
अध्याय 342 में प्रभासखण्ड के अंतर्गत ईश्वर एक स्थान-विशेष का उपदेश देते हैं। दक्षिण–नैरृत्य दिशा में थोड़ी दूरी पर सोम (चन्द्र) द्वारा स्वयंसिद्ध स्थापित पाप-हर लिंग ‘चन्द्रेश/चन्द्रेश्वर’ बताया गया है। उसके निकट पवित्र जलाशय ‘अमृत-कुण्ड’ है, जिसे ‘कला-कुण्ड’ भी कहा गया है। यहाँ साधना का क्रम स्पष्ट है—पहले कुण्ड में स्नान, फिर चन्द्रेश्वर का पूजन। ऐसा करने वाले को सहस्र वर्षों के तप का फल प्राप्त होता है। साथ ही चन्द्र द्वारा निर्मित एक तड़ाग का उल्लेख है, जो सोलह धनुष-परिमाण में विस्तृत और चन्द्रेश के सापेक्ष पूर्व–पश्चिम दिशा में स्थित बताया गया है, जिससे यह खण्ड तीर्थ-मानचित्र की भाँति मार्गदर्शन करता है। उपसंहार में इसे प्रभासक्षेत्र-माहात्म्य के आशापूरा-माहात्म्य प्रसंग में स्थित कहा गया है।
Verse 1
ईश्वर उवाच । तस्य दक्षिणनैरृत्ये नातिदूरे व्यवस्थितम् । लिंगं पापहरं देवि स्वयं सोमप्रतिष्ठितम्
ईश्वर बोले—हे देवी, उसके दक्षिण-पश्चिम में अधिक दूर नहीं, पापों का हरण करने वाला एक लिंग स्थित है, जिसे स्वयं सोम (चन्द्रमा) ने प्रतिष्ठित किया है।
Verse 2
तत्रैवामृतकुण्डं तु कलाकुण्डं तु तत्स्मृतम् । तत्र स्नात्वा तु चंद्रेशं यो नरः पूजयिष्यति
वहीं अमृतकुण्ड है, जो कलाकुण्ड के नाम से भी स्मरण किया जाता है। वहाँ स्नान करके जो पुरुष चन्द्रेश (चन्द्रेश्वर) की पूजा करेगा…
Verse 3
स तु वर्षसहस्रस्य तपःफलमवाप्स्यति । तत्रैव संस्थितं देवि तडागं चंद्रनिर्मितम्
…वह निश्चय ही हजार वर्षों के तप का फल प्राप्त करता है। और वहीं, हे देवी, चन्द्रमा द्वारा निर्मित एक सरोवर भी स्थित है।
Verse 4
धनुःषोडशविस्तारं चंद्रेशात्पूर्वपश्चिमे । तत्पूर्वं ते समाख्यातं मुक्तिदानादिपूर्वकम्
चन्द्रेश के पूर्व और पश्चिम में उसका विस्तार सोलह धनुष है। उसके मुक्ति-दान आदि प्रभाव का वर्णन मैं पहले ही तुमसे कर चुका हूँ।
Verse 342
इति श्रीस्कांदे महापुराण एकाशीतिसाहस्र्यां संहितायां सप्तमे प्रभासखंडे प्रथमे प्रभासक्षेत्रमाहात्म्य आशापूरमाहात्म्ये चंद्रेश्वरकलाकुण्डतीर्थमाहात्म्यवर्णनंनाम द्विचत्वारिंशदुत्तरत्रिशततमोऽध्यायः
इस प्रकार श्रीस्कन्दमहापुराण की एकाशीतिसाहस्री संहिता के सप्तम प्रभासखण्ड के प्रथम प्रभासक्षेत्रमाहात्म्य के अन्तर्गत आशापूरमाहात्म्य में “चन्द्रेश्वर–कलाकुण्ड तीर्थ-माहात्म्य का वर्णन” नामक तीन सौ बयालीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ।