Adhyaya 212
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Adhyaya 212

इस अध्याय (212) में ईश्वर देवी को बताते हैं कि पुलहीश्वर से नैऋत्य दिशा में आठ धनुष के अंतर पर ‘क्रत्वीश्वर’ नामक पवित्र शिव-स्थल है। इसका महात्म्य यह है कि यहाँ दर्शन से ही “महाक्रतु-फल” प्राप्त होता है—अर्थात् बड़े यज्ञों के समान पुण्य तीर्थ-दर्शन द्वारा सुलभ हो जाता है। फलश्रुति में कहा गया है कि जो मनुष्य क्रत्वीश्वर का दर्शन करता है, उसे पौण्डरीक यज्ञ का फल मिलता है और वह सात जन्मों तक दरिद्रता से सुरक्षित रहता है; साथ ही वहाँ दुःख का उदय नहीं होता। इस प्रकार यह अध्याय स्थल-निर्देश, नाम-कीर्ति और दर्शनजन्य फल का संक्षिप्त मार्गदर्शक बनता है।

Shlokas

Verse 1

ईश्वर उवाच । पुलहेश्वरात्ततो देवि नैरृते धनुषाष्टके । क्रत्वीश्वरेतिनामानं महाक्रतुफलप्रदम्

ईश्वर बोले—हे देवि! पुलहेश्वर से नैऋत्य दिशा में आठ धनुष की दूरी पर ‘क्रत्वीश्वर’ नामक (लिंग) है, जो महायज्ञों का फल प्रदान करने वाला है।

Verse 2

तं दृष्ट्वा मानवो देवि पौंडरीकफलं लभेत् । सप्तजन्मनि दारिद्र्यं न दुःखं तत्र जायते

हे देवी, उसका दर्शन करने से मनुष्य को पौण्डरीक यज्ञ का फल प्राप्त होता है। सात जन्मों तक वहाँ न दरिद्रता उत्पन्न होती है, न दुःख आता है।

Verse 212

इति श्रीस्कांदे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां सप्तमे प्रभासखण्डे प्रथमे प्रभासक्षेत्रमाहात्म्ये क्रत्वीश्वरमाहात्म्यवर्णनंनाम द्वादशोत्तरद्विशततमोऽध्यायः

इस प्रकार श्रीस्कन्द महापुराण की एकाशीति-साहस्री संहिता के सप्तम प्रभासखण्ड के प्रथम प्रभासक्षेत्र-माहात्म्य में ‘क्रत्वीश्वर-माहात्म्य-वर्णन’ नामक दो सौ बारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ।