Adhyaya 19
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Adhyaya 19

इस अध्याय में देवी पूछती हैं कि चन्द्रमा सदा पूर्ण क्यों नहीं रहता। तब ईश्वर अमावस्या से पूर्णिमा तक चन्द्र-कला/तिथि की षोडश (सोलह) विभाग-व्यवस्था बताते हैं और समय के सूक्ष्म से विराट मानों का क्रम समझाते हैं—त्रुटि, लव, निमेष, काष्ठा, कला, मुहूर्त, दिन-रात, पक्ष, मास, अयन, वर्ष, युग, मन्वंतर और कल्प तक। इससे कर्मकाण्डीय समय-गणना का संबंध ब्रह्माण्डीय काल-विस्तार से जोड़ा जाता है। ईश्वर आगे माया/शक्ति को सृष्टि-स्थिति-प्रलय की प्रवर्तक शक्ति बताते हैं और यह सिद्धान्त रखते हैं कि जो उत्पन्न होता है वह अंततः अपने मूल कारण में लौट जाता है। फिर देवी सोम के अमृत-उद्भव और भक्तिप्रिय होने पर भी उसके लाञ्छन (चन्द्र-चिह्न) का कारण पूछती हैं; ईश्वर इसे दक्ष के शाप से उत्पन्न बताते हैं। असंख्य चन्द्र, ब्रह्माण्ड और कल्प बार-बार उत्पन्न और लीन होते हैं; सर्ग-संहार का एकमात्र अधिपति परमेश्वर ही है। अंत में विभिन्न कल्प-मन्वंतर-स्थानों का संकेत, पूर्व प्राकट्यों का स्मरण तथा धर्म-स्थापन हेतु विष्णु के अवतारों की परम्परा—भविष्य में कल्कि के आगमन सहित—संक्षेप में कही गई है।

Shlokas

Verse 1

देव्युवाच । यद्येवं सकलश्चंद्रः कथं न विधृतस्त्वया । अन्तभावे कलानां तत्कारणं कथय प्रभो

देवी बोलीं—यदि चन्द्रमा पूर्ण है, तो आपने उसे पूर्ण रूप में क्यों न रोका? हे प्रभो, उसकी कलाओं के क्षय (अन्तर्धान) का कारण मुझे बताइए।

Verse 2

ईश्वर उवाच । अमा षोडशभेदेन देवि प्रोक्ता महाकला । संस्थिता परमा माया देहिनां देह धारिणी

ईश्वर बोले—हे देवि, अमावस्या सोलह भेदों वाली ‘महाकला’ कही गई है। वही परम माया होकर देहधारियों के देह को धारण करती हुई स्थित है।

Verse 3

अमादिपौर्णमास्यंता या एव शशिनः कलाः । तिथयस्ताः समाख्याताः षोडशैव प्रकीर्तिताः

अमा से लेकर पूर्णिमा के अन्त तक चन्द्रमा की जो कलाएँ हैं, वही ‘तिथियाँ’ कहलाती हैं; वे ठीक सोलह ही कही गई हैं।

Verse 4

अमा सूक्ष्मा परा शक्तिः सा त्वं देवि प्रकीर्तिता । प्रलयोत्पत्तियोगेन स्थिताः कालक्रमोदिताः

अमा सूक्ष्म, परम शक्ति है; और वही शक्ति, हे देवि, तुम ही कही गई हो। प्रलय और उत्पत्ति के संयोग से काल-मान क्रमशः प्रकट होकर स्थित होते हैं।

Verse 5

षोडशैव स्वरा ये तु आद्याः सृष्टयंतकाः प्रिये । कालस्यावयवास्ते च विज्ञेयाः कालवेदिभिः

हे प्रिये, वे सोलह आद्य स्वर, जो सृष्टि का आरम्भ करते और उसका अन्त भी करते हैं—वे काल के अंग हैं; काल के ज्ञाताओं को उन्हें ऐसा ही जानना चाहिए।

Verse 6

त्रुटिर्लवो निमेषश्च कला काष्ठा मुहूर्तकम् । रात्र्यहःपक्षमासाश्च अयनं वत्सरं युगम्

त्रुटि, लव, निमेष, कला, काष्ठा और मुहूर्त; फिर रात्रि‑दिन, पक्ष और मास; फिर अयन, वत्सर और युग—ये काल के क्रमिक विभाग कहे गए हैं।

Verse 7

मन्वतरं तथा कल्पं महाकल्पं च षोडश । कला विसर्जनी या तु जीवमाश्रित्य वर्तते

मन्वन्तर, कल्प और महाकल्प—तथा सोलह प्रकार का (विभाग) कहा गया है। जो ‘विसर्जनी’ कला है, वह जीव का आश्रय लेकर प्रवृत्त होती है।

Verse 9

सा सृजत्यखिलं विश्वं विषुवद्वयसंयुतम् । तथा संवरणी या तु विश्वं संहरते प्रिये । नेत्रपाताच्चतुर्भागस्त्रुटिकालो निगद्यते । तस्माच्च द्विगुणं विद्धि निमिषं तन्महेश्वरि

वह दो विषुवों सहित इस समस्त विश्व की सृष्टि करती है; और ‘संवरणी’ नाम की वही कला, हे प्रिये, विश्व का संहार भी करती है। नेत्रपात के समय का चौथा भाग ‘त्रुटि’ कहा गया है; और हे महेश्वरी, उससे दुगुना ‘निमेष’ जानो।

Verse 10

निमिषैस्त्रिंशद्भिः काष्ठा ताभिर्विंशतिभिः कला । विंशतिकलो मुहूर्तः स्याद्दिनं पंचदशैस्तु तैः

तीस निमेषों से एक काष्ठा होती है; बीस काष्ठाओं से एक कला। बीस कलाओं से एक मुहूर्त होता है; और ऐसे पंद्रह मुहूर्तों से एक दिन बनता है।

Verse 11

दिनमाना निशा ज्ञेया अहोरात्रं द्वयाद्भवेत् । तैः पंचदशभिः पक्षो द्विपक्षो मास उच्यते

रात्रि का मान दिन के समान जानना चाहिए; इन दोनों से अहोरात्र बनता है। ऐसे पंद्रह (दिन) से पक्ष होता है; और दो पक्षों को मास कहा गया है।

Verse 12

मासैश्चैवायनं षड्भिर्वर्षं स्यादयनद्वये । चत्वारिंशच्च लक्षाणि लक्षाणां त्रितयं पुनः

छह मासों से एक अयन (अर्धवर्ष) होता है; दो अयनों से एक वर्ष बनता है। फिर चालीस लक्ष, और पुनः लक्षों के तीन लक्ष (लक्ष-लक्ष) कहे गए हैं।

Verse 13

विंशतिश्च सहस्राणि ज्ञेयं सौरं चतुर्युगम् । चतुर्युगैकसप्तत्या मन्वंतरमुदाहृतम्

सौर-वर्षों के परिमाण से चतुर्युग बीस सहस्र (इकाइयों) का जानना चाहिए। ऐसे इकहत्तर चतुर्युगों से मन्वंतर कहा गया है।

Verse 14

ऐंद्रमेतद्भवेदायुः समासांतं च कीर्तितम् । चतुर्दशेन्द्रैः प्रलीनैः कल्पं ब्रह्मदिनं भवेत्

यह इन्द्र का आयुष्य ‘ऐन्द्र’ कहा गया है, वर्षों की समाप्ति तक वर्णित। और जब चौदह इन्द्र लीन हो जाते हैं, तब वही काल कल्प—ब्रह्मा का दिन—होता है।

Verse 15

रात्रिश्च तावती चैव चतुर्युगसहस्रिका । अनेन दिनमानेन शताब्दं जीवति प्रिये

उतनी ही रात्रि भी होती है, जो सहस्र चतुर्युगों की है। हे प्रिये, इसी दिन-मान से (ब्रह्मा) सौ वर्ष जीवित रहता है।

Verse 16

ममैव निमिषार्द्धेन सहस्राणि चतुर्द्दश । विनश्यंति ततो विष्णोरसंख्याताः पितामहाः

मेरे केवल अर्ध-निमेष में ही चौदह सहस्र (ऐसे चक्र) नष्ट हो जाते हैं; और उससे आगे विष्णु के असंख्य पितामह—ब्रह्मा—भी व्यतीत हो जाते हैं।

Verse 17

एवं क्रमेण देवेशि समुत्पन्नमिदं जगत् । शशिसूर्यविभागेन चित्ररूपमनंतकम्

हे देवेशि! इस प्रकार क्रमशः यह जगत् उत्पन्न हुआ; चन्द्र और सूर्य के विभाग से यह अनन्त, नाना-रूपों वाला बना।

Verse 18

कला देवि यदाद्यंतमनादिमजमव्ययम् । तदान्वितः शशी तस्यामधोमुखमवस्थितः

हे देवि! ‘कला’ वह है जिसमें आदि और अन्त हैं; पर (परम तत्त्व) अनादि, अज और अव्यय है। उसी कला से संयुक्त चन्द्रमा वहाँ अधोमुख होकर स्थित है।

Verse 19

एवं क्षयोदयं ज्ञेयं चंद्रार्काभ्यामवस्थितम् । सृष्टिक्रमं मया प्रोक्तं संहारमधुना शृणु

इस प्रकार क्षय और उदय को चन्द्र और सूर्य द्वारा स्थापित समझना चाहिए। सृष्टि का क्रम मैंने कहा; अब मुझसे संहार का वर्णन सुनो।

Verse 21

अहोरात्रं मुहूर्तेन मुहूर्तं तु कलाहतम् । कलां काष्ठा हतां कृत्वा काष्ठां निमिषभाजिताम्

अहोरात्र मुहूर्तों से गिना जाता है, और मुहूर्त कलाओं में विभक्त होता है। कला को काष्ठाओं में, और काष्ठा को निमिषों में बाँटकर—यही काल-गणना है।

Verse 22

निमिषं च लवैर्हत्वा लवं त्रुटिविभाजितम् । तदतीतं प्रशांतं च निर्विकारमलक्षणम्

निमिष को लवों में, और लव को त्रुटियों में विभक्त किया जाता है। पर इन सब से परे जो तत्त्व है, वह प्रशान्त, निर्विकार और अलक्षण है।

Verse 23

तस्य चेयं परा माया कला शिरसि धारिता । सा शक्तिर्देवदेवस्य विश्वाकारा परा प्रिये । मोहयित्वा तु संतानं संसारयति पार्वति

उस परम तत्त्व की यह परा माया—‘कला’—शिर पर धारण की गई है। हे प्रिये! देवों के देव की वही परम शक्ति विश्वरूप होकर संतानों को मोहित करती है और, हे पार्वती, उन्हें संसार में भटकाती है।

Verse 24

एवमेतज्जगद्देवि उत्पत्तिस्थितिलक्षणम् । यत्रैवोत्पद्यते कृत्स्नं पुनस्तत्रैव लीयते

हे देवी! यह समस्त जगत् उत्पत्ति और स्थिति के लक्षण वाला है; जहाँ से यह पूर्ण रूप से उत्पन्न होता है, उसी में फिर लीन हो जाता है।

Verse 25

सेयं मायामयी शक्तिः शुद्धाशुद्धस्वरूपिणी । चंद्ररूपा स्थिता सा तु तव देवि प्रकाशयेत्

यह वही मायामयी शक्ति है, जो शुद्ध और अशुद्ध—दोनों स्वरूपों वाली है। वह चन्द्ररूप में स्थित है और, हे देवी, तुम्हारे लिए ही प्रकाश प्रकट करती है।

Verse 26

देव्युवाच । पंचाग्निनोपसन्तप्ता वर्षकोटीरनेकधा । तत्तपः सफलं जातं मेऽद्य देव जगत्पते

देवी बोलीं: ‘पंचाग्नि-साधना से अनेक प्रकार से, करोड़ों वर्षों तक तप्त होकर—आज, हे देव! जगत्पते! मेरा वह तप सफल हो गया।’

Verse 27

सृष्टियोगो मया ज्ञातः संहारश्च महेश्वर । चन्द्रोत्पत्तिस्वरूपं च कलामानं तथैव च

हे महेश्वर! मैंने सृष्टि का योग (विधि) और संहार भी जान लिया है; तथा चन्द्रमा की उत्पत्ति का स्वरूप और उसी प्रकार उसकी कलाओं का मान भी।

Verse 28

अधुना मम देवेश सन्देहो हृदि संस्थितः । कौतूहलं परं देव कथयस्व महेश्वर

अब, हे देवेश! मेरे हृदय में संदेह आ बैठा है। हे देव! मेरी जिज्ञासा अत्यन्त है; हे महेश्वर! आप ही कहिए।

Verse 29

अमृतादेव संभूतः सर्वाह्लादकरः शशी । प्रियश्च तव देवेश वल्लभश्चंद्रमास्तथा

अमृत से ही उत्पन्न चन्द्रमा सबको आनन्द देने वाला है। हे देवेश! चन्द्रमा आपको प्रिय है—वह आपका वल्लभ भी है।

Verse 31

सर्वौषधीनामधिपः पितॄणां प्रीणनं परम् । तदाश्रयश्च त्वद्भक्तस्त्व त्सेवातत्परः शशी

वह समस्त औषधियों का अधिपति है और पितरों को तृप्त करने वाला परम साधन है। उसी व्यवस्था का आश्रय लेकर चन्द्रमा आपका भक्त है, आपकी सेवा में ही तत्पर।

Verse 32

तथापि सकलंकोऽयं कौतुकं कुरुते मम । देवि ब्रह्मांडसंघट्टमालामंडितशेखरः

फिर भी यह कलंकयुक्त (चन्द्र) मेरे मन में आश्चर्य जगाता है—हे देवी! जिसका शिर ब्रह्माण्डों के संघट्ट से बनी माला से अलंकृत है।

Verse 33

शीर्षे तव निविष्टस्य कष्टं चंद्रस्य चेद्यदि । तर्हि नाथ न शोच्या वै संसारे दुःखभागिनः

यदि आपके शिर पर विराजमान चन्द्रमा को भी कष्ट भोगना पड़े, तो हे नाथ! संसार में दुःखभागी कोई भी निश्चय ही शोचनीय नहीं रह जाता।

Verse 34

न चास्ति त्रिषु लोकेषु न चैतत्संभविष्यति । यत्र शक्तो भवत्कर्तुं दुःखस्यास्य च संक्षयम्

तीनों लोकों में कोई भी नहीं है—और आगे भी कभी नहीं होगा—जो इस दुःख का अंत करने में समर्थ हो।

Verse 35

सर्वेषां वर्तते शंका यथा मम महेश्वर । उत्पन्नं कारणं किंतद्येन सोमस्य लांछनम्

हे महेश्वर! जैसे मेरे मन में, वैसे ही सबके मन में शंका है—वह कौन-सा कारण था जिससे सोम (चन्द्र) पर कलंक-चिह्न उत्पन्न हुआ?

Verse 36

किमेतत्कारणं देव कथयस्व महेश्वर । अमृते संभवो यस्य कथं तस्यापि लांछनम्

हे देव, हे महेश्वर! यह कारण मुझे बताइए। जिसका उद्भव अमृत से है, उसके ऊपर भी कलंक-चिह्न कैसे आया?

Verse 37

प्रियश्च तव देवेश लांछनं चापि तिष्ठति । कौतूहलं परं देव तत्त्वं मे वक्तुमर्हसि

हे देवेश! वह आपको प्रिय है, फिर भी उसका कलंक बना रहता है। हे देव! मेरी जिज्ञासा अत्यन्त है—कृपा कर उसका तत्त्व मुझे कहिए।

Verse 38

एवमुक्तः स पार्वत्या देवदेवो महेश्वरः । उवाच परमप्रीतः प्रेम्णा शैलसुतां प्रभुः

पार्वती द्वारा ऐसा कहे जाने पर देवों के देव महेश्वर ने, अत्यन्त प्रसन्न होकर, पर्वतराज की पुत्री से प्रेमपूर्वक कहा।

Verse 39

ईश्वर उवाच । किं ते देवि महाशंकाद्योत्पन्ना वरवर्णिनि । ममोपरि न कर्त्तव्या निरुद्विग्ना भव प्रिये । पितुस्तव प्रभावेन लांछनं शशिनोऽभवत्

ईश्वर बोले—हे देवी, वरवर्णिनी! तुम्हारे मन में यह महान् शंका क्यों उत्पन्न हुई? मुझ पर ऐसा संदेह न करो; प्रिय, निश्चिन्त रहो। तुम्हारे पिता के प्रभाव से ही चन्द्रमा पर यह कलंक आया।

Verse 40

भावित्वात्कर्मणो देवि दक्षस्याज्ञाव्यतिक्रमात् । समं वर्त्तस्व भार्याभिरित्युक्तः शशलांछनः

हे देवी, नियति से होने वाले कर्म के कारण और दक्ष की आज्ञा का उल्लंघन करने से ‘शशलांछन’ चन्द्रमा से कहा गया—“अपनी पत्नियों के साथ समान भाव से रहो।”

Verse 41

तद्वाक्यमन्यथा चक्रे ततः शप्तः शशी प्रिये । इदं पृष्टं तु यद्देवि त्वया लांछनकारणम्

प्रिय, चन्द्रमा ने उस वचन के विपरीत आचरण किया; इसलिए शशी शापित हुआ। हे देवी, तुमने जो चन्द्र के कलंक का कारण पूछा था—वही यह है।

Verse 42

कल्पेकल्पे पृथग्भावं कारणैरस्ति भामिनि । असंख्यातं च तद्वक्तुं शक्यं नैव मया प्रिये

हे भामिनि, प्रत्येक कल्प में कारणों के अनुसार भिन्न-भिन्न स्थिति होती है। वे कारण असंख्य हैं; इसलिए प्रिय, उन सबका वर्णन करना मेरे लिए संभव नहीं।

Verse 43

असंख्येयाश्चन्द्रमसः संभवंति पुनःपुनः । विनश्यंति च देवेशि सर्वमन्वन्तरान्तरम्

हे देवेशी, असंख्य चन्द्रमा बार-बार उत्पन्न होते हैं और नष्ट भी होते हैं; एक मन्वन्तर से दूसरे मन्वन्तर तक सब कुछ ऐसा ही होता है।

Verse 44

असंख्याताश्च कल्पाख्या असंख्याताः पितामहाः । हरयश्चाप्यसंख्याता एक एव महेश्वरः

असंख्य कल्प-चक्र हैं, असंख्य पितामह (ब्रह्मा) हैं। असंख्य हरि (विष्णु) भी हैं—पर महेश्वर एक ही हैं।

Verse 45

कोटिकोट्ययुतान्यत्र ब्रह्माण्डानि मम प्रिये । जलबुद्बुदवद्देवि संजातानि तु लीलया

हे मेरी प्रिये देवी! यहाँ कोटि-कोटि अयुत ब्रह्माण्ड जल के बुलबुलों के समान, केवल लीला से सहज ही उत्पन्न होते हैं।

Verse 46

तत्रतत्र चतुर्वक्त्रा ब्रह्माणो हरयो भवाः । सृष्टाः प्रधानेन तदा लब्धा शंभोस्तु संनिधिः

वहाँ-वहाँ चतुर्मुख ब्रह्मा, हरि (विष्णु) और भव (रुद्र) प्रधाना से सृजित होते हैं; पर प्रत्येक लोक में शंभु का सान्निध्य प्राप्त होता है।

Verse 47

लयं चैव तथान्योन्यमाद्यंतं प्रकरोति च । सर्गसंहारसंस्थानां कर्त्ता देवो महेश्वरः

वही लय को भी करता है और आरम्भ-अन्त का परस्पर संयोग भी रचता है; सृष्टि, संहार और लोक-व्यवस्था का कर्ता देव महेश्वर है।

Verse 48

सर्गे च रजसा पृक्तः सत्त्वस्थः परिपालने । प्रतिसर्गे तमोयुक्तः सोऽहं देवि त्रिधा स्थितः

सृष्टि में मैं रजोगुण से युक्त होता हूँ, पालन में सत्त्व में स्थित रहता हूँ; और प्रतिसर्ग/संहरण में तमोगुण से संयुक्त—हे देवी, मैं त्रिविध रूप से स्थित हूँ।

Verse 49

तस्मान्माहेश्वरो ब्रह्मा ब्रह्मणोऽधिपतिः शिवः । सदाशिवो भवेद्विष्णुर्ब्रह्मा सर्वात्मको ह्यतः

इसलिए ब्रह्मा माहेश्वर-स्वरूप हैं और ब्रह्मा के भी अधिपति शिव हैं। सदाशिव ही विष्णु-रूप हो जाते हैं; अतः ब्रह्मा भी सर्वात्मा परमात्मा से व्याप्त है।

Verse 50

स एव भगवान्रुद्रो विष्णुर्विश्व जगत्प्रभुः । अस्मिन्नण्डे त्विमेलोका अन्तर्विश्वमिदंजगत्

वही भगवान रुद्र हैं, वही विष्णु भी—विश्व और जगत के प्रभु। इस ब्रह्माण्ड-रूपी अण्डे में ये लोक हैं; इसी के भीतर यह समस्त अन्तर्यामी विश्व समाहित है।

Verse 51

चन्द्रसूर्यग्रहा देवि ब्रह्माण्डेऽस्मिन्मनस्विनि । संख्यातुं नैव शक्यन्ते ये भविष्यंति ये गताः

हे देवि, हे मनस्विनी! इस ब्रह्माण्ड में चन्द्र, सूर्य और ग्रहों की गणना नहीं हो सकती—जो बीत गए और जो आगे होने वाले हैं।

Verse 52

अस्मिन्वाराहकल्पे तु वर्तमाने मनस्विनि । षडतीता महादेवि रोहिणीपतयः पुरा

हे मनस्विनी, हे महादेवि! इस वर्तमान वाराह-कल्प में पहले रोहिणी के छह पति (चन्द्र) बीत चुके हैं।

Verse 53

सप्तमोऽयं महादेवि वर्ततेऽमृतसंभवः । दक्षशापेन यो देवि संक्षीणो दृश्यतेऽधुना

हे महादेवि! यह सातवाँ अमृत-सम्भव चन्द्र अब विद्यमान है; और हे देवि, दक्ष के शाप से वह आज क्षीण होता हुआ दिखाई देता है।

Verse 54

अथ द्वितीये संप्राप्ते परार्द्धे चैव वेधसः । तस्य त्रिंशत्तिमे कल्पे पितृ कल्पेति विश्रुते

फिर जब वेधस् (ब्रह्मा) का दूसरा परार्ध आ पहुँचा, तब उनके तीसवें कल्प में—जो ‘पितृ-कल्प’ के नाम से प्रसिद्ध है—यह गणना कही जाती है।

Verse 55

स्वायंभुवेंऽतरे प्राप्ते तस्यादौ त्वं सती किल । तस्मिन्काले महादेवि योभूद्दक्षः पिता तव

जब स्वायम्भुव मन्वन्तर आया, उसके आरम्भ में तुम सचमुच सती बनीं। उस समय, हे महादेवी, दक्ष तुम्हारे पिता उत्पन्न हुए।

Verse 56

प्राणात्प्रजापतेर्जन्म तस्य दक्षस्य कीर्तितम् । अस्मिन्मन्वन्तरे देवि दक्षः प्राचेतसोऽभवत्

कहा जाता है कि दक्ष का जन्म प्रजापति के प्राण से हुआ। और इस मन्वन्तर में, हे देवी, दक्ष ‘प्राचेतस’ कहलाए।

Verse 57

अंगुष्ठाद्दक्षिणाद्दक्षो भविष्यत्यधुना प्रिये । युगेयुगे भवन्त्येते सर्वे दक्षादयो द्विजाः

हे प्रिये, अब दाहिने अँगूठे से दक्ष उत्पन्न होंगे। युग-युग में ये सब—दक्ष आदि—द्विज ऋषि बार-बार जन्म लेते हैं।

Verse 58

पुनश्चैव विनश्यन्ति विद्वांस्तत्र न मुह्यति । तस्यापमानात्त्वं देवि देहं तत्यक्थ वै पुरा

और फिर वे नष्ट भी हो जाते हैं; इस विषय में ज्ञानी मोहित नहीं होता। उसके अपमान से, हे देवी, तुमने पहले एक बार अपना देह त्याग दिया था।

Verse 59

तावद्वियुक्तोऽहं देवि त्वया मुक्तोऽभवं पुरा । यावद्वराहकल्पस्य चाक्षुषस्यान्तरं प्रिये

हे देवी, उतने ही समय तक मैं तुमसे वियुक्त रहा; पहले भी तुम्हारे वियोग से रहित था—जब तक वराह-कल्प के चाक्षुष मन्वन्तर का अन्त न हुआ, हे प्रिये।

Verse 60

एकविंशो मनुश्चायं कल्पे वाराहसंज्ञके । कल्पेकल्पे महादेवि भवेन्नामान्तरं तव

इस वराह-संज्ञक कल्प में यह मनु इक्कीसवाँ है। और हे महादेवी, प्रत्येक कल्प में तुम्हारा नाम भिन्न-भिन्न हो जाता है।

Verse 61

अस्मिन्कल्पे तु वाराहे हिमवत्तपसार्ज्जिते । संभूता पार्वती देवि चाक्षुषस्यांतरे गते

परन्तु इस वराह-कल्प में—हिमवत् के तप से प्राप्त—चाक्षुष मन्वन्तर के बीत जाने पर, हे देवी, तुम पार्वती रूप में उत्पन्न हुईं।

Verse 62

ब्रह्मणो दिनमेकं तु षण्मासेन तवावधिः । त्वं वियुक्ता मया सार्द्धं दक्षकोपेन भामिनि

ब्रह्मा का एक दिन तुम्हारे हिसाब से छह महीने के बराबर है। हे भामिनि, दक्ष के क्रोध के कारण तुम भी मेरे साथ वियुक्त हो गईं।

Verse 63

तव क्रोधेन ये शप्ता ऋषयो वै मया पुरा । तेऽपि देवि त्वया सार्द्धं जाता वैवस्वतेंतरे

तुम्हारे क्रोध के कारण जिन ऋषियों को मैंने पहले शाप दिया था, हे देवी, वे भी तुम्हारे साथ वैवस्वत मन्वन्तर में पुनः उत्पन्न हुए।

Verse 64

भृगुरंगिरा मरीचिस्तु पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । अत्रिश्चैव वसिष्ठश्च अष्टौ ते ब्रह्मणः सुताः

भृगु, अंगिरा, मरीचि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, अत्रि और वसिष्ठ—ये आठों ब्रह्मा के पुत्र हैं।

Verse 65

दक्षस्य यज्ञे ते शप्ताः पूर्वं स्वायंभुवेन्तरे । जाता देवि पुनस्ते वै कल्पेस्मिंश्चाक्षुषे गते

स्वायम्भुव मन्वन्तर में, दक्ष के यज्ञ में तुम पहले शापित हुई थीं। पर हे देवी, चाक्षुष मन्वन्तर के बीत जाने पर इसी कल्प में तुम फिर जन्मी हो।

Verse 66

देवस्य महतो यज्ञे वारुणीं बिभ्रतस्तनुम् । ब्रह्मणो जुह्वतः शुक्रमग्नौ पूर्वं प्रजेप्सया

पूर्वकाल में देव के महान यज्ञ में, जब (एक) वारुणी का रूप धारण किए था, तब प्रजा की इच्छा से ब्रह्मा ने अपना वीर्य अग्नि में आहुति रूप से अर्पित किया।

Verse 67

ऋषयो जज्ञिरे पूर्वं सूर्यबिंबसमप्रभाः । पितुस्तव समीपं ते वरणाय तव प्रिये । प्रस्थापिता मया पूर्वं तत्त्वं जानासि सुव्रते

पूर्वकाल में सूर्य-मण्डल के समान तेजस्वी ऋषि उत्पन्न हुए। हे प्रिये, तुम्हें वरण करने हेतु उन्हें तुम्हारे पिता के पास मैंने पहले भेजा था; हे सुव्रते, तुम इस सत्य को जानती हो।

Verse 68

अथ किं बहुनोक्तेन वच्मि ते प्रश्नमुत्तमम् । द्वितीये तु परार्द्धेऽस्मिन्वर्त्तमाने च वेधसः

अब बहुत कहने से क्या लाभ? तुम्हारे प्रश्न का परम उत्तम उत्तर मैं कहता हूँ। ब्रह्मा (वेधस) के जीवन के इस वर्तमान द्वितीय परार्ध में…

Verse 69

श्वेतकल्पात्समारभ्य यावद्वाराहगोचरम् । समतीताश्च ये चन्द्रास्ताञ्छृणुष्व वरानने

श्वेतकल्प से आरम्भ करके वाराहकल्प की सीमा तक जो-जो चन्द्रचक्र (मास) बीत चुके हैं, हे सुन्दर-मुखी, उन्हें सुनो।

Verse 70

चतुःशतानि देवेशि षड्विंशत्यधिकानि तु । गतानि शीतरश्मीनां सप्तविंशोऽधुना प्रिये

हे देवेशी, शीतरश्मि चन्द्र के चार सौ छब्बीस चक्र बीत चुके हैं; हे प्रिये, अब सत्ताईसवाँ चल रहा है।

Verse 71

वैवस्वतेंऽतरे प्राप्ते यश्चायं वर्ततेऽधुना । त्रेतायुगे तु दशमे दत्तात्रेयपुरःसरः

जब वैवस्वत मन्वन्तर आया—जो अब चल रहा है—तब त्रेता-युग के दसवें (चक्र) में दत्तात्रेय अग्रणी होकर (प्रवर्तित हुए)।

Verse 72

संजातो रोहिणीनाथो योऽधुना वर्त्तते प्रिये । तस्योत्पत्तिप्रसंगेन विष्णोर्मानुषसंभवान्

हे प्रिये, जो रोहिणीनाथ (चन्द्र) अब विद्यमान है, वह उत्पन्न हुआ; और उसके जन्म-प्रसंग से विष्णु के मानुष-रूप अवतारों का (वर्णन होगा)।

Verse 73

देहावतारान्वक्ष्यामि प्रारंभात्प्रथमान्प्रिये । पञ्चमः पंचदश्यां स त्रेतायां तु बभूव ह

हे प्रिये, मैं आरम्भ से ही प्रथम देहावतारों का वर्णन करूँगा। पन्द्रहवें क्रम में पाँचवाँ अवतार हुआ, और वह त्रेता-युग में ही हुआ।

Verse 74

मांधाता चक्रवर्त्तित्वे तस्योतथ्यपुरःसरः । एकोनविंशत्रेतायां सर्वक्षत्रांतकोऽभवत्

मांधाता ने चक्रवर्ती पद प्राप्त किया; उनके अग्रगामी मार्गदर्शक उतथ्य थे। उन्नीसवें त्रेता-युग में सर्व क्षत्रियों का संहारक प्रकट हुआ।

Verse 75

जामदग्न्यस्तथा षष्ठो विश्वामित्रपुरःसरः । चतुर्विंशे युगे रामो वसिष्ठेन पुरोधसा

छठा अवतार जामदग्न्य (परशुराम) हुआ, जिनके अग्रभाग में विश्वामित्र थे। चौबीसवें युग में राम का जन्म हुआ, और वसिष्ठ उनके राजपुरोहित थे।

Verse 76

सप्तमो रावणस्यार्थे जज्ञे दशरथात्मजः । अष्टमे द्वापरे विष्णुरष्टाविंशे पराशरात्

सातवाँ अवतार दशरथ का पुत्र बनकर रावण-वध के हेतु प्रकट हुआ। आठवें द्वापर में विष्णु अट्ठाईसवें रूप में पराशर से उत्पन्न हुए।

Verse 77

वेदव्यासस्ततो जज्ञे जातूकर्ण्यपुरःसरः । तत्रैव नवमो विष्णुरदितेः कश्यपात्मजः

तदनंतर वेदव्यास का जन्म हुआ, जिनके अग्रभाग में जातूकर्ण्य थे। वहीं विष्णु का नवम प्राकट्य अदिति के पुत्र—कश्यप के आत्मज—रूप में हुआ।

Verse 78

देवक्यां वसुदेवात्तु ब्रह्मगर्गपुरःसरः । एकविंशतमस्यास्य द्वापरस्यांशसंक्षये । नष्टे धर्मे तदा जज्ञे विष्णुर्वृष्णिकुले स्वयम्

देवकी के गर्भ से वसुदेव द्वारा विष्णु प्रकट हुए; ब्रह्मा और गर्ग अग्रगण्य साक्षी रहे। इस इक्कीसवें द्वापर के अंश-क्षय पर, धर्म के नष्ट होने पर, तब विष्णु स्वयं वृष्णिकुल में जन्मे।

Verse 79

कर्तुं धर्मव्यवस्थानमसुराणां प्रणाशनः । पूर्वजन्मनि विष्णुः स प्रमतिर्नाम वीर्यवान्

धर्म की व्यवस्था स्थापित करने और असुरों का विनाश करने हेतु, पूर्वजन्म में वही विष्णु ‘प्रमति’ नामक पराक्रमी थे।

Verse 80

गोत्रेण वै चंद्रमसः संध्यामिश्रे भविष्यति । कल्किर्विष्णुयशानाम पाराशर्यप्रतापवान्

गोत्र से वह चन्द्रमस (चन्द्रवंशी) होगा और संध्यामिश्र में प्रकट होगा। वह विष्णुयशा के कुल में उत्पन्न, पाराशर्य-प्रताप से युक्त कल्कि होगा।

Verse 81

दशमो भाव्यसंभूतो याज्ञवल्क्यपुरःसरः । अनुकर्षश्च वै सेनां हस्त्यश्वरथसंकुलाम्

भविष्य में दसवाँ अवतार प्रकट होगा, जिसके अग्रभाग में याज्ञवल्क्य होंगे; और वह हाथी-घोड़े-रथों से भरी सेना को साथ खींच ले चलेगा।

Verse 82

प्रगृहीतायुधैर्विप्रैर्भृशं शतसहस्रशः । निःशेषाञ्छूद्रराज्ञस्तांस्तदा स तु करिष्यति

हथियार धारण किए हुए ब्राह्मणों के—लाखों की संख्या में—साथ, वह तब उन शूद्र-राजाओं का पूर्णतः संहार कर देगा।

Verse 83

पाखंडान्म्लेच्छजातींश्च दस्यूंश्चैव सहस्रशः । नात्यर्थं धार्मिका ये च ब्रह्मब्रह्मद्विषः क्वचित्

वह पाखण्डियों, म्लेच्छ जातियों और दस्युओं को—हजारों की संख्या में—तथा जो अत्यन्त धर्मात्मा नहीं हैं, और कभी-कभी ब्रह्म तथा ब्राह्मणों से द्वेष करने वालों को भी (वश में करेगा)।

Verse 84

प्रवृत्तचक्रो बलवाञ्च्छूराणामंतको बली । अदृश्यः सर्वभूतानां पृथिवीं विचरिष्यति

प्रवृत्त चक्र से युक्त, बलवान् और पराक्रमी—दुष्टों का संहारक—सब प्राणियों से अदृश्य होकर वह पृथ्वी पर विचरेगा।

Verse 85

मानवस्य तु सोंऽशेन देवस्य भुवि वै प्रभुः । क्षपयित्वा तु तान्सर्वान्भाविनार्थेन नोदितान् । गंगायमुनयोर्मध्ये निष्ठां प्राप्स्यति सानुगः

देव का मानवांश लेकर पृथ्वी पर वह प्रभु प्रकट होगा। भविष्य-काल के विधान से प्रेरित उन सबका संहार करके, अपने अनुचरों सहित गंगा-यमुना के मध्य प्रदेश में निष्ठा (अंतिम प्रतिष्ठा) को प्राप्त होगा।

Verse 86

ततो व्यतीते कल्कौ तु सामात्ये सहसैनिके । नृपेष्वपि च नष्टेषु तदात्वप्रहराः प्रजाः

फिर, जब कल्कि अपने मंत्रियों और सेना सहित विलीन हो जाएगा, और राजाओं का भी नाश हो जाएगा, तब उस समय प्रजा परस्पर प्रहार करने वाली, उग्र हो जाएगी।

Verse 87

रक्षणे विनिवृत्ते च हत्वा चान्योन्यमाहवे । परस्परहतास्ताश्च निराक्रंदाः सुदुःखिताः

जब रक्षा और व्यवस्था निवृत्त हो जाएगी, तब वे युद्ध में एक-दूसरे को मार डालेंगे। परस्पर से मारे गए वे अत्यन्त दुःखी होकर बिना करुण-क्रंदन के पड़े रहेंगे।

Verse 88

क्षीणे कलियुगे चास्मिन्दशवर्षसहस्रके । स संध्यांशे तु निःशेषे कृतं वै प्रतिपत्स्यति

जब यह दस हजार वर्षों वाला कलियुग क्षीण हो जाएगा, और उसका संध्यांश भी पूर्णतः समाप्त हो जाएगा, तब निश्चय ही कृतयुग पुनः प्रवर्तित होगा।

Verse 89

यदा चंद्रश्च सूर्यश्च तथा तिष्यबृहस्पती । एकराशौ समेष्यंति प्रपत्स्यति तदा कृतम्

जब चन्द्रमा और सूर्य तथा तिष्य नक्षत्र सहित बृहस्पति एक ही राशि में एकत्र होंगे, तब कृतयुग का प्रवर्तन होगा।

Verse 90

अभिजिन्नाम नक्षत्रं जयंतीनाम शर्वरी । मुहूर्तो विजयो नाम यत्र जातो जनार्द्दनः

नक्षत्र का नाम अभिजित था, रात्रि जयंती कहलाती थी, और मुहूर्त विजया नाम का था—उसी समय जनार्दन का जन्म हुआ।

Verse 91

देव्युवाच । नोक्तं यथावदखिलं भृगुशापविचेष्टितम् । पूर्वावतारान्मे ब्रूहि नोक्तपूर्वान्महेश्वर

देवी बोलीं—भृगु के शाप से उत्पन्न समस्त वृत्तांत आपने यथावत् पूर्ण रूप से नहीं कहा। हे महेश्वर, जो पूर्व में नहीं बताए गए, वे पूर्वावतार मुझे कहिए।

Verse 92

ईश्वर उवाच । यदा तु पृथिवी व्याप्ता दानवैर्बलवत्तरैः । ततः प्रभृति शापेन भृगुनैमित्तिकेन ह

ईश्वर बोले—जब पृथ्वी बलवान दानवों से व्याप्त हो गई, तब भृगु-निमित्त शाप के कारण उसी समय से यह क्रम प्रवृत्त हुआ।

Verse 93

जज्ञे पुनःपुनर्विष्णुः कर्त्तुं धर्मव्यवस्थितिम् । धर्मान्नारायणः साध्यः संभूतश्चाक्षुषेंतरे

धर्म की व्यवस्था स्थापित करने हेतु विष्णु बार-बार प्रकट हुए। धर्म से नारायण ‘साध्य’ रूप में प्रादुर्भूत हुए और चाक्षुष मन्वन्तर में उत्पन्न हुए।

Verse 94

यज्ञं प्रवर्तयामास स च वैवस्वतेंऽतरे । प्रादुर्भावे तदा तस्य ब्रह्मा चासीत्पुरोहितः

उसने यज्ञ का प्रवर्तन किया; यह वैवस्वत मन्वंतर में हुआ। उस प्रादुर्भाव के समय स्वयं ब्रह्मा उसके पुरोहित बने।

Verse 95

चतुर्थ्यां तु युगाख्यायामापन्नेषु सुरेष्विह । संभूतः स समुद्रात्तु हिरण्यकशिपोर्वधे

यहाँ कही गई चौथी युग-परंपरा में, जब देवता संकट में पड़ गए, तब वह समुद्र से प्रकट हुए—हिरण्यकशिपु के वध हेतु।

Verse 96

द्वितीयो नरसिंहोऽभूद्रुद्रस्तस्य पुरःसरः । लोकेषु बलिसंस्थेषु त्रेतायां सप्तमे युगे

दूसरा अवतार नरसिंह हुआ, जिनके आगे-आगे रुद्र चले। जब लोक बलि के शासन में स्थित थे, तब त्रेता के सातवें युग में यह हुआ।

Verse 97

दैत्यैस्त्रैलोक्य आक्रांते तृतीयो वामनोभवत् । संक्षिप्यात्मानमंगेषु बृहस्पतिपुरःसरः

जब दैत्यों ने त्रैलोक्य को आक्रांत कर लिया, तब तीसरा अवतार वामन हुआ। अपने अंगों में स्वरूप को संक्षिप्त कर, बृहस्पति को अग्रगामी बनाकर वे आगे बढ़े।

Verse 98

त्रेतायुगे तु दशमे दत्तात्रेयो बभूव ह । नष्टे धर्मे चतुर्थांशे मार्कंडेयपुरःसरः । एते दिव्यावतारा वै मानुष्ये कथिताः पुरा

त्रेता युग के दसवें युग में दत्तात्रेय प्रकट हुए, जब धर्म का एक चतुर्थांश नष्ट हो गया था; उनके अग्रगामी मार्कण्डेय थे। ये ही वे दिव्य अवतार हैं जो प्राचीन काल में मनुष्यों के बीच कहे गए।