Adhyaya 349
Prabhasa KhandaPrabhasa Kshetra MahatmyaAdhyaya 349

Adhyaya 349

इस अध्याय में ईश्वर देवी को उपदेश देते हैं कि भीमेश्वर के निकट स्थित “देवी मन्त्रविभूषणा” का विशेष रूप से स्मरण और पूजन करना चाहिए। बताया गया है कि इस देवी की आराधना पूर्वकाल में सोम ने की थी, जिससे देवी और स्थान की महिमा प्रकट होती है। फिर व्रत का समय और विधि बताई जाती है—श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को विधिपूर्वक जो स्त्री इस देवी का पूजन करती है, वह समस्त शोकों से मुक्त हो जाती है। इस प्रकार तीर्थ-स्थल, भक्त-परंपरा और व्रत-काल को जोड़कर फलदायक धर्मोपदेश दिया गया है।

Shlokas

Verse 1

ईश्वर उवाच । ततो गच्छेन्महादेवि देवीं मंत्रविभूषणाम् । भीमेश्वरस्य सान्निध्ये सोमेनाराधितां पुरा

ईश्वर बोले—हे महादेवी, तब मंत्रविभूषणा देवी के दर्शन को जाना चाहिए। वह भीमेश्वर के सान्निध्य में निवास करती हैं, जिन्हें पूर्वकाल में सोम (चन्द्र) ने भक्ति से आराधा था।

Verse 2

श्रावणे मासि विधिना या नारी तां प्रपूजयेत् । तृतीयायां शुक्लपक्षे सा दुःखैर्मुच्यतेऽखिलैः

श्रावण मास में जो स्त्री विधिपूर्वक शुक्लपक्ष की तृतीया को उनका पूजन करती है, वह समस्त दुःखों से मुक्त हो जाती है।

Verse 348

इति श्रीस्कांदे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां सप्तमे प्रभासखण्डे प्रथमे प्रभासक्षेत्रमाहात्म्ये मन्त्रविभूषणागौरी माहात्म्यवर्णनंनामाष्टाचत्वारिंशदुत्तरत्रिशततमोऽध्यायः

इस प्रकार श्रीस्कन्द महापुराण की एकाशीतिसाहस्री संहिता के सप्तम प्रभासखण्ड के प्रथम प्रभासक्षेत्रमाहात्म्य में “मंत्रविभूषणा गौरी-माहात्म्य वर्णन” नामक तीन सौ उनचासवाँ अध्याय समाप्त हुआ।