाता है। ऋषि पूछते हैं कि ब्रह्मा-तीर्थ के रूप में प्रसिद्ध पुष्कर यहाँ कैसे प्रकट हुआ। सूतजी नारद और ब्रह्मा के संवाद का वर्णन करते हैं। नारद कलियुग में धर्म-शासन, यज्ञ-परंपरा और सामाजिक मर्यादा के पतन की बात कहते हैं। ब्रह्मा को चिंता होती है कि कलि का प्रभाव पुष्कर को भी दूषित करेगा, इसलिए वे कलि-रहित स्थान में तीर्थ को स्थिर करने का निश्चय करते हैं। वे एक पद्म (कमल) पृथ्वी पर गिराते हैं, जो हाटकेश्वर-प्रदेश में वेदज्ञ, संयमी ब्राह्मणों और तपस्वियों के बीच आकर ठहरता है। कमल तीन बार सरकता है और तीन गर्त बनते हैं, जो निर्मल जल से भरकर ज्येष्ठ, मध्य और कनीयक—तीन पुष्कर-कुण्ड बन जाते हैं। ब्रह्मा क्षेत्र की स्तुति करते हैं, स्नान-फल तथा कार्त्तिक-श्राद्ध का फल (गयाशीर्ष के समान) बताते हैं और यज्ञ की तैयारी आरम्भ करते हैं। वे वायु को आज्ञा देते हैं कि इन्द्र आदि देवगणों को बुलाए; इन्द्र सामग्री और योग्य ब्राह्मण लाते हैं, और ब्रह्मा विधिपूर्वक पूर्ण दक्षिणा सहित यज्ञ सम्पन्न करते हैं।

Brahmayajñopākhyāna: Ṛtvig-vyavasthā, Yajñamaṇḍapa-nirmāṇa, and Deva-sahāya (Chapter 180)
इस अध्याय में ऋषि सूत से ब्रह्मा द्वारा पवित्र क्षेत्र में किए गए अद्भुत यज्ञ के विषय में पूछते हैं—किस देवता का पूजन होता है, कौन-कौन से ऋत्विज किस पद पर नियुक्त हैं, कैसी दक्षिणा दी जाती है, और अध्वर्यु आदि कर्मकर्ताओं की व्यवस्था कैसे होती है। सूत यज्ञ की विधिवत् रूपरेखा और क्रम का वर्णन करते हैं। इन्द्र और शम्भु अपने दिव्य गणों सहित सहायता के लिए आते हैं। ब्रह्मा उनका शास्त्रोक्त आतिथ्य-सत्कार करके उन्हें यज्ञकार्य में दायित्व सौंपते हैं। फिर विश्वकर्मा को यज्ञमण्डप तथा उसके अंग—पत्नीशाला, वेदी, अग्निकुण्ड, पात्र-कप, यूप, पाक-खाइयाँ, विस्तृत ईंट-विन्यास—और हिरण्मय पुरुष की प्रतिमा बनाने की आज्ञा देते हैं। बृहस्पति को सोलह योग्य ऋत्विजों को बुलाने का भार दिया जाता है; ब्रह्मा स्वयं उनकी परीक्षा करके नियुक्ति करते हैं। अंत में सोलह ऋत्विजों और उनके पदों (होता, अध्वर्यु, उद्गाता, अग्नीध्र, ब्रह्मा आदि) की सूची दी जाती है और ब्रह्मा दीक्षा तथा यज्ञारम्भ में उनके सहयोग की विनम्र प्रार्थना करते हैं।

गायत्रीतीर्थमाहात्म्यवर्णनम् (Gayatrī-tīrtha Māhātmya: The Glory and Origin of Gayatrī Tīrtha)
अध्याय 181 में हाटकेश्वर-क्षेत्र के भीतर कर्म-अधिकार को लेकर धर्म-न्याय का विवाद आता है। नागर ब्राह्मण, अपने परंपरागत याज्ञिक अधिकार की रक्षा हेतु, मध्यमग को दूत बनाकर पद्मज ब्रह्मा के पास भेजते हैं, क्योंकि ब्रह्मा ने स्थानीय नागरों को छोड़कर बाहरी ऋत्विजों से यज्ञ आरम्भ किया था। नागर कहते हैं कि उन्हें वंचित करके किया गया यज्ञ/श्राद्ध निष्फल है; यह अधिकार-सीमा पूर्व के क्षेत्र-दान में निश्चित की गई थी। ब्रह्मा विनयपूर्वक त्रुटि स्वीकार कर नियम स्थापित करते हैं—इस क्षेत्र में नागरों को छोड़कर किया गया कर्म फलहीन होगा, और नागर यदि क्षेत्र के बाहर कर्म करें तो वह भी निष्फल होगा; इस प्रकार परस्पर अधिकार-व्यवस्था बनती है। फिर कथा यज्ञ-समाप्ति की तात्कालिकता पर आती है। सावित्री के विलम्ब से नारद और फिर पुलस्त्य उन्हें बुलाने जाते हैं; समय कम होने पर इन्द्र एक गोप-कन्या को लाते हैं, जिसे विधिपूर्वक संस्कारित कर ब्रह्मा के विवाह योग्य बनाया जाता है। रुद्र आदि देवता और ब्राह्मण उसे ‘गायत्री’ रूप में मान्यता देकर विवाह सम्पन्न कराते हैं, ताकि यज्ञ पूर्ण हो सके। अंत में तीर्थ-फलश्रुति है—यह स्थान मंगल और समृद्धि देने वाला है; यहाँ पाणिग्रहण, पिण्डदान और कन्यादान आदि करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है।

रूपतीर्थोत्पत्तिपूर्वकप्रथमयज्ञदिवसवृत्तान्तवर्णनम् (Origin of Rūpatīrtha and the Account of the First Day of the Sacrifice)
इस अध्याय में यज्ञ-परिसर की एक दिव्य घटना का वर्णन है। ब्रह्मा गायत्री के साथ यज्ञशाला में आते हैं और मानव-भाव धारण कर दण्ड, अजिन, मेखला तथा मौन-व्रत आदि वैदिक चिह्नों सहित यज्ञ की तैयारी कराते हैं। प्रवर्ग्य के समय जाल्म नाम का नग्न, कपालधारी तपस्वी अन्न माँगता है; अस्वीकार होने पर उसका कपाल फेंक दिया जाता है, पर वह अद्भुत रीति से अनेक हो कर पूरे यज्ञ-मण्डप को भर देता है और यज्ञ में विघ्न डालता है। ब्रह्मा ध्यान से समझते हैं कि इसमें शैव तत्त्व है और वे महेश्वर की शरण लेते हैं। शिव कहते हैं कि कपाल उनका प्रिय पात्र है और यज्ञ में रुद्र के लिए आहुति न होने से यह बाधा हुई; वे आदेश देते हैं कि कपाल के माध्यम से रुद्र को समर्पित आहुतियाँ दी जाएँ, तब यज्ञ पूर्ण होगा। ब्रह्मा भविष्य के यज्ञों में शतरुद्रीय-पाठ तथा मिट्टी के कपालों में रुद्रार्पण स्वीकार करते हैं, और शिव वहीं कपालेश्वर रूप में क्षेत्र-रक्षक होकर प्रकट होते हैं। फिर फलश्रुति आती है—ब्रह्मा के तीन कुण्डों में स्नान और लिङ्ग-पूजन से उच्च आध्यात्मिक फल मिलता है; कार्त्तिक शुक्ल चतुर्दशी की रात्रि-जागरण से जन्मजन्य दोषों से मुक्ति होती है। दक्षिण-पथ से आए ऋत्विज-मुनि मध्याह्न की तपन के बाद निकट के जल में स्नान करते हैं; उनके विकृत रूप सुन्दर हो जाते हैं, इसलिए वे उस स्थान का नाम ‘रूपतीर्थ’ रखते हैं और बताते हैं कि यहाँ स्नान से जन्म-जन्मान्तर में सौन्दर्य, पितृकर्म की वृद्धि और दान से राजसमृद्धि प्राप्त होती है। अंत में वे लौटकर रात भर यज्ञ-विधि पर शास्त्रीय चर्चा करते हैं—देवता-समर्पण की सही पहचान से ही यज्ञ-व्यवस्था सुरक्षित रहती है।

Nāgatīrthotpatti-māhātmya (Origin and Significance of Nāgatīrtha)
इस अध्याय में बहुदिवसीय यज्ञ के बीच एक विघ्न का वर्णन है। एक युवा तपस्वी ब्रह्मचारी (बटु) खेल-खेल में एक निरविष जल-सर्प को यज्ञसभा में फेंक देता है, जिससे ऋत्विजों में भय और अफरा-तफरी मच जाती है। वह सर्प होतृ (या मुख्य कर्मकर्ता) के चारों ओर लिपट जाता है; क्रोध में शाप उच्चरित होता है और बटु स्वयं सर्पत्व से ग्रस्त हो जाता है—यज्ञ-मर्यादा भंग और अनजाने कर्मफल की पुराणोक्त शिक्षा प्रकट होती है। पीड़ित बटु भृगु के पास शरण लेता है; भृगु करुणा से बताते हैं कि सर्प निरविष था और दण्ड असंगत रूप से कठोर हो गया। तभी ब्रह्मा प्रकट होकर इस घटना को दैवी योजना के रूप में स्थापित करते हैं—बटु का सर्प-रूप पृथ्वी पर नवम नाग-वंश की उत्पत्ति का बीज बनेगा, और वे नाग मंत्र व औषध-विद्या के साधकों के लिए अहितकारी नहीं होंगे। हाटकेश्वर क्षेत्र में एक सुंदर जल-स्रोत को ‘नागतार्थ’ घोषित किया जाता है। श्रावण कृष्णपक्ष की पंचमी (और भाद्रपद का भी संकेत) को वहाँ स्नान-पूजन का विधान है; इससे सर्प-भय का नाश, विषपीड़ितों को शान्ति, दुर्भाग्य-निवारण और संतान-प्राप्ति जैसे शुभ फल बताए गए हैं। वासुकि, तक्षक, पुण्डरीक, शेष, कालिय आदि प्रमुख नागों का समागम वर्णित है; ब्रह्मा उन्हें यज्ञ-रक्षा का दायित्व देते हैं और नागतीर्थ में उनके आवधिक सम्मान की स्थापना करते हैं। माहात्म्य के श्रवण, पाठ, लेखन और धारण से भी संरक्षण-फल मिलता है; जहाँ यह ग्रंथ सुरक्षित रखा जाए, वहाँ अभय की सिद्धि कही गई है।

पिंगलोपाख्यानवर्णनम् | Piṅgalā-Upākhyāna (Narrative of Piṅgalā) on the Third Day of the Brahmayajña
इस अध्याय में ब्रह्मयज्ञ के तृतीय दिवस पर यज्ञमण्डप का दृश्य है, जहाँ ऋत्विज अपने-अपने कर्म में लगे हैं। पका अन्न, घृत और दुग्ध की प्रचुरता तथा दान हेतु धन-सम्पदा की बहुलता से यज्ञ की समृद्धि प्रकट होती है; इसी वातावरण में उच्च ज्ञान की जिज्ञासा भी जागती है। तभी त्रिकालदर्शी-सा एक ज्ञानी अतिथि आता है, उसका सत्कार होता है और पुरोहित उसके अद्भुत विवेक का कारण पूछते हैं। अतिथि अपने जीवन का वृत्तान्त कहकर बताता है कि उसने छह “गुरु” देखे—पिंगला वेश्या, कुरर पक्षी, सर्प, सारंग मृग, बाण बनाने वाला इषुकार और एक कन्या। उसका संदेश है कि केवल एक मानव-आचार्य से ही नहीं, बल्कि प्राणियों के आचरण का सूक्ष्म निरीक्षण और मनन करने से भी ज्ञान उत्पन्न होता है। पिंगला का उपदेश मुख्य है—आशा-बँधी तृष्णा से दुःख बढ़ता है, अपेक्षा छोड़ने से शान्ति मिलती है; वह व्यर्थ की प्रतीक्षा और दिखावे को त्यागकर संतोष से सोती है। कथावाचक भी वैराग्य अपनाकर बताता है कि अन्तःशान्ति से शरीर को भी लाभ होता है—विश्राम, पाचन और बल। अंत में नीति दी जाती है कि प्राप्ति से इच्छा बढ़ती जाती है, इसलिए दिन में ऐसा आचरण करो कि रात को निश्चिन्त, निर्विघ्न निद्रा मिले।

अतिथ्य-पूजा, वैराग्योपदेशः, यज्ञपुरुष-स्मरणविधिः (Hospitality Worship, Instruction in Renunciation, and the Protocol of Remembering Yajñapuruṣa)
इस अध्याय में अतिथि-रूप तपस्वी ब्राह्मणों के बीच अपनी शिक्षाप्रद आत्मकथा सुनाता है। वह बताता है कि धन-आसक्ति से समाज में तिरस्कार, झगड़े और मन की थकान बढ़ती है। कुरर (ओस्प्रे) से वह सीखता है कि जिस वस्तु के लिए संघर्ष होता है, उसे छोड़ देने से कलह शांत हो जाता है; इसलिए वह अपना धन स्वजनों में बाँटकर शांति पाता है। फिर सर्प से वह समझता है कि घर बनाना और संपत्ति को ‘मेरा’ मानना बंधन और दुःख का कारण है; वह सच्चे यति के लक्षण—सीमित निवास, मधुकरी भिक्षा, समभाव—और संन्यास-भ्रंश के कारण भी बताता है। भ्रमर से वह अनेक शास्त्रों से ‘सार’ ग्रहण करने की रीति सीखता है, और बाण बनाने वाले (इषुकार) से एकाग्रता को ब्रह्म-ज्ञान का द्वार मानता है। वह भीतर स्थित सूर्य-स्वरूप/विश्व-रूप तत्त्व में मन को स्थिर करता है। कन्या की चूड़ियों के उदाहरण से वह जानता है कि बहुतों का संग शोर करता है, दो भी टकराते हैं, पर एक चूड़ी निःशब्द रहती है—इससे वह एकाकी विचरण और गहन ज्ञान का उपदेश देता है। आगे सूत-प्रसंग में देवता और ऋषि आते हैं, वर देते हैं और यज्ञ-भाग के बिना देवता-प्राप्ति पर विवाद उठता है। महादेव नियम स्थापित करते हैं कि भविष्य के श्राद्धों (दैव/पितृ कर्म) के अंत में यज्ञपुरुष—हरि-स्वरूप—का आवाहन और पूजन अवश्य हो; अन्यथा कर्म निष्फल हो जाता है। अतिथि हाटकेश्वर-क्षेत्र में अपने तीर्थ का निर्देश करता है और कहता है कि अङ्गारक-युक्त चतुर्थी को वहाँ स्नान करने से समस्त तीर्थों का फल मिलता है। अंत में यज्ञ आरंभ हेतु विधिपूर्वक तैयारी का वर्णन होता है।

अतिथिमाहात्म्यवर्णनम् (Atithi-māhātmya: Theological Discourse on the Glory of Hospitality)
इस अध्याय में ऋषि गृहस्थ के अतिथि‑कृत्य से जुड़े परम माहात्म्य का विस्तृत वर्णन पूछते हैं। सूत कहते हैं कि अतिथि‑सत्कार गृहस्थ‑धर्म का सर्वोच्च अंग है; अतिथि का अपमान धर्म का नाश और पाप की वृद्धि करता है, जबकि सम्मान पुण्य की रक्षा और मन की स्थिरता देता है। अतिथियों के तीन भेद बताए गए हैं—श्राद्धीय (श्राद्ध के समय आने वाला), वैश्वदेवीय (वैश्वदेव‑काल में आने वाला) और सूर्योध (भोजन के बाद या रात्रि में आने वाला)। इनके लिए यथोचित स्वागत, आसन, अर्घ्य‑पाद्य और भोजन का विधान है; कुल‑गोत्र की कठोर पूछताछ न करके यज्ञोपवीत आदि लक्षण देखकर श्रद्धा से अन्न देना चाहिए। अतिथि की तृप्ति को देवताओं और विश्व‑तत्त्वों की तृप्ति के समान बताया गया है। अंत में प्रतिपादित है कि गृहस्थ के नैतिक जीवन में अतिथि समग्र दिव्य उपस्थिति का प्रतीक है।

राक्षसप्राप्यश्राद्धवर्णनम् (Account of Śrāddha Offerings Accruing to a Rākṣasa)
सूता चौथे दिन के यज्ञ का प्रसंग सुनाते हैं। प्रास्तातृ ने होम के लिए पशु का गुड़-भाग अलग रखा था; भूख से व्याकुल एक युवा ब्राह्मण ने उसे खा लिया। इससे हवि दूषित हुई और यज्ञ में विघ्न पड़ गया। क्रुद्ध प्रास्तातृ के शाप से वह युवक विकृत रूप वाला राक्षस बन गया; ऋत्विजों ने रक्षा-मंत्रों और देव-प्रार्थनाओं से यज्ञ की रक्षा की। वह राक्षस पुलस्त्यपुत्र विश्वावसु के रूप में पहचाना जाता है। वह लोकपितामह ब्रह्मा की शरण में जाकर स्वीकार करता है कि यह कर्म अज्ञानवश नहीं, पर इच्छा-प्रेरित होकर हो गया। ब्रह्मा यज्ञ-सिद्धि हेतु शाप हटाने की प्रार्थना करते हैं, पर प्रास्तातृ अपने वचन को अटल बताकर शाप वापस नहीं लेते। तब एक समझौता होता है—विश्वावसु को चामत्कारपुर के पश्चिम में स्थान दिया जाता है, अन्य दुष्ट प्राणियों पर अधिकार देकर नागर के कल्याण हेतु नियामक-रक्षक के रूप में स्थापित किया जाता है। आगे बताया जाता है कि जो श्राद्ध दक्षिणा-रहित, तिल-दर्भ-हीन, अपात्र, अशौच/अशुद्ध, अपवित्र पात्र में, अकाल या विधि-विरुद्ध किया जाए, वह राक्षस का “भाग” बनता है—यह श्राद्ध-विधि की शुद्धता का चेतावनी-सूची है।

औदुम्बरी-माहात्म्यं तथा मातृगण-गमनं सावित्रीदत्त-शापवर्णनम् (Audumbarī’s Mahatmya; the arrival of the Mothers; Savitrī’s curse)
इस अध्याय में वैदिक यज्ञ-परिसर का सजीव चित्रण है—सदस्, ऋत्विजों का चयन, होम-क्रम, अध्वर्यु के निर्देश और उद्गाता की सामगान-संबद्ध क्रियाएँ। इसी बीच गन्धर्व पर्वत की पुत्री, जाति-स्मरा औदुम्बरी, सामगान से आकृष्ट होकर शङ्कु-चिह्नित यज्ञ-विधि को देखकर सभा में आती है। वह उद्गाता की त्रुटि बताकर दक्षिणाग्नि में तत्काल होम कराने का आदेश देती है और बताती है कि यज्ञ में सूक्ष्म विधि-पालन ही रक्षक और अनिवार्य है। संवाद में उसका पूर्व शाप प्रकट होता है—तान/मूर्च्छना आदि संगीत-भेदों पर उपहास करने से नारद ने उसे मनुष्य-जन्म का शाप दिया; मुक्ति की शर्त यह है कि पितामह-यज्ञ के निर्णायक क्षण में वह वचन बोले और ‘समस्त देवों की सभा’ में उसकी पहचान स्वीकार हो। औदुम्बरी एक स्थायी नियम माँगती है—आगामी यज्ञों में सदस् के मध्य उसकी प्रतिमा स्थापित हो, और शङ्कु-ग्रहण/प्रवर्तन से पहले उसकी पूजा हो। देवगण और उद्गाता इसे बाध्यकारी विधान मानकर स्वीकार करते हैं तथा फल-श्रुति बताते हैं कि फल, वस्त्र, आभूषण, गन्ध-अनुलेपन आदि अर्पित करने से पुण्य अनेकगुणा होता है। फिर नगर की स्त्रियाँ श्रद्धा और जिज्ञासा से आकर उसकी पूजा करती हैं; उसके मानवीय माता-पिता भी आते हैं, पर वह अपने दिव्य भाग्य की रक्षा हेतु उन्हें साष्टाङ्ग प्रणाम से रोक देती है। आगे विशाल देव-सभा और छियासी मातृगण आते हैं, स्थान और मान की याचना करते हैं। पद्मज ब्रह्मा एक ‘नागर-जन्मा’ विद्वान प्रतिनिधि से प्रत्येक समूह को क्षेत्रानुसार आसन/सीमा बाँटने को कहते हैं, जिससे दिव्य आगमन व्यवस्थित पवित्र भूगोल में बदल जाता है। तभी सावित्री, सम्मान-वितरण में उपेक्षा अनुभव कर, शाप देती है—मातृगण की गति सीमित होगी, ऋतु-वैषम्य की पीड़ा सहनी होगी, और नगरों में न पूजा मिलेगी न भवन। इस प्रकार अध्याय यज्ञ-विधि की शुद्धता, औदुम्बरी-प्रतिष्ठा का विधान, देवसमूहों का प्रशासनिक स्थापन, और मान-सम्मान के असंतुलन से उत्पन्न शाप-परिणाम की चेतावनी देता है।

औदुम्बर्युत्पत्तिपूर्वकतत्प्राग्जन्मवृत्तान्तवर्णनम् (Origin of Audumbarī and Account of Prior Birth; Hāṭakeśvara-kṣetra Māhātmya)
इस अध्याय में शापग्रस्त गन्धर्व-स्त्रियाँ, जो रात में नृत्य-गीत से ही जीवन चलाती हैं और समाज में तिरस्कृत हैं, देवी औदुम्बरी के पास विलाप करती हुई कल्याण का उपाय पूछती हैं। देवी सावित्री के शाप की अटलता स्वीकार कर उसे रक्षात्मक वरदान के रूप में समझाती हैं—वे स्त्रियाँ ‘अड़सठ गोत्रों’ में नियत होकर रहेंगी और स्थान-विशेष की विधिवत पूजा से उन्हें मान्यता प्राप्त होगी। फिर नगर-देवालय की एक परम्परा बताई जाती है—जिस घर में मण्डप से सम्बन्धित विशेष समृद्धि-वृद्धि हो, उसे नियत अर्पण/व्रत करना चाहिए। नगर-द्वार पर स्त्रियों का एक विशेष कर्म, हँसी-हावभाव सहित और बलि-सदृश अर्पणों के साथ, करने का विधान है; इससे यज्ञ-भाग के समान तृप्ति मिलती है, और उपेक्षा करने पर संतान-हानि, रोग आदि अनिष्ट बताए गए हैं। इसके बाद कथा देवशर्मा और उसकी पत्नी की ओर मुड़ती है, जहाँ नारद के पूर्व शाप से औदुम्बरी के मानुष-देह में अवतरण और उसके कारण से देवी की उपस्थिति व अनुष्ठान-अधिकार का उद्गम समझाया जाता है। अंत में उत्सव और अवभृथ-स्नान का वर्णन कर क्षेत्र को सर्वतीर्थमय कहा गया है तथा विशेषतः पूर्णिमा के दिन, खासकर स्त्रियों द्वारा किए गए व्रतों का अद्भुत फल प्रतिपादित किया गया है।

ब्रह्मयज्ञावभृथ-यक्ष्मतीर्थोत्पत्ति-माहात्म्य (Brahmā’s Yajña-Avabhṛtha and the Origin-Glory of the Yakṣmā Tīrtha)
इस अध्याय में सूत जी के मुख से गूढ़ धर्म-तत्त्व का वर्णन आता है। हाटकेश्वर-क्षेत्र में एक ब्राह्मण पाँच रातों का पञ्चरात्र-व्रत पूर्ण करके, कलियुग में कर्म-दूषण के भय से भूमि के उद्धार हेतु कौन-सा दान/अर्पण हो—यह जानने के लिए नागर ब्राह्मणों से पूछता है। तब ब्रह्मा तीर्थों की लोक-स्थिति बताते हैं—नैमिष पृथ्वी पर, पुष्कर अन्तरिक्ष में, और कुरुक्षेत्र तीनों लोकों में व्याप्त; तथा कार्त्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक पुष्कर का पृथ्वी पर सुलभ सान्निध्य होता है। श्रद्धा से किया गया स्नान और श्राद्ध अक्षय फल देने वाला कहा गया है। फिर यज्ञ-समापन का प्रसंग आता है। पुलस्त्य ऋषि आकर विधि की शुद्धता की पुष्टि करते हैं और वरुण-संबंधी समापन कर्म, विशेषतः अवभृथ-स्नान, का विधान बताते हैं—उस समय तीर्थों का संगम होता है और सहभागी शुद्ध हो जाते हैं। भीड़ अधिक होने पर ब्रह्मा इन्द्र को आदेश देते हैं कि बाँस में बँधी मृगचर्म को जल में डालकर स्नान-काल का संकेत करें; इन्द्र वार्षिक राजकीय पुनरावृत्ति की याचना करता है, जिससे स्नान करने वालों की रक्षा, विजय और वर्षभर के पाप का क्षय हो। अंत में यक्ष्मा नामक रोग-देवता ब्रह्मा से निवेदन करता है कि यज्ञ-फल के लिए ब्राह्मण-संतोष अनिवार्य है, अतः उसे भी विधि में स्थान मिले। ब्रह्मा अग्निहोत्री गृहस्थों के लिए वैश्वदेव के अंत में बलि-नियम स्थापित करते हैं और कारण बताते हैं कि इस नागर-परिसर में यक्ष्मा का उद्भव नहीं होगा। इस प्रकार यह अध्याय तीर्थोत्पत्ति-माहात्म्य और आचार-नियम दोनों का प्रतिपादन करता है।

सावित्र्या यज्ञागमनकालिकोत्पाताद्यपशकुनोद्भववर्णनम् | Savitrī’s Journey to the Sacrifice and the Arising of Omens
ऋषियों ने सूत से पूछा कि पहले सावित्री और गायत्री का उल्लेख किस कारण हुआ, यज्ञ में पत्नी-रूप से गायत्री का संबंध कैसे बना, और सावित्री यज्ञ-मण्डप की ओर जाकर पत्नীशाला में कैसे प्रविष्ट हुई। सूत ने कहा—पति की स्थिति समझकर सावित्री ने अपना संकल्प दृढ़ किया और गौरी, लक्ष्मी, शची, मेधा, अरुन्धती, स्वधा, स्वाहा, कीर्ति, बुद्धि, पुष्टि, क्षमा, धृति आदि दिव्य पत्नियों तथा घृताची, मेनका, रम्भा, उर्वशी, तिलोत्तमा आदि अप्सराओं को साथ लेकर चल पड़ी। गन्धर्वों और किन्नरों के गीत-वाद्य के साथ आनंदपूर्वक जाते हुए सावित्री को बार-बार अपशकुन और उत्पात दिखे—दाहिनी आँख का फड़कना, पशुओं का अशुभ चलना, पक्षियों की उलटी बोली, और शरीर में निरंतर स्फुरण; इससे उसके मन में व्याकुलता बढ़ती गई। पर साथ चल रही देवियाँ परस्पर गायन-नृत्य की प्रतिस्पर्धा में मग्न थीं, इसलिए सावित्री के भीतर उठती आशंका को न समझ सकीं। इस प्रकार यह अध्याय यज्ञ-यात्रा के उत्सव के बीच शकुन-उत्पात की पुराणोक्त संकेत-व्यवस्था दिखाकर, धर्म-विवेक और भाव-तनाव को उभारता है।

सावित्रीमाहात्म्यवर्णनम् (Sāvitrī Māhātmya: The Glory of Sāvitrī at Hāṭakeśvara-kṣetra)
अध्याय 192 हाटकेश्वर-क्षेत्र में सावित्री के माहात्म्य की तीर्थ-कथा प्रस्तुत करता है। नारद मंगल-ध्वनियों के बीच वहाँ आते हैं और अपनी जननी को भाव-विभोर होकर प्रणाम करते हैं। फिर यज्ञ में एक गोप-कन्या को वैकल्पिक वधू के रूप में लाया जाता है; उसका नाम गायत्री रखा जाता है और जनसमूह के वचनों से उसे ‘ब्राह्मणी’ कहकर प्रतिष्ठित किया जाता है। इसी बीच सावित्री यज्ञ-मण्डप में पहुँचती हैं; देवता और ऋत्विज भय व लज्जा से मौन हो जाते हैं। सावित्री यज्ञ-आचार की त्रुटि और धर्म-सामाजिक अव्यवस्था पर दीर्घ उपदेशात्मक आरोप लगाती हैं और ब्रह्मा (विधि), गायत्री तथा अनेक देवों-पुरोहितों को शाप देती हैं—जिनसे आगे चलकर पूजा-हानि, दुर्भाग्य, बन्धन और यज्ञ-फल का क्षय होने का कारण बताया जाता है। इसके बाद सावित्री प्रस्थान करती हैं और पर्वत-ढाल पर अपना पावन पदचिह्न छोड़ती हैं, जो पाप-हर तीर्थ-चिह्न बन जाता है। पौर्णिमा को पूजन, स्त्रियों द्वारा दीप-दान (निश्चित शुभ-फल), भक्ति-नृत्य-गीत से शुद्धि, फल-अन्न का दान, अल्प सामग्री से श्राद्ध (गया-श्राद्ध तुल्य पुण्य) तथा सावित्री के सम्मुख जप से संचित पाप-नाश का विधान कहा गया है। अंत में चमत्कारपुर जाकर देवी-पूजन की प्रेरणा और पाठ-श्रवण से शुद्धि व कल्याण की फलश्रुति दी गई है।

गायत्रीवरप्रदानम् (Gayatrī’s Bestowal of Boons and the Reframing of Curses)
अध्याय 193 प्रश्नोत्तर के रूप में चलता है। ऋषि सूत से पूछते हैं कि सावित्री क्रोध में चली गईं और शाप दे गईं, तो उसके बाद क्या हुआ, और शाप-बद्ध होने पर भी देवता यज्ञ-सभा में कैसे टिके रहे। सूत कहते हैं कि तब गायत्री उठीं और बोलीं—सावित्री के वचन की सत्ता अटल है; उसे न देव बदल सकते हैं, न असुर। सावित्री को परम पतिव्रता और ज्येष्ठ देवी कहकर उनकी वाणी के बंधन का औचित्य बताया जाता है। फिर गायत्री शापों को सत्य मानते हुए भी एक पूरक व्यवस्था देती हैं। ब्रह्मा की पूजा और यज्ञ में उनकी केंद्रीयता स्थापित होती है—ब्रह्म-स्थानों में ब्रह्मा के बिना कर्म पूर्ण नहीं होता; ब्रह्मा-दर्शन, विशेषकर पर्व-तिथियों पर, अनेकगुणा पुण्य देता है। आगे भविष्य-कथा में विष्णु के आगामी अवतार, द्विरूप और सारथी-सेवा, इन्द्र का कारावास और ब्रह्मा द्वारा मुक्ति, अग्नि का शोधन और पुनः पूज्य होना, तथा शिव के विवाह-क्रम का परिवर्तन बताकर अंत में हिमाचल-पुत्री गौरी को श्रेष्ठ पत्नी कहा जाता है। इस प्रकार पुराण-नीति दिखती है—शाप धर्मतः मान्य रहते हैं, पर वरदान, नियोजन और तीर्थ-पूजा से जुड़े पुण्य-नियमों द्वारा उन्हें नैतिक व कर्मकाण्डीय रूप से समाहित किया जाता है।

हाटकेश्वरक्षेत्रे कुमारिकातीर्थद्वय–गर्तस्थ–सिद्धिपादुकामाहात्म्यम् (Hāṭakeśvara-kṣetra: The Glory of the Two Kumārīkā Tīrthas and the Hidden Siddhi-Pādukā for Attaining Brahma-jñāna)
इस अध्याय में सूत संवाद के रूप में तत्त्वोपदेश करते हैं। आरम्भ में देव-ऋषियों की सम्मति से यह प्रतिज्ञा कही जाती है कि जो मनुष्य पहले ब्रह्मा की पूजा करके फिर देवी की आराधना करते हैं, वे परम पद को प्राप्त होते हैं; और जो स्त्रियाँ श्रद्धापूर्वक गायत्री को नमस्कार आदि करती हैं, उन्हें सौभाग्य, उत्तम विवाह और गृहस्थ-सुख जैसे लौकिक फल भी मिलते हैं। फिर ऋषि ब्रह्मा, विष्णु और शंकर की आयु-सीमा के विषय में प्रश्न उठाकर काल-गणना का स्पष्टीकरण चाहते हैं। सूत त्रुटि, लव आदि सूक्ष्म मानों से लेकर दिन-मास-ऋतु-वर्ष तक का क्रम, तथा मनुष्य-वर्षों में युगों की अवधि बताते हैं। वे देवताओं के ‘दिन’ और ‘वर्ष’ का मान, ब्रह्मा-विष्णु-शिव की आयु-परिमिति, और निःश्वास-उच्छ्वास की गणना द्वारा सदाशिव के ‘अक्षय’ स्वरूप का संकेत करते हैं। ऋषि शंका करते हैं कि जब महान देवता भी काल-पर्यन्त समाप्त होते हैं, तो अल्पायु मनुष्य मोक्ष की बात कैसे करें? सूत अनादि, संख्या-से परे काल-तत्त्व का प्रतिपादन करते हुए कहते हैं कि श्रद्धा और साधना से उत्पन्न ब्रह्मज्ञान द्वारा असंख्य जीव, देवता सहित, मुक्ति को प्राप्त हुए हैं। वे स्वर्ग देने वाले यज्ञों को पुनरावृत्ति-जनक और ब्रह्मज्ञान को पुनर्जन्म-नाशक बताते हैं, तथा जन्म-जन्मान्तर में ज्ञान-संचय की क्रमिक वृद्धि समझाते हैं। अन्त में वे पिता से प्राप्त व्यावहारिक उपदेश सुनाते हैं—हाटकेश्वर-क्षेत्र में दो कुमारियों (एक ब्राह्मणी, एक शूद्री) द्वारा स्थापित दो शुभ तीर्थ हैं। अष्टमी और चतुर्दशी को वहाँ स्नान करके गर्त में स्थित प्रसिद्ध, गुप्त सिद्धि-पादुका की पूजा करने से, एक वर्ष के व्रत के अन्त में ब्रह्मज्ञान का उदय होता है। ऋषि इस विधान को स्वीकार कर अनुष्ठान का संकल्प करते हैं।

छान्दोग्यब्राह्मणकन्यावृत्तान्तवर्णनम् (Narrative of the Chāndogya Brāhmaṇa’s Daughter)
अध्याय 195 में ऋषि पहले बताए गए दो पात्रों—शूद्री और ब्राह्मणी—तथा हाटकेश्वर-क्षेत्र में स्थित ‘अतुलनीय तीर्थ-युगल’ के उद्गम, निर्माण और ‘पादुका’ से जुड़ी प्रकट-परंपरा के विषय में पूछते हैं। सूत उत्तर देते हुए नागर समुदाय के चांदोग्य नामक ब्राह्मण का परिचय कराते हैं, जो सामवेद में निपुण और गृहस्थ-धर्म में प्रतिष्ठित है। वृद्धावस्था में उसके यहाँ शुभ लक्षणों वाली कन्या जन्म लेती है; उसका नाम ब्राह्मणी रखा जाता है और उसके जन्म से घर में तेज और आनंद फैलता है। साथ ही रत्नवती नाम की एक अन्य कन्या का भी उल्लेख आता है, जिसका वर्णन भी प्रकाशमय उपमानों से किया गया है। दोनों सखियाँ इतनी घनिष्ठ हो जाती हैं कि साथ भोजन करतीं, साथ विश्राम करतीं और अलग होना असह्य मानतीं। जब विवाह की बात उठती है तो वियोग-भय से ब्राह्मणी संकट में पड़ जाती है; वह सखी के बिना विवाह स्वीकार नहीं करती और बलपूर्वक भेजे जाने पर आत्महानि की धमकी देती है, जिससे विवाह का प्रश्न उसकी इच्छा और संबंध-धर्म के प्रश्न में बदल जाता है। माता उपाय सुझाती है कि रत्नवती का विवाह भी उसी गृह-सम्बन्ध में कर दिया जाए, पर चांदोग्य सामाजिक मर्यादा का हवाला देकर इसे निंदनीय बताकर अस्वीकार कर देता है। इस प्रकार समाज-नियम, माता-पिता का अधिकार, कन्या का व्रत और सख्य-रक्षा—इन सबका संघर्ष आगे तीर्थ-वृत्तान्त की पृष्ठभूमि बनता है।

Bṛhadbala’s Journey to Anarteśa’s City (Dāśārṇādhipati–Anarteśa Alliance Narrative)
सूत जी बताते हैं कि अनर्त देश के राजा ने अपनी पुत्री रत्नवती को यौवन में पहुँची और अनुपम सौंदर्य से युक्त देखकर कन्यादान के धर्म पर विचार किया। वह चेतावनी देता है कि किसी कार्य-साधन के लोभ से अयोग्य वर को कन्या देना बड़ा दोष है और उससे अनिष्ट फल होता है। योग्य वर न मिलने पर राजा ने प्रसिद्ध चित्रकारों को पृथ्वी भर में भेजा कि वे युवा, कुलीन और गुणवान राजाओं के चित्र बनाकर लाएँ, ताकि रत्नवती मर्यादा के अनुसार स्वयं उचित वर चुन सके और पिता का दोष न्यून रहे। चित्रों में दाशार्ण के राजा बृहद्बल को सर्वथा योग्य माना गया। तब अनर्त नरेश ने दूत द्वारा बृहद्बल को विवाह का औपचारिक संदेश भेजा और परमसुंदरी, यशस्विनी रत्नवती का हाथ देने का प्रस्ताव रखा। प्रस्ताव सुनकर बृहद्बल प्रसन्न हुआ और चतुरंगिणी सेना के साथ शीघ्र ही अनर्तेश की नगरी की ओर प्रस्थान कर गया; इसी से दोनों राजाओं के मैत्री-संबंध की यात्रा आरंभ होती है।

परावसुप्रायश्चित्तविधानवृत्तान्तवर्णनम् (Parāvasu’s Expiation: Narrative of Prāyaścitta Procedure)
सूत जी बताते हैं कि विद्वान ब्राह्मण विश्वावसु के पुत्र परावसु माघ मास में थकान और प्रमादवश एक वेश्या के घर ठहर गया और जल समझकर अनजाने में मदिरा पी बैठा। अपराध का बोध होते ही वह पश्चात्ताप से भर उठा, शुद्धि के लिए शङ्ख-तीर्थ में स्नान किया और सामाजिक दीनता के भाव से गुरु के पास जाकर प्रायश्चित्त माँगा। मित्रों ने पहले हँसी में अनुचित उपाय सुझाया, पर परावसु ने गंभीर समाधान पर आग्रह किया। स्मृतिशास्त्र-निपुण ब्राह्मणों से विचार हुआ; उन्होंने जान-बूझकर और अनजाने में किए गए पान का भेद बताकर शास्त्रोक्त प्रायश्चित्त ठहराया—जितनी मदिरा पी गई हो, उतने अनुपात में अग्नि-तप्त घृत का पान। माता-पिता ने प्राण-हानि और लोक-अपवाद के भय से उसे रोकना चाहा। तब समाज ने मान्य भर्तृयज्ञ (सभा-प्रसंग में हरिभद्र से संबद्ध) से निर्णय कराया। उन्होंने समझाया कि परिहास में कही बात भी, यदि विद्वानों की व्याख्या और देश-धर्म के संदर्भ में मान्य हो, तो प्रभावी हो सकती है। राजा की सहमति से न्याय-सभा में राजकुमारी रत्नावती ने मातृभाव धारण कर प्रतीकात्मक शुद्धि-परीक्षा कराई—स्पर्श और ओष्ठ-संपर्क पर रक्त नहीं, दूध प्रकट हुआ, जिससे परावसु की शुद्धि सार्वजनिक रूप से सिद्ध हुई। अंत में नगर-नियम बना कि ऐसे घरों में मद्य और मांस वर्जित रहेंगे; उल्लंघन पर दंड होगा—व्यक्तिगत प्रायश्चित्त को सार्वजनिक नैतिक शासन से जोड़ा गया।

Ratnāvatī–Brāhmaṇī Tapas and the Revelation of the Twin Tīrthas (Śūdrīnāma & Brāhmaṇīnāma) with a Māheśvara Liṅga
अध्याय का आरम्भ राज-विवाह की बातचीत से होता है, पर शुद्धि और विवाह-योग्यता के धर्म-न्याय विवाद से वह टूट जाती है। दाशार्ण-नरेश रत्नावती की स्थिति सुनकर उसे ‘पुनर्भू’ कहकर कुल-भ्रंश का दोष बताता है और लौट जाता है। रत्नावती अन्य वरों को अस्वीकार करती है; वह एकदान-धर्म का प्रतिपादन करती है और कहती है कि मन का संकल्प और वाणी का समर्पण भी, पाणिग्रहण न होने पर भी, विवाह-बंधन को वास्तविक बना देता है। पुनर्विवाह के स्थान पर वह घोर तप का निश्चय करती है; माता समझाती और विवाह-व्यवस्था सुझाती है, पर रत्नावती समझौते के बदले प्राणत्याग तक की प्रतिज्ञा करती है। उसकी साथिन ब्राह्मणी अपने रजस्वला होने से जुड़ी सामाजिक-याज्ञिक बाधा बताकर रत्नावती के साथ तप करने का व्रत लेती है। भर्तृयज्ञ नामक आचार्य चान्द्रायण, कृच्छ्र, सान्तपन, षष्ठकाल-भोजन, त्रिरात्र, एकभक्त आदि क्रमबद्ध तपों का उपदेश देते हैं; अंतःसमता पर बल देते हैं और कहते हैं कि क्रोध तप-फल का नाश करता है। रत्नावती ऋतुओं के परिवर्तन के बीच दीर्घकाल तक कठोर आहार-नियमों सहित तप करती है और अद्भुत तपोबल प्राप्त करती है। अंत में शशिशेखर शिव गौरी सहित प्रकट होकर वर देते हैं। ब्राह्मणी की प्रार्थना और रत्नावती की याचना से कमल-युक्त सरोवर ‘शूद्रीनाम’ तीर्थ बनता है, उसके साथ ‘ब्राह्मणीनाम’ दूसरा तीर्थ भी प्रकट होता है, और पृथ्वी से स्वयम्भू माहेश्वर लिंग उद्भूत होता है। शिव इन दोनों तीर्थों और लिंग की महिमा बताते हैं—श्रद्धा से स्नान, निर्मल जल/कमल ग्रहण और पूजन से पाप-क्षय व दीर्घायु मिलती है; विशेषतः चैत्र शुक्ल चतुर्दशी, सोमवार को। यम नरक के रिक्त होने पर विलाप करता है; इन्द्र को धूल से तीर्थ ढकने का आदेश मिलता है, फिर भी कलियुग में वहाँ की मिट्टी से पवित्र तिलक और उसी तिथि पर श्राद्ध करने को गया-श्राद्ध के समान फलदायक कहा गया है। श्रवण-पाठ से पापमुक्ति और लिंग-पूजन से विशेष सिद्धि की फलश्रुति दी गई है।

Adhyāya 199: Trika-Tīrtha Saṅgraha and Kali-yuga Upāya (त्रिकतीर्थसंग्रहः कलियुगोपायश्च)
इस अध्याय में ऋषि सूत से पूछते हैं कि कलियुग में अल्पायु मनुष्य पृथ्वी पर बताए गए असंख्य तीर्थों के स्नान-फल को कैसे प्राप्त करें। सूत धर्म-संक्षेप के रूप में चौबीस पुण्य-स्थानों को आठ त्रिकों में रखकर बताते हैं—क्षेत्र (कुरुक्षेत्र, हाटकॆश्वर-क्षेत्र, प्रभास), अरण्य (पुष्कर, नैमिष, धर्मारण्य), पुरी (वाराणसी, द्वारका, अवन्ती), वन (वृन्दावन, खाण्डव, द्वैतवन), ग्राम (कल्पग्राम, शालिग्राम, नन्दिग्राम), तीर्थ (अग्नितीर्थ, शुक्लतीर्थ, पितृतīर्थ), पर्वत (श्रीपर्वत, अर्बुद, रैवत) और नदियाँ (गंगा, नर्मदा, सरस्वती)। कहा गया है कि किसी एक त्रिक में स्नान करने से उस त्रिक का फल मिलता है, और सभी त्रिकों में स्नान करने से असंख्य तीर्थों का समग्र पुण्य प्राप्त होता है। फिर ऋषि हाटकॆश्वर-प्रदेश के विषय में कहते हैं कि वहाँ तीर्थ और देवालय इतने अधिक हैं कि सौ वर्षों में भी सबका दर्शन-स्नान संभव नहीं; अतः विशेषकर निर्धनों के लिए सार्वत्रिक पुण्य और देव-दर्शन का सरल उपाय बताइए। सूत एक प्राचीन संवाद सुनाते हैं—एक राजा विश्वामित्र से पूछता है कि एक ही तीर्थ में स्नान से सब तीर्थों का फल कैसे मिले। विश्वामित्र चार प्रधान तीर्थ और उनके व्रत बताते हैं: (1) गया-संबद्ध पवित्र कूप, जहाँ विशेष तिथि/सूर्य-ग्रहण आदि में श्राद्ध से पितरों का उद्धार कहा गया है; (2) शंख-तीर्थ, माघ में शंखेश्वर-दर्शन सहित; (3) विश्वामित्र-प्रतिष्ठित हर-लिंग (विश्वामित्रेश्वर), शुक्ल अष्टमी से संबद्ध; (4) शक्र-तीर्थ (बालमण्डन), कई दिनों के स्नान और शक्रेश्वर-दर्शन सहित, विशेषतः आश्विन शुक्ल अष्टमी में। अध्याय आगे श्राद्ध-विधि के सूक्ष्म नियम बताता है—स्थानीय योग्य (स्थानोद्भव) ब्राह्मणों की अनिवार्यता, अयोग्य व्यक्ति या अशौच से कर्म-निष्फल होने की चेतावनी, तथा कुछ स्थानीय कुलों (अष्टकुल आदि) की वरीयता-क्रम। अंत में शाप, अपराध और ब्राह्मण-वेषधारी बहिष्कृत व्यक्ति की कथा द्वारा सामाजिक-याज्ञिक मर्यादाओं का कारण दिखाकर ग्रंथ की कर्म-प्रभावशीलता की तर्क-रेखा दृढ़ की जाती है।

Adhyāya 200 — Nāgara-Maryādā, Saṃsarga-Doṣa, and Prāyaścitta-Vidhi (Purity Restoration Protocols)
इस अध्याय में छिपी हुई सामाजिक पहचान और नियत-धार्मिक समुदाय में सहभोजन/संसर्ग से उत्पन्न अशौच का न्याय-धर्मशास्त्रीय विवेचन है। प्रातःकाल दीक्षित, आहिताग्नि गृहस्थ शुभद्र की पुत्री विलाप करती है कि उसे एक अन्त्यज को दे दिया गया है; वह अग्नि में प्रवेश करने का निश्चय बताती है, जिससे घर में हाहाकार मचता है। ब्राह्मण बताते हैं कि चन्द्रप्रभ नामक व्यक्ति, जो द्विज-रूप धारण कर दीर्घकाल तक देव-और पितृकर्मों में सहभागी रहा, अब चाण्डाल सिद्ध हुआ; अतः उसके संसर्ग से स्थान, निवासी, तथा जिन लोगों ने उस घर में खाया-पिया या वहाँ से लाया अन्न ग्रहण किया, सब दूषित माने गए। अधिकार-धारी दीक्षित स्मृति-शास्त्र देखकर क्रमबद्ध प्रायश्चित्त बताता है—शुभद्र के लिए दीर्घ चान्द्रायण, गृह-भण्डार का त्याग, अग्नियों का पुनः स्थापन, गृह-शुद्धि हेतु बड़े होम, तथा जितने भोजन/जितना जल ग्रहण किया हो उसके अनुसार विशेष तप। स्पर्श-संसर्ग से प्रभावित निवासियों के लिए पृथक् प्राजापत्य आदि, स्त्रियों, शूद्रों, बालकों और वृद्धों के लिए लघु विधान, तथा मिट्टी के पात्रों का परित्याग कहा गया है। ब्रह्मस्थान में स्थान-धन से कोटि-होम द्वारा व्यापक शुद्धि का भी विधान है। फिर श्राद्धादि के लिए ‘नागर-मर्यादा’ की सीमा-व्यवस्था संहिताबद्ध की जाती है—नागर-विधि को छोड़कर किया गया कर्म निष्फल कहा गया है, और अपने स्थान की वार्षिक शुद्धि का उपदेश है। अंत में विश्वामित्र राजा से कहते हैं कि यही स्थापित व्यवस्था है, जिससे नागर श्राद्ध-योग्य माने जाते हैं और भर्तृयज्ञ-आधारित नियमों से समुदाय का नियमन होता है।

नागरप्रश्ननिर्णयवर्णनम् (Nagara Status Inquiry and Adjudication)
इस अध्याय में ब्राह्मण विश्वामित्र से ‘नागर’ ब्राह्मण की शुद्धि और कर्माधिकार के विषय में औपचारिक प्रश्न करते हैं—जिसका पितृवंश अज्ञात हो, और जो देशान्तर में जन्मा या वहाँ से आया हो। भर्तृयज्ञ उत्तर देते हैं कि शुद्धि का निर्णय प्रधान, संयमी और शीलवान ब्राह्मणों द्वारा किया जाए, तथा गर्ता-तीर्थ से उत्पन्न ब्राह्मण को प्रमुख साक्षी/मध्यस्थ के रूप में स्थापित किया जाए। काम, क्रोध, द्वेष या भय से शुद्धि देने से इनकार करना भारी पापजनक बताया गया है, जिससे मनमानी बहिष्कृति पर नैतिक रोक लगती है। शुद्धि को त्रिविध कहा गया है—पहले कुल-शुद्धि, फिर मातृपक्ष-शुद्धि, और अंत में शील/आचरण-शुद्धि; इसके बाद वह ‘नागर’ मानकर सामान्य पद (सामान्य कर्माधिकार) का अधिकारी होता है। वर्षांत और शरद् ऋतु में सभा-आयोजन, सोलह योग्य ब्राह्मणों की स्थापना, वेदपाठ-भूमिकाओं से जुड़ी अनेक पीठिकाओं सहित आसन-विन्यास, तथा शान्ति-पाठ, सूक्त/ब्राह्मण-पाठ और रुद्र-प्रधान जपों का क्रम वर्णित है। अंत में पुण्याह-घोष, वाद्य, श्वेत वस्त्र व चन्दन, मध्यस्थ की विनयपूर्ण प्रार्थना, और साधारण वाद-विवाद के स्थान पर वैदिक वाणी-क्रिया द्वारा निर्णय; निर्णय-क्षण में ‘ताल-त्रय’ अर्पण का निर्देश दिया गया है।

भर्तृयज्ञवाक्यनिर्णयवर्णनम् (Bhartṛyajña on Adjudicating Speech and Preserving Kṣetra-Sanctity)
अध्याय 202 में विश्वामित्र के प्रसंग से ब्राह्मण-सभा एक मध्यस्थ/निर्णायक से निर्णय-मानदण्ड पूछती है। वे प्रश्न करते हैं कि निर्णय मनुष्य-जनित कथनों पर नहीं, वैदिक वाणी पर ही क्यों आधारित हो, और मध्यस्थ ‘त्रिविध ताल’ क्यों देता है। भर्तृयज्ञ उत्तर देते हैं कि ब्रह्मशाला में स्थित पवित्र क्षेत्र की मर्यादा के लिए नगरवासियों में असत्य वचन न उठे; स्थिर निष्कर्ष तक पहुँचने हेतु बार-बार प्रश्न करके सत्यापन करना आवश्यक है। वे कारण-श्रृंखला बताते हैं—अप्रमाण वचन से क्षेत्र-माहात्म्य का ह्रास होता है, उससे क्रोध, फिर वैर और अंततः धर्मदोष उत्पन्न होता है; इसलिए सामुदायिक व्यवस्था टूटने से बचाने हेतु मध्यस्थ से पुनःपुनः पूछताछ की जाती है। ‘त्रिविध ताल’ अनुशासन का साधन है, जो क्रमशः (1) अनुचित प्रश्नोत्तर से जुड़ी हिंसा/हानि, (2) क्रोध और (3) लोभ को दबाकर सभा की शांति स्थिर करता है। अंत में यह भी स्पष्ट किया जाता है कि यद्यपि अथर्ववेद को ‘चतुर्थ’ कहा जाता है, कार्य-सिद्धि के लिए उसे ‘प्रथम’ की भाँति क्यों माना जाए। क्योंकि उसमें रक्षात्मक और क्रियात्मक विधियों का व्यापक ज्ञान, लोक-कल्याण हेतु अनेक उपाय तथा अभिचारिक आदि सामग्री भी समाहित है; इसलिए कार्य-समापन के लिए पहले उसी का परामर्श उचित है। इस प्रकार क्षेत्र-परिसर में प्रश्न-नीति और प्रमाणिक वाणी की मर्यादा का समन्वित विवेचन होता है।

नागरविशुद्धिप्रकारवर्णनम् — Procedure for the Purification/Validation of a Nāgara Dvija
अध्याय 203 में नागर द्विज की समुदाय-समक्ष शुद्धि (प्रमाणन) की विधि बताई गई है। आनर्त पूछता है कि शुद्धि के लिए आया नागर, नागरों के सामने खड़ा होकर मान्य शुद्धि कैसे प्राप्त करे। ग्रंथ कहता है कि एक निष्पक्ष मध्यस्थ नियुक्त हो, जो माता-पिता, गोत्र, प्रवर आदि पूछे और पिता-पक्ष में पिता–पितामह–प्रपितामह तक तथा माता-पक्ष में भी इसी प्रकार कई पीढ़ियों तक वंश-परंपरा की सूक्ष्म जाँच कराए। शुद्धि-कर्म में लगे ब्राह्मण सावधानी से शाखा-आगम और मूल-वंश निश्चित करें; इसे वटवृक्ष की व्यापक जड़ों के समान आधारभूत कहा गया है। वंश-निश्चय के बाद सभा में सिंदूर-तिलक और मंत्रों द्वारा (चतुष्पाद मंत्र का उल्लेख सहित) शुद्धि-दान होता है। मध्यस्थ औपचारिक घोषणा करता है, समुदाय संकेत रूप में तीन बार करताड़न करता है, और शुद्ध व्यक्ति को समान सामाजिक-धार्मिक अधिकार मिलते हैं। फिर वह अग्नि की शरण लेकर अग्नि को तृप्त करता है, पंचमुख मंत्र से पूर्णाहुति देता है और सामर्थ्य के अनुसार अन्न सहित दक्षिणा देता है। अंत में चेतावनी है कि यदि वंशाधारित शुद्धि सिद्ध न हो तो प्रतिबंध आवश्यक है; अशुद्ध पुरोहित द्वारा किया श्राद्ध आदि निष्फल कहा गया है—उद्देश्य स्थान और कुल-परंपरा की शुद्धि को कठोर विधि से सुनिश्चित करना है।

प्रेतश्राद्धकथनम् (Preta-Śrāddha: Discourse on Ancestral Rites for the Preta-State)
इस अध्याय में तीर्थमाहात्म्य के भीतर दो जुड़े हुए प्रसंग आते हैं। पहले, वंश-परंपरा के लुप्त हो जाने पर भी अपने को ‘नागर’ मानने वाले आनर्त के प्रश्न पर शुद्धि-विधान बताया जाता है। विश्वामित्र पूर्व उदाहरण सुनाते हैं—भर्तृयज्ञ के अनुसार पहले व्यक्ति के शील और नागर-धर्म/आचार की जाँच हो; यदि आचरण संगत हो तो विधिपूर्वक शुद्धि कराई जाए, जिससे श्राद्ध आदि कर्मों का अधिकार पुनः स्थापित हो जाता है। फिर कथा शक्र–विष्णु संवाद में बदलती है, जो हिरण्याक्ष के युद्ध में मरे हुए लोगों के कारण उठता है। विष्णु बताते हैं कि पवित्र स्थल (संवाद में ‘धारा-तीर्थ’) में शत्रु के सम्मुख वीरगति पाने वाले पुनर्जन्म को नहीं लौटते, पर जो पीठ दिखाकर भागते हुए मारे गए वे प्रेत-स्थिति को प्राप्त होते हैं। इन्द्र के मोक्ष-प्रश्न पर उपाय बताया जाता है—भाद्रपद (नभास्य) मास की कृष्ण पक्ष चतुर्दशी को, जब सूर्य कन्या राशि में हो, विशेषतः गया में पितृ-आज्ञा के अनुसार श्राद्ध किया जाए। इससे पितरों को वार्षिक तृप्ति मिलती है; उपेक्षा करने पर प्रेतों का कष्ट बना रहता है।

गयाश्राद्धफलमाहात्म्य (Glory of the Fruit of Gayā-Śrāddha) — within Hāṭakeśvara-kṣetra Māhātmya
इस अध्याय में हाटकेश्वर-क्षेत्र-माहात्म्य के भीतर विष्णु इन्द्र को श्राद्ध-विषयक धर्मोपदेश देते हैं। वे बताते हैं कि युद्ध में शत्रु के सामने से मारे गए हों या पीछे से आघात पाकर गिरे हों—ऐसे पतित योद्धाओं का भी गयाश्राद्ध के समान विधि से किया गया पिण्ड-तर्पण कल्याण कर सकता है। तब इन्द्र शंका करते हैं कि गया तो दूर है और वहाँ पितामह ब्रह्मा प्रतिवर्ष विधि करते हैं; पृथ्वी पर व्यवहारतः श्राद्ध-सिद्धि कैसे हो? विश्वामित्र विष्णु का उत्तर सुनाते हैं—हाटकेश्वर-प्रदेश में कूपिका के मध्य एक अत्यन्त पुण्य तीर्थ है। अमावस्या तथा चतुर्दशी को वहाँ ‘गया’ का संक्रमण माना गया है और वह स्थान समस्त तीर्थों की संयुक्त शक्ति से युक्त होता है। विशेष नियम यह है कि सूर्य के कन्या राशि में होने पर, अष्टवंश-प्रसिद्ध ब्राह्मणों के द्वारा वहाँ श्राद्ध करने से प्रेतावस्था में पड़े पितरों सहित स्वर्गस्थ पितर भी उद्धृत होते हैं। उन ब्राह्मणों की उत्पत्ति हिमालय-समीप रहने वाले तपस्वियों से बताई गई है। विष्णु इन्द्र को आदेश देते हैं कि उन्हें सम्मानपूर्वक बुलाएँ, साम-उपाय से प्रसन्न करें और नियमपूर्वक श्राद्ध पूर्ण करें। अंत में इन्द्र संतुष्ट होकर हिमालय की ओर उन ब्राह्मणों को खोजने जाते हैं और विष्णु क्षीरसागर को प्रस्थान करते हैं—इस प्रकार तीर्थ-आधारित गया-समान फल और विधि-व्यवस्था दोनों का प्रतिपादन होता है।

बालमण्डनतीर्थमाहात्म्यवर्णनम् (Glorification of Bālamaṇḍana Tīrtha)
इस अध्याय में तीर्थ-माहात्म्य के प्रसंग में विश्वामित्र और आनर्त का संवाद आता है। विष्णु की आज्ञा से इन्द्र हिमालय पर कठोर तप करने वाले ऋषियों के पास जाकर चामत्कारपुर की गयाकूपी में श्राद्ध हेतु उनका सहयोग माँगता है। ऋषि शंका करते हैं—कलहप्रिय जनों के संग से दोष, क्रोध से तप का नाश, और राजदान स्वीकार करने से वैराग्य-धर्म में बाधा हो सकती है। इन्द्र बताता है कि हाटकेश्वर-सम्बन्धी उस क्षेत्र की तीव्र शक्ति से विवाद उठता है, पर वह क्रोध और विघ्न से रक्षा करेगा तथा गया-सम्बन्धी श्राद्ध का अद्भुत फल भी बताता है। उसी समय संकट होता है कि विश्वेदेव ब्रह्मा के श्राद्ध में गए हैं। इन्द्र घोषणा करता है कि विश्वेदेवों के बिना भी मनुष्य एकोद्दिष्ट-श्राद्ध करें; आकाशवाणी से पुष्टि होती है कि जिन पितरों के लिए किया गया है उन्हें उद्धार-फल मिलेगा। बाद में ब्रह्मा नियम पुनः निर्धारित करते हैं—केवल कुछ विशेष दिनों में, विशेष मृत्यु-स्थितियों में (विशेषतः प्रेतपक्ष चतुर्दशी) ही विश्वेदेव-वर्जित श्राद्ध मान्य होगा। विश्वेदेवों के आँसुओं से कूष्माण्डों की उत्पत्ति, तथा श्राद्ध के पात्रों पर भस्म-रेखाएँ लगाकर विघ्न-निवारण का विधान भी बताया गया है। अंत में इन्द्र माघ शुक्ल पक्ष, पुष्य नक्षत्र, रविवार, त्रयोदशी को बालमण्डन के निकट शिवलिंग स्थापित करता है; वहाँ स्नान और पितृ-तर्पण के लाभ, पुरोहित-पालन व दान, तथा अकृतज्ञता के नैतिक दोष का उपदेश दिया जाता है।

इन्द्रमहोत्सववर्णनम् (Indra Mahotsava—Institution and Ritual Logic)
इस अध्याय में विश्वामित्र पहले तीर्थ की पावन-शक्ति, स्नान का फल और विशेष काल-निर्धारण का वर्णन करते हैं। फिर आनर्त पूछता है कि इन्द्र की पृथ्वी पर पूजा केवल पाँच रात्रियों तक ही क्यों सीमित है और वह किस ऋतु में की जानी चाहिए। तब विश्वामित्र गौतम–अहल्या प्रसंग सुनाते हैं—इन्द्र का अपराध, गौतम का शाप (वीर्य-नाश, मुख पर सहस्र चिह्न, और पृथ्वी पर पूजा करने पर शिरोभेद का भय), अहल्या का शिला-रूप हो जाना तथा इन्द्र का हट जाना। इन्द्र के अभाव से लोक-व्यवस्था डगमगाती देखकर बृहस्पति और देवगण गौतम से प्रार्थना करते हैं। ब्रह्मा विष्णु और शिव के साथ मध्यस्थ बनकर संयम, मर्यादा और क्षमा-धर्म का उपदेश देते हैं, पर वचन की सत्यता भी बनाए रखते हैं। शाप आंशिक रूप से शान्त होता है—इन्द्र को मेष-सम्बन्धी अंग प्राप्त होते हैं और मुख के चिह्न नेत्र बन जाते हैं, जिससे वह ‘सहस्राक्ष’ कहलाता है। इन्द्र मनुष्यों में पुनः पूजन की अनुमति चाहता है। गौतम पृथ्वी पर ‘पञ्चरात्र’ इन्द्र-महोत्सव की स्थापना करते हैं और बताते हैं कि जहाँ यह व्रत होगा वहाँ आरोग्य, अकाल-निवारण और राज्य-क्षय का अभाव रहेगा। नियम यह भी है कि इन्द्र की मूर्ति की पूजा न हो; वृक्ष से उत्पन्न यष्टि को वैदिक मन्त्रों से प्रतिष्ठित किया जाए, और व्रत का फल नैतिक शुद्धि व कुछ पापों से मुक्ति से जुड़ा है। फलश्रुति में पाठ/श्रवण से वर्षभर रोग-रहितता तथा अर्घ्य-मन्त्र से विशेष दोष-क्षय कहा गया है।

हाटकेश्वरक्षेत्रमाहात्म्ये गौतमेश्वराहिल्येश्वरशतानन्देश्वरमाहात्म्यवर्णनम् (Hāṭakeśvara-kṣetra Māhātmya: The Glories of Gautameśvara, Ahilyeśvara, and Śatānandeśvara)
इस अध्याय में विश्वामित्र द्वारा एक राजा को सुनाया गया बहु-स्तरीय माहात्म्य आता है। इन्द्र के प्रसंग के बाद गौतम के क्रोध का वर्णन है और शतानन्द अपनी माता अहल्या की दशा तथा शुद्धि-विधि के विषय में करुणापूर्वक निवेदन करता है। गौतम अशौच की कठोरता बताकर कहते हैं कि साधारण प्रायश्चित्त से अहल्या का उद्धार संभव नहीं; तब शतानन्द अत्यन्त त्यागमय व्रत का संकल्प करता है। फिर गौतम भविष्य का उपाय बताते हैं—सूर्यवंश में राम अवतार लेकर रावण का वध करेंगे और उनके स्पर्श मात्र से अहल्या का उद्धार होगा। रामावतार-प्रसंग में विश्वामित्र बालक राम को यज्ञ-रक्षा हेतु ले जाते हैं; मार्ग में शाप से शिला बनी अहल्या को स्पर्श कराने पर वह पुनः मानव रूप पाती है, गौतम के पास जाकर पूर्ण प्रायश्चित्त मांगती है। गौतम अनेक चान्द्रायण, कृच्छ्र, प्राजापत्य व्रत और तीर्थ-सेवन का विधान करते हैं। अहल्या तीर्थयात्रा करते हुए हाटकेश्वर-क्षेत्र पहुँचती है, जहाँ देवता का दर्शन सहज नहीं। वह घोर तप करती है और समीप एक लिंग की स्थापना करती है; बाद में शतानन्द भी आकर साथ तप करता है। अंततः गौतम स्वयं आकर और भी कठोर तप से हाटकेश्वर को प्रकट करने का संकल्प करते हैं; दीर्घ तप के फल से लिंग प्रकट होता है और शिव साक्षात् दर्शन देकर क्षेत्र की महिमा तथा परिवार की भक्ति की प्रशंसा करते हैं। गौतम वर मांगते हैं कि यहाँ दर्शन-पूजन से महान पुण्य मिले और एक विशेष तिथि को भक्तों को शुभ लोक-प्राप्ति हो। अंत में बताया गया है कि इन तीर्थों की कृपा से पापी भी पुण्य की ओर आकर्षित होने लगे, जिससे देवता चिंतित होकर इन्द्र से यज्ञ, व्रत, दान आदि व्यापक धर्म-आचरण पुनः प्रवर्तित करने की प्रार्थना करते हैं, ताकि धर्म-व्यवस्था संतुलित रहे। फलश्रुति में श्रद्धा से सुनने वालों के कुछ पापों के नाश का वचन है।

शंखादित्य-शंखतीर्थोत्पत्तिवृत्तान्तवर्णनम् (Origin Account of Śaṅkhatīrtha and Śaṅkheśvara/Āditya Worship)
यह अध्याय संवाद-परम्परा में शंखतीर्थ की उत्पत्ति और महिमा का वर्णन करता है। आनर्त नामक राजा विश्वामित्र से शंखतीर्थ का पूरा वृत्तान्त पूछता है। विश्वामित्र एक पूर्व-प्रसंग सुनाते हैं—एक प्राचीन राजा कुष्ठरोग, राज्य-भंग और धन-हानि से पीड़ित होकर मार्गदर्शन हेतु नारद के पास जाता है। नारद उसके कर्म-भय को शांत करते हुए कहते हैं कि पूर्वजन्म का कोई पाप नहीं, बल्कि वह पहले सोमवंश का धर्मनिष्ठ राजा रहा है; अतः दोषारोपण छोड़कर उपाय का आश्रय लेना चाहिए। नारद एक निश्चित तीर्थ-विधि बताते हैं—हाटककेश्वर-क्षेत्र के शंखतीर्थ में माधव (वैशाख) मास की शुक्ल अष्टमी को, रविवार के दिन, सूर्योदय के समय स्नान करके शंखेश्वर का दर्शन-पूजन करना। इससे कुष्ठ का नाश और अभीष्ट की सिद्धि होती है। फिर तीर्थ की कारण-कथा आती है—विद्वान भाई लिखित और शंख, निर्जन आश्रम से फल लेने पर विवाद करते हैं; लिखित इसे धर्मशास्त्रानुसार चोरी बताता है, और शंख तप-हानि से बचने हेतु प्रायश्चित्त स्वीकार करता है। कठोर दण्ड में उसके हाथ काटे जाते हैं; तब वह हाटककेश्वर में दीर्घ तप करता है, ऋतुओं में कष्ट-साधना, रुद्र-पाठ और सूर्य-उपासना करता रहता है। अन्त में महादेव सूर्य-तेज से युक्त रूप में प्रकट होकर वर देते हैं—शंख के हाथ पुनः प्राप्त हों, लिंग में देव-सन्निधि स्थापित हो, सरोवर ‘शंखतीर्थ’ नाम से प्रसिद्ध हो, और भावी यात्रियों के लिए फल-श्रुति निश्चित हो। अध्याय का उपसंहार यह है कि जो इस कथा को सुनता या पढ़ता है, उसके वंश में कुष्ठरोग उत्पन्न नहीं होता।

ताम्बूलोत्पत्तिः तथा ताम्बूलमाहात्म्यवर्णनम् (Origin and Māhātmya of Tāmbūla)
इस अध्याय में शङ्खतीर्थ से जुड़ा एक पुनरुद्धार-प्रसंग आता है। एक राजा रोग से पीड़ित था; वह माधव मास की अष्टमी, रविवार को सूर्योदय के समय स्नान करके सूर्य-पूजन करता है और नियत काल में किए गए इस कर्म के प्रभाव से रोगमुक्त हो जाता है। इसके बाद ताम्बूल (पान) के सेवन की नीति बताई गई है—अयुक्त या अशुद्ध प्रयोग से दोष उत्पन्न होते हैं और लक्ष्मी-क्षय होता है; उन दोषों की शुद्धि हेतु प्रायश्चित्त-विधियाँ भी कही गई हैं। समुद्र-मन्थन की कथा के माध्यम से नागवल्ली की उत्पत्ति बताकर, अमृत-संबद्ध दिव्य पदार्थों से उसका प्रादुर्भाव, फिर मनुष्यलोक में उसका प्रसार और उससे कामवृद्धि तथा कर्म-अनुष्ठान में ह्रास जैसे सामाजिक परिणाम वर्णित हैं। अंत में सुधार-रूप विधि दी गई है—शुभ समय में विद्वान ब्राह्मण को बुलाकर सत्कार करना, स्वर्ण-पत्र तथा ताम्बूलादि सामग्री तैयार करना, मंत्रपूर्वक अपने दोष का निवेदन करके दान देना और शुद्धि का आश्वासन प्राप्त करना। इस प्रकार अध्याय संयमित भोग, नैतिक मर्यादा और दान-प्रधान प्रायश्चित्त द्वारा शुद्धि का आदर्श स्थापित करता है।

Śaṅkhatīrtha-māhātmya (Glory of Śaṅkhatīrtha)
यह अध्याय उपदेशात्मक संवाद के रूप में है। विश्वामित्र राजा के दुःख—दरिद्रता, कुष्ठरोग और युद्ध में पराजय—का कारण पूछते हैं। नारद बताते हैं कि राजा का पतन उसके धर्म-विचलन से हुआ: ब्राह्मणों को बार-बार निराश करना, वचन देकर सहायता न देना, याचकों का अपमान करना, और पूर्वजों व पिता के उन शासनों/आदेशों को दबा देना या हटाना जो ब्राह्मण-अधिकार और दान-भूमि आदि से जुड़े थे। इस अधर्म से शत्रु सफल होने लगते हैं। उपाय भी व्यावहारिक और तीर्थ-आधारित है। राजा श्रद्धा से शंखतीर्थ जाता है, स्नान करता है, ब्राह्मणों को बुलाकर शंखादित्य के सामने उनके चरण धोता है और अनेक दानपत्र/अनुदान (निश्चित संख्या सहित) देकर जो रोका था उसे लौटाता है। अंत में ब्राह्मणों के प्रसाद से वहीं उपस्थित शत्रु मृत्यु को प्राप्त होते हैं—यह संदेश कि सम्मान, प्रतिपूर्ति और धर्म-पालन से शरीर और राज्य दोनों की स्थिरता आती है।

रत्नादित्यमाहात्म्यवर्णनम् (Ratnāditya Māhātmya — The Glory of Ratnāditya)
अध्याय के आरम्भ में ऋषि सूत से हाटकेश्वर-क्षेत्र के प्रसंग में विश्वामित्र-संबद्ध तीर्थ का माहात्म्य पूछते हैं। सूत विश्वामित्र की अद्भुत महिमा बताकर उनके द्वारा निर्मित कुण्ड का वर्णन करते हैं, जहाँ जाह्नवी (गंगा) स्वरूप शुद्ध जल प्रकट होकर पाप-नाशक शक्ति का बोध कराता है। वहाँ भास्कर (सूर्य) की प्रतिष्ठा का विधान है और माघ शुक्ल पक्ष में रविवार के साथ सप्तमी पड़ने पर स्नान करके सूर्य-पूजन करने से कुष्ठ जैसे घोर रोग तथा आचरण-दोष नष्ट होते हैं—ऐसा कहा गया है। पश्चिमोत्तर दिशा में धन्वन्तरि द्वारा स्थापित एक वापी का उल्लेख आता है। धन्वन्तरि के तप से प्रसन्न होकर भास्कर वर देते हैं कि नियत काल में स्नान करने वाले को रोग से तत्काल राहत मिलेगी। फिर उदाहरण में अयोध्या के राजा रत्नाक्ष, जो असाध्य कुष्ठ से पीड़ित थे, एक कार्पटिक साधु के मार्गदर्शन से तीर्थ में आकर विधिवत स्नान करते हैं और तुरंत स्वस्थ होकर ‘रत्नादित्य’ नाम से सूर्यदेव की स्थापना करते हैं। एक वृद्ध ग्वाले का भी प्रसंग है—पशु को बचाते हुए अनायास जल में उतरने से उसका कुष्ठ मिट जाता है; बाद में वह नियमपूर्वक पूजा-जप कर दुर्लभ आध्यात्मिक सिद्धि पाता है। अंत में स्नान, पूजा और अधिक संख्या में गायत्री-जप की विधि तथा फलश्रुति दी गई है—आरोग्य, मनोवांछित सिद्धि, और वैराग्यवान के लिए मोक्ष; साथ ही श्रद्धापूर्वक गोदान आदि दान को संतति को रोग से बचाने वाला बताया गया है।

Kuharavāsi-Sāmbāditya-prabhāva-varṇana (Glory of Sūrya at Kuharavāsa and the Sāmba Narrative)
अध्याय में सूत जी सूर्य-पूजा की पवित्रता का विस्तार करते हैं। एक पूर्वकथा में एक ब्राह्मण लाल चन्दन से सूर्य की प्रतिमा बनाकर दीर्घकाल तक भक्ति से आराधना करता है और वर पाता है। वह कुष्ठ-निवारण माँगता है; सूर्य उसे विधि बताते हैं—सप्तमी से युक्त रविवार को पुण्य सरोवर में स्नान करके, फल हाथ में लेकर 108 प्रदक्षिणाएँ करना। यह व्रत रोग-नाशक और अन्य साधकों के लिए भी कल्याणकारी कहा गया है। फिर सूर्य उस स्थान पर अपना निवास स्थापित कर उसे “कुहरावास” नाम देते हैं, जिससे वह चमत्कार स्थायी तीर्थ-परिचय बन जाता है। इसके बाद कथा कृष्ण (विष्णु) के पुत्र साम्ब की ओर मुड़ती है। उसके सौन्दर्य से लोगों में विक्षोभ होता है और भ्रमवश एक धर्म-विरुद्ध, लज्जास्पद प्रसंग घटता है। साम्ब धर्म-निर्णय चाहता है; एक ब्राह्मण “टिङ्गिनी” नामक कठोर प्रायश्चित्त बताता है—गड्ढा, गोबर-चूर्ण, नियंत्रित अग्नि, अचल रहना और जनार्दन का ध्यान—जो महापातक-नाशक कहा गया है। साम्ब पिता से स्वीकार करता है; हरि यह कहकर दोष हल्का करते हैं कि नीयत/ज्ञान के अभाव में अपराध घटता है, और उसे शोधन-यात्रा का उपाय देते हैं—माधव मास में शुभ तिथियों पर हाटकेश्वर क्षेत्र में मार्तण्ड की पूजा तथा वही 108 प्रदक्षिणा-विधि। साम्ब परिवार की शोक-आशीष के साथ निकलकर संगम में स्नान, पूजा और दान करता है, जहाँ विष्णु पाप-हरण हेतु स्थित माने गए हैं; अंत में उसे कुष्ठ-मुक्ति का दृढ़ विश्वास होता है और तीर्थ को हाटकेश्वर/विश्वामित्रीय परिसर में स्त्रियों सहित सबके लिए परम शुभ बताया जाता है।

गणपतिपूजाविधिमाहात्म्यवर्णनम् (Glorification of the Method of Gaṇapati Worship)
अध्याय 214 में विनायक/गणनाथ-पूजा को विघ्न-शांति की सुनिश्चित साधना के रूप में बताया गया है। सूत जी विश्वामित्र द्वारा प्रतिष्ठित गणनाथ का उल्लेख करते हैं और काल-नियम बताते हैं—माघ शुक्ल चतुर्थी को पूजन करने से पूरे वर्ष बाधाएँ नहीं आतीं। ऋषियों के प्रश्न पर वे गणेशजी की उत्पत्ति (देवी गौरी के शरीर-मल से), उनके स्वरूप-चिह्न (गजमुख, चार भुजाएँ, मूषक वाहन, कुठार, मोदक) तथा देव-संघर्ष में उनकी भूमिका का वर्णन करते हैं; तब इन्द्र घोषणा करते हैं कि हर कार्य के आरम्भ में गणपति की पूजा अनिवार्य है। फिर उपाख्यान में रोहिताश्व, मार्कण्डेय से जीवन भर विघ्न रोकने वाला एक व्रत पूछता है। मार्कण्डेय विश्वामित्र-वसिष्ठ के नन्दिनी कामधेनु-प्रसंग से उत्पन्न संघर्ष का वर्णन करते हैं, जिससे विश्वामित्र कठोर तप में प्रवृत्त होकर विघ्न-रक्षा हेतु कैलास में महेश्वर की शरण लेते हैं। शिव विनायक-पूजा को शुद्धि और सिद्धि का उपाय बताते हैं, सूक्त-मंत्रों द्वारा गणेश-तत्त्व का आवाहन समझाते हैं और संक्षिप्त विधि देते हैं—लम्बोदर, गणविभु, कुठारधारी, मोदकभक्ष, एकदन्त आदि नामों से नमस्कार, मोदक नैवेद्य, अर्घ्य, तथा कंजूसी छोड़कर ब्राह्मण-भोजन। देवी फल बताती हैं कि चतुर्थी को स्मरण/पूजन से कार्य स्थिर होते हैं और समृद्धि आती है; फलश्रुति में पुत्रहीन को पुत्र, निर्धन को धन, विजय, दुःखी को सौभाग्य-वृद्धि और नित्य पाठ/श्रवण करने वालों को विघ्न न होने का वरदान कहा गया है।

श्राद्धावश्यकताकारणवर्णनम् (Necessity and Rationale of Śrāddha)
इस अध्याय में श्राद्ध-कल्प का विधि-निरूपण और उसका कारण बताया गया है। ऋषि सूत से पूछते हैं कि अक्षय फल देने वाला श्राद्ध कैसे किया जाए—उचित समय, योग्य ब्राह्मण और उपयुक्त पदार्थ कौन-से हों। सूत पूर्व प्रसंग सुनाते हैं: मर्कण्डेय सरयू-संगम से अयोध्या आते हैं, जहाँ राजा रोहिताश्व उनका स्वागत करता है। ऋषि राजा की धर्म-समृद्धि की परीक्षा वेद, विद्या, विवाह और धन की “सफलता” के प्रश्नों से करते हैं और कार्य-आधारित उत्तर देते हैं—जैसे वेद की सिद्धि अग्निहोत्र से, धन की सिद्धि दान और सदुपयोग से। फिर राजा विविध श्राद्धों के भेद पूछता है। मर्कण्डेय भरत्र्यज्ञ द्वारा आनर्त-नरेश को दिए गए उपदेश का उदाहरण रखते हुए मुख्य बात बताते हैं कि दर्श/अमावस्या का श्राद्ध विशेष रूप से अनिवार्य है। पितृगण सूर्यास्त तक गृह-द्वार पर अर्पण की आशा से आते हैं; उपेक्षा होने पर वे व्याकुल और दुःखी होते हैं। वंश-परंपरा का नैतिक कारण भी कहा गया है—जीव कर्मफल से अनेक लोकों में जाते हैं, कुछ अवस्थाओं में भूख-प्यास का कष्ट होता है; संतान-समर्थन न रहे तो पतन का भय बताया गया है। पुत्र न होने पर अश्वत्थ वृक्ष का रोपण और पालन वंश-स्थैर्य का विकल्प माना गया है। अंत में पितरों के लिए नियमित अन्न और उदक-दान, तर्पण तथा श्राद्ध का आग्रह है; उपेक्षा को पितृ-द्रोह कहा गया है, और विधिपूर्वक श्राद्ध-तर्पण को इष्ट-सिद्धि तथा त्रिवर्ग (धर्म-अर्थ-काम) के पोषण का साधन बताया गया है।

श्राद्धोत्पत्तिवर्णन (Origin and Authorization of Śrāddha Rites)
इस अध्याय में अमावस्या (इन्दु-क्षय) पर किए जाने वाले श्राद्ध की विशेष प्रामाणिकता का कारण बताया गया है। अनर्त, भर्तृयज्ञ से पितृकर्म के शुभ समय पूछता है। भर्तृयज्ञ मन्वन्तर/युग-संधि, संक्रान्ति, व्यतीपात, ग्रहण आदि अनेक पुण्यकालों का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि यदि योग्य ब्राह्मण मिलें या उचित द्रव्य उपलब्ध हो, तो पर्व-तिथियों के बाहर भी श्राद्ध किया जा सकता है। फिर अमावस्या का तात्त्विक वर्णन आता है—चन्द्रमा का सूर्य-रश्मियों में निवास होने से उस समय किया गया धर्म और पितृकृत्य ‘अक्षय’ फल देने वाला माना गया है। आगे पितृ-वर्गों (अग्निष्वात्त, बर्हिषद, आज्यप, सोमप आदि) का परिचय, नन्दीमुख पितरों का भेद, तथा देव–पितृ व्यवस्था में पितृ-तृप्ति का स्थान बताया जाता है। कथा-प्रसंग में कहा गया है कि जब वंशज कव्य-दान नहीं करते, तब स्वर्गस्थ पितर भूख-प्यास से पीड़ित होकर इन्द्रसभा में जाते हैं और फिर ब्रह्मा से निवेदन करते हैं। ब्रह्मा युगों के क्षय में आचार-ह्रास देखकर उपाय स्थापित करते हैं—(1) तीन पीढ़ियों (पितृ, पितामह, प्रपितामह) के नाम से अर्पण, (2) अमावस्या-श्राद्ध को बार-बार होने वाला उपचार, (3) वर्ष में एक बार विशेष श्राद्ध का विकल्प, और (4) परम प्रभावशाली उपाय—गयाशिर में श्राद्ध, जो अत्यन्त दुःस्थित जीवों के लिए भी मुक्ति-लाभकारी कहा गया है। अंत में फलश्रुति है कि ‘श्राद्धोत्पत्ति’ का यह वर्णन सुनने-पढ़ने से सामग्री की कमी होने पर भी श्राद्ध पूर्ण माना जाता है; मुख्य बल शुद्ध संकल्प, पितरों को सही समर्पण और कुल-धर्म की स्थिरता पर दिया गया है।

श्राद्धकल्पे श्राद्धार्हपदार्थब्राह्मणकालनिर्णय-वर्णनम् (Śrāddha-kalpa: Eligibility of recipients, proper materials, and timing)
इस अध्याय में आनर्त श्राद्ध की सम्पूर्ण विधि पूछते हैं। भर्तृयज्ञ श्राद्धकर्म को तीन मुख्य आधारों पर व्यवस्थित करते हैं—(1) श्राद्ध में लगने वाले धन का धर्मपूर्वक, ईमानदारी से अर्जित होना और शुद्ध रीति से स्वीकार किया जाना, (2) आमंत्रित ब्राह्मणों का चयन—श्राद्धार्ह (योग्य) और अनर्ह (अयोग्य) का भेद तथा अयोग्यता के विस्तृत कारण, और (3) तिथि तथा संक्रान्ति/विषुव/अयन आदि के अनुसार उचित काल-निर्णय, जिससे अक्षय फल प्राप्त होता है। अध्याय में आमंत्रण-शिष्टाचार भी बताया गया है—विश्वेदेवों और पितरों के लिए अलग-अलग आवाहन, यजमान के आचरण-संयम, तथा स्थान-व्यवस्था और शुद्धि। साथ ही वे स्थितियाँ गिनाई गई हैं जिनसे श्राद्ध ‘व्यर्थ’ हो जाता है—अशुद्ध भोजन-स्थिति, अनुचित साक्षी, दक्षिणा का अभाव, शोर-गुल और कलह, या गलत समय। अंत में मन्वादि और युगादि व्रत-आचरणों का उल्लेख कर यह प्रतिपादित किया गया है कि ठीक समय पर किया गया तिल-जल का अर्पण भी स्थायी पुण्य देता है।

Śrāddha-niyama-varṇana (Rules and Ethical Guidelines for Śrāddha)
अध्याय 218 में भर्तृयज्ञ राजा को श्राद्ध-विधि का तकनीकी और नैतिक उपदेश देते हैं। पहले सामान्य नियम दोहराए जाते हैं, फिर यह कहा जाता है कि आगे का विधान अपनी शाखा/परंपरा तथा स्वदेश–वर्ण–जाति के अनुरूप विशेष रूप से बताया जाएगा। श्राद्ध का मूल ‘श्रद्धा’ है—सच्ची निष्ठा के बिना किया गया कर्म निष्फल हो जाता है। इसके बाद बताया गया है कि श्राद्ध के दौरान अनायास उत्पन्न वस्तुएँ भी—ब्राह्मण के चरणों का जल, गिरे हुए अन्नकण, सुगंध, आचमन का शेष जल, और दर्भ के बिखरे तिनके—कल्पना-रूप से विभिन्न पितृवर्गों को, यहाँ तक कि प्रेतावस्था या तिर्यक् आदि योनि में पड़े जीवों को भी, पोषण के रूप में पहुँचते हैं। दक्षिणा पर विशेष बल है: दक्षिणा के बिना श्राद्ध को बाँझ वर्षा या अँधेरे में किए कर्म के समान कहा गया है; दान-प्रतिदान को कर्म-पूर्णता का अंग माना गया है। श्राद्ध देने या खाने के बाद कुछ निषेध बताए गए हैं—स्वाध्याय न करना, दूसरे गाँव की यात्रा से बचना, और ब्रह्मचर्य/संयम रखना; उल्लंघन से फल नष्ट होता है या पितरों को मिलने वाला लाभ विकृत हो जाता है। अनुचित निमंत्रण स्वीकार करने और कर्ता के अत्यधिक भोज में लिप्त होने की भी निंदा है। अंत में निष्कर्ष है कि यजमान और सहभागी इन दोषों से सावधानीपूर्वक बचें, तभी श्राद्ध की सिद्धि सुरक्षित रहती है।

काम्यश्राद्धवर्णनम् (Kāmya-Śrāddha: Day-wise Results and Exceptions)
अध्याय 219 में भर्तृयज्ञ राजा को काम्य-श्राद्ध का विधिवत् विवेचन करते हैं। प्रेत-पक्ष (कृष्ण पक्ष) की तिथियों में क्रमशः किए गए श्राद्ध के अलग-अलग फल बताए गए हैं—समृद्धि, विवाह-योग, घोड़े-गाय आदि की प्राप्ति, कृषि व व्यापार में सफलता, आरोग्य, राज-अनुग्रह और सर्वकार्य-सिद्धि। फिर त्रयोदशी को संतान-कामना वालों के लिए अनुपयुक्त बताकर उससे अशुभ फल की आशंका कही गई है; पर मघा-त्रयोदशी के विशेष योग में मधु-घृतयुक्त पायस का अर्पण कर विशेष आचरण भी बताया गया है। शस्त्र, विष, अग्नि, जल, सर्प/पशु-आक्रमण या फाँसी आदि से असामयिक मृत्यु वालों की तृप्ति हेतु चतुर्दशी को एकोदिष्ट श्राद्ध का विधान है। अंत में अमावस्या-श्राद्ध को समस्त कामनाओं का दाता कहा गया है और इस काम्य-श्राद्ध-प्रणाली का श्रवण/ज्ञान इच्छित फल देने वाला बताया गया है।

गजच्छायामाहात्म्यवर्णनम् (The Māhātmya of the “Elephant-Shadow” Tithi and Śrāddha Protocols)
इस अध्याय में श्राद्ध के समय-निर्णय और उसके फल का सूक्ष्म विवेचन संवाद के रूप में आता है। अनर्त, भर्तृयज्ञ से पूछता है कि त्रयोदशी तिथि पर श्राद्ध करने से वंश-क्षय क्यों कहा गया है। भर्तृयज्ञ ‘गजच्छाया’ नामक विशेष काल-लक्षण बताता है—चन्द्र-नक्षत्र की विशिष्ट स्थिति तथा ग्रहण-सन्निकट योग आदि में—जिसमें किया गया श्राद्ध ‘अक्षय’ फल देता है और पितरों को बारह वर्षों तक तृप्ति प्रदान करता है। कथा-दृष्टान्त में पूर्वयुग के पाञ्चाल-नरेश सीताश्व का वर्णन है। ब्राह्मण उसके श्राद्ध-भोजन में मधु-दुग्ध, कालशाक तथा खड्ग-मांस आदि देखकर कारण पूछते हैं। राजा स्वीकार करता है कि पूर्वजन्म में वह शिकारी था; उसने महर्षि अग्निवेश से गजच्छाया-श्राद्ध का नियम सुना और साधारण सामग्री से भी श्राद्ध किया, जिसके प्रभाव से उसे राज-जन्म मिला और उसके पितर संतुष्ट हुए। अंत में देवता त्रयोदशी-श्राद्ध की असाधारण शक्ति से चिंतित होकर एक शाप-सी मर्यादा स्थापित करते हैं कि आगे से सामान्यतः उस दिन श्राद्ध करना आध्यात्मिक रूप से जोखिमपूर्ण होगा और करने पर वंश-क्षय का कारण बन सकता है। इस प्रकार गजच्छाया की विशेष महिमा भी बनी रहती है और सावधानी की सीमा भी निर्धारित होती है।

Śrāddha-kalpa: Sṛṣṭyutpatti-kālika-brahmotsṛṣṭa-śrāddhārha-vastu-parigaṇana (Ritual Materials Authorized for Śrāddha by Cosmogonic Precedent)
अध्याय 221 में श्राद्ध-विधि के अंतर्गत ‘विकल्प’ दानों का तात्त्विक विवेचन संवाद-शैली में किया गया है। भर्तृयज्ञ बताते हैं कि एक विशेष तिथि-काल में पूर्ण श्राद्ध न हो सके तो भी पितरों की तृप्ति और वंश-च्छेद के भय से बचने हेतु अर्पण अवश्य करना चाहिए। वे घी और मधु से युक्त पायस, तथा कुछ विशिष्ट मांस (खड्ग, वाधृणस आदि) का उल्लेख करते हैं; इनके अभाव में उत्तम क्षीरान्न, और अंततः तिल-दर्भ तथा स्वर्ण-खंड मिले जल को भी स्वीकार्य विकल्प बताते हैं। आनर्त प्रश्न उठाते हैं कि शास्त्रों में निंदित मांस श्राद्ध में कैसे उचित है। भर्तृयज्ञ सृष्टि-प्रसंग का आधार देकर कहते हैं कि ब्रह्मा ने पितरों के लिए कुछ पदार्थों को ‘बलि-सदृश’ रूप से नियत किया है; अतः पितृकार्य में मर्यादित प्रयोग करने वाले दाता को पाप नहीं लगता। रोहिताश्व के ‘अनुपलब्धि’ प्रश्न पर मārkaṇḍeya और भर्तृयज्ञ अनुमेय मांसों की क्रमिक सूची, उनसे होने वाली पितृ-तृप्ति की अवधि, तथा तिल, मधु, कालशाक, दर्भ, घी, रजत-पात्र आदि श्राद्धार्ह वस्तुओं और पात्रों (दौहित्र सहित) का वर्णन करते हैं। अंत में श्राद्ध के समय इन नियमों का पाठ/उपदेश ‘अक्षय’ फल देने वाला और पितृ-गुह्य रहस्य बताया गया है।

चतुर्दशी-शस्त्रहत-श्राद्धनिर्णयवर्णनम् (Decision Narrative on the Caturdaśī Śrāddha for Violent/Untimely Deaths)
इस अध्याय में शस्त्र से मरे, दुर्घटना, विपत्ति, विष, अग्नि, जल, पशु-आक्रमण, फाँसी आदि अपमृत्यु को प्राप्त जनों के लिए प्रेतकाल में विशेषतः चतुर्दशी तिथि पर श्राद्ध करने का तात्त्विक कारण बताया गया है। आनर्त नामक राजा पूछता है कि चतुर्दशी ही क्यों, एकोद्दिष्ट-श्राद्ध क्यों कहा गया है, और इस प्रसंग में पार्वण श्राद्ध क्यों वर्जित है। भर्तृयज्ञ बृहत्त्कल्प की कथा सुनाते हैं—हिरण्याक्ष ब्रह्मा से वर माँगता है कि सूर्य के कन्या राशि में होने पर प्रेतकाल के एक ही दिन किए गए पिण्ड-उदकादि से प्रेत, भूत, राक्षस आदि वर्ग वर्षभर तृप्त रहें। ब्रह्मा वर देते हैं कि उस मास की चतुर्दशी को किया गया अर्पण निश्चित रूप से तृप्तिदायक होगा, विशेषकर रण में या हिंसक मृत्यु पाने वालों के लिए। फिर सिद्धान्त बताया जाता है कि आकस्मिक या युद्ध-मृत्यु में भय, पश्चात्ताप, भ्रम आदि से मन विचलित हो सकता है; इसलिए वीरों में भी प्रेत-स्थिति उत्पन्न हो सकती है, अतः उनके शमन हेतु यह विशेष दिन नियत है। उस दिन पार्वण नहीं, केवल एकोद्दिष्ट करना चाहिए, क्योंकि उच्च पितर उस अवसर पर ग्रहण नहीं करते; अन्यथा अर्पण वर-प्रभाव से अमानुषिक प्राणियों द्वारा हरण हो जाता है। अंत में कहा है कि श्राद्ध विधि उचित स्थानीय/जातीय कर्मकाण्डियों से ही करानी चाहिए (नागर का नागर द्वारा), अन्यथा कर्म निष्फल माना जाता है।

श्राद्धार्हानर्हब्राह्मणादिवर्णनम् / Classification of Eligible and Ineligible Agents for Śrāddha
इस अध्याय में श्राद्ध-कर्म के पात्र और अपात्र, तथा किस विधि और समय में श्राद्ध करना चाहिए—इसका सूक्ष्म धर्म-निरूपण है। भर्तृयज्ञ कहते हैं कि श्राद्ध श्राद्धार्ह ब्राह्मणों के द्वारा/साथ ही होना चाहिए, और दर्श आदि अवसरों पर पार्वण-विधान का यथोचित पालन आवश्यक है; विधि का उलट-फेर करने से फल नष्ट हो जाता है। वे आगे बताते हैं कि जारजात आदि निषिद्ध जन्म-चिह्नों वाले व्यक्तियों द्वारा किया गया श्राद्ध निष्फल हो जाता है। आनर्त, मनु के ‘बारह प्रकार के पुत्रों’ का उल्लेख कर शंका करता है कि पुत्रहीन के लिए भी कुछ पुत्र-रूप माने गए हैं। तब भर्तृयज्ञ युग-भेद के अनुसार निर्णय करते हैं—पूर्व युगों में कुछ श्रेणियाँ मान्य थीं, पर कलियुग में आचार-क्षय और नैतिक पतन के कारण वे शुद्धिकारक नहीं मानी जातीं, इसलिए नियम अधिक कठोर हैं। अध्याय वर्ण-संकर और निषिद्ध संयोगों के दुष्परिणाम, तथा उनसे उत्पन्न अपात्र संतानों का वर्णन करता है। अंत में ‘सत्पुत्र’ जो पितरों को पुम्नाम नरक से बचाते हैं, और वे वर्ग जो पतन का कारण कहे गए हैं—इनका भेद करके, जारजात-संबद्ध श्राद्ध को निष्फल ठहराया गया है।

श्राद्धविधिवर्णनम् (Śrāddha-vidhi-varṇanam) — Procedural Account of the Śrāddha Rite
यह अध्याय गृहस्थ के लिए श्राद्ध-विधि का क्रमबद्ध, मंत्राधारित वर्णन करता है, जिसका उद्देश्य पितरों की तृप्ति है। जिज्ञासु पूछता है कि गृहस्थ को श्राद्ध कैसे करना चाहिए। उपदेशक योग्य ब्राह्मणों के आमंत्रण, विश्वेदेवों के आवाहन, पुष्प-अक्षत-चंदन सहित अर्घ्य-दान, तथा दर्भ और तिल के उचित प्रयोग का विधान बताता है। देवकार्य में सव्य और पितृकार्य में अपसव्य का भेद, नांदीमुख पितरों के अपवाद, आसन-व्यवस्था और दिशानियम (मातृपक्ष के पितरों सहित) स्पष्ट किए गए हैं। आवाहन में विभक्ति आदि व्याकरण-शुद्धि को भी कर्म की शुद्धता का मानदंड कहा गया है। अग्नि और सोम के लिए यथोचित मंत्रों से होम, नमक के स्पर्श या सीधे हाथ से देने जैसी त्रुटियों से श्राद्ध के निष्फल होने का नियम, भोजन कराने की विधि और अनुमति-प्रार्थना बताई गई है। भोजन के बाद पिंडदान, वेदी-निर्माण, वितरण-नियम, अंत में आशीर्वाद, दक्षिणा और पात्रों को छूने के अधिकार-निषेध का वर्णन है। श्राद्ध दिन में ही करना चाहिए; समय-विपर्यय होने पर कर्म निष्फल होता है—यह फलश्रुति के साथ अध्याय समाप्त होता है।

सपिण्डीकरणविधिवर्णनम् (Description of the Sapīṇḍīkaraṇa Procedure)
इस अध्याय में अनर्त पार्वण-श्राद्ध के ज्ञात विधान के संदर्भ में एकोद्दिष्ट-श्राद्ध (विशिष्ट मृतक के लिए) की विधि पूछता है। भर्तृयज्ञ मृत्यु-संस्कारों से जुड़े श्राद्धों का समय-क्रम बताता है—अस्थि-संचयन से पूर्व के कृत्य, मृत्यु-स्थान पर श्राद्ध, मार्ग में जहाँ विश्राम हुआ वहाँ एकोद्दिष्ट, और तीसरा श्राद्ध संचयन-स्थल पर। फिर दिन-क्रम से नौ श्राद्धों का उल्लेख करता है (जैसे 1, 2, 5, 7, 9, 10 आदि दिन) और एकोद्दिष्ट में लाघव बताता है—देव-रहित, एक ही अर्घ्य, एक ही पवित्र, तथा आवाहन का त्याग। वह मंत्रोच्चार में व्याकरण-सावधानी भी बताता है—‘पितृ/पिता’ शब्द, गोत्र और नाम-रूप (शर्मन्) की सही विभक्ति आवश्यक है; त्रुटि होने पर पितरों के लिए श्राद्ध निष्फल माना जाता है। आगे सपिण्डीकरण का विधान आता है—सामान्यतः एक वर्ष बाद, पर कुछ स्थितियों में पहले भी। प्रेत के लिए नियत अर्पण को विशेष मंत्रों से तीन पितृ-पात्रों और तीन पितृ-पिण्डों में वितरित किया जाता है; इस मत में चौथे ग्राही का ग्रहण नहीं। सपिण्डीकरण के बाद एकोद्दिष्ट का निषेध और सपिण्डीकृत प्रेत को अलग पिण्ड देना भारी दोष कहा गया है। अंत में पिता के देहांत पर भी पितामह जीवित हों तो नाम-क्रम की शुद्धि, पितामह की तिथि पर पार्वण-श्राद्ध का निर्देश, तथा सपिण्डता स्थापित होने तक कुछ श्राद्ध-कर्मों को उसी प्रकार न करने की पुनः शिक्षा दी गई है।

तत्तद्दुरितप्राप्यैकविंशतिनरकयातनातन्निवारणोपायवर्णनम् (Chapter 226: On the Twenty-One Hells, Their Karmic Causes, and Remedial Means)
इस अध्याय में भर्तृयज्ञ सपिण्डीकरण का अर्थ बताते हैं—यह वह संस्कार है जिससे प्रेत-स्थिति समाप्त होकर मृतक का पितृ-सम्बन्ध (सपिण्डता) स्थापित होता है। पितरों के स्वप्न-दर्शन और जिनकी परलोक-गति अनिश्चित हो, उनके विषय में प्रश्न उठता है; उत्तर में कहा गया है कि ऐसे दर्शन प्रायः अपने ही वंश-सम्बन्धियों से जुड़े होते हैं और स्थिति कर्मानुसार होती है। पुत्रहीन व्यक्ति के लिए प्रतिनिधि-व्यवस्था का उल्लेख है; और जब उचित श्राद्धादि छूट जाएँ, विशेषकर अकाल/असामान्य मृत्यु में, तो प्रेत-निवारक प्रायश्चित्त रूप ‘नारायण-बलि’ का विधान बताया गया है। आगे धर्म, पाप और ज्ञान के अनुसार तीन गतियाँ—स्वर्ग, नरक और मोक्ष—समझाई जाती हैं। युधिष्ठिर-भीष्म संवाद के माध्यम से यमराज की व्यवस्था, चित्र-विचित्र नामक लेखकों, रौद्र और सौम्य कार्य करने वाले आठ प्रकार के यमदूतों, यममार्ग तथा वैतरणी-नदी के पार होने का वर्णन आता है। फिर इक्कीस नरकों की यातनाएँ और उनके कर्म-कारण बताए जाते हैं, साथ ही उनके निवारण हेतु क्रमबद्ध उपाय—विशिष्ट समयों पर श्राद्ध तथा मासिक/बहु-मासिक दान—निर्दिष्ट हैं। अंत में कहा गया है कि इन वर्णनों से कर्मफल स्पष्ट होता है और तीर्थ-यात्रा शुद्धि का साधन मानी गई है।

नरकयातनानिरसनोपायवर्णनम् (Means for the Mitigation of Naraka-Sufferings)
नरकों की यातनाएँ सुनकर युधिष्ठिर भयभीत होकर पूछते हैं कि पापी मनुष्य भी व्रत, नियम, हवन या तीर्थ-सेवन से कैसे छूट सकता है। भीष्म नरक-शमन के उपायों का विधान बताते हैं। वे कहते हैं कि जिनकी अस्थियाँ गंगा में प्रवाहित की जाती हैं, उन्हें नरक की अग्नि नहीं सताती; और मृतक के नाम से गंगा में किया गया श्राद्ध उसे नरक-चित्रों से परे उन्नति देता है। विधिपूर्वक प्रायश्चित्त तथा दान—विशेषतः सुवर्ण-दान—पापक्षय का साधन बताया गया है। इसके बाद स्थान-काल विशेष के मार्ग गिनाए गए हैं—धारा-तीर्थ आदि में, तथा वाराणसी, कुरुक्षेत्र, नैमिष, नागर-पुर, प्रयाग और प्रभास जैसे महातीर्थों में देहांत होने पर बड़े अपराधों के बावजूद भी उद्धार होता है। जनार्दन-भक्ति सहित प्रायोपवेशन और चित्रेश्वर में संयमित उपवास-मरण का भी उल्लेख है। दीन, अंधे, दरिद्र और थके यात्रियों को, समय के बाहर भी, अन्न देना नरक से रक्षा करने वाला कहा गया है। जला-धेनु, तिल-धेनु आदि दान, सूर्य-स्थिति के अनुसार, सोमनाथ-दर्शन, समुद्र व सरस्वती-स्नान, कुरुक्षेत्र में ग्रहण-व्रत, कार्त्तिका/कृत्तिका-योग में प्रदक्षिणा और त्रिपुष्कर—ये सब नरक-निवारक उपाय बताए गए हैं। अंत में कर्म-कारणता पर बल देते हुए कहा गया है कि छोटे दोष भी नरक की ओर ले जाते हैं, पर उचित साधनों से शमन संभव है।

जलशाय्युपाख्याने ब्रह्मदत्तवरप्रदानोद्धतान्धकासुरकृतशंकराज्ञावमाननवर्णनम् (Jalāśāyī Episode: The Boon to Brahmadatta and Andhaka’s Disregard of Śaṅkara’s Command)
अध्याय 228 में दो जुड़े हुए प्रसंग आते हैं। पहले सूत बिलद्वार तीर्थ की महिमा बताते हैं—यहाँ शेषनाग पर शयन करने वाले जलशायी विष्णु के दर्शन-पूजन से पाप नष्ट होते हैं। चातुर्मास्य के चार महीनों तक निरंतर भक्ति करने से तीर्थ-परिक्रमा और बड़े यज्ञों के समान फल, तथा मोक्ष-प्राप्ति कही गई है; यहाँ तक कि अत्यन्त अधर्मी जनों को भी उद्धार का मार्ग मिलता है। ऋषियों के संदेह पर कि क्षीरसागरशायी भगवान बिलद्वार में कैसे उपस्थित हो सकते हैं, सूत सिद्धान्त बताते हैं कि परब्रह्म स्वरूप भगवान अपनी इच्छा से किसी स्थान पर सुलभ रूप में प्रकट हो सकते हैं। फिर कथा-कारण आता है—हिरण्यकशिपु के पतन के बाद प्रह्लाद और अन्धक का वर्णन होता है; अन्धक ब्रह्मा से वर पाकर इन्द्र से युद्ध करता है और स्वर्ग के अधिकार छीन लेता है। इन्द्र शंकर की शरण लेता है; शंकर वीरभद्र को दूत बनाकर अन्धक को स्वर्ग छोड़कर पितृ-राज्य लौटने की आज्ञा देते हैं, पर अन्धक उस आज्ञा का उपहास कर अवज्ञा करता है—जिससे दैवी दण्ड और धर्म-स्थापन की भूमिका बनती है।

भृंगीरिट्युत्पत्तिवर्णनम् | Origin Narrative of Bhṛṅgīriṭi
सूता जी वर्णन करते हैं कि शिव क्रोध से उद्दीप्त होकर अपने गणों सहित, इन्द्र-प्रमुख देवताओं के सहारे, अमरावती की ओर बढ़ते हैं। दिव्य सेना को देखकर अन्धक भी चतुरंगिणी सेना लेकर सामने आता है और दीर्घकाल तक भयंकर युद्ध चलता है। शिव के त्रिशूल से विद्ध होने पर भी ब्रह्मा के वरदान के कारण अन्धक मरता नहीं, इसलिए संघर्ष बहुत समय तक खिंचता है। अन्त में शिव अन्धक को त्रिशूल पर चढ़ाकर ऊपर लटका देते हैं; उसके शरीर का क्षय होने लगता है और वह अपनी शक्ति-हानि तथा अधर्म का बोध करता है। तब वह आक्रामकता छोड़कर स्तुति और शरणागति करता है—कहता है कि शिव-नाम का उच्चारण भी मुक्ति-पथ की ओर ले जाता है, और शिव-भक्ति से रहित जीवन आध्यात्मिक रूप से निष्फल है। अन्धक की शुद्धि और विनय देखकर शिव उसे मुक्त करते हैं, शैव-गणों में पुनः स्थान देते हैं, और नया नाम ‘भृंगीरिटि’ प्रदान कर स्नेहपूर्वक निकटता देते हैं। अध्याय का संदेश है कि अहंकार और हिंसा का अंत आत्मस्वीकृति, पश्चात्ताप और भगवान की कृपा से पुनर्संयोजन में होता है।

वृकेन्द्रराज्यलम्भनवर्णनम् (Account of Vṛka’s Acquisition of Indra’s Sovereignty)
इस अध्याय में अन्धक-वध के बाद उसके पुत्र वृक का वर्णन आता है, जो शेष बचे असुर-स्वरूप के रूप में प्रकट होता है। वह पहले समुद्र के भीतर अत्यन्त सुरक्षित आश्रय में रहता है, फिर जम्बूद्वीप में आकर हाटकेश्वर-क्षेत्र को सिद्धि-स्थल मानता है, क्योंकि वहाँ पूर्व में अन्धक ने तप किया था। गुप्त रूप से वह क्रमशः कठोर तप करता है—पहले केवल जल पर, फिर वायु पर निर्वाह करते हुए—शरीर का अत्यन्त संयम रखकर कमलसम्भव पितामह ब्रह्मा का ध्यान करता है। दीर्घ तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा प्रकट होते हैं, उसे उग्र तप से विरत होने को कहते हैं और वर देते हैं। वृक जरा और मृत्यु से मुक्ति माँगता है; ब्रह्मा उसे यह वर देकर अन्तर्धान हो जाते हैं। वर से बलवान होकर वृक रैवतक पर्वत पर योजना बनाकर इन्द्र पर चढ़ाई करता है। इन्द्र वृक की अवध्यता जानकर अमरावती छोड़ देता है और देवों सहित ब्रह्मलोक में शरण लेता है। वृक देवलोक में प्रवेश कर इन्द्रासन पर बैठता है, शुक्राचार्य से अभिषेक पाता है, और आदित्य, वसु, रुद्र, मरुत आदि के पदों पर दैत्यों को नियुक्त कर यज्ञ-भागों की व्यवस्था भी शुक्र की आज्ञा से बदल देता है। अध्याय वरदान की शक्ति और उसके जोखिम, तप से प्राप्त सत्ता की नैतिक जटिलता तथा लोक-शासन की असुरक्षा को दर्शाता है।

हाटकेश्वरक्षेत्रमाहात्म्ये जलशाय्युपाख्यानम् — Ekādaśī-vrata Māhātmya (Hāṭakeśvara-kṣetra and the Jalāśayī Narrative)
इस अध्याय में दैत्यराज वृक के प्रभुत्व में कर्मकाण्ड का संकट बताया गया है। वह यज्ञ, होम और जप को दबाने के लिए अपने गुप्तचर भेजकर साधकों को खोजता और मरवाता है; फिर भी ऋषि छिपकर उपासना करते रहते हैं। सांकृति मुनि हाटकेश्वर-क्षेत्र में चतुर्भुज वैष्णव प्रतिमा के सामने गुप्त तप करते हैं; विष्णु के तेज से दैत्य उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाते। वृक स्वयं आक्रमण करता है, पर उसका शस्त्र निष्फल हो जाता है; मुनि के शाप से उसके पाँव गिर जाते हैं और वह असहाय हो जाता है, जिससे देवताओं को फिर स्थिरता मिलती है। बाद में ब्रह्मा वृक के तप से प्रसन्न होकर पुनर्स्थापन चाहते हैं, पर सांकृति कहते हैं कि पूर्ण पुनर्स्थापन से लोक-हानि का भय है। इसलिए एक समझौता होता है—नियत समय के बाद, वर्षा-ऋतु की व्यवस्था के अनुसार, वृक को फिर चलने-फिरने की शक्ति मिलती है। इन्द्र बार-बार के संकट से व्याकुल होकर बृहस्पति से परामर्श लेता है और विष्णु के लिए ‘अशून्यशयन’ व्रत करता है। तब विष्णु चातुर्मास्य में हाटकेश्वर-क्षेत्र में वृक पर शयन करते हैं, उसे चार मास तक स्थिर रखते हैं और इन्द्र का राज्य सुरक्षित करते हैं; साथ ही शयन-काल के आचार-नियम तथा शयन-एकादशी और बोधन-एकादशी की विशेष महिमा कही गई है।

चातुर्मास्यव्रतनियमवर्णनम् (Cāturmāsya Vrata and Niyama Regulations)
ऋषियों के पूछने पर कि चातुर्मास में जब भगवान विष्णु (शंख–चक्र–गदा धारी, गरुड़ध्वज) ‘शयन’ में माने जाते हैं तब क्या करना चाहिए, सूत पितामह ब्रह्मा का प्रमाण-वचन सुनाते हैं—इस काल में श्रद्धा से किया गया कोई भी नियम अनन्त फल देने वाला होता है। अध्याय चारों महीनों के लिए क्रमबद्ध साधनाएँ बताता है: भोजन-नियम (एकभक्त, नक्षत्रानुसार भोजन, उपवास का क्रम, षष्ठान-काल में भोजन, त्रिरात्र उपवास) तथा शुद्धि-संयम (सायं-प्रातः नियम, अयाचित वृत्ति, तेल/घी की मालिश का त्याग, ब्रह्मचर्य, तेलरहित स्नान, मधु-मांस वर्जन)। मास-विशेष त्याग भी बताए गए हैं—श्रावण में शाक, भाद्रपद में दही, आश्विन में दूध, और कार्तिक में मांस का त्याग; साथ ही कांस्य पात्रों से परहेज़, और कार्तिक में विशेष रूप से मांस, क्षौर, मधु तथा मैथुन का निषेध। सकारात्मक भक्ति-कर्मों में तिल-अक्षत से वैष्णव मंत्रों द्वारा होम, पौरुष सूक्त का जप, मौनपूर्वक मित-चरणों/मित-मुट्ठियों से प्रदक्षिणा, विशेषकर कार्तिक में ब्राह्मण-भोजन, विष्णु-धाम में वेद-स्वाध्याय, तथा नृत्य-गीतादि को अर्पण रूप में करना कहा गया है। जलशायी देवालय के शिखर-कलश पर दीपदान को विशिष्ट तीर्थ-कर्म बताया गया है, जो पूर्व नियम-फलों का संयुक्त भाग देने वाला माना गया है। अंत में संकल्प और सामर्थ्य के अनुसार नियम-पालन, पूर्ण होने पर ब्राह्मण को दान, और बिना किसी नियम के चातुर्मास बिताने को निष्फल कहा गया है। फलश्रुति में सुनने/पढ़ने वाले के भी चातुर्मास्य दोषों से मुक्त होकर मोक्ष-प्राप्ति का आश्वासन दिया गया है।

चातुर्मास्यमाहात्म्ये गंगोदकस्नानफलमाहात्म्यवर्णनम् (Cāturmāsya Māhātmya: The Merit of Bathing with Gaṅgā-Water)
अध्याय 233 में चातुर्मास्य-व्रत का माहात्म्य बहुस्तरीय रूप से बताया गया है। सूत जी जिज्ञासु ऋषियों से कहते हैं और भीतर ब्रह्मा–नारद संवाद के माध्यम से यह स्थापित होता है कि चातुर्मास्य का काल विष्णु-भक्ति और शुद्धि-नियमों के लिए अत्यन्त फलदायक है। विशेष रूप से प्रातःकाल स्नान को प्रधान साधना कहा गया है, जिससे पाप-क्षय होता है और अन्य धर्मकर्मों की निष्फलता दूर होकर उनकी सिद्धि पुनः जाग्रत होती है। अनेक जलों और तीर्थों का वर्गीकरण दिया गया है—नदियाँ, पुष्कर और प्रयाग जैसे महातीर्थ, रेवा/नर्मदा और गोदावरी आदि क्षेत्रीय जल, समुद्र-संगम, तथा तिल, आँवला और बिल्वपत्र से संस्कृत किए गए विकल्प-जल। यह भी बताया गया है कि जलपात्र के पास मन से गंगा का स्मरण करने पर भी स्नान-फल प्राप्त होता है, क्योंकि गंगा भगवान के पादोदक से सम्बद्ध मानी गई है। रात्रि-स्नान से बचने और सूर्य-दर्शन के साथ शुद्धि पर बल है; अंत में, जब वास्तविक स्नान संभव न हो तो भस्म-स्नान, मंत्र-स्नान या विष्णु के पादोदक से स्नान को भी पवित्र करने वाला विकल्प कहा गया है।

चातुर्मास्यनियमविधिमाहात्म्यवर्णनम् (Glorification and Procedure of Cāturmāsya Disciplines)
इस अध्याय में ब्रह्मा और नारद के संवाद के रूप में चातुर्मास्य-माहात्म्य का वर्णन है। स्नान के अंत में प्रतिदिन श्रद्धापूर्वक पितृतर्पण करने, विशेषतः पुण्य-तीर्थ में, तथा संगम-स्थलों पर देवतार्पण, जप और होम से महान पुण्य की प्राप्ति बताई गई है। आगे शुभ कर्मों से पूर्व गोविन्द-स्मरण को आधार मानकर सत्संग, द्विज-भक्ति, गुरु-देव-अग्नि तर्पण, गोदान, वेदपाठ, सत्यवचन और निरंतर दान-भक्ति को धर्म के सहायक स्तम्भ कहा गया है। नारद के प्रश्न पर ब्रह्मा ‘नियम’ की परिभाषा देते हैं—इन्द्रियों और आचरण का संयम, भीतर के शत्रुओं (षड्वर्ग) पर विजय, तथा क्षमा और सत्य जैसे गुणों की स्थापना। मनोनिग्रह को ज्ञान और मोक्ष का कारण बताकर क्षमा को समस्त नियमों का एक सूत्र कहा गया है। सत्य को परम धर्म, अहिंसा को धर्म की जड़, ब्राह्मणों और देवताओं की वस्तु की चोरी से विशेष परहेज़, अहंकार-त्याग, शम-संतोष और अनसूया (ईर्ष्या-रहित भाव) का पालन बताया गया है। अंत में भूत-दया को अनिवार्य धर्म घोषित किया गया है—क्योंकि हरि सभी के हृदय में निवास करते हैं, अतः प्राणियों को कष्ट देना अधर्म है; चातुर्मास्य में दया को विशेष रूप से सनातन धर्म कहा गया है।

Cāturmāsya-dāna-mahimā (Theological Discourse on the Eminence of Charity during Cāturmāsya)
इस अध्याय में ब्रह्मा–नारद संवाद के माध्यम से चातुर्मास्य का माहात्म्य कहा गया है, जिसे ‘हरौ सुप्ते’—अर्थात् विष्णु के शयन-कल्पित काल—के रूप में विशेष पुण्यदायक माना गया है। आरम्भ में दान को सर्वोच्च धर्म बताकर, अन्नदान और उदकदान को अद्वितीय एवं अतुलनीय कहा गया है; ‘अन्नं ब्रह्म’ के सिद्धान्त से यह भी प्रतिपादित है कि प्राण-धारण अन्न पर ही आश्रित है। चातुर्मास्य में किए जाने वाले पुण्यकर्मों की विस्तृत सूची दी गई है—अन्न-जल दान, गोदान, वेदपाठ, हवन, गुरु और ब्राह्मणों का भोजन-तर्पण, घृतदान, पूजन, तथा सत्पुरुषों की सेवा। साथ ही सहायक दानों का भी निर्देश है—दुग्ध-उत्पाद, पुष्प, चन्दन/अगरु/धूप, फल, विद्यादान और भूमिदान। प्रतिज्ञात दान के विषय में नैतिक सावधानी बताई गई है: वचन देकर दान में विलम्ब करना आध्यात्मिक रूप से संकटकारी है, जबकि समय पर देना पुण्य बढ़ाता है; प्रतिज्ञात वस्तु का अपहरण या अन्यत्र मोड़ देना निषिद्ध कहा गया है। फलश्रुति में यमलोक से बचाव, विशेष लोकों की प्राप्ति, ऋणत्रय से मुक्ति तथा पितरों को लाभ का वर्णन है; और अध्याय का स्थान नागरखण्ड, हाटकेश्वर-क्षेत्रमाहात्म्य, शेषशय्या-उपाख्यान तथा चातुर्मास्य-माहात्म्य-क्रम में बताया गया है।

इष्टवस्तुपरित्यागमहिमवर्णनम् (The Glory of Renouncing Preferred Objects during Cāturmāsya)
इस अध्याय में ब्रह्मा–नारद संवाद के रूप में चातुर्मास्य का उपदेश है। ब्रह्मा बताते हैं कि यह काल नारायण/विष्णु की विशेष आराधना का समय है, जहाँ त्याग और संयम से अक्षय पुण्य प्राप्त होता है और भक्ति दृढ़ होती है। यहाँ अनेक वर्जन बताए गए हैं—विशेषकर ताँबे के पात्र का त्याग, पलाश/अर्क/वट/अश्वत्थ के पत्तों पर भोजन, तथा नमक, अन्न-धान्य/दालें, रस, तेल, मिठाइयाँ, दुग्ध-पदार्थ, मद्य और मांस आदि का परित्याग। वस्त्रों के कुछ रंगों/प्रकारों और चंदन, कपूर, केसर-सदृश सुगंधित विलास-वस्तुओं से भी विरति कही गई है; हरि के योगनिद्रा-काल में शृंगार/सज्जा से बचने का निर्देश है। विशेष रूप से पर-निंदा को घोर दोष बताकर निषेध किया गया है। अंत में कहा गया है कि हर प्रकार से विष्णु को प्रसन्न करना ही प्रधान है; चातुर्मास्य में विष्णु-नाम का स्मरण, जप और कीर्तन मुक्तिदायक तथा अत्यंत फलदायी है।

Cāturmāsya-māhātmya and Vrata-mahimā (चातुर्मास्यमाहात्म्ये व्रतमहिमवर्णनम्)
इस अध्याय में ब्रह्मा–नारद संवाद के माध्यम से विष्णु-उपासना में काल-निर्णय, आचार-संयम और भक्ति-भाव का विधान बताया गया है। नारद पूछते हैं कि विष्णु के निकट विधि और निषेध कब ग्रहण करने चाहिए। ब्रह्मा कर्कट-संक्रान्ति को संकेत मानकर शुभ जामुन-फलों सहित अर्घ्य देने और वासुदेव के प्रति आत्म-समर्पण की मंत्र-निष्ठा से पूजा करने का निर्देश देते हैं। फिर विधि (विहित कर्म) और निषेध (नियमित संयम) को परस्पर पूरक धर्म-नियम कहा गया है, जिनका आधार स्वयं विष्णु हैं; विशेषतः चातुर्मास्य को सर्वमंगलमय काल बताकर उसमें भक्ति सहित इनका पालन करने पर बल दिया गया है। देव के “शयन”काल में कौन-सा व्रत श्रेष्ठ है—इस प्रश्न पर ब्रह्मा विष्णु-व्रत को फलदायक बताते हैं और ब्रह्मचर्य को सर्वोच्च व्रत घोषित करते हैं, जो तप और धर्म की मूल शक्ति है। अध्याय में होम, ब्राह्मण-सेवा, सत्य, दया, अहिंसा, अस्तेय, इन्द्रिय-निग्रह, अक्रोध, असंग, वेदाध्ययन, ज्ञान तथा कृष्ण-समर्पित चित्त जैसे आचारों का वर्णन है। ऐसे साधक को जीवन्मुक्त और पाप से अलिप्त कहा गया है। अंत में बताया गया है कि चातुर्मास्य में आंशिक पालन भी फल देता है, तप से शरीर शुद्ध होता है, और हरि-भक्ति ही समस्त व्रत-व्यवस्था का प्रधान समन्वय-सूत्र है।

चातुर्मास्यमाहात्म्ये तपोमहिमावर्णनम् (Tapas and the Greatness of Cāturmāsya Observance)
इस अध्याय में ब्रह्मा–नारद संवाद के माध्यम से, शेषशायी विष्णु के प्रसंग में, चातुर्मास्य काल के तप का स्वरूप बताया गया है। तप केवल उपवास नहीं, बल्कि विष्णु की षोडशोपचार पूजा, निरंतर पंच-यज्ञों का पालन, सत्य, अहिंसा और इंद्रिय-निग्रह सहित समग्र अनुशासन है। गृहस्थों के लिए दिशानुसार पंचायतन-शैली की पूजा-योजना दी गई है—काल-केन्द्र में सूर्य-चन्द्र, अग्निकोण में गणेश, नैऋत्य में विष्णु, वायव्य में कुल/वंश-देवता, ईशान में रुद्र; साथ ही पुष्प-निर्देश और संकल्प बताए गए हैं, जैसे विघ्न-नाश, रक्षा, संतान-प्राप्ति और अपमृत्यु-निवारण। इसके बाद चातुर्मास्य के विविध तप-व्रत क्रमशः गिनाए गए हैं—नियमित आहार, एकभुक्त/एकांतर, कृच्छ्र-पराक आदि, तथा द्वादशी-चिह्नित ‘महापाराक’ क्रम। प्रत्येक के फल में पाप-शुद्धि, वैकुण्ठ-प्राप्ति और भक्ति-ज्ञान की वृद्धि कही गई है। अंत में श्रवण-पाठ की महिमा बताकर इसे विष्णु के शयन-काल में गृहस्थों हेतु उच्च मूल्य का धर्म-आचार मार्गदर्शक कहा गया है।

चातुर्मास्यमाहात्म्ये तपोऽधिकार-षोडशोपचार-दीपमहिमवर्णनम् | Cāturmāsya Māhātmya: Sixteenfold Worship and the Merit of Lamp-Offering
अध्याय 239 में ब्रह्मा–नारद संवाद है। नारद पूछते हैं कि हरि के शयन-भाव में विशेषतः षोडशोपचार (सोलह सेवाओं) से पूजा कैसे की जाए; वे उसका विस्तृत विधान जानना चाहते हैं। ब्रह्मा वेद-प्रामाण्य के आधार पर बताते हैं कि विष्णु-भक्ति का मूल वेद है और पूजा-क्रम वेद–ब्राह्मण–अग्नि–यज्ञ की पवित्र परंपरा से जुड़ा है। फिर चातुर्मास्य का माहात्म्य कहा गया है—इस काल में हरि का जल-सम्बद्ध रूप से चिंतन किया जाता है; जल से अन्न, और अन्न से विष्णु-सम्बद्ध पवित्र तत्त्व का संबंध बताया गया है। अर्पण-उपचारों को संसार के बार-बार आने वाले क्लेशों से रक्षा करने वाला कहा गया है। अंतः/बहिः न्यास, वैकुण्ठ-रूप का आवाहन, फिर आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, सुगंधित व तीर्थ-जल से स्नान, वस्त्र-दान, यज्ञोपवीत का महत्त्व, चंदन-लेपन, शुद्ध श्वेत पुष्पों से पूजा, मंत्रों सहित धूप, और अंत में दीपदान का क्रम वर्णित है। दीपदान को अंधकार और पाप का शक्तिशाली नाशक कहा गया है। पूरे अध्याय में यह शर्त बार-बार आती है कि फल श्रद्धा से ही सिद्ध होता है, और पूजा को नैतिक-आध्यात्मिक अनुशासन के रूप में रखा गया है। चातुर्मास्य में दीपदान आदि के प्रबल फल-श्रुति के साथ अध्याय समाप्त होता है।

Haridīpa-pradāna Māhātmya (Theological Discourse on Offering a Lamp to Hari/Vishnu, especially in Cāturmāsya)
इस अध्याय में ब्रह्मा–नारद संवाद के रूप में हरि/विष्णु को दीपदान करने की महिमा कही गई है। ब्रह्मा बताते हैं कि अन्य दानों और पूजाओं की अपेक्षा हरि के लिए अर्पित दीप श्रेष्ठ है; वह पाप-नाशक है और चातुर्मास्य में विशेष रूप से संकल्प-पूर्ति तथा इच्छित फल देने वाला माना गया है। फिर क्रमबद्ध साधना-विधि आती है—दीप अर्पण के साथ विधिवत पूजन, त्रयोदशी को नैवेद्य-समर्पण, और ‘हरि-शयन’ के समय चातुर्मास्य में प्रतिदिन अर्घ्य-दान। शंख-जल के साथ पान के पत्ते, सुपारी, फल आदि अर्घ्य में रखकर केशव को मंत्रपूर्वक अर्पित करने का विधान है; इसके बाद आचमन, आरती, चतुर्दशी को साष्टांग प्रणाम, और पूर्णिमा को प्रदक्षिणा—जिसे तीर्थ-यात्रा और जल-दान के समान फलदायी कहा गया है। अंत में ध्यान-प्रधान उपदेश है: योग-सम्पन्न साधक स्थिर मूर्ति-कल्पना से परे सर्वत्र दिव्य सन्निधि का चिंतन करे, आत्मा का विष्णु से संबंध मनन करे, और वैष्णव भाव से देह रहते हुए भी मुक्ति (जीवनमुक्ति) की ओर बढ़े। चातुर्मास्य को ऐसी अनुशासित भक्ति के लिए विशेष अनुकूल काल बताया गया है।

सच्छूद्रकथनम् (Discourse on the 'Sat-Śūdra' and household dharma in Chāturmāsya)
यह अध्याय संवाद-रूप में धर्म और आचार का उपदेश देता है। आरम्भ में ईश्वर योग्य साधकों के लिए विष्णु-पूजन की सोलह विधियों को परम पद की प्राप्ति का साधन बताते हैं। फिर कर्माधिकार, तथा विशेष कृष्ण-उपासना के बिना मोक्षाभिमुख पुण्य कैसे प्राप्त हो—इस पर चर्चा होती है। कार्त्तिकेय शूद्रों और स्त्रियों के धर्म के विषय में पूछते हैं। ईश्वर वेद-पाठ आदि में प्रतिबन्धात्मक बातें कहकर आगे “सत्-शूद्र” की पहचान गृहस्थ-धर्म से करते हैं—उचित गुणों वाली विधिवत् विवाहिता पत्नी, संयमित गृहस्थ जीवन, मंत्रों के बिना पंच-यज्ञ, अतिथि-सत्कार, दान, और द्विज अतिथियों की सेवा। पतिव्रता-धर्म, दाम्पत्य-सामंजस्य की धार्मिक प्रभावशीलता, तथा वर्ण-भेद के अनुसार विवाह-नियम, विवाह-प्रकार और संतान-प्रकार स्मृति-शैली में बताए जाते हैं। अन्त में अहिंसा, श्रद्धापूर्वक दान, मर्यादित आजीविका, नित्य दिनचर्या और चातुर्मास्य में विशेष पुण्य-वृद्धि का विधान आता है। इस प्रकार गृहस्थ आचरण और ऋतु-पालन को आधार बनाकर साधना-प्रधान, क्रमबद्ध धर्म-मानचित्र प्रस्तुत किया गया है।

Aṣṭādaśa-prakṛti-kathana (Discourse on the Eighteen Social/Occupational Natures)
अध्याय 242 तीर्थ-माहात्म्य की पृष्ठभूमि में ब्रह्मा–नारद संवाद के रूप में है। नारद “अष्टादश प्रकृतियाँ” (अठारह स्वभाव/वर्ग) और उनकी उचित वृत्ति (जीविका व आचरण) के विषय में प्रश्न करते हैं। ब्रह्मा अपनी सृष्टि-स्मृति सुनाते हैं—कमल से प्रकट होना, असंख्य ब्रह्माण्डों का दर्शन, जड़ता में पड़ जाना, फिर तप करने की प्रेरणा और अंततः सृष्टि-कार्य का अधिकार प्राप्त होना। इसके बाद अध्याय सृष्टि से सामाजिक-धर्म की ओर आता है और वर्णानुसार कर्तव्यों का निरूपण करता है—ब्राह्मण के लिए संयम, अध्ययन और भक्ति; क्षत्रिय के लिए प्रजा-रक्षा व निर्बलों का संरक्षण; वैश्य के लिए अर्थ-व्यवस्था, दान और व्यापार-धर्म; शूद्र के लिए सेवा, शुचिता और कर्तव्यनिष्ठा। यह भी बताया गया है कि मंत्ररहित कर्मों से भी भक्ति का मार्ग सुलभ है। अठारह प्रकृतियों के अंतर्गत विभिन्न व्यवसाय-समूहों को उच्च/मध्य/निम्न रूप में संकेततः रखा गया है और निष्कर्ष में कहा गया है कि विष्णु-भक्ति सभी वर्ण, आश्रम और प्रकृतियों के लिए परम कल्याणकारी है। फलश्रुति में इस पावन पुराणांश के श्रवण-पाठ से पापक्षय और सदाचार-निष्ठ साधक की विष्णुलोक-प्राप्ति बताई गई है।

शालिग्रामपूजनमाहात्म्यवर्णनम् | The Glory of Śālagrāma Worship (Paijavana Upākhyāna)
ब्रह्मा धर्म-शिक्षा के लिए पयजवन नामक एक शूद्र गृहस्थ का उदाहरण देते हैं। वह सत्यनिष्ठ, धर्मसम्मत आजीविका वाला, अतिथि-सत्कार में तत्पर, विष्णु तथा ब्राह्मणों का भक्त है। उसके घर में ऋतुओं के अनुसार दान, लोक-कल्याण के कार्य (कुएँ, तालाब, धर्मशालाएँ) और व्रत-नियमों का अनुशासन दिखाया गया है, जिससे गृहस्थ-धर्म की आध्यात्मिक फलप्रदता स्थापित होती है। गालव ऋषि शिष्यों सहित आते हैं और पयजवन उन्हें आदरपूर्वक ग्रहण करता है। वह इस आगमन को पावन मानकर पूछता है कि वेद-पाठ का अधिकार न होने पर भी मोक्ष देने वाला कौन-सा साधन अपनाया जाए। गालव शालिग्राम-केन्द्रित हरिभक्ति का उपदेश देते हैं—यह अक्षय पुण्य देने वाली है, चातुर्मास में विशेष फलदायी है और आसपास के स्थान को भी पवित्र करती है। अधिकार-विचार में ‘असत्-शूद्र’ और ‘सत्-शूद्र’ का भेद बताकर योग्य गृहस्थों और सद्गुणी स्त्रियों के लिए भी इस उपासना का मार्ग स्वीकार किया जाता है, तथा संशय को फल-नाशक कहा गया है। तुलसी-समर्पण (पुष्पों से श्रेष्ठ), माला, दीप, धूप, पंचामृत-स्नान और शालिग्राम रूप में हरि-स्मरण जैसी विधियाँ बताई जाती हैं; फलस्वरूप पवित्रता, अविनाशी स्वर्ग-वास और अंततः मोक्ष की प्राप्ति कही गई है। अंत में चौबीस प्रकार के शालिग्राम-स्वरूपों का उल्लेख कर माहात्म्य की परम्परा पूर्ण होती है।

चतुर्मास्यमाहात्म्ये चतुर्विंशतिमूर्त्तिनिर्देशः (Cāturmāsya Māhātmya: Enumeration of the Twenty-Four Forms)
इस अध्याय में पैजवन गुरु के वचन-रूपी अमृत को सुनकर भी तृप्त न होकर तत्त्व-भेदों का विस्तृत विवेचन माँगता है। गालव उत्तर में पुराणोक्त ऐसी गणना बताने का वचन देते हैं, जिसके श्रवण से पापों का क्षय होता है। फिर हरि/विष्णु की चौबीस मूर्तियों/नामों का क्रमबद्ध निर्देश आता है—केशव, मधुसूदन, संकर्षण, दामोदर, वासुदेव, प्रद्युम्न आदि, कृष्ण तक—जिन्हें वर्ष भर उपासना के लिए प्रमाणित समूह माना गया है। इन नामों को तिथि-व्यवस्था और वार्षिक चक्र से जोड़कर नियमित भक्ति-क्रम का संकेत दिया गया है, तथा चौबीस की यह योजना अन्य चौबीसी गणनाओं (जैसे अवतार) से भी संबद्ध बताई गई है। अंत में कहा गया है कि नियत काल में एकाग्र भक्ति से पूजन करने पर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थ प्राप्त होते हैं; तथा श्रद्धा से श्रवण या पाठ करने से सृष्टि के पालक हरि प्रसन्न होते हैं।

Devas Returning to Mandarācala for Śiva-darśana (Tāraka-opadrava Context) | मंदराचलंप्रतिगमनवर्णनम्
इस अध्याय में पैजवन, गलव से शालग्राम की उत्पत्ति और पत्थर में नित्य भगवान की उपस्थिति का तात्त्विक कारण पूछता है तथा भक्ति को स्थिर करने वाला उपदेश चाहता है। गलव उत्तर को पुराण-प्रसिद्ध इतिहास के रूप में रखते हुए कथा आरम्भ करता है—दक्ष का शिव-विरोध यज्ञ में सती के देह-त्याग तक पहुँचता है; फिर सती पार्वती रूप में जन्म लेकर महादेव के लिए दीर्घ तप करती है। शिव परीक्षा-रूप धारण कर पार्वती की निष्ठा परखते हैं, उसे स्वीकार करते हैं और देवताओं की उपस्थिति में वैदिक विधि से विवाह सम्पन्न होता है। आगे शिव की अनुमति से कामदेव का पुनः देहधारण बताया गया है। उधर वरदान से बलवान तारक के उपद्रव से पीड़ित देव ब्रह्मा के पास जाते हैं; ब्रह्मा बताता है कि पार्वती से उत्पन्न शिव-पुत्र सात दिनों के बाद तारक का वध करेगा। अंत में देव मंदराचल की ओर बढ़ते हैं, जहाँ शिवगण सतर्क रहते हैं, और देव चातुर्मास्य-भाव से दीर्घ तप कर शिव-दर्शन व अनुग्रह की याचना करते हैं।

पार्वत्येन्द्रादीनां शापप्रदानवृत्तान्तवर्णनम् | Parvatī’s Curse upon Indra and the Devas: Narrative Account and Ritual Implications
इस अध्याय में गालव व्रत-चर्या के प्रश्न के उत्तर में देवताओं की कथा कहते हैं। देव प्रत्यक्ष दर्शन न पा सकने से शिव की एक मूर्त-रूप कल्पना करके शैव-भाव से तप करते हैं—षडक्षर मंत्र-जप, चातुर्मास्य का कठोर नियम, तथा भस्म, कपाल-दण्ड, अर्धचंद्र और पंचवक्त्र-चिह्नों सहित व्रत की पहचान बताने वाले लक्षण धारण करते हैं। शिव उनकी शुद्धि और भक्ति से प्रसन्न होकर ‘शुभ मति’ प्रदान करते हैं और बताते हैं कि विधिपूर्वक शतरुद्रीय-जप, ध्यान, दीप-दान और षोडशोपचार पूजा से वे संतुष्ट होते हैं। इसी बीच एक दिव्य सत्ता पक्षी-रूप धारण कर शिव के निकट आती है; उससे उत्पन्न प्रसंग में पार्वती को रोष होता है और वे देवताओं को शाप देती हैं कि वे पाषाणवत और संतानहीन हो जाएँ। देवगण दीर्घ स्तुति करके पार्वती को प्रकृति, मंत्र-बीज और सृष्टि-स्थिति-प्रलय की आधार-शक्ति मानकर क्षमा याचना करते हैं। साथ ही चातुर्मास्य में विशेषतः बिल्वपत्र-पूजन को अत्यन्त फलदायी बताया जाता है; विनय, अनुशासन और मेल-मिलाप की नीति तथा शिव-शक्ति की सर्वोच्चता और परस्पर-सम्पूरकता इस तीर्थ-कथा का मुख्य उपदेश बनती है।

अश्वत्थमहिमवर्णनम् (Aśvattha-Mahimā Varṇanam) — The Glory of the Aśvattha Tree in Chāturmāsya
अध्याय के आरम्भ में पैजवन पूछते हैं कि श्री (लक्ष्मी) तुलसी में और पार्वती बिल्व-वृक्ष में कैसे प्रतिष्ठित हैं। तब मुनि गालव पूर्व प्रसंग सुनाते हैं—देव–असुर संग्राम में पराजित और भयभीत देवता ब्रह्मा की शरण जाते हैं; ब्रह्मा पक्षपात से इंकार कर उच्चतर समाधान की ओर संकेत करते हैं। इसी प्रसंग में हरिहर स्वरूप का वर्णन आता है—अर्ध शिव, अर्ध विष्णु—जो अभेद-तत्त्व का प्रतीक बनकर मतभेदों में उलझे जनों को निर्वाणोन्मुख मार्ग दिखाता है। फिर वृक्ष-तत्त्व की स्थापना होती है: देवता जानते हैं कि बिल्व में पार्वती और तुलसी में लक्ष्मी का निवास है, और आकाशवाणी से सुनते हैं कि चातुर्मास्य में ईश्वर करुणावश वृक्षरूप से भी वास करते हैं। अश्वत्थ (पीपल) को विशेष महिमावान बताया गया है, विशेषतः गुरुवार को; उसके स्पर्श, दर्शन, पूजन, जल-सेवा तथा दूध और तिल-मिश्रित अर्पण से पवित्रता का फल कहा गया है। अश्वत्थ का स्मरण और सेवा यमलोक-भय तथा पापों का शमन करती है, और वृक्ष को हानि पहुँचाने की कठोर मनाही है। अंत में विष्णु की व्याप्ति बताई गई—मूल में विष्णु, तने में केशव, शाखाओं में नारायण, पत्तों में हरि और फलों में अच्युत—और निष्कर्ष है कि भक्तिपूर्वक वृक्ष-सेवा मोक्षोन्मुख पुण्य देती है।

पालाशमहिमवर्णनम् (The Glorification of the Palāśa/Brahma-Tree) — Cāturmāsya Context
इस अध्याय में वाणी पालाश-वृक्ष (ब्रह्मवृक्ष) का धर्ममय माहात्म्य बताती हैं। पालाश को अनेक उपचारों से पूज्य, मनोकामना-पूर्ति करने वाला और महापापों का नाशक कहा गया है। इसके पत्तों में बाएँ-दाएँ-मध्य के रूप में देव-त्रय का सांकेतिक विन्यास बताया गया है, और जड़, तना, शाखा, पुष्प, पत्ते, फल, छाल तथा गूदा—वृक्ष के प्रत्येक अंग में देवताओं का निवास मानकर उसे साक्षात् देवमय प्रकृति के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। पालाश-पत्र के पात्रों में भोजन करने से महान यज्ञों के समान फल, अनेक अश्वमेधों के तुल्य पुण्य—विशेषतः चातुर्मास्य में—प्राप्त होता है। रविवार को दूध से पूजा और गुरुवार को भक्ति-आचरण का विशेष महत्त्व कहा गया है; प्रातःकाल पालाश का दर्शन भी पवित्र करने वाला माना गया है। अंत में पालाश को ‘देवबीज’ और ब्रह्म का प्रकट रूप कहकर, चातुर्मास्य में श्रद्धापूर्वक उसकी सेवा को शुद्धि और दुःख-निवारण का आचार-मार्ग बताया गया है।

तुलसीमाहात्म्यवर्णनम् (Glorification of Tulasī: Virtue, Protection, and Cāturmāsya Practice)
इस अध्याय में तुलसी को गृहस्थ-धर्म और व्रत-धर्म में पवित्र करने वाली उपस्थिति तथा भक्ति का साधन बताया गया है। कहा गया है कि घर में तुलसी का रोपण महान फल देता है और दरिद्रता का निवारण करता है। आगे तुलसी के दर्शन, स्वरूप, पत्ते, फूल, फल, काष्ठ, मज्जा और छाल आदि में श्री/लक्ष्मी तथा मंगल का निवास बताकर उसे सर्वत्र शुद्धि और आशीर्वाद की वाहिनी कहा गया है। तुलसी को सिर पर, मुख में, हाथों में, हृदय में, कंधों पर और कंठ में धारण करने से रक्षा, रोग-शोक से मुक्ति और मोक्षाभिमुख स्थिति का वर्णन है। प्रतिदिन तुलसी-पत्र साथ रखना और नियमित जल देना भक्ति-आचरण के रूप में प्रशंसित है, विशेषतः चातुर्मास में तुलसी-सेवा दुर्लभ और अत्यन्त पुण्यदायी कही गई है; दूध से सींचना और तुलसी के आलवाले (क्यारी) का पोषण/दान भी बताया गया है। अंत में यह एकीकृत दृष्टि दी गई है कि हरि सभी वृक्षों में प्रकाशित हैं और कमला (लक्ष्मी) वृक्ष में निवास कर निरंतर दुःखहरण करती हैं—जिससे वैष्णव भक्ति, पवित्र वृक्ष-पर्यावरण और ऋतु-नियम एक साथ जुड़ते हैं।

बिल्वोत्पत्तिवर्णनम् | Origin and Sacred Significance of the Bilva Tree
इस अध्याय में वाणी के संवाद-रूप में बिल्ववृक्ष की उत्पत्ति और उसकी पवित्र महिमा बताई गई है। मन्दर पर्वत पर विचरते हुए थकी हुई पार्वती के शरीर से पसीने की एक बूँद पृथ्वी पर गिरती है और वही एक महान दिव्य वृक्ष बन जाती है। उसे देखकर देवी जयाऔर विजयासे पूछती हैं; वे बताते हैं कि यह देवी के शरीर से उत्पन्न है, पाप-नाशक और पूजनीय है, अतः इसका नामकरण होना चाहिए। पार्वती उसे ‘बिल्व’ नाम देती हैं और भविष्य में राजाओं सहित भक्तों द्वारा श्रद्धापूर्वक बिल्वपत्र लाकर उनकी पूजा करने की घोषणा करती हैं। आगे फलश्रुति आती है—बिल्वपत्रों के दर्शन और श्रद्धा से पूजा में सहायता होती है, इच्छित कामनाएँ पूर्ण होती हैं; पत्र के अग्रभाग का आस्वादन तथा पत्राग्र को सिर पर रखना अनेक पापों का क्षय करता है और दण्डरूप दुःख से रक्षा करता है। अंत में वृक्ष को देवी का जीवित तीर्थ-मन्दिर बताया गया है—मूल में गिरिजा, तने में दक्षायणी, शाखाओं में माहेश्वरी, पत्तों में पार्वती, फलों में कात्यायनी, छाल में गौरी, भीतर के रेशों में अपर्णा, फूलों में दुर्गा, शाखा-अंगों में उमा और काँटों में रक्षक शक्तियाँ निवास करती हैं।

Viṣṇu-śāpaḥ and the Etiology of Śālagrāma (Cāturmāsya Context)
अध्याय 251 गालव के संवाद-रूप में शालग्राम की उत्पत्ति का कारण बताता है। चातुर्मास्य के समय शुभ आकाशवाणी होती है और देवता चार वृक्षों की विधिपूर्वक वंदना करते हैं। तब हरि-हर एक ही (हरिहरात्मक) रूप में प्रकट होकर देवताओं के अपने-अपने अधिकार और लोक-व्यवस्था को पुनः स्थापित करते हैं। इसके बाद पार्वती के शाप से पीड़ित देवता बिल्वपत्र और बार-बार स्तुति करके उन्हें प्रसन्न करते हैं। देवी शाप को हटाती नहीं, पर उसे करुणा से लोकहित में बदल देती हैं—देवता मनुष्य-लोक में मासिक रूप से प्रतिमा/चिह्न-रूप में सुलभ होंगे और विवाह-संस्कार, संतान-प्राप्ति आदि में समुदायों को वर देने वाले बनेंगे। फिर देवी विष्णु और महेश्वर को शाप-फल बताती हैं—विष्णु पाषाण-रूप होंगे और शिव ब्राह्मण-शाप के प्रसंग से लिंग-संबद्ध पाषाण-रूप धारण करेंगे, जिससे समाज में विवाद और दुःख भी होगा। विष्णु देवी की विधिवत स्तुति करते हैं, उन्हें गुणत्रयमयी माया और त्रिरूपा शक्ति के रूप में स्मरण करते हुए। पार्वती मोक्षदायी भूगोल बताती हैं—विष्णु गंडकी के निर्मल जल में शालग्राम-शिला रूप से निवास करेंगे; पुराण-ज्ञाता स्वर्णाभ वर्ण और चक्र-चिह्न आदि लक्षणों से उन्हें पहचानेंगे। तुलसी-भक्ति सहित शिला-रूप विष्णु की पूजा से भक्तों के मनोरथ पूर्ण होते हैं और मुक्ति का सान्निध्य मिलता है; केवल दर्शन भी यम-भय से रक्षा कहा गया है। अंत में शालग्राम की उत्पत्ति और शापोत्तर देव-निवास की व्यवस्था पुनः पुष्ट होती है।

Cāturmāsya-vṛkṣa-devatā-nivāsaḥ (Divine Abiding in Trees during Cāturmāsya)
इस अध्याय में एक शूद्र प्रश्नकर्ता और ऋषि गालव के बीच प्रश्नोत्तर है। शूद्र पूछता है कि चातुर्मास्य में देवता वृक्षरूप धारण करके वृक्षों में कैसे निवास करते हैं। गालव बताते हैं कि दैवी संकल्प से इस काल में जल अमृतवत् माना जाता है; वृक्ष-देवताएँ उसे ‘पान’ करके बल, तेज, सौन्दर्य और उत्साह जैसे गुण प्रकट करती हैं। फिर आचार-धर्म की बातें आती हैं—वृक्ष-सेवा सभी महीनों में प्रशंसनीय है, पर चातुर्मास्य में विशेष फलदायी। तिलोदक (तिल मिला जल) से वृक्षों का सिंचन कामनापूरक कहा गया है; तिल को पवित्र, धर्म-और-अर्थ का पोषक तथा दान में प्रधान वस्तु बताया गया है। इसके बाद विभिन्न वृक्षों के साथ देवताओं और गणों का संबंध सूचीवत् दिया गया है—जैसे वट में ब्रह्मा, जौ में इन्द्र, तथा गन्धर्व, यक्ष, नाग, सिद्ध आदि का अलग-अलग वृक्षों में निवास। अंत में पिप्पल/अश्वत्थ और तुलसी की सेवा को समस्त वनस्पति-जगत की सेवा के समान माना गया है; चातुर्मास्य में यज्ञ-आवश्यकता के बिना वृक्ष-कटाई वर्जित है। जम्बू-वृक्ष के नीचे ब्राह्मण-भोजन और वृक्ष-पूजन से समृद्धि तथा चारों पुरुषार्थों की सिद्धि बताई गई है।

शंकरकृतपार्वत्यनुनयः (Śaṅkara’s Appeasement of Pārvatī) — Cāturmāsya-Māhātmya Context
अध्याय 253 में संवाद के रूप में एक धर्म-तत्त्वपूर्ण प्रसंग आता है। प्रश्न उठता है कि पार्वती का क्रोध, उनका शाप और रुद्र का विकृत अवस्था में दिखाया जाना किस कारण है। गालव बताते हैं कि देवी के भय से देवता अदृश्य हो जाते हैं और मनुष्य-लोक में प्रतिमाओं के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं; फिर देवी अनुग्रह करती हैं। विष्णु की जगन्माता और पापहरिणी के रूप में स्तुति भी की जाती है। इसके बाद नीति-धर्म का उपदेश है—अपराध होने पर निग्रह और सुधार का कर्तव्य, पिता-पुत्र, गुरु-शिष्य, पति-पत्नी जैसे संबंधों में भी यथोचित रूप से निभाना चाहिए; कुल, जाति और देश-धर्म का त्याग महादोष बताया गया है। पार्वती शोक और क्रोध में शिव पर आरोप करती हैं और यह भी कहती हैं कि ब्राह्मणों से शिव को हानि होगी। शिव करुणा और अहिंसा का आश्रय लेकर धीरे-धीरे उन्हें शांत करते हैं। समाधान व्रत-नियमों पर आधारित है—पार्वती चातुर्मास्य-व्रत, ब्रह्मचर्य और देवताओं के सामने सार्वजनिक ताण्डव की शर्त रखती हैं। शिव स्वीकार करते हैं और शाप अनुग्रह में बदल जाता है। अंत में फलश्रुति है कि श्रद्धा से सुनने पर दृढ़ता, सफलता और मंगलमय शरण प्राप्त होती है।

चातुर्मास्य-माहात्म्ये हरताण्डवनृत्य-वर्णनम् | Description of Śiva’s Haratāṇḍava Dance within the Glory of Cāturmāsya
अध्याय का आरम्भ एक प्रश्नकर्ता (शूद्र) के विस्मय और भक्ति-उत्सुकता से होता है। वह पूछता है—देवों से घिरे महादेव ने नृत्य कैसे किया, चातुर्मास्य-व्रत की उत्पत्ति और ग्रहण करने योग्य संकल्प क्या है, तथा कौन-सा दिव्य अनुग्रह प्रकट हुआ। ऋषि गालव पुण्यदायी कथा सुनाते हैं। चातुर्मास्य आने पर हरे ब्रह्मचर्य-व्रत धारण कर मन्दर पर्वत पर देवों और ऋषियों को बुलाते हैं और भवानी को प्रसन्न करने हेतु हरताण्डव नृत्य आरम्भ करते हैं। देव, ऋषि, सिद्ध, यक्ष, गन्धर्व, अप्सराएँ और गणों की विराट सभा बनती है; विविध वाद्य, ताल और गायन-परम्पराओं का वर्णन आता है। आगे शिव से उद्भूत रागों का सपरिवार (पत्नी-समेत) व्यक्तिरूप में निरूपण होता है, जिसमें चक्र आदि सूक्ष्म-देह संकेतों के साथ सौन्दर्य और तत्त्व का समन्वय है। ऋतुचक्र पूर्ण होने पर पार्वती प्रसन्न होकर भविष्य की घटना बताती हैं—ब्राह्मण-शाप से गिरा एक लिङ्ग नर्मदा-जल से सम्बद्ध होकर जगत्-वन्द्य होगा। फिर शिव-स्तोत्र और उसकी फलश्रुति आती है: भक्तिपूर्वक पाठ करने वालों को इष्ट-वियोग नहीं होता, जन्म-जन्म में आरोग्य व समृद्धि मिलती है, भोग प्राप्त होते हैं और अन्ततः शिवलोक की प्राप्ति होती है। अंत में ब्रह्मा आदि देव शिव की सर्वव्यापकता तथा शिव-विष्णु के अभेद का स्तवन करते हैं, और गालव दिव्य रूप-चिन्तन से कल्याणकारी निष्कर्ष कहते हैं।

लक्ष्मीनारायणमहिमवर्णनम् (Glorification of Lakṣmī–Nārāyaṇa and Śāligrāma Worship during Cāturmāsya)
अध्याय 255 में तीर्थ-तत्त्व और गृहस्थ-धर्म के कर्मविधान का सुंदर समन्वय है। इसमें गण्डकी नदी के शालिग्राम को स्वयम्भू (मानव-निर्मित नहीं) बताया गया है और नर्मदा को महेश्वर से संबद्ध करके प्रकृति में प्रकट दिव्य-चिह्नों की पवित्रता का प्रकार-भेद समझाया गया है। फिर श्रवण, अंश-पाठ, पूर्ण-पाठ और कपट-रहित पठन—इन भक्ति-उपायों को ‘शोक-रहित परम पद’ देने वाला कहा गया है। चातुर्मास्य के लिए विशेष साधना-क्रम बताया गया है—लाभ हेतु गणेश-पूजन, आरोग्य हेतु सूर्य-पूजन और गृहस्थों के लिए पञ्चायतन-पूजा; चार महीनों में इनका फल विशेष बढ़ता है। शालिग्राम के द्वारा लक्ष्मी–नारायण-पूजा, साथ में द्वारवती-शिला, तुलसी और दक्षिणावर्त शंख आदि का महत्त्व बताकर शुद्धि, समृद्धि, घर में ‘श्री’ की स्थिरता तथा मोक्षाभिमुख फल का आश्वासन दिया गया है। अंत में कहा गया है कि सर्वव्यापी प्रभु की पूजा ही समस्त जगत की पूजा है, इसलिए भक्ति सबके लिए पर्याप्त साधन है।

रामनाममहिमवर्णनम् (Glorification of the Name “Rāma” and Mantra-Discipline in Cāturmāsya)
अध्याय का आरम्भ कैलास पर होता है, जहाँ रुद्र उमा के साथ विराजमान हैं और असंख्य गणों से घिरे हैं; उनके नामों का क्रमशः उल्लेख करके दिव्य सभा का पवित्र, विश्वव्यापी वातावरण स्थापित किया जाता है। वसन्त के आगमन से इन्द्रियों को मोहित करने वाली शोभा और क्रीड़ात्मक चंचलता फैलती है; तब शिव गणों को आदेश देते हैं कि वे हँसी-खेल को रोककर तपस्या में प्रवृत्त हों। पार्वती शिव की जपमाला देखकर पूछती हैं कि आदिदेव होकर भी आप किसका जप करते हैं, किस परम तत्त्व का ध्यान करते हैं। शिव उत्तर देते हैं कि वे निरन्तर हरि के सहस्रनामों के सार का चिन्तन करते हैं और फिर मन्त्र-शास्त्र का उपदेश देते हैं। प्रणव तथा द्वादशाक्षरी मन्त्र को वेद-सार, शुद्ध, मोक्षदायक बताते हैं और विशेषतः चातुर्मास्य में इसके महान फल—विशाल पाप-संचय के नाश आदि—का वर्णन करते हैं। आगे अधिकार-विचार आता है: प्रणव-युक्त रूपों की चर्चा के साथ उन वर्गों के लिए, जो प्रणव का प्रयोग नहीं करते, दो अक्षरों वाला “राम” नाम सर्वोत्तम मन्त्र कहा जाता है। अंत में “राम” नाम की महिमा विस्तार से गाई जाती है—यह भय और रोग का नाश करता है, विजय देता है, सबको पवित्र करता है; चातुर्मास्य में नामाश्रय से विघ्न शांत होते हैं और दण्डरूप परलोक-फल भी कट जाते हैं।

द्वादशाक्षरनाममहिमपूर्वकपार्वतीतपोवर्णनम् (The Glory of the Twelve-Syllable Mantra and the Account of Pārvatī’s Austerity)
इस अध्याय में मंत्र-अधिकार और तप-भक्ति के अनुशासन का संवादात्मक निरूपण है। पार्वती द्वादशाक्षर मंत्र की महिमा, शुद्ध रूप, फल और जप-विधि पूछती हैं। महादेव वर्ण-आश्रम के अनुसार नियम बताते हैं—द्विजों के लिए प्रणव (ॐ) सहित जप, और स्त्रियों व शूद्रों के लिए पुराण-स्मृति-निर्णय के अनुसार प्रणव रहित, नमस्कार-पूर्वक “नमो भगवते वासुदेवाय” का उपदेश। वे चेताते हैं कि निर्धारित क्रम का उल्लंघन दोष है और विपरीत फल दे सकता है। पार्वती कहती हैं कि वे तीन मात्राओं से उपासना करती हैं, फिर भी प्रणव-अधिकार क्यों नहीं? शिव प्रणव को आद्य तत्त्व बताकर कहते हैं कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव उसी में संकल्पित हैं, पर अधिकार तप से प्राप्त होता है—विशेषतः हरि की प्रसन्नता हेतु चातुर्मास्य-व्रत से। तप फलदायक और गुणवर्धक है, पर कठिन; तप की सच्ची वृद्धि हरि-भक्ति से है, और भक्ति रहित तप क्षीण माना गया है। विष्णु-स्मरण वाणी को पवित्र करता है, और हरि-कथा दीपक की तरह पाप व अंधकार को दूर करती है। अंत में पार्वती हिमाचल पर ब्रह्मचर्य और सरलता सहित चातुर्मास्य तप करती हैं, नियत समयों पर हरि-शंकर का ध्यान करती हैं। उपसंहार में (गालव के वचन से) उन्हें जगन्माता, गुणातीत प्रकृति कहकर स्तुति की जाती है और उनका तप इस व्रत-क्षेत्र परंपरा में आदर्श रूप में प्रतिष्ठित होता है।

हरशापः (Haraśāpaḥ) — “The Curse upon Hara / Śiva”
इस अध्याय में मुनि-संवाद के रूप में गालव के प्रश्न से प्रसंग आरम्भ होता है। शैलपुत्री पार्वती कठोर तप में लगी हैं, और काम से पीड़ित शिव शान्ति की खोज में विचरते हुए यमुना के तट पर आते हैं। उनके तपोमय तेज से यमुना का जल रूपान्तरित होकर श्यामवर्ण हो जाता है; फिर फलश्रुति में कहा गया है कि वहाँ स्नान करने से महान पापसमूह नष्ट होते हैं, और वह स्थान “हरतीर्थ” के नाम से पवित्र प्रसिद्ध होता है। इसके बाद शिव मनोहर, क्रीड़ामय तपस्वी-वेष धारण कर ऋषियों के आश्रमों में विचरते हैं। ऋषि-पत्नियाँ उनके प्रति मानसिक रूप से आकृष्ट हो जाती हैं, जिससे समाज में क्षोभ उत्पन्न होता है। ऋषि शिव को पहचान नहीं पाते और क्रोध में अपमानकारी दण्ड-रूप शाप दे देते हैं; शाप से शिव के शरीर में भयंकर विकार प्रकट होता है और समस्त जगत में अस्थिरता व देवताओं में भय फैल जाता है। तब ऋषि अपनी अज्ञानजन्य भूल पर पश्चात्ताप करते हुए शिव की परात्परता स्वीकारते हैं। देवी की सर्वव्यापकता और जगत-कार्य की अधिष्ठात्री शक्ति के रूप में स्तुति होती है, और शिव शाप-प्रभाव से निवृत्ति हेतु अनुग्रह की याचना करते हैं—इस प्रकार तीर्थ-स्थापन, उतावले निर्णय से बचने की शिक्षा और दिव्य तत्त्वचिन्तन एक साथ प्रकट होते हैं।

अमरकण्टक-नर्मदा-लिङ्गप्रतिष्ठा तथा नीलवृषभ-स्तुति (Amarakantaka–Narmadā Liṅga स्थापना and the Praise of Nīla the Bull)
अध्याय 259 में तीर्थमाहात्म्य का बहु-खंडीय प्रसंग है। ऋषि एक विशाल गिरे हुए लिंग को देखकर उसमें युगों से संचित व्यापक शक्ति का अनुभव करते हैं और पृथ्वी की व्यथा का वर्णन आता है। वे विधिपूर्वक लिंग की प्रतिष्ठा करते हैं; उसी के साथ जल की पवित्र पहचान स्थिर होती है—वह रेवाः नर्मदा कहलाती है और लिंग अमरकण्टक-संबंधी नाम से प्रसिद्ध होता है। इसके बाद नर्मदा-स्नान, आचमन, पितृ-तर्पण तथा नर्मदा-सम्बद्ध लिंगों की पूजा के फल बताए जाते हैं। विशेष रूप से चातुर्मास्य-व्रत में लिंग-पूजा, रुद्र-जप, हर-पूजन, पंचामृत-अभिषेक, मधु-धारा और दीप-दान की महिमा कही गई है। फिर ब्रह्मा की वाणी से ऋषियों की लोक-क्षोभ की चिंता प्रकट होती है; देवगण आकर ब्राह्मणों की दीर्घ स्तुति करते हैं, वाणी-शक्ति का माहात्म्य बताते हैं और ब्राह्मण-कोप को न उकसाने की धर्म-नीति समझाते हैं। आगे कथा गोलोक में जाती है, जहाँ सुरभि के पुत्र वृषभ ‘नील’ का दर्शन, उसके नाम का कारण तथा धर्म और शिव से उसका संबंध बताया गया है। ऋषि नील को जगत्-आधार और धर्म-स्वरूप कहकर स्तुत करते हैं; दिव्य वृषभ/धर्म के प्रति अपराध की चेतावनी और श्राद्ध में मृतक हेतु वृषभ-उत्सर्ग न होने पर दोष-फल भी वर्णित है। अंत में नील को चक्र-शूल आदि प्रतीकात्मक आयुधों से अलंकृत कर गो-समूह में उसका विचरण दिखाया गया है और रेवाजल में शाप, भक्ति तथा शिला-रूप परिवर्तन को जोड़ने वाला श्लोक उपसंहार करता है।

Cāturmāsya Māhātmya and the Worship of Śālagrāma-Hari and Liṅga-Maheśvara (Paijavana-upākhyāna context)
यह अध्याय शालग्राम-कथानक के प्रसंग को आगे बढ़ाता है। इसमें महेश्वर के प्राकट्य का स्मरण कराते हुए लिङ्ग-स्वरूप का तत्त्व बताया गया है। शालग्राम-रूप में हरि की भक्ति-पूर्वक पूजा तथा हरि-हर (विष्णु-शिव) की युगल-आराधना, विशेषतः चातुर्मास्य काल में, अत्यन्त फलदायी कही गई है; इसे स्वर्ग और मोक्ष देने वाली साधना के रूप में वर्णित किया गया है। साथ ही धर्म-आचरण के सहायक नियम बताए गए हैं—वेदोक्त कर्म, इष्ट-पূर्त कार्य, पञ्चायतन-पूजा, सत्य, और लोभ-रहित जीवन। पात्रता और चरित्र-निर्माण पर भी चर्चा है; विवेक, ब्रह्मचर्य और द्वादशाक्षर मन्त्र का ध्यान प्रमुख साधन माने गए हैं। पूजा सोलह उपचारों से, मन्त्र न भी हों तो भी, करने की बात कही गई है; अंत में रात्रि बीतने पर सबका प्रस्थान होता है और फलश्रुति में श्रवण-पाठ-उपदेश से पुण्य-हानि न होने का आश्वासन दिया गया है।

ध्यानयोगः (Dhyāna-yoga) — Cāturmāsya Māhātmya within Brahmā–Nārada Dialogue
इस अध्याय में नागरखण्ड के तीर्थ-प्रसंग के भीतर ब्रह्मा–नारद संवाद आता है। नारद पूछते हैं कि सदा-मङ्गलमयी पार्वती ने हरि के योगनिद्रा-काल के चार मास (चातुर्मास्य) में द्वादशाक्षर मन्त्रराज के द्वारा कैसी महान योग-सिद्धि प्राप्त की। ब्रह्मा बताते हैं कि पार्वती ने मन, वाणी और कर्म से भक्ति रखकर, देवों, द्विजों, अग्नि, अश्वत्थ-वृक्ष और अतिथियों का पूजन किया तथा पिनाकधारी शिव की आज्ञा के अनुसार निरन्तर मन्त्र-जप सहित कठोर व्रत का पालन किया। तब विष्णु चतुर्भुज, शङ्ख-चक्रधारी, गरुड़ारूढ़, दिव्य तेज से प्रकट होकर दर्शन देते हैं। पार्वती उनसे ऐसी निर्मल विद्या माँगती हैं जो पुनर्जन्म की निवृत्ति करे; विष्णु परम तत्त्व का उपदेश शिव को सौंपते हुए कहते हैं कि वही परमात्मा भीतर-बाहर का साक्षी और धर्म का आधार है। शिव के आगमन पर विष्णु लीन हो जाते हैं। शिव पार्वती को दिव्य विमान से एक दिव्य नदी और शरवन-सदृश वन में ले जाते हैं, जहाँ कृत्तिकाएँ तेजस्वी षण्मुख बालक—कार्त्तिकेय—को प्रकट करती हैं और पार्वती उसे हृदय से लगा लेती हैं। आगे द्वीपों और समुद्रों के ऊपर दिव्य यात्रा के बाद श्वेत प्रदेश के श्वेत शिखर पर शिव एक रहस्योपदेश देते हैं—प्रणव-युक्त मन्त्र और ध्यान-विधि: आसन, अन्तःपूजा, नेत्र-मुद्रा, हस्त-मुद्रा तथा विश्वपुरुष का ध्यान। कहा गया है कि चातुर्मास्य में थोड़े से ध्यान से भी मल-क्षय और शुद्धि होती है।

ज्ञानयोगकथनम् (Jñānayoga-kathana) — Discourse on the Yoga of Knowledge
इस अध्याय में पार्वती ध्यानयोग की ऐसी विधि पूछती हैं जिससे आगे चलकर ज्ञानयोग प्राप्त हो और ‘अमर’ अवस्था सिद्ध हो। ईश्वर बारह अक्षरों वाले ‘मन्त्रराज’ का तकनीकी निरूपण करते हैं—ऋषि, छन्द, देवता और विनियोग सहित, तथा अक्षर-प्रत्याक्षर रंग, तत्त्व-बीज, सम्बद्ध ऋषि और प्रयोग-फल का सूक्ष्म विन्यास बताते हैं। फिर पाद, नाभि, हृदय, कण्ठ, हाथ, जिह्वा/मुख, कान, नेत्र और शिर तक देह-न्यास की स्थापना तथा लिङ्ग, योनि और धेनु—इन तीन मुद्राओं का विधान कहा जाता है। इसके बाद संवाद साधना-तत्त्व में प्रवेश करता है: ध्यान को पापक्षय और शुद्धि का निर्णायक साधन बताया गया है। योग के दो रूप स्पष्ट होते हैं—सालम्बन ध्यान, जिससे नारायण-दर्शन होता है; और उच्चतर निरालम्बन ज्ञानयोग, जो निराकार, अमेय ब्रह्म की ओर ले जाता है। निरविकल्प, निरञ्जन, साक्षीमात्र जैसे अद्वैत-लक्षणों का वर्णन करते हुए भी साधक के लिए शरीर-आधारित सेतु रखा गया है, विशेषतः शिर को ध्यान-धारण का प्रधान केन्द्र कहा गया है; चातुर्मास्य में साधना की विशेष प्रभावशीलता भी बताई गई है। नीति-नियम के रूप में कहा गया है कि यह उपदेश अनुशासनहीन या दुष्ट को न दिया जाए, परन्तु भक्त, संयमी और शुद्ध साधक को—समाज-भेद से परे—दिया जा सकता है। अंत में देह को ब्रह्माण्ड का सूक्ष्म रूप मानकर शरीर-स्थानों में देवता, नदियाँ और ग्रहों की स्थिति का संकेत दिया गया है, और नाद-अनुसन्धान तथा विष्णु-केन्द्रित ध्यान से मुक्ति-फल की पुनः पुष्टि की गई है।

मत्स्येन्द्रनाथोत्पत्तिकथनम् (Origin Account of Matsyendranātha)
इस अध्याय में ईश्वर कर्म, ज्ञान और योग का तत्त्वोपदेश करते हैं। शुद्ध मन, अनासक्ति और भक्ति के साथ हरि/विष्णु को समर्पित कर्म बन्धनरहित हो जाते हैं—यह मुख्य सिद्धान्त बताया गया है। शम, विचार, सन्तोष और साधु-संग को मोक्ष-मार्गरूपी ‘नगर’ के चार ‘द्वारपाल’ कहा गया है, और गुरु-उपदेश को देह में रहते हुए ब्रह्मभाव की प्राप्ति तथा जीवन्मुक्ति का निर्णायक साधन बताया गया है। इसके बाद मंत्र-प्रधान प्रसंग आता है। द्वादशाक्षर मंत्र को पवित्र करने वाला बीज और ध्यान का केन्द्र कहा गया है। चातुर्मास्य को विशेष पुण्यकाल बताकर, उसमें व्रत-पालन और कथा-श्रवण से संचित दोषों के दग्ध होने का वर्णन है। फिर ब्रह्मा कथा सुनाते हैं—हर एक अद्भुत मत्स्य-रूपधारी जीव को देखकर प्रश्न करते हैं। वह मत्स्य वंश-शंका के कारण त्याग, दीर्घकालीन बन्धन और शिव-वचनों से जाग्रत हुए ज्ञान-योग का वृत्तान्त कहता है। मुक्त होने पर उसका नाम ‘मत्स्येन्द्रनाथ’ रखा जाता है; उसे ईर्ष्या-रहित, अद्वैत-निष्ठ, वैराग्यवान और ब्रह्म-सेवा में तत्पर श्रेष्ठ योगी कहा गया है। अंत में श्रवण-फलश्रुति है—विशेषतः चातुर्मास्य में इस कथा का श्रवण महान् पुण्य देता है और अश्वमेध-यज्ञ के तुल्य फल प्रदान करता है।

तारकासुरवधः (Tārakāsura-vadha) — The Slaying of Tārakāsura
इस अध्याय में ब्रह्मा गङ्गा-तट पर पार्वती और शिव के समीप बालक स्कन्द/कार्त्तिकेय की दिव्य लीला का वर्णन करते हैं, जिससे देवता का पवित्र भू-दृश्य से आत्मीय संबंध प्रकट होता है। तारकासुर से पीड़ित देवगण शंकर की शरण लेते हैं; स्कन्द को सेनापति नियुक्त किया जाता है, देव-वाद्यों, जयघोषों और अग्नि की शक्ति आदि दिव्य सहायकों के साथ। फिर ताम्रवती में स्कन्द के शंखनाद से युद्ध छिड़ता है; देव-दानवों का घोर संग्राम, भगदड़ और विनाश का चित्रण होता है। अंततः तारक का वध होता है, विजय-यज्ञ/उत्सव होते हैं और पार्वती स्कन्द को आलिंगन करती हैं। इसके बाद संवाद ज्ञान-वैराग्य की ओर मुड़ता है। शिव विवाह (पाणिग्रहण) का विषय उठाते हैं, पर स्कन्द असंगता, समदृष्टि और ज्ञान की दुर्लभता व रक्षा का उपदेश देते हैं। वे कहते हैं कि सर्वव्यापी ब्रह्म के साक्षात्कार से योगी के कर्म शांत हो जाते हैं; आसक्त मन चंचल रहता है, समचित्त स्थिर रहता है—और निर्णायक साधन ज्ञान ही है। तत्पश्चात स्कन्द क्रौञ्चपर्वत पर तप, द्वादशाक्षर बीज-मंत्र का जप, इन्द्रिय-निग्रह और सिद्धियों के प्रलोभन पर विजय हेतु प्रस्थान करते हैं। अंत में शिव पार्वती को सांत्वना देकर चातुर्मास्य-माहात्म्य को पाप-नाशक बताते हैं और सूत आगे श्रवण की प्रेरणा देकर पुराण-परंपरा को बनाए रखते हैं।

अशून्यशयनव्रतमाहात्म्यवर्णन (The Māhātmya of the Aśūnya-Śayana Vrata)
अध्याय 265 दो भागों में उपदेश देता है। पहले ऋषि पूछते हैं कि दुर्बल या कोमल शरीर वाले लोग अनेक नियम-व्रत कैसे निभाएँ। तब सूत कार्तिक शुक्ल पक्ष में एकादशी से आरम्भ होने वाला पाँच दिन का सरल “भीष्म-पञ्चक” बताते हैं। इसमें प्रातः स्नान-शुद्धि, वासुदेव-केन्द्रित नियम, उपवास या उपवास न हो सके तो दान द्वारा पूर्ति, ब्राह्मण को हविष्यान्न अर्पण, जलशायी हृषीकेश की धूप-गन्ध-नैवेद्य से पूजा, रात्रि-जागरण, और छठे दिन ब्राह्मण-सत्कार के बाद पंचगव्य-पूर्वक स्वयं भोजन कर व्रत-समापन कहा गया है। एकादशी को जाती-पुष्प, द्वादशी को बिल्व-पत्र आदि दिन-विशेष के पुष्प/पत्र अर्पण तथा अर्घ्य-मन्त्र भी वर्णित है। दूसरे भाग में ऋषि “अशून्य-शयन व्रत” का विस्तृत विधान पूछते हैं, जिसे इन्द्र ने चक्रपाणि को प्रसन्न करने हेतु किया था। श्रावणी के बाद द्वितीया तिथि, विष्णु-सम्बद्ध नक्षत्र में आरम्भ, तथा पापी/पतित/म्लेच्छ आदि से संवाद-त्याग जैसी सावधानियाँ बताई गई हैं। मध्याह्न स्नान कर शुद्ध वस्त्र पहन जलशायी विष्णु की पूजा करते हुए गृह-समृद्धि, पितृ, अग्नि, देवता और दाम्पत्य-धर्म की अविनाशिता की प्रार्थना की जाती है—लक्ष्मी-विष्णु की एकता और जन्म-जन्म में ‘शय्या का अशून्य’ रहना इसका भाव है। यह व्रत भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक तक चलता है; तेल-त्याग आदि आहार-नियम रहते हैं। अंत में फल-चावल-वस्त्र सहित शय्या-दान और स्वर्ण-दक्षिणा दी जाती है। फलश्रुति में उपवास से अधिक पुण्य, देवता की निरन्तर तुष्टि, पाप-नाश, स्त्रियों की शुद्धि व मन-स्थिरता, कन्या के विवाह-योग, तथा निष्काम साधक को चातुर्मास्य-नियमों के फल की प्राप्ति कही गई है।

शिवारात्रिमाहात्म्यवर्णनम् (The Māhātmya of Śivarātri)
अध्याय 266 में ऋषि प्रमुख तीर्थों और ऐसे प्रसिद्ध लिंगों की सूची पूछते हैं जिनके दर्शन से समग्र पुण्य मिलता है। सूत मंकणेश्वर और सिद्धेश्वर आदि का उल्लेख कर विशेष रूप से मंकणेश्वर के फल का वर्णन करते हैं, विशेषतः शिवरात्रि-व्रत के साथ। शिवरात्रि को माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की रात्रि बताया गया है; उस रात शिव का सभी लिंगों में ‘प्रवेश’/व्याप्ति मानी जाती है, और मंकणेश्वर में इसकी विशेष ख्याति कही गई है। कथा में राजा अश्वसेन कलियुग के लिए अल्प-परिश्रम, महा-फल देने वाले व्रत के विषय में ऋषि भर्तृयज्ञ से पूछता है। ऋषि शिवरात्रि को एक-रात्रि जागरण वाला व्रत बताकर कहते हैं कि उस रात दान, पूजन, हवन और जप ‘अक्षय’ फल देते हैं। देवता भी मनुष्यों की शुद्धि हेतु एक दिन-रात का उपाय मांगते हैं; शिव उस तिथि-रात्रि में अवतरित होने की स्वीकृति देते हैं और संक्षिप्त पंचवक्त्र-क्रम के मंत्र, अर्घ्य-उपचार, ब्राह्मण-सत्कार, भक्तिकथा, संगीत-नृत्य आदि सहित पूजन-विधि बताते हैं। फिर दृष्टांत आता है—एक चोर अनजाने में लिंग के पास वृक्ष पर रात भर जागता रहता है और पत्ते गिरा देता है; अशुद्ध उद्देश्य होते हुए भी उसे व्रत का पुण्य मिलकर उत्तम जन्म और आगे चलकर मंदिर-निर्माण का अवसर मिलता है। अंत में शिवरात्रि को परम तप और महान पावनकर्ता कहकर उसकी महिमा तथा पाठ-श्रवण का फल बताया गया है।

तुलापुरुषदानमाहात्म्यवर्णनम् | Tula-Puruṣa Donation: Procedure and Merit (Siddheśvara Context)
अध्याय 267 संवाद-क्रम में विधि और तत्त्व का उपदेश देता है। सूत बताते हैं कि शिवरात्रि जैसे व्रत दोनों लोकों में कल्याण देने वाले हैं। मङ्कणेश्वर और शिवरात्रि की पूर्व-प्रशंसा सुनकर आनर्त सिद्धेश्वर के प्रादुर्भाव का पूरा वृत्तान्त पूछता है; तब भर्तृयज्ञ सिद्धेश्वर-दर्शन के फल—विशेषतः राजसत्ता और चक्रवर्ती-समृद्धि—का वर्णन करते हुए तुलापुरुष-दान को अत्यन्त प्रशस्त कर्म बताते हैं। इसके बाद तुलापुरुष-दान की विधि कही जाती है—ग्रहण, अयनान्त और विषुव जैसे शुभ समयों में मण्डप और वेदियों का निर्माण, योग्य ब्राह्मणों का चयन, तथा दान का नियमपूर्वक वितरण। निर्दिष्ट शुभ वृक्षों की लकड़ी के स्तम्भों से तुला स्थापित कर दाता तुला-देवी का आवाहन करता है, अपने शरीर को सुवर्ण-रजत या इच्छित द्रव्यों के बराबर तौलता है, और जल-तिल सहित विधि से अर्पण करता है। फलश्रुति में कहा गया है कि दान के अनुपात से संचित पाप नष्ट होते हैं, उपद्रवों से रक्षा होती है, और सिद्धेश्वर के सम्मुख दिया गया दान सहस्रगुण फल देता है। अंत में क्षेत्र की समन्वित पवित्रता—एक ही स्थान में अनेक तीर्थों और देवालयों का संगम—तथा सिद्धेश्वर के दर्शन, स्पर्श और पूजन से सर्वांगीण लाभ का प्रतिपादन किया गया है।

पृथ्वीदानमाहात्म्यवर्णनम् (The Glory and Procedure of the Earth-Gift)
इस अध्याय में आनर्त, भर्तृयज्ञ से पूछता है कि चक्रवर्ती सम्राट बनने के कर्मकारण क्या हैं और वह पद कैसे प्राप्त होता है। भर्तृयज्ञ बताता है कि राजत्व दुर्लभ है और पुण्य पर निर्भर है; जो राजा गौतमेेश्वर के सामने श्रद्धापूर्वक स्वर्णमयी पृथ्वी (हिरण्मयी पृथ्वी) का दान करता है, वह चक्रवर्ती होता है। मन्धाता, हरिश्चन्द्र, भरत, कार्तवीर्य आदि राजाओं के उदाहरण दिए गए हैं। फिर दान-विधि का विस्तार आता है—पृथ्वी-प्रतिमा निश्चित भार-मान से बने, धन में छल न हो। उसमें सात समुद्र (लवण, इक्षुरस, सुरा, घृत, दधि, क्षीर, जल), सात द्वीप, मेरु आदि पर्वत और गंगा प्रमुख नदियाँ दर्शाई जाती हैं। मण्डप, कुण्ड, तोरण, मध्य वेदी, पंचगव्य व शुद्ध जल से अभिषेक, तथा मंत्रयुक्त स्नान, वस्त्र, धूप, आरती और अन्न-दान का विधान है। दाता पृथ्वी को जगत्-आधार मानकर स्तुति करता है और दान के लिए उसकी उपस्थिति प्रार्थित करता है। दान जल में प्रतीक रूप से समर्पित किया जाता है—न भूमि पर रखा जाता है, न सीधे ग्राही के हाथ में। अंत में विसर्जन कर ब्राह्मणों में वितरण किया जाता है। फलश्रुति में वंश-राज्य की स्थिरता, सुनने मात्र से पाप-नाश, गौतमेेश्वर में करने पर अनेक जन्मों तक फल और विष्णु के अविनाशी धाम की प्राप्ति कही गई है; साथ ही दूसरों द्वारा दान की गई भूमि को हड़पना निषिद्ध बताया गया है।

कपालमोचन-ईश्वर-उत्पत्तिमाहात्म्यवर्णनम् (Kapālamocaneśvara: Origin and Glory of the Skull-Release Lord)
अध्याय के आरम्भ में सूत कपालमोचन-क्षेत्र के कपालेश्वर का माहात्म्य कहते हैं और बताते हैं कि इसका केवल श्रवण भी पवित्र करने वाला है। ऋषि पूछते हैं—कपालेश्वर की स्थापना किसने की, दर्शन-पूजा का फल क्या है, इन्द्र की ब्रह्महत्या कैसे उत्पन्न हुई और कैसे दूर हुई, तथा “पाप-पुरुष” (पाप का प्रतीक) के अर्पण की विधि, मंत्र और आवश्यक उपकरण क्या हैं। सूत कहते हैं कि ब्रह्महत्या से मुक्ति पाने के लिए इन्द्र ने ही इस देवता की प्रतिष्ठा की। फिर कारण-कथा आती है—त्वष्टा से उत्पन्न वृत्र को ब्रह्मा के वर से ब्राह्मण-भाव प्राप्त होता है और वह ब्राह्मणों का भक्त बनता है; देवों और दानवों में युद्ध छिड़ता है। बृहस्पति इन्द्र को नीति-युक्त उपाय बताते हैं और आगे दधीचि की अस्थियों से वज्र बनवाने का विधान करते हैं। इन्द्र ब्रह्म-भूत कहे गए वृत्र का वध करता है, जिससे ब्रह्महत्या का दोष प्रकट होकर तेज का ह्रास और दुर्गन्धादि मलिनता उत्पन्न करता है। ब्रह्मा इन्द्र को तीर्थ-परिक्रमा कर स्नान करने, मंत्रपूर्वक सुवर्णमय देह-रूप “पाप-पुरुष” को एक ब्राह्मण को दान देने, और हाटकईश्वर-क्षेत्र में कपाल की स्थापना कर पूजा करने का आदेश देते हैं। इन्द्र विश्वामित्र-ह्रद में स्नान करता है; कपाल गिर पड़ता है; वह हर के पंचमुखों से सम्बद्ध पाँच मंत्रों से पूजा करता है और उसकी अशुद्धि दूर हो जाती है। वातक नामक ब्राह्मण वह सुवर्ण-पाप-पुरुष ग्रहण करता है, पर लोक-निन्दा सहता है; संवाद में स्वीकार की धर्म-नीति स्पष्ट होती है और उस स्थान की स्थायी प्रतिष्ठा तथा “कपालमोचन” की ख्याति की भविष्यवाणी होती है। अंत में इस कथा के श्रवण-पाठ को पाप-नाशक और तीर्थ को ब्रह्महत्या-हरण में समर्थ कहा गया है।

पापपिण्डप्रदानविधानवर्णनम् | Procedure for the Donation of the Pāpa-Piṇḍa (Sin-Effigy)
इस अध्याय में ऐसे व्यक्ति के लिए प्रायश्चित्त का विधान बताया गया है जिसने अज्ञान, प्रमाद, काम या अपरिपक्वता से पाप किया हो और सामान्य प्रायश्चित्त न किया हो। आनर्त शीघ्र पाप-नाशक उपाय पूछता है; भर्तृयज्ञ ‘पाप-पिण्ड’ दान की विधि बताता है—पच्चीस पल का सुवर्ण-पिण्ड। यह कर्म अपर-पक्ष में, स्नान, शुद्ध वस्त्र, तथा मण्डप/वेदी की तैयारी सहित करना कहा गया है। दाता पृथ्वी से आरम्भ कर तत्त्व-क्रम में भूतों और इन्द्रियों आदि का मंत्रोच्चारपूर्वक पूजन करता है। फिर वेद-वेदाङ्ग-निपुण ब्राह्मण का स्वागत कर चरण-प्रक्षालन, वस्त्र-आभूषण आदि से सम्मान करता है और उसी के अनुरूप मूर्ति/पिण्ड प्रदान करता है; औपचारिक मंत्र द्वारा पूर्व पाप को उस दान-रूप में आरोपित कर देने की घोषणा की जाती है। ब्राह्मण प्रतिग्रह-मंत्र से ग्रहण स्वीकार करता है; तत्पश्चात् दक्षिणा देकर आचार्य/ब्राह्मण को आदरपूर्वक विदा किया जाता है। फल-चिह्नों में शरीर की हलकापन, तेज की वृद्धि और शुभ स्वप्न बताए गए हैं; यहाँ तक कि इस विधि का श्रवण भी पवित्र करने वाला कहा गया है। कापालेश्वर-क्षेत्र में इसका प्रभाव विशेष बताया गया है तथा गायत्री-मंत्र सहित होम करने की भी अनुशंसा है।

Liṅgasaptaka-pratiṣṭhā and Indradyumna’s Fame: The Hāṭakeśvara-kṣetra Narrative (लिङ्गसप्तक-माहात्म्यं तथा इन्द्रद्युम्न-कीर्तिः)
अध्याय 271 में सूत हाटकेश्वर-क्षेत्र में स्थित सात लिंगों (लिंगसप्तक) का महान माहात्म्य बताते हैं। इनके दर्शन-पूजन से दीर्घायु, रोग-नाश और पाप-क्षय होता है। मर्कण्डेश्वर, इन्द्रद्युम्नेश्वर, पालेश्वर, घण्टाशिव, कलशेश्वर (वानरेश्वर-संबद्ध) तथा ईशान/क्षेत्रेश्वर आदि लिंगों के नाम आते हैं। ऋषि पूछते हैं कि इनकी स्थापना किसने की, कौन-सी विधि है और कौन-से दान करने चाहिए। इसके बाद इन्द्रद्युम्न राजा की कथा आती है—अनेक यज्ञ और दान करने पर भी जब पृथ्वी पर उसकी कीर्ति घटने लगती है, तो स्वर्ग में उसका पद डगमगाता है; वह फिर कीर्ति बढ़ाने हेतु पुण्यकर्म करने लौटता है। अपने अस्तित्व का प्रमाण अत्यन्त दीर्घ काल में खोजते हुए वह क्रमशः मर्कण्डेय, बक/नाडीजनघ, उल्लूक, गृध्र, कूर्म (मन्थरक) और अंत में लोमश ऋषि से मिलता है। वे बताते हैं कि शिव-भक्ति (जैसे बिल्वपत्र-पूजन) से दीर्घायु मिलती है और पशु-योनि तपस्वी के शाप का फल है। अंततः भर्तृयज्ञ और संवर्त से जुड़ी शिक्षा के अनुसार हाटकेश्वर-क्षेत्र में सात लिंगों की प्रतिष्ठा तथा ‘पर्वत-दान’ के रूप में मेरु, कैलास, हिमालय, गन्धमादन, सुवेल, विन्ध्य और शृङ्गी—इन सात पर्वतों के प्रतीक दान निर्दिष्ट पदार्थों से करने का विधान बताया जाता है। फलश्रुति में कहा है कि प्रातःकाल केवल दर्शन से भी अनजाने पाप छूट जाते हैं; और विधिपूर्वक पूजा-दान करने से शिव-सामीप्य (गणत्व), दीर्घ स्वर्ग-सुख तथा जन्म-जन्मान्तर में उच्च राज्य-सम्पदा प्राप्त होती है।

युगस्वरूपवर्णनम् (Description of the Nature of the Yugas and Measures of Time)
इस अध्याय में ऋषि पूर्व में ईशान और एक राजपुरुष के प्रसंग में कहे गए ‘दिन’ के मान के विषय में पूछते हैं। सूत जी सूक्ष्मतम काल-मानों से आरम्भ करके निमेषादि, घड़ी/नाड़ी, प्रहर, फिर दिन-रात, मास, ऋतु, अयन और वर्ष तक समय-क्रम का विधिवत् निरूपण करते हैं। इसके बाद युग-तत्त्व का वर्णन आता है—कृत, त्रेता, द्वापर और कलि में धर्म और पाप के अनुपात, लोक-आचार, सामाजिक-नैतिक स्थिति तथा यज्ञ-परम्परा और स्वर्ग-प्राप्ति के सम्बन्ध का विवेचन किया गया है। कलियुग में लोभ, वैर, विद्या-आचार का क्षय, अभाव-लक्षण और आश्रम-धर्म में विकृति आदि का विस्तार से चित्रण है; फिर चक्रानुसार भविष्य में पुनः कृतयुग के आगमन का संकेत दिया गया है। अन्त में इन मानों को ब्रह्मा के दिन-वर्ष जैसे महाकाल-मानों से जोड़ा गया है और शिव-शक्ति-सम्बद्ध विश्व-रूप की झलक दी गई है। यह नागरखण्ड के हाटकेश्वर-क्षेत्र-माहात्म्य में ‘युगस्वरूपवर्णन’ नामक अध्याय है।

युगप्रमाणवर्णनम् (Yuga-Pramāṇa Varṇana) — Description of Cosmic Time Measures
इस अध्याय में सूत जी युगों, मन्वन्तरों और शक्र (इन्द्र) के पद की क्रमपरम्परा सहित काल-प्रमाण का तात्त्विक वर्णन करते हैं। वे पूर्ववर्ती शक्रों की गणना करके वर्तमान शक्र को “जयन्त” तथा वर्तमान मनु को वैवस्वत बताते हैं। आगे वे कहते हैं कि भविष्य में “बलि” वासुदेव-प्रसाद से शक्रपद प्राप्त करेगा, क्योंकि पूर्व में उसे आगामी मन्वन्तर में राज्य का वर/प्रतिज्ञा मिली थी। फिर काल-गणना में ब्रह्मा की समय-लेखा का संकेत देकर चार व्यवहारिक प्रमाण बताए जाते हैं—सौर, सावन, चान्द्र और नाक्षत्र/आर्क्ष। ऋतु-परिवर्तन, कृषि और महायज्ञ सौर प्रमाण से; लोक-व्यवहार और शुभ कार्य सावन से; चान्द्र गणना में अधिकमास का समावेश आवश्यक है; और ग्रह-गणित नक्षत्राधारित मान से चलता है। अंत में फलश्रुति है कि इन युग-काल-प्रमाणों का भक्तिपूर्वक पाठ रक्षा करता है और अकाल मृत्यु के भय से भी मुक्त करता है।

Durvāsas-स्थापित-त्रिनेत्र-लिङ्गमाहात्म्य (The Glory of the Trinetra Liṅga Established by Durvāsas)
इस अध्याय में सूत–ऋषि संवाद के माध्यम से दुर्वासा-स्थापित त्रिनेत्र-लिंग की महिमा कही गई है। एक मठाधिपति लिंग-पूजा तो करता है, पर लेन-देन से प्राप्त धन को लोभवश जमा करता रहता है और सोना बंद संदूक में रखता है। दु:शील नामक चोर वैराग्य का ढोंग करके मठ में प्रवेश करता है, शैव-दीक्षा लेता है और अवसर की प्रतीक्षा करता है; यात्रा के समय मुरला नदी के तट पर ठहरने पर गुरु का विश्वास बढ़ता है, संदूक कुछ समय के लिए सुलभ रह जाता है और वह सोना चुराकर भाग निकलता है। बाद में गृहस्थ बनकर वह एक तीर्थ में दुर्वासा से मिलता है और लिंग के सामने नृत्य-गीत सहित भक्ति-प्रदर्शन देखता है। दुर्वासा बताते हैं कि उन्होंने यह लिंग इसलिए स्थापित किया क्योंकि महेश्वर ऐसी भक्ति से प्रसन्न होते हैं। फिर वे प्रायश्चित्त और धर्म का विधान देते हैं—कृष्णाजिन का दान, स्वर्ण सहित तिल-पात्रों में नियमित तिलदान, अधूरे प्रासाद/मंदिर का निर्माण पूर्ण करना गुरु-दक्षिणा रूप में, तथा पुष्प-नैवेद्य और भक्तिकलाओं का अर्पण। अंत में फलश्रुति है—चैत्र मास में दर्शन से वर्षभर के पाप नष्ट होते हैं, स्नान-अभिषेक से दशकों के पाप कटते हैं, और देव के सम्मुख नृत्य-गीत से जीवनभर के पापों का क्षय तथा मोक्षोपयोगी पुण्य प्राप्त होता है।

Nimbēśvara–Śākambharī Utpatti Māhātmya (Origin-Glory of Nimbēśvara and Śākambharī)
सूत जी बताते हैं कि दुःशील नाम का एक व्यक्ति, आचरण में दोष होने पर भी, गुरु के चरणों का स्मरण करते हुए गुरु के नाम से एक शिव-स्थान की स्थापना करता है। यह मंदिर दक्षिण दिशा की ओर स्थित बताया गया है और “निम्बेश्वर” के नाम से प्रसिद्ध होता है। वह तीव्र भक्ति से आधार-कार्य करता है और गुरु-भक्ति को ही अपना बल मानता है। उसकी पत्नी शाकम्भरी अपने ही नाम से दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करती है, जिससे शिव–देवी का संयुक्त तीर्थ बन जाता है। दम्पति शेष धन को पूजा-व्यवस्था में लगाकर देवताओं और ब्राह्मणों को दान देते हैं और फिर भिक्षा-वृत्ति से जीवन बिताते हैं। समय आने पर दुःशील का देहान्त होता है; शाकम्भरी अटल मन से पति के शरीर को लेकर चिता में प्रवेश करती है—यह प्रसंग यहाँ धर्म-उदाहरण के रूप में है, विधि-आदेश के रूप में नहीं। तत्पश्चात दोनों दिव्य विमान से, उत्तम अप्सराओं के साथ, स्वर्ग को जाते दिखाए गए हैं। अंत की फलश्रुति कहती है कि इस “उत्तम” आख्यान का पाठ करने वाला अज्ञान से किए पापों से मुक्त होता है; भक्ति, दान और तीर्थ-संबंध की शक्ति प्रतिपादित होती है।

एकादशरुद्रोत्पत्ति-वर्णनम् | Origin Account of the Eleven Rudras (at Hāṭakeśvara-kṣetra)
यह अध्याय संवाद-रूप में एक शंका का समाधान करता है। ऋषि पूछते हैं—परंपरा में रुद्र तो एक ही माने गए हैं, गौरी के पति और स्कन्द के पिता; फिर ‘एकादश रुद्र’ कैसे? सूत रुद्र की एकता स्वीकारते हुए बताते हैं कि विशेष प्रसंग में शिव ने एकादश रूपों में प्राकट्य किया। वाराणसी में तपस्वी हाटकेश्वर के प्रथम दर्शन का व्रत लेते हैं। प्रतिस्पर्धा बढ़ती है और नियम बनता है कि जो पहले दर्शन न कर पाए, वह सबके श्रमजन्य दोष का भागी होगा। शिव उनकी स्पर्धा-भावना जानकर भी भक्ति का मान रखते हुए नाग-द्वार से भूमिगत लोक से प्रकट होते हैं और त्रिशूलधारी, त्रिनेत्र, कपर्द-भूषित एकादशमूर्ति रूप धारण करते हैं। तपस्वी दण्डवत् प्रणाम कर दिशाओं से संबद्ध रुद्रों और रक्षक-स्वरूपों की स्तुति करते हैं। शिव कहते हैं—मैं ही एकादश रूपों में हूँ—और वर देते हैं। तपस्वी प्रार्थना करते हैं कि सर्वतीर्थ-स्वरूप हाटकेश्वर-क्षेत्र में वे एकादश रूपों में सदा विराजें। शिव स्वीकार करते हैं, बताते हैं कि एक रूप कैलास में रहेगा, और उपासना-विधि स्थापित करते हैं—विश्वामित्र-ह्रद में स्नान, इन मूर्तियों का नाम लेकर पूजन, जिससे पुण्य अनेकगुणा होता है। फलश्रुति में आध्यात्मिक उन्नति, दरिद्र को समृद्धि, निःसंतान को संतान, रोगी को आरोग्य और शत्रुओं पर विजय का वर्णन है; भस्म-स्नान का नियम रखने वाले साधक को षडक्षर मंत्र से अल्प अर्पण पर भी विशेष फल मिलता है। चैत्र शुक्ल चतुर्दशी को विशेष पूजन-काल बताकर, एकादश रुद्रों को महादेव की ही मूर्तियाँ कहा गया है।

एकादशरुद्रसमीपे दानमाहात्म्यवर्णनम् (The Glory of Donations in the Presence of the Eleven Rudras)
इस अध्याय में प्रश्नोत्तर रूप से धर्म-तत्त्व का निरूपण है। ऋषि वाराणसी में रुद्र से संबद्ध ब्राह्मण-नामों के एकादश समूह के विषय में पूछते हैं। कथावाचक हरि की आज्ञा से स्थापित रुद्र-रूपों के नाम बताता है—मृगव्याध, सर्वज्ञ, निन्दित, महायश, अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य, पिनाकी, परंतप, दहन, ईश्वर और कपालि। फिर ऋषि दान-विधि और पूर्वोक्त जप के बारे में मार्गदर्शन चाहते हैं। कथावाचक क्रमबद्ध दान-प्रणाली बताता है—प्रत्यक्षा (वास्तविक) धेनुओं का दान क्रम से किया जाए, और प्रत्येक धेनु किसी विशेष पदार्थ-सम्बन्ध से युक्त हो, जैसे गुड़-सम्बन्धी, मक्खन-सम्बन्धी, घी-सम्बन्धी, स्वर्ण-सम्बन्धी, लवण-सम्बन्धी, रस-सम्बन्धी, अन्न-सम्बन्धी, जल-सम्बन्धी आदि। फलश्रुति में कहा गया है कि ऐसे दान करने वाला चक्रवर्ती होता है; विशेषतः पवित्र उपस्थिति के निकट दिया गया दान अधिक प्रभावशाली होता है। सब कुछ न कर सके तो भी, समस्त रुद्रों को अर्पित मानकर यत्नपूर्वक कम से कम एक गाय का दान अवश्य करे।

द्वादशार्कोत्पत्तिरत्नादित्योत्पत्तिमाहात्म्ये याज्ञवल्क्यवृत्तान्तवर्णनम् (Origin of the Twelve Suns and the Ratnāditya: Account of Yājñavalkya)
इस अध्याय में सूत ऋषियों से कहते हैं कि आकाश में सूर्य एक ही दिखाई देता है, फिर भी हाटकेश्वर-क्षेत्र में बारह सूर्य-रूपों की विधिपूर्वक स्थापना क्यों की जाती है। यह परम्परा याज्ञवल्क्य की दीक्षा और प्रतिष्ठा से जुड़ी बताई गई है; सावित्री के शाप से ब्रह्मा का अवतरण और उससे उत्पन्न दाम्पत्य-क्रम तथा यज्ञ-आचार की मर्यादा से जुड़े धर्म-संकट भी वर्णित हैं। आगे शान्ति-कर्म के लिए राजाओं की बार-बार की प्रार्थनाओं के प्रसंग में गुरु शाकल्य और याज्ञवल्क्य के बीच टकराव होता है—अवमान, अस्वीकार और गुरु-शिष्य विवाद बढ़कर उस स्थिति तक पहुँचता है जहाँ याज्ञवल्क्य पूर्व-शिक्षा का प्रतीकात्मक त्याग करते हुए अर्जित विद्या को ‘उगल’ देते हैं। तब वे पुनः अधिकार-प्राप्ति हेतु सूर्य की कठोर उपासना करते हैं, बारह सूर्य-मूर्तियाँ बनाकर स्थापित करते हैं, उनके नामों की परम्परागत सूची बताकर अर्घ्य-आदि से पूजन करते हैं। सूर्य देव प्रकट होकर वर देते हैं और अश्व के कान में उपदेश के अद्भुत विधान से याज्ञवल्क्य को वेद-विद्या पुनः प्रदान कर उनकी वैदिक क्षमता को पुनः मान्यता देते हैं। अंत में इस उपदेश का प्रसार, तीर्थ-यात्रा के फल—पापक्षय, उन्नति और मोक्ष—तथा रविवार के दिन दर्शन की विशेष प्रभावशीलता बताकर इस क्षेत्र की सौर-परम्परा को साधना और शिक्षा—दोनों की पवित्र धरोहर के रूप में स्थापित किया गया है।

पुराणश्रवणमाहात्म्यवर्णन (Glorification of Listening to the Purāṇa)
अध्याय 279 में सूत जी स्कन्दपुराण की प्रामाणिकता को परम्परा के माध्यम से स्थापित करते हैं। स्कन्द ने यह पुराण भृगु (ब्रह्मा के पुत्र) को सुनाया; वहाँ से यह अङ्गिरस, च्यवन और ऋचीक तक क्रमशः पहुँचा—इसी गुरु-शिष्य परम्परा को प्रमाण-रूप में बताया गया है। फिर फलश्रुति आती है—सज्जनों की सभा में स्कन्दपुराण का श्रवण संचित पाप-मल को दूर करता है, आयु बढ़ाता है और सभी आश्रम-वर्णों के लिए कल्याणकारी है। हाटकेश्वर-क्षेत्र का माहात्म्य अपार पुण्यदायक कहा गया है; इस धर्म-माहात्म्य का ब्राह्मण को दान दीर्घकालीन स्वर्गफल देता है। पुत्र, धन, विवाह-योग, बिछड़े बन्धुओं का मिलन, तथा राज-विजय जैसे लौकिक लाभ भी बताए गए हैं। उपदेशक/गुरु का सम्मान ब्रह्मा-विष्णु-रुद्र के सम्मान के समान माना गया है; अल्प-उपदेश भी धन से चुकाया नहीं जा सकता, इसलिए गुरु को यथोचित दक्षिणा और आतिथ्य देना चाहिए। श्रवण को समस्त तीर्थों के फल के समान और बहुजन्म के दोषों को शांत करने वाला कहा गया है।
The place is presented as an ascetic forest in Ānarta where a crisis triggered by the falling of Śiva’s liṅga becomes the basis for establishing liṅga worship as uniquely authoritative; the site’s “glory” lies in being a setting where cosmic disorder is resolved through proper devotion and reinstatement of the liṅga.
Merit is framed through devotional correctness: sustained, faith-filled liṅga-pūjā (including tri-kāla worship) is said to lead to elevated spiritual outcomes (“parā gati”), and the act of honoring the liṅga is treated as honoring the triad of Śiva, Viṣṇu, and Brahmā.
The core legend is Śiva’s wandering after Satī’s separation, the ascetics’ curse causing the liṅga to fall into the earth and enter Pātāla, the ensuing cosmic omens, and the devas’ intervention culminating in the installation and worship of a golden liṅga named Hāṭakeśvara.