
इस अध्याय में प्रभास के मुख्य पवित्र क्षेत्र के निकट स्थित “ज्वालेश्वर” लिंग की उत्पत्ति-कथा कही गई है। ईश्वर बताते हैं कि त्रिपुरारि शिव से संबद्ध पाशुपत अस्त्र/शर का तेज जिस स्थान पर गिरा, वहीं ज्वाला-सी दीप्ति प्रकट हुई; इसलिए उस लिंग का नाम “ज्वालेश्वर” प्रसिद्ध हुआ। इस प्रकार एक दिव्य युद्ध-घटना को स्थायी तीर्थ-चिह्न बनाकर कथा को भूगोल से जोड़ा गया है। व्यावहारिक उपदेश संक्षेप में है—इस लिंग के केवल दर्शन से ही मनुष्य-भक्त की शुद्धि होती है और वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। अध्याय की रूपरेखा में इसे स्कन्दमहापुराण के प्रभासखण्ड, प्रथम प्रभासक्षेत्रमाहात्म्य के अंतर्गत 271वाँ अध्याय कहा गया है।
Verse 1
ईश्वर उवाच । तस्यैव संनिकृष्टे तु लिंगं ज्वालेश्वरं स्मृतम् । शरः पाशुपतो यत्र ज्वलन्वै त्रिपुरारिणा
ईश्वर बोले—उसी स्थान के निकट ‘ज्वालेश्वर’ नाम का लिंग प्रसिद्ध है; क्योंकि वहीं त्रिपुरारि शिव द्वारा छोड़ा गया पाशुपत बाण ज्वलित होकर प्रकट हुआ।
Verse 2
पातितो यत्प्रदेशे तु तेन ज्वालेश्वरः स्मृतः । तं दृष्ट्वा मानवो देवि मुच्यते सर्वपातकैः
जिस प्रदेश में वह बाण गिरा था, उसी कारण वह ‘ज्वालेश्वर’ कहलाया। हे देवि, उसके दर्शन मात्र से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
Verse 271
इति श्रीस्कांदे महापुराण एकाशातिसाहस्र्यां संहितायां सप्तमे प्रभासखंडे प्रथमे प्रभासक्षेत्रमाहात्म्ये ज्वालेश्वरमाहात्म्यवर्णनंनामैकसप्तत्युत्तरद्विशततमोऽध्यायः
इस प्रकार श्रीस्कन्द महापुराण की एक्यासी सहस्र श्लोकों वाली संहिता के सप्तम प्रभासखण्ड के प्रथम ‘प्रभासक्षेत्रमाहात्म्य’ में ‘ज्वालेश्वर माहात्म्य का वर्णन’ नामक 271वाँ अध्याय समाप्त हुआ।