Adhyaya 272
Prabhasa KhandaPrabhasa Kshetra MahatmyaAdhyaya 272

Adhyaya 272

इस अध्याय में स्वयं ईश्वर तत्त्वोपदेश के रूप में तीर्थयात्री को निर्देश देते हैं। वे बताते हैं कि इसी पवित्र क्षेत्र में पूर्व दिशा (प्राची) में, देवी के सान्निध्य के निकट एक विशेष स्थान है, जहाँ त्रिपुर से संबद्ध तीन लिंग प्रतिष्ठित हैं। इन महात्मा त्रिपुर-पुरुषों के नाम विद्युन्माली, तारक और कपोल बताए गए हैं। अध्याय का मुख्य संदेश दिशा-निर्देश, लिंग-त्रय की पहचान और उसके फल का संबंध है। कहा गया है कि इन प्रतिष्ठित लिंगों का केवल दर्शन मात्र करने से भी साधक पापों से मुक्त हो जाता है। अंत में यह प्रसंग स्कन्दमहापुराण के प्राभास खण्ड, प्राभासक्षेत्र-माहात्म्य के अंतर्गत ‘त्रिपुरलिंगत्रयमाहात्म्य’ के रूप में निर्दिष्ट है।

Shlokas

Verse 1

ईश्वर उवाच । तत्रैव संस्थितं पश्येत्प्राची देव्यास्तु संनिधौ । लिंगत्रयं समाख्यातं त्रिपुराणां महात्मनाम्

ईश्वर बोले—वहीं प्राची देवी के सान्निध्य में स्थित त्रिपुर नामक महात्माओं से सम्बद्ध प्रसिद्ध तीन लिंगों का दर्शन करना चाहिए।

Verse 2

विद्युन्माली तारकाख्यः कपोलाख्यस्तथैव च । तैश्च प्रतिष्ठितं लिंगं दृष्ट्वा पापैः प्रमुच्यते

विद्युन्माली, तारक नामक और कपोल नामक—इनके द्वारा स्थापित उस लिंग का जो दर्शन करता है, वह पापों से मुक्त हो जाता है।

Verse 272

इति श्रीस्कांदे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां सप्तमे प्रभासखंडे प्रथमे प्रभासक्षेत्रमाहात्म्ये त्रिपुरलिंगत्रयमाहात्म्य वर्णनंनाम द्विसप्तत्युत्तरद्विशततमोऽध्यायः

इस प्रकार श्रीस्कन्द महापुराण की एकाशीतिसाहस्री संहिता के सप्तम प्रभासखण्ड के प्रथम ‘प्रभासक्षेत्रमाहात्म्य’ में ‘त्रिपुर-लिंगत्रय-माहात्म्य-वर्णन’ नामक 272वाँ अध्याय समाप्त हुआ।