Adhyaya 12
Prabhasa KhandaPrabhasa Kshetra MahatmyaAdhyaya 12

Adhyaya 12

इस अध्याय में ईश्वर शब्द-व्युत्पत्ति के माध्यम से तीर्थ की महिमा और प्रमाण्यता बताते हैं। पहले ‘राजा/रानी’ तथा ‘छाया’ जैसे शब्दों की धातु-आधारित व्याख्या करके यह दिखाया जाता है कि नाम और पहचान भी धर्म-तत्त्व का संकेत हैं। फिर वर्तमान मनु को वंश-परंपरा में रखकर शंख-चक्र-गदा-धारी वैष्णव-लक्षणयुक्त पुरुष का उल्लेख होता है और यम को ‘हीन-पाद’ दोष से पीड़ित बताकर उसके निवारण हेतु उपाय का प्रसंग उठता है। यम प्रभास-क्षेत्र में जाकर दीर्घकाल तक तप करता है और अत्यन्त लंबे समय तक लिंग की आराधना करता है। प्रसन्न होकर ईश्वर अनेक वर देते हैं और उस स्थान को स्थायी रूप से ‘यमेश्वर’ नाम से प्रतिष्ठित करते हैं। अंत में फलश्रुति कही गई है कि यम-द्वितीया के दिन यमेश्वर के दर्शन से यमलोक का दर्शन/अनुभव टल जाता है—इस प्रकार प्रभास-तीर्थ की यात्रा में इस व्रत-तिथि का मोक्षदायक महत्व बताया गया है।

Shlokas

Verse 1

ईश्वर उवाच । या संज्ञा सा स्मृता राज्ञी छाया या सा तु निक्षुभा । राजृ दीप्तौ स्मृतो धातू राजा राजति यः सदा

ईश्वर बोले— जो संज्ञा है वह ‘राज्ञी’ कही जाती है; और जो छाया है वह ‘निक्षुभा’ कहलाती है। ‘राजृ’ धातु का अर्थ ‘दीप्त होना’ है; इसलिए जो सदा दीप्तिमान रहता है, वह ‘राजा’ कहलाता है।

Verse 2

अधिकं सर्वभूतेभ्यस्तस्माद्राजा स उच्यते । राजपत्नी तु सा यस्मात्तस्माद्राज्ञी प्रकीर्तिता

वह सब प्राणियों से अधिक श्रेष्ठ है, इसलिए ‘राजा’ कहलाता है; और क्योंकि वह राजा की पत्नी है, इसलिए वह ‘राज्ञी’ के नाम से प्रसिद्ध है।

Verse 3

क्षुभ संचलने धातुर्निश्चला तेन निक्षुभा । भवंति ह्यथवा यस्मात्स्वांगीयाः क्षुद्विवर्जिताः

‘क्षुभ्’ धातु का अर्थ ‘संचलन/क्षोभ’ है; वह अचल होने से ‘निक्षुभा’ कहलाती है। अथवा क्योंकि उसके अपने अंग से उत्पन्न संतति भूख से रहित हो जाती है।

Verse 4

छाया तां विशते दिव्या स्मृता सा तेन निक्षुभा । सांप्रतं वर्तते योऽयं मनुर्लोके महामते

दिव्य छाया उस संज्ञा में प्रविष्ट हुई; इसलिए वह ‘निक्षुभा’ नाम से स्मरण की जाती है। और हे महामति, जो मनु इस समय लोक में प्रवर्तित है—

Verse 5

तस्यान्ववाये जातस्तु शंखचकगदाधरः । यमस्तु मात्रा संशप्तो हीनपादो धरातले

उसके वंश में शंख-चक्र-गदा धारण करने वाला उत्पन्न हुआ। परंतु यम अपनी माता के शाप से पृथ्वी पर पाँवों से हीन हो गया।

Verse 6

प्रभासक्षेत्रमासाद्य चचार विपुलं तपः । वर्षाणामयुतं साग्रं लिंगं पूजितवान्प्रिये

प्रभास-क्षेत्र में पहुँचकर उसने महान तप किया। हे प्रिये, दस हज़ार से कुछ अधिक वर्षों तक उसने लिंग की पूजा की।

Verse 7

तुष्टश्चाहं ततस्तस्य वराणां च शतं ददौ । अद्यापि तत्र देवेशि यमेश्वरमिति श्रुतम् । यमद्वितीयायां दृष्ट्वा यमलोकं न पश्यति

तब मैं प्रसन्न हुआ और उसे सौ वर दिए। हे देवेशि, वह स्थान आज भी ‘यमेश्वर’ नाम से प्रसिद्ध है। यमद्वितीया को उसके दर्शन से मनुष्य यमलोक नहीं देखता।

Verse 12

इति श्रीस्कांदे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां सप्तमे प्रभासखंडे प्रथमे प्रभासक्षेत्रमाहात्म्ये यमेश्वरोत्पत्तिवर्णनंनाम द्वादशोऽध्यायः

इस प्रकार श्रीस्कन्दमहापुराण की एकाशीति-साहस्री संहिता के सप्तम प्रभासखण्ड के प्रथम प्रभासक्षेत्र-माहात्म्य में ‘यमेश्वरोत्पत्ति-वर्णन’ नामक द्वादश अध्याय समाप्त हुआ।