Adhyaya 262
Prabhasa KhandaPrabhasa Kshetra MahatmyaAdhyaya 262

Adhyaya 262

इस अध्याय में ईश्वर महादेवी को संक्षिप्त तत्त्वोपदेश देते हैं। वे निर्देश करते हैं कि गोष्पद के दक्षिण में स्थित वराहस्वामी के पवित्र धाम में जाया जाए, जिसे ‘पाप-प्रणाशन’ कहा गया है—जहाँ पापों का नाश होता है। वहाँ शुक्ल पक्ष की एकादशी को विशेष रूप से पूजन करने का विधान बताया गया है। इस दिन श्रद्धापूर्वक की गई पूजा से साधक समस्त पापों से मुक्त होकर अंततः ‘विष्णुपद’ को प्राप्त करता है। अध्याय स्थान, समय, कर्म और फल—इन चारों को जोड़कर प्राभास-क्षेत्र की साधना-मार्गरेखा प्रस्तुत करता है।

Shlokas

Verse 1

ईश्वर उवाच । ततो गच्छेन्महादेवि वराहं तत्र संस्थितम् । गोष्पदाद्दक्षिणे भागे स्थितं पापप्रणाशनम्

ईश्वर बोले—हे महादेवि! तत्पश्चात वहाँ प्रतिष्ठित वराह (देवालय) के पास जाना चाहिए, जो गोष्पद के दक्षिण भाग में स्थित पाप-नाशक स्थान है।

Verse 2

एकादश्यां सिते पक्षे यस्तं पूजयते नरः । स मुक्तः पातकैः सर्वैर्गच्छेद्विष्णुपदं महत्

शुक्ल पक्ष की एकादशी को जो मनुष्य उस (वराह) की पूजा करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णु के महान पद (धाम) को प्राप्त होता है।

Verse 262

इति श्रीस्कान्दे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां सप्तमे प्रभासखण्डे प्रथमे प्रभासक्षेत्रमाहात्म्ये वराहस्वामिमाहात्म्यवर्णनंनाम द्विषष्ट्युत्तरद्विशततमोऽध्यायः

इस प्रकार श्रीस्कन्द महापुराण की एकाशी-सहस्री संहिता के सप्तम प्रभासखण्ड के प्रथम प्रभासक्षेत्रमाहात्म्य में “वराहस्वामी-माहात्म्य-वर्णन” नामक अध्याय 262 समाप्त होता है।