Adhyaya 291
Prabhasa KhandaPrabhasa Kshetra MahatmyaAdhyaya 291

Adhyaya 291

इस अध्याय में ईश्वर ‘कौबेर-संज्ञक’ नामक स्थान के उत्तर में स्थित भद्रकाली के तीर्थ/मन्दिर का निर्देश करते हैं। देवी को वाञ्छितार्थ-प्रदायिनी कहा गया है और उन्हें वीरभद्र के साथ दक्ष-यज्ञ के विध्वंस में प्रवृत्त, यज्ञ-भंग की कारण-शक्ति के रूप में स्मरण किया गया है। इसके बाद काल-निर्देश आता है—चैत्र मास की तृतीया तिथि को देवी-पूजन विशेष फलदायक बताया गया है। चामुण्डा-स्वरूपों की विस्तृत आराधना से भक्त को सौभाग्य, विजय तथा लक्ष्मी का निवास (समृद्धि) प्राप्त होता है—ऐसी फलश्रुति देकर यह अध्याय स्थान और तिथि को जोड़कर उपासना का व्यावहारिक निर्देश बन जाता है।

Shlokas

Verse 1

ईश्वर उवाच । तस्मादुत्तरभागे तु स्थानात्कौबेरसंज्ञकात् । भद्रकाली महादेवि वांछितार्थप्रदायिनी

ईश्वर बोले—कौबेर नामक उस स्थान के उत्तर भाग में भद्रकाली महादेवी विराजती हैं, जो भक्तों के वांछित अर्थ प्रदान करने वाली हैं।

Verse 2

दक्षयज्ञस्य विध्वंसे वीरभद्रसमन्विता । भद्रकाली महादेवी दक्षयज्ञविनाशिनी

दक्ष के यज्ञ के विध्वंस के समय, वीरभद्र के साथ भद्रकाली महादेवी प्रकट हुईं—वे ही दक्षयज्ञ का विनाश करने वाली हैं।

Verse 3

चैत्रे मासि तृतीयायां देवीं तां यस्तु पूजयेत् । नवकोट्यस्तु चामुण्डा भविष्यंति सुपूजिताः । सौभाग्यं विजयं चैव तस्य लक्ष्मीर्भविष्यति

चैत्र मास की तृतीया को जो भक्तिभाव से उस देवी की पूजा करता है, उसके द्वारा नव-कोटि चामुण्डाएँ भी भली-भाँति पूजित हो जाती हैं। उसके लिए सौभाग्य, विजय और लक्ष्मी का निवास होता है।

Verse 291

इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां सप्तमे प्रभासखण्डे प्रथमे प्रभासक्षेत्रमाहात्म्ये न्यंकुमतीमाहात्म्ये भद्रकालीमाहात्म्यवर्णनंनामैकनवत्युत्तरद्विशततमोऽध्यायः

इस प्रकार श्रीस्कन्द महापुराण की एकाशीति-साहस्री संहिता के सप्तम प्रभासखण्ड के प्रथम प्रभासक्षेत्र-माहात्म्य के न्यंकुमती-माहात्म्य में ‘भद्रकाली-माहात्म्य-वर्णन’ नामक दो सौ इक्यानवेवाँ अध्याय समाप्त हुआ।