Adhyaya 210
Prabhasa KhandaPrabhasa Kshetra MahatmyaAdhyaya 210

Adhyaya 210

इस अध्याय में ईश्वर महादेवी को संक्षिप्त तीर्थ-उपदेश देते हैं। प्रभास-क्षेत्र के पवित्र मानचित्र में निर्दिष्ट दिशा और माप-चिह्न के अनुसार स्थित ‘उत्तम’ तीर्थ पुलस्त्येश्वर की ओर जाने का निर्देश है। वहाँ पहले दर्शन करने और फिर विधानतः (उचित विधि से) पूजा करने का क्रम बताया गया है। फलश्रुति में दृढ़ वचन है कि उपासक सात जन्मों के संचित पापों से मुक्त हो जाता है—“इसमें कोई संशय नहीं।” इस प्रकार यह अध्याय स्थान-निर्देश, पूजा-विधि और पापक्षय-फल को एक ही तीर्थ-एकक में जोड़ता है।

Shlokas

Verse 1

ईश्वर उवाच । ततो गच्छेन्महादेवि पुलस्त्येश्वरमुत्तमम् । मार्कंडेयोत्तेरे भागे धनुषां पञ्चके स्थितम्

ईश्वर बोले—हे महादेवी, तब उत्तम पुलस्त्येश्वर के तीर्थ में जाना चाहिए, जो मार्कण्डेय से उत्तर दिशा में पाँच धनुष की दूरी पर स्थित है।

Verse 2

तं दृष्ट्वा मानवो देवि पूजयित्वा विधानतः । सप्तजन्मार्जितात्पापान्मुच्यते नात्र संशयः

हे देवी, उसका दर्शन करके और विधिपूर्वक पूजन करने से मनुष्य सात जन्मों में अर्जित पापों से मुक्त हो जाता है—इसमें संदेह नहीं।

Verse 210

इति श्रीस्कांदे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां सप्तमे प्रभासखण्डे प्रथमे प्रभासक्षेत्रमाहात्म्ये पुलस्त्येश्वरमाहात्म्यवर्णनंनाम दशोत्तरद्विशततमोऽध्यायः

इस प्रकार श्रीस्कन्द महापुराण की एकाशीतिसाहस्री संहिता के सप्तम प्रभासखण्ड के प्रथम प्रभासक्षेत्र-माहात्म्य में ‘पुलस्त्येश्वर-माहात्म्य-वर्णन’ नामक दो सौ दसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।