
अध्याय 122 सूत–ऋषि संवाद के रूप में है, जिसमें पूर्व की दैत्य-वध कथाओं से हटकर केदार-केन्द्रित पाप-नाशिनी कथा आती है। ऋषि पूछते हैं कि हिमालय में गंगाद्वार के निकट प्रसिद्ध केदार कैसे प्रतिष्ठित हुआ। सूत बताते हैं कि शिव का ऋतु-नियम है—वे दीर्घकाल हिमालय में निवास करते हैं, पर हिमपात के महीनों में स्थान दुर्गम हो जाता है, इसलिए अन्यत्र भी उनके निवास और पूजा की व्यवस्था की गई। कथा में इन्द्र, दैत्य हिरण्याक्ष और उसके सहयोगियों से पदच्युत होकर गंगाद्वार में तप करता है। शिव महिष (भैंसे) के रूप में प्रकट होकर इन्द्र की प्रार्थना स्वीकारते हैं और उन प्रमुख दैत्यों का संहार करते हैं; उनके अस्त्र-शस्त्र शिव को हानि नहीं पहुँचा पाते। इन्द्र के आग्रह पर शिव लोक-रक्षा हेतु उसी रूप में ठहरते हैं और स्फटिक-सा निर्मल एक कुण्ड स्थापित करते हैं। शुद्ध भक्त कुण्ड के दर्शन कर निर्दिष्ट हाथ/दिशा-विन्यास के साथ तीन बार जल पीता है और मातृ-पितृ-वंश तथा आत्म-सम्बन्धी मुद्राओं द्वारा देह-क्रिया को दिव्य विधि से जोड़ता है। इन्द्र निरन्तर पूजा की स्थापना करता है, देव का नाम ‘केदार’ रखता है (विदारक/छेदक अर्थ से) और भव्य मंदिर बनवाता है। फिर चार महीनों में जब हिमालय का मार्ग बंद रहता है, सूर्य के वृश्चिक से कुम्भ तक रहने पर शिव आनर्त देश के हाटकेश्वर-क्षेत्र में निवास करते हैं—वहाँ रूप-प्रतिष्ठा, मंदिर-निर्माण और नियमित पूजा का विधान है। फलश्रुति में कहा है कि चार मास की उपासना शिव-पथ की ओर ले जाती है; ऋतु के बाहर भी भक्ति पाप हरती है; विद्वान गीत-नृत्य से स्तुति करते हैं। नारद-उद्धृत वचन में केदार-जलपान और गया में पिण्डदान को ब्रह्मज्ञान तथा पुनर्जन्म-मुक्ति से जोड़ा गया है; सुनना, पढ़ना या पढ़वाना भी पाप-राशि नष्ट कर कुल का उद्धार करता है।
Verse 1
सूत उवाच । एतद्वः सर्वमाख्यातं यत्पृष्टोस्मि द्विजोत्तमाः । यथा स निहतो देव्या महिषाख्यो दनूत्तमः
सूत बोले—हे द्विजोत्तमो! जो कुछ तुमने पूछा था, वह सब मैंने कह दिया—कैसे दानवों में श्रेष्ठ महिष नामक असुर देवी द्वारा मारा गया।
Verse 2
सांप्रतं कीर्तयिष्यामि कथां पातकनाशिनीम् । केदारसंभवां पुण्यां तां शृणुध्वं समाहिताः
अब मैं पाप-नाशिनी कथा का कीर्तन करूँगा—केदार से उत्पन्न वह पुण्यकथा; तुम सब एकाग्रचित्त होकर उसे सुनो।
Verse 3
ऋषय ऊचुः । केदारः श्रूयते सूत गंगाद्वारे हिमाचले । स कथं चेह संप्राप्तः सर्वं विस्तरतो वद
ऋषियों ने कहा—हे सूत, केदार तो हिमाचल में गंगाद्वार पर प्रसिद्ध है; फिर वह यहाँ कैसे आया? सब कुछ विस्तार से कहिए।
Verse 4
सूत उवाच । एतत्सत्यं गिरौ तस्मिन्स्वयंभूः संस्थितः प्रभुः । परं तत्र वसेद्देवो यावन्मासाष्टकं द्विजाः
सूत बोले—यह सत्य है; उस पर्वत पर स्वयंभू प्रभु विराजमान हैं। परन्तु हे द्विजो, वहाँ देवता केवल आठ मास तक ही निवास करते हैं।
Verse 5
यावद्घर्मश्च वर्षा च तावत्तत्र वसेत्प्रभुः । शीतकाले पुनश्चात्र क्षेत्रे संतिष्ठते सदा
जितने समय तक ग्रीष्म और वर्षा ऋतु रहती है, उतने समय तक प्रभु वहाँ निवास करते हैं; और शीतकाल में भी वे इस क्षेत्र में सदा प्रतिष्ठित रहते हैं।
Verse 6
ऋषय ऊचुः । किं तत्कार्यं वसेद्येन क्षेत्रे मासचतुष्टयम् । हिमाचले यथैवाष्टौ सूतपुत्र वदस्व नः
ऋषियों ने कहा—किस प्रयोजन से कोई इस पवित्र क्षेत्र में चार मास निवास करे, और उसी प्रकार हिमाचल में आठ मास? हे सूतपुत्र, हमें बताइए।
Verse 7
सूत उवाच । पूर्वं स्वायंभुवस्यादौ मनोर्दैत्यो महाबलः । हिरण्याक्षो महातेजास्तपोवीर्यसमन्वितः
सूत बोले—पूर्वकाल में, स्वायंभुव मन्वन्तर के आरम्भ में, मनु के समय एक महाबली दैत्य था—हिरण्याक्ष, महान तेजस्वी और तपोबल से युक्त।
Verse 8
तैर्व्याप्तं जगदेतद्धि निरस्य त्रिदशाधिपम् । यज्ञ भागाश्चदेवानां हृता वीर्यप्रभावतः
उनके द्वारा यह जगत् व्याप्त हो गया; त्रिदशों के अधिपति (इन्द्र) को भी उन्होंने खदेड़ दिया। और अपने पराक्रम-प्रभाव से देवताओं के यज्ञ-भाग भी हर लिए।
Verse 9
अथ शक्रः सुरैः सार्धं गंगाद्वारं समाश्रितः । तपस्तेपे सुदुःखार्तो राज्यश्रीपरिवर्जितः
तब शक्र (इन्द्र) देवताओं सहित गंगाद्वार में शरण को गया। घोर दुःख से पीड़ित और राज्य-लक्ष्मी से वंचित होकर उसने तपस्या की।
Verse 10
तस्यैवं तप्यमानस्य तपस्तीव्रं महात्मनः । माहिषं रूपमास्थाय निश्चक्राम धरातलात्
उस महात्मा के इस प्रकार तीव्र तप करते समय (भगवान) महिष-रूप धारण कर धरातल से प्रकट हुए।
Verse 11
स्वयमेव महादेवस्ततः शक्रमुवाच ह । केदारयामि मे शीघ्रं ब्रूहि सर्वं सुरोत्तम । दैत्यानामथ सर्वेषां रूपेणानेन वासव
तब स्वयं महादेव ने शक्र से कहा—“हे सुरोत्तम, मुझे शीघ्र सब बताओ। हे वासव, इसी रूप से मैं समस्त दैत्यों का विदारण कर दूँगा।”
Verse 12
इन्द्र उवाच । हिरण्याक्षो महादैत्यः सुबाहुर्वक्र कन्धरः । त्रिशृंगो लोहिताक्षश्च पंचैतान्दारय प्रभो । हतैरेतैर्हतं सर्वं दानवानामसंशयम्
इन्द्र ने कहा—“हिरण्याक्ष महादैत्य है; (और) सुबाहु, वक्रकन्धर, त्रिशृंग तथा लोहिताक्ष—हे प्रभो, इन पाँचों का विदारण करो। इनके मारे जाने पर निःसंदेह समस्त दानव मारे गए समझो।”
Verse 13
किमन्यैः कृपणैर्ध्वस्तैर्यैः किंचिन्नात्र सिध्यति । तस्य तद्वचनश्रुत्वा भगवांस्तूर्णमभ्यगात् । यत्र दानवमुख्योऽसौ हिरण्याक्षो महाबलः
“अन्य दीन-ध्वस्त शत्रुओं से क्या प्रयोजन, जिनसे यहाँ कुछ सिद्ध नहीं होता?” उसके वचन सुनकर भगवान शीघ्र वहाँ गए जहाँ दानवों का मुखिया, महाबली हिरण्याक्ष था।
Verse 14
अथ तं दूरतो दृष्ट्वा महिषं पर्वतोपमम् । आयातं रौद्ररूपेण दानवाः सर्वतश्च ते
तब दूर से पर्वत-सम उस महिष को क्रोधमय रूप में आते देख, वे दानव चारों ओर से इकट्ठे हो गए।
Verse 15
ततो जघ्नुश्च पाषाणैर्लगुडैश्च तथापरे । क्ष्वेडितास्फोटितांश्चक्रुस्तथान्ये बलगर्विताः
तब कुछ ने पत्थरों और लाठियों से प्रहार किया; और कुछ बल-गर्व से भरे हुए गरजते, ताली बजाते और उँगलियाँ चटकाते रहे।
Verse 16
अथवमन्य तान्देवः प्रहारं लीलया ददौ । यत्रास्ते दानवेन्द्रोऽसौ चतुर्भिः सचिवैः सह
तब भगवान ने उन्हें तुच्छ जानकर, खेल-खेल में प्रहार किया और वहाँ पहुँचे जहाँ वह दानव-राज अपने चार मंत्रियों सहित खड़ा था।
Verse 17
ततः शस्त्रं समुद्यम्य यावद्धावति सम्मुखः । तावच्छृंगप्रहारेण सोनयद्यमसादनम्
फिर वह शत्रु शस्त्र उठाकर सामने से दौड़ा ही था कि प्रभु ने सींग के प्रहार से उसे यमलोक पहुँचा दिया।
Verse 18
हत्वा तं सचिवान्पश्चात्सुबाहुप्रमुखांश्च तान् । जघान हन्यमानोऽपि समन्ताद्दानवैः परैः
उसके बाद उसने सुबाहु आदि मंत्रियों को मारकर, शेष दानवों को भी—चारों ओर से आक्रमण होते हुए भी—संहार दिया।
Verse 19
न तस्य लगते क्वापि शस्त्रं गात्रे कथंचन । यत्नतोऽपि विसृष्टं च लब्धलक्षैः प्रहारिभिः
उसके शरीर पर कहीं भी किसी प्रकार कोई शस्त्र नहीं लगता था; लक्ष्य साधकर प्रहार करने वालों ने भी पूरा यत्न करके फेंका, तो भी वह नहीं लगा।
Verse 20
एवं पंच प्रधानास्तान्हत्वा दैत्यान्महेश्वरः । भूयो जगाम तं देशं यत्र शक्रो व्यवस्थितः । अब्रवीच्च प्रहष्टात्मा ततः शक्रं तपोन्वितम्
इस प्रकार उन पाँच प्रधान दैत्यों का वध करके महेश्वर फिर उस स्थान पर गए जहाँ शक्र (इन्द्र) स्थित थे; तब प्रसन्नचित्त होकर तपस्वी शक्र से बोले।
Verse 22
मत्तोऽन्यदपि देवेश वरं प्रार्थय वांछितम् । कैलासशिखरं येन गच्छामि त्वरयाऽन्वितः
हे देवेश! मुझसे अपनी इच्छा के अनुसार एक और वर माँगो, जिससे मैं शीघ्रता सहित कैलास-शिखर को जा सकूँ।
Verse 23
इन्द्र उवाच । अनेनैव हि रूपेण तिष्ठ त्वं चात्र शंकर । त्रैलोक्यरक्षणार्थाय धर्माय च शिवाय च
इन्द्र बोले—हे शंकर! इसी रूप में यहाँ ही ठहरिए, त्रिलोकी की रक्षा के लिए, धर्म के लिए और कल्याण के लिए।
Verse 24
श्रीभगवानुवाच । एतद्रूपं मया शक्र कृतं तस्य वधाय वै । अवध्यः सर्वभूतानां यतोन्येषां मया हतः
श्रीभगवान बोले—हे शक्र! मैंने यह रूप उसी के वध के लिए धारण किया था; वह सब प्राणियों के लिए अवध्य था, इसलिए अन्य किसी से नहीं, मुझसे ही मारा गया।
Verse 25
तस्मादत्रैव ते वाक्यात्स्थास्यामि सुर सत्तम । अनेनैव तु रूपेण मोक्षदः सर्वदेहिनाम्
इसलिए, हे देवश्रेष्ठ! तुम्हारे वचन से मैं यहीं निवास करूँगा; और इसी रूप में मैं समस्त देहधारियों को मोक्ष प्रदान करूँगा।
Verse 26
एवमुक्त्वा विरूपाक्षश्चक्रे कुंडं ततः परम् । शुद्धस्फटिकसंकाशं सुस्वादुक्षीरवत्प्रियम्
ऐसा कहकर विरूपाक्ष (शिव) ने तत्पश्चात् एक कुण्ड बनाया। वह शुद्ध स्फटिक के समान दीप्त था, और उसका जल दूध के समान मधुर—सबको प्रिय था।
Verse 27
ततः प्रोवाच देवेन्द्रं मेघगंभीरया गिरा । शृण्वतां सर्वदेवानां भगवांस्त्रिपुरातकः
तब भगवान् त्रिपुरान्तक ने, सब देवताओं के सुनते हुए, मेघ-गम्भीर वाणी से देवेन्द्र से कहा।
Verse 28
यो मां दृष्ट्वा शुचिर्भूत्वा कुंडमेतत्प्रपश्यति । त्रिः पीत्वा वामसव्येन द्वाभ्यां चैव ततो जलम्
जो मुझे देखकर शुद्ध होकर इस कुण्ड का दर्शन करता है—और फिर इसके जल को तीन बार आचमन करके, तत्पश्चात् बाएँ और दाएँ (हाथ) से उस जल को ग्रहण करे…
Verse 30
वामेन मातृकं पक्षं दक्षिणेनाथ पैतृकम् । उभाभ्यामथ चात्मानं कराभ्यां मद्वचो यथा
बाएँ हाथ से मातृ-पक्ष को, और दाएँ हाथ से पितृ-पक्ष को (पवित्र करे); फिर दोनों हाथों से अपने-आप को पवित्र करे—जैसा मैं कहता हूँ।
Verse 31
इन्द्र उवाच । अहमागत्य नित्यं त्वां स्वर्गाद्वृषभवाहन । अत्रस्थं पूजयिष्यामि पास्यामि च तथोदकम्
इन्द्र ने कहा—हे वृषभध्वज प्रभु! मैं स्वर्ग से प्रतिदिन यहाँ आकर, इस स्थान में स्थित आपकी पूजा करूँगा और इस पवित्र जल का पान भी करूँगा।
Verse 32
के दारयामि यत्प्रोक्तं त्वया महिषरूपिणा । केदार इति नाम्ना त्वं ततः ख्यातो भविष्यसि
भैंसे के रूप में आपने जो कहा है, उसे मैं धारण करूँगा (उसे निभाऊँगा)। इसलिए ‘केदार’ नाम से आप आगे प्रसिद्ध होंगे।
Verse 33
श्रीभगवानुवाच । यद्येवं कुरुषे शक्र ततो दैत्यभयं न ते । भविष्यति परं तेजो गात्रे संपत्स्यतेऽखिलम्
भगवान् ने कहा—हे शक्र! यदि तुम ऐसा करोगे, तो तुम्हें दानवों का भय नहीं रहेगा। परम तेज तुम्हारे शरीर में सर्वथा व्याप्त हो जाएगा।
Verse 34
एवमुक्तः सहस्राक्षस्ततः प्रासादमुत्तमम् । तदर्थं निर्मयामास साध्वालोकं मनोहरम्
ऐसा उपदेश पाकर सहस्राक्ष (इन्द्र) ने तब उसी हेतु एक उत्तम प्रासाद (मंदिर) बनवाया—जो मनोहर, रमणीय और सज्जनों के देखने योग्य था।
Verse 35
ततः प्रणम्य तं देवमनुमन्त्र्य ततः परम् । जगाम निजमावासं मेरुशृंगाग्रसंस्थितम्
फिर उस देव को प्रणाम करके और श्रद्धापूर्वक अनुमति लेकर, वह मेरु-शिखर के अग्रभाग पर स्थित अपने निवास को चला गया।
Verse 36
ततश्चागत्य नित्यं स स्वर्गाद्देवस्य शूलिनः । केदारस्य सुभक्त्याढ्यां पूजां चक्रे समाहितः
तत्पश्चात वह स्वर्ग से प्रतिदिन आकर त्रिशूलधारी देव केदार की अत्यन्त भक्ति-सम्पन्न पूजा एकाग्रचित्त होकर करता रहा।
Verse 37
मन्त्रोदकं च त्रिः पीत्वा ययौ ब्राह्मणसत्तमाः । कस्यचित्त्वथ कालस्य यावत्तत्र समाययौ
मन्त्र-संस्कारित जल को तीन बार पीकर वह श्रेष्ठ ब्राह्मण चला गया; कुछ समय बीतने पर वह फिर उसी स्थान पर आ पहुँचा।
Verse 38
तावद्धिमेन तत्सर्वं गिरेः शृंगं प्रपूरितम् । तच्च कुण्डं स देवश्च प्रासादेन समन्वितः
तब तक हिम से पर्वत-शिखर सब ओर भर गया था; और वहाँ वह कुण्ड तथा वह देवता भी भव्य प्रासाद सहित प्रकट हो गए।
Verse 39
ततो दुःखपरीतात्मा भक्त्या परमया युतः । तां दिशं प्रणिपत्योच्चैर्जगाम निजमंदिरम्
तब वह दुःख से घिरा हुआ, परन्तु परम भक्ति से युक्त, उस दिशा को ऊँचे स्वर से प्रणाम कर अपने निवास को लौट गया।
Verse 40
एवमागच्छतस्तस्य गतं मासचतुष्टयम् । अपश्यतो महादेवं दिदृक्षागतचेतसः
इसी प्रकार आते-जाते उसके चार मास बीत गए; दर्शन की अभिलाषा में चित्त लगा होने पर भी वह महादेव को न देख सका।
Verse 41
ततः प्राप्ते पुनर्विप्रा घर्मकाले हिमालये । संयातो दृक्पथं देवः स तथारूपसंस्थितः
तब, हे ब्राह्मणो, हिमालय में घर्मकाल के पुनः आने पर वही देवता उसी रूप में स्थित होकर दृष्टि-पथ में प्रकट हुए।
Verse 42
ततः पूजां विधायोच्चैश्चातुर्मास्यसमुद्भवाम् । गीतवाद्यादिकं चक्रे तत्पुरः श्रद्धयान्वितः
तब उसने चातुर्मास्य-व्रत से सम्बद्ध पूजा विधिपूर्वक भली-भाँति की और श्रद्धायुक्त होकर उनके सम्मुख गीत, वाद्य आदि अर्पित किए।
Verse 43
अथ देवः समालोक्य तां श्रद्धां तस्य गोपतेः । प्रोवाच दर्शनं गत्वा भगवांस्त्रिपुरांतकः
तब देव—त्रिपुरान्तक भगवान—उस गोपति की श्रद्धा देखकर दर्शन देने हेतु उसके सामने आए और उससे बोले।
Verse 44
परितुष्टोऽस्मि देवेश भक्त्या चानन्ययाऽनया । तस्मात्प्रार्थय दास्यामि यं कामं हृदिसंस्थितम्
‘हे देवेश! तुम्हारी इस अनन्य भक्ति से मैं पूर्णतः प्रसन्न हूँ। इसलिए अपने हृदय में स्थित जो भी कामना हो, माँगो—मैं उसे प्रदान करूँगा।’
Verse 45
शक्र उवाच । तव प्रसादात्संजातं ममैश्वर्यमनुत्तमम् । यत्किंचित्त्रिषु लोकेषु तत्सर्वं गृहसंस्थितम्
शक्र बोले—‘आपकी कृपा से मेरे लिए अनुपम ऐश्वर्य उत्पन्न हुआ है। तीनों लोकों में जो कुछ भी है, वह सब मेरे गृह-क्षेत्र में सुरक्षित स्थित है।’
Verse 46
तस्माद्यदि प्रसादं मे करोषि वृषभध्वज । वरं वा यच्छसि प्रीतस्तत्कुरुष्व वचो मम
इसलिए, हे वृषभध्वज! यदि आप मुझ पर प्रसन्न होकर कृपा करें, अथवा प्रीत होकर वर दें, तो मेरी इस प्रार्थना को पूर्ण कीजिए।
Verse 47
पर्वतोऽयं भवेद्गम्यो मासानष्टौ सुरेश्वर । यावन्मीनस्थितो भानुः प्रगच्छति श्रुतं मया
हे सुरेश्वर! मैंने ऐसा सुना है कि जब तक सूर्य मीन राशि में स्थित होकर चलता है, तब तक यह पर्वत आठ मासों तक गम्य रहता है।
Verse 48
ततः परमगम्यश्च हिमपूरेण संवृतः । यदा स्याच्चतुरो मासान्यावत्कुम्भगतो रविः
इसके बाद यह घने हिम से आच्छादित होकर अत्यन्त दुर्गम हो जाता है; यह अवस्था चार मासों तक रहती है, जब तक सूर्य कुम्भ राशि में न आ जाए।
Verse 49
संजायतेऽप्यगम्यश्च ममापि त्रिपुरांतक । किं पुनः स्वल्पसत्त्वानां नरादीनां सुरेश्वर
हे त्रिपुरान्तक! यह तो मेरे लिए भी अगम्य हो जाता है; फिर अल्पबल प्राणियों—मनुष्यों आदि—का क्या कहना, हे सुरेश्वर!
Verse 50
तस्मात्स्वर्गेऽथ पाताले मर्त्ये वा त्रिदशेश्वर । कुरुष्वानेनरूपेण स्थितिं मासचतुष्टयम् । येन न स्यात्प्रतिज्ञाया हानिर्मम सुरेश्वर
इसलिए, हे त्रिदशेश्वर! स्वर्ग में, पाताल में अथवा मर्त्यलोक में—आप इसी रूप में चार मास तक निवास कीजिए, जिससे मेरी प्रतिज्ञा का भंग न हो, हे सुरेश्वर।
Verse 51
सूत उवाच । ततो देवश्चिरं ध्यात्वा प्रोवाच बलसूदनम् । परं संतोषमापन्नो मेघनिर्घोषनिःस्वनम्
सूतजी बोले—तब देवता ने बहुत देर तक ध्यान करके बलसूदन से कहा; अत्यन्त प्रसन्न होकर उसकी वाणी मेघ-गर्जना के समान गूँज उठी।
Verse 52
आनर्तविषये क्षेत्रं हाटकेश्वरसंज्ञितम् । अस्मदीयं सहस्राक्ष विद्यते धरणीतले
आनर्त देश में हाटकेश्वर नाम का एक पवित्र क्षेत्र है; हे सहस्राक्ष, वह हमारा ही है और पृथ्वी पर विद्यमान है।
Verse 53
तत्राहं वृश्चिकस्थेऽर्के सदा स्थास्यामि वासव । यावत्कुम्भस्य पर्यंतं तव वाक्यादसंशयम्
हे वासव! वहाँ मैं सदा निवास करूँगा—जब सूर्य वृश्चिक में हो तब से लेकर कुम्भ के अंत तक; तुम्हारे वचन के कारण इसमें कोई संदेह नहीं।
Verse 54
तस्मात्तत्र द्रुतं गत्वा कृत्वा प्रासादमुत्तमम् । मम रूपं प्रतिष्ठाप्य कुरुपूजा यथोचिताम् । येन तत्र निजं तेजो धारयामि तवार्थतः
इसलिए वहाँ शीघ्र जाकर उत्तम प्रासाद (मंदिर) बनाओ, मेरी मूर्ति की प्रतिष्ठा करो और विधिपूर्वक पूजा करो; जिससे मैं तुम्हारे हित के लिए वहाँ अपना दिव्य तेज धारण करूँ।
Verse 55
सूत उवाच । एतच्छ्रुत्वा सहस्राक्षो देवदेवस्य शूलिनः । गत्वा तत्र ततश्चक्रे यद्देवेनेरितं वचः
सूतजी बोले—यह सुनकर सहस्राक्ष, देवों के देव शूलिन के वचन को मानकर, वहाँ गया और जैसा देव ने आदेश दिया था वैसा ही उसने किया।
Verse 56
प्रासादं निर्मयित्वाथ रूपं संस्थाप्य शूलिनः । कुण्डं चक्रे च तद्रूपं स्वच्छोदकसमावृतम्
मंदिर का निर्माण करके फिर शूलिन (शिव) के स्वरूप की प्रतिष्ठा की; और उसी स्वरूप के अनुरूप एक कुण्ड बनवाया, जो चारों ओर निर्मल जल से परिपूर्ण था।
Verse 57
ततश्चाराधयामास पुष्पधूपानुलेपनैः । स्नात्वा कुण्डेऽपिबत्तोयं त्रिःकृत्वा च यथापुरा
तब उसने पुष्प, धूप और सुगंधित लेपों से भगवान की आराधना की। कुण्ड में स्नान करके उसने प्राचीन विधि के अनुसार तीन बार उसका जल पिया।
Verse 58
एवं स भगवांस्तत्र शक्रेणाराधितः पुरा । समायातोऽत्र विप्रेंद्राः सुरम्यात्तु हिमाचलात्
इस प्रकार वह भगवान वहाँ पूर्वकाल में शक्र (इन्द्र) द्वारा आराधित हुए थे। हे विप्रश्रेष्ठो! वह रमणीय हिमालय से यहाँ इस स्थान पर आए।
Verse 59
यस्तमाराधयेत्सम्यक्सदा मासचतुष्टयम् । हिमपातोद्भवे मर्त्यः स शिवाय प्रपद्यते
जो मनुष्य हिमपात-जन्य उस तीर्थ में चार मास तक निरंतर विधिपूर्वक उसकी आराधना करता है, वह शिव की शरण को प्राप्त होता है।
Verse 60
शेषकालेऽपि यः पूजां करोत्येव सुभक्तितः । स पापं क्षालयेत्प्राज्ञ आजन्ममरणांतिकम्
उस अवधि के अतिरिक्त समय में भी जो सच्ची भक्ति से पूजा करता है, वह, हे प्राज्ञो, जन्म से लेकर मृत्यु-पर्यंत के पापों को धो डालता है।
Verse 61
तत्र गीतं प्रशंसंति नृत्यं चैव पृथग्विधम् । देवस्य पुरतः प्राज्ञाः सर्वशास्त्रविशारदाः
वहाँ देवता के सम्मुख, समस्त शास्त्रों में निपुण बुद्धिमान जन पवित्र गीत की प्रशंसा करते हैं और नाना प्रकार के नृत्य करते हैं।
Verse 62
अत्र श्लोकः पुरा गीतो नारदेन सुरर्षिणा । तद्वोऽहं कीर्तयिष्यामि श्रूयतां ब्राह्मणोत्तमाः
यहाँ पहले देवर्षि नारद ने एक श्लोक गाया था। वही मैं अब तुम्हें सुनाऊँगा—हे ब्राह्मणोत्तमो, ध्यान से सुनो।
Verse 63
केदारे सलिलं पीत्वा गयापिडं प्रदाय च । ब्रह्मज्ञानमथासाद्य पुनर्जन्म न विद्यते
केदार में जल पान करके और गया में पिण्डदान करके, फिर ब्रह्मज्ञान प्राप्त होने पर पुनर्जन्म नहीं होता।
Verse 64
एतद्वः सर्वमाख्यातं केदारस्य च संभवम् । आख्यानं ब्राह्मणश्रेष्ठाः सर्वपातकनाशनम्
हे ब्राह्मणश्रेष्ठो, केदार की उत्पत्ति और प्राकट्य सहित यह सब तुम्हें कहा गया। यह आख्यान समस्त पापों का नाश करने वाला है।
Verse 65
यश्चैतत्छृणुयात्सम्यक्पठेद्वा तस्य चाग्रतः । श्रावयेद्वापि वा विप्राः सर्वपातकनानम् । केदारस्य स पापौघैर्मुच्यते तत्क्षणान्नरः
हे विप्रो, जो इसे विधिपूर्वक सुने, या किसी के सामने पढ़े, अथवा सुनवाए—यह आख्यान समस्त पापों का नाश करता है। केदार-सम्बन्धी पाप-समूहों से वह मनुष्य उसी क्षण मुक्त हो जाता है।
Verse 294
कराभ्यां स पुमान्नूनं तारयेच्च कुलत्रयम् । अपि पापसमाचारं नरकेऽपि व्यव स्थितम्
वह पुरुष अपने ही हाथों से निश्चय ही अपने कुल की तीन पीढ़ियों का उद्धार कर देता है—पापाचारी भी हो, और नरक में स्थित हो, तब भी।