Adhyaya 274
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Adhyaya 274

इस अध्याय में प्रभास-क्षेत्र के भीतर एक संक्षिप्त तीर्थ-उपदेश दिया गया है। ईश्वर महादेवी से कहते हैं कि वे (और तीर्थयात्री भी) सूर्यप्राची नामक तेजस्वी, अत्यन्त प्रभावशाली स्थान पर जाएँ। इस तीर्थ का स्वरूप शुद्धिकारी बताया गया है—यह ‘सर्वपाप-शमन’ है और धर्मसम्मत इच्छाओं के फल भी प्रदान करता है, जैसा कि संयमित पुराणोक्त तीर्थयात्रा-नीति में कहा गया है। यहाँ मुख्य विधि तीर्थ-स्नान है। सूर्यप्राची में स्नान करने से पंच-पातकों (पाँच महापापों) से मुक्ति का फल बताया गया है, जो माहात्म्य साहित्य की प्रायश्चित्त-प्रधान वाणी को प्रबल करता है। उपसंहार में इसे स्कन्दमहापुराण की 81,000 श्लोकों वाली संहिता के प्रभास-खण्ड, प्रभासक्षेत्र-माहात्म्य के अंतर्गत ‘सूर्यप्राची-माहात्म्य’ अध्याय कहा गया है।

Shlokas

Verse 1

ईश्वर उवाच । ततो गच्छेन्महादेवि सूर्यप्राचीं महाप्रभाम् । सर्वपापोपशमनीं सर्वकामफलप्रदाम्

ईश्वर बोले—तत्पश्चात्, हे महादेवी, महाप्रभा सूर्यप्राची में जाना चाहिए; वह समस्त पापों का शमन करने वाली और समस्त कामनाओं का फल देने वाली है।

Verse 2

तत्र स्नात्वा महादेवि मुच्यते पञ्चपातकैः

हे महादेवी, वहाँ स्नान करने से मनुष्य पाँच महापातकों से मुक्त हो जाता है।

Verse 274

इति श्रीस्कांदे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां सप्तमे प्रभासखण्डे प्रथमे प्रभासक्षेत्रमाहात्म्ये सूर्यप्राचीमाहात्म्यवर्णनंनाम चतुःसप्त त्युत्तरद्विशततमोऽध्यायः

इस प्रकार श्रीस्कन्द महापुराण की एकाशीतिसाहस्री संहिता के सप्तम प्रभासखण्ड के प्रथम ‘प्रभासक्षेत्रमाहात्म्य’ में ‘सूर्यप्राची-माहात्म्य-वर्णन’ नामक 274वाँ अध्याय समाप्त हुआ।