Adhyaya 165
Prabhasa KhandaPrabhasa Kshetra MahatmyaAdhyaya 165

Adhyaya 165

यह अध्याय शिव–देवी संवाद के रूप में बताता है कि सावित्री का प्रभास-क्षेत्र से संबंध कैसे बना और यज्ञ की तात्कालिकता कैसे धर्म-नीति तथा तत्त्वचिन्तन में तनाव उत्पन्न करती है। शिव कहते हैं कि ब्रह्मा ने पुष्कर में महायज्ञ का संकल्प किया, पर दीक्षा और होम के लिए पत्नी का साथ अनिवार्य था। गृहकार्य के कारण सावित्री विलम्ब से पहुँचीं; तब इन्द्र ने एक गोपालकन्या को लाकर गायत्री के रूप में पत्नी-स्थान दिया और यज्ञ आरम्भ हो गया। सावित्री अन्य देवियों के साथ सभा में आकर ब्रह्मा से सामना करती हैं और क्रमशः शाप देती हैं—ब्रह्मा की पूजा वर्ष में केवल कार्तिकी में सीमित हो, इन्द्र को भविष्य में अपमान व बन्धन मिले, विष्णु को मर्त्यावतार में पत्नी-वियोग का दुःख हो, रुद्र को दारुवन-प्रसंग में संघर्ष हो, तथा अग्नि और अनेक ऋत्विज/याजक भी दोषभागी हों। यह शाप-क्रम कामना-प्रेरित कर्म और प्रक्रिया-सुविधा के नाम पर धर्म-लोप की आलोचना बन जाता है। फिर विष्णु सावित्री की स्तुति करते हैं; सावित्री प्रतिवर देकर शापों का शमन करती हैं और यज्ञ-समाप्ति की अनुमति देती हैं। गायत्री जप, प्राणायाम, दान और यज्ञ-दोष-निवारण का आश्वासन देती हैं, विशेषतः प्रभास और पुष्कर के संदर्भ में। अंत में सावित्री का प्रभास में सोमेश्वर के निकट निवास बताया गया है। पन्द्रह दिन तक पूजा, पाण्डु-कूप में स्नान, पाण्डव-प्रतिष्ठित पाँच लिंगों का दर्शन, तथा ज्येष्ठ पूर्णिमा को सावित्री-स्थान पर ब्रह्मसूक्तों का पाठ विधान है। फल—पाप-मोचन और परम पद की प्राप्ति।

Shlokas

Verse 1

ईश्वर उवाच । ततो गच्छेन्महादेवि सावित्रीं लोकमातरम् । महा पापप्रशमनीं सोमेशादीशदिक्स्थिताम्

ईश्वर बोले—तदनंतर, हे महादेवि, लोकमाता सावित्री के पास जाना चाहिए; जो महापापों का शमन करने वाली है और सोमेश आदि की दिशा में स्थित है।

Verse 2

संयतात्मा नरः पश्येत्तत्र तां नियतात्मवान्

वहाँ संयमी और नियमयुक्त चित्त वाला पुरुष उसका दर्शन करे।

Verse 3

ब्रह्मणा यष्टुकामेन सावित्री सहधर्मिणी । कृता तां बलतो ज्ञात्वा गायत्रीं कोपमाविशत्

यज्ञ करने की इच्छा से ब्रह्मा ने सावित्री को अपनी सहधर्मिणी बनाया; यह बलपूर्वक हुआ जानकर गायत्री क्रोध से भर उठी।

Verse 4

ततः संत्यज्य सा देवी ब्रह्माणं कमलोद्भवम् । सपत्नीरोषसन्तप्ता प्रभासं क्षेत्रमाश्रिता

तब वह देवी कमल-सम्भव ब्रह्मा को त्यागकर, सौतन के रोष से संतप्त होकर, प्रभास-क्षेत्र की शरण में गई।

Verse 5

तपः करोति विपुलं देवैरपि सुदुःसहम् । तत्र स्थले स्थिता देवी साऽद्यापि प्रियदर्शना

वह वहाँ महान तप करती है, जो देवताओं के लिए भी अत्यन्त दु:सह है; उसी स्थान में स्थित वह देवी आज भी मनोहर दर्शनीय है।

Verse 6

श्रीदेव्युवाच । किमर्थं सा परित्यक्ता सावित्री ब्रह्मणा पुरा । गायत्री च कथं प्राप्ता केन चास्य निवेदिता

श्रीदेवी बोलीं—पूर्वकाल में ब्रह्मा ने सावित्री को किस कारण त्याग दिया? और गायत्री उन्हें कैसे प्राप्त हुई, तथा किसने उसे उन्हें समर्पित किया?

Verse 7

कीदृशीं तां च गायत्रीं लब्धवान्पद्मसंभवः । यस्तां पत्नीं समुत्सृज्य तस्यामेव मनो दधौ

वह गायत्री कैसी थीं, जिन्हें पद्मसम्भव ब्रह्मा ने पाया—जिन्होंने अपनी पत्नी को त्यागकर उसी में अपना मन लगा दिया?

Verse 8

कस्य सा दुहिता देव किमर्थं च विवाहिता । एतन्मे कौतुकं सर्वं यथावद्वक्तुमर्हसि

हे देव! वह किसकी पुत्री थी और किस प्रयोजन से उसका विवाह हुआ? यह सब मेरी जिज्ञासा है; कृपा करके यथावत्, जैसा हुआ था वैसा ही बताइए।

Verse 9

ईश्वर उवाच । शृणु देवि प्रवक्ष्यामि सावित्र्याश्चरितं महत् । यथा सा ब्रह्मणा त्यक्ता गायत्री च विवाहिता

ईश्वर बोले—हे देवी, सुनो; मैं सावित्री का महान चरित्र कहूँगा—कैसे उसे ब्रह्मा ने त्याग दिया और कैसे गायत्री का विवाह हुआ।

Verse 10

पुरा बुद्धिः समुत्पन्ना ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः । इति वेदा मया प्रोक्ता यज्ञार्थं नात्र संशयः

पूर्वकाल में अव्यक्त-जन्मा ब्रह्मा के मन में यह विचार उत्पन्न हुआ—‘ये वेद मैंने यज्ञ के प्रयोजन से ही प्रकट किए हैं; इसमें कोई संशय नहीं।’

Verse 11

यज्ञैः संतर्पिता देवा वृष्टिं दास्यंति भूतले । ततश्चौषधयः सर्वा भविष्यंति धरातले

यज्ञों से तृप्त होकर देवता पृथ्वी पर वर्षा देंगे; तब धरती पर समस्त औषधियाँ और अन्न-वनस्पतियाँ समृद्ध होंगी।

Verse 12

तस्मात्संजायते शुक्रं शुक्रात्सृष्टिः प्रवर्तते । सृष्ट्यर्थं सर्वलोकानां ततो यज्ञं करोम्यहम्

उससे शुक्र उत्पन्न होता है, और शुक्र से सृष्टि का प्रवाह चलता है; इसलिए समस्त लोकों की सृष्टि के हेतु मैं यज्ञ करता हूँ।

Verse 13

दृष्ट्वा मां यज्ञ आसक्तं ये च विप्रा धरातले । ते यज्ञान्प्रचरिष्यंति शतशोऽथ सहस्रशः

मुझे यज्ञ में आसक्त देखकर पृथ्वी पर रहने वाले ब्राह्मण यज्ञों का प्रचार करेंगे—सैकड़ों और फिर हजारों की संख्या में।

Verse 14

एवं स निश्चयं कृत्वा यज्ञार्थं सुरसुंदरि । तीर्थं निवेशयामास पुष्करं नाम नामतः

इस प्रकार यज्ञ के लिए निश्चय करके, हे दिव्य सुन्दरी, उसने वहाँ एक तीर्थ की स्थापना की, जो नाम से ‘पुष्कर’ प्रसिद्ध हुआ।

Verse 15

यज्ञवाटो महांस्तत्र आसीत्तस्य महात्मनः । तत्र देवर्षयः सर्वे देवाः सेन्द्रपुरोगमाः

वहाँ उस महात्मा का विशाल यज्ञ-वाट (यज्ञ-परिसर) था; और वहीं इन्द्र के नेतृत्व में समस्त देव तथा देवर्षि एकत्र हुए।

Verse 16

समायाता महादेवि यज्ञे पैतामहे तदा । पुण्यास्तेऽपि द्विजश्रेष्ठास्तत्रर्त्विजः प्रजज्ञिरे

तब, हे महादेवी, वे पितामह (ब्रह्मा) के उस यज्ञ में एकत्र हुए; और वहाँ वे पुण्यात्मा श्रेष्ठ द्विज ऋत्विज (यज्ञ-पुरोहित) बने।

Verse 17

सावित्री लोकजननी पत्नी तस्य महात्मनः । गृहकार्ये समासक्ता दीक्षा कालव्यतिक्रमात् । अध्वर्युणा समाहूता सावित्री वाक्यमब्रवीत्

लोकजननी सावित्री, उस महात्मा की पत्नी, गृहकार्य में लगी हुई थीं; दीक्षा-काल बीतने लगा तो अध्वर्यु ने उन्हें बुलाया, तब सावित्री ने ये वचन कहे।

Verse 18

सावित्र्युवाच । अद्यापि न कृतो वेषो न गृहे गृहमण्डनम् । लक्ष्मीर्नाद्यापि संप्राप्ता न भवानी न जाह्नवी

सावित्री बोली—अभी तक मेरा वेश तैयार नहीं हुआ, न ही घर का शृंगार हुआ है। अभी तक लक्ष्मी नहीं आईं, न भवानी, न जाह्नवी।

Verse 19

न स्वाहा न स्वधा चैव तथा चैवाप्यरुंधती । इन्द्राणी देवपत्न्योऽन्याः कथमेकाकिनी व्रजे

यहाँ न स्वाहा हैं, न स्वधा, न अरुंधती; न इन्द्राणी और न अन्य देवपत्नी। मैं अकेली वहाँ कैसे जाऊँ?

Verse 20

उक्तः पितामहो गत्वा पुलस्त्येन महात्मना । सावित्री देव नायाति प्रसक्ता गृहकर्मणि

तब महात्मा पुलस्त्य जाकर पितामह से बोले—“हे देव! सावित्री नहीं आ रही; वह गृहकार्य में लगी है।”

Verse 21

त्वत्पत्नी किमिदं कर्म फलेन संप्रवर्तते । तच्छ्रुत्वा दीक्षितो वाचं शिखी मुंडी मृगाजिनी

“तुम्हारी पत्नी का यह आचरण क्या है? इससे कौन-सा फल सिद्ध होगा?” यह वचन सुनकर दीक्षित—शिखाधारी, मुण्डित-मस्तक, मृगचर्मधारी—(बोला/प्रतिक्रिया की)।

Verse 22

पत्नीकोपेन संतप्तः प्राह देवं पुरंदरम्

पत्नी के क्रोध से संतप्त होकर उसने देव पुरंदर (इन्द्र) से कहा।

Verse 23

गच्छ मद्वचनाच्छक्र पत्नीमन्यां कुतश्चन । गृहीत्वा शीघ्रमागच्छ न स्यात्कालात्ययो यथा

मेरे वचन से, हे शक्र! कहीं से दूसरी पत्नी ले आओ और शीघ्र लौट आओ, जिससे नियत समय का उल्लंघन न हो।

Verse 24

जगाम बलहा तूर्णं वचनात्परमेष्ठिनः । अपश्यमानः कांचित्स्त्रीं या योग्या हंसवाहने

परमेष्ठी (ब्रह्मा) के वचन से बलहा शीघ्र चला और ऐसी किसी स्त्री की खोज करने लगा जो हंसवाहन प्रभु के यज्ञकर्म हेतु योग्य हो।

Verse 25

अथ शापाद्बिभीतेन सहस्राक्षेण धीमता । दृष्टा गोपालकन्यैका रूपयौवनशालिनी

तब शाप से भयभीत बुद्धिमान सहस्राक्ष (इन्द्र) ने एक गोपाल-कन्या को देखा, जो रूप और यौवन से दीप्त थी।

Verse 26

बिभ्रती तत्र पूर्णं सा कुम्भं कन्येत्यचोदयत् । तां गृहीत्वा ततः शक्रः समायाद्यत्र दीक्षितः । देवदेवश्चतुर्वक्त्रो विष्णुरुद्रसमन्वितः

वह वहाँ भरा हुआ कलश धारण किए खड़ी थी; (इन्द्र ने) उसे ‘कन्या!’ कहकर पुकारा। उसे साथ लेकर शक्र वहाँ पहुँचा जहाँ दीक्षा चल रही थी—जहाँ देवदेव चतुर्मुख ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र सहित विराजमान थे।

Verse 27

संप्रदानं तु कृतवान्कन्याया मधुसूदनः

तत्पश्चात् मधुसूदन (विष्णु) ने कन्या का विधिपूर्वक संप्रदान किया।

Verse 28

प्रेरितः शंकरेणैव ब्रह्मा देवर्षिभिस्तथा । परिणीयतां ततो दीक्षां तस्याश्चक्रे यथात्मनः

शंकर और देवर्षियों की प्रेरणा से ब्रह्मा ने तब उसका विधिपूर्वक विवाह कराया और जैसे अपने लिए करते, वैसे ही उसकी दीक्षा-संस्कार भी संपन्न किया।

Verse 29

ततः प्रवर्तितो यज्ञः सर्वकामसमन्वितः

तत्पश्चात् सर्वकाम-सम्पन्न, यथोचित इच्छाओं को पूर्ण करने वाला यज्ञ आरम्भ कराया गया।

Verse 30

अत्रिर्होतार्चिकस्तत्र पुलस्त्योऽध्वर्युरेव च । उद्गाताऽथो मरीचिश्च ब्रह्माहं सुरपुंगवः

वहाँ अत्रि होतृ और ऋचाओं के पाठक बने; पुलस्त्य अध्वर्यु हुए; मरीचि उद्गाता बने; और मैं, देवों में श्रेष्ठ, ब्रह्मा-ऋत्विज् (यज्ञाध्यक्ष) रहा।

Verse 31

सनत्कुमारप्रमुखाः सदस्यास्तस्य निर्मिताः । वस्त्रैराभरणैर्युक्ता मुकुटैरंगुलीयकैः

उस यज्ञ के लिए सनत्कुमार आदि सदस्य नियुक्त किए गए; वे वस्त्रों और आभूषणों से युक्त—मुकुट और अंगूठियों से सुशोभित थे।

Verse 32

भूषिता भूषणोपेता एकैकस्य पृथक्पृथक् । त्रयस्त्रयः पृष्ठतोऽन्ये ते चैवं षोडशर्त्विजः

वे आभूषणों से अलंकृत थे—प्रत्येक के आभूषण अलग-अलग थे। अन्य लोग उनके पीछे तीन-तीन के समूह में खड़े थे; इस प्रकार सोलह ऋत्विज् व्यवस्थित हुए।

Verse 33

प्रोक्ता भवद्भि र्यज्ञेऽस्मिन्ननुगृह्योऽस्मि सर्वदा । पत्नी ममेयं गायत्री यज्ञेऽस्मिन्ननुगृह्यताम्

आपने इस यज्ञ में जो कहा और निर्देश दिया, उससे मैं सदा अनुगृहीत हूँ। यह मेरी पत्नी गायत्री है—इस यज्ञ में इसे भी कृपा करके स्वीकार किया जाए।

Verse 34

मृदुवस्त्रधरां साक्षात्क्षौमवस्त्रावगुण्ठिताम् । निष्क्रम्य पत्नीशालात ऋत्विग्भिर्वेदपारगैः

वह कोमल वस्त्र धारण किए, सूत (क्षौम) के वस्त्र से आवृत होकर, पत्नीशाला से बाहर निकली; वेद-पारंगत ऋत्विज् उसके साथ थे।

Verse 35

औदुम्बरेण दण्डेन संवृतो मृगचर्मणा । तया सार्धं प्रविष्टश्च ब्रह्मा तं यज्ञमण्डपम्

उदुम्बर काष्ठ का दण्ड धारण किए और मृगचर्म से आवृत होकर, ब्रह्मा उसके साथ उस यज्ञ-मण्डप में प्रविष्ट हुए।

Verse 36

ईश्वर उवाच । एतस्मिन्नेव काले तु संप्राप्ता देवयोषितः । संप्राप्ता यत्र सावित्री यज्ञे तस्मिन्निमंत्रिताः

ईश्वर बोले—उसी समय दिव्य देवांगनाएँ आ पहुँचीं; जिस यज्ञ में सावित्री निमंत्रित थी, उसी यज्ञ में वे सब उपस्थित हुईं।

Verse 37

भृगोः ख्यात्यां समुत्पन्ना विष्णुपत्नी यशस्विनी । आमन्त्रिता सा लक्ष्मीश्च तत्रायाता त्वरान्विता

भृगु और ख्याति से उत्पन्न, विष्णु की यशस्विनी पत्नी लक्ष्मी—निमंत्रित होकर—शीघ्रता से वहाँ आ पहुँची।

Verse 38

तत्र देवी महाभागा योगनिद्रादिभूषिता । देवी कांतिस्तथा श्रद्धा द्युतिस्तुष्टिस्तथैव च

वहाँ महाभागा देवी योगनिद्रा आदि से विभूषित होकर आईं; साथ ही देवी कान्ति, श्रद्धा, द्युति और तुष्टि भी उपस्थित हुईं।

Verse 39

सती या दक्षतनया उमा या पार्वती शुभा । त्रैलोक्यसुन्दरी देवी स्त्रीणां सौभाग्यदायका

जो सती हैं, दक्ष की पुत्री; जो शुभा उमा, पार्वती हैं—वही देवी त्रैलोक्यसुन्दरी, स्त्रियों को सौभाग्य देने वाली हैं।

Verse 40

जया च विजया चैव गौरी चैव महाधना । मनोजवा वायुपत्नी ऋद्धिश्च धनदप्रिया

जया और विजया भी, गौरी और महाधना भी; वायु की पत्नी मनोजवा तथा धनद के प्रिय ऋद्धि भी (वहाँ आईं)।

Verse 41

देवकन्यास्तथाऽयाता दानव्यो दनुवंशजाः । सप्तर्षीणां तथा पत्न्य ऋषीणां च तथैव च

देवकन्याएँ भी आईं, दनु-वंश से उत्पन्न दानवी स्त्रियाँ भी; तथा सप्तर्षियों की पत्नियाँ और अन्य ऋषियों की पत्नियाँ भी (वहाँ पहुँचीं)।

Verse 42

प्लवा मित्रा दुहितरो विद्याधरगणास्तथा । पितरो रक्षसां कन्यास्तथाऽन्या लोकमातरः

प्लवा और मित्रा नाम की पुत्रियाँ भी, तथा विद्याधरों के गण; पितृगण, राक्षसों की कन्याएँ और अन्य लोकमातराएँ भी (वहाँ एकत्र हुईं)।

Verse 43

वधूभिश्चैव मुख्याभिः सावित्री गन्तुमिच्छति । अदित्याद्यास्तथा देव्यो दक्षकन्याः समागताः

मुख्य वधुओं के साथ सावित्री जाने की इच्छा करने लगी। अदिति आदि देवियाँ—दक्ष की कन्याएँ—भी वहाँ एकत्र हो गईं।

Verse 44

ताभिः परिवृता सार्धं ब्रह्माणी कमलालया । काश्चिन्मोदकमादाय काश्चित्पूपं वरानने

उन स्त्रियों से घिरी हुई ब्रह्मा की पत्नी ब्रह्माणी—कमल-निवासिनी देवी—उनके साथ चलीं। हे सुन्दर-मुखी, कोई मोदक लाईं, कोई पूप (पकवान) ले आईं।

Verse 45

फलानि तु समादाय प्रयाता ब्रह्मणोऽन्तिकम् । आढकीश्चैव निष्पावान्राजमाषांस्तथाऽपराः

फल लेकर वे ब्रह्मा के समीप पहुँचीं। कोई आढकी (दाल), कोई निष्पाव (सेम), और कोई राजमाष (श्रेष्ठ सेम) भी ले आईं।

Verse 46

दाडिमानि विचित्राणि मातुलिंगानि शोभने । करीराणि तथा चान्या गृहीत्वा करमर्दकान्

हे शोभने, कोई विचित्र दाड़िम (अनार) और सुन्दर मातुलिंग (बिजौरा) लाईं। अन्य स्त्रियाँ करीर और करमर्दक फल भी बटोरकर ले आईं।

Verse 47

कौसुंभं जीरकं चैव खर्जूरं चापरास्तथा । उततीश्चापरा गृह्य नालिकेराणि चापराः

अन्य स्त्रियाँ कौसुम्भ (कुसुम-रंग), जीरक और खर्जूर भी लाईं। कोई उतती लेकर आई, और कोई नारिकेल (नारियल) ले आई।

Verse 48

द्राक्षया पूरितं चाम्रं शृङ्गाराय यथा पुरा । कर्बुराणि विचित्राणि जंबूकानि शुभानि च

द्राक्षाओं से भरे आम, जैसे पहले आनंद के लिए लाए जाते थे; वैसे ही रंग-बिरंगे कर्बूर फल और शुभ जामुन भी लाए गए।

Verse 49

अक्षोडामलकान्गृह्य जंबीराणि तथा पराः । बिल्वानि परिपक्वानि चिर्भटानि वरानने

अखरोट और आँवले लेकर, अन्य लोग नींबू भी लाए; और हे सुन्दर-मुखी, पूरी तरह पके बेलफल तथा चिर्भट (खरबूजे) भी थे।

Verse 50

अन्नपानाधिकाराणि बहूनि विविधानि च । शर्करापुत्तलीं चान्या वस्त्रे कौसुम्भके तथा

अन्न-पान की बहुत-सी विविध सामग्री लाई गई। एक अन्य स्त्री शक्कर की मिठाइयाँ और कौसुम्भ (कुसुम) रंग से रँगे वस्त्र भी लाई।

Verse 51

एवमादीनि चान्यानि गृह्य पूर्वे वरानने । सावित्र्या सहिताः सर्वाः संप्राप्तास्तु तदा शुभाः

इस प्रकार की और भी वस्तुएँ लेकर वे पूर्व की ओर से आईं; हे सुन्दर-मुखी, वे सब सावित्री के साथ तब शुभ रीति से वहाँ पहुँचीं।

Verse 52

सावित्रीमागतां दृष्ट्वा भीतस्तत्र पुरंदरः । अधोमुखः स्थितो ब्रह्मा किमेषा मां वदिष्यति

सावित्री को आते देखकर वहाँ पुरंदर (इन्द्र) भयभीत हो गया। ब्रह्मा मुख नीचे किए खड़े रहे—‘यह मुझे क्या कहेगी?’

Verse 53

त्रपान्वितौ विष्णुरुद्रौ सर्वे चान्ये द्विजातयः । सभासदस्तथा भीतास्तथैवान्ये दिवौकसः

विष्णु और रुद्र लज्जा से भर गए; अन्य सभी द्विज भी वैसे ही हो गए। सभा के सदस्य भी भयभीत हो उठे, और अन्य देवगण भी उसी प्रकार काँप गए।

Verse 54

पुत्रपौत्रा भागिनेया मातुला भ्रातरस्तथा । ऋतवो नाम ये देवा देवानामपि देवताः

वहाँ पुत्र-पौत्र, भगिनीपुत्र, मामा और भाई भी थे; तथा ‘ऋतु’ नामक देवता भी उपस्थित थे, जो देवों में भी पूज्य देवता माने जाते हैं।

Verse 55

विलक्षास्तु तथा सर्वे सावित्री किं वदिष्यति । ब्रह्मवाक्यानि वाच्यानि किं नु वै गोपकन्यया

सबके सब विस्मित होकर कहने लगे—“सावित्री क्या कहेगी? ब्रह्मा के गंभीर वचन कैसे कहे जाएँगे—और वह भी किसी गोप-कन्या के मुख से?”

Verse 56

मौनीभूतास्तु शृण्वानाः सर्वेषां वदतां गिरः । अध्वर्युणा समाहूता नागता वरवर्णिनी

वे सब मौन हो गए और बोलने वालों की वाणी सुनने लगे। अध्वर्यु पुरोहित द्वारा बुलाए जाने पर भी वह सुंदरी वहाँ नहीं आई।

Verse 57

शक्रेणान्या तथाऽनीता दत्ता सा विष्णुना स्वयम् । अनुमोदिता च रुद्रेण पित्रा दत्ता स्वयं तथा

तब शक्र (इन्द्र) एक अन्य स्त्री को ले आए। उसका विवाह स्वयं विष्णु ने कराया; रुद्र ने उसे अनुमोदन दिया, और पिता ने भी अपने हाथों से कन्यादान किया।

Verse 58

कथं सा भविता यज्ञः समाप्तिं वा कथं व्रजेत् । एवं चिन्तयतां तेषां प्रविष्टा कमलालया

“यह यज्ञ कैसे चलेगा और कैसे पूर्ण होगा?”—ऐसा विचार करते हुए उन सबके बीच कमल-धामिनी श्रीलक्ष्मी सभा में प्रविष्ट हुईं।

Verse 59

वृतो ब्रह्मा भार्यया स ऋत्विग्भिर्वेदपारगैः । हूयन्ते चाग्नयस्तत्र ब्राह्मणैर्वेदपारगैः

ब्रह्मा अपनी पत्नी सहित वेद-पारंगत ऋत्विजों से घिरे थे; और वहाँ वेद-निपुण ब्राह्मणों द्वारा पवित्र अग्नियों में विधिपूर्वक आहुतियाँ दी जा रही थीं।

Verse 60

पत्नीशाले तथा गोपी रौप्यशृंगा समेखला । क्षौमवस्त्रपरीधाना ध्यायन्ती परमेश्वरम्

पत्नीशाला में वह गोपी खड़ी थी—रजत-आभूषणों और मेखला से विभूषित, सूक्ष्म क्षौम-वस्त्र धारण किए—और परमेश्वर का ध्यान कर रही थी।

Verse 61

पतिव्रता पतिप्राणा प्राधान्येन निवेशिता । कृपान्विता विशालाक्षी तेजसा भास्करोपमा

वह पतिव्रता थी, पति को ही प्राण मानने वाली; सम्मान-स्थान पर विराजमान—करुणामयी, विशाल-नेत्रा, और तेज में सूर्य-सम।

Verse 62

द्योतयंती सदस्तत्र सूर्यस्येव यथा प्रभा । ज्वलमानस्तथा वह्निर्भ्रमंते चर्त्विजस्तथा

वह वहाँ यज्ञ-मण्डप को सूर्य-प्रभा की भाँति प्रकाशित कर रही थी; अग्नि भी प्रज्वलित थी, और ऋत्विज क्रमशः अपने-अपने कार्य में विचर रहे थे।

Verse 63

पशूनामवदानानि गृह्णंति द्विजसत्तमाः । प्राप्ता भागार्थिनो देवा विलंबसमयोऽभवत्

श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने पशुओं के नियत अवदान-भाग ग्रहण किए। अपने भाग के अभिलाषी देवता भी आ पहुँचे, पर वहाँ विलम्ब हो गया।

Verse 64

कालहीनं न कर्तव्यं कृतं न फलदं भवेत् । वेदेष्वयमधीकारो दृष्टः सर्वो मनीषिभिः

असमय में कर्म नहीं करना चाहिए; किया भी जाए तो वह फलदायक नहीं होता। यह अधिकार और काल-नियम वेदों में सर्वत्र मनीषियों द्वारा देखा गया है।

Verse 65

प्रवर्ग्ये क्रियमाणे तु ब्राह्मणैर्वेदपारगैः । क्षीरद्वये हूयमाने मंत्रेणाध्वर्युणा तथा

जब वेद-पारंगत ब्राह्मणों द्वारा प्रवर्ग्य-याग किया जा रहा था, और अध्वर्यु यथाविधि मंत्रोच्चार सहित अग्नि में दो क्षीर-आहुतियाँ दे रहा था—

Verse 66

उपहूतोपहूतेन आगतेषु द्विजन्मसु । क्रियमाणे तथा भक्ष्ये दृष्ट्वा देवी क्रुधान्विता । उवाच देवी ब्रह्माणं सदोमध्ये तु मौनिनम्

निमंत्रण-प्रतिनिमंत्रण से द्विजगण आ चुके थे और भोजन की तैयारी हो रही थी। यह देखकर देवी क्रोध से भर उठीं और सभा-मंडप के मध्य मौन बैठे ब्रह्मा से बोलीं।

Verse 67

किमेवं बुध्यते देव कृतमेतद्विचेष्टितम् । मां परित्यज्य यः कामात्कृतवानसि किल्बिषम्

“हे देव! तुमने ऐसा कैसे सोचा और ऐसा आचरण किया? कामवश मुझे त्यागकर तुमने पापमय अपराध किया है।”

Verse 68

न तुल्या पादरजसा समा साऽधिशिरः कृता

वह चरण-रज के भी तुल्य नहीं; फिर भी उसे समकक्ष मानकर, सिर के ऊपर स्थापित किया गया।

Verse 69

यद्वदंति नराः सर्वे संगताः सदसि स्थिताः । आश्चर्यं च प्रभूणां तु कुरुते यं यमिच्छति

सभा में एकत्र बैठे सभी लोग यही कहते हैं—समर्थ प्रभु जो जैसा चाहें, वैसा ही आश्चर्य रच देते हैं।

Verse 70

भवता रूपलोभेन कृतं कर्म विगर्हितम्

रूप-लोभ के वशीभूत होकर आपने निंदनीय कर्म किया है।

Verse 71

न पुत्रेषु कृता लज्जा पौत्रेषु च न ते विभो । कामकारकृतं मन्ये ह्येतत्कर्म विगर्हितम्

हे प्रभो! न पुत्रों के सामने आपको लज्जा हुई, न पौत्रों के सामने। मैं मानता हूँ, यह निंदनीय कर्म कामवश किया गया है।

Verse 72

पितामहोऽसि देवानामृषीणां प्रपितामहः । कथं न ते त्रपा जाता आत्मनः पश्यतस्तनुम्

आप देवों के पितामह और ऋषियों के प्रपितामह हैं; अपने ही शरीर को देखते हुए भी आपको लज्जा कैसे न हुई?

Verse 73

लोकमध्ये कृतं हास्यमिह चैव विगर्हितः । यद्येष ते स्थितो भावस्तिष्ठ देव नमोऽस्तु ते

लोक के बीच तुम हँसी का पात्र बने हो और यहाँ भी निन्दित हो। यदि यही तुम्हारा स्थिर भाव है, तो वैसे ही रहो, हे देव—तुम्हें नमस्कार।

Verse 74

अहं कथं सखीनां तु दर्शयिष्यामि वै मुखम् । भर्त्रा मे विहिता पत्नी कथमेतदहं वदे

मैं अपनी सखियों को अपना मुख कैसे दिखाऊँ? मैं यह कैसे कहूँ कि मेरे पति ने मुझे पत्नी के रूप में नियुक्त कर दिया है?

Verse 75

ब्रह्मोवाच । ऋत्विग्भिरहमाज्ञप्तो दीक्षा कालोऽतिवर्तते । पत्नीं विना न होमोत्र शीघ्रं पत्नीमिहानय

ब्रह्मा बोले—ऋत्विजों ने मुझे आज्ञा दी है; दीक्षा का समय बीत रहा है। पत्नी के बिना यहाँ होम नहीं हो सकता; शीघ्र पत्नी को यहाँ ले आओ।

Verse 76

शक्रेणैषा समानीता दत्ता चैवाऽथ विष्णुना । गृहीता च मया त्वं हि क्षमस्वैकं मया कृतम् । न चापराध्यं भूयोऽन्यं करिष्ये तव सुव्रते

यह शक्र द्वारा लाई गई और विष्णु द्वारा दी गई; और मैंने इसे स्वीकार किया। हे सुव्रते, मेरे द्वारा किए गए इस एक कर्म को क्षमा करो; आगे मैं तुम्हारे प्रति कोई अन्य अपराध नहीं करूँगा।

Verse 77

ईश्वर उवाच । एवमुक्ता तदा क्रुद्धा ब्रह्माणं शप्तुमुद्यता । यदि मेऽस्ति तपस्तप्तं गुरवो यदि तोषिताः

ईश्वर बोले—ऐसा कहे जाने पर वह क्रुद्ध हो गई और ब्रह्मा को शाप देने को उद्यत हुई—“यदि मैंने सचमुच तप किया है, यदि मेरे गुरु संतुष्ट हुए हैं…”

Verse 78

सर्वब्राह्मणशालासु स्थानेषु विविधेष्वपि । न तु ते ब्राह्मणाः पूजां करिष्यंति कदाचन

समस्त ब्राह्मण-शालाओं में और नाना स्थानों में भी, ब्राह्मण तुम्हारे लिए कभी पूजा नहीं करेंगे।

Verse 79

ऋते वै कार्तिकीमेकां पूजां सांवत्सरीं तव । करिष्यंति द्विजाः सर्वे सत्येनानेन ते शपे । एतद्बुद्ध्वा न कोपोस्तु हतो हन्ति न संशयः

कार्तिक मास की एक वार्षिक पूजा को छोड़कर, सभी द्विज तुम्हारी पूजा नहीं करेंगे—इस सत्य से मैं तुम्हें शपथ देता हूँ। यह जानकर क्रोध न करना; आहत व्यक्ति प्रत्याघात करता है, इसमें संदेह नहीं।

Verse 80

सावित्र्युवाच । भोभोः शक्र त्वयानीता आभीरी ब्रह्मणोऽन्तिकम् । यस्मादीदृक्कृतं कर्म तस्मात्त्वं लप्स्यसे फलम्

सावित्री बोलीं—हे हे शक्र! तुम ही आभीरि (गोपिका) को ब्रह्मा के समीप लाए थे। क्योंकि तुमने ऐसा कर्म करवाया है, इसलिए उसका फल तुम्हें ही प्राप्त होगा।

Verse 81

यदा संग्राममध्ये त्वं स्थाता शक्र भविष्यसि । तदा त्वं शत्रुभिर्बद्धो नीतः परमिकां दशाम्

जब तुम, हे शक्र, संग्राम के मध्य में स्थित होगे, तब शत्रुओं द्वारा बाँधे जाकर तुम परम दयनीय दशा को प्राप्त किए जाओगे।

Verse 82

अकिंचनो नष्टसुतः शत्रूणां नगरे स्थितः । पराभवं महत्प्राप्य अचिरादेव मोक्ष्यसे

तुम निर्धन-निरुपाय होकर, पुत्र-हानि से व्याकुल, शत्रुओं के नगर में निवास करोगे; महान पराभव भोगकर, शीघ्र ही मुक्त कर दिए जाओगे।

Verse 83

शक्रं शप्त्वा तदा देवी विष्णुं चाऽथ वचोब्रवीत्

शक्र को शाप देकर तब देवी ने विष्णु से भी वचन कहे।

Verse 84

गुरुवाक्येन ते जन्म यदा मर्त्ये भवि ष्यति । भार्याविरहजं दुःखं तदा त्वं तत्र भोक्ष्यसे

गुरु के वचन से जब तुम्हारा जन्म मर्त्यलोक में होगा, तब वहाँ तुम पत्नी-वियोग से उत्पन्न दुःख भोगोगे।

Verse 85

हृतां शत्रुगणैः पत्नीं परे पारे महोदधेः । न च त्वं ज्ञायसे सीतां शोकोपहचेतनः

जब शत्रुओं के समूह तुम्हारी पत्नी को महोदधि के उस पार हर ले जाएँगे, तब शोक से आच्छन्न चित्त होने के कारण तुम सीता को पहचान न सकोगे।

Verse 86

भ्रात्रा सह परां काष्ठामापदं दुःखितस्तथा । पशूनां चैव संयोगश्चिरकालं भविष्यति

भाई के साथ तुम दुःखी होकर विपत्ति की पराकाष्ठा तक पहुँचोगे; और दीर्घकाल तक पशुओं के साथ भी संगति (चरवाहा-जीवन) रहेगी।

Verse 87

तथाऽह रुद्रं कुपिता यदा दारुवने स्थितः । तदा ते मुनयः क्रुद्धाः शापं दास्यंति ते हर

इसी प्रकार, जब रुद्र दारुवन में स्थित होंगे और (मैं) कुपित होऊँगी, तब वे मुनि क्रुद्ध होकर, हे हर, तुम्हें शाप देंगे।

Verse 88

भोभोः कापालिक क्षुद्र पत्न्योऽस्माकं जिहीर्षसि । तदेतद्भूषितं लिंग भूमौ रुद्र पतिष्यति

अरे अरे, नीच कापालिक! तू हमारी पत्नियों को हर लेना चाहता है। इसलिए हे रुद्र, यह अलंकृत लिंग भूमि पर गिर पड़ेगा।

Verse 89

विहीनः पौरुषेण त्वं मुनिशापाच्च पीडितः । गंगातीरे स्थिता पत्नी सा त्वामाश्वासयिष्यति

तू पुरुषार्थ से रहित और मुनियों के शाप से पीड़ित होगा। गंगा-तट पर रहने वाली तेरी पत्नी तुझे ढाढ़स बँधाएगी।

Verse 90

अग्ने त्वं सर्वभक्षोऽसि पूर्वं पुत्रेण मे कृतः । भ्रूणहा धर्म इत्येष कथं दग्धं दहाम्यहम्

हे अग्नि, तू सर्वभक्षी है; पहले मेरे पुत्र ने तुझे ऐसा बनाया था। ‘भ्रूणहत्या अधर्म है’—तो जो पहले ही दग्ध है, उसे मैं कैसे जलाऊँ?

Verse 91

जातवेदस रुद्रस्त्वां रेतसा प्लावयिष्यति । मेध्येषु च कृतज्वाला ज्वालया त्वां ज्वलिष्यति

हे जातवेद! रुद्र अपने रेत से तुझे प्लावित करेगा; और यज्ञकर्म में प्रज्वलित ज्वाला अपनी ज्वलन से तुझ पर भड़क उठेगी।

Verse 92

ब्राह्मणानृत्विजः सर्वान्सावित्री ह्यशपत्तदा

तब सावित्री ने यजमान के समस्त ऋत्विज ब्राह्मणों को सचमुच शाप दिया।

Verse 93

प्रतिग्रहाग्निहोत्राश्च वृथा दारा वृथाश्रमाः । सदा क्षेत्राणि तीर्थानि लोभादेव गमिष्यथ

तुम्हारा दान-प्रतिग्रह और अग्निहोत्र निष्फल होगा; तुम्हारे गृहस्थ-जीवन और आश्रम भी व्यर्थ होंगे। तुम सदा लोभवश ही क्षेत्र-तीर्थों में जाओगे।

Verse 94

परान्नेषु सदा तृप्ता अतृप्ताः स्वगृहेषु च । अयाज्ययाजनं कृत्वा कुत्सितस्य प्रतिग्रहम्

वे पराये अन्न से सदा तृप्त रहते हैं, पर अपने घर में असंतुष्ट रहते हैं; अयाज्य लोगों का याजन करके और नीचों से दान-प्रतिग्रह करके रहते हैं।

Verse 95

वृथा धनार्जनं कृत्वा व्यवश्चैव तथा वृथा । मृतानां तेन प्रेतत्वं भविष्यति न संशयः

व्यर्थ धन-संचय करके और व्यर्थ ही जीवन बिताकर—उस कारण मृतकों को प्रेतत्व प्राप्त होगा; इसमें कोई संदेह नहीं।

Verse 96

एवं शक्रं तथा विष्णुं रुद्रं वै पावकं तथा । ब्रह्माणं ब्राह्मणांश्चैव सर्वांस्तानशपत्तदा

इस प्रकार उस समय उसने शक्र (इन्द्र), विष्णु, रुद्र, पावक (अग्नि), ब्रह्मा तथा ब्राह्मणों—इन सबको शाप दिया।

Verse 97

शापं दत्त्वा तथा तेषां तदा सावस्थिता स्थिरा

उन सबको शाप देकर वह तब स्थिर होकर, अचल भाव से खड़ी रही।

Verse 98

लक्ष्मीः प्राह सखीं तां च इन्द्राणी च वरानना । अन्या देव्यस्तथा प्राहुः साऽह स्थास्यामि नात्र वै । तत्र चाहं गमिष्यामि यत्र श्रोष्ये न तु ध्वनिम्

लक्ष्मी ने अपनी सखी से कहा और सुन्दर मुखवाली इन्द्राणी ने भी कहा; अन्य देवियों ने भी वैसा ही कहा। तब उसने कहा—“मैं यहाँ नहीं रहूँगी; जहाँ मुझे कोई ध्वनि न सुनाई दे, मैं वहीं चली जाऊँगी।”

Verse 99

ततस्ताः प्रमदाः सर्वाः प्रयाताः स्वं निकेतनम् । सावित्री कुपिता तासां पुनः शापाय चोद्यता

तब वे सब दिव्य स्त्रियाँ अपने-अपने धाम को चली गईं। उन पर क्रुद्ध होकर सावित्री फिर से शाप देने के लिए उद्यत हुई।

Verse 100

यस्मान्मां संपरित्यज्य गतास्ता देवयोषितः । तासामपि तथा शापं प्रदास्ये कुपिता भृशम्

“क्योंकि वे दिव्य स्त्रियाँ मुझे छोड़कर चली गई हैं, इसलिए मैं भी अत्यन्त क्रुद्ध होकर उन्हें वैसा ही शाप दूँगी।”

Verse 101

नैकत्र वासो लक्ष्म्यास्तु भविष्यति कदाचन । रुद्रापि चंचला तावन्मूर्खेषु च वसिष्यसि

“लक्ष्मी का निवास कभी भी एक ही स्थान पर स्थिर नहीं रहेगा। और तुम, ‘रुद्रा’ होकर भी, उतनी ही चंचल रहोगी और मूर्खों के बीच निवास करोगी।”

Verse 102

म्लेच्छेषु पर्वतीयेषु कुत्सिते कुष्ठिते तथा । वाचाटे चावलिप्ते च अभिशस्ते दुरात्मनि । एवंविधे नरे तुभ्यं वसतिः शापकारिता

“इस शाप से तुम्हारा निवास ऐसे मनुष्यों में होगा—म्लेच्छों में, पर्वतीय जनों में, कुत्सितों में, कुष्ठरोगियों में, वाचालों में, अहंकारियों में, अभिशप्तों में और दुरात्माओं में।”

Verse 103

शापं दत्त्वा ततस्तस्या इन्द्राणीमशपत्तदा

इस प्रकार शाप देकर उसने उसी समय इन्द्राणी को भी शाप दिया।

Verse 104

त्वष्टुर्वाचा गृहीतेन्द्रे पत्यौ ते दुष्टकारिणि । नहुषाय गते राज्ये दृष्ट्वा त्वां याचयिष्यति

हे दुष्कर्मिणी! जब त्वष्टा के शाप से तुम्हारा पति इन्द्र ग्रस्त होगा और राज्य नहुष को चला जाएगा, तब वह तुम्हें देखकर तुम्हें (अनुचित कामना से) माँगेगा।

Verse 105

अहमिन्द्रः कथं चैषा नोपतिष्ठति चालसा । सर्वान्देवान्हनिष्यामि लप्स्ये नाहं शचीं यदि

मैं इन्द्र हूँ—यह ढीठ स्त्री मेरी सेवा में क्यों नहीं आती? यदि मुझे शची न मिली, तो मैं सब देवताओं का वध कर दूँगा!

Verse 106

नष्टा त्वं च तदा शस्ता वने महति दुःखिता । वसिष्यसि दुराचारे शापेन मम गर्विते

तब तुम त्याग दी जाओगी और हाँकी जाकर बड़े वन में दुःखी रहोगी। हे गर्विते, दुराचारिणी! मेरे शाप से वहीं निवास करोगी।

Verse 107

देवभार्यासु सर्वासु तदा शापमयच्छत

तब उसने समस्त देवपत्नीओं पर शाप उच्चारित किया।

Verse 108

न चापत्यकृता प्रीतिः सर्वास्वेव भविष्यति । दह्यमाना दिवारात्रौ वंध्याशब्देन दुःखिताः

उनमें से किसी में भी संतान-जनित हर्ष न होगा। दिन-रात शोक से दग्ध होकर ‘वंध्या’ नाम के कटु अपवाद से वे दुःखी रहेंगी।

Verse 109

गौरीमेवं तथा शप्त्वा सा देवी वरवर्णिनी । उच्चै रुरोद सावित्री भर्तृ यज्ञाद्बहिः स्थिता

इस प्रकार गौरी को शाप देकर वह वरवर्णिनी देवी सावित्री, पति के यज्ञ से बाहर खड़ी होकर ऊँचे स्वर से रोने लगी।

Verse 110

रोदमाना तु सा दृष्टा विष्णुना च प्रसादिता । मा रोदीस्त्वं विशालाक्षि एह्यागच्छ सदः शुभे

उसे रोती हुई देखकर विष्णु ने उसे सांत्वना दी—“हे विशालाक्षि, मत रोओ; आओ, शुभ यज्ञ-मंडप में प्रवेश करो।”

Verse 111

प्रविष्टा च शुभे यागे मेखलां क्षौमवाससी । गृहाण दीक्षां ब्रह्माणि पादौ ते प्रणमे शुभे

वह मेखला और क्षौम-वस्त्र धारण कर शुभ यज्ञ में प्रविष्ट हुई। (कहा गया)—“हे ब्रह्माणी, दीक्षा ग्रहण करो; हे शुभे, मैं तुम्हारे चरणों में प्रणाम करता हूँ।”

Verse 112

एवमुक्ताऽब्रवीदेनं नाहं कुर्यां वचस्तव । तत्राहं च गमिष्यामि यत्र श्रोष्ये न च ध्वनिम्

ऐसा कहे जाने पर उसने उत्तर दिया—“मैं तुम्हारी बात नहीं मानूँगी। मैं वहाँ चली जाऊँगी जहाँ इसका कोई शब्द-ध्वनि भी न सुनूँ।”

Verse 113

एतावदुक्त्वा व्यरमदुच्चैः स्थाने क्षितौ स्थिता

इतना कहकर वह देवी मौन हो गई और विराम ले लिया। वह ऊँचे स्थान पर पृथ्वी पर खड़ी होकर वहीं स्थिर रही।

Verse 114

विष्णुस्तदग्रतः स्थित्वा बद्ध्वा च करसंपुटम् । तुष्टाव प्रणतो भूत्वा भक्त्या परमया युतः

तब विष्णु उसके सामने खड़े हुए, हाथ जोड़कर, प्रणाम करके, परम भक्ति से युक्त होकर उन्होंने देवी की स्तुति की।

Verse 115

विष्णुरुवाच । नमोऽस्तु ते महादेवि भूर्भुवःस्वस्त्रयीमयि । सावित्रि दुर्गतरिणि त्वं वाणी सप्तधा स्मृता

विष्णु बोले—हे महादेवी! आपको नमस्कार है; आप भूः, भुवः, स्वः तथा त्रयी-वेदमयी हैं। हे सावित्री, दुःख-संकट से तारने वाली! आप वाणी के सात रूपों में स्मरण की जाती हैं।

Verse 116

सर्वाणि स्तुतिशास्त्राणि लक्षणानि तथैव च । भविष्या सर्वशास्त्राणां त्वं तु देवि नमोऽस्तु ते

स्तुति-शास्त्रों के समस्त ग्रंथ और लक्षण-चिह्न भी—हे देवी, समस्त शास्त्रों की भावी आधार-रूपा आप ही हैं; आपको नमस्कार है।

Verse 117

श्वेता त्वं श्वेतरूपासि शशांकेन समानना । शशिरश्मिप्रकाशेन हरिणोरसि राजसे । दिव्यकुंडलपूर्णाभ्यां श्रवणाभ्यां विभूषिता

आप श्वेतवर्णा, श्वेतरूपा हैं; आपका मुख चन्द्रमा के समान है। चन्द्रकिरणों के प्रकाश से आप हरिणचर्म पर शोभायमान होती हैं। दिव्य कुण्डलों से पूर्ण आपके दोनों कान सुशोभित हैं।

Verse 118

त्वं सिद्धिस्त्वं तथा ऋद्धिः कीर्तिः श्रीः संततिर्मतिः । संध्या रात्रि प्रभातस्त्वं कालरात्रिस्त्वमेव च

तुम ही सिद्धि और ऋद्धि हो; तुम ही कीर्ति, श्री, संतति और मति हो। तुम संध्या, रात्रि और प्रभात हो—और तुम ही कालरात्रि भी हो।

Verse 119

कर्षुकाणां यथा सीता भूतानां धारिणी तथा । एवं स्तुवंतं सावित्री विष्णुं प्रोवाच सुव्रता

जैसे हल चलाने वालों के लिए सीता (रेखा) होती है, वैसे ही वह समस्त भूतों की धारिणी है। इस प्रकार स्तुति करते हुए विष्णु से सुव्रता सावित्री ने कहा।

Verse 120

सम्यक्स्तुता त्वया पुत्र अजेयस्त्वं भविष्यसि । अवतारे सदा वत्स पितृमातृसु वल्लभः

हे पुत्र, तुमने मेरा सम्यक् स्तवन किया है; तुम अजेय हो जाओगे। हे वत्स, अपने अवतारों में सदा तुम पिता-माताओं के प्रिय रहोगे।

Verse 121

अनेन स्तवराजेन स्तोष्यते यस्तु मां सदा । सर्वदोषविनिर्मुक्तः परं स्थानं गमिष्यति

जो इस स्तवराज से सदा मेरी स्तुति करेगा, वह सब दोषों से मुक्त होकर परम स्थान को प्राप्त होगा।

Verse 122

गच्छ यज्ञं चिरं तस्य समाप्तिं नय पुत्रक

जाओ पुत्रक, उस दीर्घकाल से चल रहे यज्ञ को पूर्णता तक पहुँचा दो।

Verse 123

कुरुक्षेत्रे प्रयागे च भविष्ये यज्ञकर्मणि । समीपगा स्थिता भर्तुः करिष्ये तव भाषितम्

कुरुक्षेत्र और प्रयाग में, तथा आगे होने वाले यज्ञकर्मों में, मैं अपने पति के समीप रहकर आपके कहे अनुसार आचरण करूँगी।

Verse 124

एवमुक्तो गतो विष्णुर्ब्रह्मणः सद उत्तमम् । सावित्री तु समायाता प्रभासे वरवर्णिनि

ऐसा कहे जाने पर जगन्नाथ विष्णु ब्रह्मा के परम उत्तम धाम को चले गए; और हे सुन्दरवर्णे, सावित्री प्रभास में आ पहुँची।

Verse 125

गतायामथ सावित्र्यां गायत्री वाक्यमब्रवीत्

सावित्री के चले जाने पर गायत्री ने ये वचन कहे।

Verse 126

शृण्वंतु मुनयो वाक्यं मदीयं भर्तृसन्निधौ । यदहं वच्मि संतुष्टा वरदानाय चोद्यता

मेरे स्वामी की सन्निधि में मुनिगण मेरे वचन सुनें। मैं संतुष्ट होकर वरदान देने के लिए प्रेरित होकर जो कहती हूँ, उसे सुनें।

Verse 127

ब्रह्माणं पूजयिष्यंति नरा भक्तिसमन्विताः । तेषां वस्त्रं धनं धान्यं दाराः सौख्यं सुताश्च वै

भक्तियुक्त नर ब्रह्मा की पूजा करेंगे। उनके लिए वस्त्र, धन, धान्य, पत्नी, सुख और निश्चय ही पुत्र होंगे।

Verse 128

अविच्छिन्नं तथा सौख्यं गृहं वै पुत्रपौत्रिकम् । भुक्त्वाऽसौ सुचिरं कालं ततो मोक्षं गमिष्यति

उसको अविच्छिन्न सुख प्राप्त होगा और पुत्र-पौत्रों से युक्त गृह-सम्पदा मिलेगी। उसे बहुत दीर्घ काल तक भोगकर अंत में वह मोक्ष को प्राप्त होगा।

Verse 129

शक्राहं ते वरं वच्मि संग्रामे शत्रुभिः सह । तदा ब्रह्मा मोचयिता गत्वा शत्रुनिकेतनम्

हे शक्र! मैं तुम्हें वरदान कहता हूँ—जब तुम शत्रुओं सहित संग्राम में पड़ोगे, तब ब्रह्मा शत्रुओं के निकेतन में जाकर तुम्हारा उद्धार करने वाले होंगे।

Verse 130

सपुत्रशत्रुनाशात्त्वं लप्स्यसे च परं मुदम् । अकंटकं महद्राज्यं त्रैलोक्ये ते भविष्यति

पुत्रों सहित शत्रु के विनाश से तुम परम आनंद पाओगे; और तीनों लोकों में तुम्हारा निष्कंटक, महान राज्य होगा।

Verse 131

मर्त्यलोके यदा विष्णो ह्यवतारं करिष्यसि । भ्रात्रा सह परं दुःखं स्वभार्या हरणं च यत्

हे विष्णु! जब तुम मर्त्यलोक में अवतार लोगे, तब भाई के साथ तुम्हें महान दुःख होगा—अर्थात् अपनी ही पत्नी का हरण।

Verse 132

हत्वा शत्रुं पुनर्भार्यां लप्स्यसे सुरसन्निधौ । गृहीत्वा तां पुनः प्राज्यं राज्यं कृत्वा गमिष्यसि

शत्रु का वध करके देवताओं की सन्निधि में तुम अपनी पत्नी को फिर पाओगे। उसे पुनः ग्रहण कर समृद्ध राज्य स्थापित करके अंत में तुम प्रस्थान करोगे।

Verse 133

एकादश सहस्राणि कृत्वा राज्यं पुनर्दिवम् । ख्यातिस्ते विपुला लोके चानुरागो भविष्यति

ग्यारह सहस्र वर्षों तक राज्य करके तुम फिर स्वर्गलोक को प्राप्त होगे। संसार में तुम्हारी कीर्ति अत्यन्त विस्तृत होगी और लोगों के हृदय में तुम्हारे प्रति भक्ति तथा अनुराग उत्पन्न होगा।

Verse 134

गायत्री ब्राह्मणांस्तांश्च सर्वानेवाब्रवीदिदम्

तब गायत्री ने उन सब ब्राह्मणों को संबोधित करके ये वचन कहे।

Verse 135

युष्माकं प्रीणनं कृत्वाऽ तृप्तिं यास्यंति देवताः । भवंतो भूमिदेवा वै सर्वे पूज्या भविष्यथ

तुम्हें प्रसन्न करने से देवता स्वयं तृप्त हो जाते हैं। तुम सचमुच ‘भूमि-देव’ हो; तुम सब पूजनीय हो जाओगे।

Verse 136

युष्माकं पूजनं कृत्वा दत्त्वा दानान्यनेकशः । प्राणायामेन चैकेन सर्वमेतत्तरिष्यथ

तुम्हारी पूजा करके, अनेक प्रकार के दान देकर, और एक बार प्राणायाम करने मात्र से भी तुम इन सब (दोषों और बाधाओं) से पार हो जाओगे।

Verse 137

प्रभासे तु विशेषेण जप्त्वा मां वेदमातरम् । प्रतिग्रहकृतान्दोषान्न प्राप्स्यध्वं द्विजोत्तमाः

परन्तु प्रभास-क्षेत्र में विशेष रूप से मुझे—वेदमाता—का जप करने से, हे द्विजोत्तमो, तुम दान-प्रतिग्रह से उत्पन्न दोषों को प्राप्त नहीं करोगे।

Verse 138

पुष्करे चान्नदानेन प्रीताः सर्वे च देवताः । एकस्मिन्भोजिते विप्रे कोटिर्भवतिभोजिता

पुष्कर में भी अन्नदान से समस्त देवता प्रसन्न होते हैं। एक ब्राह्मण को भोजन कराने पर मानो एक करोड़ ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है।

Verse 139

ब्रह्महत्यादिपापानि दुरितानि च यानि च । तरिष्यंति नराः सर्वे दत्ते युष्मत्करे धने

ब्रह्महत्या आदि पाप और जो भी अन्य दुरित हैं—जब धन तुम्हारे हाथों में दिया जाता है, तब सभी लोग उनसे पार हो जाते हैं।

Verse 140

महीयध्वे तु जाप्येन प्राणायामैस्त्रिभिः कृतैः । ब्रह्महत्यासमं पापं तत्क्षणादेव नश्यति

जप के द्वारा तुम महान् सम्मान पाओगे; तीन प्राणायाम करने पर ब्रह्महत्या के समान पाप भी उसी क्षण नष्ट हो जाता है।

Verse 141

दशभिर्जन्मजनितं शतेन तु पुरा कृतम् । त्रियुगं तु सहस्रेण गायत्री हंति किल्बिषम्

दस जप से गायत्री इस जन्म के पाप नष्ट करती है; सौ से पूर्वकृत पाप, और हजार से तीन युगों की मलिनता भी मिट जाती है।

Verse 142

एवं ज्ञात्वा सदा पूज्या जाप्ये च मम वै कृते । भविष्यध्वं न सन्देहो नात्र कार्या विचारणा

यह जानकर सदा मेरी पूजा करो और मेरा जप करो। तुम अवश्य फल प्राप्त करोगे—इसमें संदेह नहीं; यहाँ विचार की आवश्यकता नहीं।

Verse 143

ओंकारेण त्रिमात्रेण सार्धेन च विशेषतः । पूज्याः सर्वे न सन्देहो जप्त्वा मां शिरसा सह

त्रिमात्रिक ओंकार तथा उसके विशेष संयुक्त रूप से—निःसंदेह—सब पूज्य हो जाते हैं, जब वे मुझे जपकर शिर पर धारण करते हैं।

Verse 144

अष्टाक्षरस्थिता चाहं जगद्व्याप्तं मया त्विदम् । माताऽहं सर्ववेदानां वेदैः सर्वैरलङ्कता

मैं अष्टाक्षरी रूप में स्थित हूँ; यह समस्त जगत् मुझसे व्याप्त है। मैं समस्त वेदों की माता हूँ, और सभी वेदों से अलंकृत व प्रमाणित हूँ।

Verse 145

जत्वा मां परमां सिर्द्धि पश्यन्ति द्विजसत्तमाः । प्राधान्यं मम जाप्येन सर्वेषां वो भविष्यति

मेरा जप-पूजन करके द्विजश्रेष्ठ परम सिद्धि का दर्शन करते हैं। मेरे मंत्र-जप से तुम सबको सबके बीच प्रधानता और विशेष प्रतिष्ठा प्राप्त होगी।

Verse 146

गायत्रीसारमात्रोऽपि वरं विप्रः सुयन्त्रितः । नायंत्रितश्चतुर्वेदः सर्वाशी सर्वविक्रयी

गायत्री के सारमात्र को जानने वाला भी यदि संयमी ब्राह्मण हो तो श्रेष्ठ है; पर जो असंयमी है, वह चारों वेद जानकर भी सर्वभक्षी और सर्वविक्रयी बन जाता है।

Verse 147

यस्माद्भवतां सावित्र्या शापो दत्तो सदे त्विह । अत्र दत्तं हुतं चापि सर्वमक्षयकारकम् । दत्तो वरो मया तेन युष्माकं द्विजसत्तमाः

क्योंकि सावित्री द्वारा यहाँ तुम पर शाप दिया गया है, इसलिए यहाँ दिया गया दान और यहाँ किया गया हवन—सब अक्षय फल देने वाला होता है। इसी कारण, हे द्विजश्रेष्ठो, मैंने तुम्हें यह वर प्रदान किया है।

Verse 148

अग्निहोत्रपरा विप्रास्त्रिकालं होमदायिनः । स्वर्गं ते तु गमिष्यंति एकविंशतिभिः कुलैः

जो ब्राह्मण अग्निहोत्र में परायण होकर त्रिकाल होम करते हैं, वे निश्चय ही अपने इक्कीस कुलों सहित स्वर्ग को प्राप्त होंगे।

Verse 149

एवं शक्रे च विष्णौ च रुद्रे वै पावके तथा । ब्रह्मणो ब्रह्मणानां च गायत्री सा वरं ददौ । तस्मिन्काले वरं दत्त्वा ब्रह्मणः पार्श्वगाऽभवत्

इस प्रकार शक्र (इन्द्र), विष्णु, रुद्र, पावक (अग्नि), तथा ब्रह्मा और ब्राह्मणों को गायत्री ने वर प्रदान किया; उस समय वर देकर वह ब्रह्मा के पार्श्व में निवास करने लगी।

Verse 150

हरिणा तु समाख्यातं लक्ष्म्याः शापस्य कारणम् । युवतीनां च सर्वासां शापस्तासां पृथक्पृथक्

तब हरि ने लक्ष्मी के शाप का कारण बताया और उन सब युवतियों पर पड़े भिन्न-भिन्न शापों का भी पृथक्-पृथक् वर्णन किया।

Verse 151

लक्ष्म्यास्तदा वरं प्रादाद्गायत्री ब्रह्मणः प्रिया

तब ब्रह्मा की प्रिया गायत्री ने लक्ष्मी को वर प्रदान किया।

Verse 152

अकुत्सिताः सदा पुत्रि तव वासेन शोभने । भविष्यति न संदेहः सर्वेभ्यः प्रीतिदायकाः

हे पुत्री, वे सदा तिरस्कृत नहीं होंगे; हे सुन्दरी, तुम्हारे निवास से—इसमें संदेह नहीं—वे सबके लिए प्रिय और प्रीतिदायक हो जाएंगे।

Verse 153

ये त्वया वीक्षिताः सर्वे सर्वे वै पुण्यभाजनाः । तेषां जातिः कुलं शीलं धर्मश्चैव वरानने

हे वरानने! जिन-जिन पर तुम्हारी दृष्टि पड़ी है, वे सब निश्चय ही पुण्य के पात्र हैं। उनकी जाति, कुल, शील और धर्म भी शुभ होकर प्रतिष्ठित होते हैं।

Verse 154

परित्यक्तास्त्वया ये तु ते नरा दुःखभागिनः । सभायां ते न शोभन्ते मन्यन्ते न च पार्थिवैः

परंतु जिन्हें तुम त्याग देती हो, वे पुरुष दुःख के भागी होते हैं। सभा में वे शोभा नहीं पाते और राजा भी उन्हें मान नहीं देते।

Verse 155

आशिषश्चैव तेषां तु कुर्वते वै द्विजोत्तमाः । सौजन्यं तेषु कुर्वन्ति नप्ता भ्राता पिता गुरुः

उनके लिए श्रेष्ठ द्विज आशीर्वाद देते हैं। उनके प्रति पौत्र, भ्राता, पिता और गुरु भी सौजन्य तथा कृपा करते हैं।

Verse 156

बांधवोऽसि न संदेहो न जीवेऽहं त्वया विना । त्वयि दृष्टे प्रसन्ना मे दृष्टिर्भवति शोभना । मनः प्रसीदतेऽत्यर्थं सत्यंसत्यं वदामि ते

तुम मेरे बान्धव हो—इसमें संदेह नहीं; तुम्हारे बिना मैं जीवित नहीं रह सकता। तुम्हें देखते ही मेरी दृष्टि प्रसन्न और शोभन हो जाती है; मेरा मन अत्यन्त शांत हो उठता है। सत्य-सत्य, मैं तुमसे यही कहता हूँ।

Verse 157

एवंविधानि वाक्यानि त्वया दृष्ट्या निरीक्षिते । सज्जनास्ते वदिष्यन्ति जनानां प्रीतिदायकाः

जब तुम ऐसी कृपामयी दृष्टि से निहारा जाता है, तब वे सज्जन ऐसे वचन बोलते हैं जो सब लोगों को प्रीति देने वाले होते हैं।

Verse 158

इन्द्राणि नहुषः प्राप्य स्वर्गं त्वां याचयिष्यति । अदृष्ट्वा तु हतः पापो अगस्त्यवचनाद्द्रुतम्

हे इन्द्राणी! नहुष स्वर्ग को पाकर तुमसे याचना करेगा। पर तुम्हें विधिपूर्वक न देखकर वह पापी अगस्त्य-मुनि के वचन से शीघ्र ही दण्डित होकर गिर पड़ेगा।

Verse 159

सर्पत्वं समनुप्राप्य प्रार्थयिष्यति तं मुनिम् । दर्पेणाहं विनष्टोऽस्मि शरणं मे मुने भव

सर्प-योनि को प्राप्त होकर वह उसी मुनि से प्रार्थना करेगा— ‘अहंकार से मैं नष्ट हो गया हूँ; हे मुने! आप मेरे शरणदाता बनिए।’

Verse 160

वाक्येन तेन तस्यासौ नृपस्य भगवानृषिः । कृत्वा मनसि कारुण्यमिदं वचनमब्रवीत्

राजा के वे वचन सुनकर भगवान् ऋषि ने हृदय में करुणा धारण की और यह उत्तर कहा।

Verse 161

उत्पत्स्यति कुले राजा त्वदीये कुरुनंदन । सार्पं कलेवरं दृष्ट्वा प्रश्नैस्त्वामुद्धरिष्यति

हे कुरुनन्दन! तुम्हारे ही कुल में एक राजा उत्पन्न होगा। वह तुम्हारे सर्प-शरीर को देखकर प्रश्नों के द्वारा तुम्हें उस अवस्था से उद्धार देगा।

Verse 162

सोऽप्यजगरतां त्यक्त्वा पुनः स्वर्गं गमिष्यति । अश्वमेधे कृते भर्त्रा सह यासि पुनर्दिवि । प्राप्स्यसे वर दानेन ममानेन सुलोचने

वह भी अजगर-भाव को त्यागकर फिर स्वर्ग को जाएगा। तुम्हारे पति द्वारा अश्वमेध यज्ञ किए जाने पर तुम भी उसके साथ पुनः दिव्य लोक में जाओगी। हे सुलोचने! मेरे इस वरदान से तुम वह फल अवश्य पाओगी।

Verse 163

देवपत्न्यस्तदा सर्वास्तुष्टया परिभाषिताः । अपत्यैरपि हीनाः स्युर्नैव दुःखं भविष्यति

तब संतोषपूर्वक संबोधित की गईं सभी देवपत्नी—यदि संतान से भी वंचित हों—तो भी उन्हें कोई दुःख नहीं होगा।

Verse 164

इति दत्त्वा वरान्देवी गायत्री लोकसंमता । जगामादर्शनं देवी सर्वेषां पश्यतां तदा

इस प्रकार वरदान देकर, समस्त लोकों में पूज्या देवी गायत्री, सबके देखते-देखते उसी क्षण अदृश्य हो गईं।

Verse 165

सावित्री तु तदा देवी प्रभासं क्षेत्रमागता । कृतस्मरस्य शृङ्गे तु श्रीसोमेश्वरपूर्वतः

तब देवी सावित्री प्रभास के पवित्र क्षेत्र में आईं—कृतस्मर नामक शिखर पर, पूज्य सोमेश्वर के पूर्व दिशा में।

Verse 166

मन्वन्तरे चाक्षुषे च द्वितीये द्वापरे शुभे । तत्र यज्ञः समारब्धो ब्रह्मणा लोककारिणा

द्वितीय (चाक्षुष) मन्वंतर के शुभ द्वापर युग में, लोक-कल्याणकारी ब्रह्मा ने वहाँ यज्ञ आरंभ किया।

Verse 167

यज्ञे याता महात्मानो देवाः सप्तर्षयो वराः । स्वायंभुवे तु ये शस्ताः शप्तास्ते चाभवन्पुरा

उस यज्ञ में महात्मा देवता और श्रेष्ठ सप्तर्षि आए। जो स्वायंभुव काल में प्रसिद्ध थे, वे प्राचीन समय में शापग्रस्त भी हुए थे।

Verse 168

तस्मात्कालात्समारभ्य प्रभासं क्षेत्रमाश्रिताः

उस समय से आगे वे प्रभास के पवित्र क्षेत्र में शरण लेकर वहीं प्रतिष्ठित हो गए।

Verse 169

सावित्री लोकजननी लोकानुग्रहकारिणी । यस्तां पूजयते भक्त्या पक्षमेकं निरंतरम् । ब्रह्मपूजाविधानेन तस्य पुत्रो ध्रुवो भवेत्

सावित्री लोकजननी और प्राणियों पर अनुग्रह करने वाली हैं। जो ब्रह्म-पूजा-विधान से एक पक्ष तक निरंतर भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करता है, उसे अवश्य ध्रुव (स्थिर) पुत्र प्राप्त होता है।

Verse 170

पाण्डुकूपे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा लिंगानि पञ्च वै । पाण्डवैः स्थापितानीह दृष्ट्वा यज्ञफलं लभेत्

पाण्डुकूप में स्नान करके और यहाँ पाण्डवों द्वारा स्थापित पाँचों लिंगों के दर्शन करके मनुष्य यज्ञ का फल प्राप्त करता है।

Verse 171

ज्येष्ठस्य पूर्णिमायां तु सावित्रीस्थलसंनिधौ । पठेद्यो ब्रह्मसूक्तानि मुच्यते सर्वपातकैः

ज्येष्ठ पूर्णिमा को सावित्री-स्थल के समीप जो ब्रह्मसूक्तों का पाठ करता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

Verse 172

एतत्ते सर्वविख्यातमाख्यातं कल्मषापहम् । यश्चेदं शृणुयाद्भक्त्या स गच्छेत्परमं पदम्

यह सर्वत्र विख्यात, कल्मष-नाशक वृत्तांत तुम्हें कहा गया। जो इसे भक्तिपूर्वक सुनता है, वह परम पद को प्राप्त होता है।