
Prabhasa Kshetra Mahatmya
This section is centered on Prabhāsa-kṣetra, a coastal pilgrimage region in western India traditionally associated with Somnātha/Someśvara worship and a dense network of tīrthas. The text treats the landscape as a ritual field where travel (yātrā), bathing, and recitation function analogously to Vedic rites, while also embedding the site in a broader purāṇic memory-map through genealogies of teachers and narrators.
366 chapters to explore.

प्रभासक्षेत्रमाहात्म्ये प्रस्तावना (Prologue: Invocation, Authority, and Eligibility)
इस अध्याय में प्रभास-खण्ड की कथा-भूमिका और प्रमाण-परम्परा स्थापित की जाती है। व्यास को पुराणार्थ के मूल ज्ञाता-आचार्य के रूप में स्मरण किया गया है। नैमिषारण्य के ऋषि सूत (रोमहर्षण) से प्रभास-क्षेत्र-माहात्म्य सुनाने का अनुरोध करते हैं; पूर्व में प्रचलित ब्राह्मी-यात्रा का उल्लेख कर वे विशेषतः वैष्णवी और रौद्री यात्राओं का वर्णन चाहते हैं। आरम्भ में सोमेश्वर की स्तुति, चैतन्य-स्वरूप (चिन्मात्र) को नमस्कार, तथा अमृत और विष के विरोध से रक्षण का संकेत आता है। सूत हरि को ओंकार-स्वरूप, परात्पर और सर्वव्यापी बताकर उनकी स्तुति करते हैं और आगे आने वाली कथा को सुव्यवस्थित, अलंकृत तथा पावन-शुद्धिकारक कहते हैं। नीति-निर्देश दिए जाते हैं कि यह उपदेश नास्तिकों को न दिया जाए; श्रद्धालु, शान्त और योग्य अधिकारियों के लिए ही इसका पाठ हो। ब्राह्मण-योग्यता को संस्कार, नित्यकर्म और सदाचार-सम्पन्नता के साथ जोड़ा गया है। अंत में कैलास पर शिव से आरम्भ होकर परम्परा से सूत तक पहुँची वाणी का वंशक्रम बताया जाता है, जिससे इस खण्ड की प्रामाणिकता और परम्परागत संरक्षण सिद्ध होता है।

Purāṇa-lakṣaṇa, Purāṇa-anuक्रम, and Upapurāṇa Enumeration (पुराणलक्षण–पुराणानुक्रम–उपपुराणनिर्देश)
इस अध्याय में ऋषि कथा-वाचन की कसौटी पूछते हैं—उसके लक्षण, गुण-दोष, और प्रमाणिक रचना की पहचान कैसे हो। सूतजी उत्तर देते हुए वेद और पुराण की आद्य उत्पत्ति, पुराण-साहित्य के मूलतः विशाल स्वरूप, तथा समय-समय पर व्यास द्वारा उसके संक्षेप और अठारह महापुराणों में विभाजन का वर्णन करते हैं। फिर महापुराणों और उपपुराणों की गणना की जाती है; अनेक स्थानों पर उनके अनुमानित श्लोक-परिमाण के साथ दान-विधि भी बताई जाती है—ग्रंथ की प्रतिलिपि बनाना, दान करना, और संबंधित अनुष्ठान सहित पुण्य-प्राप्ति का विधान। पुराण का प्रसिद्ध पंचलक्षण (सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वंतर, वंशानुचरित) स्पष्ट किया जाता है, तथा गुणानुसार सात्त्विक-राजस-तामस भेद और तदनुसार देवता-प्रधानता भी कही जाती है। अंत में इति्हास–पुराण परंपरा को वेदार्थ का स्थिर आधार बताकर, स्कंदपुराण के सात आंतरिक विभागों में प्राभासिक खंड का स्थान निर्धारित किया जाता है, जिससे आगे की तीर्थ-भूगोलात्मक कथा-धारा का मार्ग प्रशस्त होता है।

तीर्थविस्तरप्रश्नः प्रभासरहस्यप्रकाशश्च (Inquiry into the Spread of Tīrthas and the Revelation of Prabhāsa’s Secret)
इस अध्याय में ऋषि, पूर्व के सृष्टि-वर्णन के बाद, सूत से तीर्थों का क्रमबद्ध और स्पष्ट विवरण माँगते हैं। सूत कैलास पर हुए पुराने संवाद का स्मरण कराते हैं, जहाँ देवी दिव्य सभा को देखकर शिव की दीर्घ स्तुति करती हैं। शिव उत्तर में शिव-शक्ति के परम अभेद को प्रकट करते हुए व्यापक तादात्म्य-वचन कहते हैं—यज्ञ-भूमिकाओं, लोक-कार्य, काल-मानों और प्रकृति-शक्तियों में दोनों की परस्पर व्याप्ति दिखाते हैं। फिर देवी कलियुग से पीड़ित प्राणियों के लिए एक व्यावहारिक उपदेश पूछती हैं—ऐसा कौन-सा तीर्थ है जिसके दर्शन से सभी तीर्थों का फल मिल जाए। शिव भारत के प्रमुख तीर्थों का उल्लेख कर अंत में प्रभास को गुप्त और सर्वोच्च क्षेत्र बताते हैं। साथ ही यह नीति भी कहते हैं कि कपटी, हिंसक या नास्तिक यात्री वांछित फल नहीं पाते, और क्षेत्र की शक्ति जान-बूझकर सुरक्षित रखी गई है। अंत में सोमेश्वर लिंग का रहस्य, उसकी सृष्टि-भूमिका तथा इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति—इन तीन शक्तियों के जगत्-कार्य हेतु प्राकट्य का वर्णन होता है; श्रद्धा से सुनने वालों के लिए पवित्रता और स्वर्ग-प्राप्ति का फल कहा गया है।

प्रभासक्षेत्रप्रमाण-त्रिविधविभाग-श्रीसोमेश्वरमाहात्म्य (Prabhāsa: Measurements, Threefold Division, and the Somēśvara Discourse)
इस अध्याय में देवी प्रभास-तीर्थ की सर्वश्रेष्ठता और वहाँ किए गए कर्मों के अक्षय पुण्य का कारण विस्तार से पूछती हैं। ईश्वर उत्तर देते हैं कि प्रभास उनका अत्यन्त प्रिय क्षेत्र है, जहाँ वे निरन्तर सन्निहित रहते हैं; इसलिए वहाँ श्रद्धा से किया गया दान, तप, जप और यज्ञ कभी क्षीण नहीं होता। फिर वे प्रभास का त्रिस्तरीय स्वरूप बताते हैं—क्षेत्र, पीठ और गर्भगृह—जिनमें क्रमशः फल की वृद्धि होती है। सीमाएँ, दिशाचिह्न और भीतर का रुद्र-विष्णु-ब्रह्मा विभाजन, तीर्थों की संख्या तथा रौद्री, वैष्णवी और ब्राह्मी यात्राओं का विधान कहा गया है, जिन्हें इच्छाशक्ति, क्रियाशक्ति और ज्ञानशक्ति से जोड़ा गया है। आगे सोमेश्वर तथा कालभैरव/कालाग्निरुद्र की महिमा, रक्षण और शुद्धि का तत्त्व, और शतरुद्रीय को आदर्श शैव स्तोत्र-परंपरा के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। विनायक, दण्डपाणि और गणों जैसे रक्षकों का वर्णन तथा यात्रा-शिष्टाचार—द्वारदेवताओं का सम्मान, घृत-कम्बल आदि अर्पण, और विशेष तिथियों की रात्रियों में नियत कर्म—भी बताए गए हैं।

प्रभासक्षेत्रस्य अतिविशेषमहिमा — The Supreme Eminence of Prabhāsa-kṣetra
इस अध्याय में सूत के प्रसंग के बाद देवी प्रभास-क्षेत्र की महिमा का विस्तृत वर्णन पूछती हैं। ईश्वर प्रभास को अपना प्रिय क्षेत्र बताते हुए कहते हैं कि यह योगियों और वैराग्यशीलों की परा-गति का स्थान है; जो यहाँ देह त्यागते हैं, वे शिवलोक को प्राप्त होते हैं। फिर मर्कण्डेय, दुर्वासा, भरद्वाज, वसिष्ठ, कश्यप, नारद, विश्वामित्र आदि महर्षियों का उल्लेख आता है जो इस क्षेत्र को नहीं छोड़ते और निरन्तर लिङ्ग-पूजन करते हैं। अग्नि-तीर्थ, रुद्रेश्वर, कम्पर्दीश, रत्नेश्वर, अर्क-स्थल, सिद्धेश्वर, मर्कण्डेय-स्थान तथा सरस्वती/ब्रह्मकुण्ड आदि में जप-पूजा करने वाली विशाल सभाओं का संख्यात्मक वर्णन करके क्षेत्र की पवित्रता और साधना-घनत्व दिखाया गया है। फलश्रुति में कहा गया है कि चन्द्रशेखर भगवान के दर्शन से वेदान्त में प्रशंसित समस्त फल मिलता है; स्नान और पूजा से यज्ञफल प्राप्त होता है; पिण्ड-श्राद्ध से पितरों का विशेष उद्धार होता है; और जल का सहज स्पर्श भी पुण्यदायक है। साथ ही विभ्रम और संभ्रम नामक गण, विनायक-प्रकार के उपसर्ग तथा ‘दस दोष’ बताए गए हैं; इनके निवारण हेतु दण्डपाणि के भक्तिपूर्वक दर्शन का विधान है। अंत में सभी वर्णों के कामी या निष्कामी जनों के लिए प्रभास में मृत्यु को शिवधाम-प्राप्ति का साधन कहा गया है और महादेव के गुणों की अवर्णनीयता प्रतिपादित की गई है।

सोमेश्वरलिङ्गस्य परमार्थवर्णनम् (Theological Description of the Someshvara Liṅga at Prabhāsa)
इस अध्याय में देवी पूर्वकथित विषय की अद्भुतता स्वीकार कर पूछती हैं कि अन्य लोकप्रसिद्ध लिंगों की अपेक्षा सोमेश्वर की सिद्धि-शक्ति क्यों श्रेष्ठ है और प्रभास-क्षेत्र की विशेष महिमा क्या है। ईश्वर उत्तर देते हैं कि यह उपदेश परम ‘रहस्य’ है और तीर्थ, व्रत, जप, ध्यान तथा योग—इन सबमें प्रभास-माहात्म्य सर्वोच्च है। फिर सोमेश्वर-लिंग का परमार्थ-स्वरूप बताया जाता है—वह ध्रुव, अक्षय, अव्यय है; भय, मल, पराधीनता और कल्पना-विस्तार से रहित है; सामान्य स्तुति और वाणी के परे है, फिर भी साधक के बोध हेतु ज्ञान-दीप के समान प्रकट है। इसमें प्रणव/शब्द-ब्रह्म का संकेत, हृदय-कमल और द्वादशान्त की अंतःस्थिति, तथा ‘केवल’ और ‘द्वैत-रहित’ अद्वय लक्षणों का समन्वय है। वेद-स्मृति के अनुरूप ‘तमस से परे महान पुरुष’ के ज्ञान का संकेत देकर कहा जाता है कि हजारों वर्षों में भी सोमेश्वर की पूर्ण महिमा अवर्णनीय है। फलश्रुति में सभी वर्णों के लिए पाठ/श्रवण से पाप-नाश और अभीष्ट-प्राप्ति का विधान किया गया है।

सोमेश्वरनाम-प्रभाव-वर्णनम् | Someshvara: Names Across Kalpas, Boon of Soma, and the Sacred Topography of Prabhāsa
इस अध्याय में देवी, पूर्व स्तुतियाँ सुनकर, शंकर से पूछती हैं कि “सोमेश्वर/सोमनाथ” नाम की उत्पत्ति क्या है, यह नाम कैसे स्थिर माना जाता है, और कल्प-कल्प में इसमें परिवर्तन क्यों होता है। वे लिंग के पूर्व और भविष्य के नाम भी जानना चाहती हैं। ईश्वर उत्तर देते हैं कि ब्रह्मा-युगों के चक्र में लिंग के नाम बदलते रहते हैं; वे क्रमशः विभिन्न ब्रह्मा-परिचयों के अनुसार नामों की परंपरा बताते हुए वर्तमान नाम “सोमनाथ/सोमेश्वर” और भविष्य का नाम “प्राणनाथ” बताते हैं। देवी की स्मृति-क्षीणता को वे उनके बार-बार अवतार लेने और प्रकृति-कार्य से जुड़े रूप-परिवर्तन के कारण समझाते हैं, तथा अनेक कल्पों में देवी के नाम-रूपों का वर्णन करते हैं। फिर “सोमनाथ” नाम की प्रसिद्धि और स्थायित्व का कारण सोम/चंद्र के तप, एक उग्र नाम से निर्दिष्ट लिंग की पूजा, और उस वरदान में बताया जाता है कि ब्रह्मा-चक्र भर यह नाम सभी चंद्राधिकारियों में विख्यात रहे। इसके बाद अध्याय प्रभास-क्षेत्र का मानचित्र-सा वर्णन करता है—क्षेत्र की परिधि, मध्य पवित्र मंडल, दिशागत सीमाएँ, और समुद्र के निकट लिंग की स्थिति। पवित्र वृत में देहत्याग करने वालों के लिए मोक्षफल कहा गया है, क्षेत्र में अधर्म करने से कठोर निषेध दिया गया है, और घोर अपराधियों के नियंत्रण हेतु विघ्ननायक की रक्षक-व्यवस्था बताई गई है। अंत में सोमेश्वर-लिंग की अद्वितीय प्रियता, तीर्थों-लिंगों का संगम-स्थान होना, तथा भक्ति, स्मरण और नियमपूर्वक जप से मुक्ति देने वाली महिमा का गान होता है।

श्रीसोमेश्वरैश्वर्यवर्णनम् (Description of the Sovereign Powers of Śrī Someśvara)
इस अध्याय में देवी–ईश्वर संवाद है। देवी सोमेश्वर की पुनः शुद्धिकारी महिमा और ब्रह्मा–विष्णु–ईश के त्रिविध तत्त्व-निर्देशन का वर्णन चाहती हैं। ईश्वर बताते हैं कि प्रभास-क्षेत्र के सोमेश्वर-लिङ्ग से अद्भुत प्रभाव प्रकट होते हैं—असंख्य तपस्वी ऋषि उसमें प्रवेश कर लीन हो गए, और वहीं से सिद्धि, वृद्धि, तुष्टि, ऋद्धि, पुष्टि, कीर्ति, शान्ति, लक्ष्मी आदि समृद्धि-शक्तियाँ व्यक्त होकर उद्भूत होती हैं। आगे मंत्र-सिद्धियाँ, योग-रसायन व औषध-रस, गरुड़-विद्या, भूत-तन्त्र तथा खेचरी/अन्तरी जैसी विशेष परम्पराएँ भी इसी धाम से सम्बद्ध बताई जाती हैं। युग-युग में प्रभास के सोमेश्वर में सिद्धि पाने वाले सिद्ध-गणों (पाशुपत-सम्बद्ध महापुरुषों सहित) के नाम गिनाए जाते हैं; साथ ही कहा जाता है कि अशुभ कर्मों के कारण सामान्य जन इस स्थान का मूल्य नहीं पहचानते। ग्रह-दोष, भूत-प्रेतादि उपद्रव और अनेक रोग—इन सबका शमन सोमेश्वर-दर्शन से होता है, ऐसा विस्तृत सूची सहित कहा गया है। अंत में सोमेश्वर को ‘पश्चिमो भैरव’ और ‘कालाग्निरुद्र’ आदि नामों से अभिन्न बताकर निष्कर्ष दिया जाता है कि उनका माहात्म्य ‘सर्वपातक-नाशन’ है—तीर्थ-धर्म की भाषा में सर्वथा पाप-क्षय का सिद्धान्त।

मुण्डमालारहस्यं तथा प्रभासक्षेत्रतत्त्वनिर्णयः (The Secret of the Skull-Garland and the Tattva-Doctrine of Prabhāsa)
इस अध्याय में देवी प्रभास-क्षेत्र में शंकर को सोमेश्वर कहकर प्रणाम करती हैं और कालाग्नि-केन्द्रित दिव्य रूप का स्मरण करती हैं। वे एक सिद्धान्तगत शंका उठाती हैं—जो भगवान अनादि हैं और प्रलय से परे हैं, वे मुण्डों की माला कैसे धारण करते हैं? ईश्वर उत्तर देते हैं कि अनन्त कल्प-चक्रों में असंख्य ब्रह्मा और विष्णु उत्पन्न होकर लीन होते रहते हैं; मुण्डमाला बार-बार होने वाली सृष्टि और प्रलय पर प्रभुत्व का संकेत है। फिर प्रभास में शिव के शान्त, प्रकाशमय, आदि-मध्य-अन्त से परे स्वरूप का वर्णन आता है—बाएँ विष्णु, दाएँ ब्रह्मा, भीतर वेद, और नेत्रों के रूप में लोक-दीप्तियाँ; इससे देवी की शंका निवृत्त होती है और वे विस्तृत स्तुति करती हैं। इसके बाद देवी प्रभास की महिमा और अधिक सुनना चाहती हैं तथा पूछती हैं कि विष्णु द्वारका छोड़कर प्रभास में ही देह-त्याग क्यों करते हैं; वे विष्णु के जगत-कार्य, अवतारों और नियति पर अनेक प्रश्न रखती हैं। सूत प्रसंग को बाँधते हैं और ईश्वर ‘रहस्य’ बताते हैं—प्रभास अन्य तीर्थों से फल में श्रेष्ठ है; यहाँ ब्रह्म-तत्त्व, विष्णु-तत्त्व और रौद्र-तत्त्व का अद्वितीय संगम है। 24/25/36 तत्त्व-गणना को क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और शिव की सन्निधि से जोड़ा गया है। अंत में फलश्रुति में कहा गया है कि प्रभास में मृत्यु सभी वर्णों, आश्रमों और योनियों के प्राणियों को—यहाँ तक कि घोर पापों से दबे हुए जनों को भी—उच्च गति और शुद्धि प्रदान करती है।

तत्त्वतीर्थ-निरूपणम् (Mapping of Tattva-Tīrthas and the Sanctity of Prabhāsa)
इस अध्याय में ईश्वर देवी को उपदेश देते हुए तत्त्व-तत्त्वों को तीर्थ-मानचित्र के रूप में प्रकट करते हैं। पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—इन तत्त्व-क्षेत्रों के अधिष्ठाता क्रमशः ब्रह्मा, जनार्दन, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव बताए गए हैं; और कहा गया है कि प्रत्येक तत्त्व-क्षेत्र में स्थित तीर्थ उसी देवता की सन्निधि से युक्त होते हैं। आगे जल, तेज, वायु और आकाश से संबद्ध तीर्थ-समूहों (विशेषतः अष्टकों) का वर्णन आता है तथा सिद्धान्त रूप से जल-तत्त्व को नारायण का अत्यन्त प्रिय बताया गया है, जिन्हें ‘जलशायी’ कहा गया है। इसके बाद भल्लुका-तीर्थ का उल्लेख है, जो सूक्ष्म है, शास्त्र के बिना पहचानना कठिन है, पर केवल दर्शन से ही विस्तृत लिंग-पूजा के समान फल देने वाला कहा गया है। मासिक व्रत, अष्टमी-चतुर्दशी, ग्रहण, और कार्तिकी जैसे कालों में प्रभास के लिंगों की विशेष पूजा का विधान बताया गया है, तथा सरस्वती के समुद्र-संगम पर अनेक तीर्थों के एकत्र होने का वर्णन है। अध्याय में कल्प-कल्पान्तरों में क्षेत्र के विविध नामों की दीर्घ सूची दी गई है और भिन्न आकार-परिमाण वाले अनेक उपक्षेत्रों की बहुलता बताई गई है। अंत में प्रभास को प्रलय के बाद भी स्थित रहने वाला पवित्र क्षेत्र कहकर, श्रवण-पाठ को नैतिक शुद्धि का साधन बताया गया है और इस ‘रौद्र’ दिव्य आख्यान के श्रवण से उत्तम परलोक-गति का फल घोषित किया गया है।

प्रभासक्षेत्रनिर्णयः — Cosmography of Bhārata and the Etiology of Prabhāsa
इस अध्याय में देवी के प्रश्नों से प्रेरित तत्त्व-व्याख्या होती है। प्रसन्न होकर भी जिज्ञासु देवी प्रभास-क्षेत्र का विस्तृत वर्णन चाहती हैं। ईश्वर पहले जम्बूद्वीप और भारतवर्ष का माप-सीमा सहित निरूपण करते हैं और भारत को प्रधान कर्मभूमि बताते हैं, जहाँ पुण्य-पाप के फल का प्रत्यक्ष विधान होता है। फिर कूर्म-रूपक के द्वारा भारत-देह पर नक्षत्र-समूह, राशियों के स्थान और ग्रहों की अधिपतियाँ आरोपित कर बताते हैं कि ग्रह/नक्षत्र की पीड़ा से उसी अनुरूप प्रदेश-पीड़ा होती है, और शान्ति हेतु तीर्थ-कर्म करने की विधि उपयुक्त है। इसी भू-आकाशीय मानचित्र में सौराष्ट्र का स्थान बताकर समुद्र-समीप प्रभास को विशिष्ट भाग कहा गया है, जहाँ मध्य पिठिका में ईश्वर लिङ्ग-रूप से विराजते हैं—कैलास से भी अधिक प्रिय और गुप्त रूप से रक्षित। “प्रभास” नाम की कई व्युत्पत्तियाँ दी जाती हैं—प्रकाश, ज्योतियों व तीर्थों में प्रधानता, सूर्य-सन्निधि, तथा पुनः प्राप्त तेज। इसके बाद देवी वर्तमान कल्प की उत्पत्ति-कथा पूछती हैं। ईश्वर सूर्य के विवाह (द्यौः/प्रभा तथा पृथिवी/निक्षुभा), संज्ञा की असह्य तेज से पीड़ा, छाया का प्रतिस्थापन, यम-यमुना आदि की उत्पत्ति, रहस्य का सूर्य को ज्ञात होना, और विश्वकर्मा द्वारा सूर्य-तेज के क्षौर/शमन का वर्णन करते हैं। अंत में कहा जाता है कि सूर्य का ऋग्मय तेज का एक अंश प्रभास में गिरा, जिससे इस क्षेत्र की असाधारण पवित्रता और नाम-तर्क स्थापित होता है।

Yameśvarotpatti-varṇanam (Origin Account of Yameśvara)
इस अध्याय में ईश्वर शब्द-व्युत्पत्ति के माध्यम से तीर्थ की महिमा और प्रमाण्यता बताते हैं। पहले ‘राजा/रानी’ तथा ‘छाया’ जैसे शब्दों की धातु-आधारित व्याख्या करके यह दिखाया जाता है कि नाम और पहचान भी धर्म-तत्त्व का संकेत हैं। फिर वर्तमान मनु को वंश-परंपरा में रखकर शंख-चक्र-गदा-धारी वैष्णव-लक्षणयुक्त पुरुष का उल्लेख होता है और यम को ‘हीन-पाद’ दोष से पीड़ित बताकर उसके निवारण हेतु उपाय का प्रसंग उठता है। यम प्रभास-क्षेत्र में जाकर दीर्घकाल तक तप करता है और अत्यन्त लंबे समय तक लिंग की आराधना करता है। प्रसन्न होकर ईश्वर अनेक वर देते हैं और उस स्थान को स्थायी रूप से ‘यमेश्वर’ नाम से प्रतिष्ठित करते हैं। अंत में फलश्रुति कही गई है कि यम-द्वितीया के दिन यमेश्वर के दर्शन से यमलोक का दर्शन/अनुभव टल जाता है—इस प्रकार प्रभास-तीर्थ की यात्रा में इस व्रत-तिथि का मोक्षदायक महत्व बताया गया है।

Arka-sthala-prādurbhāva and Prabhāsa-kṣetra-tejas (Origin of Arkāsthala and the Radiant Sanctification of Prabhāsa)
इस अध्याय में देवी–ईश्वर संवाद है। देवी पूछती हैं कि शाकद्वीप में गतिमान सूर्य को ‘क्षुर-धार’ के समान किसी कारण से कैसे छाँटा/काटा गया और प्रभास में गिरा हुआ अपार तेज क्या बना। ईश्वर ‘उत्तम सूर्य-माहात्म्य’ सुनाते हैं, जिसके श्रवण से पाप नष्ट होते हैं। कहा गया है कि सूर्य का आद्य तेजांश प्रभास में गिरकर स्थलाकार बना—पहले जाम्बूनद (स्वर्ण) वर्ण का, फिर माहात्म्य-बल से पर्वत-सा; और प्राणियों के कल्याण हेतु सूर्य वहाँ अर्क-रूप प्रतिमा में प्रकट हुए। युगानुसार नाम बताए गए—कृत में हिरण्यगर्भ, त्रेता में सूर्य, द्वापर में सविता और कलि में अर्कस्थल; अवतरण का काल स्वारोचिष (द्वितीय) मनु का युग कहा गया। फिर तेज-रेणु के प्रसार से क्षेत्र की सीमाएँ, योजनों का विस्तार, नदियाँ और समुद्र आदि का वर्णन कर सूक्ष्म तेजोमण्डल अलग बताया गया। ईश्वर कहते हैं कि उनका निवास इसी तेजोमण्डल के मध्य नेत्र की पुतली के समान है; सूर्य-तेज से उनका गृह प्रकाशित होने के कारण ही यह ‘प्रभास’ कहलाता है। फलश्रुति में कहा है कि अर्क-रूप सूर्य के दर्शन से पापमुक्ति और सूर्यलोक में उत्कर्ष मिलता है; ऐसा यात्री मानो सब तीर्थों में स्नान कर, महायज्ञ और दान कर चुका हो। आचार-नियम भी हैं—अर्क-पत्तों पर भोजन करना घोर निन्दित और अशौच-फलदायक है, अतः त्याज्य है। अर्कभास्कर के प्रथम दर्शन पर विद्वान ब्राह्मण को महिष-दान का विधान, ताम्रवर्ण/लाल वस्त्र का उल्लेख तथा समीप के अग्नि-कोण का संकेत दिया गया है। अंत में सिद्धेश्वर लिंग (कलि में प्रसिद्ध, पूर्व नाम जैगीषव्येश्वर) के दर्शन से सिद्धि बताई गई। पास ही भूमिगत द्वार का वर्णन है जहाँ सूर्य-तेज से राक्षस जले; कलि में वह योगिनियों और मातृदेवियों द्वारा रक्षित ‘द्वार’ है। माघ कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि में बलि, पुष्प और उपहार से पूजन कर सिद्धि पाने का विधान है। उपसंहार में कहा गया है कि जो इस उपदेश को सुनकर आचरण करता है, वह देहांत में सूर्यलोक को प्राप्त होता है।

जैगीषव्यतपः–सिद्धेश्वरलिङ्गमाहात्म्य (Jaigīṣavya’s Austerities and the Glory of the Siddheśvara Liṅga)
इस अध्याय में देवी–ईश्वर संवाद के रूप में प्रभास-क्षेत्र की सूर्य-संबद्ध पवित्रता, अर्क-स्थल की आद्य प्रतिष्ठा और क्षेत्र-भूषणता, तथा पूजन के सही मानदण्ड—मंत्र, विधि और उत्सव-काल—का विस्तार से प्रश्न किया जाता है। ईश्वर उत्तर में कृतयुग की प्राचीन परम्परा का वर्णन करते हैं। शतकलाक के पुत्र महर्षि जैगीषव्य प्रभास में आकर दीर्घ काल तक क्रमशः कठोर तप करते हैं—वायु-आहार, जल-आहार, पर्ण-आहार और चान्द्रायण-व्रत के चक्र; अंततः तीव्र संयम के साथ लिङ्ग की भक्तिपूर्वक आराधना करते हैं। तब शिव प्रकट होकर संसार-बंधन काटने वाला ज्ञान-योग प्रदान करते हैं, साथ ही अमान, क्षमा और आत्मसंयम जैसे धर्म-स्थापक गुणों का उपदेश देते हैं, योग-ऐश्वर्य और भविष्य में दिव्य-दर्शन की सुलभता का वर देते हैं। अध्याय आगे बताता है कि युगों में इस स्थल की शक्ति बनी रहती है; कलियुग में वही लिङ्ग ‘सिद्धेश्वर’ नाम से प्रसिद्ध होता है। जैगीषव्य की गुहा में पूजा और योग-साधना शीघ्र फल देने वाली, शुद्धि करने वाली और पितरों के लिए भी कल्याणकारी कही गई है। अंत में फलश्रुति में सिद्ध-लिङ्ग-पूजन का अद्भुत पुण्य, व्यापक लौकिक-दैविक तुलना के साथ, घोषित किया गया है।

पापनाशनोत्पत्तिवर्णनम् | Origin Account of the Pāpa-nāśana Liṅga
इस अध्याय में ‘पाप-हर/पाप-नाशन’ कहे गए लिंग का संक्षिप्त तत्त्व और विधि-विधान बताया गया है। ईश्वर के वचन से प्रभास-क्षेत्र की दिशात्मक सूक्ष्म-भूगोल-रचना के भीतर इसका स्थान बताया जाता है—सिद्ध-लिंग के निकट अरुण (उषा-स्वरूप, सूर्य से संबद्ध) के साथ जुड़ा हुआ पापनाशन-लिंग प्रतिष्ठित है। आगे यह भी कहा गया है कि इसकी स्थापना सूर्य के सारथि ने की, जिससे सौर-संबंध पुष्ट होता है, पर पूज्य-केंद्र शैव-चिह्न लिंग ही रहता है। फिर स्पष्ट काल-नियम दिया गया है—चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को विधिपूर्वक और भक्ति से इसकी पूजा करनी चाहिए। इसका फल ‘पुण्डरीक’ के फल के समान/तुल्य बताया गया है, जो तीर्थ-माहात्म्य में पुण्य-निर्धारण का संकेत है। अंत में इसे प्रभास-खण्ड के प्रभास-क्षेत्र-माहात्म्य (प्रथम) का पंद्रहवाँ अध्याय कहा गया है।

पातालविवरमाहात्म्यं (Glory of the Pātāla Fissure near Arkasthala)
ईश्वर देवी को प्रभास में अर्कस्थल के निकट स्थित महान पाताल-विवर का माहात्म्य सुनाते हैं। आरम्भ में घोर अन्धकार के समय सूर्य-विरोधी असंख्य बलवान राक्षस उत्पन्न होते हैं और उदित होते दिवाकर का उपहास करते हैं। तब सूर्य धर्मयुक्त क्रोध से अपना तेज बढ़ाते हैं; उनकी तीक्ष्ण दृष्टि से वे राक्षस क्षीण ग्रहों की भाँति, गिरे हुए फलों या यंत्र से छूटी शिलाओं की तरह आकाश से गिर पड़ते हैं—अधर्म का पतन स्वयं उसका फल बनता है। वायु के वेग और आघात से वे पृथ्वी को फाड़कर रसातल में उतर जाते हैं और अंततः प्रभास पहुँचते हैं; उनके पतन से ही उस पाताल-विवर का प्राकट्य/दर्शन जुड़ा बताया गया है। अर्कस्थल को सर्व-सिद्धि देने वाला देव-स्थान कहा गया है और उसके पास यह विवर प्रमुख है; अन्य अनेक विवर कालक्रम में छिप गए, पर यह आज भी प्रकट है। यह स्थान सूर्य-तेज के मध्य भाग के समान स्वर्णमय, सिद्धेश द्वारा रक्षित और विशेषतः सूर्य-पर्वों में अत्यन्त फलदायक है। ब्राह्मी, हिरण्या और समुद्र का त्रि-संगम कोटि-तीर्थ के समान फल देने वाला कहा गया है। श्रीमुख-द्वार पर चतुर्दशी को एक वर्ष तक सुनन्दा आदि मातृगणों की पूजा, पुष्प-धूप-दीप-नैवेद्य तथा विधिपूर्वक ब्राह्मण-भोजन का विधान है; इससे सिद्धि मिलती है, और इस माहात्म्य का श्रवण उत्तम पुरुष को आपत्तियों से मुक्त करता है।

Arkasthala-Sūryapūjāvidhi: Dantakāṣṭha, Snāna, Arghya, Mantra-nyāsa, and Phalaśruti (अर्कस्थल-सूर्यपूजाविधिः)
इस अध्याय में ईश्वर प्रभास-क्षेत्र के अर्कस्थल में भास्कर/सूर्य की पूजा-विधि देवी को बताते हैं। पहले आदित्य की ब्रह्माण्डीय महिमा स्थापित होती है—वे देवताओं में आद्य हैं और चर-अचर जगत् का धारण, सृष्टि और प्रलय करते हैं; इसी से पूजा का आधार विश्व-धर्म में स्थित माना गया है। फिर क्रमशः शुद्धि-विधान आता है—मुख, वस्त्र और शरीर की पवित्रता; दन्तकाष्ठ के नियम (कौन-कौन से वृक्ष ग्राह्य हैं, उनके फल, निषेध, आसन, दाँत साफ करने का मंत्र, और काष्ठ का त्याग); तथा पवित्र मिट्टी/जल से मंत्रयुक्त स्नान। तर्पण, संध्या और सूर्य को अर्घ्य देने का विस्तार से वर्णन है, साथ ही पाप-नाश और पुण्य-वृद्धि की फलश्रुति। जो विस्तृत दीक्षा-विधि न कर सकें, उनके लिए वेद-मार्ग का विकल्प देकर आवाहन-पूजन के वैदिक मंत्र बताए गए हैं। अध्याय में मंडल-प्रतिष्ठा, अङ्ग-न्यास, ग्रहों और दिक्पालों की स्थापना-पूजा, तथा आदित्य के ध्यान और रूप-वर्णन का विधान है। मूर्ति-पूजा में अभिषेक-द्रव्य, उपवीत, वस्त्र, धूप, गंध, दीप, आरात्रिक आदि क्रम, प्रिय पुष्प-गंध-दीप और अर्पण-अयोग्य वस्तुओं का निर्देश मिलता है; लोभ और प्रसाद के अनुचित व्यवहार से बचने की चेतावनी भी है। अंत में राहु द्वारा ग्रहण का अर्थ ‘आवरण’ बताया गया है, गोपनीयता के नियम और श्रवण-पाठ के फल—समृद्धि, सुरक्षा और लोक-कल्याण—विभिन्न समुदायों के लिए वर्णित हैं।

चन्द्रोत्पत्तिवर्णनम् — Origin of the Moon and Śiva as Śaśibhūṣaṇa (Moon-adorned)
अध्याय 18 में सूत के मुख से चल रही कथा आगे बढ़ती है। प्रभास-क्षेत्र की महिमा का विस्तृत श्रवण करके देवी बताती हैं कि शंकर के उपदेश से उनका भ्रम और संशय मिट गया, मन प्रभास में स्थिर हो गया और तपस्या का फल सिद्ध हुआ। फिर वे विशेष रूप से पूछती हैं कि शिव के मस्तक पर विराजमान चन्द्रमा की उत्पत्ति कब और कैसे हुई। ईश्वर वराह-कल्प और सृष्टि के आरम्भिक काल का संकेत देकर उत्तर देते हैं। क्षीर-सागर के मंथन से चौदह रत्न प्रकट हुए, उन्हीं में तेजस्वी चन्द्रमा भी उत्पन्न हुआ। शिव कहते हैं कि वे चन्द्र को धारण करते हैं और विष-पान की घटना से उसका सम्बन्ध जोड़कर बताते हैं कि यह भूषण वैराग्य और मोक्ष-प्रतीक है। अंत में प्रभास में शिव का स्वयम्भू लिंग-रूप से नित्य निवास, सर्व सिद्धियों का दान और कल्प-पर्यन्त स्थिरता का वर्णन होता है।

कला-मान, सृष्टि-प्रलय-क्रम, तथा चन्द्र-लाञ्छन-कारण (Measures of Time, Creation–Dissolution Sequence, and the Cause of the Moon’s Mark)
इस अध्याय में देवी पूछती हैं कि चन्द्रमा सदा पूर्ण क्यों नहीं रहता। तब ईश्वर अमावस्या से पूर्णिमा तक चन्द्र-कला/तिथि की षोडश (सोलह) विभाग-व्यवस्था बताते हैं और समय के सूक्ष्म से विराट मानों का क्रम समझाते हैं—त्रुटि, लव, निमेष, काष्ठा, कला, मुहूर्त, दिन-रात, पक्ष, मास, अयन, वर्ष, युग, मन्वंतर और कल्प तक। इससे कर्मकाण्डीय समय-गणना का संबंध ब्रह्माण्डीय काल-विस्तार से जोड़ा जाता है। ईश्वर आगे माया/शक्ति को सृष्टि-स्थिति-प्रलय की प्रवर्तक शक्ति बताते हैं और यह सिद्धान्त रखते हैं कि जो उत्पन्न होता है वह अंततः अपने मूल कारण में लौट जाता है। फिर देवी सोम के अमृत-उद्भव और भक्तिप्रिय होने पर भी उसके लाञ्छन (चन्द्र-चिह्न) का कारण पूछती हैं; ईश्वर इसे दक्ष के शाप से उत्पन्न बताते हैं। असंख्य चन्द्र, ब्रह्माण्ड और कल्प बार-बार उत्पन्न और लीन होते हैं; सर्ग-संहार का एकमात्र अधिपति परमेश्वर ही है। अंत में विभिन्न कल्प-मन्वंतर-स्थानों का संकेत, पूर्व प्राकट्यों का स्मरण तथा धर्म-स्थापन हेतु विष्णु के अवतारों की परम्परा—भविष्य में कल्कि के आगमन सहित—संक्षेप में कही गई है।

दैत्यावतारक्रमः—सोमोत्पत्तिः—ओषधिनिर्माणं च (Order of Asura Incarnations, Soma’s Emergence, and the Origin of Plants)
इस अध्याय में ईश्वर देवी से अत्यन्त दीर्घ काल-चक्रों में दैत्य/राक्षस-सम्बद्ध साम्राज्यों के क्रम का वर्णन करते हैं। हिरण्यकशिपु और बलि जैसे प्रतापी शासकों को उदाहरण बनाकर बताया जाता है कि युग-सदृश अवधियों में कभी अधर्म का प्रभुत्व बढ़ता है और फिर लोक-व्यवस्था का पुनर्स्थापन होता है। इसके बाद वंश-परम्परा का प्रसंग आता है—पुलस्त्य-वंश, कुबेर और रावण आदि के जन्म, तथा नाम और पहचान के सूचक कारणों का उल्लेख किया जाता है। फिर कथा का मुख्य मोड़ सोम (चन्द्र) की उत्पत्ति है: अत्रि के तप से सोम का प्राकट्य, उसके ‘पतन’ से उत्पन्न विश्व-व्याकुलता, ब्रह्मा का हस्तक्षेप, और सोम का राजत्व व यज्ञ-प्रतिष्ठा में स्थापित होना—राजसूय की छाया तथा दक्षिणा-दान सहित—वर्णित है। अंत में ओषधियों का कारण-निर्देश दिया गया है—वनस्पति, धान्य, दाल आदि की उत्पत्ति का सूचीवत् वर्णन। सोम को ज्योत्स्ना द्वारा जगत् का पोषण करने वाला और वनस्पतियों का अधिपति बताकर, ब्रह्माण्ड-तत्त्व को कृषि और अनुष्ठान-जीवन से जोड़ा गया है।

Dakṣa-śāpa, Soma-kṣaya, and Prabhāsa-liṅga Upadeśa (दक्षशाप–सोमक्षय–प्रभासलिङ्गोपदेशः)
इक्कीसवें अध्याय में देवी ईश्वर से सोम के विशेष चिह्न/अवस्था और उसके कारण का प्रश्न करती हैं। ईश्वर दक्ष की संतति और विवाह-वितरण का वर्णन करते हैं—दक्ष की कन्याएँ धर्म, कश्यप, सोम आदि को दी गईं; फिर धर्म की पत्नियों और उनकी संतानों, वसुओं और उनके वंश, साध्यों, बारह आदित्यों, ग्यारह रुद्रों तथा हिरण्यकशिपु आदि असुर-वंशों का संक्षिप्त वंशानुक्रम बताया जाता है। इसके बाद सोम के सत्ताईस नक्षत्र-पत्नियों से विवाह का प्रसंग आता है, जिसमें रोहिणी सोम की अत्यन्त प्रिय बनती है। अन्य नक्षत्र-पत्नियाँ उपेक्षा से दुःखी होकर दक्ष के पास जाती हैं। दक्ष सोम को समान भाव से रहने की चेतावनी देते हैं; सोम वचन देकर भी फिर रोहिणी में ही आसक्त हो जाता है। तब दक्ष शाप देते हैं कि सोम को यक्ष्मा (क्षय-रोग) ग्रस्त करेगा और उसका तेज क्रमशः घटेगा। क्षीण तेज वाले सोम को रोहिणी सलाह देती है कि शाप देने वाले अधिकार के पास जाकर और अंततः महादेव की शरण लेकर उपाय करो। सोम दक्ष से निवृत्ति माँगता है; दक्ष कहते हैं कि यह शाप सामान्य उपायों से नहीं टलता, शंकर की आराधना करो। वे स्थान-निर्देश भी देते हैं—वरुण दिशा में समुद्र के निकट अनूप (दलदली) प्रदेश में एक स्वयम्भू, अत्यन्त प्रभावशाली लिंग है; उसके दिव्य लक्षणों का वर्णन कर भक्तिपूर्वक पूजन से शुद्धि और पुनः तेज-प्राप्ति का उपदेश देते हैं। इस प्रकार अध्याय नीति (पक्षपात का फल), वंश-सूची और प्रभास-क्षेत्र के लिंग-उपासना मार्ग को जोड़ता है।

कृतस्मरपर्वत-वर्णनम् तथा सोमशापानुग्रहः (Description of Mount Kṛtasmar(a) and Soma’s Curse–Boon Resolution)
अध्याय 22 में प्राभास-क्षेत्र की पवित्र भूगोल-परंपरा के भीतर सोम का दुःख से पुनर्स्थापन तक का क्रम आता है। दक्ष की अनुमति मिलने पर भी शोकग्रस्त सोम प्राभास पहुँचकर प्रसिद्ध कृतस्मर पर्वत का दर्शन करता है, जहाँ शुभ वनस्पतियाँ, पक्षी, गन्धर्वों का संगीत, तथा तपस्वी और वेदपाठी ब्राह्मणों की सभा का मनोहर वर्णन है। इसके बाद सोम समुद्र-तट पर ‘स्पर्श’ से संबद्ध लिङ्ग के निकट बार-बार प्रदक्षिणा और एकाग्र पूजन करता है। फल-मूलाहार के नियम से दीर्घ तप करके वह शिव के परात्पर स्वरूप की स्तुति करता है, जिसमें अनेक नाम और युगानुक्रम से जुड़े दिव्य नामों की परंपरा भी आती है। शिव प्रसन्न होकर वर देते हैं कि सोम का क्षय और वृद्धि कृष्ण व शुक्ल पक्ष में क्रमशः होती रहे—दक्ष का वचन भी सत्य रहे और उसकी कठोरता भी शान्त हो जाए। अध्याय में आगे ब्राह्मण-प्राधान्य को जगत-स्थिरता और यज्ञ-सिद्धि का आधार बताने वाला दीर्घ नीतिपरक प्रसंग है। अंत में समुद्र में छिपे लिङ्ग के विषय में तथा उसके प्रतिष्ठापन की विधि का संकेत देकर कहा गया है कि जहाँ तेजहीन सोम की प्रभा पुनः लौटी, वही स्थान ‘प्राभास’ कहलाया।

Somēśa-liṅga Pratiṣṭhā at Prabhāsa: Soma’s Yajña Preparations and Brahmā’s Consecration
इस अध्याय में सोम (चन्द्र) शम्भु से प्राप्त परम लिंग को लेकर प्रभास-क्षेत्र में भक्ति और विस्मय सहित निवास करते हैं। वे विश्वकर्मा (त्वष्टा) को लिंग की रक्षा और उचित स्थान-निर्धारण का दायित्व देकर स्वयं चन्द्रलोक लौटते हैं, ताकि महायज्ञ के लिए विशाल सामग्री जुटा सकें। मंत्री हेमगर्भ व्यवस्था संभालता है—अग्नि सहित ब्राह्मणों को बुलाता है, वाहन और प्रचुर दान-सामग्री जुटाता है, तथा देव, दानव, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, सप्तद्वीपों के नरेश और पातालवासियों तक को यज्ञ हेतु आमंत्रित करता है। प्रभास में शीघ्र ही मण्डप, यूप और अनेक कुण्ड बनते हैं; समिधा, कुश, पुष्प, घृत, दूध और स्वर्ण पात्र आदि विधिपूर्वक तैयार होकर उत्सव-सा वैभव छा जाता है। हेमगर्भ तैयारी का समाचार सोम और ब्रह्मा को देता है। ब्रह्मा ऋषियों सहित, बृहस्पति को पुरोहित बनाकर आते हैं; प्रभास में अपने बार-बार आगमन और कल्पानुसार नाम-भेद का वर्णन करते हैं तथा पूर्व दोष के परिहार और प्रतिष्ठा के पुनर्संस्कार की आवश्यकता बताकर ब्राह्मणों को सहायता हेतु नियुक्त करते हैं। फिर अनेक मण्डपों की रचना, ऋत्विजों का विभाजन, रोहिणी को पत्नी बनाकर सोम की दीक्षा, वेद-शाखाओं के अनुसार मंत्र-जप का वितरण, दिशानुसार नियत आकृतियों में कुण्ड-निर्माण, ध्वज-स्थापन और पवित्र वृक्षों की स्थापना होती है। अंत में ब्रह्मा भूमि में प्रवेश कर लिंग को प्रकट करते हैं, उसे ब्रह्म-शिला पर स्थापित कर मंत्र-न्यास सहित सोमेश की प्रतिष्ठा पूर्ण करते हैं। धूमरहित अग्नि, दिव्य दुन्दुभि और पुष्प-वृष्टि जैसे शुभ लक्षण प्रकट होते हैं; तत्पश्चात् प्रचुर दक्षिणा, राजदान और सोम द्वारा स्थापित देवता की त्रिकाल पूजा का विधान बताया गया है।

सोमनाथलिङ्गप्रतिष्ठा, दर्शनफलप्रशंसा, पुष्पविधान, तथा सोमवारव्रतप्रस्तावना (Somnātha Liṅga स्थापना, merits of darśana, floral regulations, and the prelude to the Monday-vrata)
इस अध्याय में देवी–ईश्वर संवाद के माध्यम से त्रेता-युग की पवित्र परंपरा में सोमनाथ-लिंग की स्थापना और उसकी प्रामाणिकता बताई गई है। सोम अपने तप और निरंतर उपासना के बल पर शिव की अनेक विशेषणों से स्तुति करता है—ज्ञानस्वरूप, योगस्वरूप, तीर्थस्वरूप और यज्ञस्वरूप। शिव प्रसन्न होकर लिंग में अपनी नित्य-सन्निधि का वर देते हैं तथा स्थान का नाम ‘प्रभास’ और देव का नाम ‘सोमनाथ’ स्थापित करते हैं। फिर फलश्रुति में कहा गया है कि सोमनाथ-दर्शन महान तप, दान, तीर्थयात्रा और बड़े यज्ञों के समान या उनसे भी बढ़कर फल देता है—क्षेत्र में भक्तिपूर्ण साक्षात्कार को सर्वोच्च माना गया है। साथ ही पूजा में ग्राह्य और त्याज्य पुष्प-पत्रों की सूची, ताजगी तथा रात्रि-दिवस संबंधी नियम और निषेध भी दिए गए हैं। आरोग्य-लाभ के बाद सोम द्वारा मंदिर-नगर, प्रासाद-समूह और दान-व्यवस्थाओं के निर्माण का वर्णन आता है। शिव-निर्माल्य के स्पर्श से अशौच की शंका पर ब्राह्मणों की चिंता और नारद के माध्यम से गौरी–शंकर संवाद का सिद्धांत—भक्ति का महत्त्व, गुणानुसार प्रवृत्तियाँ, तथा शिव और हरि का परम तत्त्व में अद्वैत संबंध—प्रतिपादित होता है। अंत में सोमवार-व्रत की प्रस्तावना और एक गंधर्व-परिवार की कथा द्वारा सोमनाथ-पूजन से रोग-निवारण का उपाय बताया जाता है।

सोमवारव्रतविधानम् — The Ordinance of the Monday Vow (Somavāra-vrata)
इस अध्याय में संवाद के रूप में सोमव्रत (सोमवार-व्रत) का विधान बताया गया है। ईश्वर एक गन्धर्व का प्रसंग कहते हैं, जो भव (शिव) को प्रसन्न करना चाहता है और सोमव्रत की विधि पूछता है। गोशृंग ऋषि इस व्रत को सर्वकल्याणकारी बताते हुए पूर्वकथा सुनाते हैं—दक्ष के शाप से पीड़ित सोम ने दीर्घ ध्यान द्वारा शिव की आराधना की; प्रसन्न शिव ने सूर्य-चन्द्र और पर्वतों के रहने तक स्थिर रहने वाला लिङ्ग स्थापित होने का वर दिया, और सोम रोगमुक्त होकर पुनः तेजस्वी हो गया। फिर व्रत की प्रक्रिया आती है—शुक्लपक्ष के सोमवार को शुद्धि करके सुसज्जित कलश और पूजास्थल की स्थापना, उमासहित सोमेश्वर तथा दिक्-रूपों की पूजा, श्वेत पुष्पों और निर्दिष्ट अन्न-फल आदि का नैवेद्य। उमायुक्त बहुमुख-बहुभुज शिव के लिए बताए गए मंत्र से जप-पूजन किया जाता है। सोमवारों की क्रमिक साधना (दन्तकाष्ठ के भेद, अर्पण, रात्रि-नियम जैसे दर्भ पर शयन और कहीं-कहीं जागरण) बताई गई है। नवें दिन उद्यापन में मण्डप, कुण्ड, कमल-मण्डल, आठ दिशाओं के कलश, स्वर्ण-प्रतिमा, होम, गुरु-दक्षिणा, ब्राह्मण-भोजन तथा वस्त्र-गोदान आदि होते हैं। फलश्रुति रोग-नाश, समृद्धि, वंश-कल्याण और शिवलोक-प्राप्ति बताती है; अंत में गन्धर्व प्रभास-क्षेत्र के सोमेश्वर में व्रत करके वर पाता है।

गन्धर्वेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Gandharveśvara Māhātmya (Description of the Glory of Gandharveśvara)
इस अध्याय में ईश्वर शैव-उपदेश की शैली में गन्धर्वेश्वर का माहात्म्य बताते हैं। घनवाहन नामक गन्धर्व वर पाकर कृतार्थ होता है और भक्तिभाव से शिवलिङ्ग की स्थापना करता है। वही लिङ्ग “गन्धर्वेश्वर” कहलाता है, जिसे “गान्धर्व-फलदायक” अर्थात गन्धर्व-संबंधी फल देने वाला कहा गया है। इसका स्थान सोमेश के उत्तर में और दण्डपाणि के निकट निश्चित बताया गया है। फिर पूजा का व्यावहारिक निर्देश आता है—वरुण-सम्बद्ध भाग (वरदा-वारुण-भाग) में, धनुषों के “पञ्चक” के बीच स्थित स्थान पर, शुक्ल/कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि को पूजन करने से उपासक के दुःख-क्लेश का निवारण होता है। अंत में कोलोफोन द्वारा इसे स्कन्दमहापुराण (८१,००० श्लोक) के प्राभासखण्ड के सप्तम भाग तथा प्राभास-क्षेत्र-माहात्म्य के प्रथम खण्ड का अध्याय बताया गया है।

गन्धर्वसेनेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Gandharvasenīśvara: Account of the Shrine’s Greatness
इस अध्याय में ईश्वर देवी से कहते हैं कि गौरी के निकट गन्धर्वसेना द्वारा स्थापित एक लिङ्ग ‘विमलेश्वर’ नाम से प्रसिद्ध है और वह सर्वरोग-विनाशक है। उसके स्थान का संकेत ‘तीन धनुष’ की दूरी और ‘पूर्व विभाग’ की दिशा से दिया गया है, जिससे पवित्र क्षेत्र में मार्ग-निर्देशन होता है। यहाँ भक्ति-पूर्वक पूजन का विधान बताया गया है, विशेषतः तृतीया तिथि को व्रतभाव से पूजने का फल अधिक माना गया है। फलश्रुति में स्त्री साधिका के लिए दुर्भाग्य-नाश, मनोवांछित सिद्धि, पुत्र-पौत्र की प्राप्ति तथा प्रतिष्ठा का वरदान कहा गया है। अंत में इसे पातक-नाशक व्रत-कथा बताकर त्रेता-युग की परंपरा में स्थित किया गया है।

Somnātha-yātrāvidhi, Tīrthānugamana-nyāya, and Dāna–Upavāsa Regulations (सौमनाथयात्राविधिः)
इस अध्याय में देवी सोमनाथ-यात्रा का ठीक-ठीक समय, विधि और अनुशासन पूछती हैं। ईश्वर बताते हैं कि जब भीतर संकल्प (भाव) जागे तब किसी भी ऋतु में यात्रा की जा सकती है; कारण मुख्यतः भाव ही है। फिर तैयारी के नियम आते हैं—रुद्र को मन से नमस्कार, यथायोग्य श्राद्ध, प्रदक्षिणा, मौन/वाणी-संयम, संयमित आहार, तथा क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर आदि दोषों का त्याग। इसके बाद प्रतिपादन है कि कलियुग में तीर्थानुगमन, विशेषकर पैदल यात्रा, कुछ यज्ञ-परम्पराओं से भी श्रेष्ठ फल देने वाली है; और प्रभास तीर्थों में अद्वितीय है। यात्रा के ढंग (पैदल/वाहन), तप (भिक्षा-आधारित संयम), और आचरण-शुद्धि के अनुसार फल-भेद बताया गया है; अनुचित प्रतिग्रह, तथा वेद-विद्या का व्यापार/विक्रय जैसे आचरणों से सावधान किया गया है। वर्ण-आश्रम के अनुसार उपवास-नियम, कपटपूर्ण तीर्थयात्रा की निन्दा, और प्रभास में तिथि-क्रम से दान का सुव्यवस्थित विधान दिया गया है। अंत में कहा गया है कि मंत्रहीन या निर्धन यात्री भी यदि प्रभास में देह त्यागें तो शिवलोक को प्राप्त होते हैं; साथ ही तीर्थ-स्नान के सामान्य मंत्र-क्रम का निर्देश देकर अगले विषय—आगमन पर पहले किस तीर्थ में स्नान करें—की भूमिका बाँधी गई है।

Agnitīrtha–Padmaka Tīrtha Vidhi and the Ocean’s Curse–Boon Narrative (अग्नितीर्थ–पद्मकतीर्थविधिः सागरशापवरकथा)
इस अध्याय में दो जुड़े हुए प्रसंग हैं। पहले भाग में तीर्थ-विधान आता है—ईश्वर शुभ समुद्र-तट पर अग्नितीर्थ का निर्देश करते हैं और सोमनाथ के दक्षिण में स्थित पद्मक तीर्थ को विश्वविख्यात पाप-नाशक बताते हैं। शंकर का मन से ध्यान करके स्नान, वपन/केश-छेदन के बाद केशों को नियत स्थान पर अर्पित करना, फिर पुनः स्नान और श्रद्धापूर्वक तर्पण करने की विधि कही गई है। स्त्री-गृहस्थ आदि की मर्यादाएँ, मंत्र के बिना समुद्र-स्पर्श का दोष, पर्व-काल और नियत विधि से ही समुद्र-गमन की चेतावनी, तथा समुद्र-प्रवेश के मंत्र और समुद्र में स्वर्ण-कंकण अर्पित करने का विधान भी बताया गया है। दूसरे भाग में देवी पूछती हैं कि नदियों का आश्रय और विष्णु-लक्ष्मी से संबद्ध समुद्र में ‘दोष’ कैसे हो सकता है। ईश्वर पुराकथा सुनाते हैं—प्रभास में दीर्घ यज्ञ के बाद दक्षिणा माँगने वाले ब्राह्मणों से भयभीत देवता समुद्र में छिप गए; देवताओं की रक्षा हेतु समुद्र ने ब्राह्मणों को छिपाकर मांस खिलाया, जिससे ब्राह्मण-शाप के कारण समुद्र सामान्यतः अस्पृश्य/अपेय हो गया। ब्रह्मा ने उपाय ठहराया कि पर्व-काल, नदी-संगम, सेतुबन्ध और कुछ विशिष्ट तीर्थों में विधिपूर्वक समुद्र-स्पर्श शुद्धिदायक और महान पुण्यदायक होगा; समुद्र रत्नादि देकर प्रतिदान भी करता है। अंत में वाडवानल (समुद्र के भीतर जल पीने वाली अग्नि) के स्थान-निर्देश के साथ अग्नितीर्थ को रक्षित, गुह्य और अत्यन्त फलदायक कहा गया है—इसके श्रवण मात्र से भी भारी पापियों का शोधन होता है।

सोमेश्वरपूजामाहात्म्यवर्णनम् | Someshvara Worship: Procedure and Merits
देवी के प्रश्न पर ईश्वर बताते हैं कि अग्नि-तीर्थों में स्नान के बाद यात्री अपनी यात्रा को निर्विघ्न कैसे करे। विधिपूर्वक स्नान करके महोदधि को अर्घ्य दें, फिर गंध‑पुष्प‑वस्त्र‑लेपन से पूजन करें। सामर्थ्य के अनुसार स्वर्ण कंगन/आभूषण पवित्र जल में अर्पित करें, पितरों का तर्पण करें और कपर्दिन शिव के पास जाकर गण‑सम्बन्धी मंत्र से अर्घ्य समर्पित करें। मंत्राधिकार का भी निर्देश है; शूद्रों के लिए भी अष्टाक्षर मंत्र का स्मरण आदि बताया गया है। इसके बाद सोमेश्वर के दर्शन कर अभिषेक करें और शतरुद्रीय आदि रुद्रपाठ/जप करें। दूध, दही, घी, मधु, शर्करा/गन्ने के रस से स्नापन, कुंकुम‑कपूर‑उशीर‑कस्तूरी‑चंदन से सुगंधित लेपन, धूप‑दीप‑नैवेद्य‑आरती, तथा गीत‑नृत्य आदि भक्ति‑सेवा का विधान है। द्विज तपस्वियों, दीन‑दरिद्र, अंधे और निराश्रितों को दान दें तथा सोमेश्वर‑दर्शन की तिथि पर उपवास का नियम रखें। इसका फल—जीवन के सभी चरणों के पापों का क्षय, कुल का उद्धार, दरिद्रता‑अमंगल से मुक्ति और तीव्र भक्ति—विशेषतः कलियुग की कठिनता में भी सोमेश्वर‑सेवा से महान पुण्य प्राप्त होता है।

वडवानलोत्पत्तिवृत्तान्ते दधीचिमहर्षये सर्वदेवकृतस्वस्वशस्त्रसमर्पणवर्णनम् (Origin Account of the Vādavānala and the Devas’ Deposition of Weapons with Maharṣi Dadhīci)
इस अध्याय में देवी–ईश्वर संवाद के माध्यम से तीन बातों का कारण पूछा जाता है—(1) पहले बताए गए ‘स-कार-पंचक’ का रहस्य, (2) प्रभास क्षेत्र में सरस्वती का प्राकट्य और निवास, तथा (3) वडवानल की उत्पत्ति और उसका समय। ईश्वर बताते हैं कि प्रभास में सरस्वती पावन शक्ति के रूप में प्रकट होती हैं और पाँच नामों—हिरण्या, वज्रिणी, न्यङ्कु, कपिला और सरस्वती—से विख्यात हैं। इसके बाद कथा कारण-प्रसंग में मुड़ती है। सोम से संबंधित कारण से देव–असुर संघर्ष शांत होने पर ब्रह्मा की आज्ञा से चंद्रमा तारा को लौटा देते हैं। देवगण पृथ्वी पर दृष्टि डालकर दधीचि महर्षि के दिव्य-सम आश्रम को देखते हैं, जो ऋतु-पुष्पों और सुगंधित वनस्पतियों से शोभित है। वे संयमित, मानुष-सी चाल से वहाँ पहुँचते हैं; ऋषि उन्हें अर्घ्य-पाद्य से सत्कार कर आसन देते हैं। इंद्र निवेदन करते हैं कि देवों के शस्त्र सुरक्षित रखने हेतु ऋषि स्वीकार करें। दधीचि पहले उन्हें स्वर्ग लौटने को कहते हैं, पर इंद्र आग्रह करते हैं कि आवश्यकता के समय शस्त्र पुनः प्राप्त होने चाहिए। तब ऋषि सत्य-प्रतिज्ञा करते हैं कि युद्धकाल में लौटा देंगे; इंद्र उनके सत्य पर भरोसा कर शस्त्र सौंपकर चले जाते हैं। फलश्रुति में कहा है कि जो इस वृत्तांत को नियमपूर्वक सुनता है, उसे संग्राम में विजय, सुयोग्य संतान, तथा धर्म, अर्थ और यश की प्राप्ति होती है।

दधीच्यस्थि-शस्त्रनिर्माणम्, पिप्पलादोत्पत्तिः, वाडवाग्नि-प्रसंगः (Dadhīci’s Bones and the Making of Divine Weapons; Birth of Pippalāda; The Vāḍava Fire Episode)
इस अध्याय में देवताओं के चले जाने के बाद ब्राह्मण-ऋषि दधीचि तपस्या में स्थित रहकर उत्तर दिशा में नदी-तट के आश्रम में निवास करते हैं। उनकी सेविका सुभद्रा स्नान के समय अनजाने में त्यागे हुए कौपीन से संपर्क करती है, जिससे गर्भ ठहर जाता है; लज्जित होकर वह अश्वत्थ-वृक्षों के उपवन में प्रसव करती है और अज्ञात कारणकर्ता पर शर्त सहित शाप देती है। उधर लोकपाल और इन्द्र दधीचि के पास आकर सौंपे गए अस्त्रों की वापसी मांगते हैं। दधीचि बताते हैं कि उन अस्त्रों की शक्ति उन्होंने अपने शरीर में समाहित कर ली है और कहते हैं कि उनके अस्थियों से दिव्य शस्त्र बनाए जाएँ; लोक-रक्षा हेतु वे स्वेच्छा से देह त्याग देते हैं। देवता पाँच दिव्य सुरभि-गायों से अस्थियों का शोधन कराते हैं; विवाद से सरस्वती पर शाप का प्रसंग आता है, जिससे कर्मकाण्ड में शौच-अशौच की परंपरा का कारण बताया जाता है। विश्वकर्मा दधीचि की अस्थियों से वज्र, चक्र, शूल आदि लोकपालों के आयुध बनाते हैं। बाद में सुभद्रा बालक को जीवित पाती है; वह कर्म-नियति का संकेत देता है और अश्वत्थ-रस से पोषित होने के कारण ‘पिप्पलाद’ कहलाता है। पिता के आयुध-निर्माण हेतु वध का समाचार सुनकर वह प्रतिशोध का संकल्प करता है और तप से घोर कृत्या उत्पन्न करता है; उसकी जंघा से अग्निरूप प्राणी प्रकट होता है, जो वाडवाग्नि से जुड़ा है। देवता भयभीत होकर शरण लेते हैं; विष्णु क्रमशः एक-एक करके भक्षण की विधि से उस उग्रता को नियम में बाँधकर जगत-व्यवस्था स्थापित करते हैं। अंत में श्रवण-फल कहा गया है कि श्रद्धा से सुनने पर पाप-भय मिटता है तथा ज्ञान और मोक्ष में सहायता मिलती है।

वाडवानल-नयनम् तथा पञ्चस्रोता-सरस्वती-प्रादुर्भावः (Transport of the Vāḍava Fire and the Manifestation of Five-Stream Sarasvatī)
इस अध्याय में देवी पूर्व घटना-क्रम के विषय में पूछती हैं। ईश्वर बताते हैं कि प्रलयकारी वाडवानल को नियंत्रित कर अन्यत्र ले जाना देवताओं के लिए आवश्यक हो गया था। विष्णु ने सरस्वती को उसका ‘यान’ बनाया, पर गंगा आदि नदियाँ उसकी दाहक शक्ति से असमर्थता प्रकट करती हैं। सरस्वती पिता की आज्ञा के बिना कार्य न करने का व्रत बताकर ब्रह्मा से अनुमति लेती हैं; ब्रह्मा उन्हें भूमिगत मार्ग से चलने का विधान देते हैं और कहते हैं कि थकने पर वे पृथ्वी पर ‘प्राची’ रूप से प्रकट होकर तीर्थों के द्वार खोलेंगी। इसके बाद सरस्वती का शुभ प्रस्थान, हिमालय से नदी-रूप में उद्भव, और बार-बार भूमिगत तथा दृश्य प्रवाह का वर्णन आता है। प्रभास में हरिण, वज्र, न्यङ्कु और कपिल—इन चार ऋषियों के निमित्त सरस्वती पाँच धाराओं वाली होकर पाँच नाम धारण करती हैं—हरिणी, वज्रिणी, न्यङ्कु, कपिला और सरस्वती। इन धाराओं में स्नान-पान के नियमों से महापापों का शमन और विशिष्ट दोषों की शुद्धि का क्रम बताया गया है। फिर कृतस्मरा नामक पर्वत विवाह हेतु बाधा डालता है; सरस्वती चतुराई से उससे वाडवानल थामने को कहती हैं और अग्नि-स्पर्श से पर्वत नष्ट हो जाता है। कथा में उसके नरम पत्थरों को गृह-देवालय निर्माण योग्य बताया गया है। अंत में समुद्र तट पर वाडवानल वर देता है; विष्णु की सलाह से सरस्वती ‘सूची-मुख’ होने का वर माँगती हैं, जिससे वह जल पी सके पर देवताओं को न जला सके। अध्याय श्रवण-पाठ की फलश्रुति के साथ पूर्ण होता है।

वडवानल-निबन्धनम् (Containment of the Vaḍavānala) — Sarasvatī, the Ocean, and Prabhāsa’s Tīrtha-Order
ईश्वर देवी को प्रभास-क्षेत्र से जुड़ी एक दिव्य कथा सुनाते हैं। सरस्वती वडवानल (समुद्र के भीतर की प्रलयकारी अग्नि) से संबंधित वर पाकर, दैवी आज्ञा से प्रभास आती हैं और समुद्र को बुलाती हैं। दिव्य शोभा और सेवकों से युक्त समुद्र प्रकट होता है; सरस्वती उसे समस्त प्राणियों का आद्य आधार कहकर संबोधित करती हैं और देवकार्य हेतु वडवा-अग्नि को स्वीकार करने की प्रार्थना करती हैं। समुद्र विचार कर स्वीकार करता है; अग्नि के तेज बढ़ते ही जलचर भयभीत हो उठते हैं। तभी दैत्यों का संहारक अच्युत विष्णु आते हैं, जलचरों को आश्वस्त करते हैं और वरुण/समुद्र को आदेश देते हैं कि वडवानल को गहरे जल में स्थापित कर नियंत्रित रखो, जहाँ वह समुद्र को पीता हुआ-सा रहता है पर बंधा रहता है। समुद्र को जल-क्षय का भय होता है, तब विष्णु समुद्र-जल को अक्षय कर देते हैं और जगत का संतुलन स्थिर हो जाता है। फिर सरस्वती एक नामित मार्ग से समुद्र में प्रवेश कर अर्घ्य देती हैं, अर्घ्येश्वर की स्थापना करती हैं और कहा गया है कि वे दक्षिण-पूर्व में सोमेश के निकट स्थित रहती हैं, वडवानल-संबंध को धारण किए। अंत में अग्नितीर्थ की तीर्थ-विधि बताई जाती है—स्नान, पूजन, दंपतियों को वस्त्र-भोजन का दान और महादेव की आराधना। चाक्षुष और वैवस्वत मन्वंतर का उल्लेख तथा फलश्रुति है कि इस कथा का श्रवण पाप हरता है और पुण्य व कीर्ति बढ़ाता है।

Ādhyāya 35 — Oūrva, Vāḍavāgni, and Sarasvatī’s Tīrtha-Route to Prabhāsa (और्व-वाडवाग्नि-सरस्वतीतीर्थमार्गः)
इस अध्याय में देवी वर्तमान मन्वन्तर में भृगुवंशी और्व के जन्म का कारण पूछती हैं। ईश्वर बताते हैं कि धन-लोभ से क्षत्रियों ने ब्राह्मणों का वध किया; तब एक स्त्री ने गर्भ को जाँघ (ऊरु) में छिपाकर बचाया, और उसी से और्व प्रकट हुए। और्व ने तपस्या से उत्पन्न भयंकर रौद्र अग्नि—और्व/वाडवाग्नि—उत्पन्न की, जो पृथ्वी को भस्म करने को उद्यत हुई; देवगण ब्रह्मा की शरण में गए। ब्रह्मा ने और्व को शांत कर आदेश दिया कि यह अग्नि संसार को न जलाए, समुद्र में प्रवाहित की जाए। तब सरस्वती स्वर्ण-कलश में प्रतिष्ठित अग्नि को लेकर हिमालय से पश्चिम दिशा तक तीर्थ-मार्ग से चलती हैं; वे बार-बार अंतर्धान होकर नामित कूपों और तीर्थों में प्रकट होती हैं—गन्धर्व-कूप, अनेक ईश्वर-स्थल, संगम, वट, वन और यज्ञ-नोडों का विस्तृत क्रम बनता है। अंत में समुद्र-तट पर सरस्वती वाडवाग्नि को लवण-जल में छोड़ देती हैं; अग्नि वर देता है, पर मुद्रिका-आज्ञा से समुद्र को सुखाने से रोका जाता है। अध्याय में प्राची सरस्वती की दुर्लभता व महिमा, अग्नि-तीर्थ का पुण्य, और ‘रौद्री यात्रा’ की पूजा-क्रमावली—सरस्वती, कपर्दिन/शिव, केदार, भीमेश्वर, भैरवेश्वर, चण्डीश्वर, सोमेश्वर, नवग्रह, रुद्र-एकादश तथा बाल-रूप ब्रह्मा—का फलश्रुति सहित वर्णन है, जो पाप-नाशक कहा गया है।

Prācī Sarasvatī Māhātmya and Prāyaścitta of Arjuna at Prabhāsa (प्राचीसरस्वतीमाहात्म्यं तथा पार्थस्य प्रायश्चित्तकथा)
इस अध्याय में देवी प्राची सरस्वती की दुर्लभता और विशेषतः प्रभास में उसकी श्रेष्ठ शुद्धि-शक्ति के विषय में पूछती हैं। ईश्वर (शिव) प्रभास-तीर्थ की अतिशय महिमा बताते हुए कहते हैं कि यह नदी दोषों का नाश करने वाली है; इसके पान और स्नान के लिए कठोर काल-नियम नहीं, और जो भी इसमें स्नान-पान करे—यहाँ तक कि पशु भी—पुण्य को प्राप्त होते हैं। कुरुक्षेत्र और पुष्कर की तुलना में प्रभास में इसका प्रभाव अधिक कहा गया है। फिर सूत एक दृष्टान्त सुनाते हैं—भारत-युद्ध के बाद बन्धु-वध के भार से अर्जुन (किरीटी, नरा-नारायण-सम्बन्धी) लोक में तिरस्कृत और बहिष्कृत हो जाते हैं। श्रीकृष्ण उन्हें गया, गंगा या पुष्कर नहीं, बल्कि प्राची सरस्वती के स्थान पर जाने की आज्ञा देते हैं। अर्जुन त्रिरात्र उपवास करते हैं और दिन में तीन बार स्नान करते हैं; इससे संचित पाप नष्ट होता है और युधिष्ठिर आदि उन्हें पुनः स्वीकार कर लेते हैं। अध्याय में आगे नियम-नीति भी आती है—उत्तरी तट के समीप देहान्त को ‘पुनरागमन-रहित’ फलदायक कहा गया है, तप की प्रशंसा की गई है, और तीर्थ में दान-श्राद्ध करने से दाता तथा पितरों को अनेक गुना फल, यहाँ तक कि कई पीढ़ियों का उद्धार, बताया गया है। अंत में सरस्वती को नदियों में श्रेष्ठ, लोक-कल्याण और परलोक-सुख देने वाली कहा गया है।

कंकणमाहात्म्यवर्णनम् / Theological Account of the Bracelet Rite
इस अध्याय में प्रभास-क्षेत्र में सोमेश्वर के निकट समुद्र में कंकण (कड़ा/कंगन) डालने की विधि, उसका कारण और उसका महाफल संवाद के रूप में बताया गया है। देवी मंत्र, विधि, समय और पूर्व-प्रसंग पूछती हैं; ईश्वर पुराण-शैली में एक दृष्टांत सुनाते हैं। धर्मनिष्ठ राजा बृहद्रथ और उनकी पतिव्रता रानी इन्दुमती के यहाँ महर्षि कण्व पधारते हैं। सत्कार और धर्मोपदेश के बाद कण्व इन्दुमती का पूर्वजन्म बताते हैं—वह पहले एक दरिद्र आभीर स्त्री थी, जिसके पाँच पति थे। वह सोमेश्वर आई; समुद्र-स्नान करते समय लहरों से घिरकर उसका स्वर्ण-कंकण गिर गया और खो गया; कुछ समय बाद उसकी मृत्यु हुई और वह पुनर्जन्म में राजकुल में रानी बनी। कण्व स्पष्ट करते हैं कि इन्दुमती का वर्तमान सौभाग्य किसी बड़े व्रत, तप या दान से नहीं, बल्कि प्रभास में कंकण-घटना के स्थान-विशेष फल से जुड़ा है। फिर कंकण-रिति का फल—पाप-नाश और सर्वकाम-प्रदता—बताकर कहा जाता है कि सोमेश्वर के लवण-जल में स्नान के बाद यह कर्म प्रतिवर्ष किया जाए; तीर्थ-शक्ति से छोटे कर्म का भी महान पुण्य होता है।

Kaparddī-Vināyaka as Prabhāsa-kṣetra Protector and the Vighnamardana Stotra (कपर्द्दी-विनायकः प्रभासक्षेत्ररक्षकः तथा विघ्नमर्दनस्तोत्रम्)
इस अध्याय में देवी–ईश्वर संवाद के द्वारा यह स्पष्ट किया गया है कि प्रभास-क्षेत्र में सोमेश्वर के दर्शन से पहले कपर्द्दी-विनायक (गणेश का एक रूप) की वंदना क्यों आवश्यक है। ईश्वर सोमेश्वर को प्रभास में प्रतिष्ठित सदाशिव का लिंग-रूप बताते हैं और विघ्नों के नियमनकर्ता होने से कपर्द्दी की प्रधानता समझाते हैं। युगानुसार विनायक के अवतार भी बताए गए हैं—कृत में हेरम्ब, त्रेता में विघ्नमर्दन, द्वापर में लम्बोदर और कलि में कपर्द्दी। आगे कथा में देवताओं की चिंता प्रकट होती है, क्योंकि मनुष्य बिना विधि-विधान के भी केवल सोमेश्वर-दर्शन से स्वर्गसुख प्राप्त करने लगते हैं, जिससे कर्म-क्रम और देव-लोक की मर्यादा डगमगाती है। देवता देवी की शरण लेते हैं; देवी अपने शरीर को संकुचित करने से उत्पन्न ‘मल’ से चतुर्भुज गजमुख विनायक को प्रकट करती हैं और उसे यह कार्य देती हैं कि जो लोग मोहवश सोमेश्वर की ओर जाएँ, उनके लिए विघ्न उत्पन्न कर संकल्प-शुद्धि और नैतिक तैयारी की रक्षा करे। देवी उसे प्रभास-क्षेत्र-रक्षक नियुक्त कर आदेश देती हैं कि वह परिवार-धन की आसक्ति या रोग आदि से अस्थिर जनों को रोक दे, ताकि केवल दृढ़ निश्चयी ही आगे बढ़ें। अंत में कपर्द्दी के लिए विघ्नमर्दन स्तोत्र, लाल द्रव्यों से पूजा और चतुर्थी-व्रत का विधान बताया गया है। फलश्रुति में विघ्नों पर अधिकार, निश्चित समय में कार्य-सिद्धि और कपर्द्दी की कृपा से अंततः सोमेश्वर-दर्शन का फल कहा गया है; ‘कपर्द्दी’ नाम उसके कपर्द (जटाजूट-सदृश) आकार से जोड़ा गया है।

Kedāra (Vṛddhi/Kalpa) Liṅga Māhātmya and Śivarātri Jāgaraṇa: The Narrative of King Śaśabindu
इस अध्याय में ईश्वर महादेवी को प्रभास-क्षेत्र के केदार-संबद्ध लिंग का माहात्म्य बताते हैं। यह स्वयम्भू, शिवप्रिय और भीमेश्वर के निकट स्थित है; पूर्व युग में इसका नाम रुद्रेश्वर था। म्लेच्छ-संसर्ग के भय से यह लिंग लीन/गुप्त हो गया और फिर पृथ्वी पर ‘केदार’ नाम से प्रसिद्ध हुआ। विधि यह है कि लवण-सागर तथा पद्मक तीर्थ/कुण्ड में स्नान करके रुद्रेश और केदार का पूजन किया जाए। विशेषतः शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को एक-रात्रि जागरण सहित शिवरात्रि-व्रत अत्यन्त पुण्यदायक कहा गया है। इसके बाद राजा शशबिन्दु चतुर्दशी को प्रभास आता है, जप-होम में लगे ऋषियों को देखकर सोमनाथ की पूजा करता है और फिर केदार जाकर जागरण करता है। च्यवन, याज्ञवल्क्य, नारद, जैमिनि आदि के पूछने पर वह पूर्वजन्म की कथा सुनाता है—दुर्भिक्ष में वह शूद्र था; रामसरस में कमल तोड़े पर बिक न सके। वहीं अनंगवती नामक गणिका ने वृद्ध/रुद्रेश्वर लिंग पर शिवरात्रि-जागरण कराया; अन्नाभाव से अनायास उपवास, स्नान, कमल-अर्पण और जागरण के फल से उसे आगे चलकर राज्य मिला और कारण की स्मृति भी रही। अंत में कहा है कि इस लिंग का पूजन महापापों का नाश करता है और सभी पुरुषार्थ देता है; अनंगवती भी उसी व्रत से अप्सरा बनी।

भीमेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् / Chapter 40: The Māhātmya (Sacred Account) of Bhīmeśvara
यह अध्याय शिव–देवी संवाद के रूप में भीमेश्वर-लिंग की उत्पत्ति, नामकरण और उसके पुण्य-फल का वर्णन करता है। ईश्वर देवी को प्रभास क्षेत्र में केदारेश्वर के निकट स्थित उस अत्यन्त प्रभावशाली लिंग का निर्देश देते हैं, जिसे पहले श्वेतकेतु ने स्थापित किया था और जिसे भीम ने भी पूजा था। तीर्थ-फल और उत्तम परलोक-गति चाहने वालों के लिए वहाँ विधिपूर्वक पूजन, दुग्धाभिषेक आदि क्रमों का महत्त्व बताया गया है। देवी पूछती हैं कि श्वेतकेतु का लिंग किस कारण प्रसिद्ध हुआ और वह भीमेश्वर नाम से क्यों जाना गया। ईश्वर कहते हैं कि त्रेता-युग में राजर्षि श्वेतकेतु ने प्रभास के पवित्र समुद्र-तट पर अनेक वर्षों तक ऋतु-ऋतु में कठोर तप किया। प्रसन्न होकर शिव ने वर दिए; श्वेतकेतु ने अचल भक्ति और उसी स्थान पर शिव के नित्य निवास की प्रार्थना की, जिसे शिव ने स्वीकार किया, और वह लिंग ‘श्वेतकेत्वीश्वर’ कहलाया। कलि-युग में तीर्थयात्रा के समय भीमसेन अपने भाइयों सहित वहाँ आया और उस लिंग की पूजा की, तब से वह ‘भीमेश/भीमेश्वर’ नाम से विख्यात हुआ। अंत में कहा गया है कि केवल दर्शन और एक बार श्रद्धापूर्वक प्रणाम करने से भी अनेक जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं।

भैरवेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् / The Māhātmya of Bhairaveśvara
अध्याय 41 में ईश्वर पूर्व दिशा में स्थापित एक अत्यन्त शक्तिशाली लिङ्ग का माहात्म्य बताते हैं, जो सरस्वती से सम्बद्ध है और समुद्र के निकट स्थित है। कथा में विनाशकारी “वडवानल” (समुद्र के भीतर की अग्नि) से उत्पन्न संकट आता है। तब देवी लिङ्ग को समुद्र-तट के पास ले जाकर विधिपूर्वक पूजन करती हैं, वडवानल को अपने में धारण कर देवताओं के कल्याण हेतु समुद्र में डाल देती हैं। देवता शंख-नाद, दुन्दुभि-ध्वनि और पुष्प-वर्षा से उत्सव करते हैं तथा देवी को “देवमाता” नाम से सम्मानित करते हैं—क्योंकि यह कार्य देवों और दानवों के लिए भी कठिन माना गया। ईश्वर आगे बताते हैं कि देवी द्वारा इस शुभ लिङ्ग की स्थापना और नदी-श्रेष्ठ, पाप-नाशिनी सरस्वती की प्रशंसा के कारण यह लिङ्ग “भैरव” के नाम से प्रसिद्ध होकर “भैरवेश्वर” कहलाता है। अन्त में विधान है कि सरस्वती और भैरवेश्वर का पूजन—विशेषतः महा-नवमी को उचित स्नान सहित—वाणी-दोष (वाग्दोष) दूर करता है। दूध से अभिषेक करके अघोर मन्त्र से लिङ्ग-पूजन करने पर सम्पूर्ण यात्रा-फल प्राप्त होता है।

चण्डीशमाहात्म्यवर्णनम् (Chandīśa Shrine-Glory and Ritual Protocols)
अध्याय 42 में ईश्वर देवी को प्रभास-क्षेत्र में चण्डीश देव के पास जाने और उनकी पूजा करने की विधि बताते हैं। तीर्थ का स्थान संकेतों से बताया गया है—सोमेश/ईश के दिग्भाग के निकट और दण्डपाणि के निवास से अधिक दूर दक्षिण में नहीं। साथ ही यह भी कहा गया है कि पहले चण्डा तथा कठोर तप करने वाले एक गण ने यहाँ प्रतिष्ठा और पूजा की थी, जिससे प्रसिद्ध चण्डेश्वर-लिंग प्रकट हुआ। इसके बाद क्रमबद्ध पूजन-क्रम आता है—दूध, दही और घी से अभिषेक; मधु, ईख-रस और केसर का लेपन; कर्पूर, उशीरा, कस्तूरी-सार आदि सुगन्धित द्रव्यों तथा चन्दन का अनुलेपन; पुष्प, धूप और अगुरु; सामर्थ्य के अनुसार वस्त्र-समर्पण; दीप सहित नैवेद्य, विशेषतः परमान्न; और द्विजातियों को दान-दक्षिणा। स्थान-विशेष फल भी बताए गए हैं—दक्षिणाभिमुख होकर दिया गया दान चण्डीश के लिए अक्षय होता है; चण्डीश के दक्षिण में किया गया श्राद्ध पितरों को दीर्घकाल तक तृप्त करता है; तथा उत्तरायण में घृत-कम्बल का व्रत/दान कठोर पुनर्जन्म से रक्षा करता है। अंत में शूलिन की तीर्थ-भक्ति को प्रायश्चित्त कहा गया है, जो निर्माल्य-संबंधी अपराध, अनजाने भक्षण और अन्य कर्मजन्य दोषों से जीवों को मुक्त करती है।

आदित्येश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Adityeśvara Māhātmya (Chapter on the Glory of Adityeśvara)
अध्याय 43 में ईश्वर देवी को दिशानुसार तीर्थ-यात्रा का उपदेश देते हैं। वे बताते हैं कि सोमेश के पश्चिम, ‘सात धनुष’ की माप के भीतर, सूर्य-प्रतिष्ठित एक लिंग स्थित है। उसका नाम आदित्येश्वर है और वह सर्व-पातक-नाशक कहा गया है। त्रेतायुग की स्मृति भी आती है—समुद्र ने लंबे समय तक रत्नों से उस लिंग की पूजा की थी—जिससे इस स्थान की प्राचीन महिमा स्थापित होती है। रत्नों से पूजित होने के कारण उसे ‘रत्नेश्वर’ भी कहा गया। विधि यह है कि पहले पंचामृत से स्नान कराकर पाँच रत्नों से पूजन किया जाए, फिर राजोपचारों सहित नियमपूर्वक आराधना हो। फलश्रुति में मेरुदान के समान फल, यज्ञ-दानों का संयुक्त पुण्य, तथा पितृ और मातृ कुल का उद्धार बताया गया है; बाल्य, यौवन, प्रौढ़ और वृद्धावस्था के पाप रत्नेश्वर-दर्शन से धुल जाते हैं। यहाँ धेनुदान की प्रशंसा कर दस पूर्व और दस उत्तर पीढ़ियों के कल्याण-मोक्ष का वचन दिया गया है। सम्यक् लिंग-पूजन के बाद देव के दाहिने शतरुद्रीय का पाठ करने वाला पुनर्जन्म नहीं पाता। अंत में कहा गया है कि श्रद्धापूर्वक सुनना भी कर्म-बन्धन से मुक्ति देने वाला है।

Someshvara-māhātmya-varṇanam (Glorification and Ritual Protocol of Someshvara)
इस अध्याय में ईश्वर क्रमबद्ध पूजा-विधि बताते हैं। आदित्येश का विधिपूर्वक पूजन करके साधक सोमेश्वर के पास जाए और वहाँ पञ्चाङ्ग-भक्ति के साथ विशेष रूप से आराधना करे। साष्टाङ्ग प्रणाम, प्रदक्षिणा और बार-बार दर्शन—इन देहगत श्रद्धा-चिह्नों को अनिवार्य बताया गया है। यहाँ सोमेश्वर-लिङ्ग को सूर्य और चन्द्र तत्त्वों का समन्वय कहा गया है; इसलिए यह पूजा अग्नीषोम-भाव से यज्ञ-भावना को मंदिर-उपासना द्वारा पूर्ण करने वाली मानी गई है। आगे साधक निकटस्थ उमादेवी का पूजन करे और फिर दैत्यसूदन के तीर्थ-स्थान की ओर बढ़े—इस प्रकार प्रभास-क्षेत्र की जुड़ी हुई पवित्र परिक्रमा का संकेत मिलता है। अंत में इसे प्रभासखण्ड के प्रभासक्षेत्रमाहात्म्य में सोमेश्वर-माहात्म्य-वर्णन का 44वाँ अध्याय कहा गया है।

अङ्गारेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् (Aṅgāreśvara Māhātmya: The Glory of the Aṅgāreśvara Shrine)
इस अध्याय में ईश्वर प्रभास-क्षेत्र में स्थित अङ्गारेश्वर की उत्पत्ति और उसकी पूजा की प्रभावशीलता का वर्णन करते हैं। त्रिपुर-दहन का संकल्प करते समय शिव के तीव्र क्रोध से उनके तीन नेत्रों से अश्रु-धारा निकली; वह दिव्य तत्त्व पृथ्वी पर गिरकर भूसुत बना, जिसे भोम/मङ्गल (मंगल ग्रह) कहा गया। बाल्यकाल से ही भोम प्रभास पहुँचा और शंकर की आराधना में दीर्घ तप करता रहा; प्रसन्न होकर शिव ने उसे वर दिया। भोम ने ग्रहत्व (ग्रह का पद) माँगा, जिसे शिव ने स्वीकार किया और साथ ही यह रक्षावचन दिया कि जो भक्त वहाँ श्रद्धा से अङ्गारेश्वर की पूजा करेंगे, वे संकटों से सुरक्षित रहेंगे। अध्याय में लाल पुष्पों से पूजन, मधु-घृत मिश्रित आहुतियों के साथ लक्ष-गणना का होम, तथा पञ्चोपचार-पूजा का विधान बताया गया है। फलश्रुति में कहा है कि इस संक्षिप्त माहात्म्य के श्रवण से पाप नष्ट होते हैं और आरोग्य मिलता है; विद्रुम (मूँगा) आदि दान से इच्छित फल प्राप्त होते हैं, और भोम को ग्रहों के बीच दिव्य विमान में तेजस्वी बताया गया है।

बुधेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Budheśvara Māhātmya (The Glory of Budheśvara Liṅga)
ईश्वर देवी से कहते हैं कि उत्तर दिशा में स्थित अत्यन्त शक्तिशाली ‘बुधेश्वर’ नामक लिङ्ग के दर्शन करो। उसका केवल दर्शन ही समस्त पापों का नाश करने वाला बताया गया है, इसलिए वह परम पावन तीर्थ है। इस क्षेत्र की प्रतिष्ठा बुध (ग्रह) द्वारा मानी गई है। बुध ने सदाशिव की आराधना करते हुए “दस-दस हज़ार वर्षों के चार वर्ष” के समान दीर्घ तप और पूजन किया, और अंत में शिव का साक्षात् दर्शन पाया। प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उसे ग्रहों में स्थान दिया तथा कहा कि विशेषकर सौम्याष्टमी को इस लिङ्ग की विधिवत् पूजा करने से राजसूय यज्ञ के समान फल मिलता है। फलश्रुति में दुर्भाग्य, कुल-कलंक/कुलदोष, इच्छित वस्तु से वियोग और शत्रुओं के भय से रक्षा का आश्वासन है। श्रद्धापूर्वक इस माहात्म्य का श्रवण करने वाला साधक परम पद की ओर अग्रसर होता है।

वृहस्पतीश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of Bṛhaspatīśvara (Guru-associated Liṅga)
इस अध्याय में ईश्वर महादेवी को उपदेश देते हैं कि तीर्थयात्री पूर्व भाग में, उमा-संबद्ध आग्नेय क्षेत्र के अंतर्गत स्थित एक विशेष लिंग का दर्शन करें। यह देवाचार्य द्वारा प्रतिष्ठित महान लिंग है, जो गुरु बृहस्पति से निकट रूप से संबद्ध होने के कारण ‘बृहस्पतीश्वर’ कहलाता है। लंबे समय तक श्रद्धापूर्वक लिंग-भक्ति करने से साधक को दुर्लभ इच्छाएँ भी प्राप्त होती हैं; फिर देवताओं में सम्मान और ईश्वर-ज्ञान की प्राप्ति होती है। केवल बृहस्पति-निर्मित लिंग का दर्शन भी अनिष्ट से रक्षा करता है और विशेषतः बृहस्पति-जन्य पीड़ाओं का शमन बतलाया गया है। पूजा का श्रेष्ठ समय शुक्ल चतुर्दशी का गुरुवार से योग है। विधिपूर्वक राजोपचार सहित या शुद्ध भाव से भी पूजन स्वीकार्य है। बड़े परिमाण में पंचामृत-स्नान करने से मातृ, पितृ और गुरु—इन तीन ऋणों से मुक्ति, शुद्धि, निर्वंद्व मन और अंततः मोक्ष की प्राप्ति कही गई है। अंत में फलश्रुति है कि श्रद्धा से श्रवण करने पर गुरु प्रसन्न होते हैं।

Śukreśvara-māhātmya (Glory of the Liṅga Established by Śukra)
इस अध्याय में प्रभास-क्षेत्र के एक तीर्थ का वर्णन है। ईश्वर देवी से कहते हैं कि पश्चिम दिशा में विभूतीश्वर के निकट शुक्र (भृगुवंशी) द्वारा स्थापित एक शिवलिंग है, जिसके दर्शन और स्पर्श से पापों का नाश होता है और मनुष्य शुद्ध होता है। कथा में शुक्र को रुद्र की कृपा से घोर तप द्वारा संजीवनी-विद्या प्राप्त होने का प्रसंग आता है। दैवी प्रयोजन से शम्भु ने उन्हें निगल लिया; शुक्र ने भगवान के भीतर भी तप जारी रखा, जिससे महादेव प्रसन्न हुए और उन्हें मुक्त किया—इसी से इस लिंग की महिमा और नाम की कारणकथा बताई गई है। आगे उपासना-विधि दी गई है—स्थिर मन से लिंग-पूजन, मृत्युंजय मंत्र का एक लाख जप, पंचामृत अभिषेक तथा सुगंधित पुष्पों से पूजा। फलस्वरूप मृत्यु-भय से रक्षा, पाप-मुक्ति, इच्छित फल की प्राप्ति और ऐश्वर्यादि सिद्धियाँ स्थिर भक्ति से मिलती हैं।

Śanaiścaraiśvara (Saurīśvara) Māhātmya and Daśaratha’s Śani-stotra | शनैश्चरैश्वरमाहात्म्यं तथा दशरथकृतशनीस्तोत्रम्
यह अध्याय ईश्वर–देवी संवाद के रूप में प्रभास-क्षेत्र में स्थित ‘शनैश्चरैश्वर/सौरीश्वर’ नामक महान् लिंग-तीर्थ का माहात्म्य बताता है। इसे ‘महाप्रभ’ शक्ति-केंद्र कहा गया है, जो बड़े पाप, भय और संकट का शमन करता है; साथ ही शनिदेव की उच्च स्थिति को शम्भु-भक्ति से जोड़ा गया है। शनिवार-व्रत की विधि भी दी गई है—शमी-पत्रों सहित तिल, माष, गुड़, ओदन आदि से पूजन तथा योग्य पात्र को काले बैल का दान। कथा-भाग में राजा दशरथ पर आने वाले ज्योतिषीय संकट का वर्णन है—शनि का रोहिणी की ओर गमन ‘शकट-भेद’ दोष उत्पन्न कर सकता है, जिससे अनावृष्टि और दुर्भिक्ष का भय होता है। उपाय असंभव जानकर दशरथ साहस और तप से तारामंडल में जाकर शनि का सामना करते हैं और वर मांगते हैं कि रोहिणी को कष्ट न हो, शकट-भेद न घटे और बारह वर्ष का अकाल न पड़े; शनि ये वर दे देते हैं। अध्याय में दशरथकृत शनि-स्तोत्र सुरक्षित है, जिसमें शनि के भयानक स्वरूप और राज्य देने-हरने की शक्ति का स्तवन है। शनि शर्त सहित आश्वासन देते हैं कि जो भक्तिपूर्वक पूजन कर अंजलि बाँधकर इस स्तोत्र का पाठ करेंगे, वे शनि-पीड़ा तथा अन्य ग्रह-दोषों से भी जन्म-नक्षत्र, लग्न, दशा-अंतर्दशा आदि कालों में सुरक्षित रहेंगे। फलश्रुति के अनुसार शनिवार प्रातः पाठ और स्मरण से ग्रहजन्य दुःख शांत होते हैं और अभीष्ट सिद्ध होता है।

राह्वीश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Rāhvīśvara Māhātmya (The Glory of Rāhu-established Īśvara)
यह पचासवाँ अध्याय प्रभास-खण्ड में देवी से ईश्वर द्वारा एक विशिष्ट तीर्थ का माहात्म्य कहता है। यहाँ राहु (स्वभानु/सैंहिकेय) द्वारा प्रतिष्ठित अत्यन्त प्रभावशाली शिवलिङ्ग का वर्णन है। उसका स्थान वायव्य दिशा में—मंगला के निकट, अजादेवी के उत्तर में, तथा सात ‘धनुष’ चिह्नों के आसपास बताया गया है। उत्पत्ति-कथा में भयंकर असुर स्वभानु सहस्र वर्षों तक कठोर तप करता है और महादेव को प्रसन्न करता है। प्रसन्न होकर महादेव ‘जगद्दीप’ के समान प्रकाशमान रूप में वहाँ प्रकट/प्रतिष्ठित होते हैं। फलश्रुति स्पष्ट है—श्रद्धापूर्वक पूजन और सम्यक् दर्शन से ब्रह्महत्या-सम पाप भी नष्ट हो जाते हैं। अंधत्व, बधिरता, मूकता, रोग और दरिद्रता से मुक्ति, फिर समृद्धि, सौन्दर्य, अभीष्ट-सिद्धि और देवतुल्य भोग की प्राप्ति बताई गई है। अंत में इसे स्कन्दपुराण के प्रभास-खण्ड, प्रभास-क्षेत्र-माहात्म्य का अध्याय कहा गया है।

केत्वीश्वरमाहात्म्यवर्णन (Ketu-linga / Ketvīśvara Māhātmya Description)
इस अध्याय में प्रभास-क्षेत्र के भीतर केतुलिङ्ग (केत्वीश्वर) का स्थल-निर्देश और पूजा-विधान ईश्वर के वचन से बताया गया है। तीर्थ का स्थान राह्वीशान के उत्तर और मङ्गला के दक्षिण, धनुष-प्रहार जितनी दूरी पर बताकर यात्रियों के लिए मार्ग-निर्णय किया गया है। फिर केतु-ग्रह का उग्र स्वरूप, उसके चिह्न, तथा उसके सौ दिव्य वर्षों के तप का वर्णन आता है, जिसके फलस्वरूप शिव की कृपा से उसे अनेक ग्रहों पर अधिपत्य प्राप्त होता है। केतु के अशुभ उदय के समय और तीव्र ग्रह-पीड़ाओं में केतुलिङ्ग की भक्तिपूर्वक आराधना का विधान है—पुष्प, गन्ध, धूप और विविध नैवेद्य उचित विधि से अर्पित करने को कहा गया है। फलश्रुति स्पष्ट है: यह लिङ्ग ग्रह-दोषों को शांत करता और पापों का नाश करता है। आगे इसे नवग्रह-लिङ्गों तथा कुल चौदह आयतनों की व्यापक व्यवस्था में रखकर कहा गया है कि नियमित दर्शन से पीड़ा का भय मिटता है और गृहस्थ का कल्याण होता है।

सिद्धेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् / The Glorification of Siddheśvara
ईश्वर देवी को “पाँच सिद्ध-लिंगों” का माहात्म्य बताते हैं और कहते हैं कि इनके दर्शन से मनुष्य की तीर्थ-यात्रा सफल (यात्रा-सिद्धि) होती है। फिर सिद्धेश्वर का स्थान-निर्देश दिया जाता है—सोमेश के निकट, निर्दिष्ट दिशा-भाग में, तथा एक प्रसिद्ध स्थल-चिह्न के पूर्व खंड में सिद्धेश्वर स्थित है। वहाँ भक्तिपूर्वक अभिगमन और पूजन अत्यन्त फलदायी माना गया है; अणिमा आदि सिद्धियाँ, पापक्षय और सिद्ध-लोक की प्राप्ति का वचन दिया गया है। अध्याय में भीतर के “विघ्न” भी गिनाए गए हैं—काम, क्रोध, भय, लोभ, आसक्ति, ईर्ष्या, दम्भ, आलस्य, निद्रा, मोह और अहंकार—जो सिद्धि में बाधक हैं। सिद्धेश्वर की आराधना से क्षेत्र में रहने वालों और यात्रियों के ये विघ्न शांत होते हैं; इसलिए संयमित तीर्थ-यात्रा और निरंतर अर्चना का उपदेश मिलता है। अंत में इसे श्रवण-मात्र से पाप-नाशक तथा भक्ति द्वारा धर्मार्थकाममोक्ष आदि उचित पुरुषार्थ देने वाला पवित्र प्रसंग कहा गया है।

कपिलेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् (Kapileśvara Māhātmya—Account of the Glory of Kapileśvara)
शिव–देवी संवाद के रूप में इस अध्याय में यात्री को कपिलेश्वर तीर्थ का निर्देश दिया गया है। यात्रा-क्रम में बताए गए स्थान से थोड़ा पूर्व स्थित कपिलेश्वर लिंग को ‘महाप्रभाव’ कहा गया है और बताया गया है कि इसके दर्शन मात्र से पाप का नाश होता है। इस क्षेत्र की पवित्रता का कारण राजर्षि कपिल की तपस्या मानी गई है—उन्होंने वहाँ महादेव की प्रतिष्ठा की और परम सिद्धि प्राप्त की; साथ ही इस लिंग पर निरंतर देव-सान्निध्य रहने की बात कही गई है। फिर व्रत-काल का विधान आता है—शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को नियमपूर्वक भक्त यदि कपिलेश्वर रूप में सोम/सोमेश का सात बार दर्शन करे, लोक-कल्याण की भावना से, तो उसे गोदान के समान फल मिलता है। अंत में दान-विधि बताई गई है—जो व्यक्ति उसी तीर्थ में एकाग्रचित्त होकर ‘तिल-धेनु’ का दान करता है, उसे तिल के दानों की संख्या के बराबर युगों तक स्वर्ग-वास का फल प्राप्त होता है।

गन्धर्वेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of Gandharveśvara (Ghanavāheśvara Liṅga)
ईश्वर देवी को प्रभास-क्षेत्र के एक स्थानीय तीर्थ का माहात्म्य सुनाते हैं। दण्डपाणि के निवास के उत्तर में स्थित ‘उत्तम गन्धर्वेश्वर’ के दर्शन-पूजन का विधान बताया गया है। कथा के केंद्र में गन्धर्वराज घनवाह और उसकी पुत्री गन्धर्वसेना हैं। अपने रूप के गर्व से गन्धर्वसेना शिखण्डि और उसके गणों द्वारा शापित होती है; फिर गोशृंग ऋषि उसे सोम/शिव-भक्ति तथा सोमवार-व्रत (सोमवार-व्रत) से जुड़ा अनुग्रह देकर शाप-शमन का उपाय बताते हैं। घनवाह कठोर तप करके वहाँ एक लिङ्ग की स्थापना करता है और पुत्री भी वहीं लिङ्ग स्थापित करती है; यह पूज्य लिङ्ग ‘घनवाहेश्वर’ कहलाता है। दण्डपाणि के समीप श्रद्धापूर्वक पूजा करने से शुद्ध और संयमी भक्त को गन्धर्व-लोक की प्राप्ति कही गई है। फलश्रुति में इसे ‘तृतीय’ पाप-नाशक, पुण्य-वर्धक शक्ति-स्थान बताया गया है; अग्नि-तीर्थ में स्नान और गन्धर्वों द्वारा वन्दित लिङ्ग की आराधना की प्रशंसा है, तथा उत्तरायण के आगमन पर निर्वाण-प्राप्ति का विशेष उल्लेख है। इस माहात्म्य के श्रवण और सम्मान से महान भय से मुक्ति बताई गई है।

Vimaleśvara-māhātmya (विमलेश्वरमाहात्म्य) — The Glory of Vimaleśvara
ईश्वर देवी को आदेश देते हैं कि गौरी के निकट, नैऋत्य दिशा में अधिक दूर नहीं स्थित विमलेश्वर के पास जाएँ। यह तीर्थ “पाप-प्रणाशन” कहा गया है—स्त्री और पुरुष, यहाँ तक कि शरीर-क्षय से पीड़ित जन भी, इसकी शरण में पापों से मुक्त होकर दुःखों का अंत पाते हैं। यहाँ भक्ति-युक्त पूजा ही मुख्य साधन बताई गई है; उससे कष्ट शांत होते हैं और साधक को निर्मल अवस्था/पद की प्राप्ति होती है। गन्धर्वसेना और विमला से जुड़ी कारण-कथा द्वारा पृथ्वी पर इस लिंग की ‘विमलेश्वर’ नाम से प्रसिद्धि समझाई गई है। अंत में इसे माहात्म्यों की श्रृंखला का चौथा भाग कहकर, इसके सर्वपाप-नाशक प्रभाव पर बल दिया गया है।

धनदेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Dhanadeśvara Māhātmya (Glory of Dhanadeśvara)
ईश्वर प्राभास-क्षेत्र में धनदेश्वर नामक एक प्रसिद्ध सिद्ध-लिंग का वर्णन करते हैं। यह लिंग ब्रह्मा के नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) भाग में, ‘धनुष’ माप की सोलहवीं स्थिति में, राहुलिंग के निकट स्थित बताया गया है। धनद (कुबेर) पूर्व जन्म की स्थितियों को स्मरण कर, शिवरात्रि और प्राभास की महिमा जानकर वहाँ लौटते हैं और उस स्थान की अद्भुत शक्ति को अनुभव करते हैं। वे विधिपूर्वक दीर्घकाल तक कठोर तप करते हुए लिंग की स्थापना कर उसकी पूजा करते हैं। शिव की कृपा से धनद को अलका का अधिपत्य और उच्च पद प्राप्त होता है; तप और भक्ति द्वारा वे वहाँ शंकर की प्रकट उपस्थिति को और भी दृढ़ करते हैं। अध्याय के अंत में भक्ति-मार्ग का फल बताया गया है—पंचोपचार और सुगंधित द्रव्यों से पूजन करने पर वंश में स्थायी समृद्धि, अजेयता, शत्रुओं के गर्व का दमन तथा दरिद्रता का निवारण होता है। जो श्रद्धा से इस माहात्म्य को सुनता और मान देता है, उसके लिए कल्याण स्थिर रहता है।

वरारोहामाहात्म्यवर्णनम् / The Māhātmya of Varārohā (Umā as Icchā-Śakti) at Somēśvara
इस अध्याय में ईश्वर देवी को त्रिशक्ति-तत्त्व का उपदेश देते हैं—इच्छा, क्रिया और ज्ञान। पहले बताए गए पवित्र लिंगों की चर्चा को आगे बढ़ाते हुए कहा गया है कि साधक अपनी सामर्थ्य के अनुसार निर्दिष्ट लिंगों का पूजन करे और फिर इन तीनों शक्तियों की विधिपूर्वक आराधना करे। प्रभास-क्षेत्र के सोमेश्वर-प्रदेश में इच्छा-शक्ति का स्थान “वरारोहा” के रूप में बताया गया है। कथा में चन्द्रदेव सोम द्वारा त्यागी गई छब्बीस पत्नियाँ शुभ प्रभास-भूमि में तप करती हैं; तब गौरी/पार्वती प्रकट होकर उन्हें वर देती हैं और स्त्रियों के दुर्भाग्य-निवारण हेतु एक धर्म-क्रम स्थापित करती हैं। माघ शुक्ल तृतीया को “गौरी-व्रत” का विधान है—दर्शन, पूजन, और “सोलह” प्रकार के दान/नैवेद्य (फल, भोज्य पदार्थ, पक्वान्न आदि) तथा दम्पतियों का सम्मान। फलश्रुति में अशुभ का नाश, समृद्धि, मनोवांछित सिद्धि, तथा वरारोहा (सोमेश्वर) की उपासना से पाप और दरिद्रता के विनाश का प्रतिपादन है।

अजापालेश्वरीमाहात्म्यवर्णनम् | Ajāpāleśvarī Māhātmya (Glorification of Ajāpāleśvarī)
ईश्वर प्रभास-क्षेत्र में स्थित शक्ति के दूसरे स्वरूप का वर्णन करते हैं, जो क्रियात्मिका (कार्य कराने वाली) और देवताओं को प्रिय है। सोमेश और वायु के बीच एक योगिनियों द्वारा पूजित पीठ बताया गया है, जो एक पाताल-विवर के निकट है; वहाँ निधान, दिव्य औषधियाँ और रसायन भक्तों को प्राप्त हो सकते हैं। इस देवी को भैरवी कहा गया है। फिर त्रेता-युग के राजा अजापाल का प्रसंग आता है—वे रोगग्रस्त होकर पाँच सौ वर्षों तक भैरवी की आराधना करते हैं। प्रसन्न होकर देवी उनके समस्त शारीरिक रोग हर लेती हैं; रोग बकरों के रूप में शरीर से निकलते हैं और राजा को उनकी रक्षा का आदेश मिलता है, जिससे वे ‘अजापाल’ कहलाते हैं और देवी चारों युगों तक ‘अजापालेश्वरी’ नाम से प्रतिष्ठित होती हैं। अष्टमी और चतुर्दशी को पूजन से विशेष समृद्धि बताई गई है। आश्वयुज शुक्ल अष्टमी को सोमेश्वर को केंद्र मानकर तीन बार प्रदक्षिणा, फिर स्नान करके देवी का पृथक पूजन करने से तीन वर्षों तक भय और शोक का नाश होता है। स्त्रियों के वंध्यत्व, रोग या दुर्भाग्य में देवी के सामने नवमी-व्रत का विधान है। आगे राजवंश-प्रसंग और रावण-कथा में, जब रावण देवताओं को दबाता है, तब अजापाल ‘ज्वर’ को भेजकर रावण को पीड़ित करते हैं और उसे लौटने को विवश करते हैं। अंत में अजापालेश्वरी की रोग-शमन और विघ्न-विनाश शक्ति की स्तुति करते हुए गंध, धूप, आभूषण और वस्त्र आदि से पूजन को पाप-दुःख हरने वाला कहा गया है।

अजादेवीमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of Ajā Devī (Chapter 59)
इस अध्याय में शिव–देवी का तात्त्विक संवाद तीर्थ-भूगोल और कर्मफल से जुड़ता है। ईश्वर प्रभास में स्थित ‘तृतीय’ ज्ञान-शक्ति का वर्णन करते हैं, जो शिव-समन्वित है और दरिद्रता का नाश करती है। देवी शिव के मुख-तत्त्व के विषय में पूछती हैं—छठे मुख का नाम क्या है और उससे अजादेवी कैसे प्रकट होती हैं। ईश्वर गूढ़ रहस्य बताते हैं—पूर्वकाल में सात मुख थे; उनमें ‘अजा’ मुख ब्रह्मा से और ‘पिचु’ मुख विष्णु से संबद्ध है, इसलिए वर्तमान व्यवस्था में शिव पंचवक्त्र कहे जाते हैं। अजा-मुख से अंधासुर के साथ भयंकर युद्ध में अजादेवी प्रकट होती हैं—खड्ग-ढाल धारण किए, सिंह पर आरूढ़, अनेक दिव्य शक्तियों से घिरी हुई। भागते दैत्य दक्षिण समुद्र की ओर प्रभास क्षेत्र में पहुँचकर नष्ट होते हैं; तब देवी क्षेत्र की पवित्रता जानकर सोमेश के निकट, सौरिश के संदर्भ से निर्दिष्ट दिशा में वहीं प्रतिष्ठित हो जाती हैं। फलश्रुति में कहा है—दर्शन से सात जन्मों तक शुभ गुणों की प्राप्ति; गीत-नृत्य करने से वंश में दुर्भाग्य का नाश; लाल बत्ती वाली घृत-दीप-भेंट से दीप की सूत-गिनती के अनुसार दीर्घकालिक मंगल; और पाठ/श्रवण, विशेषतः तृतीया तिथि को, इच्छित सिद्धि देता है। अंत में बताया गया है कि इन शक्तियों की पूजा करके ही सोमेश की आराधना करने वाले को तीर्थयात्रा का पूर्ण फल मिलता है।

मङ्गलामाहात्म्यवर्णनम् (Mangalā Devī Māhātmya: Account of the Glory of Mangalā)
इस अध्याय में देवी और ईश्वर के बीच प्रश्नोत्तर रूप में धर्म-तत्त्व का निरूपण है। ईश्वर पहले प्रभास-क्षेत्र की यात्रा का फल देने वाली तीन “दूतियाँ” बतलाते हैं—मंगला, विशालाक्षी और चत्वर-देवी। देवी उनके स्थान और पूजन-विधि का स्पष्ट विवरण पूछती हैं। ईश्वर उनके स्वरूप को शक्ति-रूप मानकर बताते हैं—मंगला ब्राह्मी, विशालाक्षी वैष्णवी और चत्वर-देवी रौद्री-शक्ति हैं। मंगला का स्थान अजादेवी के उत्तर में और राह्वीश के अधिक दूर नहीं, दक्षिण में कहा गया है। सोमदेव द्वारा सोमेश्वर में किए गए अनुष्ठान के प्रसंग से मंगला के नाम की व्युत्पत्ति कही गई है—उन्होंने ब्रह्मा आदि देवों को मंगल प्रदान किया, इसलिए वे “सर्व-मांगल्य-दायिनी” हैं। तृतीया-पूजन से अमंगल और शोक का नाश होता है—यह फल-श्रुति दी गई है। साथ ही दम्पती-भोजन, वस्त्र सहित फल-दान, तथा पृषद के साथ घृत-सेवन जैसे पुण्यकर्मों को शुद्धि और पुण्यवृद्धि हेतु प्रशंसित किया गया है। अंत में मंगला-माहात्म्य को सर्व-पाप-नाशक कहा गया है।

ललितोमाविशालाक्षी-माहात्म्यवर्णनम् (Lalitā-Umā and Viśālākṣī: Account of the Sacred Greatness)
ईश्वर प्रभास-क्षेत्र के पूर्व भाग में श्रीदैत्यसूदन के निकट स्थित एक देवी का वर्णन करते हैं, जो वैष्णवी-स्वभाव वाली क्षेत्र-दूती (क्षेत्र की रक्षिका) हैं। विष्णु से पीड़ित बलवान दैत्य दक्षिण दिशा की ओर बढ़कर अनेक दिव्य अस्त्र-शस्त्रों से दीर्घ युद्ध करते हैं। उन्हें वश में करना कठिन देखकर विष्णु महामाया, तेजस्विनी भैरवी-शक्ति का आवाहन करते हैं और वह तुरंत प्रकट होती हैं। विष्णु को देखते ही देवी के नेत्र दिव्य रूप से फैल जाते हैं; इसी कारण उनका नाम ‘विशालाक्षी’ प्रसिद्ध होता है और वे वहीं शत्रु-नाशिनी रूप में प्रतिष्ठित होती हैं। आगे सोमेश्वर और दैत्यसूदन के संदर्भ में ‘उमा-द्वय’ की युगल-उपासना तथा तीर्थ-क्रम बताया गया है—पहले सोमेश्वर, फिर श्रीदैत्यसूदन का दर्शन। माघ शुक्ल/कृष्ण तृतीया को विशेष पूजन का विधान है। इसके फल में वंश-परंपरा में संतान-हीनता का नाश, आरोग्य, सुख और नित्य उपासक के लिए स्थिर मंगल-समृद्धि कही गई है। अंत में फलश्रुति है कि इस माहात्म्य के श्रवण से पाप क्षय होता है और धर्म की वृद्धि होती है।

चत्वरादेवी-माहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of Catvarā Devī (the Crossroads Goddess)
अध्याय 62 में ईश्वर ललिता के संदर्भ में पूर्व दिशा की ओर स्थित एक तीसरे पवित्र ‘चत्वर’ का वर्णन करते हैं, जो निश्चित दूरी (दश-धन्वन्तर) पर बताया गया है। इस स्थान की रक्षा के लिए ईश्वर द्वारा प्रतिष्ठित एक अत्यन्त शक्तिशाली देवी का परिचय मिलता है, जिन्हें क्षेत्र-दूती, महारौद्री और रुद्रशक्ति कहा गया है। देवी भूतगणों के साथ जीर्ण-गृहों, उद्यानों, प्रासादों, अट्टालिकाओं, मार्गों तथा सभी चौराहों में विचरती हैं और रात्रि में क्षेत्र के मध्य भाग की पहरेदारी करती हैं। महानवमी के दिन स्त्री या पुरुष को विधिपूर्वक विविध उपहारों से उनकी पूजा करने का विधान है। इस माहात्म्य को पापनाशक और समृद्धिदायक कहा गया है; प्रसन्न होने पर देवी इच्छित फल देती हैं। यात्रा-फल चाहने वालों के लिए उस स्थान पर दम्पति को भोजन कराना भी बताया गया है।

भैरवेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of Bhairaveśvara (Chapter 63)
इस अध्याय में ईश्वर देवी को उपदेश देते हैं कि योगेश्वरी के दक्षिण में अधिक दूर नहीं स्थित भैरवेश्वर के पवित्र स्थान पर जाओ। वहाँ का लिंग सर्व पापों का नाश करने वाला और दिव्य ऐश्वर्य प्रदान करने वाला बताया गया है। ग्रंथ पूर्वकथा से इस तीर्थ की महिमा स्थापित करता है—जब देवी ने दैत्यों के विनाश हेतु कार्य आरम्भ किया, तब उन्होंने भैरव को बुलाकर अपना दूत नियुक्त किया। इसी कारण देवी ‘शिवदूती’ और आगे चलकर ‘योगेश्वरी’ नाम से प्रसिद्ध हुईं, जिससे देवी-नाम और स्थानीय भूगोल का संबंध भी प्रकट होता है। जहाँ भैरव दूत-सेवा में नियुक्त हुए, वहीं यह लिंग ‘भैरवेश्वर’ के नाम से विख्यात हुआ; इसे भैरव ने स्थापित किया और देवों तथा दैत्यों—दोनों ने इसकी पूजा की। फलश्रुति में कहा है कि जो भक्त कार्तिक मास में विधिपूर्वक श्रद्धा से इसकी आराधना करे, या छह महीने तक निरंतर पूजन करे, उसे मनोवांछित फल प्राप्त होता है।

लक्ष्मीश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Lakṣmīśvara Māhātmya (Account of the Glory of Lakṣmīśvara)
इस अध्याय में ईश्वर प्रभास-क्षेत्र की पूर्व दिशा में, पाँच धनु की दूरी पर स्थित एक विशेष तीर्थ का वर्णन करते हैं। उस स्थान का नाम ‘लक्ष्मीश्वर’ है, जो दरिद्रता और अमंगल का नाश करने वाला कहा गया है। कथा के अनुसार दैत्यों के वध के बाद देवी लक्ष्मी को वहाँ लाया गया और देवी ने स्वयं प्रतिष्ठा करके उस देवता का नाम ‘लक्ष्मीश्वर’ स्थापित किया। फिर श्रीपंचमी के दिन विधिपूर्वक भक्ति से लक्ष्मीश्वर की पूजा करने का विधान बताया गया है। फलश्रुति में कहा गया है कि उपासक पर लक्ष्मी की कृपा निरंतर बनी रहती है—वह लक्ष्मी से वियुक्त नहीं होता और मन्वंतर-पर्यंत दीर्घ काल तक समृद्धि-सौभाग्य प्राप्त करता है। यह स्कंदमहापुराण के प्रभासखण्ड, प्रभासक्षेत्रमाहात्म्य का चौंसठवाँ अध्याय है।

वाडवेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Vāḍaveśvara Liṅga — Description of its Māhātmya
इस अध्याय में ईश्वर देवी से कहते हैं कि प्राभास-क्षेत्र में वाडवेश्वर-लिंग के दर्शन हेतु यात्री को जाना चाहिए। उसका स्थान पवित्र-भूगोल के संकेत से बताया गया है—लक्ष्मीश के उत्तर में और विशालाक्षी के दक्षिण में—जिससे तीर्थयात्री मार्ग को स्पष्ट जान सके। फिर उत्पत्ति-कथा आती है: काम (कृतस्मर) के दग्ध होने पर वाडवा-अग्नि से एक पर्वत समतल हो गया; उसी प्रसंग में वाडव ने वहाँ लिंग की प्रतिष्ठा की, इसलिए यह स्थान महान् शक्ति वाला माना गया। साधक को विधिपूर्वक पूजन करना चाहिए और शंकर का दशविध स्नान/अभिषेक करना चाहिए। वहीं वेदपाठी ब्राह्मण को दही का दान करने से अग्निलोक की प्राप्ति तथा तीर्थयात्रा का पूर्ण फल मिलता है।

अर्घ्येश्वरमाहात्म्यवर्णनम् (Arghyeśvara Māhātmya—Account of the Glory of Arghyeśvara)
ईश्वर प्रभास-क्षेत्र में विशालाक्षी के उत्तर दिशा में निकट स्थित एक अत्यन्त प्रभावशाली लिङ्ग ‘अर्घ्येश्वर’ का वर्णन करते हैं। यह लिङ्ग देवों और गन्धर्वों द्वारा पूजित तथा शीघ्र फल देने वाला कहा गया है। कथा में वाडवानल (समुद्राग्नि) धारण करने वाली देवी का आगमन आता है। प्रभास पहुँचकर महोदधि को देखकर वह विधि के अनुसार पहले समुद्र को अर्घ्य अर्पित करती है, फिर एक महान् लिङ्ग की प्रतिष्ठा करके यथाविधि पूजन करती है और स्नान हेतु समुद्र में प्रवेश करती है। नाम-व्युत्पत्ति भी बताई गई है—पहले अर्घ्य दिया गया और फिर भगवान् की स्थापना हुई, इसलिए यह लिङ्ग ‘अर्घ्येश/अर्घ्येश्वर’ कहलाया; इसे पाप-प्रणाशक कहा गया है। जो भक्त पञ्चामृत से लिङ्ग का अभिषेक कर नियमपूर्वक पूजा करता है, वह सात जन्मों तक विद्या प्राप्त करता है, शास्त्र का योग्य आचार्य बनता है और संशयों का समाधान करने वाला ज्ञानी होता है। यह प्रभासखण्ड के इस प्रसंग का 66वाँ अध्याय है।

कामेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Kāmeśvara Liṅga Māhātmya (Description of the Glory of Kāmeśvara)
इस अध्याय में शिव देवी को उपदेश देते हैं कि प्रभास-क्षेत्र में ‘कामेश्वर’ नामक एक विशिष्ट महालिङ्ग स्थित है। यह दैत्यसूदन के पश्चिम में, सात धनुष-प्रमाण के भीतर बताया गया है और कहा गया है कि इसकी पूर्वकाल में कामदेव ने पूजा की थी; अतः तीर्थयात्री को वहाँ जाने का निर्देश दिया जाता है। कथा में स्मरण कराया गया है कि शिव के तृतीय नेत्र की अग्नि से कामदेव भस्म हो गए थे। तत्पश्चात् वे ‘अनंग’ (देह-रहित) अवस्था की स्मृति रखते हुए, सहस्र वर्षों तक महेश्वर की आराधना करते हैं और पुनः कामना-सृष्टि की सामर्थ्य प्राप्त करते हैं। अंत में लिङ्ग का फल-प्रशंसात्मक परिचय दिया गया है—यह पृथ्वी पर प्रसिद्ध, समस्त पापों का नाश करने वाला और सभी अभीष्ट फल देने वाला है। माधव (वैशाख) मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को विधिपूर्वक कामेश्वर-पूजन का विधान है; इससे सर्वकाम-सिद्धि, समृद्धि तथा स्त्रियों के लिए सौभाग्य/आकर्षण की वृद्धि जैसे फल पुराण-भाषा में कहे गए हैं।

गौरीतपोवनमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of Gaurī’s Forest of Austerity
अध्याय 68 शिव–देवी संवाद के रूप में है। ईश्वर प्रभास में सोमेश के पूर्व दिशा में स्थित एक अत्यन्त शक्तिशाली तपोवन का वर्णन करते हैं। देवी पूर्वजन्म में श्यामवर्णा थीं और गुप्त रूप से “काली” कही जाती थीं; वे व्रत-तर्क से तप करके “गौरी” बनने का संकल्प लेती हैं। प्रभास आकर वे एक लिंग की स्थापना कर पूजन करती हैं, जो “गौरीश्वर” नाम से प्रसिद्ध होता है। एक पाँव पर खड़े रहना, ग्रीष्म में पंचाग्नि, वर्षा में भीगना और शीत में जल-शयन जैसे कठोर तप से उनका शरीर गौरवर्ण हो जाता है—यह रूपान्तरण अनुशासित भक्ति का फल बताया गया है। इसके बाद शिव वर प्रदान करते हैं और देवी फलश्रुति कहती हैं: वहाँ दर्शन से शुभ संतान, दाम्पत्य-सौभाग्य और वंश-वृद्धि होती है; संगीत-नृत्य अर्पित करने से दुर्भाग्य दूर होता है; पहले लिंग की पूजा और फिर देवी-पूजन करने से परम सिद्धि/गति मिलती है। ब्राह्मणों को दान, निःसंतानता के लिए नारियल-दान, दीर्घ सौभाग्य हेतु लाल बत्ती के साथ घी का दीपदान बताया गया है। पास के तीर्थ में स्नान पापहर है, श्राद्ध से पितरों का कल्याण होता है, और रात्रि-जागरण भजन-कीर्तन/नृत्य सहित करने की विधि कही गई है। अंत में ऋतु-परिवर्तन में भी देवी की नित्य उपस्थिति और विशेषतः तृतीया तिथि तथा देवी-सन्निधि में इस अध्याय के पाठ-श्रवण की चिरस्थायी मंगलदायिनी महिमा का प्रतिपादन है।

गौरीश्वरमाहात्म्यवर्णनम् (The Glory of Gaurīśvara Liṅga)
इस अध्याय में देवी और ईश्वर का धर्मसंवाद है, जिसमें ‘गौरीश्वर’ लिंग की स्थिति और उसके पूजन-फल का वर्णन पापनाशक माहात्म्य के रूप में किया गया है। देवी पूछती हैं कि प्रसिद्ध गौरीश्वर लिंग कहाँ स्थित है और उसकी आराधना से कौन-सा फल मिलता है। ईश्वर एक प्रसिद्ध तपोवन का वर्णन करते हैं, जो गौरी से संबद्ध है और धनुष-प्रमाण में परिधि/वृत्ताकार पवित्र क्षेत्र के रूप में बताया गया है। उसी पावन वन में देवी को एकपाद तपस्या करते हुए कहा गया है, और लिंग का स्थान दिशा-निर्देश सहित—कुछ उत्तर की ओर, ईशान कोण में, तथा दूरी के संकेतों के साथ—निश्चित किया गया है। इसके बाद पूजा की प्रभावशीलता बताई जाती है—भक्ति से गौरीश्वर लिंग का पूजन, विशेषकर कृष्णाष्टमी के दिन, पापों से मुक्त करता है। दान-धर्म को भी साधना का अंग कहा गया है: गोदान, योग्य ब्राह्मण को सुवर्णदान, और विशेष रूप से अन्नदान, जिससे दोष-शमन होता है। फलश्रुति का निष्कर्ष अत्यंत प्रायश्चित्तकारी है—भारी पापी भी इस लिंग के दर्शन मात्र से पाप से छूट जाते हैं।

वरुणेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् (Varuṇeśvara Māhātmya—Account of the Glory of Varuṇeśvara)
इस अध्याय में दिव्य संवाद के रूप में ईश्वर देवी को निर्देश देते हैं कि आग्नेय दिशा में गौरी के तपोवन में स्थित, बीस धनुष की दूरी पर प्रतिष्ठित परम पावन वरुणेश्वर-लिंग के दर्शन करें। इसके उद्भव का कारण भी बताया गया है—पूर्वकाल में कुम्भज (अगस्त्य) ने समुद्र का जल पी लिया, तब जलाधिपति वरुण क्रोध और ताप से व्याकुल हुए। उन्होंने प्राभास-क्षेत्र को कठोर तपस्या के योग्य जानकर घोर तप किया, महालिंग की स्थापना की और युत वर्षों तक भक्तिपूर्वक उसकी आराधना की। शिव प्रसन्न होकर अपने गंगाजल से रिक्त समुद्र को फिर पूर्ण करते हैं और वरुण को वरदान देते हैं; तब से समुद्र सदा परिपूर्ण रहते हैं और वह लिंग ‘वरुणेश्वर’ नाम से प्रसिद्ध होता है। आगे फलश्रुति और विधि कही गई है—वरुणेश्वर के मात्र दर्शन से समस्त तीर्थों का फल मिलता है; अष्टमी और चतुर्दशी को दही से लिंगाभिषेक करने से वैदिक तेज और विद्या की वृद्धि होती है। वहाँ स्नान, जप, बलि, होम, पूजा, स्तोत्र और नृत्य आदि अक्षय फल देने वाले बताए गए हैं; विविध जनों और अवस्थाओं के लिए भी यह स्थान कल्याणकारी है। तीर्थफल और स्वर्ग की कामना रखने वालों को सुवर्ण-पद्म, मोती आदि का दान करने की प्रशंसा की गई है।

उषेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of Uṣeśvara Liṅga
इस अध्याय में प्रभास-क्षेत्र के भीतर स्थित एक पवित्र लिंग का वर्णन है। यह वरुणेश्वर के दक्षिण में, तीन धनुष की दूरी पर स्थित बताया गया है। वरुण की पत्नी उषा अपने पति से जुड़े दुःख से व्याकुल होकर महाघोर तप करती हैं और वहीं लिंग की स्थापना करती हैं; उसी का नाम ‘उषेश्वर’ कहा गया है। उषेश्वर-लिंग को सर्वसिद्धि देने वाला और सर्वसिद्धियों से पूजित बताया गया है। श्रद्धा से इसकी पूजा करने पर पापों का नाश होता है और भारी पाप-भार से दबे हुए व्यक्ति भी परम गति को प्राप्त कर सकते हैं—ऐसी फलश्रुति कही गई है। विशेष रूप से स्त्रियों के लिए यह सौभाग्य देने वाला तथा दुःख और दुर्भाग्य का नाश करने वाला माना गया है।

Jalavāsa Gaṇapati Māhātmya (The Glory of Gaṇeśa ‘Dwelling in Water’)
इस अध्याय में ईश्वर संक्षेप में एक धर्म-युक्त अनुष्ठान-उपदेश देते हैं। उसी तीर्थ में ‘जलवास’ नाम से प्रसिद्ध विघ्नेश का दर्शन करने का निर्देश है; यह दर्शन विघ्नों का नाश करता है और समस्त कार्यों की सिद्धि देता है। उत्पत्ति-कारण बताया गया है कि वरुण ने तपस्या निर्विघ्न हो, इस हेतु जल से उत्पन्न अर्पणों द्वारा भक्तिपूर्वक गणपति की पूजा की। चतुर्थी के दिन तर्पण करके गंध, पुष्प और मोदक से पूजन करने का विधान है; यथाभक्ति और यथाशक्ति के अनुसार अर्पण करने से गणाधिप प्रसन्न होते हैं—यही इस अध्याय का संदेश है।

कुमारेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Kumāreśvara Māhātmya (Account of the Glory of Kumāreśvara)
इस अध्याय में शिव–देवी का तत्त्वमय संवाद प्रभास-क्षेत्र की एक सूक्ष्म तीर्थ-यात्रा के रूप में प्रस्तुत है। ईश्वर देवी को कुमारेश्वर के परम-प्रभावशाली लिंग के दर्शन-पूजन का निर्देश देते हैं, जो महापातकों का नाश करने वाला कहा गया है। वरुण और नैऋत दिशाओं तथा गौरी-तपोवन जैसे संकेतों से मंदिर का स्थान बताकर पवित्र भू-मानचित्र को स्पष्ट किया गया है। कथा में बताया गया है कि महान तप के बाद षण्मुख (कुमार/स्कन्द) ने इस लिंग की स्थापना की, जिससे इसके नाम और महिमा का आधार समझाया जाता है। फिर फल-तुलना दी गई है—अन्यत्र महीनों की उपासना का जो पुण्य है, वह यहाँ विधिपूर्वक एक दिन के पूजन से प्राप्त होता है। काम, क्रोध, लोभ, राग और मत्सर का त्याग तथा एक बार के पूजन में भी ब्रह्मचर्य/संयम का पालन आवश्यक बताया गया है। अंत में कहा गया है कि सही विधि से किया गया पूजन ही यात्रा का यथार्थ फल देता है।

Śākalyeśvara-liṅga Māhātmya (शाकल्येश्वरलिङ्गमाहात्म्य) — The Glory of Śākalyeśvara and Its Four Yuga-Names
ईश्वर महादेवी को प्राभास-क्षेत्र में स्थित परम पवित्र शाकल्येश्वर-तीर्थ की ओर जाने का निर्देश देते हैं, दिशा और दूरी का संकेत भी बताते हैं। यह लिङ्ग “सर्वकामद” कहा गया है। राजर्षि शाकल्य ने महान तप करके महादेव को प्रसन्न किया, और प्रसन्न भगवान वहाँ लिङ्ग-रूप में प्रकट/प्रतिष्ठित हुए। फलश्रुति में कहा है कि केवल दर्शन से सात जन्मों के पाप ऐसे नष्ट होते हैं जैसे सूर्योदय पर अंधकार मिट जाता है। अष्टमी और चतुर्दशी को दूध से शिवाभिषेक, तथा गन्ध, पुष्प आदि क्रमिक उपचरों से पूजन का विधान है; पूर्ण तीर्थ-फल चाहने वालों के लिए सुवर्ण-दान की भी अनुशंसा है। चार युगों में इसके चार नाम बताए गए हैं—कृत में भैरवेश्वर, त्रेता में सावर्णिकेश्वर (सावर्णि मनु से सम्बद्ध), द्वापर में गालवेश्वर (ऋषि गालव से सम्बद्ध), और कलि में शाकल्येश्वर (मुनि शाकल्य को अणिमा आदि सिद्धियाँ प्राप्त हुईं)। क्षेत्र की पवित्र सीमा अठारह धनुष तक कही गई है; उसके भीतर छोटे जीव भी मोक्ष के अधिकारी माने गए हैं। वहाँ के जल सरस्वती-सदृश पवित्र हैं, और दर्शन को महायज्ञों के फल के समान बताया गया है। सोम-पर्व पर लिङ्ग के समीप एक मास तक अघोर-जप और घृत-होम करने से, भारी पापों से दबे जनों को भी “उत्तम सिद्धि” मिलने का वचन है। लिङ्ग को “कामिक” कहा गया है; अघोर उसका मुख है और भैरव-तत्त्व की प्रधानता के कारण पूर्व में भैरवेश्वर नाम प्रसिद्ध था, और कलियुग में शाकल्येश्वर नाम प्रचलित है।

कलकलेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of Kalakaleśvara (Origin, Worship, and Merits)
इस अध्याय में प्रभास-क्षेत्र स्थित शाकलकलेश्वर/कलकलेश्वर लिंग का माहात्म्य शिव द्वारा देवी को बताया गया है। उसके स्थान-निर्देश, पाप-नाशक प्रभाव और युगानुसार नाम-चतुष्टय दिया गया है—कृतयुग में कामेश्वर, त्रेता में पुलहेश्वर, द्वापर में सिद्धिनाथ और कलियुग में नारदेश; साथ ही ‘कलकल’ ध्वनि से ‘कलकलेश्वर’ नाम की व्युत्पत्ति भी कही गई है। पहली नामकथा में सरस्वती के समुद्र में पहुँचने पर देवताओं के हर्ष से उठी ‘कलकल’ ध्वनि को कारण बताया गया है। दूसरी कथा में नारद का कठोर तप, लिंग के पास पौण्डरीक यज्ञ और अनेक ऋषियों का आवाहन आता है; दक्षिणा के लिए आए स्थानीय ब्राह्मणों के बीच नारद द्वारा धन फेंकने से झगड़ा मचता है, और निर्धन विद्वान ब्राह्मण उस लोभ-कलह की निंदा करते हैं—इसी कलह/कोलाहल से ‘कलकलेश्वर’ नाम प्रसिद्ध होता है। फलश्रुति में कहा है कि लिंग का स्नान कराकर तीन प्रदक्षिणा करने से रुद्रलोक मिलता है; तथा गंध-पुष्प से पूजा और योग्य पात्रों को सुवर्णदान करने से परम पद की प्राप्ति होती है।

Lakuleśvara-nāma Liṅgadvaya Māhātmya (near Kalakaleśvara) — Glory of the Twin Liṅgas established by Lakulīśa
अध्याय 76 ईश्वर के उपदेश के रूप में संक्षेप में एक पुण्यदायक तीर्थ-विधान बताता है। देवदेव के निकट, सोमेश्वर-क्षेत्र की पवित्र परिधि में स्थित दो अत्यन्त पुण्यप्रद लिंगों का वर्णन है, जिन्हें लाकुलीश ने प्रतिष्ठित किया था। इस युग्म-धाम का नाम ‘लाकुलेश्वर’ कहा गया है और इसे दर्शन के लिए ‘अनुत्तम’ माना गया है। ग्रंथ कहता है कि केवल दर्शन मात्र से भी जन्म-मरण की सीमा तक फैले पापों का क्षय हो जाता है। भाद्रपद मास की शुक्ल चतुर्दशी को उपवास और रात्रि-जागरण का विशेष व्रत बताया गया है। विधि यह है—पहले मूर्तिमान लाकुलीश की पूजा करें, फिर दोनों लिंगों की अलग-अलग विधिपूर्वक आराधना करें और क्रम से स्तुति-मंत्रों का पाठ करें। इसका फल महेश्वर के परम धाम की प्राप्ति बताया गया है।

उत्तंकेश्वरमाहात्म्य वर्णनम् | The Māhātmya of Uttankeśvara (Description of Uttankeśvara’s Sanctity)
ईश्वर महादेवी से कहते हैं कि प्रभास-क्षेत्र में पूर्वोक्त स्थान के दक्षिण दिशा में, अधिक दूर नहीं, उत्तंकेश्वर नाम का अत्यन्त श्रेष्ठ पुण्य-तीर्थ है। वे उसी ओर यात्रा करने का निर्देश देते हैं, ताकि तीर्थ-यात्रा का क्रम और मार्ग स्पष्ट हो। यह शिव-स्थल महात्मा भक्त उत्तंक द्वारा स्वयं अपनी भक्ति से स्थापित किया गया बताया गया है। जो यात्री सुसमाहित होकर वहाँ दर्शन करे, स्पर्श करे और विधिपूर्वक भक्ति से पूजन करे, वह समस्त पापों/कल्मषों से मुक्त हो जाता है—यही फलश्रुति है। यह स्कन्दमहापुराण के प्रभास-खण्ड का उत्तंकेश्वर-माहात्म्य विषयक 77वाँ अध्याय है।

वैश्वानरेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् (Glory of Vaiśvānareśvara)
ईश्वर महादेवी से कहते हैं कि आग्नेय दिशा में, ‘पाँच धनुष’ के भीतर स्थित वैश्वानरेश्वर देव के पास जाओ। यह देव दर्शन और स्पर्श—दोनों से पाप-नाशक और मल-हर माना गया है। फिर एक शिक्षाप्रद कथा आती है—एक बार एक शुक ने राजमहल में घोंसला बनाया और अपनी संगिनी के साथ बहुत समय तक वहीं रहा। वे भक्ति से नहीं, बल्कि घोंसले के मोह से नियमित प्रदक्षिणा करते रहे; अंत में दोनों की मृत्यु हो गई। उस स्थान के प्रभाव से वे जातिस्मर होकर पुनर्जन्म में लोपा-मुद्रा और अगस्त्य के रूप में प्रसिद्ध हुए। पूर्वजन्म स्मरण कर अगस्त्य एक गाथा कहते हैं—जो विधिपूर्वक प्रदक्षिणा करके वह्नीश (अग्नि-स्वामी) का दर्शन करता है, वह यश पाता है, जैसे मैंने पहले पाया। अंत में विधान है—घृत-स्नान से देव का अभिषेक करो, नियम से पूजा करो और श्रद्धा से योग्य ब्राह्मण को सुवर्ण दान दो। इससे तीर्थयात्रा का पूर्ण फल मिलता है; भक्त वह्नि-लोक को जाकर अक्षय काल तक आनंद करता है।

लकुलीश्वरमाहात्म्य (The Māhātmya of Lakulīśvara)
इस अध्याय में ईश्वर प्रभास-क्षेत्र के भीतर पूज्य लाकुलीश/लाकुलीश्वर की महिमा बताते हैं। देवता का स्थान पश्चिम दिशा में, ‘धनुषों के सप्तक’ जितनी दूरी पर कहा गया है। उनका स्वरूप शांत, कल्याणकारी और समस्त प्राणियों के लिए पाप-नाशक बताया गया है, तथा इस महान पुण्य-क्षेत्र में उनके प्राकट्य का संकेत दिया गया है। फिर लाकुलीश का तपस्वी और आचार्य-रूप वर्णित होता है—वे घोर तप करते हैं, शिष्यों को दीक्षा देते हैं और बार-बार अनेक शास्त्रों, विशेषतः न्याय और वैशेषिक, का उपदेश करके परम सिद्धि को प्राप्त होते हैं। अंत में भक्तों के लिए विधिपूर्वक पूजा का विधान है; कार्त्तिक मास और उत्तरायण में इसकी विशेष प्रभावशीलता कही गई है। योग्य ब्राह्मण को विद्या-दान/विद्या-प्रदान करने की भी अनुशंसा है। फलश्रुति में समृद्ध ब्राह्मण कुलों में बार-बार शुभ जन्म, बुद्धि और ऐश्वर्य की प्राप्ति बताई गई है।

Gautameśvara-māhātmya (गौतमेश्वरमाहात्म्य) — The Glory of the Gautameśvara Liṅga
इस अध्याय में ईश्वर देवी को गौतमेश्वर-लिंग का माहात्म्य संक्षेप में बताते हैं। पूर्व दिशा में स्थित यह पापनाशक लिंग दैत्यसूदन से जुड़े पश्चिमी चिह्न के संदर्भ से पहचाना जाता है; ‘पाँच धनुष’ के भीतर इसका स्थान बताया गया है। इसे सर्वकामद, अर्थात् सभी अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाला तीर्थ कहा गया है। कथा में कारण बताया गया है कि मद्रराज शल्य ने घोर तप करके महेश्वर को प्रसन्न किया और इसी से इस क्षेत्र में पूजन-परंपरा प्रतिष्ठित हुई। जो अन्य भक्त भी इसी प्रकार विधिपूर्वक आराधना करते हैं, वे परम सिद्धि प्राप्त करते हैं—यह सामान्य प्रतिज्ञा कही गई है। विधान यह है कि चैत्र शुक्ल चतुर्दशी को लिंग का दूध से स्नापन कर, फिर सुगंधित जल और उत्तम पुष्पों से नियमबद्ध भक्ति सहित पूजन किया जाए; इससे अश्वमेध-यज्ञ के समान पुण्य मिलता है। अंत में कहा गया है कि वाणी, मन और कर्म से किए गए पाप केवल इस लिंग के दर्शन मात्र से नष्ट हो जाते हैं।

श्रीदैत्यसूदनमाहात्म्यवर्णनम् (Glorification of Śrī Daityasūdana)
इस अध्याय में ईश्वर देवी से प्रभास-क्षेत्र की विशेष पवित्रता का वर्णन करते हैं। यह वैष्णव ‘यवाकार’ (जौ के आकार) का क्षेत्र है, जिसकी दिशागत सीमाएँ स्पष्ट बताई गई हैं। कहा गया है कि यहाँ किया गया कर्म—क्षेत्र में देहत्याग, दान, हवन, मंत्र-जप, तप, ब्राह्मण-भोजन—सात कल्पों तक अक्षय पुण्य देने वाला है। फिर साधना-रूप विधियाँ बताई जाती हैं: भक्ति सहित उपवास, चक्रतीर्थ में स्नान, कार्तिक द्वादशी को सुवर्ण-दान, दीप-दान, पंचामृत-अभिषेक, एकादशी की रात्रि में जागरण तथा भक्ति-गीत-नृत्यादि, और चातुर्मास्य-व्रत का पालन। इसके बाद कथा में देवताओं द्वारा स्तुत विष्णु दानवों के विनाश का वचन देकर प्रभास में उनका पीछा करते हैं और चक्र से उनका संहार कर ‘दैत्यसूदन’ नाम को स्थापित करते हैं। अंत में प्रभास में भगवान के दर्शन-पूजन से पाप-नाश और मंगलमय जीवन-फल की फलश्रुति कही गई है।

चक्रतीर्थोत्पत्तिवृत्तान्तमाहात्म्यवर्णनम् (Origin and Glory of Cakratīrtha)
इस अध्याय में देवी ईश्वर से “चक्रतीर्थ” का अर्थ, स्थान और प्रभाव पूछती हैं। ईश्वर देव–असुर संग्राम की कथा सुनाते हैं—हरि (विष्णु) ने दैत्यों का संहार करके रक्त से रंजित सुदर्शन-चक्र को जिस स्थान पर धोया, वही स्थान पवित्र होकर चक्रतीर्थ के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। वहाँ असंख्य उपतीर्थों का निवास बताया गया है, तथा एकादशी और सूर्य/चन्द्र ग्रहण के समय इसकी विशेष महिमा कही गई है। यहाँ स्नान करने से समस्त तीर्थों में स्नान का संयुक्त फल मिलता है और यहाँ दिया गया दान अपरिमेय फलदायक कहा गया है। क्षेत्र को निश्चित परिमाण सहित विष्णु-क्षेत्र बताया गया है, और कल्प-भेद से इसके नाम—कोटितीर्थ, श्रीनिधान, शतधारा, चक्रतीर्थ आदि—गिनाए गए हैं। तप, वेदाध्ययन, होम, श्राद्ध तथा प्रायश्चित्त-स्वरूप व्रत यहाँ करने से अन्य स्थानों की अपेक्षा अनेक गुना पुण्य बढ़ता है। अंत में फलश्रुति में इसे पाप-नाशक, कामना-पूर्ति करने वाला, तथा कठिन जन्म-स्थितियों में भी उद्धारक कहा गया है; और यहाँ देहांत होने पर उत्तम गति का वचन दिया गया है।

योगेश्वरीमाहात्म्यवर्णनम् (Yogeśvarī Māhātmya—Account of Yogeśvarī’s Glory)
ईश्वर महादेवी को प्रभास-क्षेत्र के पूर्व में स्थित देवी योगेश्वरी की उत्पत्ति और उनकी पूजा-विधि का महात्म्य सुनाते हैं। रूप बदलने में समर्थ महिषासुर तीनों लोकों को भयभीत करता है। तब ब्रह्मा एक अनुपम कन्या की सृष्टि करते हैं, जो कठोर तप करती है। नारद उसे देखकर मोहित होते हैं, पर उसके कुमारि-व्रत के कारण अस्वीकार होकर वे महिषासुर के पास जाकर उसका वर्णन करते हैं। महिषासुर तपस्विनी कन्या को विवाह हेतु बाध्य करना चाहता है; देवी हँसती हैं और उनके श्वास से शस्त्रधारी स्त्री-रूप प्रकट होकर उसकी सेना का संहार कर देते हैं। अंततः देवी महिषासुर को युद्ध में परास्त कर शिरच्छेद सहित वध करती हैं; देवगण स्तुति करके उन्हें विद्या-अविद्या, विजय, संरक्षण और सर्वशक्ति रूप मानते हैं। देवता प्रार्थना करते हैं कि देवी इसी क्षेत्र में सदा निवास करें और उपासकों को वर दें। फिर आश्विन शुक्ल पक्ष के उत्सव का विधान बताया गया है—नवमी को उपवास और दर्शन से पाप-क्षय, तथा प्रातः पाठ से अभय-प्राप्ति। रात्रि में प्रतिष्ठित खड्ग की विस्तृत पूजा—मंडप, होम, शोभायात्रा, जागरण, नैवेद्य, बलि, दिक्पालादि को अर्पण, और राजरथ द्वारा योगेश्वरी की परिक्रमा—का निर्देश है। अंत में साधकों, विशेषकर क्षेत्रवासी ब्राह्मणों, की रक्षा का आश्वासन देकर इस उत्सव को विघ्न-नाशक, मंगलकारी और सामुदायिक धर्मकर्म कहा गया है।

आदिनारायणमाहात्म्यवर्णनम् (Glorification and Narrative Account of Ādinārāyaṇa)
ईश्वर देवी से कहते हैं कि वे पूर्व दिशा में स्थित आदिनारायण हरि के पास जाएँ, जो ‘पादुका-आसन’ पर विराजमान सर्वपापहारी और जगत् को पवित्र करने वाले हैं। फिर कृतयुग की कथा आती है—मेघवाहन नामक महाबली दैत्य ने ऐसा वर पाया कि युद्ध में केवल विष्णु की पादुका से ही उसकी मृत्यु हो; इस कारण वह दीर्घकाल तक संसार को सताता रहा और ऋषियों के आश्रमों का विनाश करता रहा। पीड़ित ऋषि गरुड़ध्वज केशव की शरण में जाकर विस्तृत स्तुति करते हैं, जिसमें विष्णु की जगत्कारणता, उद्धार-शक्ति तथा नाम-स्मरण की पावन महिमा का वर्णन है। भगवान विष्णु प्रकट होकर कारण पूछते हैं; ऋषि दैत्य-वध की प्रार्थना करते हैं ताकि लोक निर्भय हो। विष्णु मेघवाहन को बुलाकर शुभ पादुका से उसके हृदय पर प्रहार करते हैं और दैत्य का अंत कर देते हैं; तत्पश्चात् वे वहीं पादुका-आसन पर प्रतिष्ठित हो जाते हैं। अंत में व्रत-फल कहा गया है—एकादशी को इस रूप की पूजा अश्वमेध-सम फल देती है और दर्शन महादान, विशेषतः गोदान के समान बताया गया है। कलियुग में आश्वासन है कि जिनके हृदय में आदिनारायण प्रतिष्ठित हैं, उनके दुःख घटते और पुण्य बढ़ता है; एकादशी, विशेषकर रविवार-संयोग में स्नान-पूजन ‘भव-बन्धन’ से मुक्त करता है। श्रवण-फल पाप-नाशक और दरिद्रता-हर बताया गया है।

सांनिहित्य-माहात्म्य-वर्णन (Glorification of the Sānnidhya Tīrtha)
इस अध्याय में देवी–ईश्वर संवाद के रूप में सान्निध्य तीर्थ की उत्पत्ति, स्थान और स्नानादि कर्मों का फल बताया गया है। देवी पूछती हैं कि कुरुक्षेत्र से संबद्ध पूज्य महा-नदी यहाँ प्रभास में कैसे प्रकट हुई और इसके दर्शन, स्पर्श तथा स्नान से क्या फल मिलता है। ईश्वर कहते हैं कि यह तीर्थ अत्यन्त शुभ और पाप-नाशक है; केवल दर्शन और स्पर्श से भी कल्याण होता है, और इसका स्थान आदिनारायण से पश्चिम दिशा में निर्दिष्ट दूरी पर है। आगे कथा आती है कि जरासंध के भय से विष्णु यादवों को प्रभास ले आते हैं और समुद्र से निवास-स्थान की याचना करते हैं। पर्वकाल में राहु द्वारा सूर्य-ग्रहण होने पर विष्णु यादवों को आश्वस्त कर समाधि में प्रवेश करते हैं और पृथ्वी को भेदकर एक शुभ जलधारा प्रकट करते हैं, जो स्नान हेतु महान प्रवाह बन जाती है। ग्रहण के समय वहाँ स्नान करने से यादवों को कुरुक्षेत्र-यात्रा का पूर्ण फल प्राप्त होता है। फिर विधि-वृद्धि बताई गई है—ग्रहणकाल में स्नान करने से अग्निष्टोम यज्ञ का सम्पूर्ण फल; छह रसों सहित ब्राह्मण-भोजन से पुण्य की वृद्धि; प्रत्येक आहुति/प्रत्येक जप पर होम और मंत्र-जप का ‘कोटि-गुण’ फल; सुवर्ण-दान तथा आदिदेव जनार्दन की पूजा की प्रशंसा। अंत में फलश्रुति है कि श्रद्धा से यह माहात्म्य सुनने मात्र से भी पाप नष्ट होते हैं।

पाण्डवेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Pāṇḍaveśvara Māhātmya (Account of the Glory of Pāṇḍaveśvara)
इस अध्याय में प्रभास-क्षेत्र के दक्षिण भाग में स्थित प्रसिद्ध लिंग ‘पाण्डवेश्वर’ का माहात्म्य कहा गया है। पाण्डवों के अज्ञातवास और वन-जीवन के समय तीर्थयात्रा के प्रसंग से वे प्रभास आते हैं। सोमपर्व के दिन तट पर विधिपूर्वक पाँचों पाण्डव क्रमशः इस लिंग की प्रतिष्ठा करते हैं; मार्कण्डेय आदि श्रेष्ठ ब्राह्मण ऋत्विज नियुक्त होते हैं, वेदमंत्रों से अभिषेक होता है और गोदान आदि दान दिए जाते हैं। ऋषि प्रसन्न होकर फलश्रुति बताते हैं कि जो पाण्डव-प्रतिष्ठित पाण्डवेश्वर की श्रद्धा से पूजा करता है, वह देवों और अन्य दिव्य/अमानवीय वर्गों में भी पूज्य होता है; उसकी पूजा का पुण्य अश्वमेध-यज्ञ के तुल्य है। सन्निहिता-कुण्ड में स्नान करके, विशेषकर माघ मास में पाण्डवेश्वर-पूजन करने से महान फल मिलता है और अंततः पुरुषोत्तम से तादात्म्य का वर्णन है; केवल दर्शन से भी पाप-क्षय बढ़ता है। लिंग को वैष्णव-रूप में भी कहा गया है, जिससे शैव तीर्थ में वैष्णव समन्वय प्रकट होता है।

Bhūteśvara Māhātmya and the Sequential Worship of the Eleven Rudras (एकादशरुद्र-यात्रा)
यह अध्याय प्रभास-क्षेत्र में एकादश रुद्रों की यात्रा और उनकी क्रमबद्ध पूजा का विधिपरक निरूपण करता है। ईश्वर बताते हैं कि जो यात्री श्रद्धा से यात्रा पूर्ण करे, वह संक्रांति, अयन-परिवर्तन, ग्रहण तथा अन्य शुभ तिथियों में विशेषतः निश्चित क्रम से एकादश रुद्रों का पूजन करे। यहाँ रुद्र-नामों के दो संबद्ध समूह दिए गए हैं—एक प्राचीन नामावली (जैसे अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य आदि) और दूसरी कलियुग-नामावली (भूतेश, नीलरुद्र, कपालि, वृषवाहन, त्र्यम्बक, घोर, महाकाल, भैरव, मृत्युञ्जय, कामेश, योगेश)। देवी क्रम, मंत्र, समय और स्थान-भेद सहित एकादश-लिंग-पूजा की विस्तृत विधि पूछती हैं। ईश्वर एक व्याख्यात्मक योजना भी देते हैं—दस रुद्र दस वायुओं (प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त, धनंजय) से संबद्ध हैं और ग्यारहवाँ आत्मा-स्वरूप है; इस प्रकार बाह्य अनुष्ठान का संबंध अंतःशरीर-तत्त्व से जुड़ता है। व्यावहारिक मार्ग का आरंभ सोमनाथ से होता है, जहाँ प्रथम स्थान भूतेश्वर बताया गया है (सोमेश्वर आदिदेव रूप में)। राजोपचार, पंचामृत-अभिषेक, सद्योजात मंत्र से अर्चना, फिर प्रदक्षिणा और प्रणाम का विधान है। “भूतेश्वर” का अर्थ २५ तत्त्वों के ढाँचे में भूत-जाल पर अधिपत्य के रूप में समझाया गया है; तत्त्व-ज्ञान को मोक्ष का साधन और भूतेशरुद्र-पूजा को अक्षय मुक्ति देने वाली कहा गया है।

नीलरुद्रमाहात्म्यवर्णनम् | Nīlarudra Māhātmya (Glory of Nīlarudra)
इस अध्याय में ईश्वर महादेवी को तीर्थ-निर्देश देते हैं—भूतेश के उत्तर में स्थित ‘द्वितीय’ नीलरुद्र का पावन स्थान, जिसकी दूरी धनुष के ‘षोडश’ माप से बताई गई है। वहाँ यात्री महालिंग का विधिपूर्वक स्नान कराए, ईश-मंत्र से पूजा करे, कुमुद और उत्पल पुष्प अर्पित करे, फिर प्रदक्षिणा और नमस्कार करे। फलश्रुति में कहा गया है कि यह अनुष्ठान राजसूय यज्ञ के समान पुण्य देता है; और जो पूर्ण यात्रा-फल चाहते हों, उन्हें वृष (बैल) का दान करना चाहिए। अंत में ‘नीलरुद्र’ नाम का कारण बताया जाता है—पूर्वकाल में अंजन-श्याम दैत्य ‘आंतक’ का वध करने पर, स्त्रियों के रुदन से संबद्ध होकर भगवान नीलरुद्र के नाम से प्रसिद्ध हुए। यह माहात्म्य पाप-नाशक है और दर्शन के इच्छुक जन श्रद्धा से इसे सुनें व ग्रहण करें।

कपालीश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of Kapālīśvara (Kāpālika Rudra Shrine)
इस अध्याय में देवी के प्रति ईश्वर का तात्त्विक उपदेश है, जिसमें प्रभास-क्षेत्र के रुद्र-क्रम में कपालीश्वर को “तृतीय रुद्र” कहा गया है। शिव ब्रह्मा के पाँचवें मस्तक के छेदन की कथा सुनाते हैं; उसके बाद वह कपाल उनके हाथ से चिपक गया—यही कापालिक-स्वरूप का कारण बताया गया है। शिव उस कपाल सहित प्रभास आए और क्षेत्र के मध्य दीर्घकाल तक निवास करके लिङ्ग की अत्यन्त दीर्घ अवधि तक पूजा करते रहे, जिससे स्थल और लिङ्ग की पवित्रता दृढ़ होती है। तीर्थ का स्थान-निर्देश भी दिया गया है—बुधेश्वर के पश्चिम में तथा “धनुषों के सप्तक” के मान से, जो यात्रियों के लिए आन्तरिक निर्देश बनता है। शिव त्रिशूलधारी रक्षकों और अनेक गणों को नियुक्त कर तीर्थ की रक्षा का विधान करते हैं। श्रद्धापूर्वक पूजन, वेद-निपुण ब्राह्मण को सुवर्णदान, तथा तत्पुरुष से सम्बद्ध मन्त्र-विधि का अनुष्ठान बताया गया है। फल के रूप में कहा गया है कि लिङ्ग के दर्शन से जन्म-जन्मान्तर के पाप नष्ट होते हैं; स्पर्श और दर्शन की विशेष महिमा भी प्रतिपादित है। अंत में प्रभास के कपाली (तृतीय रुद्र) के पाप-नाशक माहात्म्य का संक्षिप्त निरूपण किया गया है।

वृषभेश्वर-माहात्म्यवर्णनम् (Narration of the Māhātmya of Vṛṣabheśvara Liṅga)
इस अध्याय में ईश्वर देवी को प्रभास-क्षेत्र के एक परम पावन रुद्र-धाम—वृषभेश्वर कल्प-लिंग—का माहात्म्य सुनाते हैं। यह लिंग देवताओं को प्रिय और अत्यन्त शुभदायक है। विभिन्न कल्पों में इसके नाम और प्रभाव बताए गए हैं—पहले कल्प में ब्रह्मा की दीर्घ आराधना और सृष्टि-उत्पत्ति के कारण यह ब्रह्मेश्वर कहलाया; अगले में राजा रैवत की विजय और समृद्धि का हेतु बनकर रैवतेश्वर; तीसरे में धर्म ने वृषभ-रूप (शिव-वाहन) से पूजन किया, तब सान्निध्य/सायुज्य का वर देने से वृषभेश्वर; और वराह-कल्प में राजा इक्ष्वाकु की त्रिकाल-नियमित पूजा से राज्य और वंश-वृद्धि हुई, इसलिए इक्ष्वाक्वीश्वर नाम प्रसिद्ध हुआ। क्षेत्र की दिशागत सीमा धनु-परिमाण में बताकर कहा गया है कि वहाँ स्नान, जप, बलि, होम, पूजा और स्तोत्र अक्षय फल देते हैं। फिर प्रबल फलश्रुति आती है—लिंग के समीप ब्रह्मचर्य सहित रात्रि-जागरण, भक्ति-नृत्य/गीत आदि सेवा, ब्राह्मण-भोजन, तथा विशेषकर माघ कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि और अष्टमी/चतुर्दशी को पूजन महान पुण्यदायक है। यहाँ के फल को ‘तीर्थ-अष्टक’—भैरव, केदार, पुष्कर, द्रुतिजंगम, वाराणसी, कुरुक्षेत्र, महाकाल, नैमिष—के तुल्य कहा गया है। अमावस्या में पिण्डदान से पितरों की तृप्ति, और लिंग का दधि, क्षीर, घृत, पंचगव्य, कुशोदक व सुगन्धित द्रव्यों से अभिषेक महापाप-शुद्धि तथा वैदिक-प्रतिष्ठा देने वाला बताया गया है। अंत में कहा गया है कि इस माहात्म्य का श्रवण विद्वान और अविद्वान—दोनों के लिए कल्याणकारी है।

त्र्यंबकेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Trimbakeśvara: Account of the Shrine’s Glory
ईश्वर देवी से कहते हैं कि वह अविनाशी त्र्यंबकेश्वर जाएँ—जो रुद्रों में पाँचवें और आद्य दिव्य स्वरूप माने गए हैं। अध्याय में तीर्थ का पवित्र भूगोल बताया गया है: साम्बपुर के निकट, पहले शिखाण्डीश्वर (पूर्व युग से सम्बद्ध) का उल्लेख, और पास ही कपालिका-स्थान जहाँ लिङ्गरूप कपालेश्वर के दर्शन-स्पर्श से दोष और पाप दूर होते हैं। वहाँ से नियत दूरी पर उत्तर-पूर्व दिशा में त्र्यंबकेश्वर स्थित हैं, जो सर्वहितकारी और मनोवांछित फल देने वाले हैं। गुरु नामक ऋषि कठोर तप करते हैं, दिव्य नियम से त्र्यंबक-मंत्र का जप करते हुए दिन में तीन बार शंकर की पूजा करते हैं। शिव की कृपा से उन्हें दिव्य ऐश्वर्य प्राप्त होता है और वे इस क्षेत्र के नाम की प्रतिष्ठा करते हैं। फलश्रुति में कहा गया है कि निकटता, पूजा और मंत्र-जप से पाप नष्ट होते हैं; वामदेव मंत्र सहित भक्ति से दोषों से मुक्ति मिलती है; और चैत्र शुक्ल चतुर्दशी की रात्रि में जागरण, पूजा, स्तुति व पाठ से विशेष सिद्धि होती है। अंत में पूर्ण तीर्थ-फल चाहने वालों के लिए गोदान का विधान और इस माहात्म्य को पुण्यप्रद व पापनाशक बताकर उपसंहार किया गया है।

अघोरेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Aghoreśvara Liṅga Māhātmya (Glorification of Aghoreśvara)
इस अध्याय में ईश्वर अघोरेश्वर का संक्षिप्त माहात्म्य बताते हैं। अघोरेश्वर को “छठा लिंग” कहा गया है और उसके ‘वक्त्र’ के रूप में भैरव का संबंध बताया गया है। तीर्थ को त्र्यम्बकेश्वर के निकट स्थित, कलियुग के मल-दोषों को हरने वाला और महान पुण्य देने वाला स्थान कहा गया है। भक्ति सहित स्नान और पूजा का क्रमिक विधान बताया गया है, जिसका फल मेरु-दान जैसे महादानों के तुल्य कहा गया है। दक्षिणामूर्ति-भाव से वहाँ जो भी अर्पण किया जाता है, वह अक्षय (अविनाशी) फल देने वाला बताया गया है। अघोरेश्वर के दक्षिण में किया गया श्राद्ध पितरों को दीर्घकाल तक तृप्त करता है और उसकी प्रशंसा गया-श्राद्ध तथा अश्वमेध से भी बढ़कर की गई है। यात्रा-दान में अल्प-सा सुवर्णदान भी फलदायक कहा गया है, तथा सोमाष्टमी के निकट ब्रह्मकूर्च व्रत को महान प्रायश्चित्त बताया गया है। अंत में कहा है कि इस माहात्म्य को सुनने से पाप नष्ट होते हैं और अभीष्ट सिद्ध होता है।

महाकालेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् (Narration of the Māhātmya of Mahākāleśvara)
ईश्वर देवी को बताते हैं कि अघोरेश से थोड़ा उत्तर, वायव्य (उत्तर-पश्चिम) दिशा में स्थित महाकालेश्वर-लिंग के पास जाना चाहिए; यह स्थान पाप-नाशक तीर्थ है। अध्याय में युगानुसार नाम-परंपरा आती है—कृतयुग में यह ‘चित्राङ्गदेश्वर’ कहलाता था और कलियुग में ‘महाकालेश्वर’ के रूप में प्रसिद्ध है। रुद्र को काल-रूप तथा सूर्य को भी ग्रस लेने वाले विश्व-तत्त्व के रूप में वर्णित करके, ब्रह्माण्ड-चिन्तन को देवालय-माहात्म्य से जोड़ा गया है। विधि बताई गई है कि प्रातःकाल षडाक्षर मंत्र से पूजन करें। कृष्णाष्टमी को घी में मिला गुग्गुलु अर्पित कर रात्रि-विधान सहित विशेष व्रत करने से बड़ा फल मिलता है; भैरव अपराधों के लिए व्यापक क्षमा प्रदान करते हैं। दान में धेनु-दान को प्रमुख कहा गया है, जो पितरों की परंपरा को उन्नत करता है; तथा देव के दक्षिण भाग में शतरुद्रीय का पाठ पितृ और मातृ—दोनों कुलों के उद्धार हेतु बताया गया है। उत्तरायण में घृत-कंबल अर्पण करने से कठोर पुनर्जन्म का शमन होता है। फलश्रुति में समृद्धि, अनिष्ट-निवारण और जन्म-जन्मांतर में भक्ति की दृढ़ता कही गई है; अंत में चित्राङ्गद के पूर्व-पूजन से इस क्षेत्र की कीर्ति का विस्तार बताया गया है।

भैरवेश्वरमाहात्म्य (Bhairaveśvara—Glory of the Shrine)
अध्याय 94 में प्राभास-क्षेत्र के भैरवेश्वर का संक्षिप्त तत्त्व और विधि-विधान बताया गया है। ईश्वर देवी से कहते हैं कि अग्निकोण के निकट, दिशा-चिह्नों और दूरी के संकेतों से पहचाने जाने वाले श्रेष्ठ भैरवेश्वर-तीर्थ में जाएँ। वहाँ का लिंग सर्वकाम-प्रद, दरिद्रता और दुर्भाग्य का नाश करने वाला कहा गया है। पूर्वकाल में यह ‘चण्डेश्वर’ नाम से प्रसिद्ध था—चण्ड नामक गण ने दीर्घकाल तक इसकी उपासना की, इसलिए यह नाम स्मरण में रहा। यह भी कहा गया है कि शांतचित्त होकर दर्शन और स्पर्श करने से पाप नष्ट होते हैं और जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्ति मिलती है। भाद्रपद कृष्ण चतुर्दशी को उपवास और रात्रि-जागरण करने से महेश्वर का परम धाम प्राप्त होता है। वाणी, मन और कर्म से हुए दोष लिंग-दर्शन से नष्ट होते हैं; तथा तिल, सुवर्ण और वस्त्र का दान विद्वान को देना चाहिए, जिससे मलिनता दूर हो और यात्रा का फल सिद्ध हो। अंत में भैरव का वैश्विक अर्थ बताया गया है—प्रलय के समय रुद्र भैरव-रूप धारण कर जगत का संहार/संकोचन करते हैं, इसी से इस क्षेत्र का नाम सार्थक है। इस माहात्म्य के श्रवण से घोर पापों से भी मुक्ति और कल्याण का फल कहा गया है।

मृत्युञ्जयमाहात्म्यवर्णनम् / The Glory of Mṛtyuñjayeśvara (Mṛtyuñjaya Liṅga)
इस अध्याय में ईश्वर प्रभास-क्षेत्र में स्थित विशेष लिंग ‘मृत्युञ्जयेश्वर’ का उपदेशात्मक माहात्म्य बताते हैं। दिशाओं और धनु-प्रमाण से उसके स्थान का निर्देश किया गया है तथा कहा गया है कि केवल दर्शन और स्पर्श से भी यह पाप-नाशक है। पूर्व युग में यही स्थान ‘नन्दीश्वर’ कहलाता था, जहाँ नन्दिन नामक गण ने कठोर तप करके महालिंग की स्थापना की और नित्य पूजा की। महामृत्युञ्जय मंत्र के निरंतर जप से भगवान प्रसन्न हुए और उसे गणेशत्व, सामीप्य तथा मोक्ष-सदृश फल प्रदान किया। आगे लिंग-पूजा की विधि क्रम से बताई गई है—दूध, दही, घी, मधु और ईख-रस से अभिषेक; कुंकुम-लेपन; कर्पूर, उशीर, कस्तूरी-रस, चंदन और पुष्प अर्पण; धूप और अगुरु; सामर्थ्य के अनुसार वस्त्र; दीप सहित नैवेद्य और अंत में प्रणाम। अंत में वेदवेत्ता ब्राह्मण को सुवर्ण-दान का विधान है; फलश्रुति में जन्म का फल, सर्वपाप-क्षय और इच्छापूर्ति का प्रतिपादन किया गया है।

कामेश्वर–रतीश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Kameśvara and Ratīśvara: Etiology and Merits of Worship
इस अध्याय में देवी और ईश्वर के बीच प्रश्नोत्तर रूप में पवित्र संवाद है। ईश्वर पहले कामेश्वर के उत्तर में रतीश्वर का स्थान दिशा‑दूरी के संकेतों से बताते हैं और फल कहते हैं कि केवल दर्शन और पूजन से सात जन्मों के पाप नष्ट होते हैं तथा गृह‑कलह/विघटन का भय दूर होता है। तब देवी उस तीर्थ की उत्पत्ति और “रतीश्वर” नाम का कारण पूछती हैं। ईश्वर कथा सुनाते हैं—त्रिपुरारि शिव द्वारा मनसिज काम के दग्ध हो जाने पर रति उसी स्थान पर दीर्घ तप करती हैं; वे अंगूठे की नोक पर खड़ी होकर बहुत काल तक तपस्या करती रहीं, तब पृथ्वी से एक माहेश्वर लिंग प्रकट हुआ। आकाशवाणी ने रति को लिंग‑पूजन का आदेश दिया और काम से पुनर्मिलन का वर दिया। रति के तीव्र पूजन से काम पुनः प्राप्त हुए और वह लिंग “कामेश्वर” कहलाया; रति कहती हैं कि आगे जो भी श्रद्धा से पूजन करेगा उसे अभीष्ट सिद्धि और शुभ गति मिलेगी। अंत में चैत्र शुक्ल त्रयोदशी के पूजन को विशेष फलदायी—मंगल और कामना‑पूर्ति देने वाला—बताया गया है।

योगेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् (Glorification of Yogeśvara Liṅga)
ईश्वर महादेवी को प्रभास-क्षेत्र के वायु-भाग में, कामेश के निकट “सात धनुष” की परिधि में स्थित अत्यन्त प्रभावशाली योगेश्वर-लिंग का माहात्म्य बताते हैं। इसके दर्शन मात्र से पाप नष्ट होते हैं; पूर्व युग में इसका नाम ‘गणेश्वर’ कहा गया। कथा के अनुसार असंख्य शक्तिशाली गण प्रभास को माहेश्वर क्षेत्र जानकर वहाँ आए और योग-नियमों सहित सहस्र दिव्य वर्षों तक कठोर तप करते रहे। उनके षडङ्ग-योग से प्रसन्न होकर वृषध्वज शिव ने उस लिंग को ‘योगेश्वर’ नाम दिया और उसे योग-फल प्रदान करने वाला घोषित किया। जो विधिपूर्वक और भक्ति से योगेश की पूजा करता है, वह योग-सिद्धि और स्वर्गीय आनंद प्राप्त करता है; यह पूजा सुवर्ण-मेरु और समस्त पृथ्वी के दान से भी श्रेष्ठ कही गई है। फल-पूर्णता हेतु वृषभ-दान का विधान भी बताया गया। आगे प्रभास में निवास करने वाले ‘एकादश रुद्रों’ की नित्य पूजा-वंदना का उपदेश है; उनकी कथा सुनने से क्षेत्र का पूर्ण पुण्य मिलता है, और उन्हें न जानना निंदित है। अंत में कहा गया है कि सोमेश्वर की पूजा के बाद शतरुद्रीय का पाठ करे—तब सभी रुद्रों का पुण्य प्राप्त होता है। यह उपदेश रहस्य, पाप-शमन और पुण्य-वर्धक बताया गया है।

पृथ्वीश्वर-माहात्म्यवर्णनम् (Glorification of Pṛthvīśvara and the Origin of Candreśvara)
इस अध्याय में देवी पूछती हैं कि वह लिंग ‘पृथ्वीश्वर’ क्यों कहलाता है और आगे चलकर ‘चन्द्रेश्वर’ नाम से कैसे प्रसिद्ध हुआ। ईश्वर पाप-प्रणाशिनी कथा सुनाते हुए बताते हैं कि यह लिंग पूर्व युगों/मन्वन्तरों से प्रसिद्ध है और प्रभास-क्षेत्र में दिशाओं व दूरी के संकेतों सहित स्थित है। दैत्य-भार से पीड़ित पृथ्वी गौ-रूप धारण कर भटकती हुई प्रभास-क्षेत्र पहुँचती है और वहाँ लिंग-प्रतिष्ठा का संकल्प करती है। वह सौ वर्षों तक कठोर तप करती है; रुद्र प्रसन्न होकर आश्वासन देते हैं कि विष्णु दैत्यों का नाश करेंगे और यह लिंग ‘धारित्री/पृथ्वीश्वर’ के नाम से विख्यात होगा। फलश्रुति में कहा गया है कि भाद्रपद कृष्ण तृतीया को पूजन महायज्ञ-फल के समान है; आसपास का क्षेत्र मोक्षदायक है और वहाँ अनायास मृत्यु भी परम पद देती है। फिर वराह-कल्प की कथा आती है: दक्ष के शाप से चन्द्रमा रोगग्रस्त होकर पृथ्वी पर गिरता है, समुद्र-समीप प्रभास में आकर पृथ्वीश्वर की सहस्र वर्षों तक आराधना करता है। उससे वह पुनः तेजस्वी और शुद्ध होता है, और वही लिंग ‘चन्द्रेश्वर’ कहलाता है। इस माहात्म्य के श्रवण से मल-नाश, पवित्रता और आरोग्य की वृद्धि बताई गई है।

Cakradhara–Daṇḍapāṇi Māhātmya (Establishment of Cakradhara near Somēśa and the Pacification of Kṛtyā)
ईश्वर देवी से प्रभास-क्षेत्र में सोमेश के निकट चक्रधर (सुदर्शनधारी विष्णु) और दण्डपाणि (शैव गणेश्वर/रक्षक) के साथ-साथ स्थित होने का माहात्म्य कहते हैं। कथा पौण्ड्रक वासुदेव नामक भ्रमित राजा से आरम्भ होती है, जो विष्णु के चिह्न धारण कर कृष्ण को चुनौती देता है कि वे चक्र आदि त्याग दें। भगवान हरि उसके दम्भ को उलटकर काशी में ही सुदर्शन का प्रयोग करते हैं और पौण्ड्रक तथा काशिराज का वध कर देते हैं। काशिराज के पुत्र ने शंकर की आराधना करके विनाशकारी कृत्या प्राप्त की, जो द्वारका की ओर बढ़ी। विष्णु ने सुदर्शन छोड़कर उसे निष्प्रभावी किया; कृत्या काशी भागकर शंकर की शरण में गई। देवायुधों के टकराव से लोक-हानि का भय उत्पन्न हुआ, तब विष्णु प्रभास में कालभैरव/सोमेश के समीप आए। दण्डपाणि ने संयम का उपदेश दिया कि चक्र का पुनः प्रक्षेपण व्यापक अनर्थ कर सकता है; हरि ने यह वचन मानकर वहीं दण्डपाणि के पास चक्रधर रूप में निवास किया। अन्त में पूजन-विधि और फलश्रुति है—पहले दण्डपाणि, फिर हरि का क्रमशः पूजन करने से भक्त पापरूपी कवच से मुक्त होकर शुभ गति पाते हैं। कुछ चन्द्र-तिथियों, व्रत और उपवास को विघ्न-नाश तथा मुक्ति-सम्बन्धी पुण्य के लिए विशेष बताया गया है।

सांबाय दुर्वाससा शापप्रदानवर्णनम् — Durvāsas’ Curse upon Sāmba and the Origin-Frame of Sāmbāditya
इस अध्याय में शिव–देवी संवाद के माध्यम से प्रभास-तीर्थ के भीतर ‘सांबादित्य-माहात्म्य’ की कथा-धारा आरम्भ होती है। ईश्वर देवी को उत्तर तथा वायव्य (उत्तर-पश्चिम) दिशा की ओर संकेत करके बताते हैं कि सांब द्वारा प्रतिष्ठित सूर्य-स्वरूप ‘सांबादित्य’ प्रसिद्ध है। वे उस क्षेत्र के तीन प्रमुख सूर्य-स्थानों—मित्रवन, मुण्डीर और तृतीय प्रभासक्षेत्र—का भी उल्लेख करते हैं। फिर देवी पूछती हैं कि सांब कौन हैं और नगर उनके नाम से क्यों जाना जाता है। ईश्वर कहते हैं कि सांब वासुदेव के पराक्रमी पुत्र हैं, जाम्बवती के सुत; पितृशाप के कारण उन्हें कुष्ठ रोग हुआ। कारण यह बताया गया है कि दुर्वासा ऋषि द्वारावती आए; यौवन और रूप के गर्व में सांब ने उनके तपस्वी रूप का हाव-भाव से उपहास और अपमान किया। इससे क्रुद्ध होकर दुर्वासा ने शाप दिया कि शीघ्र ही सांब कुष्ठ से ग्रस्त होंगे। अध्याय विनय और संन्यासियों के प्रति आदर का धर्म सिखाते हुए आगे सांब की सूर्य-उपासना तथा लोकहित हेतु सूर्य-प्रतिष्ठा की भूमिका तैयार करता है।

सांबादित्यमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of Sāmba-Āditya (Sun Worship at Prabhāsa)
इस अध्याय में आचरण, परिणाम और प्रायश्चित्त-भक्ति का धर्मोपदेशक प्रसंग आता है। नारद द्वारावती में यदुवंश की सभा में पहुँचकर राजदरबार की स्थिति देखते हैं; साम्ब का अविनय कथा का कारण बनता है। नारद मद्य और परिस्थितियों से चित्त की अस्थिरता का विषय उठाते हैं, जिस पर श्रीकृष्ण विचारपूर्वक एक परीक्षा-सा प्रसंग घटित होने देते हैं। विहार के समय नारद साम्ब को कृष्ण और अन्तःपुर की स्त्रियों के सामने ले आते हैं; मद और आवेश में संयम टूटता है और अव्यवस्था हो जाती है। श्रीकृष्ण का शाप यहाँ नीति-चेतावनी है—ध्यान-भंग, सामाजिक असुरक्षा और प्रमादजन्य कर्मफल का संकेत। कुछ स्त्रियाँ अपने वांछित लोक से गिरती कही गई हैं और आगे चलकर दस्युओं द्वारा हर ली जाती हैं; पर मुख्य रानियाँ अपने धैर्य और मर्यादा से सुरक्षित रहती हैं। साम्ब को भी कुष्ठ का शाप मिलता है, जिससे प्रायश्चित्त का मार्ग खुलता है। वह प्रभास में कठोर तप करता है, सूर्यदेव की स्थापना कर निर्दिष्ट स्तुति से पूजन करता है और आरोग्य का वर तथा आचरण-नियम प्राप्त करता है। इसके बाद सूर्य के बारह नाम, महीनों से संबद्ध द्वादश आदित्य, तथा माघ शुक्ल पंचमी से सप्तमी तक के व्रत का क्रम बताया गया है—करवीर पुष्प और रक्तचन्दन से अर्चना, पूजाविधि, ब्राह्मण-भोजन और फल-प्रतिज्ञा सहित। अंत में फलश्रुति है कि इस माहात्म्य के श्रवण से पाप नष्ट होते हैं और स्वास्थ्य प्राप्त होता है।

कंटकशोधिनीदेवीमाहात्म्य (Glory of the Goddess Kaṇṭakaśodhinī)
इस अध्याय में कण्टकशोधिनी देवी के तीर्थ का संक्षिप्त उपदेश दिया गया है। साधक को उत्तर दिशा के भाग में, “दो धनुष” की दूरी पर स्थित देवी-स्थान तक जाने का निर्देश है। देवी को महीषघ्नी, विशाल देह वाली, ब्रह्मा और देवर्षियों द्वारा पूजित, तथा रक्षक-वीर रूप में वर्णित किया गया है। कथा का हेतु यह बताया गया है कि युग-युग में देवी देवकण्टक—देवताओं को पीड़ित करने वाले दैत्यादि—रूपी “काँटों” को दूर कर शुद्धि करती हैं। आश्वयुज शुक्ल पक्ष की नवमी को पशु-नैवेद्य, पुष्प-उपहार, उत्तम दीप और धूप से विशेष पूजन का विधान है। फलश्रुति में उपासक के लिए एक वर्ष तक शत्रु-रहितता कही गई है; और सच्ची भक्ति से दर्शन करने पर देवी पुत्रवत् रक्षा करती हैं, चाहे विशेष यात्रा हो या नियमित दर्शन। अंत में इसे संक्षिप्त, पाप-नाशक माहात्म्य कहा गया है, जिसका श्रवण भी परम रक्षणकारी है।

कपालेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of Kapāleśvara (Origin and Merit of the Shrine)
अध्याय 103 प्राभास-क्षेत्र में कपालेश्वर की पवित्रता और नाम-प्रसिद्धि की कारणकथा बताता है। ईश्वर देवी से कहते हैं कि उत्तर दिशा में स्थित, देवगणों द्वारा पूजित परम पावन कपालेश्वर के दर्शन करने चाहिए। कथा फिर दक्ष के यज्ञ में जाती है, जहाँ धूल से ढका एक कपालधारी तपस्वी आता है। ब्राह्मण उसे यज्ञ-भूमि के अयोग्य मानकर क्रोधपूर्वक बाहर निकाल देते हैं। वह हँसकर अपना कपाल यज्ञ-मंडप में फेंक देता है और अंतर्धान हो जाता है। वह कपाल बार-बार प्रकट होता है; फेंक देने पर भी हटता नहीं। ऋषि विस्मित होकर समझते हैं कि ऐसा अद्भुत कार्य केवल महादेव ही कर सकते हैं। वे स्तोत्र, हवन और शतरुद्रीय पाठ से शिव की आराधना करते हैं, तब शिव प्रत्यक्ष प्रकट होते हैं। वर माँगने पर ब्राह्मण प्रार्थना करते हैं कि शिव वहीं लिंगरूप में ‘कपालेश्वर’ नाम से निवास करें, क्योंकि वहाँ असंख्य कपालों की पुनरावृत्ति होती है। शिव वरदान देते हैं, यज्ञ पुनः चलता है। कपालेश्वर-दर्शन का फल अश्वमेध यज्ञ के तुल्य तथा पूर्वजन्मों सहित समस्त पापों से मुक्ति बताया गया है। मन्वंतर के अनुसार नाम-भेद (कपालेश्वर, आगे चलकर तत्त्वेश्वर) का उल्लेख भी है और यह भी कि शिव ने जाल्म/वेषधारी रूप लेकर इस तीर्थ की महिमा स्थापित की।

कोटीश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Kotīśvara Liṅga: Account of its Sacred Greatness
ईश्वर देवी को दिशानुसार तीर्थ-यात्रा का क्रम बताते हैं—साधक को पहले परम पावन कोटीश्वर जाना चाहिए और उसके उत्तर में स्थित कोटीश (कोटीशा) का भी दर्शन करना चाहिए। इस स्थान की पवित्रता का आधार कपालेश्वर के निकट घटित एक प्राचीन प्रसंग से बताया गया है। वहाँ पाशुपत संन्यासी—भस्म-लिप्त, जटाधारी, मुँज-मेखला धारण करने वाले, संयमी और क्रोध-विजयी ब्राह्मण शिव-योगी—चारों दिशाओं में क्षेत्र का परिभ्रमण करते हुए दीर्घ तप करते रहे। वे ‘कोटि’ की संख्या में, मंत्र-जप में रत होकर, कपालेश के पास विधिपूर्वक एक लिंग की स्थापना कर भक्तिभाव से उसकी पूजा करते थे। महादेव प्रसन्न होकर उन्हें मुक्ति प्रदान करते हैं; क्योंकि वहाँ कोटि ऋषियों ने सिद्धि पाई, इसलिए वह लिंग पृथ्वी पर ‘कोटीश्वर’ नाम से प्रसिद्ध हुआ। कहा गया है कि कोटीश्वर की भक्ति-पूर्वक पूजा से कोटि मंत्र-जप का फल मिलता है; वहीं वेदज्ञ ब्राह्मण को स्वर्ण-दान करने से कोटि होम के तुल्य फल होता है, और यह तीर्थ-यात्रा पूर्णतः फलदायी मानी गई है।

ब्रह्ममाहात्म्यवर्णनम् (Brahmā-Māhātmya: Theological Discourse on Brahmā’s Sanctity at Prabhāsa)
ईश्वर प्रभास-क्षेत्र के भीतर एक “गुप्त, श्रेष्ठ स्थान” का परिचय देते हैं, जिसे सर्वथा पावन और सर्वजन-शुद्धिकारक कहा गया है। वे वहाँ की दिव्य सन्निधियों का वर्णन करके बताते हैं कि केवल दर्शन मात्र से भी जन्मजन्य भारी पाप-मल नष्ट होते हैं और मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। देवी पूछती हैं कि ब्रह्मा को यहाँ “बालरूपी” क्यों कहा गया है, जबकि अन्यत्र वे वृद्ध रूप में वर्णित हैं; साथ ही स्थान, समय, पूजन-विधि और यात्रा-क्रम जानना चाहती हैं। ईश्वर बताते हैं कि सोमनाथ के ईशान्य दिशा में ब्रह्मा का परम स्थान है; ब्रह्मा आठ वर्ष की अवस्था में वहाँ आकर कठोर तप करते हैं और विशाल अनुष्ठानों सहित सोमनाथ-लिंग की स्थापना/प्रतिष्ठा में सहभागी होते हैं। इसके बाद अध्याय में काल-गणना का तकनीकी निरूपण आता है—त्रुटि से मुहूर्त तक की इकाइयाँ, मास-वर्ष की रचना, युग और मन्वंतर के मान, मनुओं और इंद्रों के नाम, तथा ब्रह्मा के मास में आने वाले कल्पों की सूची; वर्तमान कल्प को “वराह कल्प” कहा गया है। अंत में ब्रह्मा–विष्णु–रुद्र की त्रयी का समन्वय और अद्वैत-भाव प्रतिपादित होता है—शक्तियाँ कार्य-भेद से अलग दिखती हैं, पर तत्त्वतः एक ही हैं; इसलिए यात्राफल चाहने वाले पहले ब्रह्मा का सम्मान करें और संप्रदाय-द्वेष से बचें।

ब्राह्मणप्रशंसा-वर्णनम् (Praise of Brahmins and Conduct in Prabhāsa-kṣetra)
इस अध्याय में देवी पूछती हैं कि प्रभास-क्षेत्र में बालरूप से प्रकट पितामह (ब्रह्मा), जो अद्वैत ब्रह्मस्वरूप हैं, उनकी पूजा कैसे की जाए—कौन-से मंत्र और विधि-नियम हों, तथा क्षेत्र में रहने वाले ब्राह्मण किस प्रकार के हैं और उनके निवास से क्षेत्र-फल कैसे मिलता है। ईश्वर उत्तर देते हैं कि ब्राह्मण पृथ्वी पर देवता के प्रत्यक्ष स्वरूप हैं; उनका सम्मान करना मूर्ति-पूजा के समान, और कुछ कथनों में उससे भी श्रेष्ठ माना गया है। वे चेतावनी देते हैं कि ब्राह्मणों की परीक्षा लेना, अपमान करना या कष्ट पहुँचाना निषिद्ध है—चाहे वे निर्धन हों, रोगी हों या अंग-हीन। हिंसा और तिरस्कार के भयंकर दुष्परिणाम बताए गए हैं, और अन्न-जल आदि का दान-सत्कार ब्राह्मण-पूजन का मुख्य मार्ग कहा गया है। इसके बाद प्रभास में रहने वाले ब्राह्मणों की विभिन्न वृत्तियों/जीवन-शैलियों का वर्गीकरण दिया गया है—व्रत, तप, नियम, भिक्षा या अन्य उपजीविका के संकेतों सहित। अंत में कहा गया है कि प्रभास में अनुशासित, वेद-निष्ठ ब्राह्मण ही बाल-पितामह की पूजा के योग्य हैं; जो बड़े अपराधों से दूषित हों, उन्हें उस पूजा के निकट नहीं जाना चाहिए।

बालरूपी-ब्रह्मपूजाविधानम्, रथयात्रा-विधिः, नामशत-स्तोत्र-माहात्म्यम् (Bālarūpī Brahmā Worship Procedure, Chariot-Festival Protocol, and the Merit of the Hundred Names)
इस अध्याय में ईश्वर विधि और तत्त्व का उपदेश देते हैं। भक्ति को तीन रूपों—मानसी, वाचिकी और कायिकी—में बाँटकर, उसकी प्रवृत्तियाँ लौकिकी, वैदिकी और आध्यात्मिकी भी बताई गई हैं। फिर प्रभास-क्षेत्र में बालरूपी ब्रह्मा की विशेष पूजा-विधि वर्णित है—तीर्थ-स्नान, मंत्रोच्चार सहित पंचगव्य व पंचामृत से अभिषेक, शरीर पर न्यास-क्रम, द्रव्यों की शुद्धि, पुष्प-धूप-दीप-नैवेद्य आदि उपचार, तथा वेद-समूह और सद्गुणों को भी पूज्य मानकर सम्मान करना। कार्त्तिक मास में, विशेषतः पूर्णिमा के आसपास, रथयात्रा का विधान आता है—नगर-जन की भूमिकाएँ, अनुष्ठान की सावधानियाँ, और सहभागी व दर्शक के लिए बताए गए फल। इसके बाद ब्रह्मा के स्थान-सम्बद्ध नामों/रूपों की दीर्घ सूची दी गई है, जो तीर्थ-भूगोल का संकेत करती है। फलश्रुति में कहा गया है कि नामशत-स्तोत्र का पाठ और विधिपूर्वक आचरण पाप का नाश कर महान पुण्य देता है; प्रभास में पद्मक-योग जैसे दुर्लभ काल-योगों का विशेष माहात्म्य भी बताया गया है। अंत में महोत्सवों के समय निवास करने वाले ब्राह्मणों के लिए जप-पाठ की अनुशंसा तथा दान-विधान—भूमिदान और निर्दिष्ट वस्तुओं के दान—का निर्देश किया गया है।

प्रत्यूषेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् / The Māhātmya of Pratyūṣeśvara
ईश्वर देवी से कहते हैं कि सोमनाथ-क्षेत्र के ईशान कोण में निश्चित दूरी पर वसुओं का एक परम लिंग है—चार मुखों वाला, देवताओं को प्रिय। उसका नाम प्रत्यूषेश्वर है और वह महापापों का नाशक बताया गया है; केवल दर्शन से ही सात जन्मों के संचित पाप नष्ट हो जाते हैं। देवी पूछती हैं कि प्रत्यूष कौन हैं और यह लिंग कैसे प्रतिष्ठित हुआ। ईश्वर वंशकथा सुनाते हैं—ब्रह्मा-पुत्र दक्ष ने अपनी कन्याएँ धर्म को दीं; उनमें विश्वा से आठ पुत्र उत्पन्न हुए, जो आठ वसु कहलाए: आप, ध्रुव, सोम, धर, अनल, अनिल, प्रत्यूष और प्रभास। प्रत्यूष पुत्र-प्राप्ति की इच्छा से प्रभास-क्षेत्र आए, उसे कामना-पूर्ति करने वाला पवित्र क्षेत्र जानकर महादेव की स्थापना की और सौ दिव्य वर्षों तक एकाग्र तप किया। प्रसन्न होकर महादेव ने देवल नामक पुत्र दिया, जो श्रेष्ठ योगी कहा गया; इसलिए यह लिंग प्रत्यूषेश्वर प्रसिद्ध हुआ। यहाँ पूजा करने से निःसंतान को भी स्थायी वंश-परंपरा मिलती है। प्रत्यूषकाल (प्रातः) में दृढ़ भक्ति से आराधना करने पर ब्रह्महत्या-जन्य सहित घोर पाप भी नष्ट होते हैं। पूर्ण तीर्थफल के लिए वृषदान का विधान है और माघ कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि जागरण को समस्त दान-यज्ञों का फल देने वाला कहा गया है।

अनिलेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् (Anileśvara Māhātmya—Description of the Glory of Anileśvara)
ईश्वर महादेवी को उत्तम अनिलेश्वर तीर्थ की ओर जाने का उपदेश देते हैं। यह स्थान उत्तर दिशा में तीन धनुष की दूरी पर बताया गया है। वहाँ का लिंग ‘महाप्रभाव’ है और उसके दर्शन मात्र से पापों का नाश होता है। कथा में अनिल को वसुओं में पाँचवाँ कहा गया है। उसने श्रद्धापूर्वक महादेव की आराधना करके शिव को प्रत्यक्ष किया और विधिपूर्वक लिंग की स्थापना की। ईश की शक्ति से उसके पुत्र मनोजव को अद्भुत बल और वेग प्राप्त हुआ; उसकी गति का पता लगाना कठिन बताया गया है—यह देवकृपा का उदाहरण है। जो इस मूर्ति/स्थान का दर्शन करते हैं, वे क्लेशों से मुक्त रहते हैं; विकलांगता और दरिद्रता का अभाव तथा मंगल की प्राप्ति कही गई है। लिंग पर एक पुष्प अर्पित करने मात्र से भी सुख, सौभाग्य और सौन्दर्य मिलता है। इस पापनाशक माहात्म्य को सुनकर और अनुमोदन करके मनुष्य के प्रयोजन सिद्ध होते हैं—ऐसी फलश्रुति है।

प्रभासेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of Prabhāseśvara (Installation, Austerity, and Pilgrimage Observance)
ईश्वर देवी को गौरी-तपोवन से पश्चिम दिशा में स्थित परम पावन प्रभासेश्वर की ओर जाने का उपदेश देते हैं। वे बताते हैं कि यह क्षेत्र सात धनुष की परिधि में प्रसिद्ध है और वहाँ का महान लिंग अष्टम वसु ‘प्रभास’ द्वारा स्थापित किया गया था। फिर प्रभास की संतान-प्राप्ति की इच्छा, उसके द्वारा महालिंग की स्थापना और ‘आग्नेयी’ नामक कठोर तपस्या का वर्णन आता है, जो सौ दिव्य वर्षों तक चली। अंत में रुद्र प्रसन्न होकर उसे इच्छित वर प्रदान करते हैं। प्रसंगवश भुवना (बृहस्पति की बहन) को प्रभास की पत्नी कहा गया है; उनके वंश का संबंध विश्वकर्मा—जगत्-शिल्पी सृष्टिकर्ता—और अत्यन्त शक्तिशाली तक्षक से जोड़ा गया है। अध्याय का उपसंहार तीर्थव्रत-विधान से होता है—माघ मास की चतुर्दशी को समुद्र-संगम में स्नान, शतरुद्रीय जप, संयम (भूमि-शय्या, उपवास), पंचामृत से लिंगाभिषेक, विधिपूर्वक पूजन, और इच्छानुसार वृष-दान। इसका फल पाप-शुद्धि और सर्वांगीण समृद्धि बताया गया है।

रामेश्वरक्षेत्रमाहात्म्यवर्णन — Rāmeśvara Kṣetra Māhātmya (at Puṣkara)
ईश्वर देवी से पुष्कर के निकट ‘अष्टपुष्कर’ नामक कुण्ड का माहात्म्य कहते हैं—यह असंयमी जनों के लिए दुर्लभ है, पापों का नाश करने वाला और अत्यन्त पुण्यदायक है। वहीं राम द्वारा स्थापित ‘रामेश्वर’ नामक लिंग का वर्णन आता है; केवल दर्शन-पूजन से भी प्रायश्चित्त होता है और ब्रह्महत्या जैसे महापाप से मुक्ति बताई गई है। देवी विस्तार से पूछती हैं कि सीता-लक्ष्मण सहित राम वहाँ कैसे पहुँचे और लिंग-प्रतिष्ठा कैसे हुई। ईश्वर राम के जीवन-प्रसंग बताते हैं—रावण-वध हेतु अवतार, फिर ऋषि-शाप के कारण वनवास; यात्रा में प्रभास-प्रदेश में आगमन। विश्राम के बाद राम को दशरथ का स्वप्न होता है; वे ब्राह्मणों से परामर्श करते हैं। ब्राह्मण स्वप्न को पितरों का संकेत मानकर पुष्कर-तीर्थ में श्राद्ध का विधान बताते हैं। राम योग्य ब्राह्मणों को बुलाते हैं, लक्ष्मण को फल लाने भेजते हैं और सीता सामग्री तैयार करती हैं। श्राद्ध के समय ब्राह्मणों में अपने पितृकुल की साक्षात उपस्थिति का अनुभव कर सीता लज्जावश अलग हो जाती हैं; उनके न दिखने पर राम क्षणभर क्रोधित होते हैं, फिर सीता कारण बताती हैं—और यही प्रसंग पुष्कर के पास रामेश्वर-लिंग की स्थापना से जोड़ा जाता है। अंत में फलश्रुति है—भक्ति से पूजन करने पर परम गति मिलती है। विशेषकर द्वादशी तथा चतुर्थी/षष्ठी के संयोगों में किया गया श्राद्ध अपार फल देता है; पितरों की तृप्ति बारह वर्षों तक बनी रहती है। अश्वदान को अश्वमेध-यज्ञ के समान पुण्यफल कहा गया है। यह प्रभास खण्ड के इस भाग का 111वाँ अध्याय बताया गया है।

लक्ष्मणेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् (Lakṣmaṇeśvara Māhātmya—Account of the Glory of Lakṣmaṇeśvara)
अध्याय 112 में ईश्वर देवी को यात्रा-शैली में निर्देश देते हैं और रames के पूर्व दिशा में, तीस धनुष की दूरी पर स्थित प्रसिद्ध लक्ष्मणेश्वर तीर्थ का वर्णन करते हैं। वहाँ का लिंग लक्ष्मण द्वारा तीर्थयात्रा के समय प्रतिष्ठित बताया गया है; वह महापापों का नाश करने वाला और देवताओं द्वारा पूजित है। यहाँ भक्ति की विधियाँ बताई गई हैं—नृत्य, गीत, वाद्य-वादन सहित पूजन, होम और जप, तथा ध्यान-समाधि में स्थित होकर आराधना; जिसका फल ‘परमा गति’ कहा गया है। दान-क्रम भी निश्चित है—गंध, पुष्प आदि से क्रमशः देवता का पूजन कर, योग्य द्विज को अन्न, जल और सुवर्ण का दान करना चाहिए। माघ मास की कृष्ण चतुर्दशी को विशेष महत्त्व दिया गया है; उस दिन स्नान, दान और जप को अक्षय फल देने वाला कहा गया है। अंत में यह अध्याय प्राभास खंड तथा प्राभासक्षेत्र-माहात्म्य के अंतर्गत स्थित बताया गया है।

जानकीश्वरमाहात्म्यवर्णनम् (Jānakīśvara Māhātmya: Account of the Glory of Jānakīśvara)
इस अध्याय में ईश्वर देवी से कहते हैं कि प्रभास-क्षेत्र के नैऋत्य भाग में, रामेश/रामेशान के निकट ‘जानकीश्वर’ नामक श्रेष्ठ लिंग है। यह समस्त प्राणियों के पापों का नाश करने वाला है और कभी जानकी (सीता) द्वारा विशेष रूप से पूजित रहा है। इसके नामों का क्रम भी बताया गया है—पहले यह ‘वसिष्ठेश’ कहलाता था, त्रेता-युग में ‘जानकीश’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ, और आगे चलकर साठ हजार वालखिल्य ऋषियों की सिद्धि-प्राप्ति से ‘सिद्धेश्वर’ नाम प्राप्त हुआ। कलि-युग में इसे शक्तिशाली ‘युग-लिंग’ कहा गया है, जिसके दर्शन मात्र से भक्त दुर्भाग्यजन्य दुःख से मुक्त हो जाते हैं। स्त्री-पुरुष दोनों के लिए समान भक्ति-पूजा का विधान है—लिंग का स्नान/अभिषेक आदि। विशेष व्रत में पुष्कर-तीर्थ में स्नान करके नियम, सदाचार और संयमित आहार के साथ एक मास तक निरंतर पूजन करने पर प्रतिदिन का पुण्य अश्वमेध से भी अधिक बताया गया है। माघ मास की तृतीया को किसी स्त्री द्वारा की गई पूजा से उसके कुल तक का शोक और दुर्भाग्य दूर हो जाता है। अंत में फलश्रुति है कि इस माहात्म्य का श्रवण पापों का नाश कर शुभता प्रदान करता है।

वामनस्वामिमाहात्म्यवर्णनम् | Vāmana-Svāmin Māhātmya (Glorification of Vāmana Svāmin)
ईश्वर देवी को वामन-स्वामिन् नामक विष्णु-तीर्थ में जाने का उपदेश देते हैं। यह स्थान पापों का नाश करने वाला और बड़े-बड़े अपराधों को मिटाने वाला कहा गया है, तथा पुष्कर के दक्षिण-पश्चिम भाग के निकट स्थित बताया गया है। यहाँ बलि के बन्धन की कथा आती है—विष्णु के त्रिविक्रम रूप के तीन पगों में पहला पग इसी स्थान पर दाहिने चरण से, दूसरा मेरु-शिखर पर और तीसरा आकाश में बताया गया है; तीसरे पग से जगत्-सीमा भेदित होती है और जल प्रकट होता है, जिसे विष्णुपदी गंगा कहा गया है। ‘पुष्कर’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘आकाश’ और ‘जल’ के अर्थों से समझाई गई है, और इसे प्रजापति-संबंधित पवित्र संगम माना गया है। यहाँ स्नान करके हरि के पदचिह्न का दर्शन करने से हरि के परम धाम की प्राप्ति, पिण्डदान से पितरों की दीर्घ तृप्ति, तथा नियमशील ब्राह्मण को पादुका दान करने से विष्णुलोक में सम्मानित वाहन-प्राप्ति का पुण्य कहा गया है। वसिष्ठ की गाथा उद्धृत कर तीर्थ की शुद्धिकारक महिमा पुष्ट की गई है।

Puṣkareśvaramāhātmya-varṇana (Glorification of Puṣkareśvara)
ईश्वर महादेवी को प्रभास-क्षेत्र में तीर्थ-यात्रा का क्रम बताते हैं—पहले परम प्रसिद्ध पुष्करेश्वर जाएँ, फिर उसके दक्षिण में स्थित जानकीश्वर का दर्शन-पूजन करें। पुष्करेश्वर-लिंग अत्यन्त प्रभावशाली कहा गया है; इसकी प्रतिष्ठा आदर्श पूजन से प्रमाणित है—ब्रह्मपुत्र (ब्रह्मा के पुत्र) तथा महर्षि सनत्कुमार ने स्वर्ण-पुष्कर पुष्पों से विधिपूर्वक इसकी आराधना की, इसी से नाम और महिमा प्रसिद्ध हुई। अध्याय में कर्म-फल का सिद्धान्त भी बताया गया है—गन्ध, पुष्प आदि अर्पित कर भक्तिपूर्वक, क्रम से और शास्त्रोक्त विधि से किया गया पूजन ‘पुष्करी-यात्रा’ की पूर्णता के समान माना जाता है। यह स्थान ‘सर्व-पातक-नाशन’ के रूप में विख्यात है, जहाँ यात्रा नैतिक शुद्धि और अनुशासित भक्ति-मार्ग दोनों का साधन बनती है।

शंखोदककुण्डेश्वरीगौरीमाहात्म्य (Glory of Śaṅkhodaka Kuṇḍa and Kuṇḍeśvarī/Gaurī)
ईश्वर देवी से कहते हैं कि प्रभास क्षेत्र में ‘कुण्डेश्वरी’ नाम का देवी-स्थान है, जो सौभाग्य देने वाली तथा पाप और दरिद्रता को दूर करने वाली है। दिशा और दूरी के संकेतों सहित उसके स्थान का वर्णन किया गया है। उसके निकट ‘शंखोदक कुण्ड’ नामक जलाशय बताया गया है, जो समस्त पापों का नाश करने वाला तीर्थ है। कथा के अनुसार विष्णु ने शंख नामक असुर का वध किया और उसके बड़े शंख-सदृश शरीर को प्रभास लाकर धोया; उसी से यह प्रभावशाली तीर्थ प्रतिष्ठित हुआ। शंखनाद सुनकर देवी वहाँ आती हैं और कारण पूछती हैं; इसी प्रसंग से ‘कुण्डेश्वरी’ और ‘शंखोदक’ नाम प्रचलित होते हैं। माघ मास की तृतीया को यहाँ पूजन करने से स्त्री-पुरुष को ‘गौरीपद’ (गौरी का धाम/अवस्था) प्राप्त होने का विधान है। तीर्थ-फल की इच्छा रखने वालों के लिए दान-धर्म बताया गया है—दंपती को भोजन कराना, कंचुक/वस्त्र दान देना, और गौरी-स्वरूपिणी स्त्रियों को भोजन कराना।

भूतनाथेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् (Glorification of Bhūtanātheśvara)
इस अध्याय में प्रभास-खण्ड के अंतर्गत ईश्वर महादेवी को भूतनाथेश्वर का माहात्म्य सुनाते हैं। भक्त को कुण्डेश्वरी के ईश-भाग के निकट, ‘बीस धनुष’ के अंतर पर स्थित भूतनाथेश्वर-हर के दर्शन-पूजन का निर्देश दिया गया है। लिङ्ग को अनादि-निधन ‘कल्प-लिङ्ग’ कहा गया है और युगानुसार नाम-परिवर्तन बताया गया है—त्रेता में यह ‘वीरभद्रेश्वरी’ के नाम से स्मरणीय है, और कलियुग में ‘भूतेश्वर/भूतनाथेश्वर’ के रूप में प्रसिद्ध है। द्वापर-काल के एक प्रसंग में असंख्य भूतों ने इस लिङ्ग के प्रभाव से परम सिद्धि पाई—इसी से पृथ्वी पर इस तीर्थ का नाम स्थिर हुआ। कृष्ण-चतुर्दशी की रात्रि में विशेष साधना बताई गई है: शंकर की पूजा करके दक्षिणाभिमुख होकर अघोर की उपासना करें; संयम, निर्भयता और ध्यान-एकाग्रता रखें—तब लोक में उपलब्ध जो भी सिद्धि हो, वह प्राप्त होती है। तिल और स्वर्ण का दान तथा पितरों के लिए पिण्ड-दान प्रेतत्व से मुक्ति हेतु कहा गया है। अंत में फलश्रुति है कि श्रद्धा से इसका पाठ या श्रवण पाप-संचय का नाश कर शुद्धि प्रदान करता है।

गोप्यादित्यमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of Gopyāditya (Sun consecrated by the Gopīs)
ईश्वर देवी को प्राभास-क्षेत्र में दिशाओं और दूरी के संकेतों से बताए गए अत्यन्त प्रशंसित सूर्य-तीर्थ ‘गोप्यादित्य’ के पास जाने का उपदेश देते हैं, जिसे महापाप-नाशक स्थान कहा गया है। फिर वे उसकी उत्पत्ति सुनाते हैं—कृष्ण यादवों सहित प्राभास आए; वहाँ गोपियाँ और कृष्ण के पुत्र भी उपस्थित थे। दीर्घ निवास के दौरान अनेक नामों वाले शिवलिंग स्थापित किए गए, जिससे ध्वजों, प्रासादों और चिह्नों से युक्त लिंग-बहुल पवित्र क्षेत्र बन गया। कथा में सोलह ‘मुख्य’ गोपियों के नाम आते हैं और उन्हें चन्द्र-कलाओं से सम्बद्ध शक्तियाँ/कलाएँ बताया गया है। कृष्ण को जनार्दन/परमात्मा के रूप में और गोपियों को उनकी शक्तियों के रूप में निरूपित किया गया है। नारद आदि ऋषियों और स्थानीय जनों के साथ गोपियों ने विधिवत् प्रतिष्ठा करके सूर्य-प्रतिमा की स्थापना की; दान भी हुए। तब यह देवता ‘गोप्यादित्य’ नाम से प्रसिद्ध होकर शुभ फल देने और पाप हरने वाला माना गया। अंत में आचार-विधान बताया गया है—गोप्यादित्य की भक्ति को तपस्या और समृद्ध यज्ञों के तुल्य फलदायी कहा गया है; माघ शुक्ल सप्तमी की प्रातः पूजा विशेष रूप से अनुशंसित है, जिससे पितरों का भी कल्याण होता है। साथ ही शुद्धि-नियम, विशेषकर तेल-स्पर्श तथा नीले/लाल वस्त्रों के निषेध और उनसे जुड़ी प्रायश्चित्त-विधियाँ, साधकों की नैतिक-वैदिक सुरक्षा के रूप में दी गई हैं।

बलातिबलदैत्यघ्नीमाहात्म्यवर्णनम् (Māhātmya of the Goddess who Slays Bala and Atibala)
इस अध्याय में देवी पूछती हैं कि स्थानीय देवी “बलातिबल-दैत्यघ्नी” के नाम से क्यों प्रसिद्ध हैं। ईश्वर शुद्धि देने वाली कथा सुनाते हैं—रक्तासुर के पुत्र बल और अतिबल अत्यन्त शक्तिशाली होकर देवताओं को जीत लेते हैं, नामित सेनापतियों और विशाल सेनाओं के बल पर अत्याचारपूर्ण शासन स्थापित करते हैं। देवता और देवरषि मिलकर भगवती की शरण जाते हैं और विस्तृत स्तोत्र से उनकी स्तुति करते हैं, जिसमें उन्हें शक्ति-शैव-वैष्णव रूपों में जगत् की आधार-शक्ति और सर्वशरण्या कहा गया है। तब देवी सिंहवाहिनी, बहुभुजा, आयुधधारिणी उग्र रूप में प्रकट होकर भयंकर युद्ध में दैत्य-सेनाओं का सहज ही संहार करती हैं और धर्म-व्यवस्था पुनः स्थापित करती हैं। कथा प्रभास-क्षेत्र से जुड़ती है—अम्बिका वहीं निवास करती हैं और बल-अतिबल का वध करने वाली के रूप में विख्यात होती हैं; उनके साथ चौंसठ योगिनियों का गण बताया गया है। ईश्वर योगिनियों के नाम गिनाते हैं और साधना-मार्ग बताते हैं—भक्ति से चण्डिका की स्तुति, चतुर्दशी, अष्टमी, नवमी आदि तिथियों पर व्रत-उपवास व नियमपूर्वक पूजा तथा उत्सव, जिससे समृद्धि और रक्षा होती है। अंत में इसे पाप-नाशक और प्रभास-देवी के भक्तों के लिए सर्वार्थ-साधक कहा गया है।

गोपीश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Gopīśvara Māhātmya (Account of the Glory of Gopīśvara)
इस अध्याय में ईश्वर महादेवी को शैव-तत्त्व का उपदेश देते हैं और तीर्थयात्री को उत्तर दिशा में स्थित, ‘तीन धनुष’ की दूरी पर बताए गए अनुपम गोपीश्वर-धाम की ओर जाने का निर्देश करते हैं। यह स्थान पाप-शमन करने वाला है और गोपियों द्वारा प्रतिष्ठित बताया गया है, जिससे देवता की स्थानीय महिमा और अधिकार का आधार बनता है। आगे संक्षिप्त पूजा-विधान कहा गया है—पुत्र-प्राप्ति हेतु महादेव/महेश्वर की आराधना करनी चाहिए; वे मनुष्यों के सभी अभीष्ट सिद्ध करते हैं और विशेष रूप से सन्तति-प्रदाता हैं। चैत्र शुक्ल तृतीया को गन्ध, पुष्प और नैवेद्य आदि से किया गया पूजन मनोवांछित फल देता है। अंत में प्रभास-क्षेत्र में गोपीश्वर के पावन माहात्म्य का संक्षेप में फल-निर्देश किया गया है।

जामदग्न्येश्वरमाहात्म्य (Glory of Jāmadagnyēśvara Liṅga)
इस अध्याय में प्रभासक्षेत्र स्थित जामदग्न्येश्वर-लिङ्ग की उत्पत्ति और महिमा का शैव-स्थलपुराण रूप में वर्णन है। ईश्वर तीर्थयात्रा का क्रम बताते हैं, जिसमें रामजामदग्न्य (परशुराम) द्वारा स्थापित रामेश्वर का उल्लेख आता है; गोपीश्वर के निकट एक अत्यन्त शक्तिशाली, पाप-नाशक लिङ्ग का स्थान दूरी-चिह्न सहित बताया गया है। कथा में परशुराम का गंभीर नैतिक संकट स्मरण कराया गया है—पिता की आज्ञा से मातृवध, फिर पश्चात्ताप, जमदग्नि का प्रसादन और वरदान से रेणुका का पुनर्जीवन। वर प्राप्त होने पर भी परशुराम प्रभास में अद्भुत तप करते हैं, महादेव शंकर की स्थापना करते हैं और ईश्वर की तुष्टि तथा इच्छित फल पाते हैं; महेश्वर वहीं सन्निध रहते हैं। आगे क्षत्रियों के विरुद्ध परशुराम के अभियान, कुरुक्षेत्र और पञ्चनद आदि में किए गए अनुष्ठान, पितृऋण-निवारण तथा पृथ्वी का ब्राह्मणों को दान संक्षेप में कहा गया है। फलश्रुति में कहा है कि इस लिङ्ग की पूजा से महापापी भी समस्त दोषों से मुक्त होकर उमापति के लोक को प्राप्त होता है; और कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को जागरण करने से अश्वमेध-यज्ञ तुल्य फल तथा स्वर्गीय आनन्द मिलता है।

चित्राङ्गदेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of Citrāṅgadeśvara
इस अध्याय में ईश्वर देवी से प्राभास-क्षेत्र के एक विशेष लिंग ‘चित्राङ्गदेश्वर’ का माहात्म्य संक्षेप में कहते हैं। वे मार्ग-सूचना भी देते हैं कि यह लिंग दक्षिण-पश्चिम दिशा में लगभग बीस धनुष की दूरी पर स्थित है। इस तीर्थ की स्थापना गन्धर्वराज चित्राङ्गद ने की थी। स्थान की पवित्रता जानकर उसने कठोर तप किया, महेश्वर को प्रसन्न किया और वहाँ लिंग की प्रतिष्ठा की। जो भक्त भावपूर्वक यहाँ पूजन करता है, वह गन्धर्वलोक को प्राप्त करता है और गन्धर्वों का सान्निध्य पाता है। शुक्ल त्रयोदशी के दिन विधिपूर्वक शिव का स्नान कराकर, क्रम से विविध पुष्प, सुगन्ध और धूप आदि से पूजा करने का विधान बताया गया है। विधि और भाव से की गई यह आराधना सभी इच्छित प्रयोजनों की पूर्ण सिद्धि देने वाली कही गई है।

रावणेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of Rāvaṇeśvara (Foundation Narrative of the Rāvaṇeśvara Liṅga)
ईश्वर देवी को प्रभास-क्षेत्र में रावणेश्वर के माहात्म्य का वर्णन करते हैं। त्रिलोकी-विजय की आकांक्षा से रावण पुष्पक-विमान में जा रहा था कि आकाश में ही विमान अचानक रुक गया—यह संकेत था कि इस क्षेत्र में शिव की मर्यादा के कारण आगे बढ़ना संभव नहीं। रावण ने प्रहस्त को जाँच के लिए भेजा; उसने देखा कि सोमेश्वर (शिव) की देवगण स्तुति कर रहे हैं और वलखिल्यादि तपस्वी-समुदाय उनकी सेवा में लगे हैं; शिव की अनतिक्रम्य सत्ता के कारण विमान पार नहीं जा सकता। रावण स्वयं उतरकर भक्ति से पूजन करता है; भयभीत स्थानीय लोग भाग जाते हैं और देवालय-परिसर सूना-सा हो जाता है। तभी एक अशरीरी वाणी धर्मादेश देती है—देव की यात्रा-ऋतु में विघ्न मत डालो; दूर-दूर से द्विजाती तीर्थयात्री आते हैं, उन्हें संकट में न डालो। वाणी यह भी कहती है कि सोमेश्वर के केवल दर्शन से बाल्य, यौवन और वृद्धावस्था में संचित दोष धुल जाते हैं। तब रावण वहाँ एक लिंग की स्थापना कर उसे ‘रावणेश्वर’ नाम देता है, उपवास और रात्रि-जागरण करता है तथा संगीत-वाद्य से आराधना करता है। शिव उसे वर देते हैं—यहाँ उनकी स्थायी उपस्थिति रहेगी, रावण को लौकिक उत्कर्ष मिलेगा, और इस लिंग के उपासक दुर्जेय होकर सिद्धि प्राप्त करेंगे। रावण फिर अपने अभियान हेतु प्रस्थान करता है; अध्याय का उद्देश्य तीर्थ की पवित्रता और पूजा-फल की मर्यादा को स्थापित करना है।

सौभाग्येश्वरीमाहात्म्यवर्णनम् (Glory of Saubhāgyeśvarī / The Saubhāgya-Granting Gaurī Shrine)
इस अध्याय में शिव–देवी संवाद के माध्यम से पश्चिम दिशा में स्थित गौरी के एक विशेष तीर्थ का निर्देश मिलता है, जहाँ देवी ‘सौभाग्येश्वरी’ के रूप में सौभाग्य (वैवाहिक मंगल और कल्याण) प्रदान करती हैं। स्थान का परिचय रावण से जुड़े ‘रावणेश’ नाम तथा ‘पाँच धनुषों के समूह’ जैसे स्थानीय संकेतों से कराया गया है। कारणकथा में बताया गया है कि अरुंधती देवी ने सौभाग्य की कामना से वहीं गौरी-पूजन में लीन होकर कठोर तप किया और देवी की कृपा से परम सिद्धि प्राप्त की। माघ शुक्ल तृतीया को विशेष पुण्यकाल कहा गया है। फलश्रुति स्पष्ट है—जो भक्तिभाव से वहाँ सौभाग्येश्वरी की आराधना करता है, उसे इस जन्म में ही नहीं, आगे के जन्मों में भी सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

पौलोमीश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Paulomīśvara Māhātmya (Glorification of the Paulomīśvara Liṅga)
इस अध्याय में ईश्वर क्षेत्र की दिशा‑स्थिति और दूरी बताकर देवप्रिय ‘महालिंग’ का वर्णन करते हैं। यह लिंग कामप्रद और सर्वपातक‑नाशक कहा गया है तथा पौलोमी द्वारा प्रतिष्ठित होने से ‘पौलोमीश्वर’ नाम से प्रसिद्ध है। तारक के युद्ध में देवता पराजित होते हैं और इन्द्र शोक व भय से व्याकुल हो उठते हैं। इन्द्राणी इन्द्र की विजय के लिए शम्भु की आराधना करती है; महादेव प्रसन्न होकर भविष्यवाणी करते हैं कि षण्मुख (छः मुखों वाला) महान् पुत्र उत्पन्न होगा और वही तारक का वध करेगा। जो भक्त पौलोमीश्वर लिंग की पूजा करता है, वह शिव का गण बनकर उनके सान्निध्य को प्राप्त होता है। अंत में इन्द्र वहीं निवास कर शोक‑भय से मुक्त हो जाते हैं, जिससे यह तीर्थ शरण और पुण्य‑क्षेत्र के रूप में प्रतिष्ठित होता है।

Śāṇḍilyeśvara-māhātmya (Glory of Śāṇḍilyeśvara)
ईश्वर देवी से कहते हैं कि ब्रह्मा के पश्चिमी भाग की दिशा में, बताए गए चिह्नों और दूरी-निर्देशों के अनुसार स्थित परम शाण्डिल्येश्वर-लिंग के दर्शन हेतु जाओ। यह लिंग अत्यन्त प्रभावशाली है; केवल दर्शन मात्र से ही पाप-नाश और मल-क्षय होता है—ऐसा इस अध्याय में कहा गया है। फिर ब्रह्मर्षि शाण्डिल्य का वर्णन आता है—वे ब्रह्मा के सारथी, तपस्वी, तेजस्वी, ज्ञान में स्थित और जितेन्द्रिय हैं। वे प्रभास क्षेत्र में आकर घोर तप करते हैं, सोमेश्वर के उत्तर में एक महान लिंग की स्थापना करते हैं और सौ दिव्य वर्षों तक स्वयं उसकी पूजा करते हैं। अंततः वे अपना अभीष्ट प्राप्त कर कृतकृत्य हो जाते हैं; नन्दीश्वर की कृपा से उन्हें अणिमा आदि योग-सिद्धियाँ भी प्राप्त होती हैं। अध्याय का निष्कर्ष यह है कि जो भी शाण्डिल्येश्वर का दर्शन करता है, वह तत्काल शुद्ध हो जाता है; बाल्य, यौवन या वृद्धावस्था में जाने-अनजाने किए गए पाप भी इस दर्शन से नष्ट हो जाते हैं।

Kṣemakareśvara-liṅga Māhātmya (क्षेमंकरॆश्वरलिङ्गमाहात्म्य) — Glory of Kṣemeśvara/Kṣemakareśvara
इस अध्याय में ईश्वर देवी से क्षेमेश्वर (क्षेमंकरॆश्वर) नामक परम प्रभावशाली लिंग का माहात्म्य कहते हैं। यह कपालेश के उत्तर कोने में, उसके क्षेत्र के दर्शन-पूजन-परिसर के भीतर, “पंद्रह धनुष” की दूरी पर स्थित बताया गया है। यह लिंग महाप्रभावी और सर्वपातक-नाशक कहा गया है। इसके बाद उत्पत्ति-कथा आती है—क्षेममूर्ति नामक प्रतापी राजा ने वहाँ दीर्घ तप किया और भक्ति तथा एकाग्र संकल्प से उस लिंग की स्थापना की। इसके दर्शन से ‘क्षेम’ (कल्याण व स्थिर मंगल), कार्यसिद्धि, जन्म-जन्मांतर तक इच्छित फल की समृद्धि और सौभाग्य प्राप्त होता है। केवल दर्शन का फल सौ गायों के दान के समान बताया गया है और क्षेत्रफल चाहने वालों को नित्य उस लिंग की शरण लेने की प्रेरणा दी गई है।

सागरादित्यमाहात्म्यवर्णनम् | Sāgarāditya Māhātmya (Glory of Sāgara’s Solar Shrine)
ईश्वर देवी को प्रभास-क्षेत्र में स्थित ‘सागरादित्य’ नामक विशिष्ट सूर्य-प्रतिमा-स्थल का माहात्म्य बताते हैं। भैरवेश के पश्चिम, तथा दक्षिण/आग्नेय दिशा में कामेश के निकट आदि दिशासूचकों से तीर्थ का स्थान-निर्देश होता है। पुराण-प्रसिद्ध राजा सगर ने यहाँ सूर्य की आराधना की—इस राज-परंपरा से स्थल की प्रामाणिकता स्थापित की जाती है; समुद्र की विशालता और ‘सागर’ नाम का संदर्भ भी इसकी पौराणिक-ऐतिहासिक गरिमा बढ़ाता है। फिर माघ शुक्ल पक्ष का व्रत-विधान आता है—संयम, षष्ठी को उपवास, देवता के समीप शयन, सप्तमी को प्रातः उठकर भक्तिपूर्वक पूजन, और दान में कपट न रखकर ब्राह्मणों को भोजन कराना। सूर्य को त्रिलोकी का आधार और परम देव-तत्त्व कहा गया है, तथा ऋतु के अनुसार सूर्य के रंग-रूप का ध्यान भी बताया गया है। अंत में सहस्रनाम के स्थान पर 21 पवित्र/गुप्त नामों का संक्षिप्त स्तव सिखाया जाता है; प्रातः और संध्या में जप करने से पापों से मुक्ति, समृद्धि और सूर्यलोक की प्राप्ति बताई गई है। इस माहात्म्य के श्रवण से दुःख का शमन और महापापों का नाश होता है।

उग्रसेनेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् / The Māhātmya of Ugraseneśvara (formerly Akṣamāleśvara)
अध्याय 129 प्राभास क्षेत्र में समुद्र और सूर्य की दिशा के निकट स्थित एक लिंग के उद्गम, नाम-परिवर्तन और मोक्षदायक महिमा का वर्णन करता है। ईश्वर उस स्थान को बताकर इसे पाप-शमन करने वाला “युगलिंग” कहते हैं, जो पहले अक्षमालेश्वर और बाद में उग्रसेनेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। देवी पूर्व नाम का कारण पूछती हैं। ईश्वर आपद्धर्म की कथा सुनाते हैं—दुर्भिक्ष में भूखे ऋषि धान्य-संग्रह वाले एक चाण्डाल (अन्त्यज) के घर पहुँचते हैं। वह शुद्धि-निषेध और दुष्परिणाम बताता है, पर ऋषि अजिगर्त, भरद्वाज, विश्वामित्र, वामदेव आदि के उदाहरण देकर संकट में प्राण-रक्षा हेतु स्वीकार को उचित ठहराते हैं। शर्त के साथ वसिष्ठ अन्त्यज की पुत्री अक्षमाला से विवाह करते हैं; वह अपने आचरण और ऋषि-संग से अरुन्धती के रूप में प्रतिष्ठित होती है। प्राभास में वह उपवन में लिंग पाकर स्मरणपूर्वक निरन्तर पूजा करती है, जिससे उसकी पापहर की कीर्ति प्रकट होती है। द्वापर-कलि संधि में अन्धासुर-पुत्र उग्रसेन चौदह वर्ष उसी लिंग की आराधना कर कंस नामक पुत्र पाता है, तब से वह तीर्थ उग्रसेनेश्वर कहलाता है। फलश्रुति में दर्शन-स्पर्श से महापाप-क्षय, भाद्रपद ऋषि-पंचमी के पूजन से नरक-भय से मुक्ति, तथा गौ, अन्न और जल-दान को शुद्धि व परलोक-कल्याण हेतु प्रशंसित कहा गया है।

पाशुपतेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of Pāśupateśvara (and Anādīśa) at Prabhāsa
इस अध्याय में प्रभास-क्षेत्र के पाशुपत-सम्बद्ध तीर्थों और सन्तोषेश्वर/अनादीश/पाशुपतेश्वर नामक लिङ्ग का माहात्म्य संवाद के रूप में कहा गया है। ईश्वर अन्य प्रभास-स्थलों के सापेक्ष इसका स्थान बताकर कहते हैं कि इसके दर्शन से पाप नष्ट होते हैं, मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं; यह सिद्धि-स्थान है और अधर्म-आध्यात्मिक रोग से पीड़ितों के लिए औषधि के समान है। यहाँ सिद्ध महर्षियों का निवास बताया गया है और निकट का श्रीमुख वन लक्ष्मी-निवास तथा योगियों की साधना-भूमि कहा गया है। देवी पाशुपत योग-व्रत, देव के नाम-भेद, पूजन-मान, तथा योगियों के देह सहित स्वर्ग-प्राप्ति की कथा का स्पष्टीकरण माँगती हैं। फिर नन्दिकेश्वर का तपस्वियों को कैलास बुलाने का प्रसंग आता है और पद्म-नाल (कमल की डंडी) की अद्भुत घटना वर्णित होती है—योगी सूक्ष्म रूप से नाल में प्रवेश कर उसके भीतर यात्रा करते हैं, जिससे उनकी सिद्धि और स्वच्छन्द-गति प्रकट होती है। देवी के आवेग से शाप का संकेत होता है, फिर शमन और कारण-कथा: गिरा हुआ नाल ‘महानाल’ लिङ्ग बनता है, जो कलियुग में ध्रुवेश्वर से जुड़ता है; जबकि मुख्य देवता अनादीश/पाशुपतेश्वर ही प्रतिष्ठित माने जाते हैं। अंत में फलश्रुति है—विशेषतः माघ मास में निरन्तर भक्ति से पूजन करने पर यज्ञ-दान के समान फल, सिद्धि और मोक्ष की प्राप्ति होती है; भस्म-धारण आदि पाशुपत-चिह्नों और आचार का भी धर्मपूर्वक निर्देश दिया गया है।

ध्रुवेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Dhruveśvara Māhātmya (The Glory and Origin Account of Dhruveśvara)
इस अध्याय में श्रीदेवी पूछती हैं कि जो लिङ्ग “नालेश्वर” कहलाता है, वही “ध्रुवेश्वर” नाम से कैसे प्रसिद्ध हुआ। तब ईश्वर उसका माहात्म्य सुनाते हैं। राजा उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव प्रभास-क्षेत्र में आकर कठोर तप करते हैं, महादेव की स्थापना करते हैं और सहस्र दिव्य वर्षों तक अखण्ड भक्ति से पूजन करते रहते हैं। ईश्वर ध्रुव का स्तोत्र भी बताते हैं, जो बार-बार शरणागति के वाक्य से रचा है—“तं शंकरं शरणदं शरणं व्रजामि”; इसमें शिव की विश्व-स्वामिता और पुराणप्रसिद्ध लीलाओं का गुणगान है। फलश्रुति में कहा गया है कि शुद्धि और संयमयुक्त मन से इस स्तोत्र का पाठ करने वाला शिवलोक को प्राप्त होता है। प्रसन्न शिव ध्रुव को दिव्य-दर्शन देते हैं और अनेक वर प्रदान करना चाहते हैं; पर ध्रुव पद-प्रतिष्ठा आदि को ठुकराकर केवल निर्मल भक्ति और स्थापित लिङ्ग में शिव की नित्य उपस्थिति माँगते हैं। ईश्वर वरदान की पुष्टि करते हैं, ध्रुव के “अचल” स्थान को परम धाम से जोड़ते हैं, तथा श्रावण अमावस्या या आश्वयुज पूर्णिमा को लिङ्ग-पूजन का विधान बताते हैं—जिससे अश्वमेध-सम पुण्य तथा उपासकों और श्रोताओं को विविध लौकिक-पारलौकिक फल प्राप्त होते हैं।

सिद्धलक्ष्मीमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of Siddhalakṣmī (Prabhāsa)
इस अध्याय में ईश्वर देवी से कहते हैं कि प्रभास के निकट सोमेश/ईश-दिक्-भाग में एक परम वैष्णवी शक्ति विराजती है। उस पीठ की अधिष्ठात्री ‘सिद्धलक्ष्मी’ हैं; प्रभास को जगत्-व्यवस्था में ‘प्रथम पीठ’ कहा गया है, जहाँ भैरव के साथ भूमिगत तथा आकाशचारी योगिनियाँ स्वच्छन्द विचरती हैं। जालंधर, कामरूप, श्रीमद्-रुद्र-नृसिंह, रत्नवीर्य, कश्मीर आदि महापीठों का वर्णन आता है और इनके ज्ञान को ‘मंत्रवित्’ होने से जोड़ा गया है। फिर सौराष्ट्र में ‘महोधय’ नामक आधार-पीठ का उल्लेख है, जहाँ कामरूप-सदृश विद्या का प्रवाह चलता रहता है। उसी पीठ में देवी की स्तुति ‘महालक्ष्मी’ रूप में की गई है—जो पाप शान्त करती हैं और शुभ सिद्धि देती हैं। श्रीपंचमी को सुगन्ध और पुष्पों से पूजन करने पर अलक्ष्मी (दुर्भाग्य) का भय दूर होता है। महालक्ष्मी-सन्निधि में उत्तराभिमुख होकर मंत्र-साधना बताई गई है—दीक्षा और स्नान के बाद लक्ष-जप, तथा उसके दशांश के अनुसार त्रिमधु और श्रीफल से होम। फलश्रुति में कहा है कि लक्ष्मी प्रकट होकर इस लोक और परलोक में इच्छित सिद्धि प्रदान करती हैं; तृतीया, अष्टमी और चतुर्दशी के पूजन को भी विशेष फलदायक बताया गया है।

महाकालीमाहात्म्यवर्णनम् | Mahākālī Māhātmya (Glorification of Mahākālī)
इस अध्याय में ईश्वर देवी को महाकाली के महात्म्य का उपदेश देते हैं। वे बतलाते हैं कि महाकाली एक महान पीठ में प्रतिष्ठित हैं, जहाँ पाताल का विवर (पाताल-विवर) है; वे दुःख को शांत करने वाली और शत्रुता का नाश करने वाली हैं। कृष्णाष्टमी की रात्रि में गंध, पुष्प, धूप आदि तथा नैवेद्य और बलि सहित विधिपूर्वक उनकी पूजा करने का विधान कहा गया है। यहाँ स्त्रियों के लिए विशेष व्रत का संकेत भी है—शुक्लपक्ष में एक वर्ष तक नियमपूर्वक आराधना, और विधि के अनुसार ब्राह्मण को फल-दान। गौरी-व्रत के पालन में रात्रि के समय कुछ दाल-धान्य आदि का त्याग करने जैसे आहार-नियम भी बताए गए हैं। फलश्रुति में गृहस्थ के धन-धान्य की अक्षयता, विपत्तियों से रक्षा और अनेक जन्मों के दुर्भाग्य का शमन कहा गया है। अंत में इस स्थान को मंत्र-सिद्धि देने वाला पीठ बताकर, आश्विन शुक्ल नवमी को जागरण तथा शांत चित्त से रात्रि-जप करके इच्छित सिद्धि प्राप्त करने की अनुशंसा की गई है।

पुष्करावर्तकानदीमाहात्म्यवर्णनम् (Māhātmya of the Puṣkarāvartakā River)
ईश्वर देवी को प्राभास-क्षेत्र में ब्रह्मकुण्ड के उत्तर, निकट स्थित पुष्करावर्तका नामक नदी का माहात्म्य बताते हैं और उसे महान तीर्थ-केन्द्र के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। प्रसंग में एक पुराकथा आती है—सोम के यज्ञ-समय में ब्रह्मा, सोमनाथ की स्थापना और पूर्व प्रतिज्ञा के संबंध से, प्राभास में पधारते हैं। उचित संध्या-काल को लेकर चिंता उठती है: ब्रह्मा पुष्कर में संध्या करने को जा रहे हैं, पर दैवज्ञ/काल-विद् कहते हैं कि यह क्षण अत्यन्त शुभ है, इसे छोड़ना नहीं चाहिए। तब ब्रह्मा एकाग्र होकर नदी-तट पर पुष्कर के अनेक रूप प्रकट करते हैं और तीन आवर्त—ज्येष्ठ, मध्यम, कनिष्ठ—उत्पन्न होते हैं, जिससे त्रिविध पवित्र स्थल-रचना बनती है। ब्रह्मा नदी का नाम ‘पुष्करावर्तका’ रखते हैं और अपने अनुग्रह से उसकी कीर्ति जगत में घोषित करते हैं। यहाँ स्नान और भक्तिपूर्वक पितृ-तर्पण करने से ‘त्रि-पुष्कर’ के समान पुण्य मिलता है; विशेष विधान यह है कि श्रावण मास, शुक्ल पक्ष, तृतीया को किया गया तर्पण पितरों को अत्यन्त दीर्घ काल तक तृप्ति देता है।

दुःखान्तकारिणी–लागौरीमाहात्म्य (Duhkhāntakāriṇī / Lāgaurī Māhātmya) — Śītalā as the Ender of Afflictions
इस अध्याय में प्रभास-क्षेत्र में विराजमान एक रक्षक देवी का माहात्म्य बताया गया है। द्वापर-युग में वे ‘शीतला’ के नाम से प्रसिद्ध थीं और कलि-युग में वही ‘कलिदुःखान्तकारिणी’—अर्थात् कलि के दुःखों का अंत करने वाली—कही गई हैं। ईश्वर उनके सान्निध्य का वर्णन करते हुए बालकों के रोग, विशेषकर फोड़े-फुंसियों/विस्फोट जैसे उद्भेदक विकार और उनसे उत्पन्न उपद्रवों को शांत करने का व्यावहारिक भक्ति-क्रम बताते हैं। विधान यह है कि भक्त देवी के धाम में जाकर दर्शन करे, मसूर (मसूर दाल) को पीसकर मित मात्रा में शांति-नैवेद्य तैयार करे और बच्चों के कल्याण हेतु शीतला के सम्मुख अर्पित करे। इसके साथ श्राद्ध आदि सहायक कर्म, तथा ब्राह्मणों को भोजन कराना भी कहा गया है। कर्पूर, पुष्प, कस्तूरी, चंदन जैसे सुगंधित द्रव्य और घृत-पायस का नैवेद्य अर्पित कर, अंत में दंपति द्वारा अर्पित वस्त्र/वस्तुओं को धारण करने (परिधापन) का निर्देश है। शुक्ल पक्ष की नवमी को पवित्र बिल्व-माला अर्पित करने से ‘सर्व-सिद्धि’ की प्राप्ति बताई गई है—यही इस अध्याय का मुख्य फल है।

लोमशेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् (The Māhātmya of Lomaśeśvara)
इस अध्याय में ईश्वर देवी को उपदेश देते हैं कि दुःखान्तकारिणी के पूर्व दिशा में, ‘धनुषों के सप्तक’ के भीतर स्थित परम तीर्थ लोमशेश्वर में जाना चाहिए। वहाँ एक गुफा के भीतर महालिङ्ग की स्थापना ऋषि लोमश ने अत्यन्त कठिन तप करके की थी। आगे दीर्घायु का रहस्य बताया गया है—जितने शरीर में रोम हैं, उतने ही इन्द्र माने गए हैं; जैसे-जैसे इन्द्र क्रम से नष्ट होते हैं, वैसे-वैसे रोमपात होता है। ईश्वर की कृपा से लोमश मुनि अनेक ब्रह्माओं की आयु तक जीवित रहते हैं। जो भक्तिभाव से लोमश द्वारा पूजित उस लिङ्ग का पूजन करता है, वह दीर्घायु, रोगरहित, नीरोग और सुखी रहता है—यही इस अध्याय का फल है।

कंकालभैरवक्षेत्रपालमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of Kaṅkāla Bhairava as Kṣetrapāla
इस अध्याय में ईश्वर-प्रमाणित वाणी द्वारा पवित्र क्षेत्र के प्रमुख क्षेत्रपाल कंकाल भैरव का माहात्म्य बताया गया है। भैरव ने उन्हें क्षेत्र की रक्षा के लिए नियुक्त किया है, ताकि विकृत स्वभाव वाले प्राणियों की हानिकारक प्रवृत्तियों को रोकें और दुष्ट संकल्पों का प्रतिकार करें। श्रावण मास की शुक्ल पंचमी तथा आश्विन मास की शुक्ल अष्टमी को उनके पूजन का विशेष विधान कहा गया है। भक्तिभाव से बलि और पुष्प अर्पित कर जो साधक क्षेत्र में निवास करते हुए पूजन करता है, उसके कार्य निर्विघ्न होते हैं और कंकाल भैरव उसे अपने पुत्र के समान संरक्षण प्रदान करते हैं।

Tṛṇabindvīśvara Māhātmya (तृणबिन्द्वीश्वरमाहात्म्य) — Glory of the Shrine of Tṛṇabindvīśvara
इस अध्याय में ‘ईश्वर उवाच’ के शैव-प्रकटीकरण रूप में प्रभास-क्षेत्र के पश्चिम भाग में स्थित तृणबिन्द्वीश्वर तीर्थ का निर्देश मिलता है। कहा गया है कि यह स्थान ‘धनुषों के पाँच’ परिमाण के भीतर स्थित पवित्र क्षेत्र में है, जहाँ शिव-आराधना का विशेष फल बताया गया है। तीर्थ की पवित्रता का कारण ऋषि तृणबिन्दु की तपस्या से जोड़ा गया है। उन्होंने अनेक वर्षों तक कठोर तप किया और मास-प्रतिमास कुशा-घास के अग्रभाग से केवल एक जल-बिंदु पीने का नियम अपनाकर संयम, वैराग्य और भक्ति का आदर्श रखा। ईश्वर की निरंतर उपासना से उन्हें ‘शुभ प्राभासिक क्षेत्र’ में परम सिद्धि प्राप्त हुई; इसी से तृणबिन्द्वीश्वर धाम की महिमा और आध्यात्मिक शक्ति प्रमाणित होती है।

चित्रादित्यमाहात्म्यवर्णनम् / The Māhātmya of Citrāditya (and the Stotra of the 68 Names of Sūrya)
ईश्वर बताते हैं कि ब्रह्मकुण्ड के निकट स्थित, दरिद्रता-नाशक चित्रादित्य के दर्शन हेतु जाना चाहिए। इसकी कथा में धर्मपरायण कायस्थ मित्र का वर्णन है, जो प्राणियों के हित में रत था। उसके दो संतानें—पुत्र चित्र और पुत्री चित्रा—थीं। मित्र के निधन के बाद पत्नी सती हो गई; दोनों बालक-बालिका की रक्षा ऋषियों ने की और आगे चलकर वे प्रभास क्षेत्र में तप करने लगे। चित्र ने भास्कर (सूर्य) की स्थापना कर विधिपूर्वक पूजन किया और परंपरा से प्राप्त स्तोत्र का जप किया, जिसमें सूर्य के अड़सठ गुप्त/वैदिक नाम हैं, जो उन्हें भारत के अनेक तीर्थों से जोड़ते हैं। इन नामों के श्रवण-जप से पापक्षय, इच्छित फल (राज्य, धन, संतान, सुख), रोग-निवारण और बंधन-मुक्ति बताई गई है। प्रसन्न होकर सूर्य ने चित्र को कर्म और ज्ञान में परिपक्वता दी; फिर धर्मराज ने उसे चित्रगुप्त—विश्व के कर्मों का लेखा रखने वाला—नियुक्त किया। अंत में विशेषतः सप्तमी तिथि पर पूजन-विधान और दान—घोड़ा, म्यान सहित तलवार, तथा ब्राह्मण को स्वर्ण—यात्रा के पुण्य हेतु बताए गए हैं।

चित्रपथानदीमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of the Citrāpathā River
इस अध्याय में प्रभास-क्षेत्र की चित्रपथा नदी का माहात्म्य और उसकी विधि-फलप्रद शक्ति बताई गई है। देवी को ब्रह्मकूण्ड के निकट, चित्रादित्य के संबंध में स्थित इस नदी के पास जाने का उपदेश दिया जाता है। कथा में आता है कि यम की आज्ञा से यमदूत ‘चित्र’ नामक पुरुष को ले जाते हैं; यह सुनकर उसकी बहन शोक से व्याकुल होकर ‘चित्रा’ नदीरूप बन जाती है, भाई की खोज में समुद्र में प्रवेश करती है, और बाद में द्विजजन उस नदी का नाम ‘चित्रपथा’ रखते हैं। फल यह कहा गया है कि जो चित्रपथा में स्नान करके चित्रादित्य का दर्शन करता है, वह दिवाकर-संबंधी परम पद को प्राप्त होता है। कलियुग में यह नदी प्रायः गुप्त हो गई है और विरले ही, विशेषकर वर्षा-ऋतु में, दिखाई देती है; पर जब भी उसका दर्शन हो, वही प्रमाण माना गया है—तिथि-काल की बाध्यता नहीं। यह स्थान पितृलोक से भी जुड़ा है: नदी के दर्शन से स्वर्गस्थ पितर प्रसन्न होते हैं और वंशजों द्वारा किए जाने वाले श्राद्ध की प्रतीक्षा करते हैं, जिससे उन्हें दीर्घ तृप्ति मिलती है। इसलिए वहाँ स्नान और श्राद्ध पाप-नाश तथा पितृ-प्रीति के लिए करने की शिक्षा दी गई है, और चित्रपथा को प्रभास की पुण्य-जननी तीर्थ-धारा कहा गया है।

कपर्दिचिन्तामणिमाहात्म्यवर्णनम् (Kapardī–Chintāmaṇi Māhātmya: Description of the Sacred Efficacy)
अध्याय 141 में ईश्वर द्वारा संक्षिप्त तत्त्व-और-पूजा-विधान बताया गया है। पहले तीर्थयात्री को कपर्दी के प्रतिष्ठित स्थान पर जाना चाहिए, फिर उसके उत्तर दिशा में निकट स्थित उस देवस्थान पर पहुँचना चाहिए जिसे ‘चिन्तितार्थप्रद’ कहा गया है—जो मन में सोचे हुए प्रयोजनों को देने वाला, मानो दूसरा चिन्तामणि रत्न है। इसके बाद काल और विधि का निर्देश है: चतुर्थी तिथि को, विशेषकर जब वह अङ्गारकवार (मंगलवार) से युक्त हो, देवता का स्नान/अभिषेक करके पूर्ण पूजा करनी चाहिए और शुभ प्रकार के विविध नैवेद्य अर्पित करने चाहिए। यह आचरण विघ्नराज (गणेश) की तुष्टि का साधन कहा गया है, और नियमपूर्वक करने पर ‘सभी कामनाओं’ की सिद्धि का फल बताया गया है।

चित्रेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् (Citreśvara Māhātmya—Account of the Glory of Citreśvara)
इस अध्याय में ईश्वर देवी से कहते हैं कि प्रभास-क्षेत्र में आग्नेय (दक्षिण-पूर्व) दिशा की ओर, सात धनुष-प्रमाण दूरी पर ‘चित्रेश्वर’ नाम का एक अत्यन्त प्रभावशाली लिंग स्थित है। उसे ‘सर्व-पातक-नाशक’ कहा गया है; उसके दर्शन और पूजन से भक्त को नरक का भय नहीं रहता। यहाँ पाप को मल की भाँति मानकर कहा गया है कि चित्रेश्वर उसे ‘मार्जित’ कर देता है—अर्थात निरन्तर भक्ति और पूजा से शुद्धि होती है। इसलिए पूर्ण प्रयत्न से चित्रेश की आराधना करने की प्रेरणा दी गई है; फलश्रुति में कहा है कि पाप-भार से दबा हुआ व्यक्ति भी नरक का दर्शन नहीं करता। यह स्कन्दमहापुराण, प्रभासखण्ड, प्रभास-क्षेत्र-माहात्म्य (प्रथम भाग), अध्याय 142 है।

विचित्रेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of Vicitreśvara
ईश्वर महादेवी को विचित्रेश्वर की तीर्थयात्रा का विधान बताते हैं। वे कहते हैं कि प्राभास-क्षेत्र के उस भाग में, पूर्व दिशा की ओर और थोड़ा-सा आग्नेय (दक्षिण-पूर्व) क्षेत्र के भीतर, दस धनुष की दूरी पर यह परम प्रतिष्ठित लिंग स्थित है। उत्पत्ति-कथा में बताया गया है कि यमराज के लेखक (लेखक) ‘विचित्र’ ने अत्यन्त कठिन तप किया और उसी के द्वारा यह महान् लिंग स्थापित हुआ। इस लिंग का दर्शन और साथ में पूजन करने से समस्त पापों का नाश होता है; और विधिपूर्वक पूजा करने पर भक्त दुःख से ग्रस्त नहीं होता—ऐसा फल इस अध्याय में कहा गया है।

पुष्करकुण्डमाहात्म्य (Puṣkara-kuṇḍa Māhātmya) — The Glory of Puṣkara Pond
ईश्वर महादेवी को “तीसरे महान पुष्कर” की ओर जाने का उपदेश देते हैं। उसके पूर्व भाग में, ईशान दिशा के निकट, एक छोटा सरोवर ‘पुष्कर’ नाम से स्मरणीय बताया गया है। वहाँ मध्याह्न में ब्रह्मा ने पूजा की थी—ऐसा आदर्श-प्रसंग कहा गया है; और त्रिलोकी-माता संध्या का संबंध वहाँ प्रतिष्ठा (स्थापन) से जोड़ा गया है। विधि यह है कि पूर्णिमा के दिन शांत चित्त से वहाँ स्नान करने वाला व्यक्ति ‘आदि-पुष्कर’ में विधिवत् स्नान का फल प्राप्त करता है। समस्त पापों के नाश हेतु हिरण्य-दान (स्वर्णदान) का विधान भी बताया गया है। अंत में फलश्रुति कहती है कि इस संक्षिप्त माहात्म्य को सुनने से पाप दूर होते हैं और इच्छित फल सिद्ध होते हैं।

गजकुंभोदरमाहात्म्यवर्णनम् (The Māhātmya of Gajakumbhodara: Vighneśa at the Kuṇḍa)
अध्याय 145 प्राभास-क्षेत्र में विघ्नेश (गणेश) के एक स्थानीय स्वरूप का संक्षिप्त माहात्म्य बताता है। ईश्वर ‘गजकुंभोदर’ नामक विग्रह का परिचय देते हैं—हाथी-लक्षणों से युक्त, विघ्नों को हरने वाला और अधर्म/दुष्कर्म का नाश करने वाला देव। इसके बाद व्रत-नियम बताया गया है: प्रयत्नशील यात्री चतुर्थी के दिन उस संबंधित कुण्ड में स्नान करे और भक्ति से देव का पूजन करे। शुद्ध भाव, उचित समय और धर्मयुक्त आचरण से देव प्रसन्न होते हैं; फलस्वरूप बाधाएँ दूर होती हैं और शुभ फल सिद्ध होते हैं। अंत में इसे स्कन्दपुराण के अंतर्गत ‘गजकुंभोदर-माहात्म्यवर्णन’ अध्याय के रूप में स्थापित किया गया है।

यमेश्वर-प्रतिष्ठा तथा पापविमोचन-उपदेशः (Yameśvara Installation and Guidance on Release from Demerit)
इस अध्याय में धर्मराज यम छाया से जुड़े शाप के कारण पीड़ित होकर अपना एक पाँव खो देते हैं और भारी कष्ट भोगते हैं। वे प्रभास-क्षेत्र में तपस्या करते हैं और शूलधारी शिव का लिंग स्थापित करते हैं। शिव साक्षात प्रकट होकर वर माँगने को कहते हैं; यम अपने गिरे हुए पाँव की पुनःप्राप्ति की याचना करते हैं। फिर यम प्रार्थना करते हैं कि जो भी भक्तिभाव से यमेश्वर-लिंग का दर्शन करे, उसे पाप-विमोचन प्राप्त हो। शिव वरदान देकर अंतर्धान हो जाते हैं; यम का पाँव लौट आता है और वे स्वर्ग लौटते हैं। आगे तीर्थ-उपदेश है—भ्रातृद्वितीया के संयोग में सरोवर में स्नान कर मंदिर के पास यमेश्वर का दर्शन करें। तिल-पात्र, दीप, गौ और कंचन यम को अर्पित करने से सर्व पातकों से मुक्ति बताई गई है; यहाँ न्याय के साथ भक्ति, तप और विधिपूर्वक कर्म से भय का शमन दिखाया गया है।

ब्रह्मकुण्डमाहात्म्य (Brahmakuṇḍa Māhātmya) — The Glory of Brahmakuṇḍa at Prabhāsa
इस अध्याय में शिव–देवी का संवाद है। ईश्वर देवी को प्रभास में स्थित ब्रह्मकुण्ड की ओर निर्देश करते हैं, जिसे ब्रह्मा ने अनुपम तीर्थ के रूप में प्रकट किया। जब चन्द्र (सोम/शशाङ्क) ने सोमनाथ की स्थापना की और देवताओं का अभिषेक-समारोह हुआ, तब ब्रह्मा से स्वयम्भू-चिह्न देने का अनुरोध किया गया। ब्रह्मा ने तप और ध्यान से स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल के समस्त तीर्थों को एकत्र कर इस कुण्ड में संहित किया—इसी से इसका नाम “ब्रह्मकुण्ड” प्रसिद्ध हुआ। यहाँ स्नान और पितृ-तर्पण से अग्निष्टोम यज्ञ के समान पुण्य तथा स्वर्गगमन का फल बताया गया है। पाप-नाश हेतु विद्वान ब्राह्मणों को दान की प्रशंसा है। पूर्णिमा और प्रतिपदा को सरस्वती के यहाँ स्नान का उल्लेख कर तिथि-विशेष की पवित्रता भी बताई गई है। कुण्ड-जल को सिद्ध-रसायन कहा गया है—अनेक रंगों और सुगन्धों से युक्त, अद्भुत प्रभाव वाला; पर इसकी सिद्धि महादेव की प्रसन्नता पर निर्भर है। पात्र-शोधन, जल-तापन, बार-बार संस्कार/सेचन जैसी विधियाँ तथा बहुवर्षीय स्नान, मन्त्र-जप और हिरण्येश, क्षेत्रपाल व भैरवेश्वर की पूजा से आरोग्य, दीर्घायु, वाक्-शक्ति और विद्या की प्राप्ति कही गई है। अंत में प्रदक्षिणा, पूजा और श्रवण से विविध पापों का क्षय तथा ब्रह्मलोक-प्राप्ति की फलश्रुति दी गई है।

Kūpa–Kuṇḍala-janma-kathā and Śivarātri-phala (The Well of Kundala and the Fruit of Śivarātri)
इस अध्याय में शिव–देवी संवाद के रूप में ब्रह्मतीर्थ के निकट ब्रह्मकुण्ड के उत्तर में स्थित ‘कुण्डल’ नामक कूप का वर्णन है। कहा गया है कि वहाँ स्नान करने से चोरी का पाप नष्ट होता है और वह स्थान अत्यन्त पावन है। विशेषतः शिवरात्रि को पिण्डदान आदि कर्म हिंसा से मरे हुए तथा पापकर्म से कलुषित माने गए लोगों के कल्याण हेतु श्रेष्ठ बताए गए हैं। देवी के पूछने पर ईश्वर उस तीर्थ की प्रसिद्धि की कथा सुनाते हैं। राजा सुदर्शन को पूर्वजन्म स्मरण होता है—पूर्व जन्म में वह एक चोर था, जो शिवरात्रि की जागरण-रात्रि में दुष्कर्म करने निकला और राजरक्षकों द्वारा मारा गया; उसके अवशेष ब्रह्मतीर्थ के उत्तर में गाड़ दिए गए। अनजाने में शिवरात्रि-जागरण का संयोग और क्षेत्र की महिमा से उसे परिवर्तनकारी फल मिला और वह धर्मात्मा राजा सुदर्शन के रूप में जन्मा। फिर सोना मिलने का दृश्य प्रमाण लोगों को सत्यापित करता है; ‘चित्रापथा’ नदी का उद्भव और नामकरण होता है। श्रावण मास में उस कूप में स्नान कर विधिपूर्वक श्राद्ध करने तथा चित्रादित्य की पूजा करने से शिवलोक में मान प्राप्त होने की बात कही गई है। अंत में पाठ या श्रवण की फलश्रुति द्वारा रुद्रलोक में पवित्रता और प्रतिष्ठा का वचन दिया गया है।

Bhairaveśvara at Brahmakuṇḍa (भैरवेश्वर-ब्रह्मकुण्ड-माहात्म्यम्)
ईश्वर देवी से कहते हैं कि ब्रह्मकुण्ड के ईशान (उत्तर-पूर्व) भाग में स्थित भैरवेश्वर परम प्रतिष्ठित रूप हैं—वे तीर्थ के रक्षक और पापों के नाशक हैं। उनका स्वरूप चतुर्वक्त्र बताया गया है, जिससे इस पवित्र क्षेत्र में उनकी संरक्षण-शक्ति और विधि-प्राधिकार प्रकट होता है। अध्याय में सरल तीर्थ-विधि बताई गई है—महाकुण्ड में स्नान करके, इन्द्रियों का संयम रखते हुए, भक्तिपूर्वक पंचोपचार से पूजन करना चाहिए। फलश्रुति में कहा गया है कि उपासक अपने पूर्वजों और आने वाली संतानों तक का उद्धार करता है और भक्त को किसी प्रकार की हानि या विनाश नहीं होता। तेजस्वी विमानों की प्राप्ति, सूर्य-सदृश प्रभा में निरन्तर गमन और दिव्य भोग का वर्णन है; यहाँ तक कि इस चतुर्वक्त्र लिङ्ग के दर्शन मात्र से भी समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।

ब्रह्मकुण्डसमीपस्थ-ब्रह्मेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् (Glory of Brahmeśvara near Brahma-kuṇḍa)
इस अध्याय में ईश्वर ब्रह्मकुण्ड के दक्षिण में स्थित ‘ब्रह्मेश्वर’ नामक शैव-तीर्थ का माहात्म्य बताते हैं। कहा गया है कि यह क्षेत्र त्रिलोकी में प्रसिद्ध है और शिव के गण इसकी रक्षा करते हैं, जिससे प्रभास-तीर्थ-परम्परा में इसकी प्रतिष्ठा सिद्ध होती है। यात्री के लिए निश्चित विधि बताई गई है—पहले ब्रह्मेश्वर के पास जाकर वहाँ स्नान करे; विशेषतः चतुर्दशी को और उससे भी अधिक अमावस्या को। फिर विधिपूर्वक श्राद्ध करके ब्रह्मेश्वर का पूजन करे। इसके बाद दान का विधान है—ब्राह्मणों को सुवर्ण-दान शंकर की प्रसन्नता के लिए उत्तम कहा गया है। इन कर्मों से ‘जन्म-फल’ की प्राप्ति, व्यापक कीर्ति और ब्रह्मा के अनुग्रह से उत्पन्न हर्ष का फल बताया गया है।

Sāvitrīśvara-bhairava-māhātmya (सावित्रीश्वरभैरवमाहात्म्य)
अध्याय 151 प्राभास-क्षेत्र में ब्रह्म-कुण्ड के निकट स्थित तीर्थ का संक्षिप्त माहात्म्य बताता है। ईश्वर वहाँ दक्षिण भाग में ब्रह्म-कुण्ड के पास स्थित तीसरे भैरव का वर्णन करते हैं, जहाँ सावित्री का संबंध एक शैव-प्रतिष्ठा से जुड़ा है। सावित्री ने संयम और कठोर नियमों से युक्त तपस्या करके शंकर को प्रसन्न किया। प्रसन्न शिव ने वरदान रूप में विधि बताई—जो व्यक्ति ब्रह्म-कुण्ड में स्नान करके पूर्णिमा के दिन “मेरे लिंग” की गंध, पुष्प आदि क्रमपूर्वक विधिवत् पूजा करता है, उसे मनोवांछित शुभ फल प्राप्त होते हैं। भारी पापों से ग्रस्त जन भी दोषों से मुक्त होकर वृषभध्वज शिव की रक्षा में पुरुषार्थ-सिद्धि पाता है। अंत में शिव अंतर्धान हो जाते हैं, सावित्री शैव-भाव स्थापित कर ब्रह्मलोक चली जाती हैं; और इस कथा को श्रद्धा से सुनने वाला विवेकी श्रोता भी दोषमुक्त होता है।

नारदेश्वरभैरवप्रादुर्भावः (Naradeśvara Bhairava: Origin and Merit)
ईश्वर भैरव के प्राकट्यों का क्रम बताते हैं और ब्रह्मेश के पश्चिम में धनुष-प्रमाण से नापकर स्थित चौथे भैरव-स्थान का वर्णन करते हैं। वहाँ नारद मुनि द्वारा प्रतिष्ठित लिंग ‘नारदेश्वर’ कहलाता है, जो समस्त पापों का नाशक और अभीष्ट फल देने वाला है। कथा में बताया गया है कि नारद पहले ब्रह्मलोक में थे। वहाँ उन्होंने सरस्वती से संबद्ध तेजस्वी दिव्य वीणा देखी और जिज्ञासा से उसे विधि-विरुद्ध बजा दिया। उससे उत्पन्न सात स्वर ‘पतित ब्राह्मण’ के समान कहे गए; ब्रह्मा ने इसे अज्ञानजन्य दोष मानकर सात ब्राह्मणों को कष्ट देने के तुल्य महापातक बताया और प्रायश्चित्त हेतु प्रभास में भैरव की शरण लेने का आदेश दिया। नारद प्रभास पहुँचकर ब्रह्मकुण्ड में शत दिव्य वर्षों तक भैरव की आराधना करते हैं, शुद्ध हो जाते हैं और गायन-विद्या में सिद्धि पाते हैं। अंत में ‘नारदेश्वर भैरव’ की महिमा कही गई है—यह बड़े दोषों का नाश करता है; जो लोग अज्ञान से वीणा/स्वर का प्रयोग करें, वे शुद्धि के लिए यहाँ जाएँ। माघ मास में संयमित आहार रखकर दिन में तीन बार पूजन करने से भक्त को रमणीय, शुभ स्वर्ग-लोक की प्राप्ति होती है।

Hiraṇyeśvara-māhātmya (हिरण्येश्वरमाहात्म्य) — The Glory of Hiraṇyeśvara near Brahmakuṇḍa
ईश्वर देवी से ब्रह्मकुण्ड के निकट स्थित हिरण्येश्वर लिङ्ग का स्थान और मोक्षदायक माहात्म्य बताते हैं। यह श्रेष्ठ लिङ्ग ब्रह्मकुण्ड के वायव्य भाग में है और कृतस्मरा, अग्नितीर्थ, यमेश्वर तथा उत्तर समुद्र-प्रदेश जैसे पवित्र स्थलों के बीच स्थित है; इसी परिसर में ब्रह्मकुण्ड के पास प्रसिद्ध ‘पाँच भैरव’ भी माने गए हैं। ब्रह्मा ने लिङ्ग के पूर्व भाग में कठोर तप किया और एक उत्तम यज्ञ आरम्भ किया। देवता और ऋषि अपने-अपने भाग लेने आए, परन्तु दक्षिणा कम पड़ जाने से यज्ञ की पूर्णता में बाधा आ गई। तब ब्रह्मा ने महादेव से प्रार्थना की; उनकी प्रेरणा से देवहित के लिए सरस्वती का आवाहन हुआ और वह ‘काञ्चन-वाहिनी’ (स्वर्ण-धारा) बन गई। उसकी पश्चिमाभिमुख धारा से असंख्य स्वर्ण कमल उत्पन्न हुए, जो अग्नितीर्थ तक क्षेत्र को भरने लगे। ब्रह्मा ने उन स्वर्ण कमलों को पुरोहितों को दक्षिणा रूप में देकर यज्ञ पूर्ण किया, शेष कमलों को भूमि के भीतर रखकर उनके ऊपर लिङ्ग की स्थापना की—इसी से नाम पड़ा ‘हिरण्येश्वर’, जिसकी पूजा दिव्य स्वर्ण कमलों से कही गई है। ब्रह्मकुण्ड का जल अनेक रंगों का दिखता है और भीतर दबे कमलों के कारण क्षणभर स्वर्ण-सा हो जाता है। हिरण्येश्वर के दर्शन-पूजन से पाप नष्ट होते हैं, दरिद्रता दूर होती है; माघ शुक्ल चतुर्दशी का पूजन समस्त जगत् के पूजन के तुल्य बताया गया है, तथा भक्तिपूर्वक श्रवण-पाठ से देवलोक-प्राप्ति और पापों से मुक्ति का फल कहा गया है।

गायत्रीश्वरमाहात्म्यवर्णनम् (Glory of Gayatrīśvara Liṅga)
ईश्वर देवी से कहते हैं कि हिरण्येश्वर के वायव्य भाग में, ‘तीन धनुष’ की दूरी पर एक पाप-विमोचक लिंग स्थित है। उसका दर्शन और स्पर्श सभी प्राणियों के पापों का नाश करता है। यह गायत्री परंपरा/मंत्र के द्वारा प्रतिष्ठित ‘आदि-लिंग’ कहा गया है। जो ब्राह्मण शुचि होकर वहाँ पहुँचकर गायत्री-जप करता है, वह दुष्प्रतिग्रह (अनुचित दान-ग्रहण) के दोष से मुक्त हो जाता है। ज्येष्ठ पूर्णिमा को जो यथाशक्ति दम्पती को भोजन कराकर वस्त्र देता है, उसका दुर्भाग्य दूर होता है। पूर्णिमा के दिन गंध, पुष्प और नैवेद्य से पूजन करने पर सात जन्मों तक ब्राह्मण्य की प्राप्ति बताई गई है। अंत में इसे ब्रह्मकुण्ड की कृपा से प्राप्त ‘सार का भी सार’ कहा गया है।

Ratneśvara-māhātmya (रतनॆश्वरमाहात्म्य) — Sudarśana Kṣetra and the Merit of Ratnakuṇḍa Worship
इस अध्याय में ईश्वर देवी से संवाद करते हुए रत्नेश्वर को अनुपम तीर्थ बताते हैं। कहा गया है कि वहीं पराक्रमी और श्रेष्ठ विष्णु ने तप किया और सर्वकामना-प्रद लिंग की स्थापना की। रत्नकुंड में स्नान करके पूर्ण उपचरों सहित निरंतर भक्ति से देव-पूजन करने पर साधक को इच्छित फल प्राप्त होता है। तीर्थ की महिमा यह भी है कि अपरिमित तेजस्वी श्रीकृष्ण ने यहाँ कठोर तप करके सभी दैत्यों का संहार करने वाला सुदर्शन-चक्र प्राप्त किया। ईश्वर कहते हैं कि यह क्षेत्र उन्हें सदा प्रिय है और प्रलय के समय भी उनका निवास यहीं रहता है। इस क्षेत्र का नाम “सुदर्शन” है और इसकी परिधि छत्तीस धन्वंतर बताई गई है। इस सीमा के भीतर जो ‘नीच’ माने जाते हैं, वे भी यहाँ देह त्यागने पर परम पद को प्राप्त होते हैं; तथा विष्णु को स्वर्ण-गरुड़ और पीत वस्त्र दान करने से तीर्थयात्रा का फल मिलता है।

गरुडेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् (Garudeśvara Māhātmya—Account of the Glory of Garudeśvara)
इस अध्याय में रत्नेश्वर-माहात्म्य के प्रसंग में एक संक्षिप्त तीर्थ-निर्देश दिया गया है। ईश्वर देवी से कहते हैं कि रत्नेश्वर के उत्तर दिशा में धनुष-परिमाण दूरी पर वैनतेय (गरुड़) द्वारा प्रतिष्ठित एक शिवलिंग है, जो “वैनतेय-प्रतिष्ठित” के नाम से प्रसिद्ध है। गरुड़ ने उस स्थान को वैष्णव-स्वभाव वाला जानकर पाप-नाश के लिए वहाँ लिंग की स्थापना की। पंचमी तिथि को विधि-पूर्वक उसका पूजन करने का विधान है; पंचामृत से अभिषेक करके और नियम से पूजा करने पर समस्त पुण्य की प्राप्ति तथा स्वर्ग-भोग का फल बताया गया है। फलश्रुति में सात जन्मों तक सर्पजन्य विष से रक्षा, तथा सर्वपुण्य-लाभ का आश्वासन मिलता है। इस प्रकार यह अध्याय शिव-लिंग-भक्ति को गरुड़/वैष्णव प्रतीक के साथ जोड़कर तीर्थ-आचरण में शुद्धि और संरक्षण—दोनों का महत्त्व प्रकट करता है।

सत्यभामेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Satyabhāmeśvara Māhātmya (Account of the Glory of Satyabhāmeśvara)
ईश्वर महादेवी से कहकर शुभ सत्यभामेश्वर तीर्थ की यात्रा का निर्देश देते हैं। यह स्थान रत्नेश्वर से दक्षिण दिशा में एक धनुष-भर दूरी पर बताया गया है और इसे सर्व-पाप-प्रशमन करने वाला कहा गया है। इसकी स्थापना श्रीकृष्ण की रूप-औदार्य से युक्त पत्नी सत्यभामा ने की—ऐसा वर्णन है। यहाँ वैष्णव-संबद्ध स्थान पर स्नान को पातक-नाशक बताया गया है। माघ मास की तृतीया तिथि को स्त्री-पुरुष सभी के लिए भक्ति सहित पूजा का विधान है, जिससे पापों से मुक्ति मिलती है। फलश्रुति में कहा गया है कि दुर्भाग्य, शोक, दुःख और विघ्नों से पीड़ित जन भी यहाँ के प्रभाव से मुक्त हो जाते हैं और ‘सत्यभामान्वित’ होकर सत्यभामा की पावन प्रतिष्ठा से जुड़ जाते हैं।

अनंगेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् (Māhātmya of Anangeśvara: Narrative of the Shrine’s Glory)
अध्याय 158 में ईश्वर यात्रा-निर्देश के रूप में श्रोता को अनंगेश्वर के दर्शन का उपदेश देते हैं। कहा गया है कि रत्नेश्वर के सामने धनुष-भर दूरी पर अनंगेश्वर स्थित है। वहाँ का लिंग कामदेव द्वारा—जिसे विष्णु का पुत्र भी कहा गया है—प्रतिष्ठित है; यह स्थान वैष्णव-सम्बद्ध माना गया है और कलियुग में पाप-मल दूर करने में विशेष प्रभावी बताया गया है। फलश्रुति स्पष्ट है—अनंगेश्वर के दर्शन और पूजन से भक्त को कामदेव-सदृश आकर्षण, सौन्दर्य और लोक-प्रियता प्राप्त होती है, तथा वंश में भी दुर्भाग्य या अशुभता का शमन होता है। अनंग-त्रयोदशी के दिन व्रत सहित विशेष पूजा को ‘जन्म-साफल्य’ का कारण कहा गया है। तीर्थ-धर्म की पूर्णता हेतु सदाचारी ब्राह्मण को शय्या-दान का विधान है; और यदि दान विष्णु-भक्त को दिया जाए तो पुण्य और भी बढ़ जाता है।

रत्नकुण्ड-माहात्म्य (Ratnakuṇḍa Māhātmya) / The Glory of Ratna-Kuṇḍa near Ratneśvara
ईश्वर महादेवी को रत्नेश्वर के दक्षिण में, सात धनुष की दूरी पर स्थित रत्नकुण्ड नामक श्रेष्ठ जल-तीर्थ का उपदेश देते हैं। यह कुण्ड महापातकों और बड़े दोषों का नाश करने वाला है तथा इसकी प्रतिष्ठा विष्णु ने की—ऐसा कहा गया है। श्रीकृष्ण ने पृथ्वी और स्वर्ग के असंख्य तीर्थों को एकत्र करके यहाँ स्थापित किया, और देवगण इसकी रक्षा करते हैं; इसलिए कलियुग में अनुशासनहीन और अश्रद्धालु जनों के लिए इसका लाभ सहज नहीं बताया गया है। विधिपूर्वक स्नान करने से यज्ञ-फल अत्यधिक बढ़ता है और अश्वमेध के फल का अनेकगुण फल मिलता है। एकादशी को पितरों के लिए पिण्डदान करने से अक्षय तृप्ति होती है; दृढ़ श्रद्धा के साथ रात्रि-जागरण करने से इच्छित फल की सिद्धि कही गई है। दान में पीत वस्त्र और दुग्ध देने वाली गौ का दान विष्णु को समर्पित करने से सम्पूर्ण तीर्थयात्रा का फल प्राप्त होता है। युगानुसार इसके नाम—कृत में हेमकुण्ड, त्रेता में रौप्य, द्वापर में चक्रकुण्ड और कलि में रत्नकुण्ड—बताए गए हैं; पाताल-गंगा की धाराएँ भी यहाँ मानी गई हैं, अतः यहाँ का स्नान सर्वतीर्थ-स्नान के समान है।

रैवंतकराजभट्टारकमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of Raivanta Rājabhaṭṭāraka
इस अध्याय में ईश्वर देवी को प्रभास-क्षेत्र में रैवंत राजभट्टारक के दर्शन और पूजा की विधि बताते हैं। वे सूर्यपुत्र, अश्वारूढ़ और महाबली हैं; क्षेत्र के भीतर सावित्री के निकट, नैऋत्य दिशा में स्थित माने गए हैं। कहा गया है कि उनके केवल दर्शन से ही साधक सभी आपदाओं से मुक्त हो जाता है। विशेष फल के लिए रविवारीय सप्तमी के संयोग में उनकी पूजा करने का विधान है। ऐसा करने पर पूजक के वंश में भी दरिद्रता का उदय नहीं होता—यह आश्वासन दिया गया है। अंत में ईश्वर कहते हैं कि क्षेत्र में निर्विघ्न निवास तथा राजकीय/लौकिक प्रयोजनों, विशेषतः अश्व-वृद्धि के लिए, पूर्ण प्रयत्न से उनकी आराधना करनी चाहिए।

अनन्तेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Ananteśvara Māhātmya (Glorification of Ananteśvara)
इस अध्याय में प्रभास-क्षेत्र के भीतर ईश्वर दिशा-निर्देश देते हैं। एक निर्दिष्ट तीर्थ/मंदिर के दक्षिण में, धनुष-लंबाइयों के अनुसार अल्प दूरी पर स्थित लिंग को “अनन्तेश्वर” कहा गया है। यह अनन्त द्वारा प्रतिष्ठित तथा नागराज से संबद्ध बताया गया है, जिससे इस पावन स्थल में नाग-रक्षा और अभय का भाव जुड़ता है। फाल्गुन शुक्ल पक्ष की पंचमी को, आहार और इन्द्रियों में संयम रखने वाला साधक पंचोपचार विधि से पूजन करे—ऐसा विधान है। फलश्रुति में सर्पदंश से रक्षा तथा विष का निश्चित अवधि तक न बढ़ना कहा गया है। आगे “अनन्त-व्रत” की विधि बताकर मधु और मधु-पायस का अर्पण, तथा मधु-मिश्रित पायस से ब्राह्मण-भोजन कराने को पूजा का अंग माना गया है, जहाँ दान और अतिथि-सत्कार को विशेष महत्व दिया गया है।

Aṣṭakuleśvara-māhātmya (अष्टकुलेश्वरमाहात्म्य) — The Glory of Aṣṭakuleśvara Liṅga
अध्याय 162 में भगवान शिव देवी को उपदेश देते हैं और प्रभास-क्षेत्र के पवित्र मानचित्र में अष्टकुलेश्वर लिंग का स्थान बताते हैं—एक निर्दिष्ट बिंदु से दक्षिण की ओर तथा लक्ष्मणेश के पूर्व में। फिर इस तीर्थ का स्वरूप कहा गया है: यह सर्व-पाप-प्रशमन करने वाला और घोर कष्टों का नाशक है; ‘महाविष’ जैसे भयानक संकट-रूप दोष का भी शमन करता है। सिद्ध और गन्धर्व आदि दिव्य उपासक यहाँ पूजन करते हैं—इससे इस लिंग की प्रतिष्ठा और महिमा सिद्ध होती है। यह वांछित फल देने वाला बताया गया है। विशेष विधान यह है कि कृष्णाष्टमी को विधिपूर्वक इसकी पूजा की जाए। फलश्रुति में महापापों से मुक्ति और नागलोक में मान-सम्मान की प्राप्ति का आश्वासन दिया गया है।

नासत्येश्वराश्विनेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् (The Māhātmya of Nāsatyeśvara and Aśvineśvara)
इस अध्याय में “ईश्वर उवाच” के रूप में भगवान का उपदेश आता है। वे साधक को निर्देश देते हैं कि निर्दिष्ट स्थान के पूर्व दिशा में स्थित तीर्थ-स्थल पर जाए, जहाँ “नासत्येश्वर” नामक शिवलिंग प्रतिष्ठित है। यह लिंग कल्मष—धर्म-कर्म में लगी मलिनता और पाप-रज—का महान नाशक कहा गया है; इसके दर्शन, स्पर्श और पूजन से शुद्धि तथा पुण्य की वृद्धि का फल बताया गया है। अध्याय के अंत में कोलोफ़न द्वारा इसकी स्थिति बताई गई है—स्कन्दपुराण की 81,000 श्लोकों वाली संहिता में, सातवें विभाग प्रभासखण्ड के अंतर्गत, प्रभासक्षेत्रमाहात्म्य के प्रथम उपखण्ड में यह “नासत्येश्वर और अश्विनेश्वर के माहात्म्य” का वर्णन है। इस प्रकार यह अध्याय दिशा-निर्देश, तीर्थ-नाम और शुद्धि-फल को जोड़कर स्थल-माहात्म्य की संक्षिप्त, परंतु प्रभावी, तीर्थ-निर्देशिका बन जाता है।

अश्विनेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् (The Māhātmya of Aśvineśvara)
ईश्वर देवी से कहते हैं कि वे पूर्व दिशा में जाएँ, जहाँ ‘अश्विनेश्वर’ नामक पवित्र तीर्थ धनुषों के पाँच के भीतर स्थित है। वहाँ पूजन करने से महापापों का शमन होता है और मनोवांछित फल प्राप्त होते हैं। उस लिंग के दर्शन मात्र से समस्त रोग शांत होते हैं; रोग से पीड़ित जनों के लिए यह क्षेत्र महान औषधि के समान बताया गया है। माघ मास की द्वितीया तिथि को वहाँ दर्शन दुर्लभ कहा गया है, इसलिए उस दिन का महत्व और भी बढ़ जाता है। वहाँ सूर्य-पुत्र द्वारा प्रतिष्ठित दो लिंग हैं; अतः संयमित मन वाला साधक उसी द्वितीया को श्रद्धा सहित दर्शन-पूजन करे—भक्ति, शुभ काल और आत्मसंयम को एक साथ साधते हुए।

Savitrī’s Departure to Prabhāsa and the Ritual-Political Crisis of Brahmā’s Yajña (सावित्री-गायत्री-विवादः प्रभासप्रवेशश्च)
यह अध्याय शिव–देवी संवाद के रूप में बताता है कि सावित्री का प्रभास-क्षेत्र से संबंध कैसे बना और यज्ञ की तात्कालिकता कैसे धर्म-नीति तथा तत्त्वचिन्तन में तनाव उत्पन्न करती है। शिव कहते हैं कि ब्रह्मा ने पुष्कर में महायज्ञ का संकल्प किया, पर दीक्षा और होम के लिए पत्नी का साथ अनिवार्य था। गृहकार्य के कारण सावित्री विलम्ब से पहुँचीं; तब इन्द्र ने एक गोपालकन्या को लाकर गायत्री के रूप में पत्नी-स्थान दिया और यज्ञ आरम्भ हो गया। सावित्री अन्य देवियों के साथ सभा में आकर ब्रह्मा से सामना करती हैं और क्रमशः शाप देती हैं—ब्रह्मा की पूजा वर्ष में केवल कार्तिकी में सीमित हो, इन्द्र को भविष्य में अपमान व बन्धन मिले, विष्णु को मर्त्यावतार में पत्नी-वियोग का दुःख हो, रुद्र को दारुवन-प्रसंग में संघर्ष हो, तथा अग्नि और अनेक ऋत्विज/याजक भी दोषभागी हों। यह शाप-क्रम कामना-प्रेरित कर्म और प्रक्रिया-सुविधा के नाम पर धर्म-लोप की आलोचना बन जाता है। फिर विष्णु सावित्री की स्तुति करते हैं; सावित्री प्रतिवर देकर शापों का शमन करती हैं और यज्ञ-समाप्ति की अनुमति देती हैं। गायत्री जप, प्राणायाम, दान और यज्ञ-दोष-निवारण का आश्वासन देती हैं, विशेषतः प्रभास और पुष्कर के संदर्भ में। अंत में सावित्री का प्रभास में सोमेश्वर के निकट निवास बताया गया है। पन्द्रह दिन तक पूजा, पाण्डु-कूप में स्नान, पाण्डव-प्रतिष्ठित पाँच लिंगों का दर्शन, तथा ज्येष्ठ पूर्णिमा को सावित्री-स्थान पर ब्रह्मसूक्तों का पाठ विधान है। फल—पाप-मोचन और परम पद की प्राप्ति।

सावित्रीव्रतविधि–पूजनप्रकार–उद्यापनादिकथनम् (Sāvitrī-vrata: procedure, worship method, and concluding observances)
यह अध्याय देवी–ईश्वर संवाद के रूप में प्रभास-क्षेत्र में सावित्री परंपरा का वर्णन करता है और फिर उसी को व्रत-विधि के रूप में नियमबद्ध करता है। देवी प्रभास में सावित्री के माहात्म्य, व्रत के इतिहास और फलों को पूछती हैं। ईश्वर बताते हैं कि प्रभास-यात्रा के समय राजा अश्वपति ने सावित्री-स्थल पर सावित्री-व्रत किया, देवी की कृपा से उन्हें कन्या प्राप्त हुई और उसका नाम सावित्री रखा गया। आगे सावित्री–सत्यवान की कथा संक्षेप में आती है—नारद की चेतावनी के बावजूद सावित्री ने सत्यवान को वरा, वन में उसके साथ गई, यम का सामना कर वर पाए: द्युमत्सेन की दृष्टि व राज्य की वापसी, पिता और स्वयं के लिए संतान, तथा पति के प्राणों की पुनर्प्राप्ति। दूसरे भाग में ज्येष्ठ मास की त्रयोदशी से तीन रात्रि उपवास/नियम, स्नान-विधान (पाण्डुकूप का विशेष पुण्य, पूर्णिमा पर सरसों-मिश्रित जल से स्नान), तथा सोना/मिट्टी/लकड़ी की सावित्री-प्रतिमा बनाकर लाल वस्त्र सहित दान का निर्देश है। मंत्रोच्चार से पूजन (वीणा–पुस्तक-धारिणी सावित्री से अवैधव्य की प्रार्थना), रात्रि-जागरण, पाठ-कीर्तन-वाद्य, और ब्रह्मा के साथ सावित्री का ‘विवाह-पूजन’ बताया गया है। अनेक दम्पतियों/ब्राह्मणों को क्रम से भोजन, खट्टे-क्षार से परहेज, मधुर पकवानों की प्रधानता, दान-सम्मान व विदाई, तथा गृह्य-श्राद्ध का सूक्ष्म समावेश भी है। अंत में उद्यापन के रूप में इसे शुद्धि, पुण्य और स्त्रियों के सौभाग्य-रक्षण का व्रत कहा गया है; इसे करने या विधि सुनने मात्र से भी व्यापक लौकिक कल्याण का फल बताया गया है।

भूतमातृकामाहात्म्यवर्णनम् (The Māhātmya of Bhūtamātṛkā: Origin, Residence, and Worship Protocols)
अध्याय 167 में ईश्वर और देवी के बीच तत्त्वचर्चा होती है। देवी ‘भूतमाता’ के नाम पर लोगों में दिखने वाले उन्माद/समाधि-जैसे सार्वजनिक आचरण को देखकर पूछती हैं कि क्या यह शास्त्रसम्मत है, प्रभास-निवासी उनकी पूजा कैसे करें, वह वहाँ क्यों आईं और उनका मुख्य उत्सव कब मनाया जाए। ईश्वर उत्पत्ति-कथा बताते हैं—देवी के देह-स्राव से कपाल-मालाधारिणी, शस्त्र-चिह्नयुक्त, भयानक रूप वाली देवी प्रकट होती हैं; उनके साथ ब्रह्मराक्षसी-प्रकृति की सहचरियाँ और विशाल गण भी आते हैं। ईश्वर उनके कार्य-नियम निर्धारित करते हैं, रात्रि-प्रधानता देते हैं और सौराष्ट्र के प्रभास को उनका दीर्घकालीन निवास बताते हैं, स्थान-लक्षणों सहित। फिर अध्याय गृह-धर्म और सामाजिक आचरण का फल बताता है—लिङ्ग-पूजन, जप, होम, शौच, नित्यकर्म की उपेक्षा, घर में निरन्तर कलह और अशान्ति आदि से भूत-पिशाचादि का आकर्षण होता है; जबकि जहाँ देव-नाम, विधिपूर्वक कर्म और शुद्ध मर्यादा रहती है वहाँ रक्षा होती है। इसके बाद वैशाख शुक्ल प्रतिपदा से चतुर्दशी तक पूजा-विधान, अमावस्या/चतुर्दशी से जुड़ा मुख्य व्रत, पुष्प-धूप-सिन्दूर, कण्ठ-सूत्र आदि अर्पण, सिद्ध-वट के नीचे जल-सेवन/अभिषेक, भोजन-दान तथा प्रेऱणी–प्रेक्षणी नामक हास्य-उपदेशयुक्त लोक-प्रदर्शन का निर्देश है। फलश्रुति में संतान-रक्षा, गृह-कल्याण, उपद्रव-निवारण और सर्वमङ्गल की प्राप्ति का आश्वासन दिया गया है।

Śālakaṭaṅkaṭā Devī Māhātmya (शालकटंकटा देवी माहात्म्यम्) — Glory of the Goddess Śālakaṭaṅkaṭā
अध्याय 168 ईश्वर के वचन के रूप में प्राभास-क्षेत्र में स्थित देवी शालकटंकटा का तीर्थ-माहात्म्य बताता है। देवी का स्थान सावित्री के दक्षिण और रैवता के पूर्व कहा गया है, जिससे तीर्थ-मानचित्र में उनकी उपासना का निश्चित संकेत मिलता है। उन्हें महापाप-नाशिनी, समस्त दुःखों का हरण करने वाली, गन्धर्वों द्वारा वन्दिता तथा स्फुरित दंष्ट्राओं वाली भयङ्कर रूपा कहा गया है; उनकी प्रतिष्ठा पौलस्त्य द्वारा की गई और वे ‘महिषघ्नी’ की भाँति प्रबल शत्रुओं का संहार करने वाली बताई गई हैं। माघ मास की चतुर्दशी को उनका पूजन करने से समृद्धि, बुद्धि और कुल-परम्परा की वृद्धि प्राप्त होती है—यह फलश्रुति दी गई है। साथ ही बलि, पूजा, उपहार और ‘पशु-प्रदान’ द्वारा देवी को संतुष्ट करने पर शत्रुओं से मुक्ति का विधान इस अध्याय का मुख्य संदेश है।

Vaivasvateśvara-māhātmya (Glorification of Vaivasvateśvara)
इस अध्याय में प्रभास-क्षेत्र के भीतर एक पवित्र यात्रा-क्रम का वर्णन ईश्वर–देवी संवाद के रूप में आता है। ईश्वर देवी को दक्षिण दिशा के भाग में, देवी के दिग्विभाग में, धनु-परिमाण दूरी पर स्थित ‘वैवस्वतेश्वर’ नामक लिंग के दर्शन हेतु जाने का निर्देश देते हैं। कहा गया है कि इस लिंग की प्रतिष्ठा वैवस्वत मनु ने की थी और यह सर्वकामद, अर्थात् सभी इच्छित फल देने वाला है। मंदिर के निकट एक अद्भुत ‘देवखात’ (दिव्य जलकुण्ड) है, जहाँ स्नान करके साधक शुद्धि प्राप्त करता है। इसके बाद नियमपूर्वक, भक्तिभाव से और इन्द्रियों को संयम में रखकर पंचोपचार-पूजा करने तथा अघोर-विधि से स्तोत्र-पाठ करने का विधान बताया गया है। इस क्रम के पालन से सिद्धि की प्राप्ति का आश्वासन दिया गया है और अंत में इसे प्रभासखण्ड के प्रभासक्षेत्रमाहात्म्य का अध्याय बताकर उपसंहार किया गया है।

Mātṛgaṇa–Balādevī Māhātmya (Glorification of the Mother-Hosts and Balādevī)
इस अध्याय में ईश्वर महादेवी को उपदेश देते हैं कि विवेकी साधक मातृगणों के स्थान पर जाए और उसके निकट स्थित बलादेवी की श्रद्धापूर्वक आराधना करे। प्राभास-क्षेत्र के इस पवित्र स्थल का निर्देश देकर पूजा की संक्षिप्त विधि बताई गई है। श्रावण मास में, विशेषकर श्रावणी व्रत/अनुष्ठान के दिन, बलादेवी का पूजन करने की आज्ञा है। पायस, मधु और दिव्य पुष्पों का अर्पण कर देवी से कृपा माँगी जाती है। फलश्रुति में कहा है कि इस प्रकार पूजा करने वाले भक्त का पूरा वर्ष सुख, आराम और कल्याण से व्यतीत होता है।

दशरथेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् (Daśaratheśvara Māhātmya—Account of the Glory of Daśaratheśvara)
ईश्वर देवी से कहते हैं कि पास ही ‘एकल्लवीरिका’ नामक देवी-स्थान है, और फिर प्रभास-क्षेत्र की एक कारण-कथा सुनाते हैं। सूर्यवंशी राजा दशरथ प्रभास में आकर कठोर तप करते हैं। वे शंकर को प्रसन्न करने हेतु एक लिंग की स्थापना करके विधिपूर्वक पूजा करते हैं और बलवान पुत्र की याचना करते हैं। भगवान उन्हें ‘राम’ नामक पुत्र का वर देते हैं, जो तीनों लोकों में प्रसिद्ध होता है। देव, गंधर्व, दैत्य-असुर और ऋषि-मुनि (वाल्मीकि सहित) उसके यश का गान करते हैं। अध्याय के अंत में विधि और फलश्रुति है—उस लिंग के प्रभाव से दशरथ महान कीर्ति पाते हैं; और जो कार्तिक मास में, विशेषकर कार्तिकी-व्रत पर, दीप-पूजा व अर्घ्य-नैवेद्य आदि से विधिपूर्वक उसकी आराधना करता है, वह भी यशस्वी होता है।

भरतेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् (The Glory of Bharateśvara Liṅga)
ईश्वर देवी से कहते हैं कि थोड़ा उत्तर दिशा में स्थित भरतेश्वर नामक लिंग के पास जाओ। फिर इसकी उत्पत्ति-कथा बताई जाती है—अग्नीध्र के पुत्र, प्रसिद्ध राजा भरत ने इस क्षेत्र में कठोर तप किया और संतान-प्राप्ति हेतु महादेव की प्रतिष्ठा की। प्रसन्न शंकर ने उन्हें आठ पुत्र और एक यशस्विनी कन्या प्रदान की। भरत ने अपने राज्य को नौ भागों में बाँटकर संतानों को दिया; उसी के अनुसार द्वीपों के नाम प्रसिद्ध हुए—इन्द्रद्वीप, कशेरु, ताम्रवर्ण, गभस्तिमान, नागद्वीप, सौम्य, गान्धर्व, चारुण; और कन्या के भाग को कुमाऱ्या कहा गया। ग्रंथ कहता है कि आठ द्वीप समुद्र से डूब गए, केवल कुमाऱ्या-नामक द्वीप शेष रहा; साथ ही दक्षिण-उत्तर विस्तार और चौड़ाई का माप योजन में दिया गया है। अनेक अश्वमेध यज्ञों से भरत की कीर्ति गंगा-यमुना प्रदेशों में फैली; ईश्वर-कृपा से वह स्वर्ग में आनंदित हुआ। फलश्रुति में कहा है कि भरत-प्रतिष्ठित लिंग का पूजन समस्त यज्ञ-दान का फल देता है, और कार्त्तिक मास में कृत्तिका-योग के समय दर्शन करने से घोर नरक का स्वप्न में भी दर्शन नहीं होता।

कुशकादिलिङ्गचतुष्टयमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of the Four Liṅgas beginning with Kuśakeśvara
शैव संवाद में ईश्वर देवी को प्राभास क्षेत्र में एक ही स्थान पर स्थित चार लिंगों की संक्षिप्त तीर्थ-यात्रा बताते हैं। सावित्री के पश्चिम में, दिशा-चिह्नों के अनुसार, दो लिंग पूर्व भाग में और दो पश्चिम भाग में, अपने-अपने मुख के साथ प्रतिष्ठित कहे गए हैं। इनके नाम क्रम से—कुशकेश्वर (प्रथम), गर्गेश्वर (द्वितीय), पुष्करेश्वर (तृतीय) और मैत्रेयेश्वर (चतुर्थ) हैं। कहा गया है कि जो भक्त संयम और भक्ति से इन लिंगों का दर्शन करता है, वह पापों से मुक्त होकर शिव के परम धाम को प्राप्त होता है। फिर व्यावहारिक विधान जोड़ते हुए बताया गया है कि शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को, विशेषकर वैशाख में, प्रयत्नपूर्वक स्नान करके ब्राह्मणों को भोजन कराए और सामर्थ्य के अनुसार स्वर्ण तथा वस्त्र आदि का दान करे। इन कर्तव्यों के पूर्ण होने पर ही यह यात्रा ‘सम्पूर्ण’ मानी जाती है, जिससे दर्शन के साथ काल-नियम और सामाजिक धर्म भी जुड़ जाते हैं।

कुन्तीश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Kuntīśvara Liṅga: The Glory of the Shrine
ईश्वर देवी को प्रभास-क्षेत्र के पूर्व भाग में स्थित, ‘खात’ (खुदे/गर्ताकार स्थान) में प्रतिष्ठित एक विशिष्ट लिंग ‘कुन्तीश्वर’ का माहात्म्य बताते हैं। इसकी प्रामाणिकता स्थापना-स्मृति से जुड़ी है—कहा गया है कि कुन्ती ने स्वयं इस लिंग की प्रतिष्ठा की थी, और तीर्थयात्रा के प्रसंग में कुन्ती सहित पाण्डव पहले भी प्रभास आए थे। फलश्रुति में यह लिंग समस्त पापों के भय का नाश करने वाला कहा गया है, विशेषकर कार्त्तिक मास में इसकी पूजा का अत्यधिक महत्त्व बताया गया है। उस समय पूजन करने वाला भक्त इच्छित फल पाता है और रुद्रलोक में सम्मानित होता है। साथ ही यह भी कहा गया है कि केवल दर्शन से ही वाणी, मन और कर्म से किए गए पाप नष्ट हो जाते हैं—इस प्रकार दर्शन और पूजा, दोनों तीर्थ-नीति में शुद्धि और मोक्ष के सहायक साधन माने गए हैं।

अर्कस्थलमाहात्म्यवर्णनम् (Glorification of Arkasthala / the Sun-site)
इस अध्याय में ईश्वर महादेवी को ‘अर्कस्थल’ नामक पुण्य-स्थान का माहात्म्य संक्षेप में बताते हैं। यह पूर्वोक्त स्थान से आग्नेय (दक्षिण-पूर्व) दिशा में स्थित, अत्यन्त शुभ और ‘सर्व-पातक-नाशक’ कहा गया है। इसके केवल दर्शन से शोक दूर होता है और सात जन्मों तक दरिद्रता नहीं आती; कुष्ठ आदि रोगों का भी विशेष रूप से नाश बताया गया है। दर्शन-फल की तुलना कुरुक्षेत्र में सौ गौओं के दान के फल से की गई है। साथ ही साधना का सरल क्रम बताया गया—त्रिसंगम तीर्थ में सात रविवार स्नान, ब्राह्मणों को भोजन कराना और महिषी (भैंस) का दान। फलश्रुति में सहस्र दिव्य वर्षों तक स्वर्ग में निवास और सम्मान का वर्णन करके तीर्थ, व्रत और दान को एक ही तीर्थ-यात्रा विधि में जोड़ा गया है।

सिद्धेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् (Siddheśvara Māhātmya—Description of the Glory of Siddheśvara)
इस अध्याय में ईश्वर महादेवी से कहते हैं कि अर्कस्थल के निकट आग्नेय (दक्षिण-पूर्व) दिशा में ‘सिद्धेश्वर’ नामक एक लिंग स्थित है। उसके नाम का कारण भी बताया गया है—अठारह हजार ऊर्ध्वरेतस् (ब्रह्मचारी) ऋषियों ने इस लिंग के संबंध से सिद्धि प्राप्त की, इसलिए यह ‘सिद्धेश्वर’ कहलाया। अंत में साधक के लिए आचार-विधि बताई गई है—स्नान करके भक्ति से पूजन करे, उपवास रखे, इंद्रियों का संयम करे, नियमपूर्वक पूजा संपन्न करे और ब्राह्मणों को दक्षिणा दे। फलश्रुति में सर्वकाम-समृद्धि और परम पद की प्राप्ति का वर्णन है।

Lakulīśa-māhātmya (लकुलीशमाहात्म्य) — Glory of Lakulīśa in the Eastern Quarter of Prabhāsa
इस अध्याय में ईश्वर देवी से संक्षेप में शैव-तत्त्व का वर्णन करते हैं। वे प्रभास-क्षेत्र की पूर्व दिशा में स्थित, घोर तपस्या से सिद्ध होकर ऊँचे स्थल पर प्रतिष्ठित, मूर्तिमान लकुलीश का उल्लेख करते हैं और बताते हैं कि यह स्थान विशेष रूप से पाप-शमन और शुद्धि के लिए प्रसिद्ध है। फिर काल-नियम कहा गया है—कार्त्तिकी में, विशेषतः कृतिका-योग के समय जो श्रद्धापूर्वक पूजन करता है, उसे अद्भुत मान्यता प्राप्त होती है। ऐसा उपासक देवों और असुरों सहित समस्त प्राणि-वर्गों में सम्मान के योग्य बनता है। अंत में स्कन्दपुराण के प्रभासखण्ड तथा प्रभासक्षेत्रमाहात्म्य में इस अध्याय की समाप्ति का कोलophon दिया गया है।

Bhārgaveśvara Māhātmya (Glorification of Bhārgaveśvara)
इस अध्याय में ईश्वर देवी से प्रभास-क्षेत्र की यात्रा-रीति बताते हैं। वे भक्त को दक्षिण दिशा में स्थित ‘भार्गवेश्वर’ नामक शिव-स्थान पर जाने की आज्ञा देते हैं और उसे सर्व-पाप-प्रणाशक तीर्थ के रूप में महिमामंडित करते हैं। वहाँ दिव्य पुष्पों और उपहार-समर्पण सहित देवता की पूजा को मुख्य साधन कहा गया है। ऐसा करने वाला उपासक ‘कृतकृत्य’ हो जाता है और उसे सभी कामनाओं की सिद्धि तथा समृद्धि प्राप्त होती है—यही इस तीर्थ-माहात्म्य का संक्षिप्त फल-निर्देश है।

माण्डव्येश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Māṇḍavyeśvara Māhātmya (Glorification of Māṇḍavyeśvara)
इस अध्याय में ईश्वर महादेवी को संक्षिप्त धर्म-तत्त्व का उपदेश देते हैं। वे बताते हैं कि सिद्धेश के दक्षिण-पूर्व (आग्नेय) कोने में, तीन धनुष की दूरी पर माण्डव्येश्वर नामक लिङ्ग स्थित है, जो पाप तथा महापातकों का नाश करने वाला है; यह तीर्थयात्रियों के लिए स्थान-निर्देश भी है। माघ मास की चतुर्दशी को भक्त को वहाँ पूजन करके रात्रि-जागरण करना चाहिए—ऐसा विधान कहा गया है। जो साधक संयमित भक्ति से यह व्रत करता है, वह फिर मर्त्य-जीवन में लौटता नहीं—इसी फलश्रुति के साथ अध्याय समाप्त होता है और इसे प्राभासखण्ड के प्राभासक्षेत्रमाहात्म्य में स्थित बताया गया है।

Puṣpadanteśvara Māhātmya (पुष्पदन्तेश्वर-माहात्म्यम्) — The Glory of Puṣpadanteśvara
इस अध्याय में ‘ईश्वर उवाच’ के रूप में तीर्थयात्री को प्रभास-क्षेत्र में स्थित ‘पुष्पदन्तेश्वर’ नामक शुभ देवस्थान के दर्शन का निर्देश दिया गया है। यहाँ पुष्पदन्तेश्वर को शंकर-सान्निध्य से संयुक्त गणेश के रूप में बताया गया है, जिससे इस स्थान की शैव-प्रामाणिकता और महिमा प्रकट होती है। कथा में कहा गया है कि इस स्थल पर कठोर तप किया गया और उसी के फलस्वरूप वहाँ लिंग की प्रतिष्ठा हुई। इस पवित्र प्रतिष्ठा के केवल दर्शन मात्र से जन्म-संसार के बंधन से मुक्ति का प्रतिपादन किया गया है। साथ ही, इस लोक में इच्छित सिद्धि तथा परलोक में कल्याणकारी फल की प्राप्ति भी फलश्रुति में कही गई है।

Kṣetrapāleśvara-māhātmya (The Glory of Kṣetrapāleśvara)
ईश्वर महादेवी को क్షेत्रपालेश्वर नामक एक श्रेष्ठ तीर्थ-स्थान का उपदेश देते हैं। यह सिद्धेश्वर के निकट, पूर्व दिशा में थोड़ी दूरी पर स्थित है—ऐसा बताकर वहाँ जाने की विधि बताते हैं। शुक्ल-पंचमी के दिन वहाँ दर्शन करके, सुगंध और पुष्प आदि से क्रमपूर्वक विधिवत् पूजा करनी चाहिए। इसके बाद अपनी सामर्थ्य के अनुसार विविध अन्नों से ब्राह्मणों को भोजन कराना—यही इस अध्याय का दान-धर्म है, जिससे व्यक्तिगत भक्ति और लोक-कल्याण एक साथ जुड़ते हैं। अंत में यह प्राभास खण्ड के प्राभासक्षेत्र-माहात्म्य का 181वाँ अध्याय बताया गया है, जो स्कन्दमहापुराण के तीर्थ-वर्णन की क्रमबद्ध परंपरा को सूचित करता है।

वसुनन्दा-मातृगण-श्रीमुख-विवर-माहात्म्य (Vasunandā Mothers and the Śrīmukha Cleft: Sacred Significance)
अध्याय 182 प्राभास-क्षेत्र के भीतर एक सूक्ष्म तीर्थ-निर्देश देता है। इसमें कहा गया है कि दक्षिण दिशा में, अर्क-स्थल के निकट, ‘वसुनन्दा’ नाम से अग्रणी मातृगण स्थित हैं—यात्री को उनका दर्शन करना चाहिए। आश्वयुज मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को संयमी भक्त शुद्ध विधि से, एकाग्र और शांत मन से उन माताओं की पूजा करे। ऐसा करने से ‘समृद्धि’ प्राप्त होती है, जो असंयमी जनों के लिए दुर्लभ बताई गई है। इसके बाद पास ही ‘श्रीमुख’ से संबद्ध पवित्र विवर (दरार/गुहा) का उल्लेख कर, सिद्धि चाहने वालों को उसी दिन उसका भी पूजन करने का विधान बताया गया है।

त्रिसंगममाहात्म्यवर्णनम् | The Glory of Trisaṅgama (Threefold Confluence)
अध्याय 183 में ईश्वर देवी को ‘मिश्र-तीर्थ’ नामक परम तीर्थ का उपदेश देते हैं, जो ‘त्रिसंगम’ के रूप में प्रसिद्ध है—जहाँ सरस्वती, हिरण्या और समुद्र का संगम होता है। इसे देवताओं के लिए भी दुर्लभ, सभी तीर्थों में प्रधान बताया गया है; विशेषकर सूर्य-पर्व के अवसर पर यहाँ किया गया स्नान, दान और जप ‘कोटि-गुणा’ फल देने वाला कहा गया है, और इसकी प्रभावशीलता कुरुक्षेत्र से भी अधिक मानी गई है। मंकीश्वर-लिंग की निकटता का महत्त्व बताते हुए कहा गया है कि उस सीमा तक असंख्य तीर्थ विद्यमान हैं। साथ ही यह भी प्रतिपादित है कि समाज में तिरस्कृत या हाशिये पर पड़े प्राणी भी इस तीर्थ के प्रभाव से स्वर्गफल प्राप्त कर लेते हैं—यह इसकी रूपांतरकारी शक्ति का संकेत है। यात्रा-फल की सिद्धि हेतु आचार बताया गया है—उपयोग किए वस्त्र, स्वर्ण और गौ का दान ब्राह्मण को करना चाहिए, तथा कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को पितृ-तर्पण करना चाहिए। अंत में त्रिसंगम को महापाप-नाशक, विशेषतः वैशाख में अत्यंत फलदायक कहा गया है, और पाप-क्षय व पितृ-तृप्ति के लिए वृषोत्सर्ग (बैल का विधिपूर्वक दान/मुक्ति) की प्रशंसा की गई है।

मंकीश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Mankīśvara Māhātmya (Account of the Glory of Mankīśvara)
ईश्वर देवी से कहते हैं कि त्रिसंगम के निकट ‘मंकीश्वर’ नाम का अत्यन्त पापनाशक तीर्थ है। वहाँ मंकी नामक महर्षि, जो तपस्वियों में श्रेष्ठ थे, प्रभास को शंकर का प्रिय महाक्षेत्र जानकर मूल‑कन्द‑फल के आहार पर दीर्घकाल तक कठोर तप करते रहे। लम्बे समय के बाद उन्होंने महादेव को लिंगरूप में प्रतिष्ठित किया। प्रसन्न होकर शिव ने वर माँगने को कहा; मुनि ने प्रार्थना की कि मेरे नाम से प्रसिद्ध होकर आप इसी स्थान पर लिंगरूप में युगों तक विराजमान रहें। शिव ने स्वीकार किया और वहीं अंतर्धान होकर स्थित हो गए; तभी से वह लिंग ‘मंकीश्वर’ कहलाया। माघ मास की त्रयोदशी या चतुर्दशी को पाँच उपचारों से पूजन करने पर मनोवांछित फल मिलता है। पूर्ण यात्रा‑फल चाहने वाले तीर्थयात्री वहाँ गो‑दान करें—ऐसा विधान बताया गया है।

Devamātā Sarasvatī in Gaurī-Form at the Nairṛta Quarter (Worship, Feeding, and Golden Sandal Dāna)
इस अध्याय में ईश्वर महादेवी को प्रभास-क्षेत्र में देवमाता सरस्वती के स्थानीय प्राकट्य का उपदेश देते हैं। वे ‘देवमाता’ कहलाती हैं और संसार में सरस्वती नाम से पूजित हैं; नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) दिशा में गौरी-रूप धारण कर पादुका-आसन पर विराजमान बताई गई हैं। उनके रूप में ‘वडवा’ (वडवानल) की छवि का संकेत भी आता है और कारण बताया जाता है कि जैसे माता भय से रक्षा करती है, वैसे ही देवों की वडवानल-भय से रक्षा होने के कारण विद्वान उन्हें देवमाता कहते हैं। माघ शुक्ल तृतीया को जो संयमी पुरुष या शीलवती, संयत स्त्री उनका पूजन करे, उसे अभीष्ट फल प्राप्त होते हैं। आगे अतिथि-सत्कार का पुण्य कहा गया है—पायस, शर्करा आदि से युक्त भोजन द्वारा एक दम्पति को तृप्त करने से महान गौरी-भोजन-व्रत के समान फल मिलता है। अंत में उसी तीर्थ में सुचरित्र ब्राह्मण को सुवर्ण-पादुका का दान करने की विधि बताई गई है।

Nāgasthāna-māhātmya (Glory of the Nāga Station at Tri-saṅgama)
ईश्वर देवी से कहते हैं कि मङ्कीश के पश्चिम में त्रि-संगम से जुड़ा एक परम पवित्र नाग-स्थान है, जो अत्यन्त पाप-नाशक और प्रभावशाली है; वहाँ जाना चाहिए। इसी प्रसंग में बलभद्र की कथा आती है—कृष्ण के देहावसान का समाचार सुनकर वे प्रभास आते हैं, क्षेत्र की अद्भुत महिमा और यादवों के विनाश को देखकर वैराग्य धारण करते हैं। वे शेष-नाग के रूप में शरीर त्यागकर परम त्रि-संगम तीर्थ पहुँचते हैं, वहाँ पाताल का एक महान द्वार-सा मुख देखते हैं और शीघ्र ही उसमें प्रवेश कर अनन्त के लोक में चले जाते हैं। उनके नाग-रूप में प्रवेश करने से यह स्थान ‘नागस्थान’ कहलाया; और जहाँ उन्होंने देह छोड़ा वह ‘शेषस्थान’ प्रसिद्ध हुआ, जो नागरादित्य के पूर्व में है। विधि बताई गई है—त्रि-संगम में स्नान, नागस्थान का पूजन, पंचमी को संयमित आहार सहित उपवास, श्राद्ध, तथा यथाशक्ति ब्राह्मण को दक्षिणा देना। फल में संकट-निवारण और रुद्रलोक-प्राप्ति कही गई है; साथ ही शेष-नाग को समर्पित मधुयुक्त खीर-भात आदि से ब्राह्मण-भोजन कराने पर ‘करोड़ों’ को भोजन कराने के समान पुण्य बताया गया है, जिससे दान की महिमा दृढ़ होती है।

प्रभासपञ्चकमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of the Five Prabhāsas
अध्याय 187 शिव–देवी के तत्त्वसंवाद के रूप में है। ईश्वर प्रभास-पञ्चक नामक तीर्थ-परिक्रमा का वर्णन करते हैं—मुख्य प्रभास, वृद्ध-प्रभास, जल-प्रभास और कृतस्मर-प्रभास (श्मशान/भैरव-परिसर से सम्बद्ध) आदि पाँच प्रभास-स्थल। श्रद्धापूर्वक इनका दर्शन-भ्रमण करने से जरा-मरण से परे, पुनर्जन्म-रहित अवस्था प्राप्त होती है। साथ ही तीर्थ-व्रत की विधि बताई जाती है—प्रभास में समुद्र-स्नान, विशेषतः अमावस्या तथा चतुर्दशी/पञ्चदशी को, रात्रि-जागरण, यथाशक्ति ब्राह्मण-भोजन, और दान (विशेषकर गौ व सुवर्ण), जिससे यात्रा का पुण्य धर्मपूर्वक बढ़े। देवी प्रश्न करती हैं कि जब एक प्रभास प्रसिद्ध है तो पाँच क्यों? तब कारण-कथा कही जाती है। शिव दिव्य रूप में दारुक वन में प्रवेश करते हैं; ऋषि गृहस्थ-व्यवस्था में विघ्न मानकर क्रुद्ध होते हैं और शाप देते हैं, जिससे शिव का लिङ्ग गिर पड़ता है। उसके गिरते ही पृथ्वी डोलती है, समुद्र उफनता है, पर्वत फटने लगते हैं। देवता पहले ब्रह्मा, फिर विष्णु और अंत में शिव की शरण लेते हैं। शिव कहते हैं कि शाप का प्रतिकार न करो, गिरे हुए लिङ्ग की ही पूजा करो। देवता उस लिङ्ग को प्रभास में लाकर स्थापित करते हैं, पूजन करते हैं और उसकी तारक-शक्ति का घोष करते हैं। अंत में इन्द्र के आवरण/अवरोध से मनुष्यों का स्वर्गगमन घटने की बात कहकर, प्रभास के महोदय को सर्वपाप-नाशक और सर्वकाम-फलदायक बताकर अध्याय समाप्त होता है।

Rudreśvaramāhātmya (Glorification of Rudreśvara)
इस अध्याय में प्रभास-क्षेत्र के भीतर एक संक्षिप्त यात्रा-निर्देश दिया गया है। ईश्वर देवी से कहते हैं कि आदि-प्रभास से तीन धनुष-प्रमाण दूरी पर पृथ्वी पर ‘रुद्रेश्वर’ नाम का स्वयम्भू लिंग प्रतिष्ठित है; वहाँ जाकर उसका दर्शन और पूजन करना चाहिए। आगे स्थान-माहात्म्य का कारण बताया गया है—रुद्र ने ध्यान में स्थित होकर अपना ही तेज वहाँ स्थापित/न्यस्त किया, इसलिए यह तीर्थ मानव-निर्मित नहीं, दिव्य सन्निधि से पवित्र है। अंत में फलश्रुति है कि रुद्रेश्वर का दर्शन-पूजन समस्त पापों का नाश करता है और भक्त को इच्छित फल प्रदान करता है।

कर्ममोटीमाहात्म्यवर्णनम् — Karmamoṭī Māhātmya (Glorification of Karmamoṭī)
अध्याय 189 प्राभास-क्षेत्र के भीतर एक विशिष्ट तीर्थ का संक्षिप्त, स्थान-आधारित माहात्म्य बताता है। ईश्वर पश्चिम दिशा में “अधिक दूर नहीं” स्थित एक देवालय-समूह का निर्देश करते हैं, जहाँ चण्डिका और कर्ममोटी देवी साथ विराजती हैं तथा कोटि-कोटि योगिनियों की विशाल सभा से वह स्थान संयुक्त है। इस स्थल को पिठ-त्रय के रूप में भी कहा गया है—आदि, त्रिलोकों में पूजित और इसलिए स्थानीय होते हुए भी सर्वमान्य महिमा वाला। विधान यह है कि नवमी तिथि को देवी-पिठ और योगिनी-समूह का पूर्ण पूजन करना चाहिए। फलश्रुति स्पष्ट है—उपासक को सभी अभीष्ट सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं और वह स्वर्ग में दिव्य स्त्रियों को प्रिय होता है; यह वचन उचित काल-देश में किए गए कर्म से स्वर्ग्य पुण्य और शुभ फल की प्राप्ति का संकेत देता है।

मोक्षस्वामिमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of Mokṣasvāmin (Liberation-Granting Hari)
ईश्वर देवी को प्राभास-क्षेत्र में नैरृत (दक्षिण-पश्चिम) दिशा में, मुख्य पुण्य-प्रदेश से कुछ ही दूर स्थित हरि के मोक्षदायक स्वरूप ‘मोक्षस्वामी’ का उपदेश देते हैं। वे बताते हैं कि एकादशी के दिन जिताहार (संयमित आहार) रखने वाला भक्त विधिपूर्वक पूजन करे, और विशेष रूप से माघ मास में यह व्रत अत्यन्त फलदायी है। इस उपासना का फल अग्निष्टोम यज्ञ के फल के समान कहा गया है। आगे उसी स्थान पर अनशन तथा चान्द्रायण आदि व्रतों का आचरण अन्य तीर्थों की अपेक्षा कोटि-गुण फल देने वाला, तथा मनोवांछित सिद्धि प्रदान करने वाला बताया गया है। अंत में इसे स्कन्दपुराण के प्राभासखण्ड, प्राभासक्षेत्रमाहात्म्य में स्थित अध्याय के रूप में संकलित किया गया है।

अजीगर्तेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Ajeegarteśvara Māhātmya (Glorification of Ajeegarteśvara)
इस अध्याय में प्रभास-खण्ड की तीर्थ-यात्रा के क्रम में संक्षिप्त निर्देश दिया गया है। ईश्वर देवी से कहते हैं कि चन्द्रवापी नामक पवित्र जल-स्रोत के समीप तथा एक अन्य प्रसिद्ध स्थल-चिह्न के निकट स्थित हर-स्वरूप अजीगर्तेश्वर के दर्शन हेतु आगे बढ़ो। वहाँ पहुँचकर संबंधित जल में स्नान करने और फिर शिवलिङ्ग की पूजा करने का सरल विधान बताया गया है। स्नान के बाद की गई लिङ्ग-पूजा से घोर पापों का नाश होता है और अंततः साधक को शिवपद की उत्तम प्राप्ति होती है—इसी फलश्रुति के द्वारा इस तीर्थ का माहात्म्य स्थापित किया गया है।

Viśvakarmeśvara-māhātmya (विश्वकर्मेश्वरमाहात्म्य) — The Glory of Viśvakarmeśvara
इस अध्याय में ईश्वर देवी से धर्म-तत्त्व का उपदेश करते हुए उन्हें (और तीर्थयात्री पाठक को) विश्वकर्मा द्वारा प्रतिष्ठित एक विशेष लिंग के दर्शन का निर्देश देते हैं। यह महाप्रभावशाली लिंग मोक्षस्वामिन् के उत्तर में स्थित बताया गया है और ‘पाँच धनुष’ की दूरी का संकेत देकर मार्ग-क्रम की स्पष्टता भी दी गई है। ग्रंथ में दर्शन-प्रधान फलश्रुति कही गई है—जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक उस लिंग का सम्यक् दर्शन करता है, उसे तीर्थयात्रा का फल प्राप्त होता है; तथा वाचिक और मानसिक दोनों प्रकार के पाप उस दर्शन से नष्ट हो जाते हैं। अंत में कोलोफोन द्वारा इसे स्कन्दमहापुराण के प्राभास खण्ड, प्रथम प्राभासक्षेत्रमाहात्म्य के अंतर्गत ‘विश्वकर्मेश्वर-माहात्म्य’ नामक अध्याय के रूप में, 81,000 श्लोकों वाले संकलन में स्थित बताया गया है।

Yameśvara-māhātmya-varṇanam (Glorification of Yameśvara)
इस अध्याय में ईश्वर स्वयं महादेवी से प्रत्यक्ष धर्म-तत्त्व का उपदेश करते हैं। प्रभास-क्षेत्र में तीर्थयात्री को किस क्रम से चलना चाहिए, यह बताते हुए वे यमेश्वर के दर्शन का विधान करते हैं और उसे “अनुत्तम” अर्थात् सर्वोत्तम कहते हैं। साथ ही मंदिर का स्थान भी बताया गया है—नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) दिशा में, अधिक दूर नहीं—जिससे यह वर्णन मार्गदर्शक और अनुष्ठान-सूचक बन जाता है। फलश्रुति संक्षेप में स्पष्ट है: केवल यमेश्वर के दर्शन से पाप-शमन होता है और वह सभी इच्छित कामनाओं का फल देने वाला (सर्वकाम-फल-प्रद) कहा गया है। अंत में कोलफन में इसे स्कन्दमहापुराण के प्रभासखण्ड, प्रभास-क्षेत्र-माहात्म्य के अंतर्गत “यमेश्वर-माहात्म्य-वर्णन” अध्याय के रूप में निर्दिष्ट किया गया है।

अमरेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् (Amareśvara Māhātmya—Description of the Glory of Amareśvara)
इस अध्याय में ईश्वर महादेवी को उस लिंग का उपदेश देते हैं जिसे “देवों द्वारा प्रतिष्ठित” कहा गया है। क्षेत्र के “प्रभाव” का ज्ञान पापों के नाश से जोड़ा गया है, और अमरेश्वर-तीर्थ की महिमा को स्पष्ट धर्म-आचार के रूप में बताया गया है। लिंग के निमित्त उग्र तप करने की विधि कही गई है; उसके दर्शन से यात्री कृतकृत्य, अर्थात् धार्मिक रूप से पूर्ण, माना जाता है। आगे वेदपारग ब्राह्मण को गोदान करने की प्रशंसा है, क्योंकि उचित पात्र को दिया गया दान यात्रा के फल को और अधिक पुष्ट व ऊर्जित करता है।

वृद्धप्रभासमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of Vṛddha Prabhāsa (Origin and Merit)
यह अध्याय शैव संवाद के रूप में है। ईश्वर बताते हैं कि नियमपूर्वक चलने वाला यात्री आदिप्रभास के दक्षिण स्थित वृद्धप्रभास जाए। वहाँ “चतुर्मुख” नामक प्रसिद्ध लिंग मात्र दर्शन से पापहर माना गया है। श्रीदेवी नाम की उत्पत्ति तथा दर्शन, स्तुति और पूजन के फल पूछती हैं। ईश्वर प्राचीन मन्वंतर और त्रेतायुग की कथा कहते हैं। उत्तर दिशा से आए ऋषि प्रभास के दर्शन हेतु पहुँचे, पर इन्द्र के वज्र-संबंध से लिंग छिपा हुआ मिला। दर्शन बिना लौटने से इनकार कर उन्होंने ऋतुओं के पार कठोर तप किया—ब्रह्मचर्य, नियम, शीत-उष्ण सहन आदि—और वे वृद्धावस्था को पहुँच गए। उनकी अटल निष्ठा देखकर शंकर ने करुणा से पृथ्वी को विदीर्ण कर अपना लिंग प्रकट किया; दर्शन पाकर ऋषि स्वर्गलोक को गए। इन्द्र ने फिर छिपाने का प्रयास किया, पर वृद्धभाव में दर्शन प्राप्त होने से वह स्थान “वृद्धप्रभास” कहलाया। फलश्रुति में कहा है कि भक्तिभाव से वहाँ का दर्शन राजसूय और अश्वमेध यज्ञों के तुल्य पुण्य देता है; पूर्ण फल चाहने वालों के लिए ब्राह्मण को उक्षा (बैल) का दान श्रेष्ठ बताया गया है।

जलप्रभासमाहात्म्यवर्णनम् | Jala-Prabhāsa: The Māhātmya of the Water-Prabhāsa Tīrtha
ईश्वर देवी को वृद्ध-प्रभास के दक्षिण स्थित जल-आधारित प्रभास-तीर्थ की ओर निर्देश करते हैं और उसके ‘उत्तम’ माहात्म्य का वर्णन करते हैं। कथा का केंद्र जामदग्न्य राम (परशुराम) हैं, जो क्षत्रियों के महान संहार के बाद भीतर से घृणा और ग्लानि से व्याकुल होकर अनेक वर्षों तक महादेव की कठोर तपस्या और आराधना करते हैं। शिव प्रसन्न होकर प्रकट होते हैं और वर देते हैं। राम शिव के अपने लिंग के दर्शन की याचना करते हैं, जिसका वर्णन है कि इन्द्र भयवश उसे बार-बार वज्र से ढँक देता है। शिव उस रूप में प्रत्यक्ष लिंग-दर्शन नहीं देते, पर उपाय बताते हैं—इस तीर्थ का स्पर्श करके और पवित्र जल से प्रकट होने वाले लिंग के समीप जाकर राम का दुःख और पाप नष्ट होगा। तब जल से एक महान लिंग प्रकट होता है और यह स्थान ‘जल-प्रभास’ नाम से प्रसिद्ध हो जाता है। अंत में फलश्रुति है—केवल तीर्थ-स्पर्श से शिवलोक की प्राप्ति होती है, और वहाँ एक भी सदाचारी ब्राह्मण को भोजन कराना उमासहित शिव को भोजन कराने के समान है। यह आख्यान पाप-शमन करने वाला और सर्वकाम-फल देने वाला कहा गया है।

जमदग्नीश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Jamadagniśvara: Account of the Sacred Merit
इस अध्याय में ईश्वर देवी को वृद्ध-प्रभास के निकट स्थित जमदग्नीश्वर शिव के तीर्थ-गमन का उपदेश देते हैं। यह क्षेत्र महर्षि जमदग्नि द्वारा प्रतिष्ठित, सर्व-पाप-उपशमन करने वाला बताया गया है; और देव के केवल दर्शन से ही पुराणोक्त ‘ऋण-त्रय’ से मुक्ति का फल कहा गया है। इसके बाद ‘निधाना-वापी’ नामक जल-तीर्थ का वर्णन है। वहाँ स्नान और पूजा करने से धन-समृद्धि तथा इच्छित प्रयोजनों की सिद्धि बताई गई है। पाण्डवों द्वारा प्राचीन काल में निधि (खजाना) प्राप्त होने से इस वापी का नाम और यश प्रसिद्ध हुआ, और इसे ‘त्रैलोक्य-पूजित’ कहा गया। अंत में फलश्रुति में स्नान से दुर्भाग्य का नाश होकर सौभाग्य की प्राप्ति तथा मनोवांछित फल मिलने की बात कही गई है।

Pañcama-prabhāsa-kṣetra-māhātmya: Mahāprabhāsa, Tejas-udbhava, and the Spārśa-liṅga Tradition
ईश्वर महादेवी से संवाद में महाप्रभास नामक परम पवित्र क्षेत्र का वर्णन करते हैं। यह जलप्रभास के दक्षिण में स्थित है और यम के मार्ग को रोकने वाला—अर्थात् रक्षक तथा मोक्षदायक—कहा गया है। त्रेता-युग में यहाँ दिव्य तेज से युक्त स्पार्श-लिङ्ग का स्मरण है, जिसके स्पर्श मात्र से मुक्ति प्राप्त होती है। कालान्तर में भयभीत इन्द्र वहाँ आकर वज्र-सदृश आवरण/अवरोध से लिङ्ग को ढक देता है; तभी अनियंत्रित उष्मा-तेज प्रकट होकर ज्वालामुखी-से लिङ्गरूप में फैलता है और धुएँ-अग्नि से तीनों लोकों को व्याकुल कर देता है। देवगण और वेदवेत्ता ऋषि शशिशेखर शिव की स्तुति कर प्रार्थना करते हैं कि यह स्वदाहक तेज संयमित हो, जिससे सृष्टि प्रलय में न डूबे। तब वह तेज पाँच धाराओं में विभक्त होकर पृथ्वी को भेदते हुए पंच-प्रभास रूप में प्रकट होता है; निकास-मार्ग पर शिला-द्वार स्थापित कर दरार बंद की जाती है, धुआँ शांत होता है और लोक स्थिर हो जाते हैं, जबकि तेज वहीं सीमित रह जाता है। शिव की प्रेरणा से देव वहाँ लिङ्ग की प्रतिष्ठा करते हैं और वह स्थान महाप्रभास के नाम से प्रसिद्ध होता है। फलश्रुति में कहा है—विविध पुष्पों से भक्तिपूर्वक पूजन करने पर अक्षय परम पद मिलता है; केवल दर्शन से पाप नष्ट होते हैं और अभीष्ट सिद्ध होता है। दान में—संयमी ब्राह्मण को सुवर्ण-दान तथा विधिपूर्वक द्विज को गो-दान—‘जन्म-फल’ प्रदान करता है और राजसूय व अश्वमेध यज्ञों के तुल्य पुण्य देता है।

दक्षयज्ञविध्वंसनम् (Destruction/Disruption of Dakṣa’s Sacrifice) and the Etiology of Kṛtasmaradeva
इस अध्याय में तीर्थ-मार्गदर्शन के भीतर शिव–देवी का गूढ़ संवाद आता है। ईश्वर देवी को दक्षिण दिशा में सरस्वती के रमणीय तट पर स्थित एक स्वयम्भू-स्थल का संकेत करते हैं, जहाँ ‘कृतस्मरदेव’ नाम से प्रसिद्ध देवता पापों का शोधन करने वाले माने गए हैं। फिर काम के दहन के बाद रति का विलाप और शिव द्वारा यह आश्वासन कि दैवी अनुग्रह से आगे चलकर काम का पुनर्स्थापन होगा—यह कारण-कथा आरम्भ होती है। देवी पूछती हैं कि काम क्यों जला और पुनर्जन्म कैसे हुआ। तब शिव दक्ष के महायज्ञ का प्रसंग, वंश-परम्परा और घटनाक्रम बताते हैं—दक्ष द्वारा कन्याओं के विवाह-वितरण, देवताओं व ऋषियों का यज्ञ में एकत्र होना, और कपाल-भस्म आदि तपस्वी-चिह्नों के कारण शिव का अपमानपूर्वक बहिष्कार। इससे सती क्रुद्ध होकर योग-तप से देह-त्याग करती हैं। तदनन्तर शिव वीरभद्र-प्रमुख उग्र गणों को यज्ञ-विध्वंस हेतु भेजते हैं। देवताओं से युद्ध होता है; विष्णु का सुदर्शन भी निगल लिया जाता है, और रुद्र के वरदान से वीरभद्र अवध्य रहता है। शिव त्रिशूल लेकर आगे बढ़ते हैं; देव पीछे हटते हैं, ब्राह्मण रुद्र-मन्त्रों से रक्षाहोम करते हैं, पर यज्ञ नष्ट हो जाता है। अंत में यज्ञ मृग-रूप में भागता है और आकाश में तारकासदृश रूप से आज भी दिखाई देने वाला चिर-चिह्न बताया गया है।

कामकुण्डमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of Kāma Kuṇḍa
शिव–देवी संवाद में यह अध्याय यज्ञ-विघ्न के बाद उत्पन्न संकट का वर्णन करता है। तारकासुर देवताओं को पराजित कर स्वर्ग से निकाल देता है और लोकों में अशांति फैलाता है। देवता ब्रह्मा की शरण लेते हैं; ब्रह्मा बताते हैं कि इस संकट का समाधान केवल शंकर की शक्ति से होगा और हिमालय-कन्या के साथ शिव के भावी संयोग से ही तारक-वध करने वाला उत्पन्न होगा। उस संयोग को प्रेरित करने हेतु वसंत के साथ कामदेव को भेजा जाता है; पर शिव के समीप पहुँचते ही शिव के तृतीय नेत्र से निकली अग्नि से काम भस्म हो जाता है। इसके बाद शिव शुभ प्राभासिक-क्षेत्र में निवास करते हैं और वह स्थान इस घटना का पावन स्मारक बन जाता है। रति विलाप करती है; आकाशवाणी उसे आश्वस्त करती है कि काम ‘अनंग’ रूप में, देह के बिना, पुनः कार्य करेगा। देव सृष्टि-व्यवस्था के विघ्न की बात रखते हैं; शिव स्पष्ट करते हैं कि काम बिना शरीर के भी सृष्टि-क्रम चलाएगा, और पृथ्वी पर एक लिंग प्रकट होकर इस प्रसंग का चिह्न बनता है। इसे ‘कृतस्मरा’ नाम से जोड़ा गया है तथा आगे स्कंद के जन्म और तारक-वध का संकेत मिलता है। अंत में कृतस्मरा के दक्षिण स्थित ‘कामकुंड’ में स्नान तथा वेदज्ञ ब्राह्मणों को गन्ना, स्वर्ण, गौ और वस्त्र का नियत दान बताया गया है, जिससे अमंगल दूर होकर शुभ फल प्राप्त होते हैं।

कालभैरवस्मशानमाहात्म्यवर्णनम् (The Māhātmya of Kālabhairava’s Great Cremation-Ground)
इस अध्याय में ईश्वर (शिव) प्रभास-क्षेत्र के एक विशिष्ट स्थान का माहात्म्य बताते हैं—कालभैरव से संबद्ध महाश्मशान और उसके निकट स्थित ब्रह्म-कुण्ड। शिव वहाँ मङ्कीश्वर की सन्निधि का भी उल्लेख करते हुए इस क्षेत्र की शैव-प्रधान महिमा प्रकट करते हैं। मुख्य प्रतिज्ञा मोक्ष से जुड़ी है: जो प्राणी वहाँ मरते हैं या जिनका दाह-संस्कार वहाँ होता है, वे काल-विपर्यय या अकाल-मृत्यु जैसी प्रतिकूल स्थितियों में भी मुक्ति को प्राप्त होते हैं। यहाँ तक कि ग्रंथ की नैतिक श्रेणी में ‘महापातकी’ माने गए लोग भी इस स्थान-प्रभाव से उद्धार पाते हैं। शिव ‘कृतस्मरता’—भगवद्स्मरण में प्रतिष्ठा—को इस फल का आधार बताते हैं और श्मशान को ‘अपुनर्भव-दायक’ (पुनर्जन्म से मुक्त करने वाला) क्षेत्र कहते हैं। विषुव-काल को भी इस स्थान के लिए विशेष पुण्य-समय बताया गया है, और अंत में शिव इस प्रिय क्षेत्र के प्रति अपनी स्थायी आसक्ति घोषित करते हैं, इसे इस प्रसंग में अविमुक्त से भी अधिक प्रिय बताते हुए।

रामेश्वरमाहात्म्य — Rāmeśvara at Prabhāsa and the Pratiloma Sarasvatī Purification
ईश्वर देवी को प्रभास क्षेत्र में सरस्वती के निकट स्थित रामेश्वर के स्थान और महत्त्व का वर्णन करते हैं। कथा में बलभद्र (राम/हलायुध) पाण्डव–कौरव संघर्ष में पक्ष न लेकर द्वारका लौट आते हैं; मद्य के प्रभाव से वे एक रमणीय वन-विहार में पहुँचते हैं। वहाँ वे विद्वान ब्राह्मणों को सूत के मुख से पुराण-कथा सुनते देखते हैं; क्रोध में आकर बलभद्र सूत का वध कर देते हैं, फिर उसे ब्रह्महत्या-सदृश पाप मानकर शोक करते हैं और उसके धर्मिक व शारीरिक दुष्परिणामों का स्मरण करते हैं। इसके बाद प्रायश्चित्त का तत्त्व बताया जाता है—जानबूझकर और अनजाने में हुई हिंसा का भेद, प्रायश्चित्त की विभिन्न श्रेणियाँ, तथा व्रत का महत्त्व। एक अशरीरी वाणी उन्हें प्रभास जाने की आज्ञा देती है, जहाँ पाँच धाराओं वाली प्रतिलोमा सरस्वती पाँच महापातकों का नाश करने वाली कही गई है और अन्य तीर्थ उसकी तुलना में अपर्याप्त बताए गए हैं। बलभद्र वहाँ तीर्थ-यात्रा, दान, सरस्वती–समुद्र संगम में स्नान करके महान लिंग की स्थापना व रामेश्वर-पूजन करते हैं और शुद्ध हो जाते हैं। फलश्रुति में कहा है कि रामेश्वर लिंग की उपासना पापहर है; अष्टमी को ब्रह्मकूर्च-विधि सहित व्रत करने से अश्वमेध-समान पुण्य मिलता है; तथा स्नान, पूजन और गोदान पूर्ण यात्रा-फल चाहने वालों के लिए श्रेष्ठ हैं।

मंकीश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Mankīśvara Māhātmya (Glory of the Mankīśvara Liṅga)
ईश्वर देवी से मंकीश्वर तीर्थ की यात्रा का वर्णन करते हैं। यह रामेश के उत्तर में, देवमातृ-स्थल के निकट है; अर्क-स्थल और कृत-स्मर से भी दिशा-संकेत दिए गए हैं। प्राचीन काल में कुब्ज (झुके शरीर) ब्राह्मण मंकी ने दीर्घ तप और नित्य पूजन से इस शिवलिंग की स्थापना की थी। वर्षों की आराधना के बाद भी संतोष न मिलने से वह व्याकुल हुआ और जप-ध्यान सहित कठोर साधना को वृद्धावस्था तक बढ़ाता रहा। अंततः शिव प्रकट होकर बताते हैं कि मंकी के लिए वृक्ष-शाखाओं तक पहुँचना कठिन है, इसलिए अन्य तपस्वियों की तरह बहुत-से फूल जुटाना संभव नहीं; पर भक्ति से अर्पित एक ही पुष्प भी समस्त यज्ञों के फल के समान है। साथ ही लिंग-पूजा का त्रिमूर्ति-समन्वय बताया जाता है—लिंग के दाहिने ब्रह्मा, बाएँ विष्णु और मध्य में शिव स्थित हैं; अतः लिंगार्चन से त्रिदेवों की संयुक्त पूजा होती है। बिल्व, शमी, करवीर, मालती, उन्मत्तक, चम्पक, अशोक, कह्लार आदि सुगंधित पुष्प प्रिय अर्पण कहे गए हैं। मंकी वर माँगता है कि जो भी यहाँ स्नान करके इस लिंग पर जल मात्र भी चढ़ाए, उसे सभी प्रकार की उपासना का फल मिले, और पास में दिव्य व लौकिक वृक्ष उपस्थित रहें। शिव वरदान देकर कहते हैं कि सर्व नागों की उपस्थिति से यह स्थान ‘नाग-स्थान’ कहलाएगा, फिर अंतर्धान हो जाते हैं। मंकी देह त्यागकर शिवलोक को प्राप्त होता है। अध्याय का फलश्रुति है कि श्रद्धा से यह माहात्म्य सुनने पर पाप नष्ट होते हैं।

Sarasvatī-māhātmya and the Ritual Order of Dāna–Śrāddha at Prabhāsa (सरस्वतीमाहात्म्यं दानश्राद्धविधिक्रमश्च)
यह अध्याय प्रश्न–उत्तर रूप में है। देवी सरस्वती के माहात्म्य का विस्तृत वर्णन चाहती हैं और तीर्थ-आचरण के सूक्ष्म प्रश्न पूछती हैं—‘मुख-द्वार’ से प्रवेश का पुण्य, स्नान और दान के फल, अन्य स्थान पर निमज्जन का परिणाम, तथा श्राद्ध की विधि: नियम, मंत्र, योग्य पुरोहित, उपयुक्त भोजन और दान की अनुशंसा। ईश्वर दान–श्राद्ध के क्रमबद्ध विधान को बताने का आश्वासन देते हैं। इसके बाद ईश्वर सरस्वती की पवित्रता का बहुस्तरीय स्तवन करते हैं। सरस्वती-जल को अत्यन्त पुण्यदायक कहा गया है, विशेषतः समुद्र-संगम में उसका महत्त्व देवताओं के लिए भी दुर्लभ बताया गया है; वह सांसारिक सुख देने वाली और शोक-नाशिनी मानी गई है। वैशाख मास और सोम-सम्बन्धी व्रतों की दुर्लभता पर बल देकर कहा गया है कि प्रभास में सरस्वती की प्राप्ति अन्य तप और प्रायश्चित्तों से भी श्रेष्ठ है। फलश्रुति में कहा गया है कि जो सरस्वती-जल में निवास/स्नान-निष्ठा रखते हैं, वे दीर्घकाल तक विष्णुलोक में वास पाते हैं; और जो प्रभास में सरस्वती को देख नहीं पाते, उन्हें आध्यात्मिक दृष्टि से वंचित के समान कहा गया है। सरस्वती को विशाल ज्ञान और निर्मल विवेक के समान उपमा देकर, उनके संगम-तीर्थ में स्नान और दान को महान यज्ञों के तुल्य फलदायक बताया गया है; सरस्वती-जल से स्नात जन भाग्यवान और सम्मान के योग्य कहे गए हैं।

श्राद्धविधि-काल- पात्र- ब्राह्मणपरीक्षा (Śrāddha: timing, requisites, and examination of eligible Brāhmaṇas)
अध्याय 205 में देवी, ईश्वर से श्राद्ध की पुण्यदायी विधि पूछती हैं—विशेषकर दिन के उचित समय और प्रभास/सरस्वती तीर्थ में उसके विधान के विषय में। ईश्वर दिन के मुहूर्तों का वर्णन करके मध्याह्न के निकट ‘कुटप-काल’ को अत्यन्त फलदायक बताते हैं और संध्या समय श्राद्ध करने से निषेध करते हैं। वे श्राद्ध के रक्षात्मक-पवित्र साधनों में कुश/दर्भ और काले तिल का महत्व बताते हैं तथा ‘स्वधा-भवन’ समय का संकेत देते हैं। श्राद्ध के तीन प्रशंसित ‘पावन’—दौहित्र, कुटप और तिल—कहे गए हैं; साथ ही शुद्धि, क्रोध-रहितता और उतावलेपन से बचना जैसे गुणों पर बल है। अध्याय में धन की शुद्धता के अनुसार शुक्ल/शम्बल/कृष्ण भेद करके कहा गया है कि अन्याय से प्राप्त धन से किया गया श्राद्ध पितरों को तृप्त नहीं करता, बल्कि अशुभ प्राणियों की ओर फल चला जाता है। फिर पात्र-निर्णय में योग्य, विद्वान, संयमी ब्राह्मणों की प्रशंसा और अपात्र (अपाङ्क्तेय) आचरण, व्यवसाय और नैतिक दोषों की विस्तृत सूची दी गई है; अंत में बताया गया है कि गलत चयन से श्राद्ध का फल नष्ट हो जाता है।

Śrāddha-vidhi-varṇana (श्राद्धविधिवर्णन) — Procedural Discourse on Śrāddha
इस अध्याय में ईश्वर श्राद्ध का, विशेषतः पार्वण-विधान का, तकनीकी और क्रमबद्ध निरूपण करते हैं। निमंत्रण-प्रक्रिया, पात्रता व आसन-व्यवस्था, शुद्धि-नियम, मुहूर्तों के अनुसार समय-निर्णय, तथा पात्र, समिधा, कुश, पुष्प, अन्न आदि के चयन का विस्तार से वर्णन है। साथ ही अनुचित सहभोजन, विधि-भंग और अशुद्धि जैसे दोषों से पितरों का ग्रहण निष्फल हो जाता है—ऐसी नैतिक चेतावनियाँ दी गई हैं। जप, भोजन, पितृकार्य आदि में मौन-नियम, देवकर्म और पितृकर्म की दिशानियमावली, तथा कुछ दोषों के व्यावहारिक परिहार भी बताए गए हैं। अध्याय में शुभ-अशुभ काष्ठ, पुष्प और खाद्य पदार्थों की सूची, कुछ प्रदेशों में श्राद्ध-वर्जना, तथा मलमास/अधिमास आदि के काल-प्रतिषेध और मास-गणना का स्पष्टीकरण मिलता है। अंत में मंत्रसमूह (सप्तार्चिस्-स्तुति सहित) और फलश्रुति दी गई है—प्रभास में सरस्वती–सागर संगम पर विधिपूर्वक पाठ व श्राद्ध से शुद्धि, सामाजिक-धार्मिक मान्यता, समृद्धि, स्मरण-शक्ति और आरोग्य की प्राप्ति कही गई है।

पात्रापात्रविचारवर्णनम् | Discernment of Worthy and Unworthy Recipients (Pātra–Apātra Vicāra)
इस अध्याय में प्रभास-क्षेत्र के प्रसंग में ईश्वर श्राद्ध-सम्बन्धी दानों का क्रम और उनके फल बतलाते हैं। पितरों के लिए किया गया दान तथा सरस्वती के पावन सान्निध्य में एक भी द्विज को भोजन कराना अत्यन्त पुण्यदायक कहा गया है। फिर धर्म-नीति का विस्तृत विवेचन आता है—नित्यकर्मों की उपेक्षा के दोष, भूमि-हरण की निन्दा, और निषिद्ध उपायों से कमाई के दुष्परिणाम। विशेष रूप से ‘वेद-विक्रय’ (वेदाध्ययन/अध्यापन का व्यापार) के प्रकार और उसके कर्मफल कठोर शब्दों में बताए गए हैं। साथ ही शुद्धि-नियम, अनुचित आजीविकाएँ, तथा निन्दित स्रोतों से अन्न-धन लेने या खाने के खतरे समझाए गए हैं। दान-धर्म में योग्य पात्र (श्रोत्रिय, गुणवान, शीलवान) चुनने की अनिवार्यता और अपात्र को दिया दान पुण्य को नष्ट कर देता है—यह सिद्धान्त स्थापित किया गया है। अंत में सत्य, अहिंसा, सेवा, संयमित भोग आदि गुणों की क्रमबद्ध नीति और अन्न, दीप, सुगन्ध, वस्त्र, शय्या आदि दानों के विशिष्ट फल बताकर कर्मकाण्ड को नैतिक शिक्षा से जोड़ा गया है।

दानपात्रब्राह्मणमाहात्म्यवर्णनम् (Glorification of Proper Giving, Worthy Recipients, and Brāhmaṇa Eligibility)
इस अध्याय में देवी दान का स्पष्ट वर्गीकरण पूछती हैं—क्या देना चाहिए, किसे, कब, कहाँ और किन पात्र-लक्षणों वाले को। ईश्वर निष्फल जन्म और निष्फल दान के भेद बताकर सत्जन्म तथा प्रशस्त दान की महिमा कहते हैं और षोडश महादानों का विधान बताते हैं—गौ, स्वर्ण, भूमि, वस्त्र, अन्न, तथा सुसज्जित गृह आदि का दान। फिर दान की भावना और द्रव्य की शुद्धि पर बल दिया गया है—अहंकार, भय, क्रोध या दिखावे से किया दान देर से या अल्प फल देता है; शुद्ध मन और धर्मपूर्वक अर्जित धन से किया दान शीघ्र फलदायक होता है। इसके बाद पात्र-लक्षण विस्तार से बताए गए हैं—वेदाध्ययन, योग-निष्ठा, शान्ति, पुराण-ज्ञान, करुणा, सत्य, शौच और संयम। गौदान में उत्तम गुणों वाली गाय का निर्देश है तथा दोषयुक्त, चुराई हुई या अनुचित रीति से प्राप्त गाय का दान निषिद्ध है; गलत दान के दुष्परिणाम भी बताए गए हैं। उपवास, पारण और श्राद्ध के समय-नियमों में सावधानी, तथा साधन या योग्य ब्राह्मण न मिलने पर श्राद्ध की अनुकूल विधि भी कही गई है। अंत में पाठक/आचार्य का सम्मान, शत्रु या अविनयी को ग्रंथ-उपदेश न देने की मर्यादा, और श्रद्धापूर्वक श्रवण व दान को कर्म-सिद्धि का अंग बताया गया है।

मार्कण्डेयेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Māhātmya of Mārkaṇḍeyeśvara (Foundation and Merit Narrative)
इस अध्याय में ईश्वर देवी से दो भागों में उपदेश करते हैं। पहले वे तीर्थ-मार्ग बताते हैं—सावित्री के पूर्व भाग के निकट, उत्तर दिशा में स्थित परम पावन मार्कण्डेयेश्वर के दर्शन करने को कहते हैं। पद्मयोनि ब्रह्मा की कृपा से ऋषि मार्कण्डेय पुराणोक्त अर्थ में अजर-अमर हुए; उन्होंने क्षेत्र की महिमा जानकर शिवलिंग की स्थापना की और पद्मासन में दीर्घ ध्यान-समाधि में स्थित रहे। युगों तक वायु-उड़ाई धूल से मंदिर ढँक गया; जागने पर ऋषि ने खुदाई कर महान द्वार पुनः खोलकर पूजा का मार्ग प्रकट किया। जो भक्तिभाव से प्रवेश कर वृषभध्वज शिव की पूजा करता है, वह महेश्वर के परम धाम को प्राप्त होता है। फिर देवी पूछती हैं—जब मृत्यु सबके लिए है, तब मार्कण्डेय ‘अमर’ कैसे कहलाते हैं? ईश्वर पूर्वकल्प की कथा सुनाते हैं—भृगुपुत्र मृकण्डु को एक सद्गुणी पुत्र मिला, जिसकी आयु केवल छह मास निश्चित थी। पिता ने उपनयन कराकर उसे नित्य प्रणाम-वंदन और मर्यादा का अभ्यास कराया। तीर्थयात्रा में सप्तर्षियों ने बाल ब्रह्मचारी को ‘दीर्घायु’ का आशीर्वाद दिया, पर उसकी अल्पायु जानकर वे चिंतित हुए और उसे ब्रह्मा के पास ले गए। ब्रह्मा ने विधान बताया—यह बालक मार्कण्डेय होगा, ब्रह्मा के समान आयु वाला, कल्प के आदि और अंत में सहचर। पिता का शोक मिटता है और कृतज्ञ भक्ति प्रकट होती है; साथ ही अनुशासन, दैवी अनुमोदन और क्षेत्र की सदा उपलब्ध उपासना का संदेश दृढ़ होता है।

Pulastyēśvaramāhātmya (The Glory of Pulastyēśvara) | पुलस्त्येश्वरमाहात्म्यम्
इस अध्याय में ईश्वर महादेवी को संक्षिप्त तीर्थ-उपदेश देते हैं। प्रभास-क्षेत्र के पवित्र मानचित्र में निर्दिष्ट दिशा और माप-चिह्न के अनुसार स्थित ‘उत्तम’ तीर्थ पुलस्त्येश्वर की ओर जाने का निर्देश है। वहाँ पहले दर्शन करने और फिर विधानतः (उचित विधि से) पूजा करने का क्रम बताया गया है। फलश्रुति में दृढ़ वचन है कि उपासक सात जन्मों के संचित पापों से मुक्त हो जाता है—“इसमें कोई संशय नहीं।” इस प्रकार यह अध्याय स्थान-निर्देश, पूजा-विधि और पापक्षय-फल को एक ही तीर्थ-एकक में जोड़ता है।

पुलहेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Pulahēśvara Māhātmya (Glorification of Pulahēśvara)
इस अध्याय में ईश्वर देवी को प्रभास-क्षेत्र में स्थित पुलहेश्वर तीर्थ का उपदेश देते हैं। वे बताते हैं कि यह शिव-स्थान नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) दिशा में, धनुष-प्रमाण से नापी हुई दूरी पर स्थित है; वहाँ जाकर भक्तिपूर्वक दर्शन और पूजन करना चाहिए। ईश्वर यह भी कहते हैं कि पुलहेश्वर की भक्ति-आधारित आराधना से यात्रा का पुण्यफल सिद्ध होता है। विशेष रूप से हिरण्य-दान (स्वर्ण/धन का दान) को यात्रा-फल की पूर्णता का साधन बताया गया है, जिससे तीर्थयात्रा का पुण्य सम्यक् रूप से संपन्न होता है। अंत में इसे स्कन्दपुराण के प्रभासखण्ड, प्रभासक्षेत्रमाहात्म्य का 211वाँ अध्याय कहा गया है।

Kratvīśvaramāhātmya (क्रत्वीश्वरमाहात्म्यम्) — The Glory of Kratvīśvara
इस अध्याय (212) में ईश्वर देवी को बताते हैं कि पुलहीश्वर से नैऋत्य दिशा में आठ धनुष के अंतर पर ‘क्रत्वीश्वर’ नामक पवित्र शिव-स्थल है। इसका महात्म्य यह है कि यहाँ दर्शन से ही “महाक्रतु-फल” प्राप्त होता है—अर्थात् बड़े यज्ञों के समान पुण्य तीर्थ-दर्शन द्वारा सुलभ हो जाता है। फलश्रुति में कहा गया है कि जो मनुष्य क्रत्वीश्वर का दर्शन करता है, उसे पौण्डरीक यज्ञ का फल मिलता है और वह सात जन्मों तक दरिद्रता से सुरक्षित रहता है; साथ ही वहाँ दुःख का उदय नहीं होता। इस प्रकार यह अध्याय स्थल-निर्देश, नाम-कीर्ति और दर्शनजन्य फल का संक्षिप्त मार्गदर्शक बनता है।

Kaśyapeśvara Māhātmya (काश्यपेश्वरमाहात्म्य) — Glory of the Kaśyapeśvara Shrine
इस अध्याय में संवाद-रूप से ईश्वर देवी को काश्यपेश्वर तीर्थ का संक्षिप्त माहात्म्य सुनाते हैं। तीर्थ का स्थान-निर्देश भी दिया गया है—पूर्व दिशा-भाग में, “सोलह धनुष” के अंतर पर काश्यपेश्वर स्थित है। कहा गया है कि उसके दर्शन से मनुष्य को समृद्धि और संतान-लाभ होता है, और जो “सभी पापों” से बोझिल हो वह भी पापों से मुक्त हो जाता है—यह फलश्रुति निःसंदेह बताई गई है। अंत में स्कन्दपुराण के प्रभासखण्ड तथा प्रभासक्षेत्रमाहात्म्य में इस अध्याय का पाठ-स्थान कोलोफोन द्वारा सूचित किया गया है।

कौशिकेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Narrative of the Glory of Kauśikeśvara
इस अध्याय में ईश्वर स्वयं उपदेश-रूप में प्राभास क्षेत्र के कौशिकेश्वर शिव-स्थल का माहात्म्य बताते हैं। काश्यपेश्वर से ईशान (उत्तर-पूर्व) दिशा में आठ धनुष की दूरी पर इसका स्थान कहा गया है, और इसे महापातक-नाशक तथा परम पावन तीर्थ बताया गया है। नाम की कथा में कौशिक द्वारा वसिष्ठ के पुत्रों के वध से उत्पन्न दोष का उल्लेख है; वह उसी स्थान पर शिवलिंग की प्रतिष्ठा कर पूजा करता है और पाप से मुक्त हो जाता है। अंत में फलश्रुति है कि जो इस लिंग का दर्शन और पूजन करते हैं, उन्हें वांछित फल प्राप्त होता है।

कुमारेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् / The Māhātmya of Kumāreśvara
ईश्वर देवी को मārkaṇḍeśvara के दक्षिण में थोड़ी दूरी पर स्थित कुमारेश्वर-तीर्थ का निर्देश देते हैं। वहाँ स्वामी नामक भक्त द्वारा प्रतिष्ठित शिवलिंग का वर्णन है, जिसे पवित्र क्षेत्र में प्रायश्चित्त-स्थान माना गया है। कार्त्तिकेय से संबद्ध कठोर तप को परस्त्री/परपुरुष-सम्बन्ध जैसे अतिक्रमणजन्य पापों के नाश का उपाय बताया गया है। एक आदर्श भक्त लिंग की स्थापना कर मलिनता से मुक्त होता है और त्याग-भाव से पुनः ‘कौमार’—यौवन-सदृश निर्मल पवित्रता—को प्राप्त करता है। दूसरा दृष्टांत सुमाली का है, जो पूर्वजों/पितरों की हत्या जैसे घोर कर्म के बाद भी वहाँ पूजन करके उस पाप से छूट जाता है। देव के सामने स्थित एक कूप का भी उल्लेख है; उसमें स्नान कर स्वामी-प्रतिष्ठित लिंग की पूजा करने से दोषों से मुक्ति और स्वामीपुर नामक महान दिव्य नगरी की प्राप्ति होती है। अंत में दान-विधान है—स्वामी के नाम से किसी द्विज को शातकुम्भ-स्वर्ण का ‘ताम्रचूड़ा’ दान करने पर तीर्थयात्रा का फल मिलता है।

Gautameśvara-māhātmya (गौतमेश्वरमाहात्म्य) — The Glory of Gautameśvara Liṅga
इस अध्याय में ईश्वर देवी से संक्षेप में एक शैव तीर्थ का माहात्म्य कहते हैं। वे बताते हैं कि मार्कण्डेश्वर के उत्तर में पन्द्रह धनुष की दूरी पर ‘गौतमेश्वर’ नामक श्रेष्ठ लिङ्ग स्थित है। कथा के अनुसार गुरु-वध के पाप और शोक से पीड़ित गौतम ऋषि ने वहीं उस लिङ्ग की प्रतिष्ठा की और तप तथा पूजन द्वारा अपने पापभार से मुक्त हो गए। इसलिए यह स्थान प्रायश्चित्त और शुद्धि का विशेष क्षेत्र माना गया है। तीर्थयात्रियों के लिए विधि बताई गई है—नदी में विधिपूर्वक स्नान, लिङ्ग का शास्त्रोक्त पूजन, और कपिला गाय का दान। ऐसा करने से पंचमहापातकों से मुक्ति तथा परम पावन फल, अंततः मोक्ष, प्राप्त होता है।

Devarājeśvara-māhātmya (Glorification of Devarājeśvara)
इस अध्याय में ईश्वर देवी से देवराजेश्वर का संक्षिप्त माहात्म्य कहते हैं। वे बताते हैं कि गौतमेश्वर से पश्चिम दिशा में अधिक दूर नहीं, सोलह धनु की दूरी पर देवराजेश्वर स्थित है। यहाँ लिंग की स्थापना करने से स्थापक पाप से मुक्त होता है—यह कारण-फल क्रम बताया गया है। आगे नियमरूप उपदेश है कि जो मनुष्य समाहित, एकाग्र मन से उस लिंग की पूजा करता है, वह मानव-देह से उत्पन्न पापों से भी छूट जाता है। अंत में कोलophon में इसे स्कन्दमहापुराण (८१,००० श्लोक), प्राभास खण्ड, प्राभासक्षेत्रमाहात्म्य के अंतर्गत ‘देवराजेश्वर-माहात्म्य’ नामक २१७वाँ अध्याय कहा गया है।

Mānaveśvara Māhātmya (The Glory of Mānaveśvara) | मानवेश्वरमाहात्म्य
इस अध्याय में ईश्वर द्वारा संक्षिप्त धर्मोपदेश के रूप में प्रभास-क्षेत्र के एक विशेष लिंग का वर्णन आता है, जिसे मनु ने स्थापित किया था और जो “मानव-लिंग” कहलाता है। अपने ही पुत्र-वध से उत्पन्न पापभार से व्याकुल मनु इस स्थान को पापहर जानकर विधिपूर्वक अभिषेक और प्रतिष्ठा द्वारा वहाँ ईश्वर की स्थापना करते हैं। इसके फलस्वरूप वे उस दोष से मुक्त हो जाते हैं। आगे कहा गया है कि जो भी मनुष्य-भक्त श्रद्धा से इस मानव-लिंग की पूजा करता है, वह भी पापों से मुक्त होता है। अंत में यह स्कन्दमहापुराण के प्रभासखण्ड, प्रभासक्षेत्रमाहात्म्य के अंतर्गत “मानवेश्वर-माहात्म्य” नामक 218वाँ अध्याय बताया गया है।

मार्कण्डेयेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् (Glorification of Mārkaṇḍeyeśvara and associated liṅgas near Mārkaṇḍeya’s āśrama)
इस अध्याय में ईश्वर देवी से कहते हैं कि मार्कण्डेय के आश्रम के आग्नेय (दक्षिण-पूर्व) भाग में एक विशेष पुण्य-क्षेत्र और लिंगों का समूह स्थित है। वहाँ प्रसिद्ध गुहालींग—जिसे नीलकण्ठ भी कहा गया है—का वर्णन है, जो पूर्वकाल में विष्णु द्वारा पूजित और ‘समस्त पाप-शेष का नाश करने वाला’ माना गया है। इसकी भक्ति-पूर्वक पूजा से धन-समृद्धि, संतान, पशु-सम्पदा और संतोष की प्राप्ति बताई गई है। आगे तपस्वियों के दृश्य आश्रम, गुफाएँ और अनेक लिंग-सम्बद्ध स्थानों का उल्लेख आता है। विशेष विधान यह है कि मार्कण्डेय के समीप लिंग की प्रतिष्ठा करने से विस्तृत कुल-परम्पराएँ भी उन्नत होती हैं; यह कर्म समाज-व्यापक पुण्य का साधन कहा गया है। तत्त्व-निरूपण में कहा गया है—सभी लोक शिवमय हैं और सब कुछ शिव में प्रतिष्ठित है; अतः समृद्धि चाहने वाला विद्वान शिव-पूजन करे। देव, राजा और मनुष्य—सबके उदाहरण देकर लिंग-पूजा व प्रतिष्ठा को सामान्य और प्रभावी उपाय बताया गया है; शिव-तेज से बड़े अपराध भी शांत होते हैं। इन्द्र का वृत्र-वध के बाद शुद्ध होना, संगमों पर सूर्य का पूजन, अहल्या का उद्धार आदि कथाएँ प्रमाण रूप में देकर अंत में प्रभास-क्षेत्र का सार मार्कण्डेयाश्रम के संदर्भ में पुनः कहा गया है।

वृषध्वजेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Vṛṣadhvajeśvara Māhātmya (Glorification of Vṛṣadhvajeśvara)
इस अध्याय में भगवान ईश्वर देवी को उपदेश देते हुए प्रभास-क्षेत्र के दक्षिण भाग में स्थित ‘त्रिलोक-पूजित’ वृषध्वजेश्वर का निर्देश करते हैं, जिससे तीर्थयात्री को स्पष्ट स्थान-संकेत मिलता है। फिर शिव-तत्त्व का निरूपण होता है—वे अक्षर और अव्यक्त हैं, उनसे परे कोई तत्त्व नहीं, योग द्वारा ग्राह्य हैं, और सर्वव्यापी महापुरुष हैं जिनके हाथ-पाँव, नेत्र, शिर और मुख सर्वत्र हैं—यह उनकी सर्वात्मता का बोध कराता है। पृथु, मरुत्त, भरत, शशबिंदु, गय, शिबि, राम, अम्बरीष, मन्धाता, दिलीप, भगीरथ, सुहोत्र, रन्तिदेव, ययाति, सगर आदि राजाओं का उदाहरण देकर कहा गया है कि उन्होंने प्रभास में आकर यज्ञों सहित वृषध्वजेश्वर की पूजा की और स्वर्ग को प्राप्त हुए। बार-बार संसार के दुःख—जन्म, मृत्यु, रोग, जरा और क्लेश—की स्मृति दिलाकर असार जगत में शिव-आराधना को ही ‘सार’ बताया गया है। भक्ति को समृद्धि देने वाली शक्ति कहा गया है—भक्त को चिंतामणि और कल्पवृक्ष के समान फल, तथा कुबेर तक सेवकवत् उपलब्ध होते हैं। साथ ही सरल पूजा की महिमा है: केवल पाँच पुष्पों से पूजन करने पर भी दस अश्वमेध यज्ञों का फल बताया गया है। वृषध्वज के निकट वृष-दान का विधान पाप-नाश और तीर्थयात्रा के पूर्ण फल हेतु किया गया है।

ऋणमोचनमाहात्म्यवर्णनम् (R̥ṇamocana Māhātmya—Theological Account of Debt-Release at Prabhāsa)
इस अध्याय में ईश्वर प्रभास-क्षेत्र के “ऋणमोचन” नामक लिङ्ग-तीर्थ का माहात्म्य कहते हैं। बताया गया है कि इसके दर्शन से ही माता-पिता की वंश-परम्परा से उत्पन्न पितृ-ऋण नष्ट हो जाता है। कथा में पितृगण प्रभास में दीर्घ तप करके भक्तिपूर्वक एक लिङ्ग की स्थापना करते हैं। प्रसन्न महादेव प्रकट होकर वर माँगने को कहते हैं। पितृगण वर माँगते हैं कि देव, ऋषि और मनुष्य—जो भी श्रद्धा से यहाँ आए—वह पितृ-ऋण और पाप-मल से मुक्त हो; तथा जिन पितरों की मृत्यु सर्प, अग्नि, विष आदि से असमय हुई हो, या जिनके लिए सपिण्डीकरण, एकोदिष्ट/षोडश-दान, वृषोत्सर्ग, शौच आदि कर्म अपूर्ण रह गए हों, वे भी यहाँ तर्पण से उत्तम गति पाएं। ईश्वर उत्तर देते हैं कि पितृभक्ति रखने वाले मनुष्य पवित्र जल में स्नान कर पितृ-तर्पण करें तो तत्काल उद्धार पाते हैं; भारी पाप होने पर भी महेश्वर वरदाता हैं। स्नान और पितृ-स्थापित लिङ्ग की पूजा से पितृ-ऋण से मुक्ति होती है; ऋण से मोचन करने के कारण इसका नाम “ऋणमोचन” है। सिर पर स्वर्ण रखकर स्नान करने का फल सौ गौ-दान के समान कहा गया है। अंत में वहाँ पूर्ण प्रयत्न से श्राद्ध करने और देवों को प्रिय उस पितृ-लिङ्ग की पूजा करने की अनुशंसा की गई है।

रुक्मवतीश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Rukmavatīśvara Māhātmya (Account of the Glory of Rukmavatīśvara)
इस अध्याय में “ईश्वर उवाच” के रूप में रुक्मवती द्वारा प्रतिष्ठित रुक्मवतीश्वर-लिंग का संक्षिप्त माहात्म्य कहा गया है। इसे सर्वशांति देने वाला, पापों का नाश करने वाला और इच्छित फल प्रदान करने वाला बताया गया है। फिर तीर्थ-आचरण की विधि बताई जाती है—संबद्ध महातीर्थ में स्नान करें, तत्पश्चात सावधानीपूर्वक लिंग का समप्लावन/अभिषेक विधिपूर्वक करें। इसके बाद ब्राह्मणों को धन-दान करने से पुण्य बढ़ता है। इस प्रकार तीर्थ, लिंग, स्नान-अभिषेक और दान—इन सबको जोड़कर शुद्धि और अभीष्ट-सिद्धि का मार्ग प्रतिपादित किया गया है।

Puruṣottama-tīrtha and Pretatīrtha (Gātrotsarga) Māhātmya — पुरुषोत्तमतीर्थ-प्रेततीर्थ(गात्रोत्सर्ग)माहात्म्य
ईश्वर देवी को त्रिलोकों में पूज्य एक लिंग और उसके समीप स्थित उस तीर्थ का विधान बताते हैं, जो कृतयुग में ‘प्रेततीर्थ’ और आगे चलकर ‘गात्रोत्सर्ग’ नाम से प्रसिद्ध हुआ। ऋणमोचन और पापमोचन के निकट इस क्षेत्र की मर्यादा बताकर कहा गया है कि वहाँ देहत्याग या स्नान करने से पापों का क्षय होता है। वहीं पुरुषोत्तम का निवास माना गया है; नारायण, बलभद्र और रुक्मिणी की पूजा त्रिविध पापों से मुक्ति देती है, तथा श्राद्ध और पिंडदान से पितर प्रेत-भाव से छूटकर दीर्घकाल तक तृप्त होते हैं। इसके बाद गौतम ऋषि की कथा आती है। पाँच भयानक प्रेत पवित्र क्षेत्र में प्रवेश नहीं कर पाते; वे बताते हैं कि उनके नाम पूर्वकृत दुष्कर्मों के नैतिक चिह्न हैं—याचना ठुकराना, विश्वासघात, हानिकारक चुगली/सूचना, दान में प्रमाद आदि। वे प्रेतों के अशुद्ध आहार-स्रोत, और प्रेत-योनि देने वाले कर्म—असत्य, चोरी, गो/ब्राह्मण हिंसा, निंदा, जल को दूषित करना, कर्मकाण्ड की उपेक्षा—गिनाते हैं; साथ ही तीर्थयात्रा, देवपूजा, ब्राह्मण-सेवा, शास्त्र-श्रवण, विद्वानों की सेवा को प्रेतत्व-निवारक बताते हैं। गौतम उनके लिए अलग-अलग श्राद्ध कर उन्हें मुक्त करते हैं; पाँचवें ‘पर्युषित’ के लिए उत्तरायण के समय विशेष श्राद्ध आवश्यक होता है। मुक्त प्रेत वर देता है कि यह स्थान ‘प्रेततीर्थ’ के रूप में विख्यात होगा और यहाँ श्राद्ध करने वालों की संतति प्रेत-भाव में नहीं गिरेगी; श्रवण और दर्शन से महान यज्ञों के समान पुण्य फल मिलता है।

इन्द्रेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् (Indreśvara Māhātmya: The Glory of Indra’s Liṅga)
इस अध्याय में ईश्वर देवी से कहते हैं कि पुरुषोत्तम के दक्षिण में इन्द्र द्वारा स्थापित एक लिङ्ग है, जो “पापमोचन” नाम से प्रसिद्ध है। वृत्र-वध के बाद इन्द्र पर ब्रह्महत्या-सदृश मल का भार आ पड़ा; देह में वर्ण-विकार और दुर्गन्ध उत्पन्न हुई, जिससे तेज, बल और जीवन-शक्ति क्षीण होने लगी। नारद आदि ऋषि और देवगण उसे पापहर क्षेत्र प्रभास जाने की सलाह देते हैं। इन्द्र प्रभास में त्रिशूलधारी भगवान के लिङ्ग की स्थापना कर धूप, सुगन्ध, चन्दन आदि से विधिपूर्वक पूजन करता है। पूजन के प्रभाव से उसकी दुर्गन्ध और मलिनता दूर हो जाती है तथा उसका स्वरूप पुनः उज्ज्वल हो उठता है। तब इन्द्र भविष्य के भक्तों के लिए फल बताता है—जो श्रद्धा से इस लिङ्ग की पूजा करेगा, उसे ब्रह्महत्या जैसे महापापों का भी नाश होगा। अंत में गो-दान (वेदवेत्ता ब्राह्मण को) और उसी स्थान पर श्राद्ध करने को सहायक उपाय बताया गया है, जिससे ब्रह्महत्या-सम्बन्धी पीड़ा का शमन होता है।

Narakeśvara-darśana and the Catalogue of Narakas (Ethical-Theological Discourse)
ईश्वर उत्तर दिशा में नरकेश्वर से जुड़ा एक पवित्र स्थान बताते हैं, जो पापों का नाश करने वाला है। फिर मथुरा का एक दृष्टान्त आता है—अगस्त्य-गोत्र के ब्राह्मण देवशर्मा गरीबी से पीड़ित थे; यम का दूत किसी दूसरे ‘देवशर्मा’ को लाने के लिए भेजा गया था, पर लेखा-भूल से वह इन्हीं के पास पहुँच गया। यम त्रुटि सुधारकर धर्मराज के रूप में कहते हैं कि नियत समय से पहले मृत्यु नहीं होती; चोट आदि होने पर भी कोई प्राणी ‘अकाल’ नहीं मरता। इसके बाद ब्राह्मण नरकों के प्रत्यक्ष लोकों की संख्या और कर्म-कारण पूछते हैं। यम इक्कीस नरकों का वर्णन करते हैं और बताते हैं कि विश्वासघात, झूठी गवाही, कठोर व छलपूर्ण वाणी, परस्त्रीगमन, चोरी, व्रतधारियों को कष्ट देना, गो-हिंसा, देवों व ब्राह्मणों से द्वेष, मंदिर/ब्राह्मण-धन का अपहरण आदि अधर्म इन नरकों के कारण बनते हैं। अंत में वे निवारक उपदेश देते हैं—जो प्रभास पहुँचकर भक्ति से नरकेश्वर का दर्शन करता है, वह नरक नहीं देखता; यह लिंग यम ने शिव-भक्ति से स्थापित किया था और इसे गुप्त शिक्षारूप में सुरक्षित रखना चाहिए। अध्याय में कर्मकाण्ड-निर्देश व फलश्रुति भी है—जीवनभर पूजा से परम गति; आश्वयुज कृष्ण चतुर्दशी को श्राद्ध से अश्वमेध-सदृश पुण्य; वेदज्ञ ब्राह्मण को काले मृगचर्म का दान तिलों की संख्या के अनुसार स्वर्गीय सम्मान देता है।

मेघेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Meghēśvara Māhātmya (Glorification of Meghēśvara)
इस अध्याय में ईश्वर प्राभास-क्षेत्र के पूर्व भाग में नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) दिशा की ओर स्थित ‘मेघेश्वर’ नामक तीर्थ-स्थल का उपदेश देते हैं। इसे पाप-मोचक और सर्व-पातक-नाशक कहा गया है। फिर अनावृष्टि (वर्षा न होने) के भय से उत्पन्न सामुदायिक संकट का समाधान बताया जाता है। वहाँ विद्वान ब्राह्मणों द्वारा शान्ति-कर्म कराया जाए और वारुणी-विधि से जल द्वारा भूमि का संस्कार/अभिषेक किया जाए—यह वर्षा-आह्वान और व्यवस्था-स्थापन का उपाय है। जहाँ मेघ-प्रतिष्ठित लिङ्ग की नित्य पूजा होती है, वहाँ अनावृष्टि-भय नहीं उठता—ऐसा कहकर इस तीर्थ को भक्ति-नियम से प्रकृति और समाज की स्थिरता का आश्रय बताया गया है।

बलभद्रेश्वरमाहात्म्य (Glory of Balabhadreśvara Liṅga)
इस अध्याय में ईश्वर देवी को बलभद्र द्वारा विधिपूर्वक स्थापित लिङ्ग के दर्शन-पूजन हेतु जाने का उपदेश देते हैं। उस लिङ्ग को महापाप-हर, ‘महालिङ्ग’ तथा महान् सिद्धि-फल देने वाला बताया गया है; इसकी स्थापना बलभद्र ने शुद्धि-उद्देश्य से की—यह बात स्पष्ट रूप से कही गई है। फिर भक्ति-क्रम बताया गया है—गन्ध, पुष्प आदि क्रमशः अर्पित करके विधिवत् आराधना करनी चाहिए। तृतीय रेवती-योग के समय यह व्रत/पूजन करने से साधक को ‘योगेश-पद’ की प्राप्ति होती है। अंत में इसे स्कन्दमहापुराण के प्रभासखण्ड, प्रभासक्षेत्रमाहात्म्य के प्रथम भाग का 227वाँ अध्याय कहा गया है।

भैरवेश-मातृस्थान-विधानम् | Rite of Bhairaveśa at the Supreme Mothers’ Shrine
अध्याय 228 में ईश्वर महादेवी को उपदेश देते हैं और ‘भैरवेश’ नामक परम ‘मातृ-स्थान’ का वर्णन करते हैं, जिसे ‘सर्व-भय-विनाशक’ कहा गया है। यह स्थल मातृशक्ति और योगिनियों की विशेष कृपा से भय-निवारण का प्रधान क्षेत्र माना गया है। कृष्णपक्ष की चतुर्दशी तिथि पर संयमी साधक को गंध, पुष्प तथा उत्तम बलि-नैवेद्य आदि से विधिपूर्वक पूजन करने का विधान बताया गया है। अंत में आश्वासन दिया गया है कि योगिनियाँ और माताएँ पृथ्वी पर भक्त की पुत्रवत् रक्षा करती हैं; इस प्रकार आत्मसंयम, क्षेत्र-विशिष्ट पूजा और भय-हरण—तीनों का समन्वय प्रतिपादित होता है।

गंगामाहात्म्यवर्णनम् (Gaṅgā-māhātmya: Discourse on the Glory of the Gaṅgā at Prabhāsa)
इस अध्याय में ईश्वर महादेवी को उपदेश देते हैं कि ईशान्य दिशा में स्थित त्रिपथगामिनी गंगा का ध्यान करें। यह गंगा स्वयम्भू पावन धारा है; विष्णु ने इसे पूर्वकाल में पृथ्वी के मध्य से प्रकट किया था, यदुवंश के कल्याण और समस्त पापों के शमन के लिए। यहाँ स्नान—जो पूर्व संचित पुण्य से भी प्राप्त होता है—और विधिपूर्वक श्राद्ध करने से किए-अनकिए कर्मों के विषय में पश्चात्ताप रहित अवस्था मिलती है। कार्तिक मास में जाह्नवी के जल में स्नान का पुण्य सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड-दान के तुल्य कहा गया है। कलियुग में ऐसे दर्शन की दुर्लभता बताकर प्रभास में गंगा/जाह्नवी तीर्थ पर स्नान-दान का विशेष महात्म्य प्रतिपादित किया गया है।

गणपतिमाहात्म्यवर्णनम् | Gaṇapati-Māhātmya (Account of Gaṇeśa’s Glory in Prabhāsa)
ईश्वर देवी से प्राभास-क्षेत्र में स्थित उस गणपति का वर्णन करते हैं जो देवताओं को अत्यन्त प्रिय है और जिसे स्वयं ईश्वर ने वहाँ प्रतिष्ठित किया है। यह गणपति गंगा के दक्षिण तट पर विराजमान हैं और क्षेत्र की रक्षा में सदा तत्पर बताए गए हैं। माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को उनकी विशेष पूजा का विधान है। दिव्य मोदक का नैवेद्य, तथा पुष्प, धूप आदि उपचारों को विधिपूर्वक क्रम से अर्पित करके आराधना करनी चाहिए। इस पूजा का फल व्यावहारिक और रक्षक है—उपासक को विघ्न नहीं आते; यह आश्वासन विशेष रूप से उसी के लिए कहा गया है जो क्षेत्र के भीतर रहता/स्थित रहता है। अंत में इसे प्राभासखण्ड के प्रथम विभाग ‘प्राभासक्षेत्रमाहात्म्य’ का 230वाँ अध्याय, ‘गणपतिमाहात्म्यवर्णन’ शीर्षक से बताया गया है।

जांबवतीतीर्थमाहात्म्यम् / The Māhātmya of the Jāmbavatī Tīrtha
ईश्वर देवी से प्रभास-क्षेत्र में जांबवती नदी से जुड़े एक पवित्र स्थान का वर्णन करते हैं। जांबवती को पुराण-परंपरा में विष्णु की प्रिय पत्नी के रूप में स्मरण किया गया है। संवाद में जांबवती अर्जुन से वर्तमान घटनाएँ पूछती है; अर्जुन शोक से भरकर यदुवंश पर आए महाविनाश का समाचार देता है—बलदेव, सात्यकि आदि प्रमुख यादवों के अंत और समूचे यादव-समाज के टूटने को वह धर्म और इतिहास में एक बड़े विच्छेद के रूप में बताता है। पति के निधन का समाचार सुनकर जांबवती गंगा-तट पर आत्मदाह करती है, चिता-भस्म को संचित करती है और फिर दिव्य रूपांतरण से नदी बनकर समुद्र की ओर प्रवाहित होती है। इस प्रकार वह जलधारा तीर्थ के रूप में प्रतिष्ठित हो जाती है। फलश्रुति में कहा गया है कि जो स्त्रियाँ श्रद्धा से वहाँ स्नान करती हैं, उन्हें और उनके वंश की स्त्रियों को वैधव्य का दुःख नहीं होता; तथा जो भी पुरुष या स्त्री पूर्ण प्रयत्न से वहाँ स्नान करे, उसे परम गति प्राप्त होती है।

Pāṇḍava-kūpa-pratiṣṭhā and Vaiṣṇava-sānnidhya at Prabhāsa (पाण्डवकूप-प्रसङ्गः)
इस अध्याय में ईश्वर द्वारा प्रभास-क्षेत्र का माहात्म्य और पाण्डव-कूप की प्रतिष्ठा का प्रसंग कहा गया है। वनवास के समय पाण्डव प्रभास में आकर शांत भाव से कुछ समय ठहरते हैं। अनेक ब्राह्मणों के आतिथ्य में जल की दूरी बाधा बनती है; तब द्रौपदी के आग्रह से पाण्डव आश्रम के निकट एक कुआँ खोदकर जल-स्रोत स्थापित करते हैं। फिर द्वारका से श्रीकृष्ण यदुवंशियों सहित (प्रद्युम्न, साम्ब आदि) वहाँ पधारते हैं। औपचारिक संवाद में कृष्ण युधिष्ठिर से वर माँगने को कहते हैं; युधिष्ठिर उस कुएँ पर कृष्ण के नित्य सान्निध्य का वर माँगते हैं और कहते हैं कि जो भक्तिभाव से वहाँ स्नान करेंगे, वे कृष्ण-कृपा से वैष्णव पद को प्राप्त होंगे। ईश्वर इस वर की पुष्टि करते हैं और कृष्ण प्रस्थान करते हैं। अंत में फलश्रुति है—उस स्थान पर श्राद्ध करने से अश्वमेध-यज्ञ के समान पुण्य मिलता है; तर्पण और स्नान से भी यथानुसार फल बढ़ता है। ज्येष्ठ पूर्णिमा को सावित्री-पूजन सहित किया गया कर्म ‘परम अवस्था’ देता है, और पूर्ण तीर्थ-फल चाहने वालों के लिए गो-दान की संस्तुति की गई है।

पाण्डवेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् (Pandaveśvara Māhātmya—Account of the Glory of Pāṇḍaveśvara)
इस अध्याय में ईश्वर देवी से प्रभास-क्षेत्र में स्थित पाँच प्रतिष्ठित लिंगों का रहस्य और महिमा संक्षेप में कहते हैं। बताया गया है कि इन लिंगों की प्रतिष्ठा महात्मा पाण्डवों ने की थी, जिससे इस तीर्थ का संबंध महाभारतीय परंपरा से दृढ़ होता है और इसकी पूजा-परंपरा की प्रामाणिकता स्थापित होती है। फिर फलश्रुति के रूप में कहा गया है कि जो भक्तिभाव से इन लिंगों का पूजन करता है, वह पापों से मुक्त हो जाता है। इस प्रकार प्रमाणित स्थल पर भक्ति-युक्त लिंग-पूजा की पावन, मोक्षदायिनी शक्ति का प्रतिपादन किया गया है।

दशाश्वमेधिकतीर्थमाहात्म्य (Māhātmya of the Daśāśvamedhika Tīrtha)
इस अध्याय में ईश्वर देवी से ‘दशाश्वमेधिक’ नामक प्रसिद्ध तीर्थ की उत्पत्ति और महिमा कहते हैं। वे त्रिलोकरूप से विख्यात, महापापों का नाश करने वाले स्थान की ओर यात्री को निर्देश देते हैं। वहाँ राजा भरत ने दस अश्वमेध यज्ञ किए और उस क्षेत्र को अनुपम मानकर देवताओं को यज्ञ-हविष से तृप्त किया। प्रसन्न देवताओं ने वर माँगने को कहा; भरत ने प्रार्थना की कि जो भी भक्त वहाँ स्नान करे, उसे दस अश्वमेधों का पुण्यफल प्राप्त हो। देवताओं ने तीर्थ का नाम और कीर्ति पृथ्वी पर स्थिर की; तब से वह पापक्षयकारी तीर्थ ‘दशाश्वमेधिक’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यह तीर्थ ऐन्द्र और वारुण चिह्नों के बीच स्थित, शिव-क्षेत्र तथा महान तीर्थ-समूहों में एक प्रमुख स्थान बताया गया है। फलश्रुति में कहा है कि वहाँ देहत्याग करने से शिवलोक में आनंद मिलता है; मनुष्येतर योनियों के प्राणी भी उच्च गति को प्राप्त होते हैं। तिल-उदक से पितृ-तर्पण करने पर पितर प्रलय तक तृप्त रहते हैं। ब्रह्मा के पूर्व यज्ञ, इन्द्र का वहाँ उपासना से देवराज पद पाना, और कर्तवीर्य के सौ यज्ञ भी स्मरण किए गए हैं; वहाँ मृत्यु से अपुनर्भव तथा वृषोत्सर्ग से बैल के रोमों की संख्या के अनुसार स्वर्गोन्नति का वर्णन है।

Śatamedhādi Liṅgatraya Māhātmya (Glory of the Three Liṅgas: Śatamedha, Sahasramedha, Koṭimedha)
इस अध्याय में ईश्वर देवी को प्रभास-क्षेत्र में स्थित “अतुलनीय त्रिलिंग” के दर्शन का उपदेश देते हैं। दक्षिण दिशा में शतमेध नामक लिंग है, जो सौ यज्ञों का फल देने वाला कहा गया है; कार्तवीर्य द्वारा पूर्वकाल में किए गए सौ यज्ञों से इसका संबंध बताया गया है और इसकी प्रतिष्ठा समस्त पाप-भार का नाश करने वाली मानी गई है। मध्य में कोटिमेध प्रसिद्ध है, जहाँ ब्रह्मा ने असंख्य (कोटि) उत्तम यज्ञ किए और महादेव को “शंकर, लोक-कल्याणकर्ता” रूप में प्रतिष्ठित किया। उत्तर दिशा में सहस्रक्रतु (सहस्रमेद्ध) लिंग है, जिसका संबंध शक्र/इंद्र से है; कहा गया है कि इंद्र ने हजार कर्मकांड किए और इस महालिंग को देवताओं की आदिदेवता के रूप में स्थापित किया। अध्याय में गंध-पुष्प से पूजन तथा पंचामृत और जल से अभिषेक का विधान है, और बताया गया है कि भक्तों को लिंग-नामों के अनुरूप फल प्राप्त होता है। पूर्ण तीर्थ-फल चाहने वालों के लिए गो-दान की विशेष प्रशंसा की गई है। अंत में कहा गया है कि वहाँ “दस करोड़ तीर्थ” निवास करते हैं और मध्य स्थित यह त्रिलिंग-समूह सर्वथा पाप-नाशक है।

दुर्वासादित्यमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of Durvāsā-Āditya (Sūrya) at Prabhāsa
अध्याय 236 में प्रभास-क्षेत्र के भीतर ‘दुर्वासा-आदित्य’ (सूर्य) तीर्थ की स्थापना और उसकी महिमा बताई गई है। तीर्थयात्रियों को उस स्थान पर जाने का विधान है जहाँ महर्षि दुर्वासा ने नियम-संयम सहित हजार वर्ष तक तप करके सूर्य-उपासना की। प्रसन्न होकर सूर्य प्रकट होते हैं और वर देते हैं; दुर्वासा पृथ्वी के रहने तक वहाँ सूर्य के नित्य निवास, तीर्थ की कीर्ति और स्थापित प्रतिमा के सान्निध्य की प्रार्थना करते हैं। सूर्य इसे स्वीकार कर यमुना को नदी-रूप में तथा धर्मराज यम को भी बुलाकर क्षेत्र की रक्षा और मर्यादा-पालन हेतु नियुक्त करते हैं, विशेषकर भक्तों और गृहस्थ ब्राह्मणों की सुरक्षा के लिए। इसके बाद पवित्र भू-रचना का वर्णन आता है—यमुना का भूमिगत मार्ग से प्रकट होना, एक कुण्ड का उल्लेख, तथा ‘दुन्दुभि’/क्षेत्रपाल से संबंध। वहाँ स्नान और पितृ-तर्पण के फल बताए गए हैं। आगे व्रत-काल का विधान है—माघ शुक्ल सप्तमी को दुर्वासा-अर्क की पूजा, माधव मास में स्नान व सूर्य-पूजन, तथा मंदिर के निकट सूर्य के सहस्र नामों का पाठ। फलश्रुति में पुण्य की वृद्धि, बड़े दोषों का शमन, मनोकामना-सिद्धि, रक्षा, आरोग्य और समृद्धि कही गई है; अंत में क्षेत्र-सीमा (आधा गव्युत) और सूर्य-भक्ति से रहित जनों की अनधिकारिता बताई गई है।

यादवस्थलोत्पत्तौ वज्रेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Origin of Yādava-sthala and the Māhātmya of Vajreśvara
यह अध्याय शिव–देवी संवाद के रूप में प्रभास-खण्ड में ‘यादव-स्थल’ की उत्पत्ति और वज्रेश्वर के माहात्म्य का वर्णन करता है। ईश्वर देवी को उस स्थान की ओर संकेत करते हैं जहाँ विशाल यादव-सेना का विनाश हुआ। देवी पूछती हैं कि वासुदेव के देखते-देखते वृष्णि, अन्धक और भोज क्यों नष्ट हुए। तब शिव शाप-क्रम बताते हैं—साम्ब ने स्त्री-वेश बनाकर विश्वामित्र, कण्व, नारद आदि ऋषियों का उपहास किया; क्रुद्ध ऋषियों ने शाप दिया कि साम्ब से कुल-नाश करने वाला लोहे का ‘मुषल’ उत्पन्न होगा। वचन में राम और जनार्दन का नाम अलग-सा आता है, पर साथ ही काल का अनिवार्य विधान भी सूचित होता है। मुषल उत्पन्न होकर चूर्ण बना, समुद्र में फेंका गया; फिर द्वारका में काल-प्रभाव से भयंकर अपशकुन फैलते हैं—समाज-विपर्यास, अशुभ ध्वनियाँ, पशुओं के विकार, यज्ञ-विघ्न और डरावने स्वप्न—जो धर्म-चेतावनी का रूप लेते हैं। कृष्ण प्रभास-तीर्थ की यात्रा का आदेश देते हैं। वहाँ मद्यपान से यादवों में वैर बढ़ता है; सात्यकि और कृतवर्मा आदि के प्रसंग से हिंसा भड़कती है और वे परस्पर नष्ट हो जाते हैं। तट के सरकंडे वज्र-सदृश मुषल बनकर शाप (ब्रह्म-दण्ड) और काल की कार्य-शक्ति के रूप में काम करते हैं। दाह-स्थल और अस्थि-संचय से वह प्रदेश ‘यादव-स्थल’ कहलाता है। अंत में वज्र नामक शेष वंशज प्रभास आता है, नारद के उपदेश से तप कर सिद्धि पाता है और वज्रेश्वर-लिंग की स्थापना करता है। जाम्बवती-जल में स्नान, वज्रेश्वर-पूजन, ब्राह्मण-भोजन तथा षट्कोण-उपहार की विधि बताई गई है; इसका फल महान तीर्थ-पुण्य, गो-सहस्र दान के तुल्य माना गया है।

Hiraṇyā-nadī-māhātmya (हिरण्यानदीमाहात्म्य) — The Glory of the Hiraṇyā River
इस अध्याय में ईश्वर हिरण्या नदी का माहात्म्य बताते हैं। उसे पापनाशिनी, पुण्यदायिनी, सर्वकामप्रदा तथा दारिद्र्य-नाशिनी कहा गया है। तीर्थ-आचरण का संक्षिप्त विधान दिया है—नदी के पास जाना, विधिपूर्वक स्नान करना, पितरों के लिए पिण्ड-उदक आदि कर्म करना, और नियमपूर्वक दान तथा अतिथि-सत्कार करना। कहा गया है कि इस प्रकार शुद्ध विधि से करने पर यात्री अक्षय लोकों को प्राप्त होता है और पितर पाप से उबरते हैं। एक विशेष उपदेश में बताया गया है कि एक योग्य ब्राह्मण को भोजन कराना, भाव-शुद्धि और पात्रता के कारण, असंख्य द्विजों को भोजन कराने के समान फल देता है। अंत में शिव को समर्पित करके वेद-निपुण ब्राह्मण को ‘स्वर्ण रथ’ (हेमरथ) का दान करने का विधान है, जिसका फल महान यात्राओं के पुण्य के तुल्य कहा गया है।

नागरादित्यमाहात्म्यम् | The Māhātmya of Nāgarāditya (Nagarabhāskara)
ईश्वर देवी को हिरण्या-तीर्थ के निकट स्थित सूर्य-प्रतिमा ‘नागरादित्य/नागरभास्कर’ का माहात्म्य सुनाते हैं। पहले उत्पत्ति-कथा आती है—यादव-राजा सत्राजित ने भास्कर को प्रसन्न करने हेतु महान व्रत और तप किया। सूर्यदेव ने उसे स्यमन्तक मणि दी, जो प्रतिदिन स्वर्ण उत्पन्न करती है। वर माँगने पर सत्राजित ने अपने आश्रम-प्रदेश में सूर्य की नित्य उपस्थिति चाही; वहाँ तेजस्वी प्रतिमा स्थापित हुई और ब्राह्मणों तथा नगरवासियों को उसकी रक्षा का दायित्व मिला, इसलिए यह क्षेत्र ‘नागरादित्य’ कहलाया। फिर फलश्रुति में कहा गया है कि नागरार्क का केवल दर्शन भी प्रयाग के महादानों के समान फल देता है। यह देवता दरिद्रता, शोक और रोग का नाश करने वाले तथा समस्त व्याधियों के सच्चे ‘वैद्य’ माने गए हैं। विधि में हिरण्या-जल से स्नान, प्रतिमा-पूजन और शुक्लपक्ष की सप्तमी—विशेषतः संक्रान्ति से युक्त—का व्रत बताया गया है, जिसमें किए गए सभी कर्म अनेकगुणा फल देते हैं। अंत में सूर्य के 21 नामों का संक्षिप्त स्तोत्र (विकर्तन, विवस्वान, मार्तण्ड, भास्कर, रवि आदि) ‘स्तवराज’ कहा गया है, जो शरीर-स्वास्थ्य बढ़ाता है। प्रातः और सायं इसका जप इच्छित फल देता है और अंततः भास्कर-लोक की प्राप्ति कराता है।

बलभद्र-सुभद्रा-कृष्ण-माहात्म्यवर्णनम् (The Māhātmya of Balabhadra, Subhadrā, and Kṛṣṇa)
इस अध्याय में ‘ईश्वर उवाच’ के स्वर में बलभद्र, सुभद्रा और श्रीकृष्ण—इन त्रिदेव-स्वरूपों का माहात्म्य कहा गया है। ये तीनों अत्यन्त पुण्यप्रद और साधक के लिए कल्याणकारी हैं; विशेषतः श्रीकृष्ण को ‘सर्व-पातक-नाशन’ अर्थात् समस्त पापों का नाश करने वाला बताया गया है। कथन कल्प-स्मृति से उनकी महिमा को दृढ़ करता है—पूर्व कल्प में हरि ने इसी स्थान पर देह-त्याग (गात्रोत्सर्ग) किया था और वर्तमान कल्प में भी वैसी ही स्मृति कही गई है। आगे तीर्थ-फल स्पष्ट किया गया है कि नागरादित्य के सान्निध्य में जो बलभद्र-सुभद्रा-कृष्ण की पूजा करते हैं, वे स्वर्गगामी होते हैं।

शेषमाहात्म्यवर्णनम् (The Māhātmya of Śeṣa at Mitra-vana)
अध्याय 241 में ईश्वर प्रभास-क्षेत्र के एक ऐसे तीर्थ-स्थल का वर्णन करते हैं जो बलभद्र से सम्बद्ध है और शेष (सर्प-रूप) के रूप में प्रतिष्ठित माना गया है। यह स्थान मित्र-वन में, दो गव्युतियों तक फैला हुआ बताया गया है; वहीं त्रि-संगम का तीर्थ भी है, जिसे पौराणिक ‘पाताल-पथ’ से पहुँचा जा सकता है। देवालय का स्वरूप लिंगाकार और महाप्रभ (अत्यन्त तेजस्वी) कहा गया है, तथा रेवती के साथ यह “शेष” नाम से प्रसिद्ध है। इसके बाद स्थानीय कथा आती है—जरा नामक एक सिद्ध, जो कौलिक (बुनकर) था और कथा-भाषा में ‘विष्णु-घातक’ कहा गया है, इसी स्थान पर लय को प्राप्त होता है; तब से यह क्षेत्र शेष-नाम से व्यापक रूप से विख्यात हो जाता है। चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को यहाँ पूजन का विधान है, जिससे गृह-कल्याण, पुत्र-पौत्र, पशुधन और वर्ष भर की सुख-समृद्धि का फल बताया गया है। बच्चों को मसूरिका/विस्फोटक जैसे फोड़ों वाले रोगों से रक्षा का भी उल्लेख है। यह तीर्थ सभी वर्गों में प्रिय माना गया है; पशु, पुष्प और विविध बलि-नैवेद्य से शेष शीघ्र प्रसन्न होते हैं और संचित पाप का नाश करते हैं।

कुमारीमाहात्म्यवर्णनम् (Kumārī Māhātmya—The Glory of the Maiden Goddess)
ईश्वर महादेवी को कुमारीदेवी (देवी कुमारिका) के समीप, पूर्व दिशा में स्थित एक रक्षात्मक प्रसंग सुनाते हैं। रथन्तर कल्प में रुरु नामक महाअसुर ने देवों और गन्धर्वों को सताया, तपस्वियों व धर्माचरण करने वालों का वध किया और वेद-परम्परा को तोड़ दिया; पृथ्वी पर स्वाध्याय, वषट्कार और यज्ञोत्सवों का लोप-सा हो गया। तब देव और महर्षि उसके वध का उपाय सोचते हुए अपने शरीर से निकले स्वेद से पद्मलोचना दिव्य कुमारिका को प्रकट करते हैं; वह अपना प्रयोजन पूछती है और संकट-निवारण के लिए नियुक्त होती है। देवी के हास्य से पाश और अंकुश धारण करने वाली सहचरियाँ उत्पन्न होती हैं; उनके साथ युद्ध में रुरु की सेना पराजित हो जाती है। रुरु तामसी माया रचता है, पर देवी मोहित नहीं होती; वह शक्ति से उसे बेधती है। रुरु समुद्र की ओर भागता है तो देवी पीछा कर समुद्र में प्रवेश करती है और खड्ग से उसका शिरच्छेद कर चर्म-मुण्डधरा रूप में प्रकट होती है। प्रभास क्षेत्र में लौटकर वह तेजस्वी, बहुरूपिणी परिषदा सहित विराजती है। विस्मित देव उसे चामुण्डा, कालरात्रि, महामाया, महाकाली/कालिका आदि उग्र-रक्षक नामों से स्तुति करते हैं। देवी वर देती है; देव प्रार्थना करते हैं कि वह इसी क्षेत्र में प्रतिष्ठित रहे, उसका स्तोत्र पाठकों को फल दे, और जो भक्तिभाव से उसकी उत्पत्ति-कथा सुने वह शुद्धि और परा गति पाए। शुक्लपक्ष में, विशेषतः आश्विन मास की नवमी को पूजन शुभ कहा गया है। अंत में देवी वहीं निवास करती है और देव शत्रुओं को जीतकर स्वर्ग लौट जाते हैं।

मंत्रावलिक्षेत्रपालमाहात्म्यवर्णनम् / The Māhātmya of the Mantrāvalī Kṣetrapāla
इस अध्याय में ईश्वर देवी को बताते हैं कि ईशान (उत्तर-पूर्व) दिशा में स्थित एक अत्यन्त शक्तिशाली क्षेत्रपाल के पास कैसे जाना चाहिए। वह क्षेत्रपाल मंत्रों की माला/श्रृंखला (मंत्रावली) से अलंकृत है और हिरण्य-तट के निकट रक्षण हेतु प्रतिष्ठित है; वह ‘हीरक-क्षेत्र’ नामक रत्न-सदृश उपक्षेत्र की विशेष रक्षा करता है। फिर व्रत-काल का विधान आता है—कृष्णपक्ष की त्रयोदशी को उपासक सुगंध, पुष्प, नैवेद्य तथा बलि-प्रदान से उस क्षेत्रपाल की पूजा करे। विधिपूर्वक पूजित होने पर वह देवता सर्वकाम-प्रद बनता है; तीर्थ-आचरण की मर्यादा में यह उपासना रक्षण और इच्छित फल—दोनों प्रदान करती है।

Vicitreśvaramāhātmya (विचित्रेश्वरमाहात्म्य) — The Glory of Vicitreśvara
ईश्वर देवी से कहते हैं कि वे हिरण्यातीरे स्थित ‘विचित्रेश्वर’ नामक परम पवित्र शिव-धाम में जाएँ। यह तीर्थ महापातकों का नाश करने वाला और प्रभास-क्षेत्र में अत्यन्त श्रेष्ठ माना गया है। इस शिवालय की उत्पत्ति ‘विचित्र’ नामक यमराज के लेखक से बताई गई है। उसने कठोर तपस्या की, जिसके फलस्वरूप वहाँ एक महा-रौद्र लिंग की प्रतिष्ठा हुई। फलश्रुति में कहा गया है कि जो इस लिंग का दर्शन करता है, वह यमलोक का दर्शन नहीं करता—अर्थात् यह दर्शन पाप-निवारक और मोक्षदायक माना गया है।

ब्रह्मेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Brahmeśvara Māhātmya (Account of the Glory of Brahmeśvara)
इस अध्याय में ईश्वर देवी को दिव्य उपदेश देते हैं और तीर्थयात्रियों को भी उसी पवित्र क्षेत्र में स्थित एक विशेष स्थान की ओर निर्देशित करते हैं। वह सरस्वती के तट पर है, पार्णादित्य से संबद्ध चिन्ह के पश्चिम में, निकट/ऊपर की दिशा-चिह्नों सहित वर्णित है। वहाँ प्राचीन काल में ब्रह्मा द्वारा प्रतिष्ठित एक प्रसिद्ध लिंग है, जिसका नाम ‘ब्रह्मेश्वर’ कहा गया है और जिसे सर्व-पाप-नाशक बताया गया है। व्रत-विधान के अनुसार द्वितीया तिथि को वहाँ स्नान करके उपवास करना चाहिए, इन्द्रियों को संयम में रखकर ‘ब्रह्मेश्वर’ नाम से देवाधिदेव की पूजा करनी चाहिए। साथ ही पितरों के लिए तर्पण और श्राद्ध करने से शाश्वत पद/धाम की प्राप्ति बताई गई है।

Piṅgā-nadī-māhātmya (Glorification of the Piṅgā River)
ईश्वर देवी से कहते हैं कि वह ऋषि-तीर्थ के पश्चिम में स्थित, पापों का नाश करने वाली और समुद्र में मिलने वाली पिङ्गली (पिङ्गा) नदी के पास जाए। इस नदी का फल क्रम से बताया गया है—केवल दर्शन से महान पितृकर्म के समान पुण्य; स्नान से उसका दुगुना; तर्पण से चार गुना; और श्राद्ध करने से असीम फल प्राप्त होता है। पूर्वकथा में सोमेश्वर के दर्शन हेतु आए कुछ ऋषि, जो दक्षिणदेशीय तथा कृष्णवर्ण/विकृत रूप वाले कहे गए हैं, नदी के निकट उत्तम आश्रम में स्नान करते ही सुंदर हो जाते हैं और काम-सदृश (अत्यन्त आकर्षक) प्रतीत होते हैं। वे आश्चर्य से कहते हैं कि हमें ‘पिङ्गत्व’ प्राप्त हुआ, इसलिए यह नदी आगे ‘पिङ्गा’ नाम से प्रसिद्ध होगी। यह भी कहा गया है कि जो परम भक्ति से यहाँ स्नान करता है, उसके वंश में कुरूप संतान नहीं होती। अंत में ऋषि नदी-तट पर अलग-अलग स्थानों पर निवास कर, केवल यज्ञोपवीत धारण करने वाले तपस्वी बनकर अनेक तीर्थों की स्थापना और नामकरण करते हैं।

पिंगलादित्य–पिंगादेवी–शुक्रेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् (Māhātmya of Piṅgalāditya, Piṅgā Devī, and Śukreśvara)
इस अध्याय में ईश्वर देवी से प्रभास-क्षेत्र के भीतर दर्शन-योग्य पवित्र स्थलों और उनसे जुड़े व्रत-फलों का वर्णन करते हैं। सबसे पहले पाप-नाशक सूर्य-स्वरूप पिंगलादित्य के दर्शन का विधान बताया गया है, जिससे तीर्थयात्री की शुद्धि और पुण्यवृद्धि होती है। फिर पिंगादेवी को पार्वती-स्वरूप मानकर उसी पवित्र परिक्रमा में देवी-पूजन का महत्त्व स्थापित किया गया है। इसके बाद तृतीया तिथि के विशेष उपवास का निर्देश है, जिसके करने से अभीष्ट सिद्धि तथा धन, संतान आदि शुभ फल प्राप्त होते हैं। अंत में शुक्लेश्वर नामक लिंग/धाम का माहात्म्य कहा गया है, जिसके दर्शन से समस्त पातकों से मुक्ति होती है। इस प्रकार दर्शन, उपवास और भक्ति को क्षेत्र में नैतिक-आध्यात्मिक शुद्धि का साधन बताया गया है।

Brahmeśvara-māhātmya (ब्रह्मेश्वरमाहात्म्य) — Origin and Merit of the Brahmeśvara Liṅga
ईश्वर महादेवी से कहते हैं कि वह सरस्वती के तट पर, पर्णादित्य के पश्चिम में स्थित उस पवित्र स्थान पर जाएँ, जिसकी पूजा स्वयं ब्रह्मा ने की थी। फिर वे उसकी उत्पत्ति-कथा बताते हैं—चार प्रकार की सृष्टि रचने से पहले एक अद्भुत, वर्णनातीत स्त्री प्रकट हुई, जो पुराणोक्त सौंदर्य-लक्षणों से युक्त थी। उसे देखकर ब्रह्मा काम से मोहित हो गए और उससे संग की याचना करने लगे; उसी क्षण उनका पाँचवाँ सिर गिर पड़ा और गधे के समान हो गया—यह तत्काल धर्मदोष के रूप में कहा गया है। अपनी ‘पुत्री’ के प्रति उठे निषिद्ध काम की गंभीरता समझकर ब्रह्मा शुद्धि के लिए प्रभास आए, क्योंकि तीर्थ-स्नान के बिना देह और धर्म की पवित्रता असंभव बताई गई है। सरस्वती में स्नान करके उन्होंने देवदेव शूलिन शिव का लिंग स्थापित किया और मल-कलुष से मुक्त होकर अपने लोक लौट गए। फलश्रुति में कहा है कि जो सरस्वती में स्नान कर उस ब्रह्मेश्वर-लिंग का दर्शन करता है, वह सब पापों से छूटकर ब्रह्मलोक में सम्मान पाता है; और चैत्र शुक्ल चतुर्दशी को दर्शन करने से महेश्वर के परम पद की प्राप्ति होती है।

संगमेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Sangameśvara Māhātmya (Glory of the Lord of the Confluence)
ईश्वर देवी से कहते हैं कि वह ‘संगमेश्वर’ नामक देवता के दर्शन हेतु जाए। यह देव ‘गोलक’ के नाम से भी प्रसिद्ध है और पापों का नाश करने वाला बताया गया है। कथा उस पवित्र स्थान का निर्देश करती है जहाँ सरस्वती और पिङ्गा का संगम है, और वहीं तप में सिद्ध महर्षि उद्दालक का परिचय देती है। उद्दालक के कठोर तप के समय उनके सामने शिवलिंग प्रकट होता है, जो भक्ति की दिव्य स्वीकृति का संकेत है। तब एक अशरीरी वाणी घोषणा करती है कि उस स्थान पर भगवान की स्थायी उपस्थिति रहेगी, और संगम पर लिंग के प्रादुर्भाव के कारण इस तीर्थ का नाम ‘संगमेश्वर’ स्थापित होता है। फलश्रुति में कहा गया है कि जो प्रसिद्ध संगम में स्नान करके संगमेश्वर के दर्शन करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है। उद्दालक निरंतर लिंग-पूजन करते हुए जीवन के अंत में महेश्वर के धाम को प्राप्त होते हैं, और यह प्रसंग तीर्थ-भक्ति से मुक्ति का आदर्श प्रस्तुत करता है।

Gaṅgeśvara Māhātmya (गंगेश्वरमाहात्म्य) — The Glory of Gaṅgeśvara Liṅga
ईश्वर देवी से कहते हैं कि संगमेश्वर के पश्चिम में त्रिलोकों में प्रसिद्ध गंगेश्वर नामक लिंग स्थित है। वे उसका माहात्म्य सुनाते हुए बताते हैं कि एक विशेष समय पर प्रभुविष्णु ने अभिषेक-कार्य हेतु गंगा को बुलाया था। गंगा वहाँ पहुँचकर एक अत्यन्त पुण्य क्षेत्र देखती हैं—जहाँ ऋषियों का आवागमन रहता है, असंख्य लिंग विराजते हैं और तपस्वियों के आश्रम फैले हैं। शिव-भक्ति से प्रेरित होकर गंगा उसी क्षेत्र में गंगेश्वर लिंग की स्थापना करती हैं। अध्याय में कहा गया है कि इस धाम का केवल दर्शन करने से गंगास्नान का फल मिलता है, और मनुष्य को हजार अश्वमेध यज्ञों के समान पुण्य प्राप्त होता है। इस प्रकार स्थान-निर्देश, स्थापना-कथा और फलश्रुति—तीनों मिलकर भक्ति और तीर्थयात्रा का मार्ग बताते हैं।

Śaṅkarāditya-māhātmya (The Glory of Śaṅkarāditya)
ईश्वर–देवी के संक्षिप्त संवाद में यह अध्याय यात्री को गङ्गेश्वर के पूर्व में स्थित, शंकर द्वारा प्रतिष्ठित ‘शङ्करादित्य’ नामक देवालय की उपासना का निर्देश देता है। विशेष रूप से शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को वहाँ पूजा करना अत्यन्त शुभ बताया गया है। विधि यह है कि ताम्र-पात्र में रक्ता चन्दन और लाल पुष्प मिलाकर अर्घ्य तैयार करें और एकाग्र चित्त से अर्पित करें। ऐसा करने से उपासक दिवाकर-संबद्ध परम लोक को प्राप्त होता है, परा सिद्धि पाता है और दरिद्रता में नहीं गिरता। अंत में कहा गया है कि उस क्षेत्र में पूर्ण प्रयत्न से शङ्करादित्य की आराधना करें, क्योंकि वे सर्वकाम-फल-प्रदाता हैं।

शङ्करनाथमाहात्म्यवर्णनम् (Śaṅkaranātha Māhātmya—Account of the Glory of Śaṅkaranātha)
ईश्वर देवी से कहते हैं कि तीर्थयात्रा का क्रम त्रिलोकों में प्रसिद्ध, पापों का नाश करने वाले शङ्करनाथ नामक लिङ्ग की ओर किया जाए। वे बताते हैं कि इस लिङ्ग की प्रतिष्ठा भानु (सूर्य) ने महान तप करके की थी और उसी ने वहाँ देवालय स्थापित कराया। इसके बाद संक्षेप में आचार-धर्म बताए जाते हैं—उपवास सहित महादेव की पूजा, ब्राह्मणों को भोजन कराना, इन्द्रिय-संयम के साथ श्राद्ध करना, और सामर्थ्य के अनुसार स्वर्ण व वस्त्र का दान। अंत में स्पष्ट फल कहा गया है कि ऐसा करने वाला परम धाम को प्राप्त होता है।

गुफेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Gufeśvara Shrine-Māhātmya (Description of the Glory of Gufeśvara)
इस अध्याय में ईश्वर महादेवी को दिव्य उपदेश देते हुए तीर्थ-यात्रा का मार्ग बताते हैं और ‘गुफेश्वर’ नामक श्रेष्ठ धाम का निर्देश करते हैं। यह स्थान हिरण्या के उत्तरी भाग में स्थित है और इसे अनुपम तथा ‘सर्वपातकनाशक’ कहा गया है। यहाँ दर्शन की महिमा विशेष रूप से कही गई है—गुफेश्वर के देवता का केवल दर्शन मात्र भी अत्यन्त भारी पापों का नाश कर देता है। फलश्रुति में अतिशयोक्ति सहित कहा गया है कि यह ‘कोटि-हत्याओं’ जैसे महादोषों को भी दूर कर देता है; इस प्रकार प्राभास-क्षेत्र के मानचित्र में यह तीर्थ मोक्षदायी शुद्धि-स्थल के रूप में प्रतिष्ठित होता है।

घण्टेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Ghanteśvara Shrine-Māhātmya (Description of the Glory of Ghanteśvara)
इस अध्याय में ईश्वर के उपदेश के रूप में प्रभास क्षेत्र में स्थित ‘घण्टेश्वर’ की महिमा कही गई है। उसे ‘सर्व-पातक-नाशक’ बताया गया है, जिसकी वंदना देव और दानव दोनों करते हैं; ऋषि और सिद्ध भी उसकी आराधना करते आए हैं। यह तीर्थ/मंदिर भक्तों को वांछित फल देने वाला माना गया है। फिर एक विशेष व्रत-विधान बताया गया है—जो मनुष्य-भक्त सोमवारे पड़ने वाली अष्टमी तिथि को घण्टेश्वर की विधिपूर्वक पूजा करता है, वह इच्छित वस्तुएँ प्राप्त करता है और पाप से मुक्त कहा गया है। अंत में कोलophon में इसे स्कन्दपुराण के प्रभास खण्ड, प्रभासक्षेत्र-माहात्म्य के अंतर्गत 254वाँ अध्याय बताया गया है।

ऋषितीर्थमाहात्म्य (The Māhātmya of Ṛṣi-tīrtha / Rishi Tirtha)
ईश्वर प्रभास के निकट स्थित प्रसिद्ध ऋषितीर्थ का माहात्म्य बताते हैं, विशेषतः उसके पश्चिम भाग का, जहाँ अनेक महर्षि निवास करते थे। अङ्गिरा, गौतम, अगस्त्य, विश्वामित्र, अरुन्धती सहित वसिष्ठ, भृगु, कश्यप, नारद, पर्वत आदि ऋषि संयम और एकाग्रता से तप करके शाश्वत ब्रह्मलोक की प्राप्ति चाहते थे। तभी भयंकर अनावृष्टि और दुर्भिक्ष पड़ता है। उपरिचर नामक राजा अन्न और धन-रत्न देने आता है और कहता है कि दान ग्रहण करना ब्राह्मणों की निर्दोष आजीविका है। ऋषि राजदान के दोष बताते हैं—लोभ से पतन, संचय और तृष्णा का बंधन, तथा अनुचित आश्रय से धर्महानि। वे संतोष और निष्कामता की प्रशंसा करते हुए दान स्वीकार नहीं करते। राजा के सेवक उदुम्बर वृक्षों के पास ‘हिरण्यगर्भ’ जैसे खजाने बिखेर देते हैं, पर ऋषि उन्हें भी त्यागकर आगे बढ़ जाते हैं। वे कमलों से भरे एक महान सरोवर में स्नान करते हैं और जीवन-निर्वाह हेतु कमल-नाल (बीस) लेते हैं। शुनोमुख नामक एक परिव्राजक वह बीस उठा लेता है ताकि धर्म-विचार हो; तब ऋषि शपथ/शाप के द्वारा चोर के नैतिक पतन का स्वरूप बताते हैं। वही शुनोमुख अपने को पुरन्दर इन्द्र प्रकट कर ऋषियों की निःस्पृहता की स्तुति करता है और कहता है कि यही अविनाशी लोकों का आधार है। अंत में ऋषि एक स्थानीय व्रत-विधि पूछते हैं—जो व्यक्ति यहाँ आकर शुद्ध रहकर तीन रात्रि उपवास करे, स्नान करे, पितरों को तर्पण दे और श्राद्ध करे, उसे समस्त तीर्थों के समान पुण्य मिलता है, अधोगति नहीं होती और दिव्य संगति प्राप्त होती है।

नन्दादित्यमाहात्म्यवर्णनम् (The Māhātmya of Nandāditya)
इस अध्याय में ईश्वर देवी से कहते हैं कि प्रभास-क्षेत्र में राजा नन्द द्वारा प्रतिष्ठित सूर्य-स्वरूप ‘नन्दादित्य’ का पूजन और मंदिर-स्थापन धर्मसम्मत है। नन्द को आदर्श राजा बताया गया है, जिसके राज्य में प्रजा सुखी रहती है; पर कर्मविपाक से वह भयंकर कुष्ठरोग से ग्रस्त हो जाता है। कारण जानने पर पूर्वकथा आती है—विष्णु-प्रदत्त दिव्य विमान से वह मानसरovar पहुँचा, जहाँ उसे अत्यन्त दुर्लभ ‘ब्रह्मज कमल’ दिखा, जिसके भीतर अंगूठे-भर तेजस्वी पुरुष विराजमान था। यश के लोभ से उसने कमल को पकड़वाना चाहा; स्पर्श होते ही भयानक नाद हुआ और वह तत्काल रोगी हो गया। वसिष्ठ मुनि बताते हैं कि वह कमल परम पवित्र है; उसे लोक-दर्शन हेतु ले जाने का अभिप्राय ही दोष बना, और भीतर का देव प्रद्योतन/सूर्य ही है। वे प्रभास में भास्कर की शान्ति-आराधना का विधान करते हैं। नन्द नन्दादित्य की स्थापना कर अर्घ्यादि से पूजा करता है; सूर्य तुरंत रोग-निवारण कर वहाँ स्थायी निवास का वर देते हैं और कहते हैं कि रविवार को सप्तमी पड़ने पर जो दर्शन करेगा वह परम पद पाएगा। अंत में फलश्रुति है—इस तीर्थ में स्नान, श्राद्ध और दान, विशेषतः कपिला गौ या घृत-धेनु का दान, अपार पुण्य और मुक्ति-सहायक फल देता है।

त्रितकूपमाहात्म्य (Glory of the Trita Well)
ईश्वर देवी को सौराष्ट्र के विद्वान् आत्रेय (राजा/ब्राह्मण) और उसके तीन पुत्रों—एकत, द्वित और कनिष्ठ त्रित—की कथा सुनाते हैं। त्रित वेदज्ञ, सदाचारी और धर्मनिष्ठ था, जबकि बड़े दोनों भाई आचरण में दूषित थे। आत्रेय के देहान्त के बाद त्रित ने नेतृत्व संभाला और यज्ञ का संकल्प करके ऋत्विजों को बुलाया, देवताओं का आवाहन किया। दक्षिणा के लिए वह भाइयों सहित प्रभास की ओर गौ-संग्रह हेतु चला; विद्या के कारण उसे मार्ग में सत्कार और दान प्राप्त हुए, जिससे भाइयों के मन में ईर्ष्या बढ़ी। रास्ते में एक भयानक बाघ प्रकट हुआ, गौएँ तितर-बितर हो गईं। पास ही एक डरावना सूखा कुआँ देखकर भाइयों ने अवसर पाकर त्रित को जलरहित कुएँ में धकेल दिया और गौओं को लेकर चले गए। कुएँ में त्रित ने निराश न होकर ‘मानस-यज्ञ’ किया—सूक्तों का जप, और बालू से प्रतीकात्मक होम। उसकी श्रद्धा से देव प्रसन्न हुए और सरस्वती को भेजकर कुएँ में जल भरवाया; त्रित जल के सहारे बाहर निकल आया। तब वह स्थान ‘त्रितकूप’ कहलाया। अध्याय के अंत में विधान बताया गया है—शुद्ध होकर वहाँ स्नान, पितृ-तर्पण, तथा स्वर्ण सहित तिल-दान अत्यन्त पुण्यदायक है। यह तीर्थ अग्निष्वात्त और बर्हिषद् आदि पितृगणों को प्रिय कहा गया है; इसके दर्शन मात्र से भी जीवनपर्यन्त पापों का क्षय होता है, इसलिए कल्याण चाहने वालों को वहाँ स्नान करने की प्रेरणा दी गई है।

शशापानतीर्थप्रादुर्भावः (Origin of the Śaśāpāna Tīrtha) / The Emergence of Shashapana Tirtha
ईश्वर देवी को शशापान नामक पापनाशक तीर्थ की उत्पत्ति सुनाते हैं, जो शशापान-स्मृतिस्थान के दक्षिण में स्थित है। समुद्र-मंथन के बाद देवताओं को अमृत मिला और उसके असंख्य बिंदु पृथ्वी पर गिरे। वहीं एक प्यासा शशक (खरगोश) जल में उतरकर अमृत-मिश्रित सरोवर से जुड़ गया और अमृत-स्पर्श से उसे अद्भुत अवस्था प्राप्त हुई; वह चिह्नरूप से वहीं दिखाई देने लगा। देवताओं को भय हुआ कि मनुष्य गिरे हुए अमृत को पीकर अमर न हो जाएँ। इसी बीच व्याध के प्रहार से पीड़ित और चलने में असमर्थ चन्द्र (निशानाथ) अमृत माँगते हैं। देवता उन्हें बताते हैं कि बहुत-सा अमृत उसी सरोवर में गिरा है और वहीं से पीने को कहते हैं। चन्द्र शशक के साथ/शशक-संबद्ध जल को पीकर पुष्ट और तेजस्वी हो जाते हैं, और शशक अमृत-संपर्क का प्रत्यक्ष संकेत बनकर बना रहता है। फिर देवता सूखे पड़े कुंड को खोदते हैं और जल पुनः प्रकट हो जाता है। चन्द्र द्वारा शशक-संबद्ध जल पीने के कारण उस तीर्थ का नाम ‘शशापान’ प्रसिद्ध होता है। फलश्रुति में कहा है—जो वहाँ स्नान करते हैं वे महेश्वर-सम्बन्धी परम गति पाते हैं; जो ब्राह्मणों को अन्नदान देते हैं उन्हें समस्त यज्ञों का फल मिलता है; आगे सरस्वती वडवाग्नि सहित आकर तीर्थ को और पवित्र करती हैं, इसलिए पूर्ण प्रयत्न से वहाँ स्नान का विधान बताया गया है।

पर्णादित्यमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of Parnāditya (Sun Shrine) on the Prācī Sarasvatī
इस अध्याय में ईश्वर महादेवी को उपदेश देते हैं कि यात्री प्राची सरस्वती के उत्तरी तट पर स्थित सूर्यदेव के पवित्र स्थान ‘पर्णादित्य’ के दर्शन करे। फिर एक प्राचीन कथा कही जाती है—त्रेता-युग में पर्णाद नामक ब्राह्मण प्रभास-क्षेत्र में आकर कठोर तप करता है और दिन-रात अखंड भक्ति से सूर्य की धूप, माला, चंदन आदि तथा वेदसम्मत स्तोत्रों से पूजा करता है। संतुष्ट होकर सूर्यदेव प्रकट होते हैं और वर मांगने को कहते हैं। भक्त पहले दुर्लभ प्रत्यक्ष दर्शन का अनुग्रह चाहता है, और फिर यह भी प्रार्थना करता है कि सूर्यदेव वहीं सदा प्रतिष्ठित रहें। सूर्यदेव उसकी बात स्वीकार कर उसे सूर्यलोक-प्राप्ति का वर देते हैं और अंतर्धान हो जाते हैं। अंत में तीर्थ-नियम और फलश्रुति बताई गई है—भाद्रपद मास की षष्ठी को स्नान करके पर्णादित्य के दर्शन करने से दुःख का निवारण होता है; इस दर्शन का पुण्य प्रयाग में विधिपूर्वक सौ गायों के दान के फल के समान कहा गया है। जो घोर रोगों से पीड़ित होकर भी पर्णादित्य को नहीं पहचानते, उन्हें अविवेकी बताया गया है—जिससे जानकर, श्रद्धा से तीर्थ-सेवा का महत्व दृढ़ होता है।

Siddheśvara-māhātmya (Glorification of Siddheśvara)
ईश्वर देवी से कहते हैं कि प्राभास क्षेत्र के पश्चिम भाग में स्थित सिद्धेश्वर की ओर जाओ, जो सिद्धों द्वारा स्थापित परम देवस्वरूप है। दिव्य सिद्ध वहाँ आते हैं और सभी कार्यों में सिद्धि पाने के उद्देश्य से लिंग का विधिपूर्वक अभिषेक कर उसे प्रतिष्ठित करते हैं; उनके घोर तप को देखकर शिव प्रसन्न हो जाते हैं। शिव उन्हें अणिमा आदि अनेक अद्भुत सिद्धियाँ और ऐश्वर्य प्रदान करते हैं तथा उस स्थान पर अपने नित्य सान्निध्य की घोषणा करते हैं। फिर विधान बताया जाता है कि चैत्र मास की शुक्ल चतुर्दशी को वहाँ शिव-पूजन करने वाला शिव-कृपा से परम पद को प्राप्त होता है। अंत में शिव अंतर्धान हो जाते हैं, सिद्ध निरंतर पूजा करते रहते हैं; और उपदेश दिया जाता है कि सिद्धेश्वर की भक्ति से महान सिद्धि और इच्छित फल मिलते हैं, इसलिए उसकी सतत आराधना करनी चाहिए।

न्यंकुमतीमाहात्म्यवर्णनम् | Nyankumatī River Māhātmya (Glorification of the Nyankumatī)
इस अध्याय में ईश्वर देवी को धर्मोपदेश देते हुए न्यंकुमती नदी की ओर निर्देश करते हैं। कहा गया है कि क्षेत्र-शान्ति के लिए शम्भु ने इस नदी को पवित्र मर्यादा में स्थापित किया, और इसके दक्षिण भाग में ऐसा तीर्थ है जो समस्त पापों का नाश करने वाला है। वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके श्राद्ध करने से पितर नरकादि दुःखद अवस्थाओं से मुक्त हो जाते हैं—ऐसी फलश्रुति बताई गई है। आगे विधान है कि वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को स्नान करके तिल, दर्भ और जल से तर्पण सहित श्राद्ध किया जाए; ऐसा श्राद्ध गंगा-तट पर किए गए श्राद्ध के समान फल देने वाला कहा गया है।

वराहस्वामिमाहात्म्यवर्णनम् (Varāha Svāmī Māhātmya—Account of the Glory of Varāha Svāmī)
इस अध्याय में ईश्वर महादेवी को संक्षिप्त तत्त्वोपदेश देते हैं। वे निर्देश करते हैं कि गोष्पद के दक्षिण में स्थित वराहस्वामी के पवित्र धाम में जाया जाए, जिसे ‘पाप-प्रणाशन’ कहा गया है—जहाँ पापों का नाश होता है। वहाँ शुक्ल पक्ष की एकादशी को विशेष रूप से पूजन करने का विधान बताया गया है। इस दिन श्रद्धापूर्वक की गई पूजा से साधक समस्त पापों से मुक्त होकर अंततः ‘विष्णुपद’ को प्राप्त करता है। अध्याय स्थान, समय, कर्म और फल—इन चारों को जोड़कर प्राभास-क्षेत्र की साधना-मार्गरेखा प्रस्तुत करता है।

छायालिङ्गमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of Chāyā-liṅga (Shadow Liṅga)
इस अध्याय में ईश्वर देवी से प्राभास-क्षेत्र के एक विशेष लिंग—छायालिंग—का माहात्म्य संक्षेप में कहते हैं। वे उसका स्थान भी बताते हैं कि वह न्यंकुमती तीर्थ के उत्तर दिशा में स्थित है, जिससे तीर्थ-भूगोल में उसकी पवित्रता स्पष्ट होती है। आगे छायालिंग के दर्शन को अत्यन्त महान फल देने वाला और अद्भुत प्रभावयुक्त बताया गया है। जो भक्त श्रद्धा से इसका दर्शन करता है, वह पापों से शुद्ध होता है; परन्तु अत्यधिक पापी जन इसे देख नहीं पाते—इस प्रकार दर्शन को साधना और नैतिक-आध्यात्मिक पात्रता से जोड़ा गया है। अंत में स्कन्दपुराण के प्राभासखण्ड, प्राभासक्षेत्र-माहात्म्य में ‘छायालिंग माहात्म्य’ अध्याय का उल्लेख किया गया है।

नंदिनीगुफामाहात्म्यवर्णनम् / The Māhātmya (Sacred Account) of Nandinī Cave
इस अध्याय में शिव–देवी का संक्षिप्त संवाद आता है, जिसमें ईश्वर प्रभास-क्षेत्र में स्थित नंदिनी-गुफा का माहात्म्य बताते हैं। वे कहते हैं कि यह गुफा स्वभाव से ही पातक-नाशिनी और परम पवित्र है, तथा पुण्यशील ऋषियों और सिद्धों का निवास/समागम-स्थल होने से इसकी पवित्रता और भी प्रतिष्ठित होती है। मुख्य उपदेश दर्शन-आधारित है—जो व्यक्ति वहाँ जाकर नंदिनी-गुफा का दर्शन करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है और चांद्रायण व्रत के समान फल प्राप्त करता है। इस प्रकार अध्याय स्थल की पहचान, सिद्ध-ऋषि-संबंध से उसकी पावनता, और तीर्थ-दर्शन की फलश्रुति को प्रायश्चित्त-व्रत के तुल्य घोषित करता है।

कनकनन्दामाहात्म्यवर्णनम् (Glorification of Goddess Kanakanandā)
इस अध्याय में ईश्वर महादेवी से संक्षिप्त शैव-शाक्त उपदेश करते हैं और ईशान्य (उत्तर-पूर्व) दिशा में स्थित देवी कनकनन्दा के क्षेत्र की ओर ध्यान दिलाते हैं। देवी को ‘सर्वकामफलप्रदा’ कहा गया है, जो भक्तों की समस्त अभिलाषाएँ पूर्ण करती हैं। यहाँ यात्रा और पूजन की विधि बताई गई है—चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को विधिपूर्वक यात्रा करके देवी का पूजन करना चाहिए। स्थान, काल और नियमबद्ध भक्ति के इस समन्वय से जो यात्री श्रद्धा से आचरण करता है, उसे इच्छित फल तथा सर्वकाम-प्राप्ति होती है—यही स्पष्ट फलश्रुति है।

Kumbhīśvara Māhātmya (कुम्भीश्वरमाहात्म्य) — The Glory of Kumbhīśvara
इस अध्याय में ईश्वर महादेवी को उपदेश देते हैं कि शरभस्थान के पूर्व दिशा में थोड़ी दूरी पर स्थित ‘अनुत्तर’ कुम्भीश्वर-धाम का दर्शन करना चाहिए। प्राभास-क्षेत्र की तीर्थ-परंपरा में इस शिवालय का स्थान बताकर, तीर्थ-यात्रा की दिशा और पवित्र भूगोल का संकेत किया गया है। मुख्य फलश्रुति यह है कि कुम्भीश्वर का मात्र दर्शन करने से मनुष्य ‘सर्व पातकों’ से मुक्त हो जाता है। इस प्रकार पवित्र स्थल का दर्शन नैतिक-आध्यात्मिक शुद्धि का साधन बताया गया है। अंत में कोलोफोन में इसे स्कन्दमहापुराण (८१,००० श्लोक) के प्राभासखण्ड, प्रथम प्राभासक्षेत्र-माहात्म्य के अंतर्गत ‘कुम्भीश्वरमाहात्म्य’ नामक २६६वाँ अध्याय कहा गया है।

गङ्गापथ-गङ्गेश्वर-माहात्म्यवर्णनम् | Glory of Gaṅgāpatha and Gaṅgeśvara
इस अध्याय में शैव संवाद के भीतर ईश्वर देवी से गङ्गापथ नामक पवित्र तीर्थ का वर्णन करते हैं, जहाँ महावेगवती गङ्गा प्रवाहित होती है और गङ्गेश्वर नाम से शिव का दिव्य स्वरूप प्रतिष्ठित है। गङ्गा को समुद्रगामिनी, पापनाशिनी, पृथ्वी पर ‘उत्ताना’ नाम से प्रसिद्ध तथा त्रिलोकी का भूषण कहा गया है। विधि यह है कि वहाँ स्नान करके गङ्गेश्वर का पूजन किया जाए। फलश्रुति में कहा गया है कि भक्त घोर पापों से मुक्त होता है और अनेक अश्वमेध यज्ञों के तुल्य पुण्य प्राप्त करता है। यह स्कन्दमहापुराण के प्रभासखण्ड, प्रभासक्षेत्रमाहात्म्य में गङ्गापथ–गङ्गेश्वर माहात्म्य का संक्षिप्त उपदेश है।

चमसोद्भेदमाहात्म्य (Camasodbheda Māhātmya: The Glory of the Camasodbheda Tīrtha)
इस अध्याय में ईश्वर देवी से कहते हैं कि तीर्थयात्री प्रभास-खण्ड के प्रसिद्ध ‘चमसोद्भेद’ नामक पवित्र स्थान में जाए। नाम की उत्पत्ति बताई गई है—ब्रह्मा ने वहाँ दीर्घकाल तक सत्र-यज्ञ किया, और देवताओं तथा महर्षियों ने चमस (यज्ञ-पात्र) से सोमपान किया; इसी कारण पृथ्वी पर वह स्थान ‘चमसोद्भेद’ कहलाया। फिर विधि बताई जाती है—उस तीर्थ की सरस्वती में स्नान करके पिण्डदान करना चाहिए। ऐसा करने से ‘गया-कोटि के समान’ पुण्य प्राप्त होता है; विशेष रूप से वैशाख मास को अत्यन्त फलदायी कहा गया है। अंत में इसे प्रभासक्षेत्र-माहात्म्य के अंतर्गत प्रभास-खण्ड का अध्याय बताकर उपसंहार किया गया है।

विदुराश्रम-माहात्म्यवर्णनम् (Glorification of Vidura’s Hermitage)
इस अध्याय में ईश्वर महादेवी से कहते हैं कि वे एक महान तीर्थ—विदुर के महा-आश्रम—की ओर ध्यान दें। यह वही स्थान है जहाँ धर्ममूर्ति विदुर ने ‘रौद्र’ प्रकार की कठोर तपस्या की थी। इसी पवित्र क्षेत्र में महादेव-लिङ्ग की प्रतिष्ठा हुई, जो त्रिभुवनेश्वर नाम से प्रसिद्ध है—मानो सर्वलोकाधिपति शिव का स्थानीय प्राकट्य। कहा गया है कि इस लिङ्ग के दर्शन से भक्त मनुष्य अपने इच्छित फल प्राप्त करते हैं और पापों की शान्ति होती है। यह क्षेत्र ‘विदुराट्टालक’ कहलाता है, जहाँ गण और गन्धर्व सेवा करते हैं; यह द्वादश-स्थानक वाला पवित्र परिसर है, जिसे बड़े पुण्य के बिना पाना कठिन है। यहाँ वर्षा का अभाव भी इस अद्भुत क्षेत्र-स्वभाव का संकेत माना गया है, और अंत में लिङ्ग-दर्शन को पापोपशमन का प्रभावी साधन बताया गया है।

Prācī Sarasvatī–Maṅkīśvara Māhātmya (प्राचीसरस्वतीमंकीश्वरमाहात्म्य)
इस अध्याय में ईश्वर (शिव) देवी को बताते हैं कि प्राची सरस्वती के प्रवाह-स्थल पर मंकीश्वर नामक लिंग प्रतिष्ठित है। वहाँ तपस्वी ऋषि मङ्कणक कठोर तप, संयमित आहार और अध्ययन में लगे रहते हैं। एक दिन हाथ से वनस्पति-रस जैसा स्राव निकलने पर वे उसे अद्भुत सिद्धि मानकर आनंद में नृत्य करने लगते हैं। उनके नृत्य से जगत में भारी विक्षोभ होता है—पर्वत हिलते हैं, समुद्र मथित-सा होता है, नदियाँ मार्ग बदलती हैं और ग्रह-नक्षत्रों की गति बिगड़ती है। तब इन्द्र आदि देव, ब्रह्मा-विष्णु सहित, त्रिपुरान्तक शिव की शरण लेते हैं। शिव ब्राह्मण-वेश में आकर कारण पूछते हैं और अंगूठे से भस्म प्रकट करके ऋषि का भ्रम दूर करते हुए विश्व-व्यवस्था को स्थिर कर देते हैं। मङ्कणक शिव की महिमा जानकर वर माँगते हैं कि उनका तप क्षीण न हो; शिव उनका तप बढ़ाते हैं और उस स्थान पर अपना स्थायी सान्निध्य स्थापित करते हैं। इसके बाद तीर्थ-विधि और फलश्रुति आती है। प्राची सरस्वती, विशेषतः प्रभास में, अत्यन्त पुण्यदायिनी कही गई है; उत्तर तट पर देहान्त को पुनर्जन्म-निवारक और अश्वमेध-सदृश फल देने वाला बताया गया है। नियमपूर्वक स्नान से परम सिद्धि और ब्रह्मपद की प्राप्ति, पात्र ब्राह्मण को अल्प स्वर्णदान से भी मेरु-तुल्य फल, श्राद्ध से अनेक पीढ़ियों का कल्याण, एक पिण्ड-दान व तर्पण से पितरों का उद्धार, अन्नदान से मोक्ष-पथ की पुष्टि, दही व ऊनी वस्त्र आदि दानों से विशेष लोक-प्राप्ति, तथा अशौच-निवारण हेतु स्नान को गोदान-फल के समान कहा गया है। कृष्णपक्ष चतुर्दशी के स्नान का विशेष महत्त्व बताया गया है और यह भी कि अल्प-पुण्य वालों के लिए यह नदी दुर्लभ है; कुरुक्षेत्र, प्रभास और पुष्कर का स्मरण करते हुए अंत में विष्णु-वचन उद्धृत है कि धर्मपुत्र को अन्य तीर्थों से बढ़कर प्राची सरस्वती को वरण करना चाहिए।

Jvāleśvara Māhātmya (ज्वालेश्वरमाहात्म्य) — The Glory of the Jvāleśvara Liṅga
इस अध्याय में प्रभास के मुख्य पवित्र क्षेत्र के निकट स्थित “ज्वालेश्वर” लिंग की उत्पत्ति-कथा कही गई है। ईश्वर बताते हैं कि त्रिपुरारि शिव से संबद्ध पाशुपत अस्त्र/शर का तेज जिस स्थान पर गिरा, वहीं ज्वाला-सी दीप्ति प्रकट हुई; इसलिए उस लिंग का नाम “ज्वालेश्वर” प्रसिद्ध हुआ। इस प्रकार एक दिव्य युद्ध-घटना को स्थायी तीर्थ-चिह्न बनाकर कथा को भूगोल से जोड़ा गया है। व्यावहारिक उपदेश संक्षेप में है—इस लिंग के केवल दर्शन से ही मनुष्य-भक्त की शुद्धि होती है और वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। अध्याय की रूपरेखा में इसे स्कन्दमहापुराण के प्रभासखण्ड, प्रथम प्रभासक्षेत्रमाहात्म्य के अंतर्गत 271वाँ अध्याय कहा गया है।

त्रिपुरलिंगत्रयमाहात्म्यम् | The Māhātmya of the Three Tripura Liṅgas
इस अध्याय में स्वयं ईश्वर तत्त्वोपदेश के रूप में तीर्थयात्री को निर्देश देते हैं। वे बताते हैं कि इसी पवित्र क्षेत्र में पूर्व दिशा (प्राची) में, देवी के सान्निध्य के निकट एक विशेष स्थान है, जहाँ त्रिपुर से संबद्ध तीन लिंग प्रतिष्ठित हैं। इन महात्मा त्रिपुर-पुरुषों के नाम विद्युन्माली, तारक और कपोल बताए गए हैं। अध्याय का मुख्य संदेश दिशा-निर्देश, लिंग-त्रय की पहचान और उसके फल का संबंध है। कहा गया है कि इन प्रतिष्ठित लिंगों का केवल दर्शन मात्र करने से भी साधक पापों से मुक्त हो जाता है। अंत में यह प्रसंग स्कन्दमहापुराण के प्राभास खण्ड, प्राभासक्षेत्र-माहात्म्य के अंतर्गत ‘त्रिपुरलिंगत्रयमाहात्म्य’ के रूप में निर्दिष्ट है।

शंडतीर्थ-उत्पत्ति तथा कपालमोचन-लिङ्गमाहात्म्य (Origin of Śaṇḍa-tīrtha and the Kapālamocana Liṅga)
ईश्वर देवी से शंडतीर्थ का माहात्म्य कहते हैं—यह तीर्थ अनुपम है, समस्त पापों को शांत करता है और मनोवांछित फल देता है। पूर्व प्रसंग में ब्रह्मा पंचशीर्ष थे; एक विशेष स्थिति में ईश्वर ने उनका एक सिर काट दिया। उस रक्तप्रवाह आदि से वह स्थान पवित्र हुआ और वहाँ विशाल ताड़-वृक्ष उत्पन्न हुए, इसलिए वह प्रदेश ताड़वन के रूप में प्रसिद्ध हुआ। ईश्वर के हाथ में कपाल (खोपड़ी) चिपक गया; उससे वे और उनका वृषभ काले पड़ गए। दोष-भय से दोनों तीर्थयात्रा पर निकले, पर कहीं भी भार नहीं उतरा। अंततः प्रभास में पूर्वाभिमुखी सरस्वती (प्राची देवी) के दर्शन हुए। वृषभ ने स्नान किया तो तुरंत श्वेत हो गया और उसी क्षण ईश्वर भी हत्यादोष से मुक्त हो गए; कपाल हाथ से गिर पड़ा और वहाँ कपालमोचन-लिंग की स्थापना हुई। इसके बाद प्राची देवी के निकट श्राद्ध का विधान बताया गया—पितरों की अत्यंत तृप्ति होती है, विशेषकर आश्वयुज मास की कृष्ण पक्ष चतुर्दशी को विधिपूर्वक, योग्य पात्रों को अन्न, सुवर्ण, दही, कंबल आदि दान सहित। वृषभ के श्वेत होने के कारण ही इस तीर्थ का नाम शंडतीर्थ प्रसिद्ध हुआ।

Sūryaprācī-māhātmya (Glory of Sūryaprācī)
इस अध्याय में प्रभास-क्षेत्र के भीतर एक संक्षिप्त तीर्थ-उपदेश दिया गया है। ईश्वर महादेवी से कहते हैं कि वे (और तीर्थयात्री भी) सूर्यप्राची नामक तेजस्वी, अत्यन्त प्रभावशाली स्थान पर जाएँ। इस तीर्थ का स्वरूप शुद्धिकारी बताया गया है—यह ‘सर्वपाप-शमन’ है और धर्मसम्मत इच्छाओं के फल भी प्रदान करता है, जैसा कि संयमित पुराणोक्त तीर्थयात्रा-नीति में कहा गया है। यहाँ मुख्य विधि तीर्थ-स्नान है। सूर्यप्राची में स्नान करने से पंच-पातकों (पाँच महापापों) से मुक्ति का फल बताया गया है, जो माहात्म्य साहित्य की प्रायश्चित्त-प्रधान वाणी को प्रबल करता है। उपसंहार में इसे स्कन्दमहापुराण की 81,000 श्लोकों वाली संहिता के प्रभास-खण्ड, प्रभासक्षेत्र-माहात्म्य के अंतर्गत ‘सूर्यप्राची-माहात्म्य’ अध्याय कहा गया है।

त्रिनेत्रेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of Trinetreśvara (Three-Eyed Śiva)
अध्याय 275 में ऋषि-तीर्थ के निकट त्रिनेत्रेश्वर शिव के तीर्थ का संक्षिप्त माहात्म्य और साधना-विधि बताई गई है। ईश्वर महादेवी से कहते हैं कि यात्री न्यंकुमती नदी के तट के उत्तर भाग में स्थित, ऋषियों द्वारा पूजित स्थान पर तीन नेत्रों वाले शिव के दर्शन-पूजन हेतु जाए। वहाँ का जल स्फटिक-सा निर्मल बताया गया है और तीर्थ की पहचान से जुड़ा एक विशेष जलचर/मत्स्य-चिह्न भी वर्णित है। यहाँ स्नान करने से ब्रह्महत्या जैसे महापाप-वर्ग से भी मुक्ति होने का उपदेश दिया गया है। फिर भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को व्रत का विधान है—उपवास करना और रात्रि-जागरण रखना। प्रातः श्राद्ध करके विधिपूर्वक शिव-पूजन करने का निर्देश है। फलश्रुति में कहा गया है कि इस विधि से साधक को दीर्घकाल तक रुद्रलोक में निवास प्राप्त होता है, जिससे तीर्थ-स्नान, व्रत और शिव-आराधना का शैव मोक्ष-परक फल स्पष्ट होता है।

Devikā-tīra Umāpati-māhātmya (देविकायामुमापतिमाहात्म्यवर्णनम्) — The Glory of Umāpati at the Devikā Riverbank
इस अध्याय में ईश्वर देवी को ऋषि-तीर्थ की ओर तीर्थ-यात्रा का उपदेश देते हैं और देविका के तट से जुड़े परम-पूज्य क्षेत्र का माहात्म्य बताते हैं। वहाँ ‘महासिद्धिवन’ नामक सिद्ध-वन का अलंकारिक वर्णन है—फूलों-फलों से लदे वृक्ष, पक्षियों का मधुर कलरव, पशु, गुफाएँ और पर्वत; और साथ ही देव, असुर, सिद्ध, यक्ष, गंधर्व, नाग तथा अप्सराएँ एकत्र होकर स्तुति, नृत्य, संगीत, पुष्प-वर्षा, ध्यान और भाव-विभोर भक्ति-क्रियाएँ करते हैं, जिससे वह स्थान एक पवित्र उपासना-भूमि बन जाता है। इसके बाद ईश्वर वहाँ ‘उमापतीश्वर’ नामक नित्य दिव्य-स्थान की स्थापना बताते हैं और कहते हैं कि वे युगों, कल्पों और मन्वन्तरों में सदा वहाँ विराजमान रहेंगे, विशेषतः देविका के शुभ तट से उनका अनन्य अनुराग है। पुष्य मास की अमावस्या को श्राद्ध करने का विधान है; फलश्रुति में दान-पुण्य की अक्षयता और दर्शन मात्र से महापाप-नाश, यहाँ तक कि ‘हजार ब्रह्महत्या’ जैसे घोर पापों के क्षय का कथन है। गौ, भूमि, स्वर्ण और वस्त्र आदि दानों की प्रशंसा करते हुए कहा गया है कि वहाँ पितृ-कार्य करने वाला अत्यन्त पुण्यवान होता है। अंत में व्युत्पत्ति दी गई है कि देवताओं के स्नानार्थ एकत्र होने से यह नदी ‘देविका’ कहलाती है, इसलिए यह ‘पाप-नाशिनी’ भी है।

Bhūdhara–Yajñavarāha Māhātmya (भूधरयज्ञवराहमाहात्म्य)
इस अध्याय में देविका नदी के तट पर स्थित एक पवित्र स्थल का वर्णन है, जहाँ ‘भूधर’ के दर्शन-पूजन का विधान बताया गया है। नाम की व्याख्या एक पौराणिक-याज्ञिक कारण से होती है—पृथ्वी को उठाने वाले वराह का स्मरण कराते हुए इस तीर्थ को यज्ञ-रूपक के माध्यम से समझाया गया है। वराह के शरीर को वेद-यज्ञ के अंगों से जोड़ा गया है: वेद उसके चरण, यूप उसके दाँत, स्रुव-स्रुच मुख/वदन, अग्नि जिह्वा, दर्भ केश, और ब्रह्मा/ब्रह्म शिरोभाग के रूप में निरूपित हैं; इस प्रकार सृष्टि-तत्त्व और यज्ञ-रचना का एकात्म भाव प्रकट होता है। अंत में श्राद्ध-प्रधान विधि दी गई है—पुष्य मास, अमावस्या, एकादशी, ऋतु-परिस्थिति तथा सूर्य के कन्या राशि में प्रवेश के समय किए जाने वाले कर्म बताए गए हैं। गुड़युक्त पायस और गुड़युक्त हवि आदि अर्पण, पितरों के लिए आवाहन-संस्कार, घी-दही-दूध आदि के लिए पृथक् मंत्र, फिर विद्वान विप्रों को भोजन और पिण्डदान का विधान है। फलश्रुति में कहा गया है कि यहाँ विधिपूर्वक किया गया श्राद्ध पितरों को दीर्घ काल तक तृप्त करता है और बिना गया गए भी गया-श्राद्ध के समान फल देता है, जिससे इस स्थानीय तीर्थ की विशेष मोक्षदायिनी महिमा स्थापित होती है।

देविकामाहात्म्य–मूलस्थानमाहात्म्यवर्णनम् (Devikā Māhātmya and the Glory of Mūlasthāna/Sūryakṣetra)
यह अध्याय शिव–देवी संवाद के रूप में है। ईश्वर देवीका नदी के रमणीय तट के पास स्थित एक प्रसिद्ध स्थान का वर्णन करते हैं, जो भास्कर (सूर्य) से संबद्ध है। देवी पूछती हैं—वाल्मीकि कैसे “सिद्ध” हुए और सप्तर्षियों को क्यों लूटा गया? तब ईश्वर बताते हैं कि एक ब्राह्मण कुल में जन्मा पुत्र (कथा में वैशाख/विशाख) वृद्ध माता-पिता और गृह-पालन के लिए चोरी करने लगा। तीर्थयात्रा में उसे सप्तर्षि मिले; उसने उन्हें धमकाया, पर ऋषि निर्विकार रहे। अङ्गिरा ने प्रश्न उठाया—अधर्म से कमाए धन के पाप का भागी कौन होगा? चोर ने माता-पिता और फिर पत्नी से पूछा, पर सबने कहा कि पाप का फल कर्ता को ही भोगना पड़ता है; कोई पाप बाँटने को तैयार न हुआ। इससे उसके भीतर वैराग्य जागा। उसने अपराध स्वीकार कर हिंसक/चौर्य-वृत्ति से हटने का उपाय माँगा। ऋषियों ने चार अक्षरों का मंत्र “झाटघोट” बताया—गुरु-आश्रय और एकाग्रता से जप करने पर यह पाप-नाशक और मोक्षदायक है। दीर्घकाल जप-समाधि से वह स्थिर हो गया और समय बीतने पर उसका शरीर चींटियों के बाँबी (वल्मीक) से ढक गया। बाद में ऋषि लौटे, बाँबी खोदकर उसे निकाला, उसकी सिद्धि पहचानकर उसे “वाल्मीकि” नाम दिया और रामायण-रचना की दिव्य प्रेरणा का वरदान बताया। फिर तीर्थ-माहात्म्य आता है—नीम वृक्ष की जड़ में सूर्य क्षेत्र-देवता रूप से विराजते हैं; यह स्थान “सूर्यक्षेत्र” और “मूलस्थान” कहलाता है। यहाँ स्नान, तिल-जल से तर्पण और श्राद्ध करने से पितरों का उद्धार होता है; जल-स्पर्श से पशुओं तक को लाभ बताया गया है। निर्दिष्ट तिथि/काल में किए गए कर्मों से कुछ त्वचा-रोग शांत होने की बात कही गई है। अंत में देव-दर्शन और इस कथा का श्रवण महादोष-निवारक माना गया है।

च्यवनादित्यमाहात्म्य—सूर्याष्टोत्तरशतनाम-माहात्म्यवर्णनम् (Cāvanāditya Māhātmya—The Glory of Sūrya’s 108 Names)
इस अध्याय में ईश्वर देवी से कहते हैं कि प्राभास-खण्ड में हिरण्या के पूर्व भाग में स्थित च्यवनार्क नामक श्रेष्ठ सूर्य-स्थान का आश्रय लिया जाए, जिसे महर्षि च्यवन ने प्रतिष्ठित किया था। वे बताते हैं कि सप्तमी तिथि को साधक शुद्ध होकर विधि-नियम से सूर्य की स्तुति करे और एकाग्रचित्त से सूर्य के अष्टोत्तरशतनाम (108 नाम) का पाठ करे। इसके बाद नामावली आती है, जिसमें सूर्य को काल के रूपों—कला, काष्ठा, मुहूर्त, पक्ष, मास, अहोरात्र, संवत्सर—के रूप में तथा इन्द्र, वरुण, ब्रह्मा, रुद्र, विष्णु, स्कन्द, यम आदि देवताओं के तुल्य और धाता, प्रभाकर, तमोनुद, लोकाध्यक्ष जैसे जगत्-कार्यकारी रूपों में वर्णित किया गया है। स्तोत्र की परम्परा भी कही गई है—शक्र ने उपदेश दिया, नारद ने ग्रहण किया, धौम्य ने युधिष्ठिर को दिया, और युधिष्ठिर ने अभीष्ट सिद्धि पाई। फलश्रुति में कहा है कि इसका नित्य पाठ, विशेषकर सूर्योदय के समय, धन-रत्न की वृद्धि, संतान-लाभ, स्मृति और बुद्धि का उत्कर्ष, शोक से मुक्ति तथा मनोकामना-पूर्ति देता है—यह सब अनुशासित भक्ति से प्राप्त, शास्त्रसम्मत फल है।

च्यवनेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of Cyavaneśvara
इस अध्याय में शिव–देवी संवाद के माध्यम से प्रभास-क्षेत्र में स्थित च्यवनेश्वर-लिंग का माहात्म्य कहा गया है, जिसे ‘सर्वपातक-नाशन’ बताया गया है। फिर भृगुवंशी ऋषि च्यवन की कथा आती है—वे प्रभास में आकर कठोर तप करते-करते स्थाणु-से अचल हो गए और वल्मीकों, लताओं तथा चींटियों से ढक गए। राजा शर्याति बड़े दल के साथ तीर्थयात्रा पर अपनी पुत्री सुकन्या सहित वहाँ पहुँचे। सुकन्या सखियों के साथ घूमते हुए उस वल्मीक के पास गई और ऋषि की आँखों को चमकती वस्तु समझकर काँटे से बेध देती है। ऋषि के क्रोध से राजा की सेना पर दंडरूप बाधा आती है—मल-मूत्रादि के निष्कासन में रुकावट जैसी पीड़ा। पूछताछ होने पर सुकन्या अपना अपराध स्वीकार करती है और शर्याति क्षमा माँगते हैं। च्यवन क्षमा तो करते हैं, पर शर्त रखते हैं कि सुकन्या का विवाह उनसे किया जाए; राजा सहमत हो जाता है। अंत में सुकन्या की आदर्श सेवा का वर्णन है—वह संयम, अतिथि-सत्कार और भक्ति से अपने तपस्वी पति की सेवा करती है; इस प्रकार तीर्थ-माहात्म्य के साथ उत्तरदायित्व, प्रायश्चित्त और निष्ठापूर्ण सेवा की शिक्षा दी जाती है।

च्यवनेश्वर-माहात्म्यवर्णनम् (Chyavaneśvara Māhātmya—Narration of the Glory of Chyavana’s Lord/Shrine)
ईश्वर शुकन्या की कथा कहते हैं। शुकन्या शर्याति की पुत्री और महर्षि च्यवन की पत्नी थीं। वन में दिव्य वैद्य अश्विनीकुमार उन्हें देखकर उनके सौंदर्य की प्रशंसा करते हुए, वृद्ध च्यवन की असमर्थता बताकर उन्हें पति-त्याग के लिए बहकाने का प्रयास करते हैं। पर शुकन्या पतिव्रता धर्म में अडिग रहती हैं और अपने पति के प्रति निष्ठा प्रकट कर प्रस्ताव ठुकरा देती हैं। तब अश्विन कहते हैं कि वे च्यवन को फिर से युवा और रूपवान बना देंगे; उसके बाद शुकन्या तीनों में से जिसे चाहें, पति चुन लें। शुकन्या यह बात च्यवन को बताती हैं और च्यवन सहमत हो जाते हैं। च्यवन और अश्विन सरोवर में स्नान हेतु प्रवेश करते हैं और शीघ्र ही समान रूप से तेजस्वी, युवा देह धारण कर बाहर आते हैं। शुकन्या विवेक से अपने वास्तविक पति च्यवन को पहचानकर उन्हीं का वरण करती हैं। च्यवन प्रसन्न होकर अश्विनों से वर मांगने को कहते हैं। वे यज्ञ में भाग और सोमपान का अधिकार चाहते हैं, जो इन्द्र ने उन्हें नहीं दिया था। च्यवन ऋषि-बल से उन्हें यज्ञभाग और सोमपान का अधिकारी बनाने का वचन देते हैं। अश्विन संतुष्ट होकर चले जाते हैं और च्यवन-शुकन्या का गृहस्थ जीवन पुनः समृद्ध होता है। यह अध्याय पतिव्रता-धर्म, धर्मसम्मत चिकित्सा और ऋषि-प्राधिकार से कर्माधिकार की स्थापना का आदर्श दिखाता है।

Chyavanena Nāsatyayajñabhāga-pratirodhaka-vajra-mocanodyata-śakra-nāśāya Kṛtyodbhava-Madonāma-mahāsurotpatti-varṇanam (Chyavaneśvara Māhātmya)
इस अध्याय में भृगुवंशी ऋषि च्यवन के आश्रम में यज्ञ के अवसर पर उत्पन्न धर्म-तत्त्व का संघर्ष वर्णित है। च्यवन के पुनः तेजस्वी और समृद्ध होने का समाचार सुनकर राजा शर्याति अपने परिजन-परिकर सहित वहाँ आते हैं और सम्मानपूर्वक स्वागत पाते हैं। च्यवन राजा के लिए यज्ञ कराने का संकल्प करते हैं और आदर्श यज्ञमण्डप की तैयारी होती है। सोम-वितरण के समय च्यवन अश्विनीकुमारों (नासत्य) के लिए सोमग्रह लेते हैं। इन्द्र इसका विरोध करते हैं कि अश्विन चिकित्सक हैं और मनुष्यों के बीच विचरते हैं, इसलिए अन्य देवों के समान सोमभाग के अधिकारी नहीं। च्यवन इन्द्र को फटकारकर अश्विनों के देवत्व और लोकहितकारी स्वरूप को सिद्ध करते हैं तथा चेतावनी के बावजूद आहुति दे देते हैं। क्रुद्ध इन्द्र वज्र से च्यवन पर प्रहार करने को उद्यत होते हैं, पर च्यवन अपने तपोबल से इन्द्र की भुजा को स्तम्भित कर देते हैं। फिर मंत्रयुक्त आहुति से वे कृत्या उत्पन्न करते हैं; उनके तप से ‘मद’ नामक भयंकर महापुरुष प्रकट होता है, जिसका रूप अतिविशाल है और गर्जना से जगत् ढँक जाता है, जो इन्द्र को निगलने के लिए दौड़ पड़ता है। यह प्रसंग यज्ञ में अधिकार, ऋत्विज की सत्ता और देव-बलप्रयोग की नैतिक सीमा को उजागर करता है।

च्यवनेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of Chyavaneśvara (Glory of the Chyavana-installed Liṅga)
इस अध्याय में प्रभास-क्षेत्र के भीतर च्यवनेश्वर नामक लिंग का स्थान-माहात्म्य और पूजा-विधान बताया गया है। ईश्वर के वचन से कथा चलती है—भयानक सामर्थ्य के सामने शक्र (इन्द्र) भयभीत दिखते हैं, और भृगुवंशी ऋषि च्यवन निर्णायक तपस्वी-प्राधिकार के रूप में प्रकट होते हैं। च्यवन के कर्मों से ही अश्विनीकुमारों को सोमपान का अधिकार मिलता है; यह संयोग नहीं, बल्कि ऋषि-शक्ति के प्रकाशन तथा सुकन्या और उसके वंश की स्थायी कीर्ति-स्थापना हेतु नियोजित बताया गया है। फिर कहा गया है कि च्यवन ने सुकन्या सहित इस वनयुक्त पुण्य-क्षेत्र में विहार किया और पाप-नाशक लिंग की स्थापना की, जो च्यवनेश्वर कहलाया। इस लिंग की विधिपूर्वक आराधना करने से अश्वमेध-यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है। अध्याय में चन्द्रमस्-तीर्थ का भी निर्देश है, जहाँ वैखानस और वालखिल्य मुनि आते हैं। पौर्णमासी को, विशेषकर आश्विन मास में, नियमपूर्वक श्राद्ध करके ब्राह्मणों को अलग-अलग भोजन कराने से ‘कोटि-तीर्थ’ का फल मिलता है। अंत में फलश्रुति है कि इस पाप-नाशिनी कथा को सुनने मात्र से मनुष्य जन्म-जन्मांतर के संचित पापों से मुक्त हो जाता है।

सुकन्यासरोमाहात्म्यवर्णनम् (Glorification of Sukanyā-saras)
इस अध्याय में ईश्वर महादेवी से प्राभास-क्षेत्र के भीतर स्थित परम पवित्र सरोवर ‘सुकन्या-सरस’ का वर्णन करते हैं। यहाँ सुकन्या, ऋषि च्यवन और अश्विनीकुमारों की प्रसिद्ध कथा को इसी तीर्थ से जोड़ा गया है—अश्विनों ने च्यवन के साथ इस सरोवर में स्नान/अवगाहन किया, और उसके प्रभाव से च्यवन का रूप परिवर्तित होकर अश्विनों के समान तेजस्वी हो गया। स्नान-प्रभाव से सुकन्या की इच्छा पूर्ण हुई, इसलिए यह सरोवर ‘कन्या-सरस’ नाम से भी स्मरण किया जाता है—ऐसा नाम-निर्वचन बताया गया है। आगे फलश्रुति के रूप में विशेषतः स्त्रियों के लिए यहाँ स्नान का महत्त्व कहा गया है, खासकर तृतीया तिथि को; इससे अनेक जन्मों तक गृह-कलह/गृह-भंग से रक्षा तथा दरिद्र, विकलांग या अंधत्व-युक्त पति से बचाव जैसे पुण्यफल तीर्थ-सेवा के विधान के रूप में बताए गए हैं।

अगस्त्याश्रम-गंगेश्वर-माहात्म्यवर्णनम् (Agastya’s Āśrama and the Glory of Gaṅgeśvara)
इस अध्याय में शिव–देवी का धर्मसंवाद तीर्थ-यात्रा के क्रम में आता है। ईश्वर देवी को न्यंकुमती नदी के पवित्र स्थलों की ओर ले जाते हैं—गोष्पद नामक श्रेष्ठ तीर्थ में गया-श्राद्ध, वराह-दर्शन, फिर हरि के धाम का दर्शन, मातृगणों का पूजन, और नदी–समुद्र संगम पर स्नान। इसके बाद पूर्व दिशा में न्यंकुमती के रमणीय तट पर स्थित दिव्य अगस्त्य-आश्रम का वर्णन है, जो ‘क्षुधा-हर’ तथा पाप-नाशक कहा गया है। देवी पूछती हैं कि वातापि का दमन क्यों हुआ और अगस्त्य का क्रोध किस कारण जागा। ईश्वर इल्वल–वातापि की कथा बताते हैं—कपटपूर्ण अतिथि-सत्कार के बहाने वे ब्राह्मणों की हत्या करते और पुनर्जीवन की युक्ति से उन्हें बार-बार मारते थे; तब पीड़ित ब्राह्मण अगस्त्य की शरण लेते हैं। प्रभास में अगस्त्य मेष-रूप में पकाए गए वातापि को खाकर उसकी पुनरुत्थान-योजना निष्फल कर देते हैं और इल्वल को भस्म कर देते हैं; फिर धन-समृद्ध वह स्थान ब्राह्मणों को प्रदान करते हैं, इसलिए वह क्षेत्र ‘क्षुधा-हर’ नाम से प्रसिद्ध होता है। दैत्य-भक्षण से उत्पन्न अशौच/दोष की शांति हेतु गंगा का आवाहन किया जाता है; गंगा वहाँ प्रतिष्ठित होकर अगस्त्य को पवित्र करती हैं और उसी से ‘गंगेश्वर’ की स्थापना व नामकरण होता है। अंत में कहा गया है कि गंगेश्वर-दर्शन तथा स्नान, दान और जप करने से निषिद्ध-भक्षणजन्य पाप का नाश होता है—स्थान, विधि और स्मरण से प्रायश्चित्त सिद्ध होता है।

बालार्कमाहात्म्यवर्णन (Bālārka Māhātmya — Account of the Glory of Bālārka)
यह अध्याय प्रभास-क्षेत्र की यात्रा-वृत्तान्त में देवी को ईश्वर के उपदेश के रूप में प्रस्तुत है। ईश्वर तीर्थयात्री को ‘पाप-नाशन’ बालार्क की ओर जाने का निर्देश देते हैं और बताते हैं कि यह अगस्त्य-आश्रम के उत्तर में, अधिक दूर नहीं है। फिर नाम-कारण बताया जाता है—प्राचीन काल में सूर्य (अर्क) ने बाल-रूप धारण करके वहाँ तप किया था, इसलिए उस स्थान का नाम ‘बालार्क’ पड़ा। आगे फलश्रुति में कहा गया है कि रविवासर (रविवार) को इसके दर्शन से कुष्ठ आदि रोग नहीं होते और बच्चों में रोगजन्य कष्ट उत्पन्न नहीं होता। इस प्रकार अध्याय में पवित्र भूगोल, नामोत्पत्ति और काल-नियत भक्ति से जुड़ा आरोग्य-फल एक साथ वर्णित है।

अजापालेश्वरीमाहात्म्यम् | Ajāpāleśvarī Māhātmya (Glory of Ajāpāleśvarī)
ईश्वर देवी से कहते हैं कि अगस्त्य-स्थान के निकट एक परम पावन तीर्थ है—अजापालेश्वरी। वहाँ रघुवंश के प्रतापी राजा अजापाल ने पाप और रोग हरने वाली देवी की भक्ति से आराधना की। कथा में ‘अजा-रूप’ (बकरी-रूप) कहे गए रोगों का शमन करने वाले राजा के पुण्यकर्म का वर्णन है, और उसी कारण उन्होंने देवी की स्थापना अपने नाम से की, ताकि वह पापनाशिनी रूप में सदा विराजें। अध्याय में तीर्थ-भूगोल, राज-प्रतिष्ठा और देवी की कृपा—इन तीनों का संगम दिखता है। अंत में फलश्रुति है कि तृतीया तिथि को विधिपूर्वक और श्रद्धा से पूजन करने पर बल, बुद्धि, यश, विद्या और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

बालार्कमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of Bālārka (the ‘Child-Sun’ Shrine)
ईश्वर देवी से मार्ग-निर्देश के रूप में बताते हैं कि अगस्त्य के स्थान के पूर्व दिशा में, गव्युतियों के माप से निर्दिष्ट दूरी पर, बालादित्य/बालार्क नामक प्रसिद्ध स्थल है। वहाँ के आसपास के स्थान-चिह्नों का उल्लेख होता है, सपाटिका से जुड़े क्षेत्र का संकेत भी दिया जाता है, और इस तीर्थ की ख्याति बताई जाती है। फिर कारण-कथा आती है—ऋषि विश्वामित्र ने इसी स्थान पर विद्या (पवित्र ज्ञान-शक्ति) की उपासना की, तीन लिंगों की स्थापना की और रवि के स्वरूप को प्रतिष्ठित किया। कठोर साधना से उन्हें सूर्य से सिद्धि प्राप्त हुई, और तभी से यह देवता बालादित्य/बालार्क के नाम से विख्यात हो गया। अंत में फलश्रुति स्पष्ट है—जो मनुष्य इस भास्कर, ‘पापों के चोर’ का दर्शन करता है, वह जीवन भर दरिद्रता से पीड़ित नहीं होता; प्रभास-क्षेत्र की तीर्थ-परंपरा में दर्शन को पुण्यदायक कर्म बताया गया है।

पातालगंगेश्वर–विश्वामित्रेश्वर–बालेश्वर लिङ्गत्रयमाहात्म्य (Glory of the Three Liṅgas: Pātāla-Gaṅgeśvara, Viśvāmitreśvara, and Bāleśvara)
इस अध्याय में ईश्वर देवी से कहते हैं कि दक्षिण दिशा में थोड़ी दूरी (गव्युतिमात्र) पर एक अत्यन्त पवित्र तीर्थ है। वहाँ गंगा का ‘पातालगामिनी’ स्वरूप प्रकट है, जिसे स्पष्ट रूप से पापनाशिनी कहा गया है। कथा में विश्वामित्र ऋषि का प्रसंग आता है—उन्होंने स्नान के लिए गंगा का आवाहन किया था। उस तीर्थ में स्नान करने से समस्त पापों से मुक्ति बताई गई है। आगे गङ्गेश्वर, विश्वामित्रेश्वर और बालेश्वर—इन तीन लिंगों का माहात्म्य कहा गया है; इनके दर्शन से इच्छित फल की सिद्धि, पापक्षय और कामप्राप्ति होती है।

Kuberanagarotpatti and Kubera-sthāpita Somanātha Māhātmya (Origin of Kuberanagara and the Glory of the Somanātha Liṅga Installed by Kubera)
यह अध्याय शिव–देवी संवाद के रूप में है। शिव प्रभास में न्यंकुमती नदी के तट पर स्थित एक उत्तम क्षेत्र का वर्णन करते हैं, जहाँ पूर्वकाल में कुबेर ने ‘धनद’ पद प्राप्त किया था। देवी पूछती हैं कि कोई ब्राह्मण चोरी जैसे कर्म में पड़कर भी आगे चलकर कुबेर कैसे बन सकता है। तब शिव देवशर्मा नामक ब्राह्मण की कथा कहते हैं—वह गृहस्थी में आसक्त होकर लोभवश धन की खोज में घर छोड़ देता है; उसकी पत्नी को चंचल-चरित्र बताया गया है। उनसे दुह्सह नामक पुत्र विपरीत परिस्थितियों में जन्म लेता है, बाद में दुर्व्यसनों में पड़कर समाज से तिरस्कृत हो जाता है। दुह्सह शिव-मंदिर में चोरी करने जाता है, पर बुझते दीपक और बत्ती के प्रसंग में अनजाने ही दीप-सेवा जैसा पुण्य कर बैठता है। मंदिर-सेवक उसे देख लेता है; वह भय से भागता है और अंततः रक्षकों के हाथों हिंसक मृत्यु पाता है। फिर वह गंधार में सुदुर्मुख नामक कुख्यात राजा बनकर जन्म लेता है; अधर्म में रहते हुए भी वह कुल-परंपरा के लिंग की बिना मंत्रों के आदतन पूजा करता है और बार-बार दीपदान करता है। शिकार के समय पूर्व-संस्कार से वह प्रभास आता है, न्यंकुमती तट पर युद्ध में मारा जाता है और शिव-पूजा के प्रभाव से उसके पाप नष्ट बताए गए हैं। इसके बाद वह तेजस्वी वैश्रवण (कुबेर) के रूप में जन्म लेकर न्यंकुमती के पास एक लिंग की स्थापना करता है और महादेव की विस्तृत स्तुति करता है। शिव प्रकट होकर उसे सख्य, दिक्पाल का पद और धनाधिपत्य का वर देते हैं तथा उस स्थान को ‘कुबेरनगर’ के नाम से प्रसिद्ध होने का आशीर्वाद देते हैं। पश्चिम में स्थापित लिंग ‘सोमनाथ’ (यहाँ उमानाथ से संबद्ध) कहा गया है। फलश्रुति में कहा है कि श्रीपंचमी को विधिपूर्वक पूजा करने से सात पीढ़ियों तक स्थिर लक्ष्मी प्राप्त होती है।

भद्रकालीमाहात्म्यवर्णनम् (Bhadrakālī Māhātmya Description)
इस अध्याय में ईश्वर ‘कौबेर-संज्ञक’ नामक स्थान के उत्तर में स्थित भद्रकाली के तीर्थ/मन्दिर का निर्देश करते हैं। देवी को वाञ्छितार्थ-प्रदायिनी कहा गया है और उन्हें वीरभद्र के साथ दक्ष-यज्ञ के विध्वंस में प्रवृत्त, यज्ञ-भंग की कारण-शक्ति के रूप में स्मरण किया गया है। इसके बाद काल-निर्देश आता है—चैत्र मास की तृतीया तिथि को देवी-पूजन विशेष फलदायक बताया गया है। चामुण्डा-स्वरूपों की विस्तृत आराधना से भक्त को सौभाग्य, विजय तथा लक्ष्मी का निवास (समृद्धि) प्राप्त होता है—ऐसी फलश्रुति देकर यह अध्याय स्थान और तिथि को जोड़कर उपासना का व्यावहारिक निर्देश बन जाता है।

भद्रकालीबालार्कमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of Bhadrakālī and Bālārka (Solar Installation)
इस अध्याय में ईश्वर कौर्वव-संज्ञक स्थान से आगे उत्तर दिशा में स्थित एक तीर्थ का वर्णन करते हैं। वहाँ देवी भद्रकाली कठोर तप करती हैं और फिर परम भक्ति से रवि/सूर्य की स्थापना करती हैं। पूजा का विशेष समय रविवासर को सप्तमी तिथि के साथ बताया गया है। लाल पुष्पों और लाल चन्दन आदि लाल लेप/अनुलेपन से अर्चना का विधान है। श्रद्धा से किया गया पूजन ‘कोटि-यज्ञ’ के फल के समान कहा गया है तथा वात-पित्तजन्य रोगों और अन्य अनेक व्याधियों से मुक्ति देने वाला बताया गया है। अंत में कहा गया है कि जो तीर्थयात्रा का पूर्ण फल चाहते हों, वे उसी स्थान पर अश्व-दान करें। इस प्रकार स्थान-विशेष की उपासना, काल-नियम और दान—तीनों को एक समन्वित धर्म-अनुष्ठान के रूप में स्थापित किया गया है।

कुबेरस्थानोत्पत्तौ कुबेरमाहात्म्यवर्णनम् (Origin of Kubera’s Station and its Māhātmya)
इस अध्याय में ईश्वर कुबेर से संबद्ध एक विशेष तीर्थ-स्थान का तात्त्विक वर्णन करते हैं। पवित्र क्षेत्र के मानचित्र में नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) दिशा में कुबेर-स्थान बताया गया है, जहाँ कुबेर की स्वयम्भू उपस्थिति सर्व-दरिद्रता का नाश करने वाली मानी गई है। पंचमी तिथि को गंध, पुष्प और अनुलेपन आदि से वहाँ विशेष पूजा करने का विधान है। यह स्थान आठ मकर-संबद्ध “निधानों” से सुशोभित कहा गया है। उचित समय, सामग्री और स्थान-देवता के संयोग से भक्त को बिना विघ्न के निधि-प्राप्ति तथा अनुपम धन-समृद्धि का फल प्राप्त होता है।

Ajogandheśvara-māhātmya (अजोगन्धेश्वरमाहात्म्य) — The Glory of Ajogandheśvara at Puṣkara
यह अध्याय शिव–देवी संवाद के रूप में है। ईश्वर देवी को कुबेर की दिशा के पूर्व में स्थित पवित्र पुष्कर-तीर्थ का वर्णन करते हैं। देवी पूछती हैं कि एक कैवर्त (मछुआरा), जो मत्स्य-हिंसा करने वाला और दुष्कर्मी था, कैसे सिद्धि को प्राप्त हुआ। तब ईश्वर बताते हैं कि माघ मास में ठंड से पीड़ित वह मछुआरा भीगे जाल को लेकर पुष्कर क्षेत्र में आया और लताओं-वृक्षों से घिरे एक शैव प्रासाद को देखा। गर्मी पाने के लिए वह प्रासाद पर चढ़ा और ध्वजस्तम्भ के शीर्ष पर जाल फैला कर धूप में सुखाने लगा; प्रमाद/मूर्छा से वह गिर पड़ा और शिव-क्षेत्र में ही अचानक मर गया। समय बीतने पर वही जाल ध्वज को बाँधे रहा और शुभ का कारण बन गया; ‘ध्वज-माहात्म्य’ से वह व्यक्ति अवन्ति में ऋतध्वज नामक राजा बनकर जन्मा, राज्य किया, अनेक देशों में भ्रमण किया और राजभोग भोगे। आगे चलकर जाति-स्मर होकर वह प्रभास-क्षेत्र लौटा, अजोगन्ध से संबद्ध देवालय-समूह का निर्माण/जीर्णोद्धार किया, एक कुण्ड के पास ‘अजोगन्धेश्वर’ नामक महालिङ्ग की स्थापना/पूजा की और दीर्घकाल तक भक्ति से आराधना की। अध्याय में तीर्थ-विधि बताई गई है—पुष्कर के पश्चिम कुण्ड ‘पापतस्कर’ में स्नान, वहाँ ब्रह्मा के प्राचीन यज्ञों का स्मरण, तीर्थों का आवाहन, अजोगन्धेश्वर-लिङ्ग की स्थापना/पूजन तथा श्रेष्ठ ब्राह्मण को स्वर्ण-कमल का दान। फलश्रुति कहती है कि गन्ध, पुष्प और अक्षत से विधिपूर्वक पूजन करने पर सात जन्मों के संचित पाप भी नष्ट हो जाते हैं।

चन्द्रोदकतीर्थमाहात्म्य–इन्द्रेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् (Glory of Candrodaka Tīrtha and the Indreśvara Shrine)
ईश्वर देवी से ईशान (उत्तर-पूर्व) दिशा में स्थित एक पवित्र क्षेत्र का वर्णन करते हैं—गव्यूति-मान से निश्चित दूरी पर श्रेष्ठ इन्द्र-स्थान, जो चन्द्रसरस और चन्द्रोदक जल से जुड़ा है। कहा गया है कि इस जल में जरा (क्षय/बुढ़ापा) और दारिद्र्य (गरीबी) को हरने की शक्ति है। यह तीर्थ शुक्लपक्ष में बढ़ता और कृष्णपक्ष में घटता है, फिर भी पापयुग में भी इसका दर्शन होता है। वहाँ स्नान को बड़े पापों से दबे लोगों के लिए भी बिना अधिक विचार के निर्णायक प्रायश्चित्त बताया गया है। फिर अहल्या-प्रसंग और गौतम के शाप से जुड़े इन्द्र के महान दोष का स्मरण होता है। इन्द्र ने बहुत दान सहित पूजा की और सहस्र वर्षों तक शिव की स्थापना की; वही रूप ‘इन्द्रेश्वर’ कहलाया, जो समस्त अपराधों का नाशक है। अंत में तीर्थ-क्रम बताया गया है—चन्द्रतीर्थ में स्नान, पितरों व देवताओं का तर्पण-पूजन, फिर इन्द्रेश्वर की आराधना; इससे निःसंदेह पापमुक्ति प्राप्त होती है।

ऋषितोयानदीमाहात्म्यवर्णन (Māhātmya of the Ṛṣitoyā River)
इस अध्याय में ईश्वर प्राभास-खण्ड के एक परम पावन क्षेत्र ‘देवकुल’ का वर्णन करते हैं। यह आग्नेय दिशा में गव्य्यूति-प्रमाण दूरी पर स्थित है; प्राचीन काल में देवों और ऋषियों की सभाओं से इसकी महिमा प्रतिष्ठित हुई और पूर्व में स्थापित लिङ्ग के कारण ही इसे प्रमाणिक नाम ‘देवकुल’ प्राप्त हुआ। इसके बाद पश्चिम की ओर ‘ऋषियों की प्रिया’ ऋषितोया नदी का माहात्म्य आता है, जो समस्त पापों का नाश करने वाली कही गई है। विधिपूर्वक स्नान करके पितरों को तर्पण-आदि करने से दीर्घकाल तक पितृ-संतोष होता है—ऐसा विधान बताया गया है। दान-नीति भी कही गई है: आषाढ़ अमावस्या को सुवर्ण, अजिन और कम्बल का दान करने से उसका पुण्य पूर्णिमा तक बढ़ते-बढ़ते सोलह गुना हो जाता है। फलश्रुति में कहा है कि इस पवित्र भूगोल में किए गए स्नान, तर्पण और दान से सात जन्मों के संचित पाप भी नष्ट होकर मुक्ति प्राप्त होती है।

ऋषितोयामाहात्म्यवर्णनम् (The Māhātmya of Ṛṣitoyā at Mahodaya)
देवी ने ईश्वर से पूछा कि ‘ऋषितोया’ नामक पवित्र जल की उत्पत्ति और महिमा क्या है तथा वह शुभ देवदारुवन में कैसे पहुँची। ईश्वर बताते हैं कि अनेक तपस्वी ऋषि, स्थानीय जलों में महान नदियों जैसा कर्मानन्द न पाकर, ब्रह्मलोक जाकर ब्रह्मा की सृष्टिकर्ता‑पालक‑संहारक रूप में स्तुति करते हैं और अभिषेक हेतु पापहरिणी नदी की याचना करते हैं। ब्रह्मा करुणावश गङ्गा, यमुना, सरस्वती आदि नदी‑देवियों को एकत्र कर अपने कमण्डलु में समेटते हैं और पृथ्वी पर प्रवाहित कर देते हैं। वही जल ‘ऋषितोया’ कहलाता है—ऋषियों को प्रिय, सर्वपापविनाशक—जो देवदारुवन में आकर वेदवेत्ता ऋषियों के मार्गदर्शन से समुद्र की ओर जाता है। अध्याय में कहा गया है कि यह जल सामान्यतः सुलभ है, पर महोदय, महातीर्थ और मूलचाण्डीश के निकट—इन तीन स्थानों पर इसका विशेष दुर्लभ लाभ बताया गया है। स्नान‑श्राद्ध के लिए कालानुसार प्रवाह‑समता भी दी गई है—प्रातः गङ्गा, सायं यमुना, मध्याह्न सरस्वती आदि; फल यह कि पाप नष्ट होते हैं और अभीष्ट फल प्राप्त होते हैं।

गुप्तप्रयागमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of Gupta-Prayāga (Hidden Prayāga)
इस अध्याय में पार्वती प्रभास-क्षेत्र में सङ्गालेश्वर के निकट तीर्थराज प्रयाग तथा गंगा, यमुना और सरस्वती की उपस्थिति का रहस्य पूछती हैं। ईश्वर बताते हैं कि पूर्वकाल में लिंग-सम्बन्धी प्रसंग से जुड़ी एक दिव्य सभा में असंख्य तीर्थ एकत्र हुए थे; उन्हीं में प्रयाग ने स्वयं को छिपा लिया, इसलिए वह ‘गुप्त-प्रयाग’ कहलाया। फिर पवित्र स्थल-रचना का वर्णन आता है—पश्चिम में ब्रह्म-कुण्ड, पूर्व में वैष्णव-कुण्ड और मध्य में रुद्र/शिव-कुण्ड; तथा ‘त्रि-संगम’ में गंगा-यमुना के संगम के बीच सरस्वती को सूक्ष्म और गुप्त रूप से प्रवाहित बताया गया है। ग्रंथ काल-निर्देश के साथ स्नान की क्रमिक शुद्धि-व्यवस्था बताता है—स्नान से मानसिक, वाचिक, कायिक, सम्बन्धगत, गुप्त तथा उपदोष क्रमशः नष्ट होते हैं; बार-बार स्नान और कुण्ड-अभिषेक से बड़े मल भी शुद्ध होते हैं। मातृगणों का पूजन-दान, विशेषतः कृष्णपक्ष चतुर्दशी को, उनके अनेक अनुचरों से होने वाले भय-निवारण हेतु कहा गया है। श्राद्ध को पितृ और मातृ दोनों वंशों के उत्थान का साधन बताया गया है, और तीर्थयात्रा का पूर्ण फल चाहने वालों के लिए वृष-दान की संस्तुति की गई है। अंत में फलश्रुति है कि इस माहात्म्य को सुनकर और श्रद्धा से स्वीकार कर साधक शंकर-धाम की ओर अग्रसर होता है।

माधवमाहात्म्यवर्णनम् | Mādhava Māhātmya (Glorification of Mādhava at Prabhāsa)
ईश्वर प्रभास-क्षेत्र के भीतर दक्षिण दिशा में स्थित माधव-तीर्थ/मंदिर का वर्णन करते हैं। वहाँ देवता को शंख-चक्र-गदा धारण करने वाले विष्णु-स्वरूप के रूप में बताया गया है। शुक्ल पक्ष की एकादशी को इंद्रियों पर संयम रखने वाला भक्त उपवास करे और चंदन-गंध, पुष्प तथा लेप/अनुलेपन से विधिपूर्वक पूजा करे तो उसे ‘परम पद’ मिलता है, जिसे पुनर्जन्म से मुक्ति (अपुनर्भव) कहा गया है। ब्रह्मा की गाथा यह भी प्रमाणित करती है कि विष्णुकुंड में स्नान करके माधव की आराधना करने से सीधे उस लोक की प्राप्ति होती है जहाँ हरि स्वयं परम आश्रय हैं। अंत में फलश्रुति में कहा गया है कि यह वैष्णव माहात्म्य सभी पुरुषार्थों को देने वाला और समस्त पापों का नाश करने वाला है—यह स्तुति के साथ-साथ साधक के लिए संक्षिप्त विधि-निर्देश भी है।

संगालेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् (Sangāleśvara Māhātmya—Account of the Glory of Sangāleśvara)
इस अध्याय में प्रभास-क्षेत्र के उत्तर भाग, वायव्य दिशा में स्थित संगालेश्वर-लिंग का माहात्म्य कहा गया है, जिसे “सर्व-पातक-नाशन” बताया गया है। ईश्वर वर्णन करते हैं कि ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र (शक्र) तथा अन्य लोकपाल, आदित्य और वसु आदि देवगण वहाँ लिंग-पूजन करने आए। देवसमूह के संगम और प्रतिष्ठा के कारण यह तीर्थ पृथ्वी पर “संगालेश्वर” नाम से प्रसिद्ध होगा—ऐसा नामकरण-कारण भी बताया गया है। मनुष्यों द्वारा संगालेश्वर की पूजा से कुल-परंपरा में समृद्धि और दरिद्रता का अभाव होता है। केवल दर्शन का फल कुरुक्षेत्र में हजार गायों के दान के समान कहा गया है। अमावस्या को स्नान करके क्रोध-रहित होकर श्राद्ध करने की विधि बताई गई है, जिससे पितर दीर्घकाल तक तृप्त रहते हैं। क्षेत्र की मर्यादा अर्ध-क्रोश परिक्रमा तक कही गई है, जो कामना-पूर्ति और पाप-नाश करने वाली है। यह भी कहा गया है कि इस महापुण्य क्षेत्र में मरने वाले—उत्तम या मध्यम—उच्च गति को प्राप्त होते हैं; जो उपवासपूर्वक देहत्याग करते हैं, वे परमेश्वर में लीन हो जाते हैं। हिंसामृत्यु, आकस्मिक मृत्यु, आत्महत्या, सर्पदंश, अशुद्ध अवस्था में मृत्यु—ऐसी स्थितियाँ भी यहाँ अपुनर्भव (पुनर्जन्म-निवारण) देने वाली बताई गई हैं। अंत में षोडश श्राद्ध, वृषोत्सर्ग और ब्राह्मण-भोजन आदि से मुक्ति का विधान तथा इस माहात्म्य के श्रवण से पाप, शोक और दुःख-नाश की फलश्रुति दी गई है।

Siddheśvara-māhātmya (Glory of Siddheśvara)
इस अध्याय में ईश्वर–देवी का संक्षिप्त धर्मोपदेशात्मक संवाद है। प्रभास-क्षेत्र के तीर्थ-समूह में सिद्धेश्वर को श्रेष्ठ लिङ्ग-स्थान बताकर उसकी निकटता और दिशा-स्थिति का वर्णन किया गया है। देवताओं ने शीघ्र ही ‘सङ्गालेश्वर’ नामक शिवलिङ्ग की प्रतिष्ठा की; तत्पश्चात सिद्ध-गणों ने ‘सिद्धेश्वर’ को सर्व-सिद्धि देने वाला मानकर स्थापित किया और उसकी स्तुति की। भगवान शिव वर देते हैं कि जो साधक नियमपूर्वक वहाँ आकर स्नान करे, सिद्धनाथ की पूजा करे और जप करे—विशेषतः शतरुद्रीय, अघोर-मन्त्र तथा महेश्वर-गायत्री—वह छह मास के भीतर सिद्धि और अणिमा आदि शक्तियाँ प्राप्त करता है। आश्वयुज मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी की महा-रात्रि में निर्भय और स्थिर साधक को विशेष सफलता बताई गई है। अंत में फलश्रुति द्वारा इसे पाप-नाशक और सर्वकाम-फल-प्रद कहा गया है।

गन्धर्वेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Gandharveśvara—Account of the Shrine’s Glory
ईश्वर देवी से कहते हैं कि प्रभास-क्षेत्र में गन्धर्वेश्वर नामक परम शिव-तीर्थ पर जाना चाहिए। वहाँ लिङ्ग उत्तर दिशा-भाग में पाँच धनुष की दूरी पर स्थित है—यह अध्याय यात्रियों के लिए मार्ग-संकेत भी देता है। कहा गया है कि इस धाम के दर्शन से साधक रूपवान् (आकर्षक/सुन्दर) हो जाता है। यह लिङ्ग गन्धर्वों द्वारा प्रतिष्ठित है, इसलिए इसकी महिमा और भी पवित्र मानी गई है। स्नान करके वहाँ एक बार विधिपूर्वक पूजन करने से ही पूर्ण फल मिलता है—सर्व कामनाएँ सिद्ध होती हैं और ‘रक्तकण्ठ’ नामक शुभ लक्षण प्राप्त होता है।

Sangāleśvara–Uttareśvara Māhātmya (संगालेश्वरमाहात्म्य–उत्तरेश्वरमाहात्म्यवर्णनम्)
अध्याय 303 में ईश्वर देवी से कहते हैं कि उत्तर दिशा में एक ‘उत्तम देवता’ के पास जाना चाहिए, जिसकी पूजा महापातकों का नाश करने वाली मानी गई है। उसी देवता के पश्चिम में एक श्रेष्ठ लिंग का वर्णन है, जिसे शेषनाग के नेतृत्व में नागों ने कठोर तप करके स्थापित किया था। इस नाग-पूजित देवता की आराधना करने वाले पर जीवन भर विष का प्रभाव नहीं पड़ता और सर्प प्रसन्न होकर हानि नहीं पहुँचाते—यहाँ रक्षात्मक धर्मभाव प्रमुख है। इसलिए मनुष्यों को पूर्ण प्रयत्न से उस लिंग की पूजा करने की आज्ञा दी गई है। अंत में कहा गया है कि पश्चिम क्षेत्र में पुण्यदायी गंगा-तट पर ऋषियों ने अनेक लिंग स्थापित किए हैं। उनके दर्शन और पूजन से समस्त पाप नष्ट होते हैं और सहस्र अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है—यही इस अध्याय की फलश्रुति है।

गंगामाहात्म्यवर्णनम् (Gaṅgā-Māhātmya near Saṅgāleśvara)
इस अध्याय में सूत संवाद का प्रसंग बाँधते हैं और ईश्वर पार्वती को प्रभास-क्षेत्र के संगालेश्वर के निकट त्रिपथगामिनी गंगा के प्राकट्य का रहस्य बताते हैं। पार्वती दो आश्चर्य पूछती हैं—गंगा वहाँ कैसे पहुँची और वहाँ त्रिनेत्र मछलियाँ कैसे हैं। ईश्वर कारण-कथा कहते हैं: महादेव से जुड़े शाप-प्रसंग में सहभागी कुछ ऋषि पश्चात्ताप से भरकर संगालेश्वर में कठोर तप और पूजा करते हैं। उनकी भक्ति से प्रसन्न शिव लोक-निदर्शन हेतु उन्हें त्रिनेत्र-चिह्न प्रदान करते हैं और अभिषेक के लिए गंगा को वहाँ प्रकट करने का वर देते हैं। उसी क्षण गंगा मछलियों सहित प्रकट होती है; ऋषियों के दर्शन से वे मछलियाँ भी शिव-अनुग्रह से त्रिनेत्र हो जाती हैं। फिर साधना-फल बताया गया है: उस कुंड में स्नान करने से पंचपातक का नाश होता है। अमावस्या को स्नान करके ब्राह्मण को स्वर्ण, गौ, वस्त्र और तिल दान करने वाला शिव-कृपा के प्रतीक रूप ‘त्रिनेत्रत्व’ प्राप्त करता है। अंत में कहा गया है कि यह कथा सुनना भी परम पुण्यदायक और इच्छित फल देने वाला है।

Nārada-Āditya Māhātmya (Glory of Nāradaāditya)
इस अध्याय में शिव–देवी संवाद के माध्यम से प्रभास क्षेत्र में स्थित ‘नारदादित्य’ नामक सूर्य-तीर्थ का माहात्म्य बताया गया है। कहा गया है कि यहाँ सूर्य-देव के दर्शन से जरा (बुढ़ापा) और दारिद्र्य का नाश होता है। देवी पूछती हैं कि नारद मुनि जरा से कैसे ग्रस्त हुए। तब शिव द्वारावती की कथा सुनाते हैं—कृष्णपुत्र साम्ब ने नारद का उचित सम्मान नहीं किया; नारद के उपदेश पर साम्ब ने तपस्वी जीवन की निन्दा की और क्रोध में नारद को जरा से ग्रस्त होने का शाप दे दिया। पीड़ित नारद एक पवित्र, एकान्त स्थान में जाकर सुंदर सूर्य-प्रतिमा की स्थापना करते हैं और ‘सर्व दारिद्र्य-नाशक’ सूर्य की स्तुतियाँ करते हैं—उन्हें ऋक्-साम स्वरूप, निर्मल प्रकाश, सर्वव्यापी कारण और अन्धकार-नाशक कहते हैं। प्रसन्न होकर सूर्य प्रकट होते हैं और वर देते हैं कि नारद पुनः यौवन को प्राप्त हों। साथ ही नियम बताया गया है कि रविवासर को यदि सप्तमी तिथि हो, उस दिन सूर्य-दर्शन करने से रोग-भय से मुक्ति मिलती है। अंत में इस तीर्थ की पाप-नाशिनी शक्ति का फलश्रुति में प्रतिपादन किया गया है।

सांबादित्यमाहात्म्यवर्णनम् (The Māhātmya of Sāmbāditya: Sāmba’s Sun-Worship at Prabhāsa)
ईश्वर प्रभास-क्षेत्र के उत्तर भाग में स्थित पाप-नाशक तीर्थ ‘सांबादित्य’ का माहात्म्य बताते हैं। जाम्बवती-पुत्र साम्ब पिता के क्रोधजन्य शाप से पीड़ित होकर विष्णु की शरण लेते हैं। विष्णु उन्हें प्रभास में ऋषितोया नदी के सुंदर तट पर, ब्राह्मणों से शोभित ‘ब्रह्मभाग’ जाने को कहते हैं और वचन देते हैं कि वहाँ वे सूर्य-रूप में वर देंगे। साम्ब वहाँ पहुँचकर भास्कर की अनेक स्तुतियों से आराधना करते हैं और ऋषितोया-तट पर नारद के तप-स्थल का दर्शन करते हैं। स्थानीय ब्राह्मण ब्रह्मभाग की पवित्रता प्रमाणित कर उनके संकल्प का अनुमोदन करते हैं; तब साम्ब नियमित पूजा और तप करते हैं। विष्णु देवताओं के कार्य-भेद का स्मरण कराते हैं—रुद्र ऐश्वर्य देते हैं, विष्णु मोक्ष, इन्द्र स्वर्ग; जल-पृथ्वी-भस्म शुद्ध करते हैं, अग्नि रूपान्तर करती है, गणेश विघ्न हरते हैं—पर दिवाकर ही विशेष रूप से आरोग्य प्रदान करते हैं। शाप के कारण सामान्य वर बाधित होने से विष्णु सूर्य बनकर प्रकट होते हैं और साम्ब को कुष्ठ से मुक्त कर शुद्धि देते हैं। साम्ब उस स्थान पर नित्य सन्निधि की प्रार्थना करते हैं; सूर्य देह-शुद्धि का आश्वासन देकर व्रत बताते हैं—रविवार को पड़ने वाली सप्तमी पर उपवास और रात्रि-जागरण। श्रद्धा से स्नान, रविवार को सांबादित्य-पूजन, तथा निकट के पाप-नाशक कुण्ड पर श्राद्ध व ब्राह्मण-भोजन करने से आरोग्य, धन, संतान, मनोकामना-सिद्धि और सूर्यलोक में सम्मान मिलता है; भक्त की वंश-परम्परा में कुष्ठ व पापजन्य रोग नहीं होते।

अपरनारायणमाहात्म्यवर्णनम् (The Māhātmya of Apara-Nārāyaṇa)
अध्याय 307 में ईश्वर बताते हैं कि पूर्वोक्त साम्बादित्य से कुछ पूर्व दिशा में ‘अपर-नारायण’ नामक दिव्य तीर्थ/धाम स्थित है। वहाँ सूर्य को विष्णु-स्वरूप कहा गया है; भगवान भक्तों को वर देने के लिए ‘अपर’ अर्थात् अन्य/अतिरिक्त रूप धारण करते हैं, इसी से ‘अपर’ नाम की व्युत्पत्ति समझाई गई है। फिर विधि बताई जाती है—उस स्थान पर पुण्डरीकाक्ष का विधिपूर्वक पूजन करें, विशेषतः फाल्गुन शुक्ल एकादशी के दिन। फलश्रुति स्पष्ट है: पापों का क्षय होता है और सभी इच्छित फल सिद्ध होते हैं; इस प्रकार स्थान, देवता, तिथि, कर्म और फल का संक्षिप्त मार्ग बताया गया है।

मूलचण्डीशोत्पत्तिमाहात्म्यवर्णनम् (Origin-Glory of Mūla-Caṇḍīśa and the Taptodaka Kuṇḍa)
ईश्वर देवी को बताते हैं कि त्रिलोकों में प्रसिद्ध ‘मूलचण्डीश’ लिङ्ग की कीर्ति कैसे हुई। देवदारुवन में वे Ḍiṇḍि नामक भिक्षुक-तपस्वी के उग्र-प्रेरक रूप में प्रकट हुए, जिससे ऋषि क्रुद्ध हो गए और शाप दे बैठे; फलतः प्रधान लिङ्ग गिर पड़ा। शुभता के लोप से व्याकुल ऋषि ब्रह्मा के पास गए। ब्रह्मा ने उन्हें कहा कि कुबेर के आश्रम के निकट हाथी-रूप में स्थित रुद्र के पास जाकर क्षमा-याचना करें। यात्रा में गौरी करुणा से गोरस (दूध) देती हैं और थकान मिटाने हेतु एक श्रेष्ठ स्नान-स्थान प्रकट करती हैं, जो उष्ण जल के कारण ‘तप्तोदक कुण्ड’ कहलाता है। अंत में ऋषि रुद्र की स्तुति कर अपराध स्वीकारते हैं और समस्त प्राणियों के कल्याण की प्रार्थना करते हैं। रुद्र प्रसन्न होकर लिङ्ग को पुनः उठाकर/प्रतिष्ठित करते हैं (उन्नत भाव से) और फलश्रुति कहते हैं—मूलचण्डीश का दर्शन बड़े-बड़े जल-कार्य कराने से भी अधिक पुण्य देता है; स्नान के बाद पूजन और दान का विधान है, जिससे शक्ति, प्रभाव और लौकिक राज्य-समृद्धि की प्राप्ति बताई गई है। अध्याय में नाम की व्युत्पत्ति (चण्डी के ईश; जहाँ गिरा वही ‘मूल’) तथा संगमेश्वर, कुण्डिका और तप्तोदक आदि तीर्थों का उल्लेख भी आता है।

Caturmukha-Vināyaka Māhātmya (Glory of Four-Faced Vināyaka)
इस अध्याय में ईश्वर महादेवी को संक्षिप्त तीर्थ-मार्ग और पूजा-विधि का उपदेश देते हैं। वे यात्री को चण्डीश के उत्तर में स्थित ‘चतुर्मुख’ नामक विनायक-स्थान की ओर जाने को कहते हैं; ईशान कोण की दिशा में चार धनुष की दूरी का संकेत भी दिया गया है। वहाँ श्रद्धा और प्रयत्नपूर्वक सावधानी से पूजा करने का विधान है—गन्ध, पुष्प, तथा भक्ष्य-भोज्य अर्पित किए जाएँ, विशेषतः मोदक। चतुर्थी तिथि को पूजन करने से सिद्धि प्राप्त होती है; अनुशासित भक्ति से विघ्न दूर होते हैं और धार्मिक प्रयोजन सफल होते हैं।

कलंबेश्वरमाहात्म्य (Kalambeśvara Māhātmya) — The Glory of Kalambeśvara
अध्याय 310 में ईश्वर के वचन के रूप में प्राभास-क्षेत्र में कलंबेश्वर के तीर्थ-स्थान का निर्देश दिया गया है। यह वायव्य (उत्तर-पश्चिम) दिशा में, ‘धनुर्द्वितय’ अर्थात दो धनुष-लंबाई की दूरी पर स्थित बताया गया है। यहाँ कलंबेश्वर का केवल दर्शन और पूजन करने से समस्त किल्बिषों की शुद्धि होती है और यह सर्व पातकों का नाश करने वाला कहा गया है। सोमवारा और अमावस्या का संयोग वहाँ विशेष पुण्यदायक माना गया है। पुण्यफल चाहने वालों को वहाँ विप्रों को भोजन कराकर अतिथि-सत्कार रूप दान करने की शिक्षा दी गई है; अंत में इसे प्राभासखण्ड के प्राभासक्षेत्रमाहात्म्य में ‘कलंबेश्वरमाहात्म्य’ कहा गया है।

गोपालस्वामिहरिमाहात्म्यवर्णनम् (The Māhātmya of Gopāla-svāmin Hari)
इस अध्याय में संक्षिप्त रूप से तत्त्वोपदेशात्मक धर्मसंवाद है। ईश्वर महादेवी को गोपालस्वामि हरि के तीर्थ-स्थान पर जाने की आज्ञा देते हैं और उसका स्पष्ट निर्देश करते हैं—चण्डीश से पूर्व दिशा में बीस धनुष की दूरी पर वह देवालय स्थित है। कहा गया है कि वहाँ हरि का दर्शन और पूजन समस्त पापों को शांत करता है तथा दरिद्रता की तरंगों का नाश करता है। विशेषतः माघ मास में पूजा और जागरण करने की प्रशंसा की गई है; ऐसा करने वाला भक्त अंततः परम पद को प्राप्त होता है।

Bakulsvāmi-Sūrya Māhātmya (बकुलस्वामिमाहात्म्यवर्णनम्) — The Glory of Bakulsvāmin as Sūrya
इस अध्याय में ईश्वर के उपदेश के रूप में तीर्थ-निर्देश और व्रत-विधान संक्षेप में कहा गया है। उत्तर दिशा में ‘आठ धनुष’ की दूरी पर बकुलस्वामी का सूर्य-स्वरूप स्थित है; उसके दर्शन को दुःख-शोक और क्लेश का नाश करने वाला बताया गया है। फिर विधि बताई गई है कि रविवासर को यदि सप्तमी तिथि हो, तो रात्रि भर जागरण करना चाहिए। इसका फल सभी मनोकामनाओं की सिद्धि तथा सूर्यलोक में मान-प्रतिष्ठा और उन्नति की प्राप्ति कहा गया है। अंत में इसे स्कन्दमहापुराण के प्रभासखण्ड, प्रभासक्षेत्रमाहात्म्य के अंतर्गत ‘बकुलस्वामिमाहात्म्य’ अध्याय के रूप में निर्दिष्ट किया गया है।

उत्तरार्कमाहात्म्यवर्णनम् (Uttarārka Māhātmya—Description of the Glory of Uttarārka)
इस अध्याय में ईश्वर-उवाच रूप में प्रमाणिक उपदेश दिया गया है। प्रभास-क्षेत्र की वायव्य दिशा में, सोलह धनु की दूरी पर स्थित “उत्तरार्क” नामक पवित्र उप-तीर्थ का निर्देश और उसका माहात्म्य बताया गया है। यह स्थान ‘सद्यः प्रत्ययकारक’ कहा गया है, अर्थात साधक को शीघ्र फल का प्रत्यक्ष अनुभव कराने वाला। यहाँ निम्ब-सप्तमी व्रत/अनुष्ठान का विधान बताया गया है और उसके करने से ‘सर्व रोगों’ से मुक्ति तथा आरोग्य-लाभ की फलश्रुति कही गई है।

ऋषितीर्थसंगममाहात्म्यवर्णनम् (Glorification of the Ṛṣi-tīrtha Confluence)
ईश्वर-देवी संवाद में प्रभास खण्ड के अंतर्गत समुद्र-तट पर देवकुलाग्नेय गव्युत्यां स्थित ‘ऋषितीर्थ’ नामक परम पवित्र तीर्थ का वर्णन आता है। यह स्थान अत्यन्त रमणीय और महाशक्तिशाली कहा गया है; यहाँ पाषाण-आकृति में स्थित ऋषिगण मनुष्यों को आज भी दिखाई देते हैं—और यह तीर्थ समस्त पापों का नाश करने वाला बताया गया है। ज्येष्ठ मास की अमावस्या को श्रद्धावान भक्तों को स्नान करना चाहिए और विशेष रूप से पिण्डदान द्वारा पितरों का तर्पण करना चाहिए। ऋषितोया-संगम में स्नान और श्राद्ध दुर्लभ तथा अत्यन्त फलदायक कर्म माने गए हैं। आगे गो-प्रदान की प्रशंसा की गई है और सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराने का विधान बताया गया है—जिससे तीर्थसेवा दान, धर्म और अतिथि-सत्कार से संयुक्त होती है।

मरुदार्यादेवीमाहात्म्यवर्णनम् (Mārudāryā Devī Māhātmya—Glorification of the Goddess Mārudāryā)
इस अध्याय में शिव–देवी संवाद के माध्यम से संक्षिप्त क्षेत्र-उपदेश दिया गया है। ईश्वर महादेवी को पश्चिम दिशा में अर्ध-क्रोश की दूरी पर स्थित तेजस्वी स्थान ‘मारुदार्या’ में जाने का निर्देश देते हैं। वहाँ की देवी मरुतों द्वारा पूजित तथा ‘सर्वकाम-फल’ देने वाली कही गई है। आगे पूजा का समय और विधि बताई जाती है—विशेषतः महानवमी के दिन, और सप्तमी को भी, गंध-पुष्प आदि सामान्य उपचरों से सावधानीपूर्वक आराधना करनी चाहिए। इस प्रकार पुराण स्थान (कहाँ), व्रत-काल (कब) और पूजा-विधि (कैसे) को जोड़कर इच्छित फल और पुण्य की प्राप्ति का मार्ग दिखाता है।

क्षेमादित्यमाहात्म्यवर्णनम् / The Māhātmya of Kṣemāditya (Solar Shrine of Welfare)
इस अध्याय में देवकुल के निकट शम्बर-स्थान में, देवकुल से पाँच गव्युत की दूरी पर स्थित ‘क्षेमादित्य’ नामक देव-प्रतिष्ठा का निर्देश किया गया है। कहा गया है कि उसके दर्शन मात्र से भक्त को कल्याण और क्षेम-सम्बन्धी सिद्धि प्राप्त होती है। साथ ही यह विधान बताया गया है कि जब सप्तमी तिथि रविवार के साथ पड़े, तब की गई पूजा सर्वकामदायी मानी जाती है। अंत में इसे देवकुल-तीर्थ में स्थित उपदेशरूप तीर्थ-माहात्म्य के रूप में स्थापित किया गया है।

कंटकशोषिणीमाहात्म्यवर्णनम् (The Māhātmya of Goddess Kaṇṭakaśoṣiṇī)
ईश्वर देवी को प्रभास-क्षेत्र के एक दिग्-निर्दिष्ट स्थान में प्रकट हुई देवी की उत्पत्ति-कथा सुनाते हैं। वहाँ पवित्र नदी-तट पर महर्षियों का महान् यज्ञ चल रहा होता है—वेद-पाठ की ध्वनि, गीत-वाद्य, धूप-दीप, हवि-आहुति और विद्वान् ऋत्विजों की विधिवत् क्रियाएँ वातावरण को पावन बनाती हैं। उसी समय मायावी और बलवान दैत्य यज्ञ को नष्ट करने के लिए आ धमकते हैं। भय से लोग तितर-बितर हो जाते हैं, पर अध्वर्यु धैर्य रखकर रक्षात्मक आहुति देता है। उस संस्कारित होम से तेजस्विनी शक्ति प्रकट होती है—अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित, भयंकर और दिव्य—और वह विघ्नकारियों का संहार कर यज्ञ की मर्यादा पुनः स्थापित कर देती है। ऋषि देवी की स्तुति करते हैं; देवी वर देती हैं। वे तपस्वियों और यज्ञ-परंपरा के कल्याण हेतु उसी स्थान पर देवी के नित्य निवास की प्रार्थना करते हैं, और देवी ‘कंटकशोषिणी’ नाम से प्रतिष्ठित होती हैं—जो कांटों/उपद्रवों को सुखा देने वाली है। अंत में अष्टमी या नवमी तिथि पर पूजन-विधान बताया गया है; फलश्रुति में राक्षस-पिशाच भय से मुक्ति और परम सिद्धि की प्राप्ति कही गई है।

ब्रह्मेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Brahmeśvara Liṅga: Account of Its Sacred Efficacy
इस अध्याय में प्रभास-क्षेत्र के वर्णन के बीच एक संक्षिप्त तात्त्विक सूचना दी गई है। ईश्वर पूर्व दिशा में, संदर्भ-स्थान से अधिक दूर नहीं, स्थित एक अत्यन्त प्रभावशाली लिंग का उल्लेख करते हैं, जो पाप-क्षय करने वाला है। उस लिंग का नाम ब्रह्मेश्वर बताया गया है और यह भी कहा गया है कि उसकी प्रतिष्ठा ब्राह्मणों द्वारा हुई, जिससे उसकी परंपरागत वैधता प्रकट होती है। यहाँ एक विधि-क्रम संकेतित है—पहले ऋषितोया-जल में स्नान, फिर ब्रह्मेश्वर-लिंग का पूजन। फलश्रुति में शुद्धि के साथ ज्ञान का उत्कर्ष भी है: उपासक वेद-विद् बनता है, योग्य ब्राह्मणत्व प्राप्त करता है और जाड़्यभाव (मानसिक जड़ता/मन्दता) से मुक्त हो जाता है। इस प्रकार भूगोल, अनुष्ठान और ज्ञान-परिणाम का सुंदर संयोजन दिखता है।

उन्नतस्थानमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of Unnata-Sthāna (The ‘Elevated Place’)
ईश्वर–देवी संवाद में शिव देवी को ऋषितोया नदी के तट के पास उत्तर दिशा का एक शुभ प्रदेश दिखाते हैं और वहाँ ‘उन्नत’ नामक स्थान का परिचय देते हैं। देवी नाम की व्युत्पत्ति, ब्राह्मणों को स्थान का ‘बलपूर्वक’ दान कैसे हुआ, तथा उसकी सीमाएँ पूछती हैं। शिव बताते हैं कि ‘उन्नत’ नाम के कई कारण हैं—महादय में लिंग का उन्नत/प्रकट होना, प्रभास से जुड़ा ‘उन्नत द्वार’, और ऋषियों के श्रेष्ठ तप व विद्या से उस क्षेत्र की उत्कृष्टता। इसके बाद अनेक तपस्वी ऋषि दीर्घकाल तक तप करते हैं। शिव भिक्षुक रूप में प्रकट होते हैं; पहचान लिए जाने पर भी अंततः ऋषियों को केवल मूलचण्डीश (लिंग) का ही दर्शन होता है। उसके दर्शन से लोग स्वर्ग को जाते हैं, जिससे और भी ऋषि आने लगते हैं। तब इन्द्र (शतक्रतु) वज्र से लिंग को ढककर अन्य ऋषियों का दर्शन रोक देता है। क्रोधित ऋषियों को शिव शांत करते हैं, स्वर्ग को अनित्य बताते हैं और उन्हें ऐसा सुंदर निवास स्वीकार करने को कहते हैं जहाँ अग्निहोत्र, यज्ञ, पितृ-पूजा, अतिथि-सत्कार और वेदाध्ययन चलता रहे—और जीवनांत में अपनी कृपा से मोक्ष का वचन देते हैं। विश्वकर्मा को निर्माण हेतु बुलाया जाता है; वह कहता है कि गृहस्थों को लिंग-क्षेत्र के ठीक पास स्थायी निवास नहीं करना चाहिए। इसलिए शिव ऋषितोया तट पर उन्नत में बसाहट बनवाते हैं। ‘नग्नहर’ सहित दिशा-चिह्नों और आठ योजन की परिधि वाला पवित्र क्षेत्र बताया जाता है। कलियुग में रक्षा हेतु महाकाल को रक्षक, उन्नत को विघ्नराज/गणनाथ व धनदाता, दुर्गादित्य को आरोग्यदाता, और ब्रह्मा को पुरुषार्थ व मोक्षदाता कहा गया है। अंत में स्थलकेश्वर की स्थापना, युगानुसार मंदिर का वर्णन, तथा माघ शुक्ल चतुर्दशी को रात्रि-जागरण सहित विशेष व्रत का विधान आता है।

लिंगद्वयमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of the Pair of Liṅgas
ईश्वर-देवी संवाद में यह अध्याय पवित्र क्षेत्र के आग्नेय भाग में स्थित अत्यन्त पुण्यदायक लिंग-द्वय का माहात्म्य बताता है। कहा गया है कि इन दोनों लिंगों की स्थापना विश्वकर्मा ने की; नगर-निर्माण हेतु त्वष्टा के आगमन पर पहले महादेव की प्रतिष्ठा होती है, फिर नगर बसता है और लिंगों की (पुनः) प्रतिष्ठा से यह दिखाया जाता है कि नगर-व्यवस्था और पवित्र प्रतीक-स्थापना एक-दूसरे को दृढ़ करती हैं। इसके बाद कथा से आगे बढ़कर आचार-विधान दिया गया है। किसी भी कार्य के आरम्भ और समापन पर, विशेषतः यात्रा तथा विवाह-बारात जैसे प्रसंगों में, इस लिंग-द्वय की पूजा को त्वरित फल देने वाला उपाय कहा गया है। सुगन्धित द्रव्य, अमृत-सदृश द्रव और विविध नैवेद्य अर्पित करने की मर्यादा बताकर सावधानीपूर्ण, उद्देश्यपूर्ण भक्ति को ही सच्चा मानदण्ड माना गया है।

उन्नतस्थाने ब्रह्ममाहात्म्यवर्णनम् (The Glorification of Brahmā at Unnata-sthāna)
इस अध्याय में शिव–देवी का संवाद है। ईश्वर मनुष्यों के पापों का नाश करने वाले एक परम, गूढ़ और श्रेष्ठ तीर्थ ‘उन्नत-स्थान’ का वर्णन करते हैं और वहाँ ब्रह्मा के माहात्म्य को प्रकट करते हैं। देवी पूछती हैं कि यहाँ ब्रह्मा बाल-रूप में कैसे हैं, जबकि अन्यत्र उन्हें वृद्ध कहा गया है; साथ ही वह स्थान, वहाँ ब्रह्मा के आने का कारण, तथा पूजा का उचित विधि और समय जानना चाहती हैं। ईश्वर बताते हैं कि ऋषितोया के निकट ब्रह्मा का प्रधान आसन है और प्रभास-क्षेत्र में त्रिविध पूजाभूगोल है—शुभ तट पर ब्रह्मा, अग्नितीर्थ पर रुद्र, और रमणीय रैवतक पर्वत पर हरि (दामोदर)। कथा में सोम की प्रार्थना से ब्रह्मा उन्नत-स्थान पर आठ वर्ष के बालक रूप में आते हैं; केवल दर्शन से ही भक्त पापों से मुक्त होते हैं। फिर सिद्धान्त-स्तुति आती है—ब्रह्मा के समान न कोई देव, न गुरु, न विद्या, न तप है; पितामह की भक्ति से ही संसार-दुःख से मुक्ति मिलती है। अंत में निर्देश है कि पहले ब्रह्म-कुण्ड में स्नान कर, फिर बाल-ब्रह्मा की पुष्प, धूप आदि से विधिपूर्वक पूजा की जाए।

दुर्गादित्यमाहात्म्यवर्णनम् (Durgāditya Māhātmya—Account of the Glory of Durgāditya)
इस अध्याय में ईश्वर महादेवी से दक्षिण दिशा में स्थित “दुर्गादित्य” नामक पवित्र तीर्थ का वर्णन करते हैं, जो समस्त पापों का नाश करने वाला कहा गया है। इसकी उत्पत्ति-कथा में बताया गया है कि दुःखों का संहार करने वाली देवी दुर्गा एक समय क्लेश से पीड़ित हुईं और शांति-प्राप्ति हेतु सूर्यदेव की आराधना में दीर्घ तप करने लगीं। प्रसन्न होकर दिवाकर प्रकट हुए और वरदान देने को कहा। देवी ने अपने दुःख के विनाश की याचना की। तब सूर्यदेव ने भविष्यवाणी की कि शीघ्र ही भगवान त्रिपुरान्तक (शिव) एक ऊँचे, शुभ स्थान पर उत्तम लिंग की स्थापना करेंगे और उसी स्थान पर मेरा नाम “दुर्गादित्य” प्रसिद्ध होगा—यह कहकर वे अंतर्धान हो गए। अंत में विधान बताया गया है कि जब सप्तमी तिथि रविवार को पड़े, तब दुर्गादित्य की पूजा करनी चाहिए; फलश्रुति में कहा है कि इससे समस्त कष्ट शांत होते हैं और कुष्ठ सहित अनेक त्वचा-रोग दूर होते हैं।

Kṣemeśvara Māhātmya (क्षेमेश्वरमाहात्म्य) — The Glory of Kṣemeśvara
शिव–देवी के उपदेशात्मक संवाद में ईश्वर देवी को पूर्वोक्त पवित्र स्थान के ‘दक्षिण’ में, ऋषितोया नदी के तट पर स्थित एक देवालय की ओर ध्यान दिलाते हैं। उस तीर्थ का नाम क्षेमेश्वर बताया गया है; साथ ही नाम-परम्परा भी सुरक्षित है—पूर्वकाल में वह भूतिश्वर कहलाता था, और कलियुग में वही क्षेमेश/क्षेमेश्वर के रूप में प्रसिद्ध है। अध्याय का व्यावहारिक संदेश संक्षिप्त और तीर्थ-केन्द्रित है: इस देव के दर्शन के बाद पूजन करने मात्र से भक्त समस्त किल्बिष (पाप/अशुद्धि) से मुक्त हो जाता है। अंत में इसे स्कन्दमहापुराण की 81,000 श्लोकों वाली संहिता के प्राभास खण्ड, प्राभासक्षेत्रमाहात्म्य के अंतर्गत ‘क्षेमेश्वरमाहात्म्य-वर्णन’ शीर्षक अध्याय के रूप में निरूपित किया गया है।

गणनाथमाहात्म्यवर्णनम् (Glorification and Ritual Protocol of Gaṇanātha/Vināyaka at Prabhāsa)
इस अध्याय में ईश्वर देवी को प्रभास के उत्तर भाग में, वायव्य (उत्तर-पश्चिम) दिशा-खण्ड में स्थित गणनाथ/विनायक-स्थान का माहात्म्य और पूजन-विधान बताते हैं। यह विनायक “सर्वसिद्धि-प्रदाता” कहा गया है; साथ ही उसका एक समन्वित परिचय दिया गया है कि वह पहले धनद (कुबेर) का सहचर था और अब गणनाथ-रूप में निधियों का रक्षक बनकर प्राणियों को सफलता देने हेतु वहाँ स्थित है। फिर काल-नियम सहित संक्षिप्त अनुष्ठान बताया गया है—जब चतुर्थी तिथि भौमवार (मंगलवार) से संयुक्त हो, तब भक्ष्य, भोज्य तथा मोदक आदि नैवेद्य से विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए। अंत में फलश्रुति के रूप में कहा गया है कि ऐसी यथाविधि उपासना से ध्रुव सिद्धि, अर्थात निश्चित सफलता प्राप्त होती है।

उन्नतस्वामिमाहात्म्यवर्णनम् (Uṇṇatasvāmi Māhātmya—Description of the Glory of Unnatasvāmi)
इस अध्याय में ईश्वर देवी को बताते हैं कि ऋषियों के पवित्र जल से अभिषिक्त, सुंदर नदी-तट पर स्थित विनायक के परम तीर्थ में जाना चाहिए। वहाँ के देवता गणेश/गणनाथ हैं—देवगणों के नायक—और त्रिपुर-विनाशक विश्वशक्ति से अभिन्न रूप में, शैव परंपरा के अनुरूप, उनका महात्म्य वर्णित है। प्रभास के महाक्षेत्र में वे उन्नत गजरूप में विराजमान हैं और असंख्य गणों से घिरे हैं। यात्रियों को विघ्नरहित यात्रा के लिए पूर्ण प्रयत्न से उनकी पूजा करनी चाहिए; प्रतिदिन पुष्प, धूप आदि अर्पित करने का विधान है। अध्याय में चतुर्थी के सामूहिक अनुष्ठान का भी निर्देश है—नगरवासी बार-बार चतुर्थी को महोत्सव करें, ताकि राष्ट्र/राज्य का कल्याण (राष्ट्रक्षेम) हो और कार्यों में सिद्धि प्राप्त हो।

Mahākāla-māhātmya (महाकालमाहात्म्य) — The Glory of Mahākāleśvara
इस अध्याय में प्रभास-तीर्थयात्रा के क्रम में ईश्वर दिशा-निर्देश देते हैं। भक्त को उत्तर दिशा में स्थित महाकालेश्वर के स्थान पर जाने को कहा गया है, जो ‘सर्व-रक्षा-कर’ परम रक्षक माने गए हैं। इस क्षेत्र/नगर के अधिष्ठाता के रूप में रुद्र-स्वरूप भैरव को क्षेत्रपाल बताया गया है, जिससे इस तीर्थ की प्रभावशीलता रक्षणप्रधान शैव-भाव से जुड़ती है। दर्श (अमावस्या) और पूर्णिमा के दिन ‘महापूजा’ करने का विधान बताया गया है, जिससे यात्रा में कालानुशासन का महत्व प्रकट होता है। फलश्रुति में कहा है कि महोदय-काल में स्नान करके महाकाल के दर्शन करने वाला भक्त ‘सात हजार जन्मों’ तक धन-समृद्धि प्राप्त करता है।

महोदयमाहात्म्यवर्णनम् | The Glorification of Mahodaya Tīrtha
इस अध्याय में ईश्वर ईशान दिशा में स्थित महोदय तीर्थ का माहात्म्य और विधि बताते हैं। यात्री को महोदय जाकर विधिपूर्वक स्नान करना चाहिए और फिर पितरों तथा देवताओं के लिए तर्पण करना चाहिए। कथन है कि महोदय विशेष रूप से उन लोगों के लिए अत्यन्त प्रभावशाली है जो धर्म-संवेदनशील लेन-देन में फँसकर ‘प्रतिग्रह’ (दान-स्वीकार) से उत्पन्न दोषों से ग्रस्त हैं; इसका सेवन करने वाले को भय नहीं होता। यह तीर्थ द्विजों के लिए महान आनन्ददायक है, और इन्द्रिय-विषयों में आसक्त तथा प्रतिग्रह-जाल में उलझे लोगों को भी मोक्षोन्मुख फल देने का आश्वासन देता है। महाकाल के उत्तर में इस स्थान की रक्षा हेतु मातृगण स्थित हैं; स्नान के बाद उनका पूजन करना चाहिए। अंत में कहा गया है कि अभिषेक से महोदय पाप-नाशक और मोक्ष-प्रद है; इसका क्षेत्र लगभग अर्ध-क्रोश परिमाण का है, और इसका मध्य भाग ऋषियों को सदा प्रिय रहने वाला पुण्य-स्थान है।

संगमेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् / Description of the Glory of Saṅgameśvara
इस अध्याय में ईश्वर संक्षेप में एक धर्म-आचार का निर्देश देते हैं। वे वायव्य दिशा में स्थित सङ्गमेश्वर को पाप-नाशक शैव तीर्थ और ऋषियों के संगम-स्थान के रूप में बताते हैं, जिससे उसकी महिमा और प्रामाण्य स्थापित होता है। फिर निकट की पूर्व दिशा में ‘कुण्डिका’ नामक पवित्र सरोवर का वर्णन है, जो पापहरिणी है और जहाँ सरस्वती वडवानल-शक्ति के साथ प्रकट हुई मानी गई है। विधि यह है कि पहले कुण्डिका में स्नान करें, फिर सङ्गमेश्वर का पूजन करें। फलश्रुति में अनेक जन्मों तक ऐश्वर्य और प्रिय संतान से वियोग न होना तथा जन्म से मृत्यु तक के समस्त पापों का नाश कहा गया है।

उन्नतविनायकमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of Unnata-Vināyaka (the Exalted Gaṇeśa)
इस अध्याय में ईश्वर प्रभास-क्षेत्र के भीतर “उत्तमस्थान” नामक प्रसिद्ध पुण्य-स्थान का परिचय देते हैं। यह एक निर्दिष्ट दिव्य-परिसर के उत्तर में, स्थानीय दूरी-मान के अनुसार स्थित बताया गया है। इसके और उत्तर में बारह धनु के अंतर पर “उन्नत विघ्नराज” विराजमान हैं, जो समस्त बाधाओं का नाश करने वाले (सर्व-प्रत्यूह-नाशन) हैं। चतुर्थी तिथि को सुगंधित द्रव्यों, फलों और मधुर नैवेद्य (मोदक आदि) से उनकी पूजा करने का विधान कहा गया है। इस उपासना का फल वांछित कामनाओं की सिद्धि तथा “त्रैलोक्य-विजय” के समान सर्वत्र जय-प्रद सफलता बताया गया है, जो इस तीर्थ-परंपरा में फलश्रुति के रूप में आश्वासन देती है।

तलस्वामिमाहात्म्यवर्णनम् | The Glory of Taptodaka-Talāsvāmin (Talāsvāmi Māhātmya)
इस अध्याय में ईश्वर का तात्त्विक उपदेश है, जिसमें वे एक ऊँचे स्थल के उत्तर में लगभग तीन योजन दूर स्थित एक पवित्र तीर्थ का निर्देश करते हैं। वहाँ तप्तोदक से जुड़ा तप्तकुण्ड और देवता तलास्वामी का माहात्म्य बताया गया है। साथ ही पूर्वकाल की कथा स्मरण कराई जाती है कि दीर्घ युद्ध के बाद दैत्यों के अग्रणी तलास्वामी को विष्णु ने संहार किया। इसके बाद कथा तीर्थ-आचरण में रूपान्तरित होती है—साधक को तप्तकुण्ड में स्नान कर तलास्वामी की विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए और पिण्ड-प्रदान भी करना चाहिए। फलश्रुति में कहा गया है कि इससे कोटि-यात्रा के समान महान पुण्य प्राप्त होता है; इस प्रकार स्थान-निर्देश, पौराणिक प्रमाण और विधि—तीनों मिलकर एक पूर्ण तीर्थ-एकक बनते हैं।

कालमेघमाहात्म्यवर्णनम् (The Māhātmya of Kāla-Megha)
इस अध्याय में ईश्वर महादेवी को ‘कालमेघ’ नामक परम पावन तीर्थ का माहात्म्य सुनाते हैं। वे भक्त को वहाँ जाने की प्रेरणा देते हैं और बताते हैं कि पूर्व दिशा में लिंग-रूप में प्रकट एक क्षेत्रपाल/क्षेत्रप (रक्षक-देवता) विराजमान है। पूजा का विधान तिथि-विशेष से जुड़ा है—अष्टमी या चतुर्दशी के दिन विशेषतः बलि-समर्पण सहित उस लिंग का पूजन करना चाहिए। फलश्रुति में कहा गया है कि यह देव वांछितार्थ प्रदान करने वाला है और कलियुग में कल्पवृक्ष के समान सहज रूप से फल देने वाला माना गया है। अंत में इसे स्कन्दमहापुराण के प्रभासखण्ड के प्रभास-क्षेत्र-माहात्म्य (प्रथम भाग) का 331वाँ अध्याय कहा गया है।

रुक्मिणीमाहात्म्यवर्णनम् | Rukmiṇī Māhātmya (Glorification of Rukmiṇī and the Hot-Water Kuṇḍa)
इस अध्याय में ईश्वर प्रभास-क्षेत्र के दो जुड़े हुए पवित्र स्थलों का निर्देश देते हैं—दक्षिण दिशा में निश्चित दूरी पर स्थित तप्तोदक-कुण्डों का समूह, और पूर्व दिशा में निर्धारित अंतराल पर प्रतिष्ठित देवी रुक्मिणी। तप्तोदक-कुण्ड को महान् पापों का भी नाश करने वाला, यहाँ तक कि ‘कोटि-हत्या’ जैसे घोर पातकों को मिटाने में समर्थ, परम शुद्धि-स्थल कहा गया है। विधि क्रम से बताई गई है—पहले तप्त जल में स्नान, फिर देवी रुक्मिणी की सम्पूर्ण पूजा। रुक्मिणी को सर्वपापहरिणी, मंगलदायिनी और भक्तों को शुभ फल देने वाली बताया गया है। फलश्रुति में गृहस्थ-धर्म की स्थिरता का आश्वासन है—विशेषतः स्त्रियों के लिए सात जन्मों तक गृह-भंग (वैवाहिक गृह का टूटना) नहीं होता, ऐसा तीर्थ-सेवा और भक्ति का पुण्यफल कहा गया है।

मधुमत्यां पिङ्गेश्वर-भद्रा-सङ्गम-माहात्म्यवर्णनम् (Glorification of Pingeshvara and the Bhadrā Confluence at Madhumatī)
ईश्वर प्रभास-क्षेत्र में भद्रा नदी के निकट और समुद्र-समीप स्थित तीर्थों का क्रम बतलाते हैं। वहाँ दुर्वासेश्वर नामक एक प्रसिद्ध लिंग का वर्णन है, जो अत्यन्त पावन और सुखद फल देने वाला कहा गया है। अमावस्या के दिन स्नान करके पितरों को पिण्ड-दान करने से पितृगण दीर्घकाल तक तृप्त होते हैं—ऐसा प्रतिपादित है। ऋषियों द्वारा स्थापित अनेक लिंगों के दर्शन, स्पर्श और पूजन से यात्रियों के दोष नष्ट होते हैं। इसके बाद क्षेत्र की सीमाएँ बताई गई हैं—परिधि में मधुमती नाम स्थान और दक्षिण-पश्चिम दिशा में खण्डघट। समुद्र-तट पर पिङ्गेश्वर स्थित है; वहाँ सात कुओँ का उल्लेख है, जिनमें पर्व-काल में पितरों के ‘हाथ’ दिखाई देने की परम्परा कही गई है, जिससे श्राद्ध की महिमा और भी पुष्ट होती है। यहाँ किया गया श्राद्ध गया से भी अनेक गुना फलदायक बताया गया है। अंत में भद्रा-संगम का निर्देश देकर उसके पुण्य को गंगा-सागर के तुल्य कहा गया है।

तलस्वामिमाहात्म्यवर्णनम् (Talasvāmi Māhātmya: Origin Legend and Pilgrimage Rite)
इस अध्याय में देवी ईश्वर से पूछती हैं कि पहले बताए गए “तल” के पतन का कारण क्या है और तलस्वामी की महिमा कैसे प्रकट हुई। ईश्वर एक गुप्त उत्पत्ति-कथा बताते हैं—महेंद्र नामक दानव कठोर तप करके देवताओं को जीत लेता है और विनाशकारी द्वंद्व चाहता है। तब रुद्र की देहस्थ अग्नि-शक्ति से “तल” उत्पन्न होता है; रुद्र-वीर्य से बलवान तल महेंद्र को पराजित कर नृत्य करता है, और उसके नर्तन-वेग से तीनों लोक काँप उठते हैं, अंधकार छा जाता है तथा प्राणियों में भय फैलता है। देव रुद्र की शरण लेते हैं; रुद्र कहते हैं कि तल उनका “पुत्र” है, इसलिए अवध्य है, और उन्हें प्रभास क्षेत्र में तप्तोदक-कुंड के पास, स्तुतिस्वामी नामक स्थान पर स्थित हृषीकेश (विष्णु) के पास भेजते हैं। विष्णु तल से मल्लयुद्ध करते हैं, थक जाते हैं और रुद्र से तप्तोदक के जल को पुनः उष्ण करने की प्रार्थना करते हैं; रुद्र तीसरे नेत्र से कुंड को तप्त करते हैं, विष्णु स्नान कर बल पाते हैं और फिर तल को जीत लेते हैं। तल हँसकर कहता है कि अशुद्ध भाव से भी उसे विष्णु की परम अवस्था मिल गई; विष्णु वर देते हैं। तल मांगता है कि उसकी कीर्ति बनी रहे और मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को भक्तिपूर्वक विष्णु-दर्शन करने वालों के पाप नष्ट हों। अध्याय में तीर्थ-प्रभाव बताए गए हैं—पापक्षय, श्रम-निवारण, और महापातकों का भी प्रायश्चित्त; वहाँ नारायण का सान्निध्य तथा शैव क्षेत्रपाल “कालमेघ” का निवास कहा गया है। यात्रा-विधि में तलस्वामी रूप से विष्णु-स्मरण, सहस्रशीर्ष मंत्र आदि का जप, स्नान, अर्घ्य, गंध-पुष्प-वस्त्र से पूजा, अभ्यंग-द्रव्य, नैवेद्य, धर्म-श्रवण, रात्रि-जागरण, योग्य वैदिक ब्राह्मण को वृषभ/स्वर्ण/वस्त्र आदि दान, उपवास और रुक्मिणी को प्रणाम का विधान है। फलश्रुति में कुंड-स्नान व तलस्वामी-दर्शन से पितरों का उद्धार, अनेक जन्मों तक पुण्य-वृद्धि और अनेक यज्ञों के तुल्य फल का वर्णन है।

शंखावर्त्ततीर्थमाहात्म्यवर्णनम् (The Māhātmya of Śaṅkhāvartta Tīrtha)
इस अध्याय में ईश्वर देवी को स्थल-निर्देश देते हैं। यात्री को पश्चिम की ओर न्यंकुमती नदी के शुभ तट पर जाकर फिर दक्षिण में ‘शंखावर्त्त’ नामक महान तीर्थ पहुँचना चाहिए। वहाँ चित्रांकित शिला है, जिसमें स्वयम्भू ‘रक्तगर्भा’ का निवास कहा गया है; शिला के कट जाने पर भी लालिमा का चिह्न बना रहता है, जिससे भूमि में स्थायी पवित्रता का संकेत मिलता है। यह स्थान विष्णु-क्षेत्र माना गया है। प्राचीन प्रसंग में विष्णु ने वेद-अपहारी ‘शंख’ का वध किया था; उसी से इस तीर्थ की उत्पत्ति बताई गई है। जलाशय को शंखाकार कहा गया है, जिससे नाम और महिमा का आधार स्पष्ट होता है। फलश्रुति में कहा है कि यहाँ स्नान करने से ब्रह्महत्या का भार उतर जाता है, और शूद्र भी क्रमशः ब्राह्मण-योनि प्राप्त करता है। आगे पूर्व दिशा में रुद्रगया जाना चाहिए; पूर्ण तीर्थफल चाहने वाले वहाँ गोदान करें—इस प्रकार शुद्धि, पुण्य और दानधर्म एक ही यात्रा-मार्ग में जुड़ते हैं।

गोष्पदतीर्थमाहात्म्यवर्णनम् (The Glory of Goṣpada Tīrtha)
इस अध्याय में ईश्वर और देवी के संवाद के रूप में प्रभास-क्षेत्र के एक गुप्त किन्तु अत्यन्त फलदायी तीर्थ—न्यंकुमती नदी-परिसर में स्थित गोष्पदतीर्थ तथा उससे जुड़ी ‘प्रेत-शिला’—का माहात्म्य कहा गया है। यहाँ के श्राद्ध-फल को “गया से सात गुना” बताया गया है और उदाहरण रूप में राजा पृथु के श्राद्ध से पापी वेन का उद्धार वर्णित है। देवी तीर्थ की उत्पत्ति, विधि, मंत्र और योग्य पुरोहित के लक्षण पूछती हैं; ईश्वर इसे रहस्य मानकर केवल श्रद्धालुओं को ही बताने की मर्यादा स्थापित करते हैं। फिर श्राद्ध-यात्रा की क्रमबद्ध विधि दी गई है—ब्रह्मचर्य, शौच, आस्तिक्य, नास्तिक-संग का त्याग, सामग्री-सज्जा, न्यंकुमती में स्नान, देव-तर्पण और पितृ-तर्पण। अग्निष्वात्त, बर्हिषद, सोमप आदि पितृदेवताओं का आवाहन कर ज्ञात-अज्ञात पितरों, दुर्गति में पड़े प्राणियों तथा अन्य योनियों में गए पूर्वजों तक के लिए पिण्ड-दान बताया गया है; पायस, मधु, सत्तू, पिष्टक, चरु, अन्न, मूल-फल आदि अर्पण, गो-दान, दीप-दान, प्रदक्षिणा, दक्षिणा और पिण्ड-विसर्जन का विधान भी आता है। इतिहास-खंड में वेन का अधर्मपूर्ण शासन, ऋषियों द्वारा उसका वध, निषाद और पृथु की उत्पत्ति, पृथु का राज्य तथा ‘पृथ्वी-दोहन’ का प्रसंग वर्णित है। पृथु वेन के मोक्ष हेतु श्राद्ध करना चाहते हैं, पर अन्य तीर्थ वेन के पाप से संकुचित हो जाते हैं; तब दिव्य निर्देश से पृथु प्रभास के गोष्पदतीर्थ में विधिवत कर्म कर वेन को मुक्ति दिलाते हैं। अंत में इस तीर्थ की काल-स्वतंत्रता, शुभ अवसरों का उल्लेख और इस रहस्य को केवल सच्चे साधकों को देने की आज्ञा पुनः कही गई है।

न्यंकुमतीमाहात्म्ये नारायणगृहमाहात्म्यवर्णनम् | Narāyaṇa-gṛha: Glory and Observances near Nyankumatī
ईश्वर देवी से कहते हैं कि गोष्पद के दक्षिण, शुभ समुद्र-तट पर, पापहरिणी न्यंकुमती के निकट ‘नारायणगृह’ नाम का परम तीर्थ है। वहाँ केशव कल्पों-कल्पों तक स्थिर रूप से निवास करते हैं; दुष्ट शक्तियों का संहार करके और कलियुग में पितरों के उद्धार हेतु वे इस ‘गृह’ में विश्राम करते हैं, इसलिए यह स्थान जगत में प्रसिद्ध हुआ। चारों युगों के अनुसार वहाँ भगवान के नाम बताए गए हैं—कृत में जनार्दन, त्रेता में मधुसूदन, द्वापर में पुण्डरीकाक्ष और कलि में नारायण। इस प्रकार यह तीर्थ चारों युगों में धर्म-व्यवस्था का स्थिर आधार माना गया है। एकादशी को निराहार रहकर जो दर्शन करता है, उसे हरि के ‘अनन्त’ परम पद का दर्शन-फल मिलता है। तीर्थ-स्नान, श्राद्ध आदि कर्मों का विधान है और उत्तम ब्राह्मण को पीत वस्त्र का दान करने का निर्देश है। अंत में कहा गया है कि इस माहात्म्य का श्रवण या पाठ शुभ सद्गति प्रदान करता है।

Jāleśvara-liṅga-prādurbhāvaḥ (Origin and Glory of Jāleśvara at the Devikā Riverbank)
ईश्वर देविका नदी के तट पर स्थित एक दिव्य, तेजस्वी लिंग का वर्णन करते हैं, जिसे नागकन्याएँ पूजती हैं और जो ‘जालेश्वर’ कहलाता है। कहा गया है कि इसका केवल स्मरण भी ब्रह्महत्या जैसे महापाप का नाश कर देता है। देवी नाम की उत्पत्ति और उस तीर्थ-संग का फल पूछती हैं। ईश्वर प्राचीन इतिहासन सुनाते हैं—प्रभास में ऋषि आपस्तम्ब जल में तपस्या और ध्यान कर रहे थे। मछुआरों ने बड़ा जाल डालकर अनजाने में उन्हें जल से खींच लिया; फिर वे भय और पश्चात्ताप से क्षमा माँगने लगे। ऋषि करुणा और धर्म का विचार कर कहते हैं कि उनका पुण्य लोक-कल्याण में लगे और मछुआरों का दोष वे स्वयं ग्रहण करें। राजा नाभाग मंत्रियों और पुरोहित सहित आकर मछुआरों को ‘मूल्य’ देकर संतुष्ट करना चाहते हैं, पर ऋषि धन को माप नहीं मानते। लोमश ऋषि बताते हैं कि उचित मूल्य गौ है; आपस्तम्ब गौ की पवित्रता, पंचगव्य की शुद्धि-शक्ति, गो-रक्षा और नित्य-पूजन का धर्म विस्तार से कहते हैं। मछुआरे गौ अर्पित करते हैं; ऋषि उन्हें आशीर्वाद देते हैं कि वे जल से उठाए गए मत्स्यों सहित स्वर्ग को प्राप्त हों—भावना और हित ही प्रधान हैं। नाभाग को साधु-संग का महत्त्व, राज-अहंकार का त्याग और दुर्लभ ‘धर्म-बुद्धि’ का वर मिलता है। अंत में ईश्वर कहते हैं कि उसी ऋषि ने लिंग की स्थापना की; जाल (नेट) में पड़ने के कारण इसका नाम ‘जालेश्वर’ पड़ा। जालेश्वर में स्नान-पूजन, माहात्म्य-श्रवण, विशेषकर चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को पिंडदान तथा वेदज्ञ ब्राह्मण को गोदान अत्यंत पुण्यदायक बताए गए हैं।

Huṁkāra-kūpa Māhātmya (The Glory of the Well Filled by the Huṁkāra)
ईश्वर महादेवी को देविका नदी के रमणीय तट पर स्थित ‘त्रिलोक-विश्रुत’ हुंकार-कूप का माहात्म्य सुनाते हैं। वहीं देविका-तट पर तण्डी नामक मुनि दृढ़ शिव-भक्ति से तप करते थे। एक अंधा, वृद्ध हिरन गहरे, सूखे कूप में गिर पड़ा। मुनि करुणा से द्रवित हुए, पर तप-नियम न तोड़ते हुए बार-बार ‘हुं’ का हुंकार करते रहे; उस ध्वनि-शक्ति से कूप जल से भर गया और हिरन कठिनाई से बाहर निकल आया। फिर वह हिरन मनुष्य-रूप धारण कर मुनि से पूछता है कि यह अद्भुत कर्मफल कैसे प्रकट हुआ। वह बताता है कि इसी तीर्थ के प्रभाव से वह मृग-योनि में गया और यहीं से फिर मनुष्य बना—अन्य कोई कारण नहीं। मुनि पुनः हुंकार करते हैं तो कूप फिर जल से भर जाता है; वे स्नान और पितृ-तर्पण कर उसे श्रेष्ठ तीर्थ जानकर परा गति को प्राप्त होते हैं। फलश्रुति में कहा है कि आज भी वहाँ हुंकार करने पर जलधारा प्रकट होती है। जो भक्त वहाँ दर्शन को जाता है—पूर्व में पापी रहा हो तब भी—उसे पृथ्वी पर फिर मनुष्य-जन्म नहीं मिलता। जो स्नान कर शुद्ध होकर श्राद्ध करता है, वह सब पापों से मुक्त होता है, पितृलोक में सम्मान पाता है और भूत-भविष्य की सात पीढ़ियों का उद्धार करता है।

चण्डीश्वरमाहात्म्यवर्णनम् (Glorification of Caṇḍīśvara)
इस अध्याय में ईश्वर देवी से कहते हैं कि प्रभास-क्षेत्र में चण्डीश्वर नाम का महालिंग स्थित है, जो सर्व पातकों का नाश करने वाला है। उसके दर्शन और पूजन से महान पुण्य तथा शुद्धि प्राप्त होती है। फिर वे व्रत-विधि बताते हैं—कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को उपवास रखकर रात्रि में जागरण करना चाहिए। इस नियमपूर्वक आचरण से साधक पापों से मुक्त होकर महेश्वर के परम पद को प्राप्त करता है—ऐसी फलश्रुति के साथ अध्याय समाप्त होता है।

आशापूरविघ्नराजमाहात्म्यवर्णनम् (The Māhātmya of Āśāpūra Vighnarāja)
इस अध्याय में ईश्वर वायव्य (उत्तर-पश्चिम) दिशा में स्थित ‘आशापूर विघ्नराज’ नामक पवित्र देवालय का माहात्म्य बताते हैं। यह स्थान ‘अकल्मष’ (निर्मल) और ‘विघ्न-नाशक’ कहा गया है; ‘आशापूरक’ नाम इसलिए है कि यह देव भक्तों की आशाएँ और अभिलाषाएँ पूर्ण करते हैं। तीर्थ की सिद्धि उदाहरणों से स्थापित की गई है—राम, सीता और लक्ष्मण ने वहाँ गणेश/विघ्नेश की पूजा कर अपना अभीष्ट प्राप्त किया। चन्द्रमा ने भी गणाधिप की आराधना करके मनचाहा वर पाया, जिसमें सभी प्रकार के कुष्ठ (त्वचा-रोग) का नाश होकर आरोग्य-लाभ विशेष रूप से कहा गया है। विधान यह है कि भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को देव की पूजा कर मोदक सहित ब्राह्मणों को भोजन कराया जाए। फलश्रुति में कहा है कि विघ्नराज की कृपा से इच्छित सफलता मिलती है; और ईश्वर ने उन्हें क्षेत्र-रक्षा तथा यात्रियों के विघ्न दूर करने हेतु नियुक्त किया है।

Chandreśvara–Kalākuṇḍa Tīrtha Māhātmya (चंद्रेश्वरकलाकुण्डतीर्थमाहात्म्य)
अध्याय 342 में प्रभासखण्ड के अंतर्गत ईश्वर एक स्थान-विशेष का उपदेश देते हैं। दक्षिण–नैरृत्य दिशा में थोड़ी दूरी पर सोम (चन्द्र) द्वारा स्वयंसिद्ध स्थापित पाप-हर लिंग ‘चन्द्रेश/चन्द्रेश्वर’ बताया गया है। उसके निकट पवित्र जलाशय ‘अमृत-कुण्ड’ है, जिसे ‘कला-कुण्ड’ भी कहा गया है। यहाँ साधना का क्रम स्पष्ट है—पहले कुण्ड में स्नान, फिर चन्द्रेश्वर का पूजन। ऐसा करने वाले को सहस्र वर्षों के तप का फल प्राप्त होता है। साथ ही चन्द्र द्वारा निर्मित एक तड़ाग का उल्लेख है, जो सोलह धनुष-परिमाण में विस्तृत और चन्द्रेश के सापेक्ष पूर्व–पश्चिम दिशा में स्थित बताया गया है, जिससे यह खण्ड तीर्थ-मानचित्र की भाँति मार्गदर्शन करता है। उपसंहार में इसे प्रभासक्षेत्र-माहात्म्य के आशापूरा-माहात्म्य प्रसंग में स्थित कहा गया है।

कपिलधाराकपिलेश्वरमाहात्म्ये कपिलाषष्ठीव्रतविधानमाहात्म्यवर्णनम् (Kapiladhārā–Kapileśvara Māhātmya and the Procedure/Glory of the Kapilā-Ṣaṣṭhī Vrata)
यह अध्याय शिव–देवी संवाद के रूप में है। इसमें पहले कपिलेश्वर और कपिल-क्षेत्र का दिग्देश तथा तीर्थ-संबंधी वर्णन करके स्थान की पहचान कराई जाती है, फिर महर्षि कपिल के दीर्घ तप और महेश्वर की प्रतिष्ठा की पुराकथा से इस क्षेत्र की प्रामाणिकता और महिमा स्थापित की जाती है। समुद्र से संबद्ध पुण्यप्रवाह ‘कपिलधारा’ का उल्लेख है, जो पुण्यवानों को प्रत्यक्ष अनुभव होती है। मुख्य उपदेश ‘कपिला-षष्ठी’ व्रत का है, जो एक दुर्लभ तिथि-संयोग से निर्धारित होता है। व्रती को क्षेत्र में या सूर्य-संबंधी स्थान पर स्नान, जप, निर्दिष्ट द्रव्यों से सूर्य को अर्घ्य, प्रदक्षिणा तथा कपिलेश्वर के निकट पूजन का क्रम बताया गया है। आगे कुम्भ-विन्यास, सूर्य-चिह्न/प्रतिमा सहित दान और वेदज्ञ ब्राह्मण को अर्पण का विधान आता है। अंत में फलश्रुति में संचित पापों का प्रायश्चित्त, महान यज्ञों के तुल्य पुण्य और अनेक तीर्थ-दान के समान महाफल की प्रशंसा की गई है।

जरद्गवेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Jaradgaveśvara Māhātmya (Glorification of Jaradgaveśvara)
अध्याय 344 में प्रभास-क्षेत्र के भीतर देवी को ईश्वर द्वारा तीर्थ-मार्गदर्शन दिया गया है। यहाँ पाप-नाशक लिंग ‘जरद्गवेश्वर’ का वर्णन है, जिसे जरद्गव ने प्रतिष्ठित किया और जो कपिलेश्वर के निकट दिशा-निर्देश सहित स्थित बताया गया है। इसके दर्शन-पूजन से ब्रह्महत्या आदि महापापों तथा उनसे जुड़े दोषों का नाश कहा गया है। उसी स्थान पर नदी-देवी अंशुमती का भी उल्लेख है। विधिपूर्वक स्नान करके पिण्डदान (पितृ-तर्पण) करने का विधान बताया गया है, जिससे पितरों की दीर्घकाल तक तृप्ति फलरूप मानी गई है; साथ ही वेद-विद् ब्राह्मण को वृषभ-दान की प्रशंसा की गई है। पूजा-विधि में गंध-पुष्प अर्पण, पंचामृताभिषेक, गुग्गुलु-धूप, तथा निरंतर स्तुति, नमस्कार और प्रदक्षिणा का निर्देश है। विविध अन्नों से ब्राह्मण-भोजन कराने को धर्म बताया गया है और बहुगुणित पुण्य-फल का कथन किया गया है। इस तीर्थ का नाम कृतयुग में ‘सिद्धोदक’ और कलियुग में ‘जरद्गवेश्वर-तीर्थ’ कहा गया है।

नलेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् (Naleśvara Māhātmya—Account of the Glory of Naleśvara)
इस अध्याय में प्रभास-क्षेत्र के हाटकेश्वर नामक लिंग का संक्षिप्त माहात्म्य कहा गया है और उसके पूर्व दिशा में नलेश्वर नामक देवालय का वर्णन आता है। ईश्वर देवी से दिशा-निर्देश और निश्चित दूरी का उल्लेख करके इस तीर्थ को पहचानने का मार्ग बताते हैं। कथा में कहा गया है कि नल ने दमयंती के साथ मिलकर नलेश्वर की स्थापना की, जिससे आदर्श राज-दंपति द्वारा क्षेत्र की श्रेष्ठता की मान्यता प्रकट होती है। आगे फलश्रुति में बताया गया है कि जो मनुष्य विधिपूर्वक दर्शन और पूजन करता है, वह कलि-जन्य दोषों से मुक्त होता है तथा द्यूत/जुए में विजय का फल भी प्राप्त करता है।

कर्कोटकार्कमाहात्म्यवर्णनम् — Karkoṭakārka Māhātmya (Account of the Glory of the ‘Karkoṭaka Sun’)
इस अध्याय में ईश्वर प्राभास-क्षेत्र के आग्नेय (दक्षिण-पूर्व) भाग में स्थित ‘कर्कोटक-रवि’ नामक सूर्य-स्वरूप का महात्म्य बताते हैं। कहा गया है कि इस रूप का केवल दर्शन करने से ही समस्त देवता प्रसन्न हो जाते हैं; एक स्थानीय दिव्य-प्राकट्य को सर्वदेव-अनुग्रह का केन्द्र माना गया है। फिर संक्षिप्त विधि दी गई है—जब सप्तमी तिथि रविवासर के साथ पड़े, तब धूप, गंध और अनुलेपन आदि से विधिपूर्वक पूजन करना चाहिए। उचित समय और शास्त्रोक्त उपचारों से की गई यह आराधना ‘सर्व-किल्बिष’ अर्थात् समस्त पाप/दोष से मुक्ति देने वाली बताई गई है। यह स्कन्दमहापुराण के प्राभासखण्ड, प्राभासक्षेत्रमाहात्म्य में 346वाँ अध्याय है।

हाटकेश्वरमाहात्म्यम् (Hāṭakeśvara Māhātmya: The Glory of Hatakeśvara Liṅga and Agastya’s Āśrama)
ईश्वर देवी से हाटकेश्वर-लिंग का स्थान और महिमा बताते हैं। यह नलेश्वर के निकट, अगस्त्याम्र-वन की छाया में स्थित है, जहाँ पहले महर्षि अगस्त्य ने तप किया था। फिर कारण-कथा आती है—विष्णु द्वारा कालकेय दैत्यों के संहार के बाद उनके कुछ अवशेष समुद्र में छिप गए और रात में प्रभास क्षेत्र में आकर तपस्वियों को सताने लगे, यज्ञ-दान की परंपरा तोड़ने लगे, जिससे स्वाध्याय, वषट्कार और धर्म-चिह्नों का लोप होने लगा। व्याकुल देवता ब्रह्मा के पास गए; ब्रह्मा ने उन्हें कालकेय बताकर प्रभास में अगस्त्य के पास जाने को कहा। अगस्त्य समुद्र के पास जाकर उसे गंडूष भर पी जाते हैं, दैत्य प्रकट हो जाते हैं और पराजित होते हैं; कुछ पाताल भाग जाते हैं। देवताओं के समुद्र लौटाने के आग्रह पर अगस्त्य कहते हैं कि जल जीर्ण/अशुद्ध हो चुका है; आगे चलकर भागीरथ गंगा को लाकर समुद्र को पुनः भरेंगे। अंत में वरदान—अगस्त्याश्रम और हाटकेश्वर के पास स्नान-पूजन से महान फल; नित्य पूजा से गोदान-समान पुण्य; ऋतु/अयन में पूजा तथा श्राद्ध से विशेष फल। श्रद्धापूर्वक इस माहात्म्य के श्रवण से दिन-रात के पाप तत्काल नष्ट होते हैं।

नारदेश्वरीमाहात्म्यवर्णनम् | Nāradeśvarī Māhātmya (Glorification of Nāradeśvarī)
इस अध्याय में ईश्वर के उपदेश के रूप में संक्षिप्त तीर्थ-निर्देश दिया गया है। भक्त से—महादेवी को संबोधित करते हुए—पश्चिम दिशा में स्थित नारदेश्वरी देवी के पवित्र धाम में जाने को कहा गया है; उनके सान्निध्य को सर्व-दौर्भाग्य-नाशिनी बताया गया है। विशेष व्रत-विधान यह है कि जो स्त्री तृतीया तिथि को शांत चित्त से देवी की पूजा करती है, वह ऐसा रक्षात्मक पुण्य स्थापित करती है कि उसके वंश में स्त्रियाँ दौर्भाग्य के चिह्न से युक्त नहीं होतीं। इस प्रकार स्थान, समय और फल—तीनों का निरूपण कर अध्याय का समापन प्राभासक्षेत्रमाहात्म्य के अंतर्गत ‘नारदेश्वरी-माहात्म्य’ के रूप में होता है।

मन्त्रविभूषणागौरी-माहात्म्यवर्णनम् (Glorification of Mantravibhūṣaṇā Gaurī)
इस अध्याय में ईश्वर देवी को उपदेश देते हैं कि भीमेश्वर के निकट स्थित “देवी मन्त्रविभूषणा” का विशेष रूप से स्मरण और पूजन करना चाहिए। बताया गया है कि इस देवी की आराधना पूर्वकाल में सोम ने की थी, जिससे देवी और स्थान की महिमा प्रकट होती है। फिर व्रत का समय और विधि बताई जाती है—श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को विधिपूर्वक जो स्त्री इस देवी का पूजन करती है, वह समस्त शोकों से मुक्त हो जाती है। इस प्रकार तीर्थ-स्थल, भक्त-परंपरा और व्रत-काल को जोड़कर फलदायक धर्मोपदेश दिया गया है।

दुर्गकूटगणपतिमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of Durgakūṭa Gaṇapati (Glorification Narrative)
इस अध्याय में ईश्वर के वचन से दुर्गकूटक में स्थित विश्वेश का सूक्ष्म स्थान-निर्देश दिया गया है—वह भल्लतीर्थ के पूर्व में और योगिनीचक्र के दक्षिण में विराजमान हैं। फिर उदाहरण रूप में भीम द्वारा इस देवता की सफल आराधना का वर्णन आता है, जिससे यह सिद्ध होता है कि विधिपूर्वक की गई पूजा ‘सर्वकामप्रदा’ है। पूजा का काल फाल्गुन मास, शुक्ल पक्ष की चतुर्थी बताया गया है। गंध, पुष्प और जल आदि सरल उपचरों से नियमपूर्वक पूजन करने पर उपासक को निःसंदेह एक वर्ष तक निर्विघ्न जीवन प्राप्त होता है—यही संक्षिप्त फलश्रुति कही गई है।

कौरवेश्वरीमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of Kauraveśvarī (Protectress of the Kṣetra)
इस अध्याय में ईश्वर महादेवी को आदेश देते हैं कि वे कौरवेश्वरी देवी के पास जाएँ। बताया गया है कि उनका नाम पूर्व आराधना के कारण कुरुक्षेत्र से जुड़ा है और वे पवित्र क्षेत्र की रक्षिका शक्ति हैं; स्मरण कराया जाता है कि भीम ने भी क्षेत्र-रक्षा का दायित्व लेकर पहले उनकी उपासना की थी। महानवमी के दिन परिश्रमपूर्वक किया गया पूजन अत्यन्त फलदायी कहा गया है। साथ ही अतिथि-सत्कार और दान का नियम बताया गया—विशेषतः दम्पतियों को भोजन कराना, उत्तम/दिव्य गुण वाले अन्न-पान तथा अच्छी तरह बने मधुर पकवान अर्पित करना। ऐसी स्तुति और दान से प्रसन्न देवी भक्त की पुत्रवत् रक्षा करती हैं; स्थान-आधारित भक्ति, रक्षण-कर्तव्य और नियत दान—तीनों को एक साथ साधने का उपदेश है।

सुपर्णेलामाहात्म्यवर्णनम् (Supārṇelā Māhātmya—Account of the Glory of Supārṇelā)
ईश्वर देवी से कहते हैं कि दुर्गा-कूट के दक्षिण में निश्चित दूरी पर सुपर्णेला तीर्थ और उससे जुड़ा भैरवी-स्थान है; वहाँ पहुँचने का दिशानिर्देश देकर वे तीर्थयात्रा का विधान बताते हैं। फिर इस स्थान की उत्पत्ति-कथा आती है—गरुड़ (सुपर्ण) पाताल से अमृत लाकर नागों की उपस्थिति में यहीं छोड़ते हैं; नागों द्वारा देखा-रखा गया यह स्थान पृथ्वी पर ‘सुपर्णेला’ नाम से प्रसिद्ध हो गया। यह भूमि ‘इला’ कही गई है, जिसे सुपर्ण ने प्रतिष्ठित किया; और ‘सुपर्णेला’ नाम को पाप-नाशक बताया गया है। आगे साधक के लिए कर्म-क्रम है—सुपर्ण-कुण्ड में स्नान, तीर्थ में पूजन, ब्राह्मण-आतिथ्य, दान तथा विशेष रूप से अन्नदान। फलश्रुति में प्राणघातक संकटों से रक्षा, गृह में शुभता, और स्त्री का ‘जीववत्सा’ होना तथा संतान-समृद्धि जैसे मंगल फल बताए गए हैं।

भल्लतीर्थमाहात्म्यवर्णनम् | Bhallatīrtha Māhātmya (Glorification of Bhallatīrtha)
ईश्वर देवी से कहते हैं कि प्रभास-खण्ड के पश्चिम भाग में मित्रवन के निकट भल्लतीर्थ नामक एक परम पवित्र तीर्थ है। इसे वैष्णव ‘आदि-क्षेत्र’ बताया गया है, जहाँ विष्णु युग-युग में विशेष रूप से निवास करते हैं और प्राणियों के कल्याण हेतु गंगा की उपस्थिति भी प्रकट मानी गई है। द्वादशी के दिन (एकादशी-व्रत के अनुशासन सहित) नियमपूर्वक स्नान, योग्य ब्राह्मणों को दान, श्रद्धा से पितृतर्पण/श्राद्ध, विष्णु-पूजन, रात्रि-जागरण और दीपदान करने का विधान कहा गया है; ये कर्म पापहर और पुण्यदायक माने गए हैं। फिर कारण-कथा आती है—यादवों के अंत के बाद वासुदेव समुद्र-तट पर ध्यानस्थ होते हैं। जरा नामक शिकारी विष्णु के चरण को मृग समझकर भल्ल (तीर) छोड़ देता है; दिव्य स्वरूप पहचानकर वह क्षमा माँगता है। विष्णु बताते हैं कि इससे पूर्व शाप का अंत पूर्ण हुआ और शिकारी को उत्तम गति देते हैं; साथ ही वचन देते हैं कि जो यहाँ दर्शन कर भक्ति-आचरण करेंगे, वे विष्णुलोक को प्राप्त होंगे। इसी भल्ल-घटना से तीर्थ का नाम भल्लतीर्थ पड़ा, और पूर्व कल्पों में इसे हरिक्षेत्र भी कहा गया है। अंत में वैष्णव आचार की उपेक्षा, विशेषकर एकादशी-संयम का त्याग, निंदित है; भल्लतीर्थ के निकट द्वादशी-पूजा को गृह-रक्षा और पुण्यवृद्धि देने वाली कहा गया है। तीर्थफल की पूर्णता चाहने वालों को अग्रणी ब्राह्मणों को वस्त्र और गौ आदि का दान करने की संस्तुति की गई है।

Kardamālā-tīrtha Māhātmya and the Varāha Uplift of Earth (कर्दमालतीर्थमाहात्म्यं तथा वाराहोद्धारकथा)
इस अध्याय में ईश्वर देवी से कर्दमाला नामक तीर्थ का माहात्म्य कहते हैं, जो तीनों लोकों में प्रसिद्ध और समस्त पापों का नाश करने वाला है। प्रलय के समय एकार्णव में पृथ्वी डूब जाती है और ज्योतियाँ भी लीन हो जाती हैं; तब जनार्दन वराह-रूप धारण कर अपनी दंष्ट्रा पर पृथ्वी को उठाकर उसे पुनः उसके स्थान पर स्थापित करते हैं। इसके बाद विष्णु इस स्थान पर नियमपूर्वक स्थायी निवास की घोषणा करते हैं और पितृकर्म से इसका विशेष संबंध बताते हैं—कर्दमाला में तर्पण करने से पितृ एक कल्प तक तृप्त रहते हैं, और शाक-मूल-फल जैसी सरल सामग्री से किया गया श्राद्ध भी समस्त तीर्थों में किए श्राद्ध के तुल्य माना गया है। स्नान और दर्शन की फलश्रुति में उत्तम लोक-प्राप्ति तथा नीच योनियों से मुक्ति का वर्णन है। फिर एक चमत्कार-कथा आती है: शिकारीयों से भयभीत हिरनों का झुंड कर्दमाला में प्रवेश करते ही तत्काल मनुष्य-योनि को प्राप्त हो जाता है; यह देखकर शिकारी शस्त्र त्यागकर स्नान करते हैं और पापमुक्त हो जाते हैं। देवी के उद्गम और सीमा-प्रश्न पर ईश्वर एक ‘गुप्त’ वृत्तांत बताते हैं—वराह का शरीर यज्ञ-स्वरूप, वेद और कर्मकाण्ड के अंगों से युक्त रूप में वर्णित है; प्राभास-क्षेत्र में दंष्ट्राग्र पर कर्दम (कीचड़) लगा होने से इसका नाम कर्दमाला पड़ा। आगे महाकुण्ड, गंगा-अभिषेक के समान विशाल जलस्रोत, विष्णु-क्षेत्र की मर्यादा, तथा कलियुग में ‘सौकर’ क्षेत्र में वराह-दर्शन से विशेष पुण्य और मोक्ष की अद्वितीयता का प्रतिपादन करके अध्याय समाप्त होता है।

Guptēśvara-māhātmya (गुप्तेश्वरमाहात्म्य) — The Glory of Guptēśvara
ईश्वर देवी से कहते हैं कि प्रभास-क्षेत्र में देवगुप्तेश्वर के पास जाओ, जो पश्चिमोत्तर दिशा में स्थित है। वहाँ सोम (चन्द्र) को कुष्ठ-सदृश रोग और शरीर-क्षय हो गया था; लज्जा के कारण वे छिपकर (गुप्त रूप से) कठोर तप करते रहे। हज़ार दिव्य वर्षों के तप के बाद शिव स्वयं प्रकट हुए और प्रसन्न होकर सोम का क्षय तथा रोग दूर कर दिया। तब सोम ने देवों और असुरों द्वारा पूजित एक महान लिंग की स्थापना की; उनके गुप्त तप के कारण ही इस स्थान का नाम ‘गुप्तेश्वर’ प्रसिद्ध हुआ। यह भी कहा गया है कि इस लिंग के दर्शन या स्पर्श मात्र से त्वचा-रोग नष्ट होते हैं। विशेषतः सोमवारे (सोमवार) पूजन करने से उपासक के वंश में भी किसी का कुष्ठ-रोग के साथ जन्म नहीं होता—ऐसी फलश्रुति दी गई है।

बहुसुवर्णेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Bahusuvarṇeśvara Māhātmya (Glory of Bahusuvarṇeśvara)
ईश्वर देवी को आदेश देते हैं कि वह प्रभास-क्षेत्र के हिरण्य-पूर्व दिशा-भाग में स्थित बहुसुवर्णक/बहुसुवर्णेश्वर नामक लिंग के दर्शन हेतु जाए। इस तीर्थ की पवित्रता का कारण यह बताया गया है कि धर्मपुत्र ने वहाँ अत्यन्त कठिन यज्ञ किया था और उसी स्थान पर बहुसुवर्ण नाम का महाशक्तिशाली लिंग स्थापित किया था। यह लिंग “सर्वेश्वर” भी कहलाता है, जो समस्त यज्ञों के फल देने वाला है और सरस्वती के जल-संबंध से विधिपूर्ण माना गया है। विधान कहा गया है कि वहाँ स्नान करके पिण्डदान करने से कुल-कोटि पितरों का उद्धार होता है और रुद्रलोक में मान प्राप्त होता है। नियमपूर्वक गन्ध-पुष्प आदि से भक्तिभाव से पूजन करने पर सदाशिव “कोटि-पूजा” के समान फल प्रदान करते हैं। यह अध्याय स्कन्दपुराण के प्रभासखण्ड, प्रभासक्षेत्र-माहात्म्य में बहुसुवर्णेश्वर-माहात्म्य के रूप में वर्णित है।

शृंगेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Śṛṅgeśvara Māhātmya (Account of the Glory of Śṛṅgeśvara)
“ईश्वर उवाच” से आरम्भ होकर यह अध्याय देवी को शुकस्थान के निकट स्थित अनुत्तम श्रीङ्गेश्वर-तीर्थ की ओर निर्देश देता है। वहाँ जाकर विधिपूर्वक स्नान करने और नियम के अनुसार श्रीङ्गेश का पूजन करने का स्पष्ट विधान बताया गया है। तीर्थ को “सर्वपातक-नाशक” कहा गया है; सही तीर्थयात्रा और पूजा से समस्त पापों से मुक्ति का फल प्रतिपादित है। उदाहरण रूप में ऋष्यशृंग के पूर्वकालीन शुद्धि-उद्धार का उल्लेख किया गया है। अंत में इसे स्कन्दमहापुराण के प्रभासखण्ड, प्रभासक्षेत्रमाहात्म्य के अंतर्गत “श्रीङ्गेश्वरमाहात्म्यवर्णन” नामक अध्याय के रूप में निर्दिष्ट किया गया है।

कोटीश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Description of the Māhātmya of Koṭīśvara
इस अध्याय में “ईश्वर उवाच” के प्रसंग से कोटीश्वर महालिङ्ग का संक्षिप्त क्षेत्र-वर्णन और फलश्रुति कही गई है। ईशान (उत्तर-पूर्व) दिशा में कोटिनगर नामक स्थान बताया गया है और उसके दक्षिण भाग में एक योजन की दूरी पर कोटीश्वर लिङ्ग की स्थिति वर्णित है। यहाँ साधना-क्रम भी बताया गया है—विधिपूर्वक स्नान करके लिङ्ग-पूजन करना चाहिए। कोटीश्वर को “कोटि-यज्ञ” के तुल्य फल देने वाला तथा समस्त पापों से मुक्त करने वाला कहा गया है। जो नियम से स्नान कर पूजन करता है, उसे सर्व-पातक से मुक्ति और कोटि-यज्ञ के समान महान पुण्य प्राप्त होता है। यह स्कन्दपुराण के प्रभासखण्ड, प्रभासक्षेत्रमाहात्म्य में कोटीश्वर-माहात्म्य का वर्णन है।

Nārāyaṇa-tīrtha-māhātmya (Glory of Nārāyaṇa Tīrtha)
इस अध्याय में ईश्वर महादेवी को उपदेश देते हैं कि यात्री नारायण नामक तीर्थ की ओर आगे बढ़े। उस तीर्थ के ईशान (उत्तर-पूर्व) भाग में शाण्डिल्या नाम की वापी/कूपिका स्थित है—ऐसा स्पष्ट स्थान-निर्देश दिया गया है। विधि के अनुसार वहाँ स्नान करके शाण्डिल्य ऋषि का पूजन करने का क्रम बताया गया है। ऋषि-पंचमी के दिन पतिव्रता स्त्री के लिए स्पर्श-अस्पर्श संबंधी आचरण से रजो-दोष (मासिक अशौच) का भय निश्चित रूप से दूर हो जाता है—यह फल कहा गया है। अंत में इसे स्कन्दपुराण के प्रभासखण्ड का ‘नारायण-तीर्थ-माहात्म्य’ अध्याय बताया गया है।

Śṛṅgāreśvara Māhātmya (Glory of Śṛṅgāreśvara at Śṛṅgasara)
इस अध्याय में ईश्वर महादेवी से कहते हैं और ‘शृंगसार’ नामक पवित्र तीर्थ का महत्त्व बताते हैं। वहाँ निवास करने वाले लिंग को ‘शृंगारेश्वर’ कहा गया है। इसकी पवित्रता का कारण एक प्राचीन दिव्य प्रसंग से जोड़ा गया है—हरि गोपियों के साथ वहाँ शृंगार-लीला करते हैं, इसी से इस स्थान और देव-लिंग का नाम प्रसिद्ध हुआ। फिर विधि-विधान से उसी स्थान पर भव (शिव) की पूजा को पाप-समूह का नाश करने वाली बताया गया है। फलश्रुति में कहा गया है कि जो भक्त दरिद्रता और शोक से पीड़ित हो, वह वहाँ आराधना करने पर आगे फिर ऐसे दुःख-दरिद्रता का सामना नहीं करता; इसलिए यह तीर्थ उपचारक भक्ति और धर्मानुष्ठान का सिद्ध स्थल माना गया है।

मार्कण्डेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | The Glory of Mārkaṇḍeśvara (Narrative Description)
अध्याय 361 ईश्वर–देवी संवाद में संक्षिप्त तीर्थ-उपदेश देता है। साधक को हिरण्यातट जाने का निर्देश है, जहाँ ‘घटिकास्थान’ नामक एक विशेष स्थान बताया गया है, जो पूर्वकाल में एक सिद्ध-ऋषि से संबद्ध रहा। इस स्थान की पवित्रता मृकण्डु की योग-सिद्धि से जुड़ी कही गई है। उन्होंने ध्यान-योग द्वारा—एक नाड़ी-परिमाण में फल सिद्ध होने का उल्लेख करते हुए—उसी स्थान पर शिवलिंग की स्थापना की। यह लिंग ‘मार्कण्डेश्वर’ नाम से प्रसिद्ध है; इसके दर्शन और पूजन मात्र से सर्व पापों का उपशमन/नाश होता है। अध्याय का संदेश यह है कि अंतर्मुख तपस्या की शक्ति लोक के लिए सुलभ भक्ति-मार्ग बनकर तीर्थ-यात्रा के रूप में प्रकट होती है, और प्रभास-क्षेत्र का एक सूक्ष्म तीर्थ-मानचित्र भी सामने आता है।

Koṭihrada–Maṇḍūkeśvara Māhātmya (कोटिह्रद-मण्डूकेश्वरमाहात्म्य)
ईश्वर देवी को प्रभास-क्षेत्र में क्रमबद्ध तीर्थ-परिक्रमा का उपदेश देते हैं। पहले मण्डूकेश्वर जाने का निर्देश है, जहाँ माण्डूक्यायन के संबंध से स्थापित एक पवित्र शिवलिङ्ग का वर्णन किया गया है। उसके निकट कोटिह्रद नामक पुण्य सरोवर है और वहाँ कोटीश्वर शिव अधिष्ठाता हैं; वहीं स्थित मातृगण इच्छित फल देने वाले बताए गए हैं। विधि यह है कि यात्री कोटिह्रद-तीर्थ में स्नान करे, लिङ्ग का पूजन करे और मातृदेवियों की भी आराधना करे; इससे दुःख और शोक से मुक्ति का फल कहा गया है। इसके बाद पूर्व दिशा में एक योजन दूर त्रितकूप नामक तीर्थ का उल्लेख है, जो अत्यन्त पवित्र और समस्त पापों का नाशक है; अनेक तीर्थों की प्रभाव-शक्ति मानो वहीं संचित/स्थित बताई गई है। कोलोफन में इसे प्रभासखण्ड के इस भाग का 362वाँ अध्याय कहा गया है।

एकादशरुद्रलिङ्गमाहात्म्यवर्णनम् | The Māhātmya of the Eleven Rudra-Liṅgas
इस अध्याय में प्रभास-क्षेत्र की यात्रा-विधि का संक्षिप्त निर्देश है। ईश्वर देवी से कहते हैं कि गोष्पद नामक स्थान के उत्तर में दो गव्युत (यात्रा-माप) की दूरी पर प्रसिद्ध वलाय तीर्थ है; वहाँ श्रद्धापूर्वक जाना चाहिए। वलाय में ‘एकादश रुद्र’ अपने-अपने स्थान-लिंगों के रूप में प्रतिष्ठित बताए गए हैं; उनमें अजैकपाद और अहिर्बुध्न्य आदि नाम भी आते हैं। इन लिंगों की विधिवत पूजा करने से समस्त पापों का नाश होता है और पूर्ण शुद्धि प्राप्त होती है।

Hiraṇya-taṭa–Tuṇḍapura–Gharghara-hrada–Kandeśvara Māhātmya (हिरण्यातुण्डपुर-घर्घरह्रद-कन्देश्वर माहात्म्यम्)
ईश्वर महादेवी से कहते हैं कि हिरण्य-तट पर तुण्डपुर नामक स्थान है, जहाँ घर्घर-ह्रद नाम का पवित्र जलाशय स्थित है। वहाँ के अधिष्ठाता देव कन्देश्वर हैं—यह तीर्थ-परम्परा का मुख्य संकेत है। शिव बताते हैं कि उसी स्थान पर उनकी जटाएँ बँधी थीं; इस दिव्य स्मृति से क्षेत्र की पवित्रता और अधिकार सिद्ध होता है। भक्त को वहाँ जाकर तीर्थ में स्नान करना और विधिपूर्वक कन्देश्वर की पूजा करनी चाहिए। इस साधना का फल धर्म और मोक्ष से जुड़ा है—भक्त घोर पापों से मुक्त होता है और ‘शासन’ प्राप्त करता है, अर्थात् ईश्वरीय संरक्षण/अनुग्रह तथा पुण्य-स्वीकृति।

संवर्तेश्वरमाहात्म्यवर्णनम् | Saṃvarteśvara Māhātmya (Glorification of Saṃvarteśvara)
इस अध्याय में ईश्वर देवी को उपदेश देते हैं और तीर्थयात्री-साधक को ‘उत्तम’ संवर्तेश्वर-धाम की ओर मार्ग दिखाते हैं। संवर्तेश्वर का स्थान इन्द्रेश्वर के पश्चिम और अर्कभास्कर के पूर्व बताया गया है, जिससे निकटवर्ती पवित्र स्थलों के संदर्भ में उसका दिशानिर्देश स्पष्ट होता है। यहाँ साधना का संक्षिप्त विधान कहा गया है—पहले महादेव का दर्शन, फिर पुष्करिणी के जल में स्नान; यही प्रभावी भक्ति-कर्म माना गया है। फलश्रुति में कहा है कि जो ऐसा करता है, उसे दस अश्वमेध यज्ञों के समान पुण्यफल प्राप्त होता है। अंत में इसे स्कन्दपुराण के प्रभासखण्ड, प्रभासक्षेत्रमाहात्म्य के प्रथम विभाग का ३६५वाँ अध्याय, ‘संवर्तेश्वरमाहात्म्यवर्णनम्’ कहा गया है।

प्रकीर्णस्थानलिङ्गमाहात्म्यवर्णनम् — Discourse on the Māhātmya of Liṅgas in Dispersed Sacred Sites
ईश्वर महादेवी को उपदेश देते हैं कि हिरण्य के उत्तर में सिद्धि-स्थानों की ओर जाओ, जहाँ सिद्ध महर्षि निवास करते हैं। फिर अध्याय प्रकीर्ण तीर्थों में स्थित लिंगों के माहात्म्य का वर्णन संख्या सहित करता है—लिंग तो असंख्य हैं, पर कुछ प्रमुख गणनाएँ बताई जाती हैं: एक समूह में सौ से अधिक प्रसिद्ध लिंग, वज्रिणी के तट पर उन्नीस, न्यङ्कुमती के तट पर बारह सौ से अधिक, कपिला के तट पर साठ श्रेष्ठ लिंग, और सरस्वती से सम्बद्ध लिंगों की संख्या अगणित। प्रभास-क्षेत्र को सरस्वती की पाँच धाराओं (पञ्चस्रोत) से परिभाषित किया गया है; इनके प्रवाह से बारह योजन का पवित्र क्षेत्र बनता है। क्षेत्र में तालाबों और कुओं में सर्वत्र जल प्रकट होता है; उसे ‘सारस्वत’ जल जानना चाहिए, और उसका पान प्रशंसित है। श्रद्धा से कहीं भी स्नान करने पर सारस्वत-स्नान का फल प्राप्त होता है। अंत में ‘स्पर्श-लिंग’ को श्री सोमेश कहा गया है और बताया गया है कि क्षेत्र के मध्य के किसी भी लिंग की पूजा, यदि उसे सोमेश रूप में जाना जाए, तो वह वास्तव में सोमेश की ही पूजा है—इस प्रकार बिखरे हुए शिवालय एक ही शैव तत्त्व में एकीकृत हो जाते हैं।
Prabhāsa is presented as a spiritually efficacious kṣetra where tīrtha-contact, devotion, and disciplined listening to purāṇic discourse are said to remove fear of saṃsāra and confer elevated destinies.
Merits are framed in yajña-like terms: purification, removal of sins, freedom from afflictions, and attainment of higher states—often conditioned by faith (śraddhā), tranquility, and proper eligibility.
The opening chapter emphasizes transmission-legends (Śiva → Pārvatī → Nandin → Kumāra → Vyāsa → Sūta) and the Naimiṣa inquiry setting, establishing Prabhāsa’s māhātmya within an authoritative purāṇic lineage.