Reva Khanda
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Reva Khanda (Narmada Section)

Reva Khanda

A Narmadā (Revā)–centered sacred-geography unit mapping tīrthas and devotional memory along the river’s banks. The chapter’s frame situates narration at Naimiṣāraṇya (a classical Purāṇic recitation landscape), from which the Revā region is described through hymnic praise, origin inquiry, and tīrtha-oriented questioning.

Adhyayas in Reva Khanda

232 chapters to explore.

Adhyaya 1

Adhyaya 1

Revā-stutiḥ, Naimiṣa-saṃvādaḥ, Purāṇa-prāmāṇya-nirdeśaḥ (Invocation to Revā; Naimiṣa Dialogue; On the Authority of Purāṇa)

अध्याय का आरम्भ मंगलाचरण और रेवा/नर्मदा की विस्तृत स्तुति से होता है। नर्मदा को दुरित-नाशिनी, देवताओं-ऋषियों-मनुष्यों द्वारा वन्द्या, तथा तपस्वियों को भी प्रिय तटों वाली परम पावन नदी कहा गया है। फिर कथा नैमिषारण्य के पुराण-परम्परागत संवाद में प्रवेश करती है। यज्ञ-सत्र में बैठे शौनक, सूत से पूछते हैं कि ब्राह्मी और विष्णु-नदी के बाद ‘तीसरी’ महानदी—रौद्री नदी रेवा—कहाँ स्थित है, उसका रुद्र-सम्बन्धी उद्गम क्या है, और उसके तटवर्ती तीर्थ कौन-कौन से हैं। सूत इस प्रश्न की प्रशंसा करके श्रुति, स्मृति और पुराण को परस्पर पूरक प्रमाण बताता है; पुराण को ‘पंचम वेद’ के समान महाप्रमाण कहकर उसके पञ्चलक्षण का निरूपण करता है। तत्पश्चात अठारह महापुराणों के नाम और श्लोक-संख्या, तथा उपपुराणों की सूची दी जाती है; अंत में श्रवण-पाठ से महान पुण्य और शुभ परलोक-प्राप्ति का फल बताया जाता है।

54 verses

Adhyaya 2

Adhyaya 2

रेवातीर्थकथाप्रस्तावः — Janamejaya’s Inquiry and the Vindhya Āśrama Prelude

द्वितीय अध्याय में सूत जी नर्मदा के तीर्थों का विस्तृत माहात्म्य आरम्भ करते हैं और कहते हैं कि उनका पूर्ण वर्णन करना अत्यन्त कठिन है। फिर वे एक पूर्व प्रसंग सुनाते हैं—महायज्ञ के बीच राजा जनमेजय ने, द्यूत-पराजय के बाद वनवास में गए पाण्डवों के तीर्थ-सेवन के विषय में, व्यास-शिष्य वैषम्पायन से प्रश्न किया। वैषम्पायन विरूपाक्ष (शिव) और व्यास को प्रणाम कर कथा कहने का संकल्प करते हैं। पाण्डव द्रौपदी और ब्राह्मण साथियों सहित अनेक तीर्थों में स्नान करते हुए विन्ध्य-प्रदेश पहुँचते हैं। वहाँ एक आदर्श तपोवन-आश्रम का मनोहर चित्रण है—घने वृक्ष, पुष्प-फल, निर्मल जल, और अहिंसक पशु-पक्षियों से भरा शांत वातावरण, जहाँ तपस्या और प्रकृति का सामंजस्य दिखता है। उसी वन में मुनि मार्कण्डेय अनुशासित ऋषियों से घिरे, विविध तपों में रत दिखाई देते हैं। युधिष्ठिर श्रद्धापूर्वक उनके पास जाकर पूछते हैं कि प्रलयों के बीच भी उनकी अद्भुत दीर्घायु का रहस्य क्या है, और प्रलय में कौन-सी नदियाँ टिकती हैं तथा कौन नष्ट होती हैं। मार्कण्डेय रुद्र-भाषित पुराण की महिमा बताते हुए भक्ति से श्रवण करने का महान फल कहते हैं, प्रमुख नदियों का उल्लेख करते हैं और बताते हैं कि समुद्र व नदियाँ कालचक्र में क्षीण होती हैं; पर नर्मदा सात कल्पान्तों तक भी अविनाशी रहती है—यही आगे के वर्णन की भूमिका बनती है।

59 verses

Adhyaya 3

Adhyaya 3

Mārkaṇḍeya’s Account of Yuga-Dissolution and the Matsya-Form Encounter (युगक्षय-वर्णनं मत्स्यरूप-समागमश्च)

इस अध्याय में युधिष्ठिर मुनि मार्कण्डेय से पूछते हैं कि उन्होंने बार‑बार युग‑क्षय के समय कैसी भयानक स्थितियाँ देखीं। मार्कण्डेय सूखा, औषधियों का नाश, नदियों‑सरिताओं और सरोवरों का सूख जाना तथा प्राणियों का उच्च लोकों की ओर प्रस्थान—इन सबका वर्णन करते हैं। फिर वे पुराण‑परंपरा की प्रमाण‑श्रृंखला स्थापित करते हैं—शम्भु → वायु → स्कन्द → वसिष्ठ → पराशर → जातूकर्ण्य → अन्य ऋषि—और बताते हैं कि पुराण‑श्रवण जन्म‑जन्मान्तर के संचित मल को हरकर मोक्षमार्ग में सहायक है। इसके बाद वे प्रलय का दृश्य कहते हैं—बारह सूर्यों से जगत् दग्ध होकर एक ही महासागर बन जाता है। जल में भटकते हुए वे आद्य तेजस्वी परम सत्ता का दर्शन करते हैं और अन्धकारमय समुद्र में एक अन्य मनु को अपनी संतति सहित विचरते देखते हैं। भय और श्रम से व्याकुल होकर वे एक महान मत्स्य‑रूप से मिलते हैं, जिसे महेश्वर कहा गया है; वह उन्हें समीप बुलाता है। समुद्र के भीतर नदी‑सा अद्भुत प्रवाह प्रकट होता है और ‘अबला’ नाम की दिव्य स्त्री अपने को ईश्वर‑देह से उत्पन्न बताकर शंकर‑सन्निधि से जुड़ी नौका की सुरक्षा समझाती है। मार्कण्डेय मनु के साथ नौका पर चढ़कर शिव‑स्तुति करते हैं—सद्योजात, वामदेव, भद्रकाली, रुद्र आदि रूपों में जगत्कारण शिव का आवाहन करते हैं। अंत में महादेव प्रसन्न होकर वर माँगने को कहते हैं; इस प्रकार नश्वरता के बीच भक्ति और प्रमाणिक श्रवण को शरण बताया गया है।

41 verses

Adhyaya 4

Adhyaya 4

Origin and Boons of Revā (Narmadā) as Rudra-born River

इस अध्याय में संवादों की परम्परा के साथ रेवा़ (नर्मदा) की उत्पत्ति और महिमा कही गई है। मार्कण्डेय त्रिकूट पर्वत-शिखर पर महादेव के पास जाकर उनका वन्दन-पूजन करते हैं। फिर युधिष्ठिर पूछते हैं कि अन्धकारमय महा-समुद्र में विचरती, पद्मलोचना स्त्री कौन है जो स्वयं को रुद्रजन्मा बताती है। मार्कण्डेय बताते हैं कि यही प्रश्न उन्होंने पहले मनु से किया था; मनु ने कहा—उमा सहित शिव ने ऋक्षशैल पर घोर तप किया और शिव के स्वेद से एक परम पुण्यवती नदी प्रकट हुई, वही पद्मलोचना देवी रेवा़ है। कृतयुग में यह नदी स्त्रीरूप धारण कर रुद्र की आराधना करती है और वर माँगती है—प्रलय में भी अविनाशिता, भक्तिपूर्वक स्नान से महापातकों का नाश करने की शक्ति, ‘दक्षिण गंगा’ का पद, उसके स्नान-फल का महायज्ञादि के फल के तुल्य होना, तथा उसके तटों पर शिव का नित्य निवास। शिव ये वर प्रदान कर उत्तर और दक्षिण तट के निवासियों के लिए फल-भेद भी बताते हैं और व्यापक कल्याणकारी मोक्ष-लाभ का विधान करते हैं। अंत में रुद्र-उद्भव से सम्बद्ध नदियों/धाराओं के नामों की सूची और फलश्रुति आती है—जो इन नामों का स्मरण, पाठ या श्रवण करें, उन्हें महान पुण्य और उत्तम परलोक-गति प्राप्त होती है।

54 verses

Adhyaya 5

Adhyaya 5

नर्मदाया उत्पत्तिः, नामकरणं च (Origin and Naming of Narmadā; Kalpa-Framing Discourse)

इस अध्याय में प्रश्नोत्तर के रूप में गहन तत्त्वचर्चा है। युधिष्ठिर ऋषियों की सभा के साथ नर्मदा की पवित्रता पर विस्मित होकर पूछते हैं कि सात कल्पों के क्षय पर भी यह देवी-नदी नष्ट क्यों नहीं होती। वे प्रलय की प्रक्रिया, जगत का जलरूप में स्थित रहना, पुनः सृष्टि और पालन—इन ब्रह्माण्डीय क्रमों का सिद्धान्त भी जानना चाहते हैं। साथ ही नर्मदा, रेवा आदि अनेक नामों के अर्थ, पूजा-परम्परा में उनके कारण, तथा पुराण-विदों द्वारा ‘वैष्णवी’ कहे जाने का आधार भी पूछते हैं। मर्कण्डेय महेश्वर से वायु के माध्यम से चली आई परम्परा का उल्लेख कर कल्पों के भेद बताते हैं और सृष्टि का संक्षिप्त चित्र देते हैं—आदि तमस से तत्त्व का प्राकट्य, हिरण्याण्ड की उत्पत्ति और ब्रह्मा का प्रादुर्भाव। फिर नर्मदा की दिव्य उत्पत्ति का प्रसंग आता है: उमा-रुद्र से सम्बद्ध तेजस्विनी कन्या देव-दानवों को मोहित करती है; शिव एक क्रीड़ा-नियम स्थापित करते हैं, कन्या दूर-दूर तिरोभाव और पुनः प्रकट होती है, और अंततः ‘नर्म’ (हास्य) तथा दिव्य लीला से सम्बन्ध जोड़कर शिव उसका नाम ‘नर्मदा’ रखते हैं। अंत में उसे महोदधि को सौंपे जाने, पर्वत-प्रदेश से समुद्र में प्रविष्ट होने, तथा विशेष कल्प-परिप्रेक्ष्य (ब्राह्म/मात्स्य आदि) में उसके प्राकट्य का संकेत दिया गया है।

52 verses

Adhyaya 6

Adhyaya 6

Narmadā–Revā Utpatti and Nāma-Nirukti (Origin and Etymologies of the River’s Names)

मार्कण्डेय बताते हैं कि युगान्त के महाप्रलय में महादेव पहले अग्निरूप और फिर मेघ-सम विश्वरूप धारण करके समस्त जगत को एक ही महासागर में डुबो देते हैं। अन्धकारमय आदिजल में शिव-शक्ति की प्रेरणा से एक तेजस्वी मयूर-रूप प्रकट होता है और उसी से पुनः सृष्टि का क्रम आरम्भ होता है। उसी समय नर्मदा पुण्य-नदी-देवी के रूप में दिखाई देती हैं, जिन्हें दिव्य अनुग्रह से प्रलय भी नष्ट नहीं कर पाता। शिव की आज्ञा से जगत का पुनः संस्थापन होता है; मयूर के पंखों से देव और असुर-गण प्रकट होते हैं, त्रिकूट पर्वत उदित होता है और फिर नदियों की धाराएँ बहकर भूगोल को पुनः स्थापित करती हैं। इसके बाद नर्मदा के नामों और उनकी व्युत्पत्तियों का क्रमबद्ध वर्णन आता है—महतী, शोणा, कृपा, मन्दाकिनी, महार्णवा, रेवाः, विपापा, विपाशा, विमला, रञ्जना आदि—जो शुद्धि, करुणा, संसार-तरण और मंगल-दर्शन जैसे गुणों से जोड़े गए हैं। अंत में कहा गया है कि इन नामों तथा उनके उद्गम का ज्ञान पाप से मुक्ति देता है और रुद्रलोक की प्राप्ति कराता है।

45 verses

Adhyaya 7

Adhyaya 7

Kūrma-Prādurbhāva and the Epiphany of Devī Narmadā (Revā’s Manifestation)

मार्कण्डेय प्रलय का दृश्य सुनाते हैं—समस्त स्थावर-जंगम जगत् अन्धकार में लीन होकर एक भयानक ‘एकार्णव’ में विलीन हो गया है। उस जलराशि में अकेले ब्रह्मा एक महान् तेजस्वी देव को कूर्म-रूप में देखते हैं, जिनका स्वरूप विश्वव्यापक और अलौकिक गुणों से युक्त बताया गया है। ब्रह्मा उन्हें कोमलता से जगाकर वेद-वेदाङ्ग की शैली में मंगल स्तुतियाँ करते हैं और निवेदन करते हैं कि संहृत लोकों को पुनः प्रकट किया जाए। देव उठकर तीनों लोकों को, उनके समस्त प्राणि-वर्गों सहित—देव, दानव, गन्धर्व, यक्ष, नाग, राक्षस—और सूर्य-चन्द्र-नक्षत्रादि को फिर से प्रसरित करते हैं। तब पृथ्वी पर्वतों, द्वीपों, समुद्रों और लोकालोक सहित विस्तृत दिखाई देती है। इसी नवसृष्टि में जल से दिव्य अलंकारों से सुसज्जित नारी-रूप में देवी नर्मदा (रेवा) प्रकट होती हैं; उनकी स्तुति कर श्रद्धापूर्वक समीप जाया जाता है। अध्याय के अन्त में यह आश्वासन दिया गया है कि इस कूर्म-प्रादुर्भाव की कथा का श्रवण या अध्ययन पापों (किल्बिष) का नाश करता है।

27 verses

Adhyaya 8

Adhyaya 8

बकरूपेण महेश्वरदर्शनं तथा नर्मदामाहात्म्योपदेशः | Mahādeva as the Crane and the Instruction on Narmadā’s Sanctity

मार्कण्डेय बताते हैं कि प्रलय के समय जब सारा जगत जल में डूब गया, तब वे दीर्घकाल तक महासागर के बीच थके-हारे पड़े रहे और उस देव का ध्यान करने लगे जो महाप्लावन से पार कराता है। तभी उन्हें क्रेन/बगुले के समान दिव्य तेज से युक्त एक पक्षी दिखाई दिया। वे आश्चर्य से पूछते हैं कि भयावह समुद्र में ऐसा दिव्य जीव कैसे प्रकट हुआ। पक्षी स्वयं को महादेव बताता है—वही परम तत्त्व जो ब्रह्मा-विष्णु को भी धारण करता है—और कहता है कि अभी विश्व का संहार हो चुका है। महेश्वर उन्हें अपने पंख के भीतर विश्राम का निमंत्रण देते हैं; मुनि को वहाँ समय के पार जाने जैसा अनुभव होता है। फिर नूपुरों की ध्वनि के साथ दस अलंकृत कन्याएँ दिशाओं से आती हैं, पक्षी की पूजा करती हैं और एक गुप्त, पर्वत-गर्भ जैसे लोक में प्रवेश करती हैं। भीतर अद्भुत नगरी, दिव्य नदी और अनेक रंगों से चमकता विलक्षण लिंग दिखाई देता है, जिसके चारों ओर संहृत अवस्था में देवगण स्थित हैं। तत्पश्चात एक तेजस्विनी कन्या स्वयं को नर्मदा (रेवा) बताती है—रुद्रदेह से उत्पन्न—और कहती है कि वे दस कन्याएँ दिशाएँ हैं। वह समझाती है कि महायोगी महादेव ने संकोच-काल में भी पूजन हेतु लिंग को प्रकट रखा है। ‘लिंग’ वही है जिसमें चर-अचर जगत लीन हो जाता है; देवता अभी माया से संकुचित हैं, सृष्टि में फिर प्रकट होंगे। अंत में उपदेश है कि नर्मदा-जल में मंत्र और विधि से महादेव का स्नान-पूजन करने से पाप नष्ट होते हैं; नर्मदा मनुष्यलोक की महान पावनी कही गई है।

55 verses

Adhyaya 9

Adhyaya 9

युगान्तप्रलयः, वेदापहारः, मत्स्यावतारः, नर्मदामाहात्म्यम् (Yugānta-Pralaya, Veda-Abduction, Matsya Intervention, and Narmadā Māhātmya)

इस अध्याय में श्री मार्कण्डेय युगान्त-प्रलय का दृश्य कहते हैं। समस्त जगत जलमग्न हो जाता है; देव-ऋषि और दिव्यगण देखते हैं कि परमेश्वर शिव प्रकृति के आश्रय से योगसमाधि में शयन कर रहे हैं और सब उनकी स्तुति करते हैं। फिर ब्रह्मा चारों वेदों के लोप पर शोक करते हुए बताते हैं कि सृष्टि-रचना, काल का स्मरण (भूत-वर्तमान आदि) और सुव्यवस्थित ज्ञान के लिए वेद अनिवार्य हैं। शिव के पूछने पर नर्मदा कारण बताती हैं—मधु और कैटभ नामक दैत्य देव-निद्रा की अवस्था में अवसर पाकर वेदों को छिपाकर समुद्र की गहराइयों में ले गए। इसके बाद वैष्णव हस्तक्षेप का स्मरण होता है: भगवान मत्स्यरूप धारण कर पाताल में वेदों को खोजते हैं, दैत्यों का वध कर वेद ब्रह्मा को लौटा देते हैं, जिससे पुनः सृष्टि का प्रवाह चलता है। अंत में गंगा, रेवा (नर्मदा) और सरस्वती को एक ही पवित्र शक्ति की तीन अभिव्यक्तियाँ कहा गया है, जो विभिन्न देव-रूपों से जुड़ी हैं। नर्मदा को सूक्ष्म, व्यापक, पावन और संसार-तरण का साधन बताकर कहा गया है कि उनके जल-स्पर्श तथा तट पर शिव-पूजन से शुद्धि और उच्च आध्यात्मिक फल प्राप्त होते हैं।

55 verses

Adhyaya 10

Adhyaya 10

Revātīra-āśrayaḥ: Kalpānta-anāvṛṣṭi, Ṛṣi-saṅgama, and Narmadā’s Salvific Efficacy (रेवातीराश्रयः)

इस अध्याय में युधिष्ठिर कल्प-काल की मर्यादा और नर्मदा-क्षेत्र के क्रम-विभाग के विषय में पूछते हैं। मर्कण्डेय पूर्व कल्पान्त की कथा कहते हैं—भीषण अनावृष्टि से नदियाँ और समुद्र सूख गए, भूख से लोग भटकने लगे, होम-बलि की परम्परा टूट गई और शौच-आचार का ह्रास हो गया। तब कुरुक्षेत्रवासी, वैखानस, गुहावासी तपस्वी आदि अनेक ऋषि मार्गदर्शन हेतु मर्कण्डेय के पास आए; वे उन्हें उत्तर दिशा छोड़कर दक्षिण में, विशेषतः सिद्धों से सेवित परम पुण्य नर्मदा-तट पर जाने की आज्ञा देते हैं। रेवा-तट को अद्भुत आश्रय बताया गया है—देवालय और आश्रम समृद्ध हैं, अग्निहोत्र चलता रहता है, और पंचाग्नि, उपवास, चान्द्रायण, कृच्छ्र आदि विविध व्रत-तप का आचरण होता है। यहाँ महेश्वर की शैव-पूजा के साथ निरन्तर नारायण-स्मरण का भी उपदेश है; स्वभावानुसार की भक्ति वैसा ही फल देती है, पर वृक्ष को छोड़ शाखाओं में आसक्ति (आंशिक आधारों पर टिकना) संसार-बंधन बढ़ाती है। फलश्रुति में कहा गया है कि रेवा-तट पर संयमित निवास और उपासना से अपुनरावृत्ति का फल मिलता है; नर्मदा-जल में देहान्त होने वाले भी उच्च गति पाते हैं। अंत में इस अध्याय के पाठ-श्रवण को रुद्र-वचनानुसार पवित्र करने वाला ज्ञान कहा गया है।

73 verses

Adhyaya 11

Adhyaya 11

Śraddhā, Narmadā-tīra Sādhanā, and the Pāśupata-Oriented Ethical Code (श्रद्धा–रेवातीरसाधना–पाशुपतधर्मः)

इस अध्याय में युधिष्ठिर पूछते हैं कि युगान्त जैसी विपरीत स्थितियों में भी कुछ तीर्थ और साधनाएँ कैसे प्रभावी रहती हैं, और ऋषि निश्चित नियमों (नियम-निष्ठा) से मोक्ष कैसे पाते हैं। मार्कण्डेय उत्तर देते हैं कि श्रद्धा ही मूल प्रेरक है—श्रद्धा के बिना कर्म निष्फल है; श्रद्धा से, अनेक जन्मों के पुण्य-संचय के परिपाक पर, शंकर-भक्ति सुलभ होती है। फिर नर्मदा-तट (रेवा-तीर) को शीघ्र सिद्धि देने वाला तीर्थ बताया गया है। शिव-पूजन, विशेषतः लिंग-पूजा, नियमित स्नान और भस्म-धारण को पाप-शोधन करने वाला कहा गया है—यहाँ तक कि जिनका आचरण पहले दूषित रहा हो, वे भी शीघ्र शुद्धि पा सकते हैं। इसके बाद अनुचित अन्न-आश्रय, विशेषकर ‘शूद्रान्न’ आदि के संदर्भ में, भोजन-निर्भरता को कर्मफल और आध्यात्मिक पतन से जोड़ा गया है। पाशुपत-मार्ग की सच्ची साधना की प्रशंसा करते हुए कपट, लोभ और दम्भ को तीर्थ-फल नष्ट करने वाले दोष कहा गया है। नन्दी के उपदेश-स्वरूप भाग में लोभ-त्याग, शिव में स्थिर भक्ति, पंचाक्षरी मंत्र-जप और रेवा की पावनता पर आश्रय का आग्रह है। अंत में रुद्राध्याय, वैदिक पाठ, नर्मदा-तट पर पुराण-पाठ/श्रवण और नियमबद्ध साधना से शुद्धि व उच्च गति का फल बताया गया है; युगान्त के अकाल में ऋषियों का नर्मदा-तट की शरण लेना रेवा को ‘नदी-श्रेष्ठ’ और नित्य-आश्रय सिद्ध करता है।

94 verses

Adhyaya 12

Adhyaya 12

नर्मदास्तोत्रम् (Narmadā-Stotra) — Hymn of Praise to the Revā

मार्कण्डेय राजसभा के श्रोता-परिप्रेक्ष्य में बताते हैं कि पूर्व उपदेश सुनकर समवेत ऋषि हर्षित हो उठते हैं और हाथ जोड़कर नर्मदा (रेवा) की स्तुति आरम्भ करते हैं। यह अध्याय एक निरन्तर स्तोत्र है, जिसमें नर्मदा को पावन जल-शक्ति, पापहरिणी, तीर्थों की शरण और रुद्र के अंग से उत्पन्न (रुद्राङ्गसमुद्भवा) दिव्य देवी के रूप में संबोधित किया गया है। स्तोत्र में नर्मदा के जल की शुद्धि-रक्षा-शक्ति, दुःख और नैतिक भ्रान्ति में भटकते जीवों के लिए उसके स्पर्श का मुक्तिदायक प्रभाव, तथा कलियुग में अन्य जलों के क्षीण/दूषित होने पर भी नर्मदा की स्थिर पवित्रता का प्रतिपादन है। अंत में फलश्रुति कहती है कि जो नर्मदा-स्नान के बाद इस स्तोत्र का पाठ या श्रवण करता है, वह शुद्ध गति पाकर दिव्य वाहन और अलंकारों से युक्त होकर महेश्वर/रुद्र के सान्निध्य को प्राप्त होता है।

18 verses

Adhyaya 13

Adhyaya 13

नर्मदाया दिव्यदर्शनं कल्पान्तरस्थैर्यं च (Narmadā’s Divine Epiphany and Her Continuity Across Kalpas)

इस अध्याय में मार्कण्डेय नर्मदा/रेवा को रक्षक और चिरस्थायी दिव्य शक्ति के रूप में वर्णित करते हैं। ऋषियों की स्तुति से प्रसन्न होकर देवी वर देने का संकल्प करती हैं और रात्रि में स्वप्न के द्वारा प्रकट होकर उन्हें आश्वासन देती हैं—“मेरे तट पर निर्भय होकर निवास करो; तुम्हें अभाव या कष्ट नहीं होगा।” तत्पश्चात आश्रमों के निकट प्रचुर मछलियों आदि के अद्भुत प्राकट्य से देवी-कृपा का संकेत मिलता है और तपस्वी समुदाय का पालन होता है। आगे दीर्घकालीन दृश्य में ऋषि नर्मदा-तट पर जप, तप, पितृ-देव-क्रियाएँ करते हैं; तट अनेक लिङ्ग-स्थानों और संयमी ब्राह्मणों से शोभित होते हैं। फिर अर्धरात्रि में जल से तेजस्विनी कन्या-रूपा देवी प्रकट होती हैं—त्रिशूल धारण किए, सर्प-यज्ञोपवीत से विभूषित—और प्रलय के निकट आने का संकेत देकर परिवार सहित ऋषियों को संरक्षण हेतु अपने भीतर (नदी में) प्रवेश करने को कहती हैं। अंत में नर्मदा की अनेक कल्पों में अविनाशी निरन्तरता बताई जाती है; उन्हें शङ्करी-शक्ति कहा गया है और जिन कल्पों में वे नष्ट नहीं होतीं, उनका उल्लेख कर नदी को पवित्र भूगोल और ब्रह्माण्डीय तत्त्व—दोनों रूपों में प्रतिष्ठित किया गया है।

47 verses

Adhyaya 14

Adhyaya 14

नीललोहितप्रवेशः तथा रौद्रदेव्याः जगत्संहारवर्णनम् | Entry into the Śaiva State and the Description of the Fierce Devī in Cosmic Dissolution

यह अध्याय राजर्षि-संवाद के रूप में है। युधिष्ठिर पूछते हैं कि नर्मदा-तट के मुनियों के परलोक गमन के बाद कौन-सा अद्भुत प्रसंग घटित हुआ। मार्कण्डेय रौद्र-संहार के रूप में एक महाविपत्ति का वर्णन करते हैं, जहाँ ब्रह्मा-विष्णु आदि देव कैलास में सनातन महादेव की स्तुति करके महाकल्प के अंत में संहार की प्रार्थना करते हैं। यहाँ त्रिविध देवतत्त्व का निरूपण होता है—एक ही परम सत्ता ब्राह्मी (सृष्टि), वैष्णवी (पालन) और शैवी (संहार) रूपों में प्रकट होती है, और अंततः भूत-तत्त्वों से परे शैव ‘पद’ में प्रवेश का विधान बताया जाता है। फिर संहार की क्रिया आरम्भ होती है। महादेव देवी को कोमल रूप छोड़कर रुद्र-सम्बद्ध उग्र रूप धारण करने की आज्ञा देते हैं; देवी करुणा से पहले अस्वीकार करती हैं, पर शिव के क्रुद्ध वचन से वे कालरात्रि-सदृश रौद्री रूप में परिणत हो जाती हैं। उनके भयानक स्वरूप, असंख्य रूपों में विस्तार, गणों की संगति, और तीनों लोकों के क्रमशः डगमगाने व दग्ध होने का वर्णन संहार को एक सुव्यवस्थित, धर्मसम्मत दैवी प्रक्रिया के रूप में स्थापित करता है।

66 verses

Adhyaya 15

Adhyaya 15

Amarāṅkaṭa at the Narmadā: Kālarātri, the Mātṛgaṇas, and Śiva’s Yuga-End Vision (अमरंकट-माहात्म्य तथा संहारा-दर्शनम्)

मार्कण्डेय युगान्त-सा महाविनाश-दृष्टि का वर्णन करते हैं। कालरात्रि क्रूर मातृगणों से घिरी हुई लोकों पर छा जाती है। ब्रह्मा-विष्णु-शिव-शक्ति से संयुक्त, भूतों तथा दिक्पाल-तत्त्वों से संबद्ध माताएँ दसों दिशाओं में शस्त्र धारण कर विचरती हैं; उनके गर्जन और पदाघात से त्रिलोकी दग्ध-सी हो उठती है। विनाश सात द्वीपों तक फैलता है; रक्तपान, भक्षण और संहार की छवियाँ प्रलय-भाव को प्रकट करती हैं। फिर कथा एक पवित्र केन्द्र पर टिकती है—नर्मदा-तट पर अमराङ्कट में शिव का निवास। “अमरा” और “कटा” शब्दों के आधार पर नाम की व्युत्पत्ति बताई जाती है। शंकर उमा सहित गणों और मातृगणों के साथ, तथा व्यक्त रूप में उपस्थित मृत्यु के साथ, उन्मत्त आनन्द-नृत्य करते हैं—रुद्र का भय और शरण, दोनों रूप एक साथ प्रकट होते हैं। नर्मदा को जगत-वंद्या मातृ-नदी कहा गया है और उसके प्रचण्ड, तरंगित रूपों की भी स्तुति है। अंत में दिव्य दर्शन तीव्र होता है—रुद्र के मुख से संवर्त-वायु उठकर समुद्रों को सुखा देती है। श्मशान-चिह्नों से युक्त, तेजोमय शिव संहार करते हुए भी कालरात्रि, मातृगण और गणों के परम आराध्य बने रहते हैं। उपसंहार में हरि-हर/शिव की रक्षाकारी स्तुति है—वे ही विश्व-कारण हैं और निरन्तर स्मरण के केन्द्र।

41 verses

Adhyaya 16

Adhyaya 16

Saṃvartaka-Kāla Nṛtya and Mahādeva-Stotra (Cosmic Dissolution Motif)

इस अध्याय में मार्कण्डेय एक उच्च-तत्त्वमय प्रसंग सुनाते हैं। शूलधारी हर/शम्भु भयानक भूत-गणों के बीच, गजचर्म ओढ़े, धुएँ और चिंगारियों की छवियों सहित, वडवामुख-सा खुला मुख किए संहार-काल का संकेत देते हुए नृत्य करते हैं। उनके दिव्य अट्टहास का प्रचण्ड नाद दिशाओं में गूँजता, समुद्रों को क्षुब्ध करता और ब्रह्मलोक तक पहुँचकर ऋषियों को विचलित कर देता है; वे ब्रह्मा से कारण पूछते हैं। ब्रह्मा इसे स्वयं ‘काल’ का स्वरूप बताते हैं—संवत्सर, परिवत्सर आदि वर्ष-चक्रों, सूक्ष्म/अणु-परिमाण और परम प्रभुत्व के रूप में वर्णित काल-तत्त्व। इसके बाद स्तोत्र में ब्रह्मा मंत्र-युक्त वाणी से महादेव की स्तुति करते हैं—जो शंकर, विष्णु और सृष्टि-तत्त्व को समेटे हुए तथा वाणी-मन से परे हैं। महादेव आश्वासन देकर ब्रह्मा को अनेक मुखों द्वारा ‘दहते’ जगत के आकृष्ट होने का दर्शन कराने को कहते हैं और अंतर्धान हो जाते हैं। फलश्रुति में इस स्तोत्र के श्रवण-पाठ से शुभ गति, भय-नाश और युद्ध, चोरी, अग्नि, वन, समुद्र आदि संकटों में रक्षा का फल बताया गया है; शिव को विश्वसनीय रक्षक कहा गया है।

24 verses

Adhyaya 17

Adhyaya 17

रुद्रवक्त्रप्रलयवर्णनम् (Description of the Dissolution Imagery from Rudra’s Mouth)

इस अध्याय में मुनि मार्कण्डेय राजा से प्रलय का अत्यन्त तीव्र और भयावह चित्र प्रस्तुत करते हैं। वे बताते हैं कि परमेश्वर प्रकट जगत् का संहार करते हैं और देव तथा ऋषिगण उनकी स्तुति करते रहते हैं। विशेष रूप से महादेव के दक्षिण मुख का वर्णन आता है—ज्वलन्त नेत्र, विशाल दाँत, सर्प-चिह्नों से युक्त देह-रूप और ग्रसने वाली जीभ—जिसमें जगत् का लय होना नदियों के समुद्र में मिलने के समान कहा गया है। उस मुख से प्रचण्ड अग्नि निकलती है और फिर द्वादश आदित्यों का तेज प्रकट होकर पृथ्वी, पर्वत, समुद्र तथा अधोलोकों को दग्ध कर देता है; सात पाताल और नागलोक तक तप्त हो उठते हैं। अंत में, सर्वत्र दाह और पर्वत-श्रेणियों के विघटन के बीच भी रेवा-नर्मदा का नाश न होने का स्मरण कराया गया है, जिससे तीर्थ-केन्द्रित पवित्र भूगोल की महिमा दृढ़ होती है।

37 verses

Adhyaya 18

Adhyaya 18

Saṃvartaka-megha-prādurbhāvaḥ (The Manifestation of the Saṃvartaka Clouds) / Cosmic Inundation and the Search for Refuge

अध्याय 18 में श्री मार्कण्डेय प्रलय का भयानक दृश्य बताते हैं। सूर्य के प्रचण्ड तेज से जगत् मानो दग्ध हो जाता है, फिर दिव्य स्रोत से संवरतक मेघ प्रकट होते हैं—अनेक रंगों वाले, पर्वत, हाथी और दुर्ग के समान विशाल, बिजली-गर्जना से युक्त। संवरतक-समूह का नाम लेकर कहा गया है कि उनकी वर्षा समस्त लोकों को भर देती है और समुद्र, द्वीप, नदियाँ तथा पृथ्वी-मण्डल सब एक ही जलराशि—एकार्णव—में लीन हो जाते हैं। उस समय दृश्यता नष्ट हो जाती है; सूर्य-चन्द्र-तारे दिखाई नहीं देते, घोर अन्धकार छा जाता है और वायु भी स्थिर-सी लगती है। इस महाप्लावन में वक्ता स्तुति करता हुआ विचार करता है कि सच्चा आश्रय कहाँ है, और शरण्य देव का स्मरण-ध्यान करता है। बाह्य सहारे मिट जाने पर भी अनुशासित स्मृति, भक्ति और अन्तर्मुख साधना ही धर्ममय उत्तर है; देवकृपा से स्थिरता आती है और जलराशि को पार करने की शक्ति प्राप्त होती है।

14 verses

Adhyaya 19

Adhyaya 19

एकोर्णवप्रलये नर्मदागोरूपिण्या रक्षणम् तथा वाराहावतारवर्णनम् | Markandeya’s Rescue by Narmadā (Cow-Form) and the Varāha Cosmogony

यह अध्याय मārkaṇḍeya के आत्मवृत्तांत के रूप में दो भागों में कथा कहता है। एकार्णव-प्रलय में चारों ओर केवल जल ही जल है; ऋषि अत्यन्त थककर भूख-प्यास से व्याकुल और मृत्यु के निकट हो जाते हैं। तभी जल पर चलती हुई तेजस्विनी गौ प्रकट होती है। वह उन्हें आश्वासन देती है कि महादेव की कृपा से उनका मरण नहीं होगा, अपनी पूँछ पकड़ने को कहती है और दिव्य दुग्ध पिलाती है, जिससे भूख-प्यास मिटती है और अद्भुत बल-प्राण लौट आते हैं। वह स्वयं को नर्मदा बताती है, जिसे रुद्र ने ब्राह्मण की रक्षा हेतु भेजा है—इससे नर्मदा को चेतन, उद्धारक और शैव-अनुग्रह की वाहिका रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। फिर दृश्य सृष्टि-रहस्य की ओर मुड़ता है: वक्ता जल में परमेश्वर को उमा और विश्व-शक्ति के साथ देखता है। देव जाग्रत होकर वराहावतार धारण करते हैं और डूबी हुई पृथ्वी का उद्धार करते हैं। अध्याय उच्चतम अर्थ में रुद्र, हरि और सृष्टिकर्ता-कार्य की अभिन्नता बताकर संप्रदायगत वैर-भाव से सावधान करता है। अंत में फलश्रुति है—नित्य पाठ/श्रवण से पवित्रता और परलोक में शुभ लोक-प्राप्ति होती है।

61 verses

Adhyaya 20

Adhyaya 20

Pralaya-lakṣaṇa, Dvādaśa-Āditya Vision, and the Revelation of Revā (Narmadā) as Refuge

इस अध्याय में युधिष्ठिर, मर्कण्डेय से शार्ङ्गधन्वा (विष्णु) के अनुभूत प्रभाव का वर्णन पूछते हैं। मर्कण्डेय प्रलय के लक्षण बताते हैं—उल्कापात, भूकम्प, धूल की वर्षा, भयानक नाद—और फिर प्राणियों तथा भू-दृश्यों के विलय का चित्र खींचते हैं। इसके बाद वे द्वादश आदित्यों का दर्शन कहते हैं, जिनकी ज्वाला से लोक दग्ध हो जाते हैं; परन्तु अविनाशी रूप में केवल रेवा और वे स्वयं दिखाई देते हैं। तृषा से व्याकुल होकर वे ऊपर उठते हैं और एक विशाल, अलंकृत दिव्य धाम में शङ्ख-चक्र-गदा-धारी परम पुरुष (पुरुषोत्तम) को शयन करते देखते हैं। वे विस्तृत स्तुति करते हुए विष्णु को जगत् का आधार, काल-युगों तथा सृष्टि-प्रलय का कारण बताते हैं। तभी दूसरा रूप हरा (शिव) प्रकट होता है और फिर देवी का आविर्भाव होकर एक धर्म-संकट उठता है—बालक की मृत्यु रोकने हेतु स्तन्यपान कराना उचित है या नहीं; ब्राह्मण-संस्कारों की मर्यादा (अन्ततः अड़तालीस संस्कार) बताई जाती है, पर देवी बाल-उपेक्षा को महापाप कहकर चेताती हैं। दीर्घ स्वप्नवत् काल के बाद देवी रहस्य खोलती हैं—शयनस्थ पुरुष कृष्ण/विष्णु हैं, दूसरा हरा है, चार कलश समुद्र हैं, बालक ब्रह्मा है, और वे स्वयं सात द्वीपों वाली पृथ्वी हैं; रेवा का नाम नर्मदा है और वह नष्ट नहीं होती। अंत में इस अनुभव-कथा के श्रवण की पवित्रता पुनः कही जाती है और आगे प्रश्न करने का निमंत्रण दिया जाता है।

83 verses

Adhyaya 21

Adhyaya 21

अमरकण्टक-रेवा-माहात्म्य तथा कपिला-नदी-उत्पत्ति (Amarakantaka and Revā Māhātmya; Origin of the Kapilā River)

इस अध्याय में युधिष्ठिर और मर्कण्डेय के प्रश्नोत्तर रूप में रेवा/नर्मदा की अद्वितीय पावनता का प्रतिपादन है। कहा गया है कि गंगा आदि की पवित्रता अनेक बार स्थान-विशेष पर निर्भर होती है, पर रेवा सर्वत्र स्वभावतः ही शुद्धि देने वाली है। अमरकण्टक क्षेत्र को सिद्धि-क्षेत्र बताया गया है, जहाँ देव, गन्धर्व और ऋषि निरन्तर विचरते हैं; दोनों तटों पर तीर्थों की घनता और उनकी लगभग अक्षयता का वर्णन है। इसके बाद उत्तर और दक्षिण तट के प्रमुख तीर्थों का नामोल्लेख आता है—उत्तर तट पर चरुकासंगम, चरुकेश्वर, दारुकेश्वर, व्यतीपातेश्वर, पातालेश्वर, कोटियज्ञ तथा अमरेश्वर के निकट लिंग-समूह; और दक्षिण तट पर केदार-तीर्थ, ब्रह्मेश्वर, रुद्राष्टक, सावित्र तथा सोम-तीर्थ। साथ ही साधक के लिए नियम बताए गए हैं—संयमपूर्वक स्नान, उपवास, ब्रह्मचर्य और पितृकर्म; तिलोदक से तर्पण और पिण्डदान करने पर दीर्घ स्वर्ग-भोग तथा शुभ पुनर्जन्म जैसे फल कहे गए हैं। यह भी कहा गया है कि ईश्वर-अनुग्रह से वहाँ किया गया कर्म ‘कोटि-गुण’ हो जाता है; नर्मदा-जल के स्पर्श से वृक्ष और पशु तक पुण्य के भागी बनते हैं। विशल्या आदि अन्य पवित्र जलों का भी संकेत है। अंत में कपिला नदी की उत्पत्ति-कथा आती है—शिव के साथ नर्मदा में क्रीड़ा करते समय दाक्षायणी (पार्वती) के स्नान-वस्त्र से निचोड़ा गया जल कपिला के रूप में प्रवाहित हुआ; इसी से उसका नाम, स्वरूप और विशेष पुण्य प्रतिष्ठित होता है।

78 verses

Adhyaya 22

Adhyaya 22

Viśalyā–Kapilā-hrada Māhātmya (The Etiology of the ‘Arrowless/Healed’ Tīrtha)

मर्कण्डेय जी विषल्या और कपिला-ह्रद की पवित्रता का कारण बताते हैं। ब्रह्मा के मन से उत्पन्न, वैदिक अग्नियों में प्रधान अग्नि नदी-तट पर तप करता है। महादेव के वर से नर्मदा और पन्द्रह अन्य नदियाँ उसकी पत्नियाँ बनती हैं; वे ‘धीष्णी’ (नदी-पत्नियाँ) कहलाती हैं और उनकी संतान यज्ञाग्नि (अध्वर-अग्नि) रूप में प्रलय तक स्थित रहती है। नर्मदा से शक्तिशाली पुत्र धीष्णीन्द्र उत्पन्न होता है। फिर मायातारक से सम्बद्ध देवासुर-संग्राम में देवता विष्णु की शरण लेते हैं। विष्णु पावक (अग्नि) और मारुत (वायु) को बुलाकर धीष्णी/पावकेन्द्र को नर्मदेय दानवों को भस्म करने की आज्ञा देते हैं। शत्रु दिव्य अस्त्रों से अग्नि को घेरना चाहते हैं, पर अग्नि और वायु उन्हें भस्म कर देते हैं और अनेक पाताल के जल में जा गिरते हैं। विजय के बाद देवता युवा नर्मदा-पुत्र अग्नि का सम्मान करते हैं। युद्ध में शस्त्रों से विद्ध होकर वह ‘सशल्य’ अवस्था में माता के पास आता है; नर्मदा उसे आलिंगन कर कपिला-ह्रद में प्रवेश करती है, जहाँ का जल क्षणभर में उसके शल्य (घाव-भेदन) को हर लेता है और वह ‘विषल्या’ कहलाता है। यह भी कहा गया है कि जो वहाँ स्नान करते हैं वे ‘पाप-शल्य’ से मुक्त होते हैं, और वहाँ देह त्यागने वाले स्वर्गगति पाते हैं—इसी से तीर्थ का नाम और माहात्म्य प्रतिष्ठित होता है।

36 verses

Adhyaya 23

Adhyaya 23

Viśalyā–Saṅgama Māhātmya (Glory of the Viśalyā Confluence) — Chapter 23

मार्कण्डेय राजा को बताते हैं कि पवित्र संगम पर परम भक्ति से प्राण त्यागना मोक्षदायक है, और विशेषतः रेवा (नर्मदा) का जल अत्यन्त शुद्धिकारक है। अध्याय में फल क्रमशः बताए गए हैं—(1) विशल्या-संगम पर सर्वोच्च भक्ति से देह छोड़ने वाले परम गति पाते हैं; (2) संन्यासी-भाव से, सब संकल्प त्यागकर देह त्यागने वाले अमरेश्वर के समीप होकर स्वर्गलोकों में निवास करते हैं; (3) शैलेन्द्र पर देह त्यागने वाला सूर्यवर्ण विमान से अमरावती जाता है, जहाँ अप्सराएँ उसकी कीर्ति गाती हैं। फिर जलों की महिमा का क्रम आता है—कुछ विद्वान सरस्वती और गंगा को समान कहते हैं, पर तत्त्वज्ञ रेवा-जल को उनसे भी श्रेष्ठ मानते हैं; इसकी श्रेष्ठता पर विवाद न करने की सीख दी जाती है। रेवा-प्रदेश को विद्याधरों और किन्नर-सदृश दिव्य जनों से युक्त बताया गया है; जो श्रद्धा से रेवा-जल को सिर पर धारण करते हैं, वे इन्द्रलोक के समीप पहुँचते हैं। जो फिर संसार-सागर न देखना चाहे, उसे नर्मदा की निरन्तर सेवा करनी चाहिए; वह तीनों लोकों को पवित्र करती है, और उसके क्षेत्र में कहीं भी मृत्यु होने पर गणेश्वरी (दिव्य-परिचर) गति मिलती है। तट यज्ञस्थलों से घिरा है; पापी भी वहाँ मरकर स्वर्ग पाते हैं। कपिला और विशल्या को ईश्वर की लोकहितकारी प्राचीन सृष्टि कहा गया है; उपवास व इन्द्रियनिग्रह सहित स्नान अश्वमेध-फल देता है। इस तीर्थ में अनाशक-व्रत सब पाप हरकर शिवधाम देता है, और विशल्या-संगम का एक स्नान पृथ्वी पर समुद्र-पर्यन्त स्नान-दान के फल के तुल्य कहा गया है।

16 verses

Adhyaya 24

Adhyaya 24

Kara–Narmadā Saṅgama Māhātmya (The Glory of the Kara–Narmadā Confluence at Māndhātṛpura)

इस अध्याय में श्री मार्कण्डेय माण्डहातृपुर में कर नदी और नर्मदा (रेवा) के संगम को विशिष्ट तीर्थ बतलाते हैं। वहाँ जाकर संगम-स्नान करना और विष्णु-परायण भक्ति—पूजन, स्मरण तथा प्रायश्चित्त-भाव—से साधना करना शुद्धि का सरल मार्ग कहा गया है। फिर तीर्थ की पवित्रता का कारण बताया जाता है। एक दैत्य के वध हेतु भगवान विष्णु ने चक्र धारण किया; उनके स्वेद से एक उत्तम नदी प्रकट हुई, जो उसी स्थान पर रेवा में मिलकर संगम बनाती है। इसलिए उस संगम में स्नान करने से पाप नष्ट होते हैं और मनुष्य शुद्ध होकर पुण्य का भागी बनता है—यही फलश्रुति है।

4 verses

Adhyaya 25

Adhyaya 25

Revā–Nīlagāṅgā Saṅgama Māhātmya (Confluence Theology and Ritual Fruits)

इस अध्याय में मार्कण्डेय बताते हैं कि ओंकार के पूर्व भाग में एक प्रसिद्ध तीर्थ है, जहाँ रेवा का नीलगंगा से संगम होता है। वहाँ स्नान और जप करने से सांसारिक अभिलाषाएँ सिद्ध होती हैं; इसलिए इस संगम को विशेष कर्मफल देने वाला माना गया है। आगे कहा गया है कि वहाँ की सेवा से मृत्यु के बाद नीलकण्ठपुर में साठ हजार वर्षों तक पवित्र निवास प्राप्त होता है, जिससे उस स्थान का शैव-धाम से संबंध प्रकट होता है। श्राद्ध के समय तिल-मिश्रित जल से पितरों का तर्पण करने पर साधक अपने सहित इक्कीस जनों का उद्धार करता है—फल व्यक्तिगत भी है और वंशगत भी।

4 verses

Adhyaya 26

Adhyaya 26

Jāleśvara Tīrtha-प्रशंसा, Tripura-उपद्रवः, तथा Madhūkā (Lalitā) Vrata-विधानम् | Praise of Jāleśvara, the Tripura crisis, and the Madhūkā vow

इस अध्याय में युधिष्ठिर मार्कण्डेय से पूछते हैं कि पूर्वोक्त जालेश्वर तीर्थ इतना विशिष्ट पुण्य कैसे देता है और सिद्ध‑ऋषियों द्वारा क्यों पूजित है। मार्कण्डेय जालेश्वर को अनुपम तीर्थ बताकर उसका कारण बताते हैं—बाण तथा त्रिपुरा से जुड़े असुर देवों और ऋषियों को सताते हैं। वे पहले ब्रह्मा की शरण जाते हैं; ब्रह्मा कहते हैं कि बाण प्रायः अवध्य है और उसका दमन केवल शिव ही कर सकते हैं। तब देवगण महादेव की स्तुति करते हैं, जिसमें पंचाक्षर, पंचवक्त्र और अष्टमूर्ति‑भाव से शिव‑तत्त्व का वर्णन आता है। शिव संकट हरने का वचन देकर नारद को कार्यसाधक बनाते हैं। नारद त्रिपुरा जाकर “अनेक धर्मों” के माध्यम से भीतर भेद उत्पन्न करने हेतु बाण की तेजस्वी नगरी में सम्मान सहित प्रवेश करते हैं और बाण तथा रानी से संवाद करते हैं। इसके बाद कथा उपदेशात्मक रूप लेती है—स्त्रियों के लिए तिथि‑आधारित व्रत‑दान की विधियाँ बताई जाती हैं; अन्न, वस्त्र, नमक, घी आदि दानों के फल—आरोग्य, सौभाग्य, संतान‑कुल की वृद्धि और मंगल—निर्दिष्ट होते हैं। मुख्य रूप से चैत्र शुक्ल तृतीया से आरम्भ होने वाले मधूका/ललिता व्रत का विधान विस्तार से है—मधूक वृक्ष की प्रतिमा में शिव‑उमा की स्थापना, मंत्रयुक्त अंग‑पूजा, अर्घ्य तथा करक‑दान के मंत्र, मासिक नियम और वर्षांत उद्यापन में गुरु/आचार्य को दान। अंत में फलश्रुति में अनिष्ट‑निवारण, दाम्पत्य‑सौहार्द, समृद्धि तथा धर्मयुक्त शुभ जन्म की प्राप्ति कही गई है।

169 verses

Adhyaya 27

Adhyaya 27

Dāna-viveka and Pati-dharma Assertion (दानविवेकः पतिधर्मप्रतिज्ञा च)

इस अध्याय में नारद के उपदेश सुनकर रानी उन्हें स्वर्ण, रत्न, उत्तम वस्त्र और दुर्लभ वस्तुएँ तक देने को उद्यत होती है। नारद व्यक्तिगत लाभ स्वीकार नहीं करते और दान का विवेक बताते हैं—ऋषि-संत भक्ति से पोषित होते हैं, संग्रह से नहीं; इसलिए दान का प्रवाह क्षीण-वृत्ति, अभावग्रस्त ब्राह्मणों की ओर होना चाहिए। रानी तब वेद-वेदाङ्ग में निपुण निर्धन ब्राह्मणों को बुलाकर नारद की विधि के अनुसार दान करती है और स्पष्ट कहती है कि यह हरि और शंकर की प्रसन्नता हेतु है। इसके बाद वह अपना पतिव्रत दृढ़ करती है—बाण ही उसका एकमात्र देवता है; वह उसके दीर्घायु और जन्म-जन्मांतर तक संग की कामना करती है, साथ ही यह भी बताती है कि उसने नारद की आज्ञा से दान किया। नारद अनुमति देकर चले जाते हैं; उनके जाने पर स्त्रियाँ पीली और तेजहीन, मानो नारद-वचन से मोहित, वर्णित होती हैं—यह प्रसंग ऋषि-संवाद की शक्ति से मनोदशा और सामाजिक परिणाम बदलने का संकेत देता है।

14 verses

Adhyaya 28

Adhyaya 28

दग्धत्रिपुरप्रसङ्गः, बाणस्तोत्रम्, अमरकण्टक-ज्वालेश्वरमाहात्म्यम् (Burning of Tripura, Bāṇa’s Hymn, and the Māhātmya of Amarakāṇṭaka–Jvāleśvara)

मार्कण्डेय कहते हैं कि नर्मदा-तट पर उमा सहित रुद्र विराजमान हैं। वहीं नारद बाण और उसके महल-वैभव का समाचार देते हैं। तब शिव त्रिपुर-विजय का संकल्प कर देवताओं, वेदों, छन्दों और तत्त्वों को रथ के अंगों में नियोजित करके दिव्य विश्व-रथ तथा आयुध-व्यवस्था रचते हैं; तीनों पुर एक साथ आने पर वे बाण छोड़ते हैं और त्रिपुर दग्ध होकर नष्ट हो जाता है। दाह की भयंकरता, अपशकुन और त्रिपुर में समाज-व्यवस्था के विघटन का चित्रण किया गया है। बाण अपने अधर्म और विनाश के कारण को समझकर शिव की शरण में जाता है और दीर्घ स्तोत्र से उन्हें सर्वव्यापी, देवताओं और भूत-तत्त्वों के आधार रूप में स्तुत करता है। शिव का क्रोध शांत होता है; वे बाण को अभय और पद प्रदान करते हैं तथा दाहाग्नि के एक अंश को रोक देते हैं। इसके बाद दग्ध त्रिपुर के ज्वलित खण्डों का संबंध श्रीशैल और अमरकण्टक से जोड़ा जाता है, जिससे ‘ज्वालेश्वर’ नाम का कारण और तीर्थ-यात्रा की महिमा स्थापित होती है। मार्कण्डेय अमरकण्टक में नियत ‘पातन’ साधना का विधान—कृच्छ्र, जप, होम और पूजा—बताते हैं तथा रेवा (नर्मदा) के दक्षिण तट के निकट तीर्थों का वर्णन कर नियमपालन, पितृकर्म और दोष-निवारण पर बल देते हैं।

142 verses

Adhyaya 29

Adhyaya 29

Kāverī–Narmadā Saṅgama Māhātmya (Kubera’s Observance and the Fruits of Tīrtha-Discipline)

यह अध्याय प्रश्न–उत्तर रूप में है। युधिष्ठिर कावेरी नदी की कीर्ति तथा उसके पवित्र प्रसंग में दर्शन, स्पर्श, स्नान, जप, दान और उपवास आदि के निश्चित फलों का स्पष्ट वर्णन पूछते हैं। मार्कण्डेय कावेरी–नर्मदा संगम को सर्वप्रसिद्ध तीर्थ बताकर उसकी शक्ति को एक दृष्टान्त-कथा से सिद्ध करते हैं। कथा में शक्तिशाली यक्ष कुबेर संगम पर दीर्घकाल तक नियमबद्ध तप करता है—शुद्धाचार, महादेव की अनुशासित पूजा, क्रमशः आहार-नियमन, समय-समय पर उपवास और कठोर व्रतों का पालन। शिव प्रकट होकर वर देते हैं; कुबेर यक्षों का अधिपत्य, अचल भक्ति और धर्म में स्थिर बुद्धि माँगता है, जिसे शिव स्वीकार करते हैं। फिर संगम-माहात्म्य की फलश्रुति आती है—यह पापहर, स्वर्ग-प्रदायक, पितरों के हित हेतु दान-तर्पण का विशेष फल देने वाला तथा महायज्ञों के तुल्य पुण्य देने वाला कहा गया है। अमरेश्वर क्षेत्र में क्षेत्रपाल, नदियों के रक्षित योग और नामयुक्त लिंगों का उल्लेख है, तथा यह चेतावनी भी कि इस पवित्र क्षेत्र में किए गए दुष्कर्म अत्यन्त भारी फल देते हैं। अंत में कावेरी की रुद्र-सम्बन्धी पावनता और असाधारण महिमा पुनः प्रतिपादित होती है।

48 verses

Adhyaya 30

Adhyaya 30

Dārutīrtha-māhātmya (The Glory of Dārutīrtha on the Narmadā)

इस अध्याय में संवाद के रूप में मार्कण्डेय, युधिष्ठिर के प्रश्न का उत्तर देते हुए नर्मदा के उत्तरी तट पर स्थित प्रसिद्ध दारुतीर्थ का माहात्म्य बताते हैं। तीर्थ का नाम दारु नामक भार्गव-वंशी, वेद-वेदाङ्ग में निपुण विद्वान ब्राह्मण से जुड़ा है। उसके जीवन का वर्णन आश्रम-क्रम (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ) में होकर अंत में यति-धर्म के अनुरूप कठोर तप और संन्यास-निष्ठा तक पहुँचता है; वह जीवनपर्यन्त महादेव का ध्यान करता रहा, जिससे तीर्थ की कीर्ति त्रिलोकों में फैल गई। इसके बाद विधि बताई गई है—नियमपूर्वक स्नान, पितरों और देवताओं का पूजन। सत्य, क्रोध-निग्रह और प्राणियों का हित—इन गुणों के साथ साधक के प्रयोजन सिद्ध होने का फल कहा गया है। सत्य और शौच से युक्त उपवास तथा ऋग्-साम-यजुर्वेद के पाठ को उत्तम फलदायक बताया गया है। अंत में शंकर के मत के रूप में फलश्रुति है कि जो विधिपूर्वक वहाँ देह त्याग करता है, वह अनावर्त (अनीवर्तिका) गति—अर्थात् पुनर्जन्म से रहित परम पथ—को प्राप्त होता है।

11 verses

Adhyaya 31

Adhyaya 31

ब्रह्मावर्ततीर्थमाहात्म्य — The Glory of the Brahmāvarta Tīrtha

मार्कण्डेय राजश्रोता को ब्रह्मावर्त नामक प्रसिद्ध तीर्थ का माहात्म्य बताते हैं, जो समस्त मलिनताओं का नाश करने वाला कहा गया है। वहाँ ब्रह्मा सदा विराजमान हैं—कठोर तप, नियम-संयम और महेश्वर के ध्यान में निरत। उपदेश है कि विधिपूर्वक स्नान करें, पितरों और देवताओं को तर्पण दें, तथा ईशान (शिव) या विष्णु को परमेश्वर मानकर पूजन करें। इस तीर्थ का प्रभाव ऐसा है कि यथाविधि यज्ञ और दक्षिणा सहित किए गए कर्मों के समान पुण्यफल प्राप्त होता है। साथ ही यह सिद्धान्त कहा गया है कि मनुष्यों के लिए स्थान बिना प्रयत्न के पवित्र नहीं होते; संकल्प, सामर्थ्य और धैर्य से सिद्धि मिलती है, जबकि प्रमाद और लोभ पतन का कारण बनते हैं। अंत में कहा गया—जहाँ आत्मसंयमी मुनि निवास करता है, वह स्थान कुरुक्षेत्र, नैमिष और पुष्कर जैसे महाक्षेत्रों के तुल्य हो जाता है।

11 verses

Adhyaya 32

Adhyaya 32

पत्त्रेश्वरतीर्थमाहात्म्य (Patreśvara Tīrtha Māhātmya)

इस अध्याय में युधिष्ठिर मार्कण्डेय से पूछते हैं कि पापों का नाश करने वाले पत्त्रेश्वर तीर्थ से जुड़ा महान सिद्ध कौन है। मार्कण्डेय बताते हैं कि चित्र (चित्रा) का तेजस्वी पुत्र पत्त्रेश्वर, जिसे ‘जय’ भी कहते हैं, देवसभा में मेनका के नृत्य को देखकर मोहित हो गया और संयम खो बैठा। इन्द्र ने इस पतन को देखकर इन्द्रिय-असंयम की शिक्षा देते हुए उसे दीर्घकाल तक मर्त्य-जीवन भोगने का शाप दिया। शाप-निवारण के लिए उसे नर्मदा (रेवा) तट पर बारह वर्ष तक नियमपूर्वक साधना करने का उपदेश मिला। उसने स्नान, जप, शंकर-पूजन और पंचाग्नि तप आदि कठोर तप किया, तब शिव प्रकट हुए और वर देने को कहा। भक्त ने वर माँगा कि भगवान उसी तीर्थ में उसके नाम से निवास करें; इस प्रकार पत्त्रेश्वर-लिंग की स्थापना हुई और उसकी कीर्ति तीनों लोकों में फैल गई। अंत में फलश्रुति है—एक बार स्नान से पापक्षय, वहाँ पूजन से अश्वमेध-सदृश यज्ञफल, स्वर्ग-सुख, शुभ जन्म, दीर्घायु, रोग-शोक से मुक्ति तथा तीर्थ-जल की स्मृति बनी रहती है।

26 verses

Adhyaya 33

Adhyaya 33

अग्नितीर्थमाहात्म्य — Agnitīrtha Māhātmya (The Glory of Agni-Tīrtha)

मार्कण्डेय युधिष्ठिर को अग्नितीर्थ जाने की विधि बताते हुए यह भी समझाते हैं कि इच्छा और लोक-धर्म के कारण अग्नि किसी स्थान पर ‘सन्निहित’ कैसे हो जाते हैं। कृतयुग में माहिष्मती का राजा दुर्योधन नर्मदा से संबंध रखता है और उससे सुदर्शना नाम की कन्या उत्पन्न होती है। युवती होने पर अग्नि दरिद्र ब्राह्मण का वेश धरकर उसका हाथ माँगते हैं, पर राजा धन-प्रतिष्ठा की असंगति बताकर इंकार कर देता है। इसके बाद यज्ञाग्नि से अग्नि अंतर्धान हो जाते हैं, यज्ञकर्म रुक जाते हैं और ब्राह्मण व्याकुल हो उठते हैं। खोज और तपस्या के पश्चात अग्नि स्वप्न में कारण बताते हैं कि कन्यादान का निषेध ही उनका प्रस्थान है। ब्राह्मण राजा से कहते हैं—यदि कन्या अग्नि को दी जाए तो गृहाग्नि फिर प्रज्वलित होगा। राजा मान जाता है, विवाह होता है और अग्नि माहिष्मती में सदा के लिए प्रकट रहते हैं; इसलिए उस स्थान का नाम ‘अग्नितीर्थ’ प्रसिद्ध होता है। अध्याय में फलश्रुति है—पक्ष-संधि पर स्नान-दान, पितृ व देवताओं को तर्पण-पूजन, स्वर्णदान का फल भूमिदान के समान, तथा उपवास-व्रत से अग्निलोक में सुख-भोग की प्राप्ति। अंत में कहा गया है कि इस तीर्थ का श्रवण मात्र भी पावन और कल्याणकारी है।

46 verses

Adhyaya 34

Adhyaya 34

Āditya’s Manifestation at a Narmadā Tīrtha and the Stated Fruits of Worship (आदित्य-तत्त्व एवं तीर्थफल-प्रशंसा)

इस अध्याय में मार्कण्डेय नर्मदा-तट पर महादित्य की एक और कथा युधिष्ठिर को सुनाते हैं। युधिष्ठिर विस्मित होकर सुनते हैं कि यह देव सर्वव्यापी है और समस्त प्राणियों का उद्धारक है। कुलिक वंश का एक ब्राह्मण-भक्त कठोर तीर्थयात्रा-व्रत करता है—लंबी यात्रा, बिना अन्न के और बहुत कम जल के साथ—तब देव स्वप्न में प्रकट होकर उसे व्रत को संयमित करने की आज्ञा देते हैं और सिद्धान्त बताते हैं कि चल-अचल जगत में वही परमात्मा व्याप्त है। वर मांगने पर भक्त नर्मदा के उत्तर तट पर आदित्य की स्थायी प्रतिष्ठा चाहता है और यह भी प्रार्थना करता है कि दूर से भी जो स्मरण या पूजन करें, उन्हें कृपा और लाभ मिले, तथा जिनके शरीर में दोष या बाधाएँ हों, उन पर विशेष करुणा हो। इसके बाद तीर्थ-फल की प्रशंसा आती है—स्नान और अर्घ्य-दान आदि से अग्निष्टोम यज्ञ के समान पुण्य; और जीवन के अंत में वहाँ किए गए विशेष कर्मों से अग्नि-लोक, वरुण-लोक या स्वर्ग में दीर्घ सम्मान की प्राप्ति बताई गई है। प्रातःकाल भास्कर का नित्य स्मरण जीवनजन्य पापों का नाशक कहा गया है।

25 verses

Adhyaya 35

Adhyaya 35

मेघनादतीर्थ-प्रादुर्भावः (Origin and Merit of Meghnāda Tīrtha)

इस अध्याय में संवाद रूप से कथा आती है। युधिष्ठिर पूछते हैं कि महादेव नर्मदा के जल में बीच धार में क्यों प्रतिष्ठित हैं, तट पर क्यों नहीं। मार्कण्डेय ऋषि कारण बताते हैं। त्रेतायुग में रावण विन्ध्य प्रदेश में दानव मय से मिलता है और उसकी पुत्री मन्दोदरी के घोर तप का समाचार पाकर उसे पत्नी रूप में माँगता है; मय उसे प्रदान करता है और विवाह होता है। उनके यहाँ ऐसा पुत्र जन्मता है जिसकी गर्जना से लोक स्तब्ध हो जाते हैं; ब्रह्मा उसका नाम ‘मेघनाद’ रखते हैं। मेघनाद शङ्कर-उमा की कठोर व्रतों से आराधना करता है और कैलास से दो लिङ्ग लेकर दक्षिण दिशा में चलता है। नर्मदा तट पर स्नान-पूजन के बाद जब वह लिङ्गों को उठाकर लङ्का ले जाना चाहता है, तब एक महान् लिङ्ग नर्मदा में गिरकर मध्यधारा में स्थिर हो जाता है और दिव्य वाणी उसे आगे बढ़ने को कहती है। मेघनाद प्रणाम कर प्रस्थान करता है। तब से यह तीर्थ ‘मेघनादतीर्थ’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ, पहले इसे ‘गर्जन’ कहा जाता था। यहाँ दिन-रात ठहरकर स्नान करने से अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य, पिण्डदान से सत्त्र का फल, षड्रस-भोजन से ब्राह्मण-भोजन कराने पर अक्षय पुण्य, और स्वेच्छा से देहत्याग करने पर प्रलय तक शङ्कर-लोक में निवास प्राप्त होता है।

32 verses

Adhyaya 36

Adhyaya 36

दारुतीर्थमाहात्म्य (Darutīrtha Māhātmya) — Origin Narrative and Pilgrimage Merits

यह अध्याय संवाद-रूप में दारुतीर्थ का माहात्म्य बताता है। युधिष्ठिर के प्रश्न पर मārkaṇḍeya नर्मदा-तट पर स्थित इस श्रेष्ठ तीर्थ की उत्पत्ति-कथा सुनाते हैं। पूर्व प्रसंग में इन्द्र के सारथि मातलि किसी कारण अपने पुत्र को शाप दे देते हैं; शाप से पीड़ित वह इन्द्र की शरण में जाता है। इन्द्र उसे नर्मदा के किनारे दीर्घ तप-निवास का आदेश देकर महेश्वर-भक्ति का उपदेश करते हैं और बताते हैं कि वह आगे चलकर ‘दारुक’ नामक प्रसिद्ध तपस्वी के रूप में जन्म लेगा; साथ ही शङ्ख-चक्र-गदा-धारी परम देव की भक्ति से सिद्धि और शुभ गति पाएगा। आगे तीर्थ-सेवन की विधि और फल कहा गया है। जो यात्री विधिपूर्वक स्नान कर संध्या करे, शिव-पूजन करे और वेदाध्ययन करे, उसे अश्वमेध यज्ञ के तुल्य महान पुण्य मिलता है। ब्राह्मणों को भोजन कराना अत्यन्त फलदायी है, और स्नान, दान, जप, होम, स्वाध्याय तथा देव-पूजा जैसे कर्म शुद्ध भाव से किए जाएँ तो पूर्ण फल देते हैं।

19 verses

Adhyaya 37

Adhyaya 37

देवतीर्थमाहात्म्यम् (Devatīrtha Māhātmya: The Glory of Devatīrtha on the Narmadā)

इस अध्याय में मुनि मार्कण्डेय युधिष्ठिर से नर्मदा-तट के ‘देवतीर्थ’ का अनुपम माहात्म्य कहते हैं। वे बताते हैं कि वहाँ स्नान करने से तैंतीस देवताओं ने परम सिद्धि पाई; यह सुनकर युधिष्ठिर पूछते हैं कि शक्तिशाली दैत्यों से पराजित देवता उस तीर्थ में स्नान करके फिर कैसे सफल हुए। तब ऋषि कहते हैं कि इन्द्र आदि देव युद्ध में हारकर, दुःखी और परिवार से बिछुड़कर ब्रह्मा की शरण में गए। ब्रह्मा ने उन्हें उपदेश दिया कि दैत्यों का प्रतिकार करने का सर्वोच्च बल ‘तप’ है; नर्मदा के किनारे तप करो। रेवाजल के समान पाप-नाशक और शुद्धि देने वाला न कोई मंत्र है, न कोई कर्म। अग्नि के नेतृत्व में देव नर्मदा पर जाकर दीर्घ तप करते हैं और सिद्धि प्राप्त करते हैं; तभी से वह स्थान तीनों लोकों में ‘देवतीर्थ’ नाम से सर्वपापहर प्रसिद्ध हुआ। अध्याय में आचार और फल भी बताए गए हैं—संयमी व्यक्ति जो श्रद्धा से वहाँ स्नान करे, उसे मोती-सदृश फल मिलता है; ब्राह्मण-भोजन से पुण्य अनेक गुना बढ़ता है; देवशिला की उपस्थिति से पुण्य-वृद्धि होती है। कुछ मृत्यु-संबंधी व्रत/आचरण (संन्यास-मरण, अग्नि-प्रवेश आदि) को स्थायी या उच्च गति से जोड़ा गया है। इस तीर्थ में स्नान, जप, होम, स्वाध्याय और पूजा के फल अक्षय कहे गए हैं। अंत में फलश्रुति है कि इस पापहर कथा का पाठ या श्रवण करने वाले दुःख से मुक्त होकर दिव्य लोक को जाते हैं।

23 verses

Adhyaya 38

Adhyaya 38

गुहावासी-नर्मदेश्वर-उत्पत्ति (Guhāvāsī and the Origin of Narmadeśvara)

इस अध्याय में युधिष्ठिर मर्कण्डेय से पूछते हैं कि जगद्गुरु महादेव ने दीर्घकाल तक गुहा में निवास क्यों किया। मर्कण्डेय कृतयुग के दारुवन-आश्रम का प्रसंग कहते हैं, जहाँ सभी आश्रमों के अनुशासित तपस्वी रहते थे। उमा के आग्रह से शिव कापालिक-सदृश वेश (जटा, भस्म, व्याघ्रचर्म, कपाल-पात्र, डमरू) धारण कर वन में प्रवेश करते हैं, जिससे आश्रम की स्त्रियों के मन विचलित हो जाते हैं। ऋषि लौटकर यह विक्षोभ देखकर एकत्र होकर सत्य-प्रयोग करते हैं, जिससे शिव का लिङ्ग गिर पड़ता है और जगत में भारी उत्पात फैलता है। देवता ब्रह्मा की शरण लेते हैं; ऋषि शिव को ब्राह्मण-तप और क्रोध की शक्ति समझाते हैं, फिर मेल-मिलाप और पुनः प्रतिष्ठा होती है। इसके बाद शिव नर्मदा-तट पर ‘गुहावासी’ व्रत धारण कर वहाँ लिङ्ग की स्थापना करते हैं, जो नर्मदेश्वर कहलाता है। अंत में तीर्थ-विधि और फलश्रुति दी गई है—स्नान, पूजन, पितृतर्पण, ब्राह्मण-भोजन, दान, विशेष तिथियों में उपवास आदि से निश्चित फल और संरक्षण मिलता है; श्रद्धा से पाठ या श्रवण करने पर भी स्नान का पुण्य प्राप्त होता है।

77 verses

Adhyaya 39

Adhyaya 39

कपिलातीर्थमाहात्म्य (Kapilā-tīrtha Māhātmya: The Glory and Origin of Kapilā Tīrtha)

इस अध्याय में युधिष्ठिर नर्मदा (रेवा) तट पर स्थित कपिला-तीर्थ का माहात्म्य और उत्पत्ति पूछते हैं, और ऋषि मार्कण्डेय उसका वर्णन करते हैं। आरम्भ में फलश्रुति कही गई है कि कपिला-तीर्थ में श्रद्धा से किया गया स्नान मात्र भी संचित मलिनता और पापों का क्षय करता है। कृतयुग के आरम्भ में ब्रह्मा ध्यान-यज्ञ में स्थित थे। तभी एक प्रज्वलित कुण्ड से तेजोमयी, अग्नि-स्वरूपा कपिला प्रकट हुई। ब्रह्मा ने उन्हें अनेक देव-शक्तियों तथा काल-मानों के रूप में सर्वव्यापिनी मानकर स्तुति की। प्रसन्न होकर कपिला ने ब्रह्मा का प्रयोजन पूछा; ब्रह्मा ने लोक-कल्याण हेतु उन्हें दिव्य लोक से मर्त्य लोक में उतरने की आज्ञा दी। कपिला पवित्र नर्मदा के तट पर आईं, तप किया और वहीं इस तीर्थ की स्थायी प्रतिष्ठा हुई। इसके बाद युधिष्ठिर के प्रश्न पर कपिला के शरीर में लोकों और देवताओं की स्थिति का वर्णन आता है—पीठ पर लोक, मुख में अग्नि, जिह्वा पर सरस्वती, नासिका-प्रदेश में वायु, ललाट पर शिव आदि। गृहस्थों द्वारा कपिला की पूजा, प्रदक्षिणा, अर्पण, स्नान-व्रत, उपवास और पितृतर्पण को पुण्यदायक बताया गया है, जिसका फल पूर्वजों और वंशजों तक फैलता है। अंत में इस कथा का श्रवण भी शुद्धिकारक कहा गया है।

39 verses

Adhyaya 40

Adhyaya 40

Karañjeśvara Tīrtha Māhātmya (करञ्जेश्वरतीर्थमाहात्म्य) / The Glory of the Karañjeśvara Pilgrimage-Site

इस अध्याय में युधिष्ठिर के प्रश्न पर मार्कण्डेय करञ्जेश्वर तीर्थ से जुड़े एक महान सिद्ध का चरित्र बताते हैं। कथा कृतयुग की वंश-परंपरा से आरम्भ होती है—मानसपुत्र मरीचि, फिर कश्यप, और दक्ष की कन्याएँ (अदिति, दिति, दनु आदि)। दनु के वंश में करञ्ज नामक दैत्य उत्पन्न हुआ, जो शुभ लक्षणों से युक्त था और नर्मदा-तट पर दीर्घकाल तक नियम, संयमित आहार और कठोर तप करता रहा। उसके तप से प्रसन्न होकर त्रिपुरान्तक शिव उमा सहित प्रकट हुए और वरदान दिया। करञ्ज ने वर माँगा कि उसकी संतति धर्मपरायण हो। देव के अंतर्धान होने पर करञ्ज ने अपने नाम से शिव-लिंग/मंदिर की स्थापना की, जो करञ्जेश्वर कहलाया। इसके बाद फलश्रुति आती है—इस तीर्थ में स्नान से पाप नष्ट होते हैं; पितरों को अर्पण करने से अग्निष्टोम यज्ञ के समान पुण्य मिलता है; उपवास आदि तप से रुद्रलोक की प्राप्ति होती है। यहाँ अग्नि या जल में मृत्यु को शिवधाम में दीर्घ निवास तथा आगे विद्या, आरोग्य और समृद्धि से युक्त शुभ जन्म का कारण कहा गया है। अंत में श्रवण-पाठ और विशेषतः श्राद्ध-काल में इसका पाठ अक्षय पुण्य देने वाला बताया गया है।

27 verses

Adhyaya 41

Adhyaya 41

कुण्डलेश्वरतीर्थमाहात्म्य (Kundaleśvara Tīrtha Māhātmya)

इस अध्याय में ऋषि–राज संवाद के रूप में मार्कण्डेय युधिष्ठिर को कुण्डलेश्वर तीर्थ की महिमा बताते हैं। त्रेतायुग में पुलस्त्यवंशी विश्रवा ने महान तप किया और धनद (वैश्रवण/कुबेर) को उत्पन्न किया, जिसे धन का अधिपति और लोकपाल नियुक्त किया गया। उसी वंश में यक्ष कुण्ड/कुण्डल का प्रादुर्भाव हुआ। कुण्डल ने माता–पिता की अनुमति लेकर नर्मदा तट पर कठोर तप किया—धूप, वर्षा, शीत सहना, प्राणसंयम और दीर्घ उपवास। वृषवाहन शिव प्रसन्न होकर वर देते हैं कि वह अजेय गण बने और यक्षाधिप के अनुग्रह से सर्वत्र स्वेच्छा से विचरे। शिव के कैलास चले जाने पर कुण्डल वहाँ लिङ्ग की स्थापना कर उसे ‘कुण्डलेश्वर’ नाम से पूजता, अलंकार करता और ब्राह्मणों को अन्न व दान देकर सम्मानित करता है। अंत में फलश्रुति है—इस तीर्थ में उपवास व पूजा से पाप नष्ट होते हैं; दान से स्वर्गसुख मिलता है; स्नान करके एक भी ऋचा का पाठ करने से पूर्ण फल प्राप्त होता है; और गोदान करने वाले को गाय के रोओं की संख्या के समान दीर्घ स्वर्गवास होकर अंततः महेश के लोक की प्राप्ति होती है।

30 verses

Adhyaya 42

Adhyaya 42

पिप्पलादचरितं पिप्पलेश्वरतीर्थमाहात्म्यं च | Pippalāda’s Account and the Māhātmya of Pippaleśvara Tīrtha

युधिष्ठिर के प्रश्न पर मार्कण्डेय मुनि पिप्पलेश्वर से जुड़ी उत्पत्ति-कथा सुनाते हैं। कथा का आरम्भ याज्ञवल्क्य के तप और गृहधर्म से सम्बन्धित एक कठिन प्रसंग से होता है—उनकी विधवा बहन के कारण उत्पन्न उलझन में एक बालक जन्म लेता है और उसे अश्वत्थ (पिप्पल) वृक्ष के नीचे छोड़ दिया जाता है। वही बालक पिप्पलाद नाम से जीवित रहकर बढ़ता है। आगे शनैश्चर (शनि) पिप्पलाद के क्रोध से भयभीत होकर क्षमा और मुक्ति की याचना करता है; तब यह मर्यादा ठहरती है कि शनि सोलह वर्ष तक के बालकों को विशेष रूप से पीड़ित नहीं करेगा—यह नियम कथा-संवाद के रूप में स्थापित होता है। फिर पिप्पलाद के रोष से याज्ञवल्क्य के विनाश हेतु एक भयंकर कृत्या उत्पन्न होती है। मुनि क्रमशः अनेक दिव्य लोकों में शरण लेते हुए अन्ततः शिव की शरण में पहुँचते हैं, जहाँ शिव संरक्षण देकर संकट का समाधान करते हैं। पिप्पलाद नर्मदा-तट पर कठोर तप करता है, तीर्थ में शिव के स्थायी निवास की प्रार्थना करता है और शिव-पूजा की स्थापना करता है। अध्याय के अन्त में तीर्थ-यात्रा के व्यावहारिक विधान—स्नान, तर्पण, ब्राह्मण-भोजन और शिव-पूजा—बताए गए हैं। पुण्य-फल का स्पष्ट वर्णन (अश्वमेध-सम तुल्य फल सहित) तथा पाठ/श्रवण से पाप-नाश और दुष्ट स्वप्नों से मुक्ति की फलश्रुति भी कही गई है।

74 verses

Adhyaya 43

Adhyaya 43

Vimalēśvara–Puṣkariṇī–Dīvakara-japa and Revā/Narmadā Purificatory Doctrine (विमलेश्वर-तीर्थमाहात्म्यं तथा दिवाकरजपः)

इस अध्याय में मार्कण्डेय युधिष्ठिर को तीर्थ-सेवा का क्रम और उसका फल बताते हैं। पहले विमलेश्वर तीर्थ का निर्देश है, जहाँ देवताओं द्वारा निर्मित ‘देवशिला’ का वर्णन आता है। वहाँ स्नान और ब्राह्मण-सत्कार से, छोटे दान से भी अक्षय पुण्य प्राप्त होता है। फिर शुद्धि हेतु सुवर्ण, रजत, ताम्र, रत्न-मोती, भूमि और गौ-दान आदि की प्रशंसा की गई है। आगे फलश्रुति में कहा है कि उस तीर्थ में देहत्याग करने से प्रलय तक रुद्रलोक में वास मिलता है; और उपवास, अग्नि या जल द्वारा नियमपूर्वक प्राणत्याग को परम अवस्था का साधन बताया गया है। इसके बाद शुद्ध करने वाली पुष्करिणी में सूर्य-भक्ति और जप का विधान है—एक ऋचा या एक अक्षर मात्र का जप भी वैदिक फल देता है और मल-कलुष दूर करता है; विधिपूर्वक करने पर पुण्य कोटि-गुणा बढ़ता है। उत्तरार्ध में चारों वर्णों के लिए अन्त्यकाल की नीति—काम-क्रोध का संयम, शास्त्रानुसार आचरण और देव-सेवा—समझाई गई है; विचलन से नरक और हीन योनियों की प्राप्ति कही गई है। अंत में रेवा़/नर्मदा की रुद्र-सम्भूता, सर्वतारिणी महिमा का प्रतिपादन है और प्रातः उठकर भूमिस्पर्श करके जपने योग्य एक संक्षिप्त नित्य-मंत्र दिया गया है, जो नदी को पापहरिणी और शुद्धिदायिनी मानकर प्रणाम करता है।

34 verses

Adhyaya 44

Adhyaya 44

शूलभेदतीर्थमाहात्म्य (Śūlabheda Tīrtha Māhātmya) — The Glory of the Śūlabheda Pilgrimage-Site

इस अध्याय में युधिष्ठिर के मोक्ष-सम्बन्धी प्रश्न पर मārkaṇḍeya उपदेश देते हैं। रेवā के दक्षिण तट पर भृगु-पर्वत के शिखर पर शूलपाणि शिव द्वारा स्थापित परम तीर्थ “शूलभेद” का वर्णन है, जो त्रिलोकी में प्रसिद्ध है। इसके कीर्तन और दर्शन से वाणी, मन और शरीर के दोष दूर होते हैं; पाँच क्रोश की पवित्र परिधि बताकर इसे भुक्ति और मुक्ति देने वाला कहा गया है। इसके बाद जल-पुराणकथा आती है—पाताल की भोगवती से सम्बद्ध गङ्गा-धारा शूल के ‘भेदन’ से प्रकट होकर पापहन्त्री बनती है। शूल से शिला-भेद होने पर सरस्वती के एक कुण्ड में गिरने का प्रसंग “प्राचीन-अघ-विमोचनी” के रूप में कहा गया है। केदार, प्रयाग, कुरुक्षेत्र, गया आदि तीर्थों की तुलना में भी शूलभेद की महिमा अधिक बताई गई है। श्राद्ध में पिण्ड और तिलोदक-दान, तीर्थजल का नियमित पान, कपट और क्रोध त्यागकर योग्य ब्राह्मणों का सम्मान, तथा तेरह दिनों के दान से बढ़े हुए पुण्य का विधान है। गणनाथ/गजानन के दर्शन, कंबलक्षेत्रप का वन्दन, फिर शूलपाणि महादेव, उमा और गुहा-निवासी मार्कण्डेयेश का पूजन बताया गया है। गुहा में प्रवेश कर “त्र्यक्षर” मन्त्र-जप से नीलपर्वत के पुण्य का अंश मिलता है; स्थान को सर्वदेवमय और कोटिलिङ्ग से युक्त कहा गया है। स्नान के समय लिङ्ग में स्फुलिंग या गति दिखना और तेल की बूँद का न फैलना—ये प्रभाव के प्रमाण हैं। अंत में इसे अत्यन्त गोपनीय, सर्वपापहारी बताकर प्रतिदिन तीन बार शूलभेद का श्रवण-स्मरण करने से भीतर-बाहर शुद्धि का फल कहा गया है।

34 verses

Adhyaya 45

Adhyaya 45

अन्धकस्य रेवातटे तपोवरप्राप्तिः (Andhaka’s Austerity on the Revā Bank and the Granting of a Boon)

मार्कण्डेय मुनि स्मरण कराते हैं कि पहले राजा उत्तानपाद ने देवर्षियों की सभा में महेश्वर से एक अत्यन्त गुप्त और परम पुण्यदायक तीर्थ के विषय में प्रश्न किया था—“शूलभेद” की उत्पत्ति क्या है और उस स्थान की महिमा क्यों है। तब ईश्वर दैत्य अन्धक का प्रसंग कहते हैं, जो अपार बल और गर्व से युक्त होकर निर्विरोध राज्य करता था। अन्धक महादेव को प्रसन्न करने के लिए रेवा-तट पर जाकर सहस्रों वर्षों तक क्रमशः बढ़ती हुई चार अवस्थाओं में तप करता है—पहले उपवास, फिर केवल जल, फिर धूम्र-आहार, और अंत में दीर्घ योग-साधना; यहाँ तक कि वह अस्थि और चर्म मात्र रह जाता है। उसके तप का प्रभाव कैलास तक पहुँचता है; उमा इस अभूतपूर्व कठोरता पर प्रश्न करती हैं और शीघ्र वरदान देने की उचितता पर विचार रखती हैं। शिव उमा सहित वहाँ पहुँचकर वर देने को कहते हैं। अन्धक सभी देवताओं पर विजय माँगता है; शिव इसे अनुचित कहकर अस्वीकार करते हैं और अन्य वर माँगने को कहते हैं। अन्धक निराश होकर गिर पड़ता है; उमा समझाती हैं कि भक्त की उपेक्षा से शिव की ‘भक्त-रक्षा’ की कीर्ति को आघात होगा। तब एक मध्यम मार्ग का वर निश्चित होता है—अन्धक विष्णु को छोड़कर सभी देवों को जीत सकेगा, पर शिव पर विजय नहीं पा सकेगा। पुनर्जीवित होकर अन्धक वर स्वीकार करता है और शिव कैलास लौटते हैं; यह प्रसंग तीर्थ-शिक्षा के रूप में तप, इच्छा और वर-नियमन का रहस्य बताता है।

42 verses

Adhyaya 46

Adhyaya 46

अन्धकस्य स्वपुरप्रवेशः स्वर्गागमनं च (Andhaka’s Return, Ascent to Heaven, and the Abduction of Śacī)

मार्कण्डेय बताते हैं कि शम्भु के वर से बलवान दैत्य अन्धक अपने नगर लौटता है। नगर में महोत्सव होता है—चौक-चौराहे सजते हैं, उद्यान, सरोवर और देवालय शोभित होते हैं; वेदपाठ, मंगल-ध्वनि, दान और सामूहिक उल्लास से पूरा पुर आनंदित हो उठता है। अन्धक कुछ समय तक ऐश्वर्य में निवास करता है। फिर देवताओं को ज्ञात होता है कि वरदान के कारण वह अजेय हो गया है। वे सब वासव (इन्द्र) की शरण में जाकर विचार करते हैं। उधर अन्धक अकेला ही मेरु की दुर्गम ऊँचाइयों पर चढ़कर इन्द्र के दुर्ग में ऐसे प्रवेश करता है मानो वह उसका अपना राज्य हो। भयभीत इन्द्र स्वर्ग का रक्षक न पाकर अतिथि-सत्कार करता है और अन्धक की माँग पर दिव्य वैभव दिखाता है—ऐरावत, उच्चैःश्रवा, उर्वशी आदि अप्सराएँ, पारिजात के पुष्प और गान-वाद्य। रंगभूमि में नृत्य-गान के बीच अन्धक की दृष्टि शची पर टिक जाती है; वह इन्द्र-पत्नी को बलपूर्वक हर लेता है। इससे युद्ध छिड़ता है और अन्धक की एकाकी शक्ति से देवता पराजित होते हैं—यह दिखाते हुए कि वर-बल जब अनियंत्रित कामना और दमन से जुड़ता है तो लोक-व्यवस्था डगमगा जाती है।

39 verses

Adhyaya 47

Adhyaya 47

अन्धकविघ्ननिवेदनम् — The Devas Seek Refuge from Andhaka

इस अध्याय में मार्कण्डेय मुनि देवताओं की आपत्ति का वृत्तान्त कहते हैं। इन्द्र के नेतृत्व में देवगण दिव्य विमानों से ब्रह्मलोक पहुँचकर ब्रह्मा को दण्डवत् प्रणाम करते हैं, स्तुति करते हैं और अपना दुःख निवेदित करते हैं—बलवान असुर अन्धक ने उन्हें पराजित कर धन-रत्न छीन लिए तथा इन्द्र की पत्नी को भी बलपूर्वक हर लिया, जिससे देवता अत्यन्त अपमानित हुए। ब्रह्मा विचार करके बताते हैं कि अन्धक देवताओं के लिए ‘अवध्य’ है, अर्थात् पूर्व वरदान या दैवी नियम के कारण उसका वध उनके द्वारा सहज नहीं हो सकता। तब देवता ब्रह्मा के साथ केशव/जनार्दन विष्णु की शरण में जाते हैं, स्तोत्रों से उनकी आराधना कर पूर्ण समर्पण करते हैं। विष्णु देवों का सत्कार कर कारण पूछते हैं और सब सुनकर प्रतिज्ञा करते हैं कि दुष्ट अन्धक जहाँ भी हो—पाताल, पृथ्वी या स्वर्ग—मैं उसका वध करूँगा। वे शंख, चक्र, गदा और धनुष धारण कर उठते हैं, देवताओं को आश्वस्त करते हैं और उन्हें अपने-अपने धाम लौटने का आदेश देते हैं; इस प्रकार दिव्य संरक्षण और धर्म-स्थापन की प्रतिज्ञा के साथ अध्याय समाप्त होता है।

23 verses

Adhyaya 48

Adhyaya 48

अन्धकस्य विष्णुस्तुतिः शिवयुद्धप्राप्तिः च (Andhaka’s Hymn to Viṣṇu and the Provocation of Śiva for Battle)

अध्याय में राजा के पूछने पर महादेव बताते हैं कि देवताओं को दबाने के बाद अन्धक पाताल में जाकर विनाशकारी कर्म कर रहा है। केशव धनुष लेकर आते हैं और आग्नेय अस्त्र चलाते हैं; अन्धक प्रबल वारुण अस्त्र से प्रत्युत्तर देता है। बाण के मार्ग से ही अन्धक प्रकट होकर जनार्दन को ललकारता है, पर निकट युद्ध में परास्त होकर वह संघर्ष छोड़ ‘साम’ का आश्रय लेता है और विष्णु की दीर्घ स्तुति करता है—नृसिंह, वामन, वराह आदि रूपों का स्मरण कर उनकी करुणा का गुणगान करता है। विष्णु प्रसन्न होकर वर देते हैं। अन्धक शुद्धि देने वाला, यशस्वी युद्ध माँगता है जिससे उसे उच्च लोकों की प्राप्ति हो। विष्णु स्वयं युद्ध से इनकार कर उसे महादेव के पास भेजते हैं और कहते हैं कि कैलास-शिखर को हिलाकर शिव का क्रोध जगाओ। अन्धक ऐसा करता है; जगत में कम्पन और अपशकुन उठते हैं, उमा पूछती हैं, और शिव अपराधी से युद्ध का निश्चय करते हैं। देवगण दिव्य रथ सजाते हैं; शिव प्रस्थान करते हैं और महायुद्ध छिड़ता है, जहाँ आग्नेय, वारुण, वायव्य, सर्प, गारुड़, नारसिंह आदि अस्त्र एक-दूसरे को शांत करते जाते हैं। अंत में बाहुयुद्ध में शिव क्षणभर जकड़े जाते हैं, फिर संभलकर अन्धक को महाशस्त्र से घायल कर शूल पर चढ़ा देते हैं। उसके रक्त-बिन्दुओं से नए दानव उत्पन्न होने लगते हैं; तब शिव दुर्गा/चामुण्डा को बुलाते हैं, जो गिरता रक्त पीकर वृद्धि रोकती हैं। संकट थमने पर अन्धक शिव की स्तुति करता है और शिव उसे वर देकर अपने गणों में भृङ्गीश के रूप में स्थान देते हैं—वैर से भक्ति और अनुशासन की ओर परिवर्तन।

90 verses

Adhyaya 49

Adhyaya 49

Śūlabheda Tīrtha-Māhātmya (The Glory of the Śūlabheda Pilgrimage Site)

मार्कण्डेय कहते हैं कि अन्धक का वध करके महादेव उमा सहित कैलास लौटे। वहाँ देवगण एकत्र हुए और शिव ने उन्हें बैठने का आदेश दिया। शिव ने बताया कि दैत्य के नाश के बाद भी उनका त्रिशूल रक्त-मल से कलुषित है और केवल सामान्य व्रत-नियमों से शुद्ध नहीं होता; इसलिए वे देवताओं के साथ क्रमबद्ध तीर्थ-यात्रा का संकल्प करते हैं। प्रभास से गङ्गासागर तक अनेक तीर्थों में स्नान करने पर भी इच्छित शुद्धि न मिलने से वे रेवातट (नर्मदा) पर आते हैं, दोनों तटों पर स्नान कर भृगु-संबद्ध पर्वत पर थककर ठहरते हैं और वहाँ एक अत्यन्त रमणीय, विधि-विशिष्ट स्थान को पहचानते हैं। शिव उस पर्वत को त्रिशूल से भेदकर नीचे तक दरार उत्पन्न करते हैं; तभी त्रिशूल निर्मल दिखाई देता है और ‘शूलभेद’ तीर्थ की शुद्धिकारक महिमा स्थापित होती है। पर्वत से पुण्यरूपा सरस्वती प्रकट होकर दूसरा संगम बनाती हैं, जिसकी उपमा प्रयाग के श्वेत-श्याम संगम से दी गई है। ब्रह्मा दुःखनाशक ब्रह्मेश/ब्रह्मेश्वर लिङ्ग की स्थापना करते हैं और विष्णु के दक्षिण भाग में नित्य निवास का वर्णन आता है। इसके बाद तीर्थ-भूगोल बताया गया है—त्रिशूल की नोक से खिंची रेखा जल-धारा को मार्ग देती है जो रेवामें मिलती है; ‘जल-लिङ्ग’ तथा आवर्तयुक्त तीन कुण्डों का भी वर्णन है। स्नान के नियम, मन्त्र-विकल्प (दशाक्षरी तथा वैदिक मन्त्र), वर्णों और स्त्री-पुरुषों की प्रक्रिया-आधारित पात्रता, तथा स्नान के साथ तर्पण, श्राद्ध-सदृश कर्म और दान का संबंध बताया गया है। विनायक और क्षेत्रपाल रक्षक हैं; आचरण-विरुद्ध जनों को विघ्न होते हैं—यात्रा को नैतिक अनुशासन कहा गया है। फलश्रुति में शूलभेद में विधिपूर्वक कृत कर्मों से पाप-क्षय, दोष-शमन और पितरों का उद्धार प्रतिपादित है।

49 verses

Adhyaya 50

Adhyaya 50

द्विजपात्रता-दानविधि-तीर्थश्राद्धकन्यादानोपदेशः (Eligibility of Brahmins, Ethics of Dāna, Tīrtha-Śrāddha, and Guidance on Kanyādāna)

इस अध्याय में उत्तानपाद और ईश्वर के संवाद के माध्यम से दान‑पूजा में पात्रता का निर्णय बताया गया है। उदाहरण देकर कहा गया है कि जो ब्राह्मण वेदाध्ययन से रहित (अनधीयान/अनृच) है, वह केवल नाम का द्विज है; ऐसे अपात्र को किया गया सत्कार और दान कर्मफल नहीं देता। फिर आचार‑विचार, यज्ञकर्म और सामाजिक मर्यादा के विरुद्ध अनेक दोषों की सूची देकर यह सिद्धान्त स्थापित किया गया है कि अपात्र को दिया दान निष्फल हो जाता है। इसके बाद तीर्थ‑श्राद्ध की विधि आती है—गृह‑श्राद्ध के बाद शुद्धि, सीमा‑नियमों का पालन, निर्दिष्ट तीर्थ‑स्थान तक यात्रा, स्नान, और अनेक स्थलों पर श्राद्ध करना; पायस, मधु, घृत सहित पिण्ड‑अर्पण आदि का विधान बताया गया है। फलश्रुति में पितरों की दीर्घकाल तृप्ति तथा जूते, शय्या, घोड़ा, छत्र, धान्य सहित गृह, तिलधेनु, जल‑अन्न आदि दानों के अनुसार स्वर्गफल का क्रम बताया गया है, विशेषकर अन्नदान की महिमा पर बल है। अंत में कन्यादान का उपदेश है—दानों में इसकी श्रेष्ठता, कुलीन‑शीलवान‑विद्वान वर को ही पात्र मानना, विवाह में धन लेकर संबंध तय करने की निन्दा, तथा दान के प्रकार (अयाचित, आमंत्रित, याचित) बताए गए हैं। अक्षम को दान न देने और अपात्र द्वारा दान ग्रहण न करने की चेतावनी के साथ अध्याय पूर्ण होता है।

47 verses

Adhyaya 51

Adhyaya 51

Śrāddha-kāla-nirṇaya, Viṣṇu-jāgaraṇa, and Markaṇḍeśvara-guhā-liṅga Māhātmya (Ritual Timing and Cave-Shrine Observances)

अध्याय संवाद-रूप में है। उत्तानपाद ईश्वर से पूछते हैं कि श्राद्ध, दान और तीर्थयात्रा कब करनी चाहिए। ईश्वर मासों के अनुसार शुभ श्राद्ध-काल बताते हैं—विशिष्ट तिथियाँ, अयन-संधि, अष्टका, संक्रांति, व्यतीपात और ग्रहण आदि—और कहते हैं कि इन अवसरों पर दिया गया दान अक्षय फल देता है। फिर भक्ति-नियम आते हैं: मधु-मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को उपवास, विष्णु के चरणों के निकट रात्रि-जागरण, धूप-दीप-नैवेद्य-माल्य से पूजन, तथा पूर्व पवित्र कथाओं का पाठ/श्रवण। वैदिक सूक्त-जप को पवित्र करने वाला और मोक्षदायक कहा गया है। प्रातःकाल श्रद्धा से श्राद्ध, ब्राह्मणों का आदर, और सामर्थ्य के अनुसार सुवर्ण, गौ, वस्त्र आदि का दान करने से पितरों की दीर्घ तृप्ति बताई गई है। इसके बाद तीर्थ-क्रम में त्रयोदशी को गुहा-स्थित लिंग के दर्शन का विधान है, जिसे मार्कण्डेय ऋषि ने कठोर तप और योग-साधना के बाद ‘मार्कण्डेश्वर’ रूप में स्थापित किया। वहाँ स्नान, उपवास, इन्द्रिय-निग्रह, जागरण, दीप-दान, पंचामृत/पंचगव्य से अभिषेक और विस्तृत मंत्र-जप (सावित्री-जप की गणना सहित) का निर्देश है; पात्र-परीक्षा पर विशेष बल है। अष्ट-पुष्प रूप ‘मानसिक’ अर्पण—अहिंसा, इन्द्रिय-निग्रह, दया, क्षमा, ध्यान, तप, ज्ञान, सत्य—को श्रेष्ठ पूजा कहा गया है। अंत में वाहन, धान्य, कृषि-उपकरण आदि दानों, विशेषतः गो-दान, और ग्रहण-काल में अतुल पुण्य का वर्णन है; जहाँ गौ दिखे वहाँ सभी तीर्थ उपस्थित माने गए हैं, और तीर्थ-स्मरण/पुनरागमन या वहाँ देहांत को रुद्र-सामीप्य का कारण कहा गया है।

62 verses

Adhyaya 52

Adhyaya 52

Dīrghatapā-āśrama and the Account of Ṛkṣaśṛṅga (दीर्घतपा-आश्रमः तथा ऋक्षशृङ्गोपाख्यानप्रस्तावः)

अध्याय 52 में ईश्वर एक पूर्ववृत्त का संकेत करते हैं—एक महान तपस्वी अपने परिवार सहित स्वर्ग को प्राप्त हुआ—इसे सुनकर राजा उत्तानपाद उस कथा को विस्तार से पूछते हैं। इसके बाद वर्णन काशी की ओर मुड़ता है: राजा चित्रसेन के शासन में वाराणसी की समृद्धि, वेदपाठ की गूंज, बाजारों का वैभव, तथा देवालयों और आश्रमों की बहुलता का चित्रण किया गया है। नगर के उत्तर में मन्दारवन के भीतर एक प्रसिद्ध आश्रम बताया जाता है। वहाँ ब्राह्मण तपस्वी दीर्घतपा कठोर तप के लिए विख्यात हैं, और यह भी दिखाया गया है कि तपस्या गृहस्थ-व्यवस्था के साथ भी निभाई जा सकती है—वे पत्नी, पुत्र और पुत्रवधू के साथ रहते हैं तथा पाँच पुत्र उनकी सेवा करते हैं। सबसे छोटे ऋक्षशृंग वेदज्ञ, ब्रह्मचारी, सदाचारी, योगनिष्ठ और अल्पाहारी हैं। एक विशेष प्रसंग में वे मृगरूप धारण कर हिरणों के झुंड के साथ विचरते हैं, फिर भी प्रतिदिन माता-पिता की वंदना कर सेवा करते हैं—तप और पितृभक्ति का अनुशासन साथ-साथ चलता है। अंत में दैवयोग से ऋक्षशृंग का देहांत हो जाता है, जिससे आगे भाग्य, पुण्य और परलोक-गति पर विचार का प्रसंग स्थापित होता है।

18 verses

Adhyaya 53

Adhyaya 53

चित्रसेन-ऋक्षशृङ्गसंवादः (King Citrasena and Sage Ṛkṣaśṛṅga: Accidental Injury and Ethical Remediation)

ईश्वर उत्तानपाद से कहते हैं कि इस कथा को श्रद्धा से सुनने पर पाप का शोधन होता है। काशी के धर्मात्मा, पराक्रमी राजा चित्रसेन अनेक मित्र राजाओं के साथ शिकार को निकले; वन में धूल और कोलाहल के कारण वे दल से बिछुड़ गए। भूख-प्यास से व्याकुल होकर वे एक दिव्य सरोवर पर पहुँचे, स्नान किया, पितरों और देवताओं को तर्पण दिया तथा कमलों से शंकर की पूजा की। वहीं उन्होंने अनेक मृगों को विचित्र ढंग से बैठे देखा और उनके बीच महातपस्वी ऋक्षशृंग को। इसे शिकार का अवसर समझकर राजा ने बाण चलाया, जो अनजाने में ऋषि को लग गया। ऋषि ने मानव-वाणी में कहा; राजा स्तब्ध होकर अपना अनिच्छित अपराध स्वीकार करता है और ब्रह्महत्या को अत्यन्त भारी मानकर आत्मदाह को प्रायश्चित्त बताता है। ऋक्षशृंग उसे रोकते हैं—ऐसा करने से उनके आश्रित परिवार में और मृत्यु बढ़ेगी। वे आदेश देते हैं कि राजा उन्हें माता-पिता के आश्रम तक ले जाए और माता के सामने ‘पुत्रघाती’ के रूप में सत्य स्वीकार करे, ताकि वे शान्ति का मार्ग बताएं। राजा उन्हें उठाकर चलता है; मार्ग में विराम-विराम पर ऋषि योगसमाधि से देह त्याग देते हैं। राजा विधिपूर्वक अन्त्येष्टि करता है और शोक करता है—आगे के प्रायश्चित्त और नैतिक उत्तरदायित्व के उपदेश की भूमिका बनती है।

50 verses

Adhyaya 54

Adhyaya 54

अध्याय ५४ — शूलभेदतीर्थ-माहात्म्य तथा चित्रसेनस्य प्रायश्चित्त-मार्गः (Shūlabheda Tīrtha-Māhātmya and King Citraseṇa’s Expiatory Path)

इस अध्याय में पाप‑कारण और उसके प्रायश्चित्त का क्रम बताया गया है। शिकार के भ्रम में राजा चित्रसेन से महातपस्वी दीर्घतपा के पुत्र ऋक्षशृंग का वध हो जाता है। राजा अपराध स्वीकार कर आश्रम में आता है; शोक से माता विलाप करती हुई मूर्छित होकर प्राण त्याग देती है, और अन्य पुत्र तथा पुत्रवधुएँ भी विनष्ट हो जाते हैं—तपस्वी‑हिंसा की भारी सामाजिक और कर्मफल‑गुरुता प्रकट होती है। दीर्घतपा पहले राजा की निन्दा करते हैं, फिर कर्म‑तत्त्व पर विचार कर कहते हैं कि मनुष्य पूर्वकर्म की प्रेरणा से भी कर्म करता है, पर फल से बच नहीं सकता। वे प्रायश्चित्त बताते हैं—समस्त परिवार का दाह‑संस्कार कर दक्षिण नर्मदा‑तट के प्रसिद्ध शूलभेद तीर्थ में अस्थियों का विसर्जन करना; यह तीर्थ पाप और दुःख का नाशक कहा गया है। चित्रसेन दाह‑कर्म कर पैदल, अल्पाहार और बार‑बार स्नान करते हुए दक्षिण की यात्रा करता है, मार्ग में ऋषियों से पूछकर तीर्थ पहुँचता है। वहाँ तीर्थ‑प्रभाव से किसी जीव के उद्धार का अद्भुत दृश्य दिखता है, जिससे स्थान की सिद्धि प्रमाणित होती है। राजा अस्थियाँ रखकर स्नान करता है, तिल‑मिश्रित जल से तर्पण कर अस्थि‑विसर्जन करता है। मृतक दिव्य रूप में विमानों सहित प्रकट होते हैं; दीर्घतपा भी उन्नत होकर राजा को आशीर्वाद देते हैं कि यह विधि आदर्श है और शुद्धि तथा इच्छित फल प्रदान करती है।

73 verses

Adhyaya 55

Adhyaya 55

Śūlabheda-Tīrtha Māhātmya (शूलभेदतीर्थमाहात्म्य) — The Glory of the Śūlabheda Sacred Ford

उत्तानपाद ने तीर्थ की अद्भुत शक्ति देखकर राजा चित्रसेन के विषय में पूछा। ईश्वर ने कहा—चित्रसेन भृगुतुङ्ग पर्वत पर चढ़कर एक कुण्ड के पास कठोर तप करने लगा और ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश का ध्यान करते हुए समय से पहले देह-त्याग का संकल्प करने लगा। तभी रुद्र और केशव साक्षात प्रकट हुए, उसे रोका और समझाया कि वह लौटकर धर्मपूर्वक राज्य का उपभोग करे तथा निर्विघ्न प्रजा-पालन करे। परन्तु चित्रसेन ने राजसुख का त्याग कर वर माँगा कि त्रिदेव इस स्थान पर सदा निवास करें, यह क्षेत्र गयाशिर के समान पुण्यदायक हो, और उसे शिवगणों में अग्रता मिले। ईश्वर ने वर दिया—शूलभेद तीर्थ में त्रिकाल में अंशरूप से त्रिदेव निवास करेंगे; चित्रसेन ‘नन्दि’ नामक गणाधिप बनेगा, गणेश के समान कार्य-संचालक होगा और शिव के निकट पूज्य-प्रथमत्व पाएगा। अध्याय में तीर्थ की तुलनात्मक महिमा (गया को छोड़ अन्य तीर्थों से श्रेष्ठ), कुण्ड-परिसर की मर्यादा व कर्म-विधि, तथा श्राद्ध-पिण्डदान का प्रभाव बताया गया है—पितरों को मुक्ति, कठिन मृत्यु वालों को भी लाभ, केवल स्नान से अनजाने पापों की शुद्धि, और वहाँ संन्यास लेने पर उच्च गति। अंत की फलश्रुति में कहा है कि इस माहात्म्य का पाठ, श्रवण, लेखन और दान करने से पाप नष्ट होते हैं, इच्छित फल मिलते हैं और ग्रंथ के सुरक्षित रहने तक रुद्रलोक में वास प्राप्त होता है।

41 verses

Adhyaya 56

Adhyaya 56

देवशिला-शूलभेद-तीर्थमाहात्म्य तथा भानुमती-व्रताख्यान (Devāśilā–Śūlabheda Tīrtha Māhātmya and the Bhānumatī Vrata Narrative)

अध्याय 56 प्रश्नोत्तर रूप में धर्म-तत्त्व का निरूपण करता है। उत्तानपाद गंगा के अवतरण और अत्यन्त पुण्यदायिनी देवशिला की उत्पत्ति पूछते हैं; तब ईश्वर पवित्र-भूगोल की कथा कहते हैं—देवताओं की प्रार्थना से गंगा प्रकट होती हैं, रुद्र उन्हें अपनी जटाओं से मुक्त करते हैं, मनुष्य-कल्याण हेतु देवनदी-रूप में प्रवाहित होती हैं, और शूलभेद, देवशिला तथा प्राची सरस्वती से सम्बद्ध तीर्थ-समूह की स्थापना होती है। इसके बाद साधना-निर्देश आते हैं—स्नान, तर्पण, योग्य ब्राह्मणों द्वारा श्राद्ध, एकादशी-व्रत, रात्रि-जागरण, पुराण-पाठ और दान को पाप-शुद्धि तथा पितृ-तृप्ति के उपाय बताया गया है। फिर दृष्टान्त में राजा वीरसेन की विधवा पुत्री भानुमती कठोर व्रत धारण कर वर्षों तक तीर्थयात्रा (गंगा से दक्षिण मार्ग, रेवा-प्रदेश और अनेक तीर्थ) करती हुई अंततः शूलभेद/देवशिला में नियमपूर्वक निवास करती है, निरन्तर पूजा और ब्राह्मण-सेवा करती है। दूसरे दृष्टान्त में अकाल-पीड़ित शिकारी (शबर/व्याध) और उसकी पत्नी पुष्प-फल अर्पित कर, एकादशी का पालन कर, तीर्थ-समूह के कर्मों में सहभागी बनकर तथा सत्य और दान के आचरण से भक्ति-पुण्य की ओर जीवन मोड़ते हैं। अंत में तिल, दीप, भूमि, हिरण्य आदि दानों के फलों का संक्षिप्त वर्गीकरण है; ब्रह्मदान को सर्वोत्तम और फल-निर्णय में भाव को प्रधान कहा गया है।

134 verses

Adhyaya 57

Adhyaya 57

Padmaka-parva and the Śabara’s Liberation at Markaṇḍa-hrada (Revā Khaṇḍa, Adhyāya 57)

इस अध्याय में दो भागों में धर्म-तत्त्व का निरूपण है। पहले भाग में भानुमती चन्द्र-तिथियों के क्रम से शैव-व्रत करती है—ब्राह्मणों को भोजन कराती है, उपवास-नियम धारण करती है, मार्कण्डेय-ह्रद में स्नान करती है और वृषभध्वज महेश्वर की पञ्चामृत, गन्ध, धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प आदि से पूजा करती है। रात्रि-जागरण में पुराण-पाठ, गीत, नृत्य और स्तुति के साथ आराधना होती है। ब्राह्मण बताते हैं कि यह “पद्मक” नामक पर्व है; तिथि-नक्षत्र-योग-करण की विशेषता कहकर वे प्रतिपादित करते हैं कि यहाँ दान, होम और जप अक्षय फल देते हैं। दूसरे भाग में भानुमती भृगुमूर्धन पर्वत पर एक शबर को पत्नी सहित कूदकर प्राण त्यागने को उद्यत देखती है। वह तत्काल दुःख से नहीं, बल्कि संसार-भय और मनुष्य-जन्म पाकर भी धर्म न कर पाने की चिन्ता से ऐसा कर रहा है। भानुमती समझाती है कि अभी समय शेष है; व्रत और दान से शुद्धि संभव है। शबर पर-आहार के दोष का विचार कर धन-सहायता अस्वीकार करता है—“जो दूसरे का अन्न खाता है, वह उसके पाप का भागी होता है”—और अर्ध-वस्त्र से संयम रखकर हरि का ध्यान करता हुआ गिर पड़ता है। थोड़ी देर बाद वह और उसकी पत्नी दिव्य विमान में आरोहण करते दिखते हैं, जो उनकी मुक्ति या उत्तम गति का संकेत है।

32 verses

Adhyaya 58

Adhyaya 58

Śūlabheda-tīrtha Māhātmya (Glory of the Śūlabheda Sacred Site)

इस अध्याय में शूलभेद-तीर्थ का माहात्म्य और अंत में फलश्रुति कही गई है। उत्तानपाद ईश्वर से भानुमती के कर्म का अर्थ पूछते हैं। ईश्वर बताते हैं कि भानुमती एक पुण्य-कुण्ड के पास पहुँची, उसकी पवित्रता पहचानकर तुरंत ब्राह्मणों को बुलाया, उनका सत्कार किया और विधिपूर्वक दान देकर अपना संकल्प दृढ़ किया। फिर उसने पितरों और देवताओं का पूजन किया, मधु-मास में पखवाड़े भर नियमपूर्वक रही और अमावस्या को पर्वत-प्रदेश में गई। शिखर पर चढ़कर उसने ब्राह्मणों से कहा कि वे उसके परिवार और संबंधियों तक मेल-मिलाप का संदेश पहुँचा दें; वह शूलभेद में अपने तप के बल से देह त्यागकर स्वर्ग-गति पाएगी। ब्राह्मणों ने उसकी बात मानकर संदेह दूर किया। तब उसने वस्त्र कसकर, एकाग्र मन से देह त्याग दिया; दिव्य स्त्रियाँ आईं, उसे विमान में बैठाकर कैलास की ओर ले गईं, और वह सबके देखते-देखते आरोहण कर गई। मार्कण्डेय परंपरा से इस कथा का प्रमाण देकर कठोर फलश्रुति कहते हैं—तीर्थ में या मंदिर में भी श्रद्धा से इसका पाठ-श्रवण करने से दीर्घकाल से संचित भारी पाप कट जाते हैं; सामाजिक, कर्मकाण्डीय और विश्वास-भंग जैसे अनेक दोष ‘शूलभेद’ के प्रभाव से नष्ट होते हैं। श्राद्ध के समय ब्राह्मण-भोजन के बीच इसका पाठ करने से पितर प्रसन्न होते हैं, और श्रोताओं को कल्याण, आरोग्य, दीर्घायु तथा कीर्ति प्राप्त होती है।

25 verses

Adhyaya 59

Adhyaya 59

पुष्करिणीतीर्थमाहात्म्यं (Puṣkariṇī Tīrtha Māhātmya on the Revā’s Northern Bank)

मार्कण्डेय ऋषि पापों का नाश करने वाली एक पवित्र पुष्करिणी का वर्णन करते हैं, जहाँ शुद्धि हेतु जाना चाहिए। यह तीर्थ रेवा (नर्मदा) के उत्तरी तट पर स्थित है और अत्यन्त शुभ माना गया है, क्योंकि वेदमूर्ति दिवाकर (सूर्य) वहाँ निरन्तर निवास करते हैं। इस तीर्थ का माहात्म्य कुरुक्षेत्र के समान बताया गया है—विशेषतः यह सर्वकामफल देने वाला और दान की वृद्धि करने वाला है। सूर्यग्रहण के समय स्नान करके विधिपूर्वक दान—धन-रत्न, सुवर्ण-रजत तथा पशु आदि—करने से महान फल मिलता है; ब्राह्मणों को सुवर्ण-रजत दान का फल तेरह दिनों तक बढ़ता हुआ कहा गया है। तिलमिश्रित जल से पितरों और देवताओं का तर्पण तृप्तिदायक है; पायस, मधु और घृत से किया गया श्राद्ध पितरों को स्वर्ग और अक्षय लाभ देता है। अक्षत, बदर, बिल्व, इंगुद, तिल आदि अन्न-फल की अर्पणाएँ भी अक्षय फल देने वाली कही गई हैं। अध्याय का भक्तिमय सार सूर्योपासना में है—स्नान, दिवाकर की पूजा, आदित्यहृदय का पाठ और वैदिक जप। एक ऋचा/यजुः/साम का भी जप समस्त वेदफल, पापनाश और उत्तम लोक की प्राप्ति कराता है। अंत में कहा गया है कि जो विधिपूर्वक वहाँ देह त्याग करता है, वह सूर्य से सम्बद्ध परम पद को प्राप्त होता है।

15 verses

Adhyaya 60

Adhyaya 60

रवितीर्थ-आदित्येश्वर-माहात्म्य एवं नर्मदास्तोत्रफलम् (Ravītīrtha–Ādityeśvara Māhātmya and the Fruit of the Narmadā Hymn)

मार्कण्डेय युधिष्ठिर को उपदेश देते हुए रवितीर्थ और आदित्येश्वर की महिमा कहते हैं—यह ऐसा परम पुण्य-स्थान है जो प्रसिद्ध तीर्थों से भी अधिक फलदायी है। वे रुद्र के समीप सुनी हुई कथा सुनाते हैं: दुर्भिक्ष के समय अनेक ऋषि नर्मदा-तट पर एक वनाच्छादित तीर्थ-प्रदेश में पहुँचते हैं। वहाँ फाँसी के फंदे धारण किए भयावह स्त्री-पुरुष उन्हें अपने ‘स्वामियों’ के पास तीर्थ में चलने को प्रेरित करते हैं। ऋषि तब नर्मदा का विस्तृत स्तोत्र करते हैं, उसकी पावन और रक्षक शक्ति का गुणगान करते हैं। देवी प्रकट होकर अद्भुत वर देती हैं, और मोक्ष की ओर ले जाने वाला दुर्लभ आश्वासन भी प्रदान करती हैं। आगे पाँच शक्तिशाली पुरुष स्नान-पूजा में लगे मिलते हैं; वे बताते हैं कि इस तीर्थ के प्रभाव से घोर पाप भी नष्ट हो जाते हैं। वे भास्कर-पूजन और अंतःकरण में हरि-स्मरण करते हैं, जिसका परिवर्तनकारी फल ऋषि प्रत्यक्ष देखते हैं। अध्याय में रवितीर्थ का विधि-क्रम बताया गया है—ग्रहण व पुण्य-संधियों में दर्शन, उपवास, रात्रि-जागरण, दीपदान, वैष्णव कथा व वेद-पाठ, गायत्री-जप, ब्राह्मण-सत्कार तथा अन्न, स्वर्ण, भूमि, वस्त्र, आवास, वाहन आदि दान। फलश्रुति में श्रद्धालु श्रोताओं की शुद्धि और सूर्यलोक-प्राप्ति कही गई है, साथ ही महापातकी जनों को तीर्थ-रहस्य बताने में सावधानी का उपदेश भी है।

86 verses

Adhyaya 61

Adhyaya 61

शक्रतीर्थ-शक्रेश्वर-माहात्म्य (Glory of Śakra-tīrtha and Śakreśvara)

मार्कण्डेय श्रोता को नर्मदा के दक्षिण तट पर स्थित अत्यन्त पुण्यकारी शक्रतीर्थ का निर्देश देते हैं, जिसे संचित पापों का नाश करने वाला कहा गया है। इसकी महिमा एक कारण-कथा से स्थापित होती है—पूर्वकाल में इन्द्र (शक्र) ने यहीं महेश्वर शिव की तीव्र भक्ति से कठोर तप किया; प्रसन्न होकर उमापति ने उन्हें देवेन्द्रत्व, राज्य-समृद्धि और दानवों पर विजय की शक्ति का वर दिया। फिर उपदेश आता है कि कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को भक्तिपूर्वक व्रत-उपवास करने से पापों से मुक्ति मिलती है, तथा दुःस्वप्न, अपशकुन और ग्रह-शाकिनी आदि उपद्रवों का शमन होता है। शक्रेश्वर के दर्शन को जन्म-जन्म के दोषों का नाशक बताया गया है और अनेक निषिद्ध कर्मों के लिए भी यहाँ शुद्धि का आश्वासन दिया गया है। अंत में स्वर्ग-प्राप्ति चाहने वाले को दान का विधान है—विशेषतः उत्तम ब्राह्मण को गौदान (या योग्य वहन-पशु) श्रद्धा से करना चाहिए; इसी के साथ तीर्थ के फल संक्षेप में कहे गए हैं।

11 verses

Adhyaya 62

Adhyaya 62

क्रोडीतीर्थ-माहात्म्य (Kroḍī Tīrtha Māhātmya) — The Glory of the Kroḍīśvara Shrine

इस अध्याय में मार्कण्डेय ऋषि राजा को क्रोडीश्वर नामक परम पवित्र तीर्थ के दर्शन-विधान का उपदेश देते हैं। दानवों के विनाश के बाद विजयोल्लास से भरकर देवता कटे हुए सिरों को एकत्र कर नर्मदा के जल में प्रवाहित करते हैं और स्वजन-संबंधों का स्मरण करते हुए स्नान करते हैं। तत्पश्चात वे उमापति शिव की स्थापना कर लोकसिद्धि और कल्याण हेतु पूजा करते हैं; यही तीर्थ पृथ्वी पर “क्रोडी” नाम से पाप-नाशक प्रसिद्ध होता है। व्रत-विधान में दोनों पक्षों की अष्टमी और चतुर्दशी को भक्तिपूर्वक उपवास, शूलिन के सम्मुख रात्रि-जागरण, पवित्र कथा-श्रवण तथा वेदाध्ययन, प्रातः त्रिदशेश्वर की पूजा, पंचामृत से अभिषेक, चंदन-लेपन, बिल्वपत्र-पुष्प अर्पण, दक्षिणाभिमुख जप और नियत जल-निमज्जन का निर्देश है। पितरों के लिए दक्षिणाभिमुख तिलांजलि, श्राद्ध, तथा वेदनिष्ठ संयमी ब्राह्मणों को भोजन-दान करने से पुण्य अनेक गुना बढ़ता है। फलश्रुति कहती है कि नियमपूर्वक इस तीर्थ में देहांत होने पर, जब तक अस्थियाँ नर्मदा-जल में रहती हैं, तब तक शिवलोक में दीर्घ निवास मिलता है; फिर धनवान, मान्य, सदाचारी और दीर्घायु जन्म प्राप्त होता है, और अंत में क्रोडीश्वर की आराधना से परम पद की प्राप्ति होती है। रेवातट के उत्तर किनारे सत्योपार्जित धन से मंदिर-निर्माण, सभी वर्णों और स्त्रियों के लिए यथाशक्ति सुलभ बताया गया है; तथा इस माहात्म्य का भक्तिपूर्वक श्रवण छह मास में पाप-नाशक कहा गया है।

24 verses

Adhyaya 63

Adhyaya 63

कुमारेश्वरतीर्थ-माहात्म्य (Kumāreśvara Tīrtha Māhātmya)

मार्कण्डेय राजश्रोता को उपदेश देते हैं कि वह अगस्त्येश्वर के निकट, नर्मदा-तट पर स्थित प्रसिद्ध कुमारेश्वर तीर्थ में जाए। प्राचीन काल में षण्मुख (स्कन्द) ने वहाँ अत्यन्त भक्ति से आराधना कर सिद्धि पाई, देवसेनाओं के नायक बने और शत्रुओं का दमन करने वाले हुए; इसी कारण वह स्थान नर्मदा पर अत्यन्त प्रभावशाली तीर्थ कहा गया है। यात्रियों के लिए नियम बताए गए हैं—एकाग्र मन और इन्द्रिय-निग्रह के साथ वहाँ पहुँचना, विशेषकर कार्त्तिक चतुर्दशी और अष्टमी को विशेष व्रत-पालन। गिरिजानाथ (शिव) का दही, दूध और घी से अभिषेक, भक्तिगान, तथा शास्त्रोक्त पिण्डदान करना चाहिए, विशेषतः वेदविद् ब्राह्मणों की उपस्थिति में। फल यह है कि वहाँ दिया गया दान अक्षय हो जाता है; यह तीर्थ सर्वतीर्थमय कहा गया है और कुमार के दर्शन से पुण्य प्राप्त होता है। अंत में कहा गया है कि इस पुण्य-परम्परा से जुड़कर जो वहाँ देह त्याग करता है, वह स्वर्ग को प्राप्त होता है—यह प्रभु का सत्य वचन है।

10 verses

Adhyaya 64

Adhyaya 64

अगस्त्येश्वरतीर्थमाहात्म्य (Agastyeśvara Tīrtha-Māhātmya)

इस अध्याय में मार्कण्डेय एक राजा से संवाद करते हुए उसे अवन्ती-खण्ड के अत्यन्त पुण्यदायक तीर्थ “अगस्त्येश्वर” की ओर प्रवृत्त करते हैं। इसे पाप-क्षय का स्थान-आधारित साधन बताया गया है, जहाँ श्रद्धा सहित किया गया आचरण नैतिक दोषों का निवारण करता है। यहाँ मुख्य विधि तीर्थ-स्नान की है, जिसे ब्रह्महत्या जैसे महापातकों की निवृत्ति से जोड़ा गया है। समय-निर्देश भी स्पष्ट है—कार्त्तिक मास, कृष्णपक्ष, चतुर्दशी को स्नान करने से काल, देश और कर्म एक ही धर्म-नियम में संयुक्त हो जाते हैं। आगे कहा गया है कि साधक समाहित चित्त और जितेन्द्रिय होकर घृत से देव का अभिषेक करे। साथ ही दान-विधान—धन, पादुका, छत्र, घृत-कम्बल तथा सबको भोजन कराना—इनसे पुण्यफल की वृद्धि बताई गई है। संदेश यह है कि तीर्थ-यात्रा केवल गमन नहीं, बल्कि नियम, भक्ति और उदारता से युक्त साधना है।

5 verses

Adhyaya 65

Adhyaya 65

Ānandeśvara-tīrtha Māhātmya (Glory of the Ānandeśvara Tīrtha)

इस अध्याय में संवाद-रूप से मार्कण्डेय युधिष्ठिर को नर्मदा के दक्षिण तट पर स्थित ‘आनन्देश्वर’ तीर्थ का माहात्म्य बताते हैं। दैत्यों के वध के बाद देवगणों और अन्य दिव्य प्राणियों ने महेश्वर की स्तुति-पूजा की; तब शिव ने गौरी सहित भैरव-रूप धारण कर नर्मदा-तट पर आनंदमय नृत्य किया। उसी आदिघटना से इस तीर्थ का नाम ‘आनन्देश्वर’ पड़ा और इसे महान् पावन-शक्ति का केन्द्र माना गया। आगे विधि बताई गई है—अष्टमी, चतुर्दशी और पौर्णमासी को देव-पूजन, सुगन्धित द्रव्यों से अभिषेक/अनुलेपन, तथा सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों का सत्कार करना चाहिए। गो-दान और वस्त्र-दान की भी विशेष प्रशंसा की गई है। वसन्त ऋतु की त्रयोदशी पर श्राद्ध का विधान, तथा इङ्गुद, बदर, बिल्व, अक्षत और जल आदि सरल अर्पणों का निर्देश मिलता है। फलश्रुति में पितरों की दीर्घ तृप्ति और अनेक जन्मों तक वंश-परम्परा की निरन्तरता बताकर कर्म को धर्म और दूरगामी कल्याण का साधन कहा गया है।

12 verses

Adhyaya 66

Adhyaya 66

मातृतीर्थमाहात्म्य (Mātṛtīrtha Māhātmya: The Glory of the Mothers’ Pilgrimage Site)

मार्कण्डेय युधिष्ठिर से कहते हैं कि नर्मदा के दक्षिण तट पर संगम के निकट स्थित अनुपम मातृतीर्थ में जाना चाहिए। वहाँ नदी-तट पर मातृगण प्रकट हुए थे; योगिनियों की सभा की प्रार्थना पर शिव—जो उमा को अर्धांग रूप में धारण करते हैं और नाग को यज्ञोपवीत की भाँति धारण किए हैं—उस तीर्थ को पृथ्वी पर प्रसिद्ध होने का वर देते हैं और अंतर्धान हो जाते हैं। इसी दिव्य अनुमोदन से तीर्थ की महिमा स्थापित होती है। नवमी तिथि को शुद्ध-नियमयुक्त भक्त उपवास करके मातृ-गोचर में पूजन करे; इससे मातृगण और शिव प्रसन्न होते हैं। वंध्या, संतान-शोक से पीड़ित या पुत्रहीन स्त्रियों के लिए मंत्र-शास्त्र-निपुण आचार्य स्वर्ण-कलश में पाँच रत्न और फल रखकर स्नान-विधि कराए; पुत्र-प्राप्ति हेतु कांस्य पात्र से स्नान कराया जाता है। अंत में कहा गया है कि जो भी कामना मन में की जाए वह सिद्ध होती है, और मातृतीर्थ से बढ़कर कोई तीर्थ नहीं।

10 verses

Adhyaya 67

Adhyaya 67

Luṅkeśvara/Liṅgeśvara Tīrtha Māhātmya and the Daitya Kālapṛṣṭha’s Boon

अध्याय 67 में मārkaṇḍेय तीर्थ-प्रधान धर्मकथा सुनाते हैं। जल में स्थित अत्यन्त पुण्यदायक तीर्थ ‘लुङ्केश्वर’ का परिचय दिया गया है, जिसे ‘लिङ्गेश्वर’ अथवा ‘स्पर्श-लिङ्ग’ के तर्क से भी समझाया गया है। कथा का केन्द्र वरदान-संकट है। दैत्य कालपृष्ठ धूमपान-व्रत सहित घोर तप करता है; पार्वती शिव से उसे वर देने का आग्रह करती हैं। शिव दबाव में वर देने के नैतिक जोखिम को बताते हुए भी ऐसा भयंकर वर दे देते हैं कि दैत्य जिसके सिर को हाथ से छुए, वह भस्म हो जाए। दैत्य उसी शक्ति से शिव पर ही आक्रमण करना चाहता है और लोक-लोकान्तरों तक पीछा करता है। तब शिव सहायता चाहते हैं; नारद विष्णु के पास जाते हैं। विष्णु माया से रमणीय वसन्त-उद्यान और मोहक कन्या प्रकट करते हैं; काम से मोहित दैत्य लोकाचार के संकेत पर अपना ही हाथ अपने सिर पर रख देता है और तत्काल नष्ट हो जाता है। अन्त में फलश्रुति और विधि-सूची आती है—लुङ्केश्वर में स्नान-पान से देह के अंग-प्रत्यंग तक के पाप और दीर्घकालीन कर्मबन्ध नष्ट होते हैं। कुछ तिथियों पर उपवास, तथा विद्वान ब्राह्मणों को अल्प दान भी महान पुण्यवर्धक बताया गया है; क्षेत्र की पवित्रता की रक्षा करने वाले देव-रक्षक भी वर्णित हैं।

109 verses

Adhyaya 68

Adhyaya 68

धनदतीर्थमाहात्म्य (Glory of Dhanada Tīrtha on the Southern Bank of the Narmadā)

मार्कण्डेय युधिष्ठिर से कहते हैं कि नर्मदा के दक्षिण तट पर स्थित धनदा-तीर्थ में जाना चाहिए। यह तीर्थ सर्वपाप-नाशक और समस्त तीर्थों का फल देने वाला बताया गया है। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को साधक संयम रखे, उपवास करे और रात्रि-जागरण करे। वहाँ ‘धनदा’ का पंचामृत से अभिषेक, घृत-दीप का अर्पण तथा भक्ति-भाव से गीत-वाद्य आदि का विधान है। प्रातःकाल दान ग्रहण करने योग्य, विद्या-शास्त्रार्थ में निष्ठ, श्रौत-स्मार्त आचरण वाले और शील-संयम से युक्त ब्राह्मणों का सम्मान करना चाहिए। गाय, सुवर्ण, वस्त्र, पादुका, अन्न तथा इच्छानुसार छत्र और शय्या आदि का दान करने से तीन जन्मों के पापों का भी सम्यक् नाश कहा गया है। फलश्रुति में भेद है—असंयमी को स्वर्ग, संयमी को मोक्ष; दरिद्र को बार-बार अन्न-लाभ; जन्मजात कुलीनता और दुःख-क्षय; तथा नर्मदा-जल से रोग-नाश। विशेष रूप से धनदा-तीर्थ में विद्यादान करने से निरोग सूर्यलोक की प्राप्ति होती है; और रेवातट की देवद्रोणी में प्रचुर दान-यज्ञादि करने वाला शोक-रहित शंकरलोक को प्राप्त होता है।

12 verses

Adhyaya 69

Adhyaya 69

Maṅgaleśvara-liṅga Pratiṣṭhā and Aṅgāraka-vrata (मङ्गलेश्वरलिङ्गप्रतिष्ठा तथा अङ्गारकव्रत)

मार्कण्डेय तीर्थयात्रा के क्रम में श्रेष्ठ मङ्गलेश्वर का वर्णन करते हैं। भूतिपुत्र मङ्गल (अङ्गारक) ने प्राणियों के कल्याण हेतु इस क्षेत्र में शिवालय की स्थापना की। चतुर्दशी तिथि को तीव्र भक्ति से प्रसन्न होकर शङ्कर-शशिशेखर मङ्गलेश्वर रूप में प्रकट हुए और वरदान दिया। मङ्गल ने जन्म-जन्मान्तर तक अनुग्रह माँगा और कहा कि वह शिव के देह-स्वेद से उत्पन्न होकर ग्रहों में निवास करता है; साथ ही देवताओं द्वारा अपने नाम से मान्यता और पूजन की प्रार्थना की। शिव ने वर दिया कि इस स्थान पर भगवान मङ्गल के नाम से प्रसिद्ध होंगे, फिर अन्तर्धान हो गए। तब मङ्गल ने योगबल से लिङ्ग की प्रतिष्ठा कर उसकी पूजा की। आगे विधि बताई गई है—मङ्गलेश्वर लिङ्ग दुःखहर है; तीर्थ में ब्राह्मणों को तृप्त करना, विशेषतः पत्नी सहित कर्म करना, और अङ्गारक-व्रत का पालन करना चाहिए। व्रत-समापन पर शिवार्थ गो/वृष दान, लाल वस्त्र, निर्दिष्ट रंग के पशु, छत्र-शय्या, लाल माला व अनुलेपन आदि शुद्ध मन से देने का विधान है। दोनों पक्षों की चतुर्थी और अष्टमी को श्राद्ध करने तथा धन-छल से बचने की आज्ञा है। फल में पितरों की युग-पर्यन्त तृप्ति, शुभ सन्तान, उत्तम स्थिति सहित पुनर्जन्म, तीर्थ-प्रभाव से देहकान्ति, और भक्तिपूर्वक नित्य पाठ करने वालों के पापों का नाश कहा गया है।

17 verses

Adhyaya 70

Adhyaya 70

Ravi-kṛta Tīrtha on the Northern Bank of Revā (रविणा निर्मितं तीर्थम् — रेवोत्तरतीरमाहात्म्यम्)

मार्कण्डेय ऋषि रेवा (नर्मदा) के उत्तरी तट पर स्थित एक “अत्यन्त तेजस्वी” तीर्थ का वर्णन करते हैं, जिसे रवि (सूर्य) ने स्थापित किया माना गया है। यह तीर्थ पाप-क्षय का साधन है और कहा गया है कि भास्कर अपने ही अंश से नर्मदा-प्रदेश के इसी उत्तरी तट पर निरन्तर विराजमान रहते हैं। अध्याय में विधि बताई गई है—विशेषकर षष्ठी, अष्टमी और चतुर्दशी तिथियों में स्नान करके, पितरों/प्रेतों के लिए भक्तिपूर्वक श्राद्ध करना चाहिए। इसका फल तत्काल शुद्धि, फिर सूर्यलोक में उत्कर्ष, और स्वर्ग से लौटकर शुद्ध कुल में जन्म, धन-सम्पदा तथा जन्म-जन्मान्तर तक रोगमुक्ति बताया गया है; इस प्रकार स्थान, काल, कर्म और फल को जोड़कर तीर्थ-माहात्म्य का संक्षिप्त उपदेश दिया गया है।

5 verses

Adhyaya 71

Adhyaya 71

Kāmeśvara-tīrtha Māhātmya (कामेश्वरतीर्थमाहात्म्य) / The Glory of the Kāmeśvara Sacred Site

मार्कण्डेय युधिष्ठिर को आगे उपदेश देते हुए कामेश्वर से जुड़े एक पवित्र तीर्थ का वर्णन करते हैं। वहाँ गौरी के पराक्रमी पुत्र, गणाध्यक्ष, सिद्ध-स्वरूप में प्रतिष्ठित माने गए हैं; यह स्थान श्रद्धा जगाने वाला और पाप-क्षय करने वाला कहा गया है। अध्याय में साधना-विधि बताई गई है—भक्ति और संयम से युक्त उपासक पहले स्नान करे, फिर पंचामृत से अभिषेक करे; उसके बाद धूप, नैवेद्य अर्पित कर विधिवत् पूजा सम्पन्न करे। इसका फल ‘सर्व पापों से मुक्ति’ और नैतिक-आचारिक शुद्धि बताया गया है। विशेष काल-निर्देश भी है कि मार्गशीर्ष मास की अष्टमी को इस तीर्थ में स्नान अत्यन्त फलदायक है। अंत में कहा गया है कि उपासक जिस उद्देश्य से पूजा करता है, उसी के अनुरूप फल प्राप्त करता है—जिस कामना से आराधना, वही सिद्धि।

5 verses

Adhyaya 72

Adhyaya 72

Maṇināgeśvara-tīrtha Māhātmya (मणिनागेश्वरतीर्थमाहात्म्य) — Origin Legend and Ritual Merits

मार्कण्डेय राजश्रोता को नर्मदा के उत्तरी तट पर स्थित शुभ मणिनागेश्वर तीर्थ का माहात्म्य बताते हैं। यह तीर्थ नागराज मणिनाग ने प्राणियों के कल्याण हेतु स्थापित किया और इसे पापों का नाश करने वाला कहा गया है। युधिष्ठिर पूछते हैं कि विषधर सर्प ने ईश्वर को कैसे प्रसन्न किया। तब कश्यप की पत्नियों कद्रू और विनता की उच्चैःश्रवा के रंग पर शर्त, कद्रू का छल, सर्पों को घोड़े के बाल काले करने का आदेश, कुछ का मानना और कुछ का मातृ-शाप के भय से भागकर जल-प्रदेशों व दिशाओं में फैल जाना—यह प्राचीन कथा कही जाती है। शाप के परिणाम से भयभीत मणिनाग नर्मदा के उत्तरी तट पर कठोर तप करता है और अक्षय परम तत्त्व का ध्यान करता है। तब त्रिपुरान्तक शिव प्रकट होकर उसकी भक्ति की प्रशंसा करते हैं, उसे संकट से बचाने का वर देते हैं तथा उत्तम निवास और वंश-कल्याण का आश्वासन देते हैं। मणिनाग के निवेदन पर शिव अंशरूप से वहाँ निवास स्वीकार करते हैं और लिंग-प्रतिष्ठा का आदेश देते हैं—इसी से तीर्थ की प्रतिष्ठा दृढ़ होती है। अध्याय में आगे विशेष तिथियों में पूजन, दधि-मधु-घृत-क्षीर आदि से अभिषेक, श्राद्ध-विधि, दान की वस्तुएँ और पुरोहितों के आचार-नियम बताए गए हैं। फलश्रुति में पाप-मुक्ति, शुभ लोक-गति, सर्प-भय से रक्षा तथा इस तीर्थ-कथा के श्रवण-पाठ से विशेष पुण्य का वर्णन है।

66 verses

Adhyaya 73

Adhyaya 73

गोपारेश्वरतीर्थमाहात्म्य (Gopāreśvara Tīrtha Māhātmya)

यह अध्याय प्रश्न–उत्तर के रूप में है। युधिष्ठिर मुनि मार्कण्डेय से पूछते हैं कि नर्मदा के दक्षिण तट पर मणिनाग के निकट “गोदेह से प्रकट हुआ लिंग” क्यों स्थित है और वह पाप-नाशक कैसे माना गया। मार्कण्डेय बताते हैं कि सुरभि/कपिला गौ ने लोक-कल्याण हेतु महेश्वर का भक्ति-पूर्वक ध्यान और तप किया; प्रसन्न होकर शिव प्रकट हुए और उसी तीर्थ में निवास का वर दिया, इसलिए वहाँ एक बार स्नान करने से भी शीघ्र शुद्धि की कीर्ति है। फिर दान-धर्म की विधि कही गई है—भक्ति से “गोपारेश्वर-गोदान” करना चाहिए: योग्य, निर्दोष गौ को (निर्दिष्ट स्वर्ण/आभूषण सहित) पात्र ब्राह्मण को दान देना। कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी या अष्टमी तथा विशेषतः कार्त्तिक मास में इसका फल अत्यन्त श्रेष्ठ बताया गया है। साथ ही प्रेत-उद्धार हेतु पिण्डदान, नित्य रुद्र-नमस्कार को पाप-हर, और वृषोत्सर्ग को पितरों के हित तथा शिवलोक में दीर्घ सम्मान-प्राप्ति का साधन कहा गया है—वृष के रोमों की संख्या के अनुपात से वहाँ मान मिलता है और फिर शुभ जन्म होता है। अंत में नर्मदा के दक्षिण तट पर स्थित गोपारेश्वर की पहचान और लिंग की अद्भुत उत्पत्ति को तीर्थ की पवित्रता का चिह्न बताकर पुष्टि की जाती है।

24 verses

Adhyaya 74

Adhyaya 74

Gautameśvara-tīrtha Māhātmya (गौतमेश्वरतीर्थमाहात्म्य) — Revā’s Northern Bank

इस अध्याय में मārkaṇḍeya संवाद-रूप में रेवā के उत्तरी तट पर स्थित अत्यन्त शोभायमान गौतमेश्वर तीर्थ का माहात्म्य बताते हैं। इसका उद्गम ऋषि गौतम से जोड़ा गया है, जिन्होंने लोक-कल्याण हेतु इसकी स्थापना की; पुराणोक्त पुण्य-भाषा में इसे ‘स्वर्ग की सीढ़ी’ (स्वर्ग-सोपान) कहा गया है। यहाँ ‘लोक-गुरु’ देवता की सन्निधि में जो यात्री विशेष भक्ति से तीर्थ-यात्रा करता है, उसके पापों का नाश, नैतिक शुद्धि और स्वर्ग-वास का आश्वासन दिया गया है। साथ ही विजय, दुःख-निवारण और सौभाग्य-वृद्धि जैसे व्यावहारिक फल भी गिनाए गए हैं; पितृ-कार्य में एक ही पिण्ड-दान से वंश की तीन पीढ़ियों के उद्धार का कथन भी आता है। अंत में मूल्य-नियम कहा गया है—भक्ति से दिया गया छोटा या बड़ा कोई भी दान, गौतम के प्रभाव से अनेक गुना फल देता है। इस तीर्थ को ‘तीर्थों में परम’ ठहराया गया है और रुद्र-वचन के रूप में इसकी शैव प्रमाणिकता पुष्ट की गई है।

7 verses

Adhyaya 75

Adhyaya 75

Śaṅkhacūḍa-tīrtha-māhātmya (Glory of the Śaṅkhacūḍa Tīrtha on the Narmadā)

मार्कण्डेय नर्मदा के दक्षिण तट पर स्थित अत्यन्त पवित्र तीर्थ ‘शंखचूड़’ का वर्णन करते हैं। कहा गया है कि शंखचूड़ वहीं निवास करता है; वैनतेय (गरुड़) के भय से सुरक्षा पाने हेतु उसने उस स्थान को आश्रय बनाया—यह कारण भी बताया जाता है। फिर साधक के लिए विधि बताई गई है—शुद्ध होकर एकाग्र चित्त से वहाँ पहुँचे, दूध, मधु और घृत आदि शुभ द्रव्यों से क्रमशः शंखचूड़ का अभिषेक करे और रात्रि में देव के समक्ष जागरण करे। प्रशंसित व्रतों वाले ब्राह्मणों का सत्कार करे, दधिभक्त आदि अन्न-दान से उन्हें तृप्त करे और अंत में गो-दान दे; इसे सर्वपाप-नाशक पवित्र कर्म कहा गया है। अंत में विशेष फल बताया गया है—इस तीर्थ में जो सर्पदंश से पीड़ित व्यक्ति को संतुष्ट/प्रसन्न करता है, वह शंकर के वचनानुसार परम लोक को प्राप्त होता है; इस प्रकार स्थान-पूजा और करुणा को मोक्षफल से जोड़ा गया है।

5 verses

Adhyaya 76

Adhyaya 76

Pāreśvara-Tīrtha Māhātmya and Parāśara’s Vrata on the Narmadā (Chapter 76)

मार्कण्डेय बताते हैं कि नर्मदा के पुण्य तट पर पारेश्वर-तीर्थ में महर्षि पराशर योग्य पुत्र की प्राप्ति हेतु कठोर तप करते हैं। तब देवी—गौरी नारायणी, शंकर की अर्धांगिनी—प्रकट होकर उनकी भक्ति की प्रशंसा करती हैं और वर देती हैं कि उन्हें सत्यनिष्ठ, शुद्ध, वेदाध्ययन में रत तथा शास्त्र-विद्या में निपुण पुत्र प्राप्त होगा। पराशर लोक-कल्याण के लिए देवी से उसी स्थान पर निवास करने की प्रार्थना करते हैं; देवी ‘तथास्तु’ कहकर वहाँ अव्यक्त रूप से स्थित हो जाती हैं। इसके बाद पराशर पार्वती की प्रतिष्ठा करते हैं और शंकर की भी स्थापना करते हुए देवता को अजेय तथा देवताओं के लिए भी दुर्लभ बताते हैं। फिर तीर्थ-व्रत का विधान आता है—स्त्री-पुरुष, जो शुद्ध, मनोनिग्रही, काम-क्रोध से रहित हों, उनके लिए; शुभ मासों और शुक्ल पक्ष को विशेष माना गया है। उपवास, रात्रि-जागरण, दीपदान तथा भक्ति-परक गीत-नृत्य आदि का निर्देश है। ब्राह्मणों के सम्मान और दान—धन, स्वर्ण, वस्त्र, छत्र, शय्या, ताम्बूल, भोजन आदि—का विधान तथा श्राद्ध की प्रक्रिया बताई गई है, जिसमें स्त्रियों और शूद्रों के लिए ‘आम-श्राद्ध’ का भेद और दिशा-नियम भी हैं। अंत में फलश्रुति है कि श्रद्धापूर्वक सुनने वालों के घोर पाप नष्ट होते हैं और कल्याण की प्राप्ति होती है।

25 verses

Adhyaya 77

Adhyaya 77

भीमेश्वरतीर्थे जपदानव्रतफलप्रशंसा | Bhīmeśvara Tīrtha: Praise of Japa, Dāna, and Vrata-Fruits

इस अध्याय में श्री मार्कण्डेय भीमेश्वर तीर्थ का माहात्म्य बताते हैं। यह तीर्थ पाप-क्षय करने वाला और शुभ व्रत-नियमों का पालन करने वाले ऋषि-समूहों से सेवित कहा गया है। विधि यह है कि भीमेश्वर के पास जाकर तीर्थ-स्नान करें, उपवास और जितेन्द्रियता रखें, तथा सूर्य के रहते दिन में ऊर्ध्वबाहु होकर ‘एकाक्षर’ मंत्र का जप करें। फिर जप, दान और व्रत के फल क्रमशः बताए गए हैं—अनेक जन्मों के संचित पापों का नाश और गायत्री-जप की विशेष शुद्धि-शक्ति। वैदिक हो या लौकिक, बार-बार किया गया जप मंत्र-शक्ति से मल को वैसे ही जला देता है जैसे अग्नि सूखी घास को। साथ ही चेतावनी है कि ‘दैवी शक्ति’ का सहारा लेकर पाप न करें; अज्ञान शीघ्र मिट सकता है, पर पाप का औचित्य नहीं बनता। अंत में कहा है कि इस तीर्थ में सामर्थ्य के अनुसार किया गया दान अक्षय फल देता है।

8 verses

Adhyaya 78

Adhyaya 78

नारदतीर्थ-नारदेश्वर-माहात्म्य (Glory of Nārada’s Tīrtha and Nāradeśvara)

यह अध्याय संवाद-रूप में नारदतीर्थ और नारदेश्वर (शूलिन) के माहात्म्य का वर्णन करता है। मार्कण्डेय मुनि एक परम तीर्थ का संकेत करते हैं जिसे नारद ने स्थापित किया था; युधिष्ठिर उसके उद्भव का कारण पूछते हैं। तब कथा रेवाती (नर्मदा) के उत्तरी तट पर नारद के कठोर तप की ओर जाती है, जहाँ ईश्वर प्रकट होकर वर देते हैं—योग-सिद्धि, अचल भक्ति, लोकों में स्वेच्छा से गमन, त्रिकाल-ज्ञान तथा स्वर, ग्राम, मूर्च्छना आदि संगीत-विद्याओं में प्रावीण्य; साथ ही यह भी कि नारद का तीर्थ जगत्-विख्यात और पाप-नाशक होगा। शिव के अंतर्धान के बाद नारद लोक-कल्याण हेतु शूलिन शिव की स्थापना कर तीर्थ की प्रतिष्ठा करते हैं। इसके बाद तीर्थ-यात्रा के नियम बताए गए हैं—इन्द्रिय-निग्रह, उपवास, भाद्रपद कृष्ण चतुर्दशी को रात्रि-जागरण, योग्य ब्राह्मण को छत्र आदि दान, शस्त्र से मरे हुए जनों का श्राद्ध, पितरों के लिए कपिला गौ का दान, दान-पुण्य और ब्राह्मण-भोजन, दीप-दान तथा मंदिर में भक्ति-गीत और नृत्य। हव्यवाहन/अग्नि की पूजा और होम (चित्रभानु आदि देवों सहित) को दरिद्रता-नाशक और समृद्धि-प्रद कहा गया है। अंत में रेवाती के उत्तरी तट पर स्थित यह तीर्थ महान पापों का नाश करने वाला परम तीर्थ घोषित किया गया है।

33 verses

Adhyaya 79

Adhyaya 79

दधिस्कन्द-मधुस्कन्दतीर्थमाहात्म्य / The Māhātmya of Dadhiskanda and Madhuskanda Tīrthas

इस अध्याय में श्री मार्कण्डेय राजश्रवणकर्ता को उपदेश देते हैं कि दधिस्कन्द और मधुस्कन्द—ये दोनों तीर्थ अत्यन्त प्रशंसित हैं और पाप-क्षय करने वाले हैं। साधक को वहाँ जाकर स्नान तथा श्रद्धापूर्वक दान-धर्म करने की प्रेरणा दी गई है। दधिस्कन्द तीर्थ में स्नान के बाद द्विज को दही (दधि) का दान करने का विधान है। इसका फल अनेक जन्मों तक रोग, जरा-जन्य कष्ट, शोक और ईर्ष्या से मुक्ति तथा दीर्घकाल तक “शुद्ध” कुल में जन्म बताया गया है। मधुस्कन्द तीर्थ में मधु-मिश्रित तिल का दान और अलग से मधु-मिश्रित पिण्ड का अर्पण करने से अनेक जन्मों तक यमलोक का दर्शन न होना तथा पौत्र-प्रपौत्रों सहित वंश में निरन्तर समृद्धि का फल कहा गया है। अन्त में दही-मिश्रित पिण्ड का भी निर्देश आता है और विधि बताई जाती है कि स्नान के बाद दक्षिणाभिमुख होकर कर्म किया जाए। ऐसा करने से पिता, पितामह और प्रपितामह बारह वर्षों तक तृप्त होते हैं—यह पितृकर्म की स्पष्ट फलश्रुति है।

7 verses

Adhyaya 80

Adhyaya 80

नन्दिकेश्वरतीर्थमाहात्म्य — Nandikeśvara Tīrtha Māhātmya

मार्कण्डेय ऋषि राजा से कहते हैं कि सिद्ध नन्दी से जुड़ा नन्दिकेश्वर तीर्थ अत्यन्त पावन और श्रेष्ठ है। नन्दी संयमित तीर्थयात्रा का आदर्श बनकर रेवातट को अग्रभाग में रखता है और तीर्थ-तीर्थ घूमकर निरन्तर तप करता है। उसकी दीर्घ तपस्या से प्रसन्न होकर शिव वर देते हैं; पर नन्दी धन, पुत्र और विषय-सुख नहीं माँगता, बल्कि जन्म-जन्मान्तर में—यहाँ तक कि अन्य योनियों में भी—शिव के चरणकमलों में अचल भक्ति की याचना करता है। शिव ‘तथास्तु’ कहकर उसे अपने धाम ले जाते हैं और इस तीर्थ की महिमा स्थापित करते हैं। फलश्रुति में कहा गया है कि यहाँ स्नान और त्रिनेत्र शिव की पूजा करने से अग्निष्टोम यज्ञ के समान पुण्य मिलता है। इस तीर्थ में देहत्याग करने वाला शिव का सान्निध्य पाता है, अक्षय कल्प में दीर्घ भोग करता है और फिर शुद्ध कुल में वेदज्ञान तथा दीर्घायु के साथ शुभ जन्म पाता है। अंत में तीर्थ की दुर्लभता और पाप-नाशक शक्ति का विशेष वर्णन है।

12 verses

Adhyaya 81

Adhyaya 81

Varuṇeśvara-tīrtha Māhātmya (Glory of Varuṇeśvara Shrine and Charity)

मार्कण्डेय ऋषि राजा से कहते हैं कि वह परम पावन वरुणेश्वर तीर्थ जाए। वहाँ यह महिमा कही गई है कि वरुण ने गिरिजानाथ शिव को कृच्छ्र और चान्द्रायण आदि तपों से प्रसन्न करके सिद्धि प्राप्त की थी। अध्याय में तीर्थ-विधि बताई गई है—जो वहाँ स्नान करके पितरों और देवताओं का तर्पण करता है तथा भक्तिभाव से शंकर की पूजा करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है। फिर दान का विशेष उपदेश आता है: कुंडिका/वर्धनी या बड़े जलपात्र का दान, साथ में अन्न-दान, अत्यन्त प्रशंसित है; इसका फल बारह वर्ष के सत्र-यज्ञ के पुण्य के समान कहा गया है। आगे कहा गया है कि दानों में अन्नदान सर्वोत्तम है और तुरंत प्रसन्नता देने वाला है। जो शुद्ध संस्कारयुक्त चित्त से इस तीर्थ में देह त्यागता है, वह प्रलय तक वरुणपुरी में निवास करता है; फिर मनुष्यलोक में जन्म लेकर निरंतर अन्नदाता बनता है और सौ वर्ष तक जीता है।

9 verses

Adhyaya 82

Adhyaya 82

Vahnītīrtha–Kauberatīrtha Māhātmya (Glory of the Fire Tīrtha and Kubera Tīrtha)

इस अध्याय में श्री मार्कण्डेय राजपुरुष को तीर्थ-विधि का उपदेश देते हैं। पहले वे वन्हीतीर्थ का निर्देश करते हैं—नर्मदा तट का वह अद्भुत स्थान जहाँ दण्डकारण्य-प्रसंग के बाद हुताशन (अग्नि) ने शुद्धि प्राप्त की मानी जाती है। वहाँ स्नान, महेश्वर-पूजन, भक्ति-आचरण तथा पितरों और देवताओं के लिए तर्पण-आदि कर्म बताए गए हैं; प्रत्येक विधि के लिए निश्चित फल और कुछ कर्मों को महायज्ञों के तुल्य फलदायक कहा गया है। फिर कथा कौबेरतीर्थ की ओर मुड़ती है, जहाँ कुबेर ने यक्षों के अधिपति का पद प्राप्त किया। वहाँ स्नान, उमा सहित जगद्गुरु का पूजन और दान-धर्म—विशेषतः ब्राह्मण को सुवर्ण-दान—का विधान है, तथा पुण्य का परिमाण भी बताया गया है। अंत में “नर्मदा तीर्थ-पञ्चक” की प्रशंसा करते हुए उत्तम परलोक-गति और यह प्रतिपादित किया गया है कि प्रलय में अन्य जल क्षीण हों तब भी रेवा की पवित्रता अक्षुण्ण रहती है।

16 verses

Adhyaya 83

Adhyaya 83

हनूमन्तेश्वरतीर्थमाहात्म्य (Hanūmanteśvara Tīrtha Māhātmya)

Chapter 83 unfolds as a theological discourse between Mārkaṇḍeya and Yudhiṣṭhira concerning a Revā-bank tīrtha called Hanūmanta/Hanūmanteśvara, described as capable of removing grave demerit (including brahmahatyā-type impurity). The chapter first frames the site’s identity: a distinguished liṅga on the southern bank of the Revā. Yudhiṣṭhira asks how the name Hanūmanteśvara arose. Mārkaṇḍeya narrates an epic backstory: after the Rāma–Rāvaṇa conflict and the destruction of rākṣasas, Hanumān is warned by Nandinī that he bears a burden of impurity from extensive killing and is directed to the Narmadā for austerity and bathing. Hanumān performs prolonged worship; Śiva appears with Umā, reassures him of purity through Narmadā māhātmya and divine दर्शन, and grants additional boons, including enumerated honorific names of Hanumān. Hanumān then establishes a liṅga—Hanūmānīśvara/Hanūmanteśvara—described as wish-granting and indestructible. A second exemplum provides “pratyakṣa-pratyaya” (a demonstrative proof) through a later narrative involving King Supārva and his son Śatabāhu, a morally wayward ruler who encounters a brāhmaṇa tasked with immersing bone-remains at Hanūmanteśvara. The brāhmaṇa recounts a princess’s previous-life memory: her body was killed in the forest; a bone fragment fell into the Narmadā at Hanūmanteśvara, resulting in a meritorious rebirth and strong ethical constraint against remarriage. The rite of collecting and immersing remaining bones is prescribed with temporal markers (Aśvina month, dark fortnight, and Śiva-related tithi), alongside night vigil and post-rite bathing. The narrative culminates in heavenly ascent imagery for those properly aligned, while also warning about greed and mental attachment that can obstruct purification. The chapter closes with ritual prescriptions: specific days (aṣṭamī, caturdaśī; especially Aśvina kṛṣṇa caturdaśī), abhiṣeka substances (honey-milk, ghee, curd with sugar, kuśa-water), sandal paste anointing, bilva and seasonal flowers, lamp offering, śrāddha with qualified brāhmaṇas, and strong emphasis on go-dāna as a superior gift. It articulates a theological rationale for the cow as “sarvadevamayī,” and ends with a phala claim: even distant remembrance of Hanūmanteśvara is said to relieve demerit.

118 verses

Adhyaya 84

Adhyaya 84

Kapitīrtha–Hanūmanteśvara–Kumbheśvara Māhātmya (कपितीर्थ–हनूमन्तेश्वर–कुम्भेश्वर माहात्म्य)

अध्याय 84 को मर्कण्डेय ऋषि एक प्राचीन वृत्तान्त के रूप में कहते हैं, जिसका प्रसंग कैलास-भूमि में देवोपदेश की प्राप्ति से जुड़ा है। रावण-वध के बाद राक्षसों का संहार होकर धर्म-व्यवस्था स्थापित होती है; तब हनुमान कैलास जाते हैं, पर नन्दी उन्हें पहले रोक देते हैं। हनुमान राक्षस-वध से जुड़े शेष दोष और उसके प्रायश्चित्त का प्रश्न करते हैं। शिव पवित्र नदियों का वर्णन कर सोमनाथ के निकट रेवा (नर्मदा) के दक्षिण तट पर एक श्रेष्ठ तीर्थ बताते हैं, जहाँ स्नान और कठोर तप से वह अन्धकार/दोष नष्ट होता है। शिव हनुमान को आलिंगन देकर वरदान देते हैं और उस स्थान को ‘कपितीर्थ’ घोषित कर ‘हनूमन्तेश्वर’ नामक लिङ्ग की स्थापना करते हैं; पाप-नाश, पितृ-कार्य, तथा दान-फल की वृद्धि में इसकी महिमा कही जाती है। आगे राम का रेवा-तट पर (विशेषतः 24 वर्षों का) तप, राम-लक्ष्मण द्वारा लिङ्ग-प्रतिष्ठा, और ऋषियों द्वारा विविध तीर्थ-जल के संकलन से कुम्भ-जल की कथा के माध्यम से ‘कुम्भेश्वर/कालाकुम्भ’ का प्रादुर्भाव वर्णित है। फलश्रुति में रेवा-स्नान, लिङ्ग-दर्शन (त्रि-लिङ्ग-दर्शन का विशेष संकेत), श्राद्ध के द्वारा दीर्घकाल तक पितरों के उद्धार, तथा दान—विशेषकर गो-दान और बहुमूल्य दानों—के अक्षय फल का प्रतिपादन है। अंत में ज्योतिष्मतीपुरी और उसके आसपास कुम्भेश्वर आदि लिङ्गों के नियमपूर्वक दर्शन की प्रेरणा देकर इस तीर्थ को रेवाखण्ड के प्रमुख यात्रा-स्थानों में स्थापित किया गया है।

51 verses

Adhyaya 85

Adhyaya 85

सोमनाथतीर्थमाहात्म्य (Somānātha Tīrtha Māhātmya at Revā-saṅgama)

इस अध्याय में युधिष्ठिर मार्कण्डेय से पूछते हैं कि रेवासंगम का वह तीर्थ कौन-सा है जिसे काशी के समान पुण्यदायक और ब्रह्महत्या-नाशक कहा गया है। मार्कण्डेय सृष्टि-वंशावली से दक्ष और चन्द्रदेव सोम तक की कथा कहते हैं—दक्ष के शाप से सोम का क्षय हुआ; तब सोम ने ब्रह्मा की शरण ली, और ब्रह्मा ने रेवातीर्थ के दुर्लभ पर्वों, विशेषतः संगम पर, तप और पूजन करने का उपदेश दिया। सोम ने दीर्घकाल तक शिव की आराधना की; शिव प्रकट हुए और एक अत्यन्त प्रभावशाली लिंग की स्थापना कराई, जो दुःख और महापापों का नाश करता है। उदाहरण में राजा कण्व की कथा आती है—मृग-रूप में ब्राह्मण का वध होने से वह ब्रह्महत्या से पीड़ित हुआ; रेवासंगम में स्नान कर सोमनाथ की पूजा की। लाल वस्त्रधारी कन्या के रूप में ब्रह्महत्या उसका पीछा करती है, पर तीर्थ-प्रभाव से वह दोष से मुक्त हो जाता है। फिर व्रत-विधान बताया गया है—नियत तिथियों में उपवास, रात्रि-जागरण, पंचामृत अभिषेक, नैवेद्य-दीप-धूप, संगीत-वाद्य, योग्य ब्राह्मणों का सत्कार-दान और आचार-नियम। फलश्रुति में कहा है कि सोमनाथ-तीर्थ में प्रदक्षिणा, श्रवण और संयमित साधना से महापाप कटते हैं, आरोग्य-समृद्धि मिलती है और उत्तम लोक प्राप्त होते हैं; साथ ही सोम द्वारा विभिन्न स्थलों पर अनेक लिंग-प्रतिष्ठा का उल्लेख है।

99 verses

Adhyaya 86

Adhyaya 86

Piṅgaleśvara-pratiṣṭhā at Piṅgalāvarta (Agni’s Cure at Revā)

इस अध्याय में युधिष्ठिर पिंगलावर्त में, रेवा के उत्तरी तट पर संगम के निकट स्थित पिंगलेश्वर की उत्पत्ति के विषय में मार्कण्डेय से प्रश्न करते हैं। मार्कण्डेय बताते हैं कि हव्यवाहन (अग्नि) रुद्र के वीर्य से दग्ध होकर रोगग्रस्त हो गए। तब वे तीर्थ-यात्रा करते हुए रेवा तट पर आए और दीर्घकाल तक वायु-आहार आदि कठोर नियमों सहित घोर तपस्या की। शिव प्रसन्न होकर वर देते हैं; अग्नि अपने रोग-निवारण की याचना करते हैं। शिव उस तीर्थ में स्नान का विधान बताते हैं; स्नान करते ही अग्नि तत्काल दिव्य रूप में स्वस्थ हो जाते हैं। कृतज्ञ होकर अग्नि वहाँ पिंगलेश्वर की प्रतिष्ठा करते हैं और नामोच्चारण सहित पूजा तथा स्तुतियाँ करते हैं। अंत में फलश्रुति है—जो क्रोध को जीतकर वहाँ उपवास करता है, उसे अद्भुत फल मिलता है और अंततः रुद्र-सदृश गति प्राप्त होती है। साथ ही, अलंकृत कपिला गाय को बछड़े सहित योग्य ब्राह्मण को दान देना परम लक्ष्य तक ले जाने वाला कहा गया है।

16 verses

Adhyaya 87

Adhyaya 87

ऋणमोचनतीर्थमाहात्म्य (R̥ṇamocana Tīrtha Māhātmya) — The Glory of the Debt-Removing Pilgrimage Site

मार्कण्डेय राजा को रेवातट (नर्मदा) पर स्थित अत्यन्त पुण्य तीर्थ ‘ऋणमोचन’ में जाने की आज्ञा देते हैं। यह तीर्थ ब्रह्मवंशीय ऋषियों की सभाओं द्वारा प्रतिष्ठित बताया गया है, जिससे इसकी विधिसम्मत पवित्रता और अधिकार सिद्ध होता है। यहाँ ‘ऋण’ के निवारण का मुख्य विधान कहा गया है—जो साधक छह मास तक भक्ति से पितृ-तर्पण करता है, वह नर्मदा-स्नान के साथ देवऋण, पितृऋण और मनुष्यऋण से विशेष रूप से मुक्त हो जाता है। कर्मों के फल, पाप सहित, वहाँ फल के समान प्रत्यक्ष होने की बात कहकर धर्म-कारणता को दृढ़ किया गया है। आचरण में एकाग्रता, इन्द्रिय-निग्रह, स्नान, दान और गिरिजापति (शिव) की पूजा का निर्देश है। फलस्वरूप ऋणत्रय से मुक्ति तथा स्वर्ग में देवतुल्य तेजस्वी अवस्था प्राप्त होती है।

6 verses

Adhyaya 88

Adhyaya 88

Kapila-Tīrtha and Kapileśvara Pūjā (कापिलतीर्थ–कपिलेश्वरपूजा)

अध्याय 88 में कापिलतीर्थ की पूजा-विधि और फल का वर्णन है। इसे कपिल मुनि द्वारा स्थापित, सर्वपाप-नाशक तीर्थ कहा गया है। मार्कण्डेय राजा से कहते हैं कि शुक्ल पक्ष की विशेषतः अष्टमी और चतुर्दशी को स्नान करके देव-सेवा करे; कपिला गाय के दूध और घी से कपिलेश्वर का अभिषेक करे, श्रीखण्ड (चन्दन) का लेप लगाए और सुगन्धित श्वेत पुष्पों से, क्रोध को जीतकर, पूजन करे। फलश्रुति में कहा है कि कपिलेश्वर के भक्त यम-लोक की दण्ड-भूमियों से बच जाते हैं; इस उपासना से विद्वानों को यातना के भयावह दृश्य नहीं देखने पड़ते। आगे तीर्थ-धर्म को लोक-कर्तव्य से जोड़ते हुए कहा गया है कि रेवा के पुण्य जल में स्नान के बाद शुभ ब्राह्मणों को भोजन कराए और गाय, वस्त्र, तिल, छत्र तथा शय्या का दान करे—इससे राजा धर्मात्मा बनता है। अंत में तेज, बल, जीवित पुत्र, मधुर वाणी और शत्रु-पक्ष का अभाव जैसे लाभ बताए गए हैं।

8 verses

Adhyaya 89

Adhyaya 89

पूतिकेश्वरमाहात्म्य (Glory of Pūtikēśvara)

इस अध्याय में मार्कण्डेय एक राजा को उपदेश देते हैं कि नर्मदा के दक्षिण तट पर स्थित पूतिकेश्वर का परम तीर्थ अवश्य जाना चाहिए, जहाँ स्नान से समस्त पापों का क्षय होता है। इस स्थान की प्रतिष्ठा की कथा में कहा गया है कि जाम्बवान ने लोक-कल्याण के लिए यहाँ शिवलिंग की स्थापना की। एक अन्य प्रसंग में राजा प्रसेनजित और उसके वक्षस्थल से जुड़े मणि का उल्लेख आता है; जब वह रत्न बलपूर्वक निकाला गया या फेंक दिया गया, तो घाव उत्पन्न हो गया। इसी तीर्थ में तपस्या करने से वह रोग-शोक से मुक्त होकर ‘निर्व्रण’ (घाव-रहित) हुआ—यहाँ की आरोग्य-शक्ति का संकेत है। अंत में विधि बताई गई है कि जो भक्त श्रद्धा-भक्ति से यहाँ स्नान कर परमेश्वर की पूजा करते हैं, वे मनोवांछित फल पाते हैं। विशेषकर कृष्णाष्टमी और चतुर्दशी को नियमित आराधना करने वाले यमलोक को नहीं जाते—ऐसी फलश्रुति के साथ पुराणोक्त नैतिक कारण-कार्य का प्रतिपादन किया गया है।

6 verses

Adhyaya 90

Adhyaya 90

चक्रतीर्थ-माहात्म्य (Cakratīrtha Māhātmya) and जलशायी-तीर्थ (Jalśāyī Tīrtha) on the Revā/Narmadā

इस अध्याय में मार्कण्डेय, युधिष्ठिर के प्रश्न के उत्तर में चक्रतीर्थ की उत्पत्ति, भगवान विष्णु की अनुपम शक्ति और रेवा/नर्मदा-संबंधी पुण्य का फल बताते हैं। तालमेघ नामक दैत्य देवताओं को पराजित कर देता है; देव पहले ब्रह्मा की शरण जाते हैं, फिर क्षीरसागर में जलशायी विष्णु की स्तुति करते हैं। विष्णु लोक-व्यवस्था की रक्षा का वचन देकर गरुड़ पर आरूढ़ होते हैं और क्रमशः अस्त्र-शस्त्रों से दैत्य का प्रतिकार करते हुए अंत में सुदर्शन चक्र छोड़कर उसका वध करते हैं। विजय के बाद सुदर्शन चक्र रेवा के जल में जलशायी-तीर्थ के निकट गिरकर “शुद्ध” होता है—इसी से चक्रतीर्थ का नाम और प्रभाव प्रतिष्ठित होता है। आगे मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी आदि शुभ समय में संयम और भक्ति से स्नान, देव-दर्शन, रात्रि-जागरण, प्रदक्षिणा, अर्पण तथा योग्य ब्राह्मणों के साथ श्राद्ध का विधान कहा गया है। तिलधेनु-दान की मर्यादा, दाता की शुद्ध आचरण-नीति और मृत्यु के बाद भयावह लोकों से पार होने का फल बताया गया है; अंत में श्रवण-पाठ से पवित्रता और पुण्य-वृद्धि की फलश्रुति दी गई है।

116 verses

Adhyaya 91

Adhyaya 91

चण्डादित्य-तीर्थ-माहात्म्य (Glory of the Caṇḍāditya Tīrtha)

मार्कण्डेय ऋषि राजा को चण्डादित्य-तीर्थ की परम पावन महिमा सुनाते हैं। नर्मदा के शुभ तट पर उग्र दैत्य चण्ड और मुण्ड दीर्घ तप करते हुए त्रिलोकों के अन्धकार-नाशक सूर्य (भास्कर) का ध्यान करते हैं। सहस्रांशु प्रसन्न होकर वर देते हैं; वे सभी देवताओं के विरुद्ध अजेयता और सदा रोग-रहित रहने का वर माँगते हैं। सूर्य यह वर देकर उसी स्थान पर उनकी भक्ति से स्थापित (स्थापना) होकर उस तीर्थ से सम्बद्ध हो जाते हैं। फिर तीर्थ-यात्रा की विधि और फल कहा गया है—आत्मसिद्धि के लिए वहाँ जाना चाहिए, देवों, मनुष्यों और पितरों का तर्पण करना चाहिए, और घी का दीपक अर्पित करना चाहिए, विशेषतः षष्ठी तिथि को। चण्डभानु/चण्डादित्य की उत्पत्ति-कथा सुनने से पाप नष्ट होते हैं, सूर्यलोक की प्राप्ति होती है, तथा दीर्घकाल तक विजय और रोग-मुक्ति बनी रहती है।

10 verses

Adhyaya 92

Adhyaya 92

Yamahāsya-tīrtha Māhātmya (यमहास्यतीर्थमाहात्म्य) — Theological Discourse on the ‘Yamahāsya’ Shrine on the Narmadā

यह अध्याय संवाद-रूप में है। युधिष्ठिर मार्कण्डेय से नर्मदा-तट के ‘यमहास्य’ तीर्थ की उत्पत्ति पूछते हैं। मार्कण्डेय बताते हैं कि धर्मराज यम पहले ही रेवा में स्नान करने आए और एक ही डुबकी से होने वाली महान शुद्धि देखकर विचार करते हैं कि पाप-भार से दबे लोग भी उनके लोक में पहुँचते हैं, जबकि रेवा-स्नान को शुभ, यहाँ तक कि वैष्णव-गति देने वाला कहा गया है। जो समर्थ होकर भी पवित्र नदी का दर्शन नहीं करते, उन पर यम हँसते हैं और वहाँ ‘यमहासेश्वर’ देवता की स्थापना करके प्रस्थान करते हैं। फिर व्रत-विधान आता है—आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को भक्तिपूर्वक उपवास, रात्रि-जागरण और घी के दीपक से देवता का प्रबोधन; इसे अनेक प्रकार के दोषों का नाशक कहा गया है। अमावस्या को क्रोध-निग्रह (जितक्रोध) के साथ ब्राह्मणों का सम्मान और दान-धर्म बताया गया है—स्वर्ण/भूमि/तिल, कृष्णाजिन, तिल-धेनु तथा विशेष रूप से महिषी-धेनु दान का विस्तृत विधान। यमलोक की भयावह यातनाओं का उपदेश भी है, पर तीर्थ-स्नान और दान के प्रभाव से वे निष्फल हो जाती हैं। अंत में फलश्रुति कहती है कि इस माहात्म्य का श्रवण मात्र भी दोषों से मुक्त करता है और यमधाम का दर्शन नहीं होने देता।

30 verses

Adhyaya 93

Adhyaya 93

कल्होडीतीर्थमाहात्म्य (Kalhoḍī Tīrtha Māhātmya)

इस अध्याय में मार्कण्डेय युधिष्ठिर को रेवातट (नर्मदा-तट) पर स्थित प्रसिद्ध कल्होडी-तीर्थ का माहात्म्य बताते हैं। यह तीर्थ भारत में पापहर और गङ्गा के समान शुद्धिकारक कहा गया है; साधारण मनुष्यों के लिए इसका पहुँचना कठिन बताया गया, जिससे इसकी विशेष पवित्रता प्रकट होती है। ‘यह पुण्य तीर्थ है’—यह शूलिन (शिव) का वचन मानकर इसकी प्रतिष्ठा स्थापित की गई है; साथ ही यह भी कहा गया कि जाह्नवी (गङ्गा) पशु-रूप में वहाँ स्नान करने आई थीं, जिससे तीर्थ की ख्याति का कारण समझाया गया। पौर्णिमा के समय तीन रात्रियों का व्रत करने, और रज-तम, क्रोध, दम्भ तथा ईर्ष्या जैसे दोषों का त्याग करने का विधान है। तीन दिनों तक प्रतिदिन तीन बार, वत्सयुक्त गाय के दूध को मधु मिलाकर ताम्रपात्र से देव का अभिषेक करते हुए ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जप करना चाहिए। फल में स्वर्ग-प्राप्ति तथा दिव्य स्त्रियों का संग बताया गया है; और जो विधिपूर्वक स्नान करके मृतकों के निमित्त दान देते हैं, उनके पितर तृप्त होते हैं। विशेष दान के रूप में श्वेत वत्सयुक्त गाय को वस्त्र से सजाकर, स्वर्ण सहित, शुद्ध और गृहधर्मनिष्ठ ब्राह्मण को देने से शाम्भव-लोक की प्राप्ति कही गई है।

11 verses

Adhyaya 94

Adhyaya 94

नन्दितीर्थ-माहात्म्य (Nanditīrtha Māhātmya)

इस अध्याय में श्री मार्कण्डेय युधिष्ठिर से नर्मदा-तट स्थित नन्दितीर्थ की यात्रा-क्रमविधि कहते हैं। यह तीर्थ अत्यन्त शुभ और सर्वपाप-नाशक बताया गया है, तथा पूर्वकाल में शैव-परिचर नन्दि द्वारा इसके निर्माण के कारण इसकी महिमा विशेष रूप से वर्णित है। नन्दिनाथ में अहोरात्र-उषित (एक दिन-रात निवास) करने का विधान है, जिससे साधना का प्रभाव बढ़ता है। नन्दिकेश्वर की पञ्चोपचार-पूजा का निर्देश देकर तीर्थ-सेवा को शास्त्रोक्त भक्ति-विधि से जोड़ा गया है। दान का भी उपदेश है—विशेषतः ब्राह्मणों को रत्न-दान—जिससे तीर्थयात्रा धर्म और लोकहित से संयुक्त होती है। फल के रूप में पिनाकी शिव के परम धाम की प्राप्ति, सर्वकल्याण, तथा अप्सराओं के संग दिव्य भोग का वर्णन है, जहाँ मोक्ष-भाव और स्वर्गीय सुख दोनों का पुराणोचित समन्वय दिखता है।

5 verses

Adhyaya 95

Adhyaya 95

Badrikāśrama–Narmadā-tīra: Śiva-liṅga-sthāpana, Vrata, and Śrāddha-Vidhi (Chapter 95)

मार्कण्डेय राजाओं से कहते हैं कि शम्भु द्वारा पूर्व में प्रशंसित, श्रेष्ठ बदरिकाश्रम तीर्थ में जाना चाहिए। यह स्थान नर-नारायण से जुड़ा है; जो जनार्दन का भक्त होकर सभी प्राणियों में—उच्च-नीच सहित—समता देखता है, वही भगवान को प्रिय होता है। नर-नारायण ने वहाँ आश्रम स्थापित किया और लोक-कल्याण हेतु शंकर की प्रतिष्ठा की; त्रिमूर्ति-संबद्ध शिवलिंग स्वर्ग-मार्ग और मोक्ष प्रदान करने वाला बताया गया है। व्रत-विधि में शुद्धि, एक रात्रि उपवास, रज-तम का त्याग कर सात्त्विक भाव धारण करना और विशेष तिथियों में रात्रि-जागरण कहा गया है—मधु मास की अष्टमी, दोनों पक्षों की चतुर्दशी, विशेषतः आश्विन में। शिव का अभिषेक पंचामृत (दूध, मधु, दही, शर्करा, घृत) से करने का विधान है। फल-श्रुति में शिव-सान्निध्य और इन्द्रलोक की प्राप्ति कही गई; शूलपाणि को अपूर्ण नमस्कार भी बंधन ढीला करता है और “नमः शिवाय” का निरन्तर जप पुण्य को स्थिर करता है। नर्मदा-जल से श्राद्ध का विधान भी है—पात्र ब्राह्मणों को ही देना, दुराचारी/अपात्र कर्मकाण्डियों का त्याग करना। स्वर्ण, अन्न, वस्त्र, गौ, वृषभ, भूमि, छत्र आदि दान प्रशंसित हैं और स्वर्ग-प्राप्ति बताई गई है। तीर्थ में या समीप, जल में भी, मृत्यु होने पर शिवधाम, दीर्घ दिव्य-वास और फिर स्मरण-युक्त समर्थ राजा के रूप में जन्म लेकर पुनः उसी तीर्थ में आने का वर्णन है।

28 verses

Adhyaya 96

Adhyaya 96

Koṭīśvara-tīrtha Māhātmya (कोटीश्वरतीर्थमाहात्म्य) — Theological Account of the Koṭīśvara Pilgrimage Site

मार्कण्डेय राजा से कहते हैं कि वह परम तीर्थ कोटीश्वर जाए। यह स्थान इसलिए सर्वोच्च माना गया है कि यहाँ ‘ऋषियों की कोटि’ का महासमागम हुआ था। आगे बताया गया है कि श्रेष्ठ ऋषियों ने शुभ वैदिक मंत्रों के ज्ञाता द्विजों से परामर्श करके लोक-कल्याण और रक्षा हेतु वहाँ शंकर-लिंग की स्थापना की; यह धाम बंधन-नाशक, संसार-छेदक और प्राणियों के दुःख हरने वाला कहा गया है। पूर्णिमा के दिन, विशेषतः श्रावण पूर्णिमा को, श्रद्धा-भक्ति से स्नान करने का विशेष विधान बताया गया है। फिर पितृकर्म का महत्त्व आता है—तर्पण और विधिपूर्वक पिंडदान करने से पितर कल्पांत तक अक्षय तृप्ति पाते हैं। अध्याय के अंत में रेवा-तट पर स्थित इस तीर्थ को ‘गुप्त’ और परम पितृस्थान बताकर, ऋषि-निर्मित तथा सर्वप्राणियों को मोक्ष देने वाला कहा गया है।

7 verses

Adhyaya 97

Adhyaya 97

Vyāsatīrtha-prādurbhāvaḥ — Origin and Merit of Vyāsa Tīrtha (व्यासतीर्थप्रादुर्भावः)

इस अध्याय में मārkaṇḍeya, राजा युधिष्ठिर से व्यासतīर्थ की दुर्लभता और महान पुण्य-प्रभाव का वर्णन करते हैं। इसे ‘अन्तरिक्ष में स्थित’ कहा गया है, जिसका कारण रेवā/नर्मदā की अद्भुत शक्ति बताई गई है। फिर कारण-कथा आती है—पराशर का तप, नाविक-कन्या का राजकुल में जन्मी सत्यवती/योजनगन्धा के रूप में प्रकट होना, पत्र ले जाने वाले तोते द्वारा बीज का संचार, तोते की मृत्यु, बीज का मछली में प्रवेश और कन्या का उद्भव—जिससे महर्षि व्यास का जन्म सिद्ध होता है। इसके बाद व्यास की तीर्थ-यात्रा और नर्मदा-तट पर तप का प्रसंग है। शिव उपासना से प्रसन्न होकर प्रकट होते हैं और नर्मदा भी व्यास के स्तोत्र से अनुग्रह करती हैं। एक धर्म-संकट उठता है—ऋषि दक्षिण तट पार करने से व्रत-भंग के भय से आतिथ्य नहीं लेना चाहते; व्यास नर्मदा से विनती करते हैं, पहले अस्वीकार होता है, व्यास मूर्छित हो जाते हैं, देवगण चिन्तित होते हैं, अंततः नर्मदा मान जाती हैं। तब स्नान, तर्पण, होम आदि कर्म और लिङ्ग-प्रादुर्भाव से तीर्थ का नाम प्रतिष्ठित होता है। अंत में कार्त्तिक शुक्ल चतुर्दशी और पूर्णिमा के उच्च-फल व्रतों की विधि, लिङ्गाभिषेक के द्रव्य, पुष्प-समर्पण, मंत्र-जप के विकल्प, योग्य ब्राह्मण-पात्र के लक्षण और दान-वस्तुओं का निर्देश है। फलश्रुति में यमलोक-भय से रक्षा, अर्पणानुसार क्रमिक फल, तथा इस तीर्थ-प्रभाव से शुभ परलोक-गति का प्रतिपादन किया गया है।

185 verses

Adhyaya 98

Adhyaya 98

प्रभासेश्वर-माहात्म्य (Prabhāseśvara Māhātmya) — The Glory of the Prabhāseśvara Tīrtha

इस अध्याय में मार्कण्डेय युधिष्ठिर को त्रिलोकों में प्रसिद्ध प्रभासेश्वर तीर्थ—‘स्वर्ग-सोपान’—के दर्शन का उपदेश देते हैं। युधिष्ठिर उसके उद्भव और फल का संक्षिप्त वर्णन पूछते हैं। कथा में प्रभा, जो रवि (सूर्य) की पत्नी होकर भी अपने दुर्भाग्य से पीड़ित है, एक वर्ष तक वायु-आहार से कठोर तप और ध्यान करती है; तब शिव प्रसन्न होकर वर देते हैं। प्रभा कहती है कि स्त्री का देवता पति ही है, गुण-दोष से परे; और अपने दुःख का कारण निवेदित करती है। शिव कृपा से पति-प्रसाद का आश्वासन देते हैं; उमा व्यवहारिकता पर प्रश्न करती हैं, तभी भानु नर्मदा के उत्तर तट पर आते हैं। शिव सूर्य को प्रभा की रक्षा और संतोष का आदेश देते हैं; उमा प्रभा को पत्नियों में श्रेष्ठ बनाने की प्रार्थना करती हैं और सूर्य स्वीकार करते हैं। प्रभा तीर्थ के ‘उन्मीलन’ हेतु सूर्य के अंश को वहीं स्थिर रहने का वर मांगती है; सर्वदेवमय लिंग स्थापित होकर ‘प्रभासेश’ कहलाता है। फिर तीर्थ-धर्म बताया गया है—प्रभासेश्वर में स्नान आदि से तुरंत इच्छित फल मिलता है, विशेषकर माघ शुक्ल सप्तमी को। ब्राह्मणों के मार्गदर्शन में अश्व-संबंध, भक्तिपूर्वक स्नान और द्विजों को दान का विधान है; गो-दान के विशिष्ट लक्षणों सहित दान-प्रकार बताए गए हैं। फलश्रुति में कहा है कि यहाँ स्नान और विशेषतः कन्या-दान से बड़े पाप भी नष्ट होते हैं; सूर्यलोक और रुद्रलोक की प्राप्ति तथा महायज्ञों के तुल्य फल मिलता है। गो-दान की महिमा को कालातीत बताकर विशेष रूप से चतुर्दशी का महत्व कहा गया है।

35 verses

Adhyaya 99

Adhyaya 99

Nāgeśvara-liṅga at the Southern Bank of Revā (Vāsuki’s Atonement and Tīrtha Procedure) / रेवायाः दक्षिणतटे नागेश्वरलिङ्गमाहात्म्यम्

यह अध्याय प्रश्नोत्तर रूप में है। युधिष्ठिर पूछते हैं कि रेवा़ (नर्मदा) के दक्षिण तट पर वासुकि की स्थापना क्यों हुई। मार्कण्डेय बताते हैं कि शम्भु के नृत्य के समय शिव के मुकुट से गङ्गाजल-मिश्रित स्वेद प्रकट हुआ; एक सर्प ने उसे पी लिया, जिससे माण्डाकिनी क्रुद्ध हुई और शाप-सदृश परिणाम से वह अजगर-भाव (जड़/अवरोधित अवस्था) में गिर पड़ा। तब वासुकि दीन वचनों से नदी की पावन शक्ति की स्तुति कर करुणा की याचना करता है। गङ्गा उसे विन्ध्य में शङ्कर की तपस्या करने का विधान देती हैं। दीर्घ तप के बाद शिव प्रसन्न होकर वर देते हैं और वासुकि को रेवा़ के दक्षिण तट पर विधिपूर्वक स्नान करने का आदेश देते हैं। वासुकि नर्मदा में प्रवेश कर शुद्ध होता है और वहीं पापहर प्रसिद्ध नागेश्वर-लिङ्ग की स्थापना का वर्णन आता है। अंत में तीर्थ-प्रक्रिया और फलश्रुति कही गई है—अष्टमी या चतुर्दशी को मधु से शिवाभिषेक करें; संगम में स्नान करने से निःसंतान को सुयोग्य संतान मिलती है; उपवास सहित श्राद्ध करने से पितरों को शांति मिलती है; तथा नाग-प्रसाद से वंश सर्प-भय से सुरक्षित रहता है।

22 verses

Adhyaya 100

Adhyaya 100

Mārkaṇḍeśa Tīrtha Māhātmya (मार्कण्डेशतीर्थमाहात्म्य) — Summary of Merits and Ritual Observances

इस अध्याय में मार्कण्डेय मुनि राजा को “महीपाल” और “पाण्डुनन्दन” कहकर नर्मदा के दक्षिण तट पर स्थित अत्यन्त प्रशंसित मार्कण्डेश तीर्थ की यात्रा का उपदेश देते हैं। वे बताते हैं कि यह स्थान देवताओं द्वारा भी पूज्य है और शैव-उपासना का गोपनीय केन्द्र है। स्वयं मार्कण्डेय ने वहाँ पवित्र प्रतिष्ठा की थी और शंकर की कृपा से उन्हें मोक्षदायिनी ज्ञान-प्राप्ति हुई—ऐसा वे साक्ष्य रूप में कहते हैं। तीर्थ में जल में प्रवेश करते समय जप करने से संचित पाप नष्ट होते हैं; मन, वाणी और कर्म से हुए अपराध भी शुद्ध हो जाते हैं। दक्षिण दिशा की ओर मुख करके खड़े होकर पिण्डिका धारण कर, शूलधारी शिव के विविध रूपों का एकाग्र भक्तियोग से पूजन करने पर देहान्त के बाद शिव-लोक की प्राप्ति बताई गई है। अष्टमी की रात्रि में घृत-दीप जलाने से स्वर्ग-लोक की सिद्धि, तथा वहीं श्राद्ध करने से प्रलय-पर्यन्त पितरों की तृप्ति कही गई है। इङ्गुद, बदर, बिल्व, अक्षत या केवल जल से तर्पण करने पर कुल के लिए ‘जन्म-फल’ प्राप्त होता है—इस प्रकार यह अध्याय उस विशिष्ट नदी-तट पर आचार और फल का संक्षिप्त विधान देता है।

10 verses

Adhyaya 101

Adhyaya 101

Saṅkarṣaṇa-Tīrtha Māhātmya (संकर्षणतीर्थमाहात्म्य) — The Glory of Saṅkarṣaṇa Tīrtha

अध्याय 101 में मर्कण्डेय राजाओं से कहते हैं कि नर्मदा के उत्तरी तट पर, यज्ञवाट के मध्य भाग में, ‘संकर्षण’ नाम का अत्यन्त शुभ तीर्थ है, जो पापों का नाश करने वाला है। इस तीर्थ की पवित्रता का कारण बलभद्र का वहाँ पूर्वकाल में किया गया तप तथा वहाँ शम्भु-उमा, केशव और देवगणों का निरन्तर सान्निध्य बताया गया है। प्राणियों के उपकार हेतु बलभद्र ने परम भक्ति से वहाँ शंकर की स्थापना की और उसे विधिवत् कर्मकाण्ड का केन्द्र बनाया। आगे विधान है—जो भक्त क्रोध और इन्द्रियों को वश में रखकर वहाँ स्नान करे, वह शुक्ल पक्ष की एकादशी को मधु से शिव का अभिषेक कर पूजन करे। वहाँ पितरों के लिए श्राद्ध-दान करने की भी आज्ञा है; इससे बलभद्र के कथनानुसार परम पद की प्राप्ति होती है।

7 verses

Adhyaya 102

Adhyaya 102

मन्मथेश्वर-तीर्थमाहात्म्य (Glory of the Manmatheśvara Tīrtha)

इस अध्याय में मुनि मार्कण्डेय राजश्रोता को देवताओं द्वारा पूजित शैव तीर्थ ‘मन्मथेश्वर’ के दर्शन‑स्नान की विधि और फल‑क्रम समझाते हैं। केवल स्नान को भी रक्षाकारी और पुण्यदायक कहा गया है; मन की शुद्धि के साथ स्नान और एक रात्रि का उपवास महान फल देता है; तीन रात्रियों तक किए गए व्रत‑अनुष्ठान क्रमशः और अधिक पुण्य प्रदान करते हैं। रात्रि में भगवान के सम्मुख जागरण, गीत‑वाद्य, नृत्य आदि भक्ति‑कर्मों को परमेेश्वर को प्रसन्न करने वाला बताया गया है। मन्मथेश्वर को स्वर्ग‑प्राप्ति की ‘सीढ़ी’ के समान कहा गया है, जहाँ काम भी शुद्ध भक्ति के मार्ग में पवित्र रूप से प्रवाहित होता है। संध्या समय श्राद्ध और दान का विधान है; विशेष रूप से अन्नदान की प्रशंसा की गई है। चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को गोदान तथा रात्रि‑जागरण में घृत‑दीप अर्पित करने का निर्देश देकर अंत में स्त्री‑पुरुष दोनों के लिए समान पुण्यफल बताया गया है।

13 verses

Adhyaya 103

Adhyaya 103

एरण्डीसङ्गममाहात्म्य — The Māhātmya of the Eraṇḍī–Reva Confluence

अध्याय 103 संवाद-परम्परा में चलता है। मार्कण्डेय राजा को एरण्डी–रेवा संगम की ओर भेजते हैं और बताते हैं कि यह रहस्य शिव ने पार्वती से “गुह्य से भी अधिक गुह्य” रूप में कहा था। शिव अत्रि और अनसूया के संतानहीन होने का प्रसंग उठाकर बताते हैं कि संतान कुलधर्म का आधार और परलोक-कल्याण का सहारा है। अनसूया रेवा के उत्तरी तट पर संगम में दीर्घ तप करती हैं—ग्रीष्म में पंचाग्नि, वर्षा में चान्द्रायण, शीत में जल-निवास; साथ ही नित्य स्नान, संध्या, देव-ऋषि तर्पण, होम और पूजा। तब ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र छिपे हुए द्विज-रूप में प्रकट होकर अपने ऋतु-तत्त्व बताते हैं—वर्षा/बीज, शीत/पालन, ग्रीष्म/शोषण—और वर देते हैं, जिससे तीर्थ की नित्य पवित्रता और मनोकामना-पूर्ति की शक्ति स्थापित होती है। आगे विशेषकर चैत्र मास में संगम-स्नान, रात्रि-जागरण, द्विज-भोजन, पिण्डदान, प्रदक्षिणा और विविध दानों का विधान है, जिनका फल कई गुना कहा गया है। दूसरा दृष्टान्त गृहस्थ गोविन्द का है, जो लकड़ी बटोरते समय अनजाने में बाल-वध कर बैठता है; बाद में उसे जो शारीरिक पीड़ा होती है, उसे कर्मफल माना जाता है। संगम-स्नान तथा पूजा-दानाादि से वह शान्ति पाता है—यह तीर्थ-आचरण द्वारा प्रायश्चित्त का धर्मोपदेश है। अंत में श्रवण-पाठ, वहाँ निवास/उपवास, और जल-मृदा के स्पर्श मात्र से भी पुण्य-वृद्धि की फलश्रुति दी गई है।

210 verses

Adhyaya 104

Adhyaya 104

सौवर्णशिला-तीर्थमाहात्म्य (Glory of the Sauvarṇaśilā Tīrtha)

मार्कण्डेय राजा को उपदेश देते हैं कि वह रेवाती (रेवा) के उत्तरी तट पर संगम के निकट स्थित प्रसिद्ध सौवर्णशिला तीर्थ जाए। यह स्थान समस्त पापों का नाश करने वाला, पूर्वकाल में ऋषिगणों द्वारा प्रतिष्ठित, दुर्लभ तथा सीमित परंतु अत्यन्त प्रभावशाली पुण्यक्षेत्र बताया गया है। विधि क्रम से कही गई है—सौवर्णशिला में स्नान करें, महेश्वर की पूजा करें, भास्कर (सूर्य) को प्रणाम करें, और फिर घी मिले बिल्व या बिल्वपत्रों से पवित्र अग्नि में आहुति दें। एक संक्षिप्त प्रार्थना भी दी गई है—हे प्रभु, प्रसन्न हों और रोगों का शमन करें। इसके बाद दान का माहात्म्य आता है—योग्य ब्राह्मण को सुवर्णदान, बहुत-से सुवर्णदान और महान यज्ञ के श्रेष्ठ फल के समान माना गया है। इससे मृत्यु के बाद स्वर्गगमन, रुद्र के सान्निध्य में दीर्घ निवास, फिर अवतरण पर शुद्ध व समृद्ध कुल में शुभ जन्म तथा उस तीर्थजल का स्मरण बना रहने का फल बताया गया है।

9 verses

Adhyaya 105

Adhyaya 105

करञ्जातीर्थगमनफलम् | The Merit of Going to the Karañjā Tīrtha

इस अध्याय में मुनि मार्कण्डेय ‘राजेन्द्र’ से करञ्जा तीर्थ जाने की विधि और उसका फल संक्षेप में कहते हैं। साधक को उपवास रखते हुए और इन्द्रियों को संयम में रखकर करञ्जा जाना चाहिए; वहाँ स्नान करने मात्र से वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। इसके बाद महादेव का भक्तिपूर्वक पूजन और श्रद्धा से दान करने का विधान बताया गया है। दान में सुवर्ण, रजत, मणि‑मुक्ता‑प्रवाल आदि तथा पादुका, छत्र, शय्या और आच्छादन जैसे उपयोगी पदार्थों का उल्लेख है। इस तीर्थसेवा, शैवपूजा और दानधर्म का फल ‘कोटि‑कोटि‑गुण’ बताया गया है।

4 verses

Adhyaya 106

Adhyaya 106

Mahīpāla Tīrtha Māhātmya (Auspiciousness Rite to Umā–Rudra) | महीपालतीर्थमाहात्म्य (उमारुद्र-सौभाग्यविधिः)

इस अध्याय में मārkaṇḍeya राजा को महīपाल-तीर्थ का माहात्म्य और विधि बताते हैं। नर्मदा-तट पर स्थित यह तीर्थ अत्यन्त रमणीय और सौभाग्यदायक कहा गया है; स्त्री-पुरुष दोनों के लिए, विशेषतः जिन पर दुर्भाग्य का प्रभाव हो, यह कल्याणकारी है। यहाँ उमā और रुद्र की विशेष पूजा का विधान है—इन्द्रिय-निग्रह सहित संयमित आचरण, तृतीया तिथि का उपवास, और योग्य ब्राह्मण दम्पति को श्रद्धापूर्वक आमंत्रित करना। विधि में आदर-सत्कार का विस्तार है—सुगन्ध, माला, सुगन्धित वस्त्र, पायस और खिचड़ी (कृसरा) से भोजन, फिर प्रदक्षिणा तथा महादेव-गौरी की कृपा और अवियोग (अविच्छेद) की कामना वाला भक्तिवचन। उपेक्षा करने पर दरिद्रता, शोक और जन्म-जन्मान्तर तक वन्ध्यत्व आदि दुर्भाग्य बढ़ने की बात कही गई है; जबकि विशेषकर ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की तृतीया को विधिपूर्वक करने से पाप-नाश और दानों से पुण्य-वृद्धि होती है। ब्राह्मणी और ब्राह्मण को गौरी-शिव के स्वरूप मानकर पूजना, सिन्दूर-कुमकुम आदि मङ्गल द्रव्यों का अर्पण, आभूषण, अन्न, भोजन आदि दान का भी निर्देश है। फलश्रुति में बढ़ा हुआ पुण्य, शङ्कर के अनुकूल उत्तम भोग, प्रचुर सौभाग्य, निःसन्तान को पुत्र-लाभ, निर्धन को धन-लाभ, और नर्मदा पर इस तीर्थ का कामना-पूर्ति-स्थल होना प्रतिपादित है।

20 verses

Adhyaya 107

Adhyaya 107

भण्डारीतीर्थमाहात्म्य (Bhaṇḍārī Tīrtha Māhātmya: The Glory of Bhaṇḍārī Pilgrimage Site)

इस अध्याय में श्री मार्कण्डेय ऋषि राजा को रेवाखण्ड के अंतर्गत एक संक्षिप्त तीर्थ-उपदेश देते हैं। वे उसे परम प्रसिद्ध भण्डारी-तीर्थ जाने की आज्ञा देते हैं और बताते हैं कि वहाँ का प्रभाव ऐसा है कि उन्नीस युगों तक ‘दारिद्र्य-च्छेद’—गरीबी का नाश—होता है। माहात्म्य का कारण भी कहा गया है—कुबेर (धनद) ने वहाँ तप किया; पद्मसम्भव ब्रह्मा प्रसन्न हुए और उसी स्थान पर अल्प दान से भी धन की रक्षा का वर प्रदान किया। इसलिए नियम बताया गया है कि जो भक्तिभाव से वहाँ जाकर स्नान करे और दान दे, उसके धन में क्षय या बाधा (वित्त-परिच्छेद) नहीं होती; समृद्धि का स्थैर्य संग्रह से नहीं, बल्कि तीर्थ, भक्ति और संयमित दान से होता है।

4 verses

Adhyaya 108

Adhyaya 108

रोहिणीतीर्थमाहात्म्य (Rohiṇī Tīrtha Māhātmya)

इस अध्याय में मार्कण्डेय राजा को रोहिणी-तीर्थ का उपदेश देते हैं, जिसे तीनों लोकों में प्रसिद्ध और पाप-दोष का शोधन करने वाला कहा गया है। युधिष्ठिर इसके फल का स्पष्ट वर्णन पूछते हैं, तब कथा प्रलय-काल से आरम्भ होती है—जलराशि पर शयन करने वाले पद्मनाभ/चक्रधारी विष्णु की नाभि से तेजस्वी कमल प्रकट होता है और उससे ब्रह्मा उत्पन्न होते हैं। ब्रह्मा मार्गदर्शन चाहते हैं; विष्णु उन्हें सृष्टि-कार्य में नियुक्त करते हैं, और आगे ऋषियों, दक्ष-वंश तथा दक्ष की कन्याओं की उत्पत्ति का वर्णन आता है। दक्ष-कन्याओं में चन्द्र की पत्नियों के प्रसंग में रोहिणी को अत्यन्त प्रिय बताया गया है; पर सम्बन्धगत तनाव से वह वैराग्य धारण कर नर्मदा-तट पर तप करने लगती है। वह क्रमबद्ध उपवास-व्रत, बार-बार स्नान और नारायणी/भवानी देवी की शरण-भक्ति करती है, जिन्हें रक्षक और दुःख-नाशिनी कहा गया है। देवी व्रत-नियम से प्रसन्न होकर रोहिणी की कामना पूर्ण करती हैं; उसी से तीर्थ का नाम और महिमा स्थापित होती है—यहाँ स्नान करने वाले दम्पति-प्रेम में रोहिणी के समान प्रिय होते हैं, और यहाँ देह त्यागने वाले को सात जन्मों तक दाम्पत्य-वियोग नहीं होता।

23 verses

Adhyaya 109

Adhyaya 109

चक्रतीर्थमाहात्म्य (Cakratīrtha Māhātmya) — The Glory of Cakra Tīrtha at Senāpura

इस अध्याय में मर्कण्डेय सेनापुर में स्थित चक्रतीर्थ का माहात्म्य बताते हैं। यह तीर्थ पाप-प्रक्षालन करने वाला, दोषों का शोधन करने वाला और अत्यन्त पवित्र कहा गया है। कथा-प्रसंग में महासन के सेनापत्याभिषेक का वर्णन है, जहाँ इन्द्र आदि देवता दानवों के विनाश और देवसेना की विजय हेतु उपस्थित होते हैं; तभी रुरु नामक दानव विघ्न डालकर घोर युद्ध छेड़ देता है, जिसमें पुराणोचित अस्त्र-शस्त्र और व्यूहों का वर्णन आता है। निर्णायक क्षण में विष्णु का सुदर्शन-चक्र प्रकट होकर रुरु का शिरच्छेद करता है और अभिषेक का विघ्न दूर हो जाता है। वह चक्र दानव को विदीर्ण कर शुद्ध जल में गिरता है; इसी से ‘चक्रतीर्थ’ नाम और उसकी पावन-शक्ति प्रतिष्ठित होती है। आगे फलश्रुति में कहा है कि यहाँ स्नान और अच्युत-पूजन से पुण्डरीक-यज्ञ का फल मिलता है; स्नान कर संयमी ब्राह्मणों का सत्कार करने से कोटिगुण पुण्य होता है; और भक्तिभाव से यहीं देह-त्याग करने पर विष्णुलोक की प्राप्ति, शुभ भोग तथा आगे श्रेष्ठ कुल में जन्म होता है। अंत में तीर्थ को धन्य, दुःखनाशक और पापनाशक कहकर आगे के उपदेश का संकेत दिया गया है।

18 verses

Adhyaya 110

Adhyaya 110

Cakratīrtha-Nikaṭa Vaiṣṇava-Tīrtha Māhātmya (Glorification of the Vaiṣṇava Tīrtha near Cakratīrtha)

मार्कण्डेय एक शुद्धिकारी तीर्थ-यात्रा का क्रम बताते हैं, जिसका समापन चक्रतीर्थ के निकट स्थित वैष्णव तीर्थ में होता है; यह तीर्थ प्राचीन काल में विष्णु (जनार्दन) द्वारा प्रतिष्ठित कहा गया है। भयंकर दानव-वध के पश्चात् उस संघर्ष से उत्पन्न शेष दोष और पाप-परिणामों के शमन हेतु भगवान् ने इस तीर्थ की स्थापना की—इसी से इसकी महिमा का आधार बनता है। यहाँ क्रोध-जय, कठोर तप और मौन-व्रत का विशेष महत्त्व बताया गया है; ऐसी साधना को देव और दानव भी सहज नहीं कर पाते। आगे संक्षेप में विधान है—स्नान, योग्य द्विजाति को दान, और विधिपूर्वक जप—ये तुरंत ही भारी पापों से भी मुक्त कर, साधक को वैष्णव पद की ओर ले जाते हैं।

6 verses

Adhyaya 111

Adhyaya 111

स्कन्दतीर्थ-सम्भवः (Origin and Merits of Skanda-Tīrtha on the Narmadā)

इस अध्याय में युधिष्ठिर स्कन्द के प्राकट्य-प्रसंग तथा नर्मदा-तट के स्कन्दतीर्थ की विधि और फल का पूर्ण वर्णन पूछते हैं। मार्कण्डेय कहते हैं—सेनापति के अभाव में देवगण शिव से प्रार्थना करते हैं। तब शिव का उमा के प्रति संकल्प, देवताओं द्वारा अग्नि के माध्यम से तेज का ग्रहण, उमा का क्रोधजन्य शाप जिससे देवों की सन्तान-परम्परा बाधित होती है, और दिव्य तेज का क्रमशः स्थानान्तरण बताया गया है। अग्नि तेज को धारण न कर सकने पर उसे गङ्गा में रख देता है; गङ्गा उसे शर-स्तम्ब (सरकण्डों के वन) में स्थापित करती है। कृतिका-गण बालक का पालन करते हैं; वह षण्मुख होकर प्रकट होता है और कार्त्तिकेय, कुमार, गङ्गागर्भ, अग्निज आदि नामों से प्रसिद्ध होता है। दीर्घ तप और तीर्थ-परिक्रमा के बाद स्कन्द नर्मदा के दक्षिण तट पर घोर तप करता है। शिव-उमा प्रसन्न होकर उसे नित्य सेनापति नियुक्त करते हैं और मयूर-वाहन प्रदान करते हैं। वही स्थान स्कन्दतीर्थ कहलाता है—दुर्लभ और पाप-नाशक। यहाँ स्नान और शिव-पूजन से यज्ञ-समान पुण्य मिलता है; तिल-मिश्रित जल से पितृतर्पण तथा एक विधिवत् पिण्ड-दान से पितर बारह वर्ष तक तृप्त रहते हैं। यहाँ किया हुआ कर्म अक्षय होता है; शास्त्रोक्त विधि से देह-त्याग करने पर शिवलोक-प्राप्ति और फिर वेदविद्या, आरोग्य, दीर्घायु तथा कुल-परम्परा से युक्त शुभ जन्म होता है।

45 verses

Adhyaya 112

Adhyaya 112

Āṅgirasatīrtha-māhātmya (Glory of the Āṅgirasa Tīrtha)

मार्कण्डेय राजसंवादी को नर्मदा के उत्तरी तट पर स्थित आङ्गिरसतीर्थ का निर्देश देते हैं और उसे सर्व-पाप-विनाशक, सर्वलोक-पावन बताते हैं। फिर इस तीर्थ की उत्पत्ति-कथा कही जाती है—वेदवेत्ता ब्राह्मण-ऋषि अङ्गिरा ने युग के आरम्भ में पुत्र-प्राप्ति के लिए दीर्घ तप किया। वे त्रिषवण-स्नान, नित्य देव-जप, महादेव-पूजन तथा कृच्छ्र और चान्द्रायण जैसे व्रत-नियमों से शिव की आराधना करते रहे। बारह वर्षों के तप से प्रसन्न होकर शिव प्रकट हुए और वर माँगने को कहा। अङ्गिरा ने ऐसा पुत्र चाहा जो वेद-विद्या से सम्पन्न, संयमी आचरण वाला, अनेक शास्त्रों में निपुण, देवताओं का मन्त्री-तुल्य और सर्वत्र सम्मानित हो। शिव ने वर दिया और बृहस्पति का जन्म हुआ। कृतज्ञ होकर अङ्गिरा ने उसी स्थान पर शङ्कर की स्थापना की। फलश्रुति में कहा गया है कि इस तीर्थ में स्नान और शिव-पूजन से पाप नष्ट होते हैं, निर्धनों को धन और निःसंतानों को संतान मिलती है, इच्छित कामनाएँ पूर्ण होती हैं और भक्त रुद्रलोक को प्राप्त होता है।

12 verses

Adhyaya 113

Adhyaya 113

Koṭitīrtha–Ṛṣikoṭi Māhātmya (Merit of Koṭitīrtha and Ṛṣikoṭi)

इस अध्याय में मārkaṇḍेय राजाओं को यात्रा-मार्ग की भाँति निर्देश देते हैं और कोṭितीर्थ को अनुपम पवित्र तीर्थ बताते हैं। कथा यह स्मरण कराती है कि यहाँ अनेक ऋषियों ने परम सिद्धि प्राप्त की, इसलिए यह स्थान ‘ऋषिकोṭि’ के नाम से भी प्रसिद्ध हुआ। इसके बाद तीर्थ-विशेष से जुड़े तीन पुण्य-उपाय बताए गए हैं—(1) कोṭितीर्थ में स्नान करके ब्राह्मणों को भोजन कराना; एक ब्राह्मण को तृप्त करने का फल ‘कोṭि’ ब्राह्मणों को भोजन कराने के समान कहा गया है। (2) स्नान के बाद पितृदेवताओं का सम्मान/तर्पण-श्राद्ध, जिससे तीर्थयात्रा में पितृधर्म का समावेश होता है। (3) वहीं महादेव की पूजा करने से वाजपेय यज्ञ के समान फल की प्राप्ति बताई गई है। इस प्रकार यह अध्याय कोṭितीर्थ के लिए संक्षिप्त धर्म-चार्टर बनकर स्थान, कर्म और फलश्रुति को स्थापित करता है।

4 verses

Adhyaya 114

Adhyaya 114

अयोनिजतीर्थ-माहात्म्य (Ayonija Tīrtha: Ritual Procedure and Salvific Claim)

इस अध्याय में मार्कण्डेय ऋषि राजा को अयोनिज नामक अत्यन्त पुण्यदायक तीर्थ का संक्षिप्त मार्ग-निर्देश देते हैं। उस तीर्थ की विशेषता बताई गई है—अद्भुत सौन्दर्य, महान पुण्य, और समस्त पापों का नाश। वहाँ का सरल विधिक्रम कहा गया है: अयोनिज में स्नान करके परमेश्वर का पूजन करें, फिर पितरों और देवताओं के लिए श्रद्धापूर्वक तर्पण-आदि करें। अंत में फलश्रुति दृढ़ है—जो विधिपूर्वक वहीं प्राणत्याग करता है, वह ‘योनि-द्वार’ अर्थात पुनर्जन्म के द्वार से बच जाता है; इस प्रकार तीर्थ-आचरण को नियमबद्ध साधना के रूप में कर्मबंधन से मुक्ति का मार्ग बताया गया है।

4 verses

Adhyaya 115

Adhyaya 115

अङ्गारकतीर्थमाहात्म्य (Aṅgāraka Tīrtha Māhātmya) — The Glory of the Aṅgāraka Tīrtha on the Narmadā

मार्कण्डेय राजा से कहते हैं कि नर्मदा के तट पर परम अङ्गारक-तीर्थ है, जो रूप-सौन्दर्य देने वाला और लोक में प्रसिद्ध है। वहीं भूमिज अङ्गारक ने असंख्य वर्षों तक कठोर तप किया। तप से प्रसन्न होकर महादेव साक्षात् प्रकट हुए और देवताओं में भी दुर्लभ वर देने की बात कही। अङ्गारक ने अविनाशी, स्थायी पद माँगा—ग्रहों के बीच सदा विचरण करने का अधिकार, और यह वर पर्वत, सूर्य-चन्द्र, नदियाँ और समुद्र जब तक रहें तब तक बना रहे। शिव ने वर देकर प्रस्थान किया; देव और असुर उनकी स्तुति करते रहे। तब अङ्गारक ने उसी स्थान पर शङ्कर की स्थापना की और फिर ग्रह-मण्डल में अपना स्थान प्राप्त किया। विधान यह है कि जो इस तीर्थ में स्नान कर परमेेश्वर की पूजा करे और क्रोध को जीतकर हवन-आहुति आदि करे, उसे अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। अङ्गारक से सम्बद्ध चतुर्थी को विधिपूर्वक स्नान करके ग्रह-पूजन करने से शुभ फल, रूप-लाभ और दीर्घ लाभ प्राप्त होते हैं; और वहाँ मृत्यु—चाहे जान-बूझकर हो या अनायास—रुद्र-सान्निध्य और उनके साथ आनन्द का कारण कही गई है।

12 verses

Adhyaya 116

Adhyaya 116

Pāṇḍu-tīrtha Māhātmya (Glory of Pāṇḍu Tīrtha)

इस अध्याय में मārkaṇḍeya राजोपदेश के रूप में पाण्डु-तीर्थ का संक्षिप्त तीर्थ-माहात्म्य बताते हैं। पाण्डु-तीर्थ को सर्वपावन कहा गया है; वहाँ स्नान करने से मनुष्य ‘सर्व-किल्बिष’ अर्थात् सभी मलिनताओं/अपराधों से मुक्त होता है—यह मुख्य विधि है। स्नान के बाद शुद्ध होकर काञ्चन-दान (स्वर्णदान) करने का नैतिक-धार्मिक निर्देश दिया गया है; इससे भ्रूण-हत्या जैसे घोर पाप भी नष्ट हो जाते हैं—ऐसा दृढ़ फल कहा गया है। आगे पिण्ड और जल का अर्पण (पिण्डोदक-प्रदान) करने से वाजपेय यज्ञ के समान फल मिलता है और पितर तथा पितामह प्रसन्न होते हैं। इस प्रकार तीर्थयात्रा, दान और पितृ-तर्पण को एक ही पुण्य-मार्ग में जोड़कर पाण्डु-तीर्थ की महिमा प्रतिपादित की गई है।

4 verses

Adhyaya 117

Adhyaya 117

त्रिलोचनतीर्थमाहात्म्य (Glory of the Trilocana Tīrtha)

इस अध्याय में श्री मार्कण्डेय राजेन्द्र से त्रिलोचन तीर्थ का माहात्म्य कहते हैं। यह तीर्थ परम पुण्यदायक है और सर्वलोक-वंदित देवेश भगवान की विशेष सन्निधि का स्थान बताया गया है। विधि अत्यन्त सरल है—तीर्थ में स्नान करके भक्तिभाव से शंकर का पूजन करना। ऐसा करने के बाद जो भक्त देह त्यागता है, वह निःसंदेह रुद्रलोक को प्राप्त होता है—यह स्पष्ट फलश्रुति है। आगे कहा गया है कि कल्प-क्षय के पश्चात् वह पुनः प्रकट होकर अवियोग भाव से रहता है और सौ वर्षों तक सम्मानित होता है। इस प्रकार तीर्थ, अल्प-क्रिया और मोक्षफल—तीनों का उपदेश एक साथ दिया गया है।

4 verses

Adhyaya 118

Adhyaya 118

इन्द्रतीर्थमाहात्म्य (Indratīrtha Māhātmya) — The Glory of Indra’s Ford on the Narmadā

इस अध्याय में युधिष्ठिर नर्मदा के दक्षिण तट पर स्थित इन्द्रतीर्थ की उत्पत्ति पूछते हैं और मर्कण्डेय ऋषि प्रश्नोत्तर रूप में प्राचीन इतिहासनुमा कथा सुनाते हैं। वृत्र-वध के बाद इन्द्र पर ब्रह्महत्या का घोर दोष चढ़ जाता है, जो उन्हें तीर्थों और पवित्र जलों में भटकने पर भी नहीं छोड़ता; इससे यह संकेत मिलता है कि गहन नैतिक अपराध केवल साधारण तीर्थ-परिक्रमा से नहीं मिटता। इन्द्र कठोर तप, उपवास और दीर्घ व्रत करते हैं, पर शांति तब मिलती है जब देवसभा में ब्रह्मा पाप को चार भागों में बाँटकर जल, पृथ्वी, स्त्रियों तथा कर्म/व्यवसाय-क्षेत्रों आदि में नियोजित करते हैं—जिससे कुछ सामाजिक-धार्मिक मर्यादाओं का कारण भी बताया जाता है। नर्मदा-तट पर महादेव की आराधना से शिव प्रसन्न होकर वर देते हैं; इन्द्र वहाँ शाश्वत दिव्य सन्निधि की याचना करते हैं और इन्द्रतीर्थ की स्थापना होती है। फलश्रुति में कहा गया है कि इन्द्रतीर्थ में स्नान, तर्पण और परमेश्वर-पूजा से महान पाप भी नष्ट होते हैं और बड़े यज्ञों के समान पुण्य मिलता है; इस माहात्म्य का श्रवण भी पवित्र करने वाला माना गया है।

41 verses

Adhyaya 119

Adhyaya 119

कल्होडीतीर्थमाहात्म्यं तथा कपिलादानप्रशंसा (Kahlodī Tīrtha Māhātmya and the Eulogy of Kapilā-Dāna)

मार्कण्डेय ऋषि राजा को उपदेश देते हैं कि वह रेवाती (नर्मदा) के उत्तरी तट पर स्थित उत्तम कल्होडी-तीर्थ में जाए, जो सर्वपाप-नाशक कहा गया है। यह स्थान प्राचीन मुनियों ने समस्त प्राणियों के कल्याण हेतु स्थापित किया और नर्मदा के महान जल से संबद्ध तपोबल के कारण इसकी महिमा बढ़ी—ऐसा वर्णन आता है। इसके बाद कपिला-तीर्थ का विशेष माहात्म्य कहा गया और कपिला-दान का विधान बताया गया—विशेषतः हाल ही में ब्याई हुई शुभ कपिला गाय का दान, उपवास के साथ, संयमित स्वभाव और क्रोध-विजय रखते हुए करना चाहिए। भूमि, धन, अन्न, हाथी, घोड़े, स्वर्ण आदि दानों की तुलना में कपिला-दान को सर्वोत्तम घोषित किया गया है। फलश्रुति में कहा है कि इस तीर्थ में दान करने से सात जन्मों के वाणी, मन और शरीर से किए पाप नष्ट होते हैं; दाता अप्सराओं द्वारा प्रशंसित विष्णुलोक को प्राप्त करता है; गाय के रोमों की संख्या के अनुसार दीर्घकाल तक स्वर्ग-सुख भोगता है; और फिर मनुष्य-योनि में समृद्ध कुल में जन्म लेकर वेद-विद्या, शास्त्र-प्रवीणता, आरोग्य और दीर्घायु से युक्त होता है। अंत में कल्होडी-तीर्थ की पापमोचन-शक्ति को अद्वितीय बताया गया है।

14 verses

Adhyaya 120

Adhyaya 120

कम्बुतीर्थ-स्थापनम् (Establishment and Merit of Kambu Tīrtha)

इस अध्याय में ‘कम्बुकेश्वर/कम्बु’ से सम्बद्ध तीर्थ-उत्पत्ति और कम्बुतीर्थ के नामकरण तथा महिमा का वर्णन है। श्री मार्कण्डेय हिरण्यकशिपु से प्रह्लाद, फिर विरोचन, बलि, बाण, शम्बर और अंत में कम्बु तक वंश-परम्परा बताते हैं। कम्बु नामक असुर विष्णु की विश्वव्यापी शक्ति से उत्पन्न भय को समझकर नर्मदा-तट पर मौन, नियमपूर्वक स्नान, तपस्वी वेश-आहार और दीर्घकालीन महादेव-पूजन का व्रत करता है। शिव प्रसन्न होकर वर देते हैं, पर एक सिद्धान्त स्पष्ट करते हैं—सृष्टि-संघर्ष में विष्णु की सर्वोच्चता को कोई, शिव भी, मिटा नहीं सकता; हरि-विरोध से स्थायी कल्याण नहीं मिलता। शिव के अंतर्धान के बाद कम्बु वहाँ शिव का शान्त, रोगरहित स्वरूप स्थापित करता है; वही स्थान ‘कम्बुतीर्थ’ कहलाकर महादोष-नाशक कहा गया है। फलश्रुति में बताया है कि वहाँ स्नान-पूजन, विशेषतः ऋग्/यजुः/साम स्तुतियों सहित सूर्य-पूजा, वैदिक यज्ञों के तुल्य फल देती है; पितृतर्पण और ईशान-पूजन से अग्निष्टोम-सदृश फल मिलता है; और वहाँ देहत्याग करने से रुद्रलोक की प्राप्ति होती है।

26 verses

Adhyaya 121

Adhyaya 121

Candrahāsa–Somatīrtha Māhātmya (Glory of Candrahāsa and Somatīrtha)

इस अध्याय में युधिष्ठिर के प्रश्नों के उत्तर में मार्कण्डेय कन्द्रहास को अगला पवित्र तीर्थ बताते हैं और स्मरण कराते हैं कि वहीं सोमदेव ने ‘परा-सिद्धि’ प्राप्त की। दक्ष के शाप से सोम को कष्ट हुआ—इसके साथ गृहस्थ-धर्म में दाम्पत्य कर्तव्य की उपेक्षा को कर्मफल का कारण बताकर नैतिक शिक्षा दी गई है। उपाय के रूप में सोम अनेक तीर्थों में भटकते हुए पापहरिणी नर्मदा/रेवा के तट पर पहुँचते हैं। वहाँ वे बारह वर्षों तक उपवास, दान, व्रत और संयम का पालन कर मलिनता से मुक्त होते हैं। अंत में महादेव का अभिषेक करके शिव की स्थापना-पूजा करते हैं, जिससे अक्षय पुण्य और उत्तम गति प्राप्त होती है। सोमतीर्थ और कन्द्रहास में स्नान—विशेषतः चन्द्र-सूर्य ग्रहण, संक्रान्ति, व्यतीपात, अयन और विषुव के अवसर पर—महाशुद्धि, स्थायी पुण्य और सोम-सदृश तेज देने वाला कहा गया है। जो यात्री रेवा पर कन्द्रहास के माहात्म्य को जानकर जाते हैं वे फल पाते हैं; जो अनजान रहते हैं वे वंचित रह जाते हैं। वहाँ किया गया संन्यास भी सोमलोक से सम्बद्ध अविचल शुभ मार्ग प्रदान करता है।

27 verses

Adhyaya 122

Adhyaya 122

Ko-hanasva Tīrtha Māhātmya and Varṇa–Āśrama Ethical Discourse (कोहनस्वतीर्थमाहात्म्य तथा वर्णाश्रमधर्मोपदेशः)

अध्याय 122 दो जुड़े हुए प्रसंगों में चलता है। पहले मार्कण्डेय ‘कोहनस्व’ नामक तीर्थ का माहात्म्य बताते हैं, जिसे पाप-नाशक और मृत्यु-भय हरने वाला कहा गया है। फिर युधिष्ठिर के प्रश्न पर चारों वर्णों की उत्पत्ति और कर्म-धर्म का वर्णन आता है—ब्रह्मा को मूल कारण मानकर देह-रूपक से ब्राह्मण मुख से, क्षत्रिय भुजाओं से, वैश्य जंघाओं से और शूद्र चरणों से उत्पन्न बताए गए हैं। ब्राह्मण के लिए स्वाध्याय-अध्यापन, यज्ञ, अग्निहोत्र, पञ्चयज्ञ, गृहस्थ-धर्म और आगे चलकर वैराग्य/संन्यास; क्षत्रिय के लिए शासन, प्रजा-रक्षा, दान और युद्ध; वैश्य के लिए कृषि, गो-रक्षा और वाणिज्य; तथा शूद्र के लिए सेवा-धर्म का निर्देश मिलता है, साथ ही मंत्र-संस्कार के अधिकार पर ग्रंथ-स्वर की सीमित दृष्टि भी व्यक्त होती है। दूसरे भाग में एक दृष्टांत है: एक विद्वान ब्राह्मण ‘हनस्व’ का अशुभ आदेश सुनकर यम और उसके दूतों को देखता है और शतरुद्रीय सहित रुद्र-स्तुति का जप करते हुए भागकर एक लिंग की शरण लेता है। वहीं वह मूर्छित होता है, तब शिव रक्षावचन बोलकर यम-बल को तितर-बितर कर देते हैं। इस कारण वह स्थान ‘को-हनस्व’ के नाम से प्रसिद्ध होता है। अंत में फलश्रुति है—यहाँ स्नान-पूजा से अग्निष्टोम-यज्ञ जैसा पुण्य, यहाँ मृत्यु होने पर यम-दर्शन नहीं; अग्नि या जल में मृत्यु के विशेष फल और फिर समृद्धि सहित पुनरागमन का वर्णन किया गया है।

39 verses

Adhyaya 123

Adhyaya 123

कर्मदीतीर्थे विघ्नेशपूजा-फलप्रशंसा | Karmadī Tīrtha and the Merit of Vighneśa Observance

इस अध्याय में मुनि मार्कण्डेय राजाओं के प्रति कर्मदी-तीर्थ का संक्षिप्त माहात्म्य कहते हैं। वे श्रोता को उस परम पवित्र तीर्थ में जाने की आज्ञा देते हैं, जहाँ महाबली गणनाथ विघ्नेश का सान्निध्य माना गया है। कहा गया है कि वहाँ स्नान करने से, और विशेषतः चतुर्थी के दिन उपवास सहित स्नान करने से, सात जन्मों तक के विघ्न शांत हो जाते हैं। उसी स्थान पर किया गया दान अक्षय फल देने वाला है—यह धर्मवचन निःसंदेह रूप से स्थापित किया गया है; इस प्रकार तीर्थयात्रा, चतुर्थी-व्रत और दान को विघ्नेश-कृपा से विघ्ननाश के सिद्धान्त से जोड़ा गया है।

4 verses

Adhyaya 124

Adhyaya 124

नर्मदेश्वरतीर्थमाहात्म्य (The Māhātmya of Narmadeśvara Tīrtha)

इस अध्याय में संवाद-रूप में संक्षिप्त तीर्थ-उपदेश दिया गया है। श्री मार्कण्डेय महिपाल राजा से कहते हैं कि वह नर्मदेश्वर नामक परम पवित्र तीर्थ में जाए, जो अत्यन्त श्रेष्ठ और पूज्य स्थान है। मुख्य प्रतिज्ञा मोक्ष और प्रायश्चित्त से जुड़ी है—जो व्यक्ति उस तीर्थ में स्नान करता है, वह समस्त किल्बिषों (पाप/दोष) से मुक्त हो जाता है। आगे फल-निर्णय का विशेष कथन है कि चाहे मृत्यु अग्नि में प्रवेश से हो, जल में हो, या ‘अननाशक’ (अप्रभावी/अविनाशी) प्रकार की मृत्यु से—उसकी गति ‘अनिवर्तिका’ (अपरिवर्तनीय) कही गई है; यह बात शंकर के पूर्व उपदेश के रूप में बताई जाती है। इस प्रकार शिव-परम्परा की प्रामाणिकता से तीर्थ की तारक महिमा स्थिर होती है।

3 verses

Adhyaya 125

Adhyaya 125

रवीतीर्थ-माहात्म्य एवं आदित्य-तपःकथा (Ravītīrtha Māhātmya and the Discourse on Āditya’s Tapas)

इस अध्याय में युधिष्ठिर पूछते हैं कि जो सूर्य सबको प्रत्यक्ष दिखते हैं और समस्त देवताओं द्वारा पूजित हैं, उन्हें तपस्वी कैसे कहा गया, और वे आदित्य/भास्कर नाम व पद को कैसे प्राप्त हुए। मार्कण्डेय उत्तर में सृष्टि-वर्णन करते हैं—पहले अंधकार की अवस्था, फिर दिव्य तेजस्वी तत्त्व का प्राकट्य, उससे व्यक्त रूप का उद्भव और आगे जगत् के कार्य-व्यवस्था का निरूपण। फिर नर्मदा-तट के रवीतीर्थ का माहात्म्य बताया जाता है, जहाँ स्नान, पूजा, मंत्र-जप और प्रदक्षिणा द्वारा सूर्य-उपासना सिद्ध होती है। मंत्र को कर्म-सफलता की अनिवार्य शर्त कहा गया है; मंत्रहीन क्रिया को निष्फल बताने के लिए उपमाएँ दी गई हैं। अंत में संक्रांति, व्यतीपात, अयन, विषुव, ग्रहण, माघ-सप्तमी आदि अवसरों के विधि-नियम, सूर्य के बारह नामों का पाठ, तथा शुद्धि, आरोग्य, कल्याण और शुभ सामाजिक फल देने वाली फलश्रुति वर्णित है।

45 verses

Adhyaya 126

Adhyaya 126

अयोनिज-महादेव-तीर्थमाहात्म्य (Glory of the Ayoni-ja Mahādeva Tīrtha)

इस अध्याय में मार्कण्डेय ‘अयोनिज’ नामक परम तीर्थ का माहात्म्य बताते हैं, जो ‘योनि-संकट’ अर्थात जन्म-बंधन और देहधर्म से उत्पन्न क्लेश से पीड़ित जनों के लिए शमन और शुद्धि का उपाय है। वहाँ तीर्थ-स्नान करने से योनि-संबंधी दुःख की अनुभूति और उसका भार दूर होता है। फिर ईश्वर/महादेव की पूजा करनी चाहिए और प्रार्थना करनी चाहिए—“मुझे सम्भव (बार-बार जन्म) और योनि-संकट से मुक्त कीजिए”; गन्ध, पुष्प, धूप आदि अर्पण से पाप-क्षय होता है। भक्ति से लिङ्ग-पूजन/लिङ्ग-पूरण करने पर देवदेव के सान्निध्य में दीर्घ निवास का फल ‘सिक्थ-संख्या’ जैसी अतिशयोक्ति से कहा गया है। सुगन्धित जल, मधु, दूध या दही से महादेव का अभिषेक करने पर ‘विपुल श्री’—समृद्धि—प्राप्त होती है। शुक्ल पक्ष और विशेषतः चतुर्दशी को गीत-वाद्य सहित पूजा, तथा प्रदक्षिणा करते हुए उसी प्रार्थना-पंक्ति का निरन्तर उच्चारण श्रेष्ठ बताया गया है। अंत में ‘नमः शिवाय’ षडक्षर की महिमा बताकर कहा गया है कि यह अनेक मंत्र-विस्तार से भी श्रेष्ठ है; इसका जप ही अध्ययन, श्रवण और कर्म-समापन के समान है। साथ ही शिव-योगियों की सेवा, दान्त-जितेन्द्रिय तपस्वियों को भोजन, दान और जल-प्रदान को स्नान-पूजा का पूरक माना गया है; इनके पुण्य को मेरु और समुद्र जैसी महान उपमाओं से तुल्य कहा गया है।

17 verses

Adhyaya 127

Adhyaya 127

अग्नितीर्थ-माहात्म्य तथा कन्यादान-फलश्रुति (Agni Tīrtha Māhātmya and the Merit of Kanyādāna)

इस अध्याय में रेवाखण्ड की यात्रा-शिक्षा के रूप में मार्कण्डेय राजा से कहते हैं कि वह अग्नितीर्थ जाए, जो अनुपम और परम पवित्र तीर्थ है। पक्ष के आरम्भ में वहाँ तीर्थ-स्नान करने का विधान बताया गया है, जिससे समस्त किल्बिष, पाप और अशुद्धि का नाश होता है। इसके बाद कन्यादान-धर्म का महत्त्व प्रतिपादित है—यथाशक्ति अलंकृत कन्या का दान करने से अत्यन्त महान फल मिलता है। इस फल की तुलना अग्नीष्टोम और अतिरात्र जैसे सोमयागों के फल से की गई है और उसे असाधारण रूप से बहुगुणित बताया गया है। अंत में पुण्य को वंश-परम्परा तक विस्तारित करके कहा गया है कि दाता अपनी संतति की निरन्तरता के अनुपात में शिवलोक को प्राप्त होता है; केश-गणना जैसी उपमा से यह बात काव्यात्मक ढंग से कही गई है। इस प्रकार सामाजिक निरन्तरता, दान-कर्तव्य और शैव मोक्ष-प्रतिज्ञा एक साथ जुड़ते हैं।

5 verses

Adhyaya 128

Adhyaya 128

भृकुटेश्वरतीर्थमाहात्म्य (Bhrikuṭeśvara Tīrtha Māhātmya)

इस अध्याय में मार्कण्डेय मुनि राजपुरुष को भृकुटेश्वर की ओर जाने की प्रेरणा देते हैं और इस तीर्थ को ‘श्रेष्ठ’ पवित्र क्षेत्र बताते हैं। इसकी प्रतिष्ठा महर्षि भृगु के तपोचरित से जुड़ी है—वे अत्यन्त तेजस्वी और कठोर स्वभाव वाले थे तथा संतान-प्राप्ति के लिए दीर्घकाल तक घोर तप करते रहे। तब ‘अन्धकघातिन्’ (अन्धक का संहार करने वाले) परमेश्वर प्रसन्न होकर वरदान देते हैं, जिससे इस तीर्थ का शैव-आश्रय स्पष्ट होता है। आगे कर्म और फल का विधान है—तीर्थ में स्नान करके परमेश्वर का पूजन करने से अग्निष्टोम यज्ञ के फल का आठ गुना फल मिलता है। पुत्रार्थी यदि घी और मधु से भृकुटेश का स्नापन करे तो इच्छित पुत्र प्राप्त होता है। दान की महिमा भी कही गई है—ब्राह्मण को सुवर्ण-दान, या विकल्प से गौ और भूमि का दान, समुद्रों, गुफाओं, पर्वतों, वनों और उपवनों सहित समस्त पृथ्वी-दान के समान पुण्यदायक है। अंत में बताया गया है कि दाता स्वर्ग में दिव्य भोग भोगकर फिर पृथ्वी पर राजा या अत्यन्त सम्मानित ब्राह्मण के रूप में उच्च पद पाता है—यह स्थान-सम्बद्ध भक्ति और दानधर्म की पुण्य-व्यवस्था है।

9 verses

Adhyaya 129

Adhyaya 129

ब्रह्मतीर्थमाहात्म्य (Glory of Brahmatīrtha on the Narmadā)

इस अध्याय में श्री मार्कण्डेय एक राजा को नर्मदा-तट स्थित ब्रह्मतीर्थ का माहात्म्य सुनाते हैं। इसे अन्य सभी तीर्थों से बढ़कर, अनुपम पवित्र स्थल कहा गया है, जहाँ ब्रह्मा स्वयं अधिष्ठाता देव माने गए हैं। पापों की शुद्धि को वाणी, मन और कर्म—इन तीन स्तरों में बताकर यह भी कहा गया है कि केवल दर्शन/आगमन मात्र से भी पवित्रता प्राप्त होती है। जो लोग स्नान करके श्रुति-स्मृति के अनुसार आचरण करते हैं, वे प्रायश्चित्त सम्पन्न कर स्वर्ग-निवास पाते हैं; पर जो काम और लोभ के वशीभूत होकर शास्त्र-मार्ग छोड़ देते हैं, उनकी निन्दा की गई है। स्नान के बाद पितृ और देव-पूजन से अग्निष्टोम यज्ञ के समान पुण्य मिलता है; ब्रह्मा के निमित्त दिया गया दान अक्षय कहा गया है। संक्षिप्त गायत्री-जप को भी ऋग्-यजुः-साम—तीनों वेदों के फल के तुल्य प्रभावशाली बताया गया है। अंत में फलश्रुति में कहा गया है कि इस तीर्थ में देहांत होने पर ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है और पुनर्जन्म का बंधन नहीं रहता; वहाँ देह-अवशेष का संबंध भी पुण्यदायक माना गया है। ऐसे पुण्य से मनुष्य ब्रह्म-ज्ञान से युक्त, विद्वान, सम्मानित, निरोग और दीर्घायु होकर जन्म लेता है; और महात्मा दर्शनार्थी आध्यात्मिक अर्थ में ‘अमृतत्व’ को प्राप्त होते हैं।

16 verses

Adhyaya 130

Adhyaya 130

Devatīrtha Māhātmya (Glory of Devatīrtha on the Southern Bank of the Narmadā)

इस अध्याय में ऋषि मार्कण्डेय नर्मदा (रेवा) के दक्षिण तट पर स्थित ‘देवतीर्थ’ नामक अनुपम पुण्य-तीर्थ का वर्णन करते हैं। देवगण वहाँ एकत्र होते हैं और परमेश्वर उस स्थान पर प्रसन्न होते हैं—इस दिव्य परंपरा से तीर्थ की पवित्रता और महिमा स्थापित की जाती है। साथ ही यात्री की नैतिक योग्यता बताई गई है: तीर्थ-स्नान काम (वासनाओं) और क्रोध से रहित होकर, शुद्ध मन से करना चाहिए। ऐसा स्नान करने वाले को गो-सहस्र दान के समान निश्चित पुण्य प्राप्त होता है—फलश्रुति द्वारा यह संदेश दिया गया है कि बाह्य स्नान तभी पूर्ण है जब अंतःकरण में संयम और शांति हो।

3 verses

Adhyaya 131

Adhyaya 131

Nāgatīrtha Māhātmya (Legend of the Nāgas’ Fear and Śiva’s Protection) / नागतीर्थमाहात्म्य

अध्याय 131 में ऋषि मार्कण्डेय और राजा युधिष्ठिर का संवाद है। आरम्भ में नर्मदा के दक्षिण तट पर स्थित ‘अनुत्तम’ नागतीर्थ का वर्णन आता है और यह प्रश्न उठता है कि महान नागों ने तीव्र भय से प्रेरित होकर तपस्या क्यों की। तब मार्कण्डेय एक प्राचीन इतिहासनुमा कथा सुनाते हैं—कश्यप की दो पत्नियाँ, विनता (गरुड़ से सम्बद्ध) और कद्रू (नागों से सम्बद्ध), दिव्य अश्व उच्चैःश्रवस को देखकर एक शर्त लगाती हैं। कद्रू छल से अपने नाग-पुत्रों को धोखा देने के लिए बाध्य करती है; कुछ मातृ-शाप के भय से मान जाते हैं, और कुछ अन्य शरण की खोज में तप में प्रवृत्त होते हैं। दीर्घ तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव वर देते हैं—वासुकि शिव के सान्निध्य में नित्य रक्षक के रूप में प्रतिष्ठित होता है और नागों को अभय का आश्वासन मिलता है, विशेषतः नर्मदा-जल में स्नान/अवगाहन से। अंत में विधि और फल बताया गया है: पंचमी तिथि को इस तीर्थ में शिव-पूजन करने से आठ नाग-वंश उपासक को हानि नहीं पहुँचाते, और मृतक इच्छित अवधि तक शिव का गण/अनुचर पद प्राप्त करता है।

37 verses

Adhyaya 132

Adhyaya 132

वाराहतीर्थमाहात्म्यम् (Glory of Varāha Tīrtha on the Northern Bank of the Narmadā)

मार्कण्डेय राजाओं को उपदेश देते हैं कि नर्मदा के उत्तरी तट पर स्थित ‘वाराह’ नामक तीर्थ में जाएँ, जो सर्व-पाप-नाशक कहा गया है। वहाँ लोकहित के लिए जगद्धाता सृष्टिकर्ता भगवान वाराह निवास करते हैं और वे संसार-सागर से पार लगाने वाले उद्धारक मार्गदर्शक हैं। विधि में तीर्थ-स्नान, धारणीधर/वाराह की सुगंध, पुष्प-मालाओं आदि से पूजा, मंगल-घोष, तथा उपवास—विशेषकर द्वादशी—का विधान है। इसके बाद रात्रि-जागरण और पवित्र कथा-श्रवण/कथन बताया गया है। साथ ही सीमा-नियम दिए हैं कि पापाचार में लगे लोगों से संग, स्पर्श और साथ भोजन न करें, क्योंकि वाणी, स्पर्श, श्वास और सहभोजन से अशुद्धि फैलती मानी गई है। यथाशक्ति और यथाविधि ब्राह्मणों का सम्मान भी आवश्यक कहा गया है। फल में कहा है कि वाराह के मुख का मात्र दर्शन भी कठिन पापों को शीघ्र नष्ट कर देता है—जैसे गरुड़ को देखकर सर्प भागते हैं, और सूर्य से अंधकार मिटता है। मंत्र-सरलता पर बल है: ‘नमो नारायणाय’ सर्वकार्य-साधक है; और श्रीकृष्ण को एक बार प्रणाम करना भी महान यज्ञों के फल के समान होकर पुनर्जन्म से पर ले जाता है। नियमशील भक्त यदि वहीं देह त्यागें तो क्षर-अक्षर से परे विष्णु के परम निर्मल धाम को प्राप्त होते हैं।

14 verses

Adhyaya 133

Adhyaya 133

लोकपालतीर्थचतुष्टयमाहात्म्य तथा भूमिदानपालन-उपदेशः (Glory of the Four Lokapāla Tīrthas and Counsel on Protecting Land-Gifts)

मार्कण्डेय ऋषि चार परम तीर्थों का वर्णन करते हैं—कुबेर, वरुण, यम और वायु से सम्बद्ध स्थान, जिनके केवल दर्शन से भी पाप नष्ट होते हैं। युधिष्ठिर पूछते हैं कि लोकपालों ने नर्मदा-तट पर तप क्यों किया। ऋषि बताते हैं कि अस्थिर संसार में स्थिर आधार की खोज में उन्होंने तप किया और यह प्रतिपादित करते हैं कि समस्त प्राणियों का धारण-आधार धर्म ही है। घोर तप के फलस्वरूप शिव से वर प्राप्त होते हैं—कुबेर यक्षों और धन के स्वामी बनते हैं, यम संयम व न्याय के अधिकारी होते हैं, वरुण जल-लोक में सार्वभौम प्रभुता पाते हैं और वायु सर्वव्यापी स्वरूप को प्राप्त होते हैं। वे अपने-अपने नाम से पृथक् देवालय स्थापित कर पूजा और बलि-आहुति करते हैं। इसके बाद सामाजिक-धार्मिक उपदेश आता है—विद्वान ब्राह्मणों को बुलाकर दान देना, विशेषतः भूमिदान, और उसे सुरक्षित रखना। भूमिदान का हरण/रद्द करना महापाप बताया गया है; ऐसे कृत्य के लिए दण्ड-विधान कहा गया है, तथा दान की रक्षा को दान करने से भी श्रेष्ठ माना गया है। तीर्थ-फल बताए गए हैं—कुबेरश में पूजन से अश्वमेध-सदृश पुण्य, यमेश्वर में जन्म-जन्म के पापों से मुक्ति, वरुणेश में वाजपेय-सदृश फल, और वातेश्वर में जीवन के पुरुषार्थों की सिद्धि। अंत में फलश्रुति है कि इस कथा का श्रवण-पाठ पाप हरता और मंगल बढ़ाता है।

48 verses

Adhyaya 134

Adhyaya 134

Rāmeśvara-tīrtha Māhātmya (रामेश्वरतीर्थमाहात्म्य) — The Glory of Rāmeśvara on the Southern Bank of the Narmadā

इस अध्याय में श्री मार्कण्डेय संक्षेप में तीर्थ-माहात्म्य बताते हैं। नर्मदा (रेवा) के दक्षिण तट पर स्थित ‘रामेश्वर’ नामक अनुपम तीर्थ को पाप-हर, पुण्य-प्रद और सर्व-दुःख-नाशक कहा गया है। विधान यह है कि जो भक्त इस तीर्थ में स्नान करके महेश्वर—महादेव, महात्मा—की पूजा करता है, वह समस्त किल्बिष (दोष/अशुद्धि) से मुक्त हो जाता है। इस प्रकार स्थान, क्रम (स्नान के बाद पूजा) और फल (अशुद्धि-क्षय) को जोड़कर तीर्थ-यात्रा का संक्षिप्त मार्ग बताया गया है।

3 verses

Adhyaya 135

Adhyaya 135

सिद्धेश्वरतीर्थमाहात्म्य (Siddheśvara Tīrtha Māhātmya)

मार्कण्डेय सिद्धेश्वर नामक एक परम सिद्ध और त्रिलोकी में पूजित तीर्थ का वर्णन करते हैं। इस अध्याय का मुख्य उपदेश सरल है—तीर्थ में स्नान करके उमा‑रुद्र (उमा‑महेश्वर) की विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए। ऐसा करने से वाजपेय यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है—यहाँ स्थानीय तीर्थ‑भक्ति को वैदिक महिमा के समकक्ष बताया गया है। फलश्रुति में कहा है कि संचित पुण्य से मृत्यु के बाद साधक स्वर्ग को जाता है, अप्सराएँ साथ रहती हैं और मंगलध्वनि से उसका स्वागत होता है; दीर्घकाल स्वर्गभोग के बाद वह धन‑धान्य से सम्पन्न, प्रतिष्ठित कुल में जन्म लेता है, वेद‑वेदाङ्ग में निपुण, समाज में सम्मानित, रोग‑शोक से रहित और सौ वर्ष की पूर्ण आयु पाता है।

6 verses

Adhyaya 136

Adhyaya 136

अहल्येश्वरतीर्थमाहात्म्य (Ahalyeśvara Tīrtha Māhātmya)

मार्कण्डेय अहल्येश्वर तीर्थ और उसके महात्म्य का वर्णन करते हैं। गौतम आदर्श ब्राह्मण-तपस्वी हैं और अहल्या अनुपम सौन्दर्य के लिए प्रसिद्ध। कामवश इन्द्र (शक्र) गौतम का वेश धरकर आश्रम के निकट अहल्या के पास जाता है। गौतम के लौटने पर अपराध प्रकट होता है; वे इन्द्र को शाप देते हैं, जिससे उसके शरीर पर अनेक ‘भग’ प्रकट होने का चिह्न पड़ता है, और इन्द्र राज्य छोड़कर प्रायश्चित्त-तप में लग जाता है। अहल्या भी शाप से शिला बन जाती है, पर शाप में मुक्ति की अवधि निश्चित है—हजार वर्ष बाद विश्वामित्र के साथ तीर्थयात्रा में आए श्रीराम के दर्शन से वह शुद्ध होकर मुक्त होती है। तत्पश्चात वह नर्मदा-तीर्थ के तट पर स्नान और चान्द्रायण आदि कृच्छ्र-व्रतों सहित तप करती है। महादेव प्रसन्न होकर वर देते हैं; अहल्या शिव की ‘अहल्येश्वर’ नाम से स्थापना करती है। फलश्रुति में कहा है कि जो इस तीर्थ में स्नान कर परमेेश्वर की पूजा करता है, वह स्वर्ग पाता है और आगे मनुष्य-जन्म में समृद्धि, विद्या, आरोग्य, दीर्घायु तथा कुल-परम्परा प्राप्त करता है।

25 verses

Adhyaya 137

Adhyaya 137

कर्कटेश्वरतीर्थमाहात्म्य (Karkaṭeśvara Tīrtha-Māhātmya)

इस अध्याय में मार्कण्डेय मुनि राजपुरुष को तीर्थ-निर्देश देते हैं और नर्मदा के उत्तरी तट पर स्थित परम शैव तीर्थ ‘कर्कटेश्वर’ का माहात्म्य बताते हैं। यह स्थान पाप-नाशक कहा गया है। विधि से स्नान करके जो शिव-पूजन करता है, उसे मृत्यु के बाद रुद्रलोक की ओर अविचल गति प्राप्त होती है। मुनि कहते हैं कि इस तीर्थ की महिमा का पूरा संक्षेप संभव नहीं, फिर भी वे मुख्य सिद्धान्त बताते हैं—यहाँ किया गया शुभ या अशुभ कर्म ‘अक्षय’ हो जाता है, अर्थात् पवित्र क्षेत्र में कर्मफल की स्थायित्व-शक्ति बढ़ जाती है। वलखिल्य ऋषि और मरीचि-संबद्ध तपस्वी अपनी इच्छा से यहाँ निवास कर आनंद लेते हैं, तथा देवी नारायणी भी यहाँ कठोर तप में निरत रहती हैं। अंत में पितृ-तर्पण का विधान आता है—जो यहाँ स्नान कर तर्पण करता है, वह बारह वर्षों तक पितरों को तृप्त करता है। इस प्रकार व्यक्तिगत मोक्ष, सदाचार और वंश-कर्तव्य एक ही तीर्थ-आधारित साधना में जुड़ जाते हैं।

9 verses

Adhyaya 138

Adhyaya 138

Śakratīrtha Māhātmya (The Glory of Śakra-tīrtha) — Indra’s Restoration and the Merit of Śiva-Pūjā

मार्कण्डेय बताते हैं कि यात्री को अनुपम शक्रतीर्थ जाना चाहिए। इसकी पवित्रता की कथा में कहा गया है कि गौतम ऋषि के शाप से शक्र (इन्द्र) की राजश्री नष्ट हो गई। तब देवता और तपस्वी ऋषि गौतम के पास विनयपूर्वक जाते हैं और कहते हैं कि इन्द्र के बिना लोक-व्यवस्था और देव-मानव धर्म का संतुलन बिगड़ जाता है; अपने ही दोष से लज्जित होकर जो देवता छिप गया है, उस पर कृपा कीजिए। वेद के परम ज्ञाता गौतम प्रसन्न होकर वर देते हैं—जो ‘हज़ार चिह्न’ का कलंक था, वह उनके अनुग्रह से ‘हज़ार नेत्र’ बन जाता है और इन्द्र का गौरव लौट आता है। फिर इन्द्र नर्मदा तट पर जाकर निर्मल जल में स्नान करता है, त्रिपुरान्तक शिव की स्थापना करके पूजा करता है और अप्सराओं से सम्मानित होकर स्वर्ग लौट जाता है। फलश्रुति में कहा गया है कि जो इस तीर्थ में स्नान करके परमेश्वर की पूजा करता है, वह पर-स्त्रीगमन के पाप से मुक्त हो जाता है; यह स्थान शैव परंपरा में नैतिक-आध्यात्मिक शुद्धि का उपाय माना गया है।

11 verses

Adhyaya 139

Adhyaya 139

Somatīrtha Māhātmya (Glory of Somatīrtha) — Ritual Bathing, Solar Contemplation, and Merit of Feeding the Learned

अध्याय 139 में मārkaṇḍeya एक यात्रा-निर्देश के रूप में सोमतीर्थ का माहात्म्य बताते हैं। यह अनुपम पुण्य-स्थान है जहाँ सोम ने तप करके दिव्य नक्षत्र-पथ प्राप्त किया। यहाँ विधिपूर्वक तीर्थ-स्नान, फिर आचमन और जप करके अंत में रवि (सूर्य) का ध्यान करने का क्रम बताया गया है। इस तीर्थ में किए गए साधन का फल ऋग्-यजुः-साम के पाठ तथा गायत्री-जप के फल के समान कहा गया है। बह्वृच, अध्वर्यु, छान्दोग आदि वेदविद् और अध्ययन-समाप्त ब्राह्मणों को भोजन कराना, तथा श्रेष्ठ ब्राह्मणों को पादुका/चप्पल, छत्र, वस्त्र, कंबल, घोड़े आदि दान देना ‘कोटि’ पुण्य के रूप में प्रशंसित है। अंत में वैराग्य-नीति कही गई है—जहाँ मुनि इन्द्रियों का संयम करता है, वह स्थान कुरुक्षेत्र, नैमिष और पुष्कर के समान है; इसलिए ग्रहण, संक्रांति और व्यतीपात में योगियों का विशेष सम्मान करना चाहिए। जो इस तीर्थ में संन्यास ग्रहण करता है, वह विमान से स्वर्ग जाकर सोम का पार्षद बनता है और सोम के समान दिव्य सुख पाता है।

14 verses

Adhyaya 140

Adhyaya 140

नन्दाह्रदमाहात्म्य (Nandāhrada Māhātmya: The Glory of Nandā Lake)

इस अध्याय में रेवाखण्ड के भीतर तीर्थ-यात्रा का उपदेशात्मक मार्ग बताया गया है। मार्कण्डेय राजश्रवणकर्ता को नन्दाह्रद जाने की प्रेरणा देते हैं—यह अनुपम पवित्र सरोवर है, जहाँ सिद्धगण निवास करते हैं और देवी नन्दा वरदान देने वाली मानी जाती हैं। तीर्थ की पवित्रता एक पुराकथा से स्थापित होती है: देवताओं से भयभीत करने वाला महिषासुर देवी के शूलिनी-स्वरूप द्वारा त्रिशूल से विद्ध होकर मारा गया। तत्पश्चात विशाल-नेत्रा देवी ने वहीं स्नान किया, इसलिए उस सरोवर का नाम “नन्दाह्रद” प्रसिद्ध हुआ। आचार-विधि में कहा गया है कि नन्दा का स्मरण करके वहाँ स्नान करें और ब्राह्मणों को दान दें; इससे अश्वमेध-यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है। भैरव, केदार और रुद्र-महालाय जैसे दुर्लभ महातीर्थों के साथ इसकी गणना की गई है, पर काम-आसक्ति और मोह के कारण बहुत लोग इसकी महिमा नहीं पहचानते। फलश्रुति में यह भी कहा गया है कि समुद्र-पर्यन्त पृथ्वी पर जहाँ-जहाँ स्नान-दान का फल है, वह सब नन्दाह्रद-स्नान से एकत्र रूप में प्राप्त हो जाता है।

12 verses

Adhyaya 141

Adhyaya 141

Tāpeśvara Tīrtha Māhātmya (The Glory of the Tāpeśvara Ford)

मार्कण्डेय तापेश्वर तीर्थ की उत्पत्ति-कथा सुनाते हैं। एक व्याध ने देखा कि भयभीत हरिणी जल में कूदकर निर्भय हुई और फिर आकाश की ओर उठ गई। यह अद्भुत दृश्य देखकर उसके भीतर वैराग्य जागा; उसने धनुष रख दिया और सहस्र दिव्य वर्षों तक कठोर तप किया। तप से प्रसन्न होकर महेश्वर प्रकट हुए और वर माँगने को कहा; व्याध ने शिव के समीप निवास की याचना की, जिसे भगवान ने प्रदान कर अंतर्धान हो गए। तदनंतर व्याध ने महेश्वर की स्थापना कर विधिपूर्वक पूजन किया और स्वर्ग को प्राप्त हुआ। तभी से यह तीर्थ त्रिलोकों में “तापेश्वर” नाम से प्रसिद्ध हुआ, व्याध के अनुताप और तप की उष्मा से संबद्ध। यहाँ स्नान कर शंकर की पूजा करने वाला शिवलोक पाता है; नर्मदा-जल में तापेश्वर पर स्नान करने से तापत्रय का नाश होता है। अष्टमी, चतुर्दशी और तृतीया को विशेष स्नान-विधान सर्व पापों की शांति हेतु कहा गया है।

12 verses

Adhyaya 142

Adhyaya 142

रुक्मिणीतीर्थमाहात्म्य (Rukmiṇī Tīrtha Māhātmya) and the Naming of Yodhanīpura

इस अध्याय में मार्कण्डेय युधिष्ठिर को रुक्मिणी-तीर्थ का माहात्म्य बताते हैं। कहा गया है कि यहाँ केवल स्नान से ही सौन्दर्य और सौभाग्य प्राप्त होता है; विशेषतः अष्टमी, चतुर्दशी और तृतीया तिथियों में स्नान-पूजन का फल अत्यन्त श्रेष्ठ माना गया है। फिर तीर्थ की प्रतिष्ठा के लिए कथा आती है—कुण्डिन के राजा भीष्मक की पुत्री रुक्मिणी के विषय में आकाशवाणी होती है कि उसका विवाह चतुर्भुज देव से होगा। राजनैतिक कारणों से उसका वचन शिशुपाल को दे दिया जाता है; तब कृष्ण और सङ्कर्षण आते हैं, हरि छद्म रूप में रुक्मिणी से मिलते हैं और कृष्ण उसका हरण कर लेते हैं। पीछा करने पर युद्ध होता है, बलदेव के पराक्रम का वर्णन है और रुक्मी से सामना होता है; रुक्मिणी के आग्रह से सुदर्शन का प्रहार रुकता है, फिर भगवान अपना दिव्य रूप प्रकट कर मेल कराते हैं। अन्त में कृष्ण सात ऋषि-स्वरूप मानसमुनीों का सम्मान कर ग्रामदान करते हैं और दान की भूमि छीनने के विरुद्ध कठोर चेतावनी देते हैं, उसके पापफल भी बताते हैं। तीर्थ-माहात्म्य में स्नान, बलदेव-केशव की पूजा, प्रदक्षिणा तथा कपिला-दान, स्वर्ण-रजत, पादुका, वस्त्र आदि दानों का विधान है; अन्य प्रसिद्ध तीर्थों के समान पुण्य की तुलना और इस क्षेत्र में अग्नि, जल या उपवास से देहत्याग करने वालों की परलोक-गति का फलश्रुति भी कही गई है।

102 verses

Adhyaya 143

Adhyaya 143

Yojaneśvara Tīrtha Māhātmya and the Worship of Balakeśava

इस अध्याय में श्री मार्कण्डेय एक राजा से योजनेश्वर नामक परम पुण्य तीर्थ का माहात्म्य कहते हैं। बताया गया है कि यहाँ नर–नारायण ऋषियों ने तप करके देव–दानव के आदियुद्ध में देवताओं को विजय दिलाई। युगों के क्रम में उसी दिव्य तत्त्व की महिमा संक्षेप में प्रकट होती है—त्रेता युग में राम–लक्ष्मण के रूप में, जहाँ तीर्थ-स्नान के अनन्तर रावण-वध द्वारा धर्म की स्थापना होती है। कलियुग में वही शक्ति वासुदेव वंश में बल–केशव (बलराम–कृष्ण) बनकर प्रकट होती है और कंस, चाणूर, मुष्टिक, शिशुपाल, जरासन्ध आदि का संहार करती है; साथ ही धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र के युद्ध में भी प्रमुख योद्धाओं के पतन में दिव्य भूमिका का संकेत दिया गया है। इसके बाद आचरण-विधि बताई गई है—तीर्थ में स्नान, बल–केशव की पूजा, उपवास, रात्रि-जागरण (प्रजागर), भक्ति-गान/कीर्तन और ब्राह्मणों का आदर-सत्कार। फलश्रुति में कहा है कि यहाँ किए गए दान और पूजन का फल अक्षय होता है, महापापों सहित पाप नष्ट होते हैं, और जो धर्मपरायण इस अध्याय को सुनें, पढ़ें या पाठ करें वे पाप से मुक्त होकर कल्याण/मोक्ष के अधिकारी होते हैं।

18 verses

Adhyaya 144

Adhyaya 144

Cakratīrtha–Dvādaśī Tīrtha Māhātmya (Non-diminishing Merit at Cakratīrtha)

इस अध्याय में श्री मार्कण्डेय राज-श्रोता को संक्षिप्त, यात्रा-निर्देश के रूप में उपदेश देते हैं। वे उसे “उत्तम” द्वादशी-तीर्थ की ओर जाने को कहते हैं और सामान्य कर्मों के फल-व्यवहार की तुलना चक्रतीर्थ की असाधारण महिमा से करते हैं। कहा गया है कि सामान्यतः दान, जप, होम और बलि/उपहार आदि के फल समय के साथ क्षीण या समाप्त हो सकते हैं; परन्तु चक्रतीर्थ में किए गए कर्म अक्षय माने गए हैं, उनका पुण्य कभी घटता नहीं। अंत में भूत और भविष्य तक विस्तृत इस तीर्थ के परम माहात्म्य को विशेष रूप से स्पष्ट और पूर्णतः कह दिया गया—ऐसा निष्कर्ष-वचन देकर इस स्तुति-खंड का समापन किया जाता है।

4 verses

Adhyaya 145

Adhyaya 145

Śivātīrtha Māhātmya (Glory of the Śiva Tīrtha)

इस अध्याय में मार्कण्डेय एक ‘देश-रक्षक/नेता’ से संक्षिप्त धर्मोपदेश करते हैं और उसे अनुपम शिवातीर्थ की ओर प्रवृत्त करते हैं। कहा गया है कि उस तीर्थ में देव-दर्शन मात्र से ही समस्त पाप-कलुष (सर्व-किल्बिष) नष्ट हो जाते हैं। फिर क्रोध पर विजय और इन्द्रिय-निग्रह के साथ तीर्थ-स्नान करके महादेव की पूजा करने का विधान है; इसका पुण्य अग्निष्टोम यज्ञ के तुल्य बताया गया है। आगे भक्ति सहित उपवास (सोपवास) करके शिव-पूजन करने से साधक की गति अविचल हो जाती है और अंततः रुद्रलोक की प्राप्ति सुनिश्चित फल के रूप में कही गई है।

4 verses

Adhyaya 146

Adhyaya 146

Asmahaka Pitṛtīrtha Māhātmya and Piṇḍodaka-Vidhi (अस्माहक-पितृतीर्थ-माहात्म्य एवं पिण्डोदक-विधि)

इस अध्याय में युधिष्ठिर ‘अस्माहक’ नामक श्रेष्ठ पितृतीर्थ का माहात्म्य पूछते हैं। मार्कण्डेय मुनि ऋषि–देव सभा में हुए प्राचीन प्रश्नोत्तर का प्रमाण देकर बताते हैं कि यह तीर्थ अन्य तीर्थसमूहों से भी बढ़कर है। यहाँ एक ही पिण्ड और जल-तर्पण से पितर प्रेत-पीड़ा से मुक्त होकर दीर्घकाल तक तृप्त होते हैं और साधक को स्थायी पुण्य मिलता है। श्रुति–स्मृति की मर्यादा, कर्मफल का नियम और देही का ‘वायु-सा’ प्रस्थान बताते हुए स्नान, दान, जप, होम, स्वाध्याय, देव-पूजन, अतिथि-सत्कार तथा विशेषतः पिण्डोदक-प्रदान को धर्मरक्षा का आधार कहा गया है। विधि में अमावस्या, व्यतीपात, मन्वादि–युगादि, अयन–विषुव और सूर्य-संक्रमण जैसे कालों का विशेष महत्त्व बताया गया है। देवकृत ब्रह्मशिला को गजकुम्भ-सदृश कहा गया है और कलियुग में वैशाख-अमावस्या के आसपास उसका विशेष प्राकट्य वर्णित है। स्नान के बाद नारायण/केशव की मंत्र-स्तुति, ब्राह्मण-भोजन, दर्भ और दक्षिणा सहित श्राद्ध, तथा दूध, मधु, दही, शीतल जल आदि वैकल्पिक अर्पणों को पितरों के प्रत्यक्ष पोषण के रूप में समझाया गया है। देव, पितृ, नदियाँ, समुद्र और अनेक ऋषि इस तीर्थ के साक्षी कहे गए हैं। फलश्रुति में महापापों की शुद्धि, बड़े वैदिक यज्ञों के तुल्य फल, नरकस्थित पितरों का उद्धार और लौकिक समृद्धि का वर्णन है, तथा ब्रह्मा–विष्णु–महेश को कार्यरूप से एक ही शक्ति के रूप में समन्वित किया गया है।

117 verses

Adhyaya 147

Adhyaya 147

Siddheśvara-tīrtha-māhātmya (सिद्धेश्वरतीर्थमाहात्म्य) — Merits of Bathing, Śiva Worship, and Śrāddha on the Narmadā’s Southern Bank

इस अध्याय में मार्कण्डेय मुनि राजा (महिपाल/नृपसत्तम) को नर्मदा (रेवा) के दक्षिण तट पर स्थित अनुपम सिद्धेश्वर तीर्थ में जाने का उपदेश देते हैं। वे बताते हैं कि यह स्थान अत्यन्त पवित्र और कल्याणकारी है; वहाँ स्नान करके वृषभध्वज भगवान शिव की भक्ति से पूजा करनी चाहिए। वहाँ का स्नान और शिव-पूजन समस्त पापों का नाश करता है और अश्वमेध यज्ञ करने वालों के समान पुण्य प्रदान करता है। परिश्रमपूर्वक स्नान करके श्राद्ध करने से पितरों की पूर्ण तृप्ति होती है—यह तीर्थ-फल के रूप में कहा गया है। जो प्राणी इस तीर्थ में या इसके सम्बन्ध से देह त्याग करता है, वह स्वभावतः दुःखमय गर्भवास की पुनरावृत्ति से मुक्त हो जाता है। अंत में तीर्थ-जल में स्नान को पुनर्भव-निवृत्ति का साधन बताकर शैव भक्ति के भीतर इसे मोक्षोपयोगी कर्म के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है।

6 verses

Adhyaya 148

Adhyaya 148

Āṅgāraka-Śiva Tīrtha Vidhi on the Northern Bank of the Narmadā (अङ्गारक-शिवतीर्थविधिः)

मार्कण्डेय राजा को नर्मदा के उत्तरी तट पर स्थित अङ्गारक-संबद्ध शिव-तीर्थ में जाने का उपदेश देते हैं, जिसे पाप-क्षय का स्थान कहा गया है। वहाँ चतुर्थी और मंगलवार (चतुर्थी–अङ्गारक दिन) को नियतकाल व्रत बताया गया है—संकल्प, सूर्यास्त के समय स्नान, और निरंतर संध्या-उपासना का विशेष विधान है। फिर पूजा-क्रम आता है: स्थण्डिल पर स्थापना, रक्तचंदन का लेपन, कमल/मण्डल-विधि से पूजन, तथा कुज/अङ्गारक के “भूमिपुत्र, स्वेदज” आदि नामों से अर्चना। ताँबे के पात्र में रक्तचंदन-जल, लाल पुष्प, तिल और चावल सहित अर्घ्य अर्पित करने का निर्देश है। आहार में खट्टा और नमकीन त्यागकर सरल, हितकर रसों का सेवन कहा गया है। विधि का विस्तार भी है—यथाशक्ति स्वर्ण-प्रतिमा, दिशाओं में करक स्थापित करना, शंख-तूर्य का मंगलनाद, और विद्वान, व्रतशील, दयालु ब्राह्मण का सम्मान। दान में लाल गाय और लाल बैल, प्रदक्षिणा, परिवार सहित सहभाग, क्षमा-प्रार्थना सहित समापन और विसर्जन बताया गया है। फलश्रुति में अनेक जन्मों तक सौंदर्य-समृद्धि, मृत्यु के बाद अङ्गारकपुर की प्राप्ति, दिव्य भोग, और अंततः धर्मयुक्त राजत्व, आरोग्य व दीर्घायु का वरदान कहा गया है।

27 verses

Adhyaya 149

Adhyaya 149

Liṅgeśvara Tīrtha Māhātmya and Dvādaśī-Māsa-Nāma Kīrtana (लिङ्गेश्वरतीर्थमाहात्म्यं तथा द्वादशी-मासनामकीर्तनम्)

मार्कण्डेय लिङ्गेश्वर नामक तीर्थ का माहात्म्य बताते हैं, जहाँ ‘देवों के देव’ के दर्शन से पाप नष्ट होते हैं। प्रसंग को विष्णु-प्रधान भाव में रखते हुए भगवान की रक्षक शक्ति और वराह-लीला का स्मरण कराया गया है, तथा तीर्थ-आचरण बताया गया है—तीर्थ में स्नान, देवता को प्रणाम-पूजन, और ब्राह्मणों का दान, सम्मान व भोजन से सत्कार। फिर द्वादशी के व्रत-नियम का विधान आता है: उपवास/संयम के साथ सुगंध और पुष्पमालाओं से भगवान की पूजा, पितरों व देवताओं का तर्पण, और बारह दिव्य नामों का कीर्तन। आगे प्रत्येक चंद्रमास के लिए केशव से दामोदर तक विष्णु के नाम नियत करके नाम-स्मरण को वाणी, मन और शरीर के दोषों का शोधन करने वाला बताया गया है। अंत में भक्तों की धन्यता और भक्ति-रहित जीवन की हानि का मूल्यांकन किया गया है। ग्रहण और अष्टका काल में तिल-मिश्रित जल से पितृतर्पण का निर्देश देकर, वराह-रूप हरि की शांति-प्रद स्तुति के साथ अध्याय पूर्ण होता है।

23 verses

Adhyaya 150

Adhyaya 150

कुसुमेश्वर-माहात्म्य (Kusumeśvara Māhātmya: Ananga, Kāma, and the Narmadā-bank Liṅga स्थापना)

मार्कण्डेय राजा को नर्मदा के दक्षिण तट पर स्थित परम पवित्र ‘कुसुमेश्वर’ तीर्थ का निर्देश देते हैं, जो उपपातकों का नाशक है और कामदेव द्वारा स्थापित होकर तीनों लोकों में प्रसिद्ध है। तब युधिष्ठिर पूछते हैं कि अनंग (देहरहित) काम को फिर ‘अंगित्व’ कैसे प्राप्त हुआ। कथा कृतयुग में जाती है—महादेव गंगासागर में घोर तप करते हैं, जिससे लोक व्याकुल हो उठते हैं। देवता इन्द्र के पास जाकर अप्सराओं, वसन्त, कोयल, दक्षिण पवन और काम को शिव का तप भंग करने भेजते हैं; पर शिव की त्रिविध मुद्रा का वर्णन होते-होते तृतीय नेत्र की ज्वाला से काम भस्म हो जाता है और जगत ‘निष्काम’ हो जाता है। देवता ब्रह्मा की शरण लेते हैं; ब्रह्मा वेद-स्तुतियों से शिव को प्रसन्न करते हैं। शिव विचार करते हैं कि काम का देह-प्रत्यावर्तन कठिन है, फिर भी अनंग जीवन-प्रदाता रूप में पुनः प्रकट होता है। इसके बाद काम नर्मदा तट पर तप कर कुण्डलेश्वर से विघ्नकारी प्राणियों से रक्षा माँगता है और वर पाता है कि उस तीर्थ में शिव की नित्य उपस्थिति रहेगी; तब वह ‘कुसुमेश्वर’ नामक लिंग की स्थापना करता है। अध्याय में स्नान-उपवास, विशेषतः चैत्र चतुर्दशी/मदन-दिवस पर, प्रातः सूर्य-पूजन, तिल-मिश्रित जल से तर्पण और पिण्डदान का विधान है। फलश्रुति कहती है कि यहाँ पिण्डदान बारह वर्ष के सत्र-यज्ञ के तुल्य है, पितरों को दीर्घ तृप्ति देता है, और इस स्थल पर मरने वाले छोटे जीवों तक के लिए भी कल्याणकारी है; कुसुमेश्वर में भक्ति, वैराग्य और संयम से शिवलोक-भोग तथा अंत में सम्मानित, स्वस्थ, वाक्पटु शासक रूप में पुनर्जन्म मिलता है।

52 verses

Adhyaya 151

Adhyaya 151

जयवाराहतीर्थमाहात्म्य तथा दशावतारकथनम् (Jaya-Vārāha Tīrtha Māhātmya and the Account of the Ten Avatāras)

यह अध्याय संवाद-रूप में है। मार्कण्डेय नर्मदा के उत्तर तट पर ‘जय-वाराह’ नामक अत्यन्त प्रशंसित तीर्थ का वर्णन करते हैं। वहाँ स्नान तथा मधुसूदन के दर्शन को पाप-नाशक कहा गया है, और विशेष रूप से भगवान के दस जन्मों (दशावतार) का स्मरण या पाठ महान् शुद्धि देने वाला बताया गया है। युधिष्ठिर पूछते हैं कि मत्स्य से लेकर कल्कि तक प्रत्येक अवतार में भगवान ने कौन-से कर्म किए। मार्कण्डेय संक्षेप में बताते हैं—मत्स्य ने डूबे वेदों का उद्धार किया; कूर्म ने मन्थन में आधार बनकर पृथ्वी को स्थिर किया; वराह ने पाताल से पृथ्वी को उठाया; नरसिंह ने हिरण्यकशिपु का वध किया; वामन ने तीन पगों से बलि को वश में कर प्रभुत्व प्रकट किया; परशुराम ने अत्याचारी क्षत्रियों का दमन कर पृथ्वी कश्यप को अर्पित की; राम ने रावण का संहार कर धर्मराज्य स्थापित किया; कृष्ण ने दुष्ट राजाओं का नाश कर युधिष्ठिर की विजय का संकेत दिया; बुद्ध को कलियुग में भ्रम फैलाने वाला रूप कहा गया; और कल्कि को दसवाँ जन्म बताया गया है। अंत में दशावतार-स्मरण को पाप-क्षय का कारण मानकर तीर्थ-माहात्म्य और अवतार-तत्त्व को समाज-धर्म के पतन की चेतावनी के साथ जोड़ा गया है।

28 verses

Adhyaya 152

Adhyaya 152

भार्गलेश्वर-माहात्म्य (Bhārgaleśvara Māhātmya) — Merit of Worship and Final Passage at the Tīrtha

इस संक्षिप्त धार्मिक प्रसंग में मार्कण्डेय तीर्थयात्री को परम पावन भार्गलेश्वर-धाम जाने की प्रेरणा देते हैं। वे शंकर को “जगत का प्राण” बताते हैं और कहते हैं कि उनका केवल स्मरण भी पापों का नाश कर देता है (स्मृतमात्र-अघनाशन)। फिर इस तीर्थ के दो फल बताए गए हैं—(1) जो वहाँ स्नान करके परमेश्वर की पूजा करता है, उसे अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है; (2) जो उसी तीर्थ में प्राणत्याग करता है, वह “अनिवर्तिका गति” पाकर निःसंदेह रुद्रलोक को प्राप्त होता है। अध्याय का संदेश यह है कि शिवभक्ति, पवित्र स्थान और स्मरण—ये मोक्षदायी साधन बनकर पुराणों में विशेष महिमा पाते हैं।

4 verses

Adhyaya 153

Adhyaya 153

रवितीर्थ-आदित्येश्वर-माहात्म्य (Ravi Tīrtha and Ādityeśvara: Theological Account and Merit Framework)

अध्याय के आरम्भ में मार्कण्डेय ‘अनुपम’ रवितीर्थ का वर्णन करते हैं, जिसके केवल दर्शन से भी पापों का क्षय बताया गया है। रवितीर्थ में स्नान और भास्कर-दर्शन के निश्चित फल कहे गए हैं। रवि को समर्पित दान यदि योग्य ब्राह्मण को विधिपूर्वक दिया जाए तो उसका फल अपरिमेय माना गया है—विशेषतः अयन, विषुव, संक्रान्ति, सूर्य/चन्द्रग्रहण तथा व्यतीपात जैसे कालों में। सिद्धान्त यह रखा गया है कि सूर्य ‘प्रतिदाता’ की भाँति अर्पित दान को समय के पार, अनेक जन्मों तक भी, लौटा देता है; समय-विशेष से पुण्य में भेद भी बताया गया है। युधिष्ठिर पूछते हैं कि रवितीर्थ इतना महापुण्य क्यों है। तब मार्कण्डेय कृतयुग की कथा सुनाते हैं—विद्वान ब्राह्मण जाबालि व्रत-पालन के कारण पत्नी के ऋतु-काल में बार-बार सहवास से इंकार करते हैं; दुःखी पत्नी उपवास करके देह त्याग देती है, और जाबालि उस दोष से कुष्ठ-सदृश रोग व देह-क्षय से ग्रस्त हो जाते हैं। वे नर्मदा के उत्तर तट पर भास्करतीर्थ/आदित्येश्वर की महिमा सुनते हैं जो सर्वरोगनाशक है; पर चल न सकने से वे कठोर तप करके आदित्येश्वर को अपने स्थान पर प्रकट कराने का संकल्प लेते हैं। सौ वर्षों के तप के बाद सूर्य वर देते हैं और वहीं प्रकट होते हैं; वह स्थान पाप-शोकहर तीर्थ घोषित होता है। व्रत-विधि बताई गई है—एक वर्ष तक प्रत्येक रविवार स्नान, सात प्रदक्षिणा, अर्घ्य-दान आदि और सूर्य-दर्शन; इससे त्वचा-रोग शीघ्र शान्त होने और ऐहिक समृद्धि की सिद्धि कही गई है। संक्रान्ति पर वहाँ किया गया श्राद्ध पितरों को तृप्त करता है, क्योंकि भास्कर को पितृदेवताओं से सम्बद्ध बताया गया है। अंत में आदित्येश्वर की शुद्धि और चिकित्सा-सम्बन्धी महिमा पुनः प्रतिपादित होती है।

44 verses

Adhyaya 154

Adhyaya 154

कलकलेश्वरतीर्थमाहात्म्य (Glory of the Kalakaleśvara Tīrtha)

इस अध्याय में श्री मार्कण्डेय नर्मदा के दक्षिण तट पर स्थित प्रसिद्ध तीर्थ ‘कलकलेश्वर’ का वर्णन करते हैं, जिसे स्वयं देव द्वारा निर्मित कहा गया है। अन्धक का वध करने के बाद महादेव का देवताओं, गन्धर्वों, किन्नरों और महान नागों द्वारा शंख, तूर्य, मृदंग, पणव, वीणा, वेणु आदि वाद्यों तथा साम, यजुः, छन्द और ऋचाओं के घोष के साथ स्तवन-पूजन किया गया—यह शैव प्रसंग यहाँ प्रतिष्ठित है। प्रमथों और वन्दियों के कलकल-नाद के बीच जिस लिंग की स्थापना हुई, उसी ध्वनि से ‘कलकलेश्वर’ नाम की व्युत्पत्ति बताई गई है। विधि यह है कि इस तीर्थ में स्नान कर कलकलेश्वर का दर्शन करने से वाजपेय यज्ञ से भी अधिक पुण्य प्राप्त होता है। फलश्रुति में पापशुद्धि, दिव्य विमान से स्वर्गारोहण, अप्सराओं द्वारा प्रशंसा, स्वर्गीय भोग, और अंततः शुद्ध कुल में दीर्घायु, निरोग, विद्वान ब्राह्मण के रूप में पुनर्जन्म का वर्णन है।

10 verses

Adhyaya 155

Adhyaya 155

शुक्लतीर्थमाहात्म्यम् (The Glory of Śukla Tīrtha on the Narmadā)

इस अध्याय में मार्कण्डेय नर्मदा के उत्तरी तट पर स्थित शुक्लतीर्थ को अनुपम और सर्वश्रेष्ठ तीर्थ बताते हैं। तीर्थों की एक मर्यादा-क्रम व्यवस्था स्थापित कर कहा गया है कि अन्य पवित्र स्थल शुक्लतीर्थ के प्रभाव के अंशमात्र के भी तुल्य नहीं हैं। साथ ही नर्मदा की सर्वपापहरिणी, सर्वलोकपावनी महिमा का प्रतिपादन होता है। उत्पत्ति-कथा में विष्णु शुक्लतीर्थ में दीर्घ तप करते हैं; तब शिव प्रकट होकर उस क्षेत्र को प्रतिष्ठित करते हैं, जो लौकिक कल्याण और मोक्ष—दोनों देने वाला है। इसके बाद राजा चाणक्य की कथा आती है, जहाँ शापग्रस्त दो प्राणी कौए के रूप में यमलोक भेजे जाते हैं; यम कहता है कि शुक्लतीर्थ में मरने वाले मेरे अधिकार से परे हैं और बिना न्याय-विचार के ही उच्च गति पाते हैं। कौए यमपुरी के दर्शन, नरकों के भेद और कर्मानुसार दण्ड, तथा दान देने वालों के दान-फल के भोग का वर्णन करते हैं। अंत में चाणक्य आसक्तियाँ त्यागकर धन दान करता है और तीर्थ-स्नान से वैष्णव गति प्राप्त करता है; इस प्रकार अध्याय नीति, दान और मोक्ष-मार्ग को पुष्ट करता है।

119 verses

Adhyaya 156

Adhyaya 156

शुक्लतीर्थमाहात्म्य (Śukla-tīrtha Māhātmya) — The Glory of Śukla Tīrtha on the Revā

मार्कण्डेय रेवातट की नर्मदा पर स्थित शुक्लतीर्थ को अनुपम और सर्वश्रेष्ठ तीर्थ बताते हैं। दिशानत ढाल वाली भूमि पर, ऋषियों से सेवित इस स्थान में स्नान से पापक्षय होता है—जैसे धोबी वस्त्र को निर्मल कर देता है, वैसे ही दोष धुल जाते हैं। वैशाख में विशेषतः (और कार्तिक में भी) कृष्णपक्ष चतुर्दशी को कैलास से शिव उमा सहित यहाँ पधारते हैं और विधिपूर्वक स्नान के बाद उनके दर्शन का विधान कहा गया है। ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, गन्धर्व, अप्सराएँ, यक्ष, सिद्ध, विद्याधर और नाग आदि दिव्य गण इस तीर्थ की पावन-परम्परा में सहभागी होते हैं। रेवा-जल से तर्पण और पिण्ड/अर्घ्यादि देने से पितरों को दीर्घकाल तक तृप्ति मिलती है। घृत-सिक्त कम्बल, यथाशक्ति सुवर्ण, तथा पादुका, छत्र, शय्या, आसन, भोजन, जल, अन्न-धान्य आदि दानों का विधान है; इनके फलस्वरूप शिवलोक/रुद्रलोक की प्राप्ति, और एक तपोव्रत-प्रसंग में वरुणपुरी की गति भी कही गई है। मासभर उपवास, प्रदक्षिणा (पृथ्वी-प्रदक्षिणा के समान), वृषमोक्ष, सामर्थ्य अनुसार अलंकृत कन्या-दान, तथा रुद्र को समर्पित ‘सुन्दर युगल’ का पूजन जन्म-जन्मान्तर में वियोग-निवारक बताया गया है। अंत में फलश्रुति कहती है कि श्रद्धा से सुनने पर संतान, धन या मोक्ष—इच्छित फल सिद्ध होते हैं।

45 verses

Adhyaya 157

Adhyaya 157

हुङ्कारतीर्थ-माहात्म्य (Glory of Hūṅkāra Tīrtha and Vāsudeva’s Sacred Site)

इस अध्याय में शुक्लतीर्थ के निकट राजा को मārkaṇḍeya ऋषि उपदेश देते हैं और नर्मदा (रेवा) तट पर स्थित प्रसिद्ध वासुदेव-तीर्थ का वर्णन करते हैं। कथा के अनुसार “हूँकार” शब्द के मात्र उच्चारण से नदी एक क्रोश दूर हट गई; इसलिए वह स्थान विद्वानों में “हूँकार” और स्नान-स्थल “हूँकारतीर्थ” कहलाया। यहाँ स्नान करके अविनाशी अच्युत के दर्शन करने से अनेक जन्मों के संचित पाप नष्ट होते हैं—ऐसा वैष्णव-भक्ति से युक्त तीर्थ-प्रभाव बताया गया है। संसार में डूबे जीवों का सबसे बड़ा उद्धारक नारायण हैं; हरि के लिए लगी जिह्वा, मन और हाथ धन्य हैं, और जिनके हृदय में हरि प्रतिष्ठित हैं उनके लिए सर्वमंगल कहा गया है। अन्य देवताओं की उपासना से जो फल चाहा जाता है, वह हरि को अष्टांग प्रणाम करने से भी प्राप्त होता है। मंदिर की धूल का स्पर्श, झाड़ू देना, जल छिड़कना, लेपन आदि सेवाएँ भी पाप का नाश करती हैं; और पूर्ण श्रद्धा न होने पर भी किया गया नमस्कार शीघ्र दोषों को गलाकर विष्णुलोक की प्राप्ति कराता है—ऐसी फलश्रुति दी गई है। अंत में कहा गया है कि हूँकारतीर्थ में किए गए शुभ-अशुभ कर्म अपने फल में स्थिर रहते हैं, जिससे इस तीर्थ की विशेष नैतिक-आनुष्ठानिक शक्ति प्रकट होती है।

16 verses

Adhyaya 158

Adhyaya 158

Saṅgameśvara-Tīrtha Māhātmya (Glory of the Saṅgameśvara Confluence Shrine)

अध्याय 158 में मārkaṇḍेय साङ्गमेश्वर नामक श्रेष्ठ तीर्थ का माहात्म्य बताते हैं। यह नर्मदा के दक्षिण तट पर स्थित है और पाप व भय का नाश करने वाला कहा गया है। विन्ध्य से निकली एक पुण्यधारा यहाँ नर्मदा में मिलती है; संगम-स्थल की प्रामाणिकता के लिए काले पत्थरों में स्फटिक-सी चमक आदि चिह्नों का उल्लेख किया गया है। इसके बाद साधना-दान के क्रमिक फल बताए गए हैं—संगम में स्नान कर साङ्गमेश्वर का पूजन करने से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। घंटियाँ, पताकाएँ, छत्र आदि अर्पित करने से दिव्य विमान की प्राप्ति और रुद्र के सान्निध्य का फल कहा गया है। दही, नारियल आदि से लिङ्ग-पूर्ति तथा दही, मधु, घृत आदि से विधिपूर्वक अभिषेक करने पर शिवलोक में दीर्घ निवास, स्वर्ग्य फल और ‘सात जन्मों’ तक पुण्य-परंपरा का वर्णन है। नीति-उपदेश भी साथ है—महादेव को परम ‘महापात्र’ कहा गया है; ब्रह्मचर्य-युक्त पूजा की प्रशंसा की गई है; और शिव-योगियों का सम्मान सर्वोच्च माना गया है। एक योगी को भोजन कराना, वेदज्ञ ब्राह्मणों की बहुत बड़ी संख्या को भोजन कराने से भी अधिक फलदायक बताया गया है। अंत में मोक्ष-वचन है कि साङ्गमेश्वर में देह-त्याग करने वाला शिवलोक से फिर लौटता नहीं, पुनर्जन्म नहीं पाता।

22 verses

Adhyaya 159

Adhyaya 159

नरकेश्वरतीर्थ-माहात्म्यं, वैतरणीदाना-विधानं च (Narakeśvara Tīrtha Glory and the Procedure of Vaitaraṇī-Gift)

अध्याय का आरम्भ मārkaṇḍeya के उपदेश से होता है, जहाँ वे राजा को नर्मदा का एक दुर्लभ और अत्यन्त पावन तीर्थ ‘नरकेश्वर’ बताते हैं, जो ‘नरक-द्वार’ के भय से रक्षा करने वाला कहा गया है। इसके बाद युधिष्ठिर पूछते हैं कि शुभ-अशुभ कर्मों के फल भोगने के बाद जीव पहचान योग्य चिह्नों सहित कैसे पुनर्जन्म लेते हैं। मārkaṇḍeya कर्म-न्याय का क्रमबद्ध विवेचन करते हैं—विशिष्ट अपराध और नैतिक पतन के अनुसार देह-दोष, दरिद्रता, सामाजिक वंचना या पशु-योनि आदि जन्म प्राप्त होते हैं; यह उपदेशात्मक सूची के रूप में प्रस्तुत है। फिर गर्भ-विकास का मासानुसार वर्णन, पंचमहाभूतों का संयोग और इन्द्रियों-मन-बुद्धि का उदय—सब ईश्वर-नियंत्रित देह-धर्म के रूप में बताया जाता है। उत्तरार्ध में यमद्वार पर वैतरणी नदी का भयावह स्वरूप आता है—मलिन जल, हिंसक जलचर और पापियों के लिए तीव्र यातना, विशेषतः जो माता, आचार्य, गुरु का अपमान करते हैं, आश्रितों को कष्ट देते हैं, दान-प्रतिज्ञा में छल करते हैं तथा काम-सामाजिक मर्यादाओं का उल्लंघन करते हैं। उपाय के रूप में ‘वैतरणी-धेनु’ दान का विधान दिया गया है—विधिपूर्वक सुसज्जित गौ बनाकर मंत्रोच्चार सहित दान, प्रदक्षिणा आदि करने से वही नदी ‘सुखवाहिनी’ बनकर पार कराने वाली होती है। अंत में विशेष तिथि (आश्वयुज कृष्ण चतुर्दशी) पर नर्मदा-स्नान, श्राद्ध, रात्रि-जागरण, तर्पण, दीपदान, ब्राह्मण-भोजन और शिव-पूजा का निर्देश है, जिससे नरक-भय से मुक्ति, उत्तम परलोक-गति और आगे शुभ मानव-फल की प्राप्ति कही गई है।

102 verses

Adhyaya 160

Adhyaya 160

मोक्षतीर्थमाहात्म्य (Mokṣatīrtha Māhātmya) — The Glory of the Liberation-Fording Place

मार्कण्डेय पाण्डु-वंशज से कहते हैं कि एक “अनुपम” मोक्षतीर्थ है, जहाँ देव, गन्धर्व और तपस्वी ऋषि निरन्तर आते हैं। विष्णु की माया से मोहित होकर बहुत-से लोग इस तीर्थ को पहचान नहीं पाते, पर सिद्ध ऋषियों ने यहीं मोक्ष प्राप्त किया है। पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, प्राचेतस, वसिष्ठ, दक्ष, नारद आदि महर्षियों का उल्लेख करके कहा गया है कि सात हजार महात्मा अपने पुत्रों सहित यहाँ मुक्त हुए—इसलिए यह तीर्थ “मोक्ष-प्रद” है। इसके बाद संगम का वर्णन है—प्रवाह के मध्य तमहा नामक नदी आकर मिलती है; यह संगम समस्त पापों का नाश करने वाला बताया गया है। यहाँ विधिपूर्वक गायत्री-जप करने से ऋग्/यजुः/साम के विस्तृत अध्ययन का फल मिलता है; दान, होम और पाठ-कीर्तन आदि जो कुछ यहाँ किया जाए वह अक्षय हो जाता है और मोक्ष का श्रेष्ठ साधन बनता है। अंत में कहा गया है कि जो द्विज-संन्यासी इस तीर्थ में देह त्यागते हैं, वे तीर्थ-प्रभाव से अनावर्त (अनीवर्तिका) गति को प्राप्त होते हैं; विधि संक्षेप में कही गई है, विस्तार पुराण में बताया गया है।

10 verses

Adhyaya 161

Adhyaya 161

सर्पतीर्थमाहात्म्य (Glory of Sarpa-tīrtha)

अध्याय 161 में मर्कण्डेय ऋषि राजा युधिष्ठिर को सर्पतीर्थ के दर्शन का उपदेश देते हैं। यह तीर्थ अत्यन्त विशिष्ट बताया गया है, जहाँ महान् नागों ने कठोर तपस्या से सिद्धि पाई। वासुकि, तक्षक, ऐरावत, कालिय, कर्कोटक, धनञ्जय, शंखचूड़, धृतराष्ट्र, कुलिक, वामन आदि नागों तथा उनकी वंश-परम्पराओं का वर्णन करके इस तीर्थ को जीवित पवित्र-लोक के समान प्रतिष्ठित किया गया है, जहाँ तप से यश और भोग दोनों प्राप्त होते हैं। आगे विधि-धर्म का निर्देश है—सर्पतीर्थ में स्नान करके पितरों और देवताओं को तर्पण देने से, शंकर के पूर्व कथन के अनुसार, वाजपेय यज्ञ के समान पुण्य मिलता है। यहाँ स्नान करने वाले यात्रियों को सर्प और बिच्छू आदि का भय नहीं रहता—ऐसा रक्षात्मक विधान भी कहा गया है। मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी को विशेष व्रत बताया गया है: उपवास, शुद्धि, तिल से लिंग को भरकर गंध-पुष्पों से पूजन, फिर प्रणाम और क्षमा-प्रायश्चित्त। फलश्रुति में तिल और अर्पण के अनुसार स्वर्ग-सुख, तथा आगे शुद्ध कुल में जन्म, रूप, सौभाग्य और महान् धन की प्राप्ति कही गई है।

12 verses

Adhyaya 162

Adhyaya 162

गोपेश्वरतीर्थमाहात्म्य (Gopeśvara Tīrtha-Māhātmya)

अध्याय 162 में अवन्तीखण्ड के गोपेश्वर तीर्थ का संक्षिप्त माहात्म्य आता है। मार्कण्डेय बताते हैं कि सर्पक्षेत्र के बाद अगला पुण्य-यात्रा-स्थल गोपेश्वर है, और यहाँ कर्म तथा उपासना के अनुसार क्रमशः फल की व्यवस्था कही गई है। कहा गया है कि तीर्थ में एक बार स्नान करने मात्र से मनुष्य पातकों से मुक्त हो जाता है। परन्तु स्नान के बाद स्वेच्छा से देहत्याग करना अनुचित बताया गया है—ऐसा व्यक्ति शिवालय पहुँच भी जाए तो ‘पाप से जुड़ा’ ही रहता है; यह तीर्थ-शक्ति के दुरुपयोग के विरुद्ध धर्म-सीमा है। जो स्नान के बाद ईश्वर की पूजा करता है, वह सब पापों से छूटकर रुद्रलोक को प्राप्त होता है। रुद्रलोक के भोग के पश्चात वह धर्मात्मा राजा के रूप में जन्म लेता है; और लौकिक फल में हाथी, घोड़े, रथ, सेवक, अन्य राजाओं से सम्मान तथा दीर्घ, सुखमय जीवन की प्राप्ति कही गई है।

6 verses

Adhyaya 163

Adhyaya 163

नागतीर्थमाहात्म्य (Nāgatīrtha-māhātmya) — Observances at Nāga Tīrtha

मार्कण्डेय राजश्रोता को उपदेश देते हैं कि रेवातट के परम पवित्र नागतीर्थ में जाकर आश्विन शुक्ल पक्ष की शुक्ल-पंचमी को निश्चित समय पर व्रत-पालन करे। शुद्धि और संयम रखते हुए रात्रि में जागरण करे तथा गंध, धूप आदि अर्पित करके विधिपूर्वक पूजन करे। प्रातः शुद्ध अवस्था में तीर्थ-स्नान करके यथाविधि श्राद्ध करने का विधान बताया गया है। फलश्रुति में कहा है कि इस अनुष्ठान से समस्त पाप नष्ट होते हैं; और जो उस तीर्थ में देह त्यागता है, वह शिव के वचनानुसार अनिवर्तनीय गति को प्राप्त होता है।

5 verses

Adhyaya 164

Adhyaya 164

सांवाौरतीर्थमाहात्म्य — The Māhātmya of the Sāṃvaura Tīrtha

श्री मार्कण्डेय एक ‘उत्तम’ तीर्थ सांवाौर का वर्णन करते हैं, जहाँ भानु (सूर्य) की विशेष उपस्थिति है और देव-दानव भी उनकी आराधना करते हैं। यह तीर्थ उन लोगों का आश्रय बताया गया है जो घोर दुःख में डूबे हैं—शारीरिक विकलता, रोग-सदृश पीड़ा, परित्याग और सामाजिक एकाकीपन से ग्रस्त। नर्मदा तट पर स्थित सांवाौरनाथ को उनका रक्षक, आर्तिहा और दुःख-विनाशक कहा गया है। विधान यह है कि एक मास तक निरंतर तीर्थ-स्नान करके भास्कर की पूजा की जाए। इसके फल की तुलना दिशाओं के समुद्रों में स्नान से की गई है, और कहा गया है कि युवावस्था, प्रौढ़ावस्था तथा वृद्धावस्था में संचित पाप केवल स्नान से ही नष्ट हो जाते हैं। इससे रोग, दरिद्रता और प्रिय-वियोग का नाश होता है तथा सात जन्मों तक कल्याण बना रहता है। सप्तमी तिथि का उपवास और रक्तचंदन सहित अर्घ्य-दान विशेष पुण्यदायक बताया गया है। नर्मदा जल को सर्वपापहर कहा गया है; जो भक्त स्नान कर सांवाौरेश्वर के दर्शन करते हैं वे धन्य हैं और प्रलय तक सूर्यलोक में वास का फल पाते हैं।

14 verses

Adhyaya 165

Adhyaya 165

सिद्धेश्वरतीर्थमाहात्म्य (Siddheśvara Tīrtha—Glory and Observances)

मार्कण्डेय नर्मदा के दक्षिण तट पर स्थित ‘सिद्धेश्वर’ नामक प्रसिद्ध तीर्थ का वर्णन करते हैं। इसे समस्त तीर्थों में अत्यन्त पावन बताया गया है। वहाँ स्नान करके पितरों और देवताओं को तर्पण देने तथा पितृ-उद्देश्य से श्राद्ध करने की विधि कही गई है; विशेष फल यह बताया गया है कि वहाँ किया गया श्राद्ध पितरों को बारह वर्षों तक तृप्ति देता है। इसके बाद शैव-भक्ति का क्रम बताया जाता है—भक्ति से स्नान, शिव-पूजन, रात्रि-जागरण, पुराण-कथा का पाठ/श्रवण, और फिर नियमपूर्वक प्रातःकाल शुद्ध जल में पुनः स्नान। इसका परम फल यह कहा गया है कि साधक गिरिजाकान्त शिव का दर्शन करता है और उच्च पद को प्राप्त होता है। अन्त में कपिल आदि प्राचीन सिद्धों और ऋषियों का उल्लेख कर तीर्थ की प्रामाणिकता स्थापित की जाती है; नर्मदा की महिमा से उन्होंने योगबल द्वारा परम सिद्धि प्राप्त की—ऐसा प्रतिपादन किया गया है।

8 verses

Adhyaya 166

Adhyaya 166

Siddheśvarī-Vaiṣṇavī Tīrtha Māhātmya (सिद्धेश्वरी-वैष्णवी तीर्थमाहात्म्य) — Ritual Merits of Seeing and Worship

मार्कण्डेय एक पवित्र तीर्थ का वर्णन करते हैं जहाँ देवी सिद्धेश्वरी तथा वैष्णवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं और पाप-नाशिनी कही गई हैं। इस तीर्थ का दर्शन अत्यन्त शुभ माना गया है। अध्याय में साधक के लिए व्यावहारिक क्रम बताया गया है—तीर्थ में स्नान, पितृदेवताओं के निमित्त विधिपूर्वक कर्म, और फिर श्रद्धा-भक्ति से देवी का पूजन। फलश्रुति में कहा गया है कि भक्तिपूर्वक दर्शन करने से पापों से मुक्ति मिलती है। जिन स्त्रियों को संतान-शोक है या जो वन्ध्या हैं, उन्हें संतान-प्राप्ति होती है; और संगम में स्नान करने वाले स्त्री-पुरुषों को पुत्र तथा धन की प्राप्ति होती है। देवी गोत्र की रक्षा करती हैं और विधिवत् पूजित होने पर संतान तथा समुदाय की निरन्तर रक्षा करती हैं। अष्टमी और चतुर्दशी को विशेष आचरण का निर्देश है, तथा नवमी को स्नान, उपवास/संयम और श्रद्धा से शुद्ध मन द्वारा पूजन का विधान बताया गया है। अंत में यह प्रतिज्ञा है कि यहाँ की उपासना से ऐसा परम लोक मिलता है जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।

9 verses

Adhyaya 167

Adhyaya 167

Mārkaṇḍeya Tīrtha on the Southern Bank of the Narmadā (Śaiva–Vaiṣṇava Installation and Vrata Protocols)

इस अध्याय में तीर्थ-प्रश्नोत्तर के रूप में युधिष्ठिर मुनि मārkaṇḍeya से नर्मदा के दक्षिण तट पर स्थित एक लक्षणयुक्त तीर्थ का परिचय और उसकी उत्पत्ति पूछते हैं। मārkaṇḍeya बताते हैं कि वे पहले विन्ध्य–दण्डकारण्य क्षेत्र में तपस्या करते रहे, फिर नर्मदा-तट पर लौटकर ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और यति—इन अनुशासित आश्रमवासियों से युक्त एक आश्रम स्थापित करते हैं। दीर्घ तप और वासुदेव-भक्ति से प्रसन्न होकर स्वयं कृष्ण और शंकर प्रकट होते हैं; मārkaṇḍeya उनसे प्रार्थना करते हैं कि वे अपने दिव्य परिवारों सहित वहीं सदा, युवा और निरोग रहें। देवगण अनुमति देकर अंतर्धान होते हैं, और मārkaṇḍeya शंकर तथा कृष्ण की प्रतिष्ठा कर वहाँ की पूजा-व्यवस्था स्थिर करते हैं। इसके बाद विधि-विधान का वर्णन आता है—तीर्थ-स्नान करके परमेेश्वर की ‘मārkaṇḍeśvara’ नाम से विशेष पूजा तथा विष्णु को त्रिलोकेश्वर मानकर आराधना। घी, दूध, दही, मधु, नर्मदा-जल, गंध, धूप, पुष्प, नैवेद्य आदि अर्पण, रात्रि-जागरण, ज्येष्ठ शुक्लपक्ष में उपवास सहित व्रत और देवपूजा बताई गई है। श्राद्ध-तर्पण, संध्या-उपासना, ऋग्/यजुः/साम मंत्र-जप, तथा लिंग के दक्षिण भाग में कलश रखकर ‘रुद्र-एकादश’ मंत्रों से स्नान-विधि का विधान है, जिससे संतान और दीर्घायु का फल कहा गया है। फलश्रुति में श्रवण-पाठ से पापशुद्धि और शैव–वैष्णव दोनों भावों में मोक्षाभिमुख फल प्रतिपादित है।

32 verses

Adhyaya 168

Adhyaya 168

अङ्कूरेश्वरतीर्थमाहात्म्य — The Glory and Origin of Aṅkūreśvara Tīrtha

इस अध्याय में मार्कण्डेय नर्मदा के दक्षिण तट पर स्थित त्रिलोकरूप से प्रसिद्ध अङ्कूरेश्वर तीर्थ का माहात्म्य बताते हैं। युधिष्ठिर के पूछने पर वहाँ से जुड़े राक्षस का वंशवर्णन होता है—पुलस्त्य से विश्रवा, फिर वैश्रवण (कुबेर), कैकसी के पुत्र रावण, कुम्भकर्ण, विभीषण; आगे कुम्भकर्ण के वंश में कुम्भ और विकुम्भ, तथा कुम्भ का पुत्र अङ्कूर। अङ्कूर अपने कुल को जानकर और विभीषण की धर्मनिष्ठा देखकर दिशाओं में तथा अंततः नर्मदा तट पर कठोर तप करता है। शिव प्रकट होकर वर देते हैं। अङ्कूर पहले कठिन वर—अमरत्व—माँगता है और फिर यह कि इस तीर्थ में उसके नाम से शिव सदा निवास करें। शिव यह शर्त रखते हैं कि जब तक अङ्कूर का आचरण विभीषण के धर्म के अनुरूप रहेगा, तब तक उनकी निकट उपस्थिति बनी रहेगी। इसके बाद अङ्कूर विधिपूर्वक अङ्कूरेश्वर लिङ्ग की स्थापना कर ध्वज, छत्र, मङ्गलघोष और विविध उपहारों से भव्य पूजा करता है। अध्याय में तीर्थ-सेवन की विधि भी निश्चित की गई है—स्नान, संध्या, जप, पितृ-देव-मनुष्य तर्पण, अष्टमी या चतुर्दशी का उपवास और संयमित मौन। यहाँ की पूजा को अश्वमेध-सम फलदायी, यथाविधि दान को अक्षय पुण्यदायक तथा होम, जप, उपवास और स्नान के फलों को अनेकगुणित कहा गया है। यहाँ मरने वाले पशु-पक्षी आदि को भी उद्धार मिलता है। अंत में फलश्रुति है कि श्रद्धा से सुनने वाले शिवलोक को प्राप्त होते हैं।

44 verses

Adhyaya 169

Adhyaya 169

माण्डव्यतीर्थमाहात्म्य-प्रस्तावः (Mandavya Tīrtha: Prologue to the Sacred Narrative)

अध्याय का आरम्भ मार्कण्डेय द्वारा एक परम पुण्यदायक, पाप-प्रणाशक तीर्थ के संकेत से होता है, जो माण्डव्य ऋषि और नारायण से सम्बद्ध है। वे यह भी स्मरण कराते हैं कि शूल पर स्थित रहते हुए भी माण्डव्य ने नारायण की भक्तिपूर्वक शुश्रूषा की थी; यह सुनकर युधिष्ठिर आश्चर्य में पड़कर पूरा वृत्तान्त पूछते हैं। तब मार्कण्डेय त्रेता-युग की कथा कहते हैं—देवपन्न नामक धर्मशील, दानी और प्रजापालक राजा समृद्ध होते हुए भी संतान-हीनता से दुःखी था। वह पत्नी दात्यायनी के साथ बारह वर्षों तक स्नान, होम, उपवास और व्रत आदि तप करता हुआ स्तुतियों से देवी चामुण्डा को प्रसन्न करता है। देवी दर्शन देकर कहती हैं कि यज्ञपुरुष की आराधना के बिना संतान नहीं होगी; राजा विधिपूर्वक यज्ञ करता है और तेजस्विनी कन्या उत्पन्न होती है, जिसका नाम कामप्रमोदिनी रखा जाता है। कन्या के बढ़ने पर उसके रूप-लावण्य का विस्तार से वर्णन होता है। देवी-पूजन हेतु गई वह सखियों सहित सरोवर में क्रीड़ा कर रही थी कि शम्बर नामक राक्षस पक्षी-रूप धारण कर उसका अपहरण कर लेता है और आभूषण भी छीन लेता है। जाते समय कुछ आभूषण नर्मदा-तट के निकट जल में गिरते हैं, जहाँ माण्डव्य ऋषि नारायण के परम स्थान से संयुक्त माहेश्वर-स्थल में गहन समाधि में स्थित हैं; अध्याय का अंत उनके भ्राता/सेवक के जनार्दन-ध्यान और शुश्रूषा में रत होने के उल्लेख से होता है, जिससे तीर्थ-महिमा की आगे की कथा का आधार बनता है।

38 verses

Adhyaya 170

Adhyaya 170

कामप्रमोदिनी-हरणं तथा तपस्वि-दण्डविधान-विपर्यासः (Abduction of Kāmapramodinī and the Misapplied Punishment of an Ascetic)

मार्कण्डेय एक पवित्र तीर्थ-सर में उत्पन्न संकट का वर्णन करते हैं। देव-सन्निधि के पास सरोवर में क्रीड़ा करती कामप्रमोदिनी को एक श्येन (पक्षी) अचानक उठा ले जाता है। उसकी सखियाँ राजा को समाचार देकर खोज का आग्रह करती हैं; तब राजा विशाल चतुरंगिणी सेना जुटाता है और नगर में युद्ध-तैयारी से हलचल मच जाती है। नगर-रक्षक अपहृता के आभूषण लाकर बताता है कि वे तपस्वी माण्डव्य के आश्रम के निकट, अनेक तपस्वियों के बीच, देखे गए। क्रोध और भ्रम से ग्रस्त राजा प्रमाण-विचार किए बिना माण्डव्य को छिपा हुआ चोर मान लेता है—मानो वही पक्षी-रूप धारण कर भागा हो—और कार्य-अकार्य का विवेक छोड़े हुए ब्राह्मण-तपस्वी को शूल पर चढ़ाने की आज्ञा दे देता है। नगरवासी और ग्रामवासी विलाप कर विरोध करते हैं कि तपोनिष्ठ ब्राह्मण का वध अनुचित है; आरोप हो तो भी अधिकतम निर्वासन ही दण्ड होना चाहिए। अध्याय राजधर्म की परीक्षा दिखाता है—अधीर दण्ड, अनिश्चित प्रमाण, और तीर्थ-भूमि में तपस्वियों की पवित्रता की रक्षा का विशेष कर्तव्य।

27 verses

Adhyaya 171

Adhyaya 171

माण्डव्य-शूलावस्था, कर्मविपाकोपदेशः, शाण्डिली-सत्यव्रत-प्रसङ्गश्च (Māṇḍavya on the Stake: Karmic Consequence Teaching and the Śāṇḍilī Episode)

इस अध्याय में मार्कण्डेय के कथन के भीतर अनेक ऋषि—नारद, वसिष्ठ, जमदग्नि, याज्ञवल्क्य, बृहस्पति, कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र आदि—शूल पर चढ़े तपस्वी माण्डव्य को देखकर नारायण के पास जाते हैं। नारायण राजा को दण्ड देने को उद्यत होते हैं, पर माण्डव्य उन्हें रोककर कर्म-विपाक का सिद्धान्त बताते हैं—प्राणी अपने ही कर्म का फल भोगता है, जैसे बछड़ा अनेक गायों में अपनी माता को पहचान लेता है। वे अपने बाल्यकाल के एक सूक्ष्म अपराध—जूँ को काँटे/सूई की नोक पर रखने—को वर्तमान पीड़ा का बीज बताकर कठोर आत्म-जवाबदेही का उपदेश देते हैं। आगे दान, स्नान, जप, होम, अतिथि-सत्कार, देव-पूजन और पितृ-श्राद्ध की उपेक्षा से अधोगति तथा संयम, दया और शुद्ध आचरण से उत्तम गति का वर्णन होता है। उत्तर भाग में पतिव्रता शाण्डिली अपने पति को उठाए हुए अनजाने में शूलस्थ मुनि से टकराती है; निन्दित होने पर वह अपने पतिव्रत और आतिथ्य-धर्म की महिमा प्रकट करती है और संकल्प करती है कि यदि पति की मृत्यु हो तो सूर्य उदय न हो। इस प्रतिज्ञा से जगत में ठहराव आ जाता है—स्वाहा-स्वधा, पञ्चयज्ञ, स्नान-दान-जप और श्राद्धादि कर्म बाधित बताए जाते हैं; इस प्रकार कर्म-नियम और व्रत-शक्ति दोनों का पौराणिक समन्वय दिखाया गया है।

61 verses

Adhyaya 172

Adhyaya 172

माण्डव्यतीर्थमाहात्म्यं — Māṇḍavya Tīrtha Māhātmya (Glory of the Māṇḍavya Sacred Ford)

इस अध्याय में दो भाग हैं। पहले भाग में नर्मदा-तट पर माण्डव्य के पुण्य आश्रम में देवता और ऋषि एकत्र होकर उनके तप से प्राप्त सिद्धि की प्रशंसा करते हैं और वरदान देते हैं। आगे शाप और राक्षस से जुड़ा प्रसंग आता है; माण्डव्य को कन्या प्रदान की जाती है, विवाह होता है, और राजाश्रय के साथ सत्कार, दान तथा उपहारों का आदान-प्रदान होता है। दूसरे भाग में माण्डव्येश्वर/माण्डव्य-नारायण तथा देवखाता आदि तीर्थों का माहात्म्य और विधि-फलश्रुति बताई गई है। स्नान, अभ्यंग, पूजन, दीप-दान, प्रदक्षिणा, ब्राह्मण-भोजन, श्राद्ध के समय, तथा व्रत-नियम—विशेषकर चतुर्दशी-रात्रि जागरण—का वर्णन है। बड़े यज्ञों और प्रसिद्ध तीर्थों के तुल्य पुण्य का प्रतिपादन कर, पाप-नाश और परलोक में शुभ गति का आश्वासन दिया गया है।

91 verses

Adhyaya 173

Adhyaya 173

शुद्धरुद्रतीर्थ-माहात्म्य (Māhātmya of Śuddharudra Tīrtha / Siddheśvara on the Southern Bank of the Narmadā)

मार्कण्डेय राजा को नर्मदा के दक्षिण तट पर स्थित एक अत्यन्त पुण्यकारी तीर्थ का उपदेश देते हैं, जो समस्त पापों तथा महापातकों का भी नाश करने वाला कहा गया है। इसकी कारण-कथा में बताया है कि ब्रह्मा के असत्य वचन के प्रसंग में शिव (त्रिशूलधारी) ने ब्रह्मा का एक शिर काट दिया, जिससे उन्हें ब्रह्महत्या का भार लगा; वह कपाल उनके हाथ से चिपक गया और गिरा नहीं। शिव ने वाराणसी, चारों दिशाओं के समुद्र तथा अनेक तीर्थों की यात्रा की, पर दोष न छूटा; अंततः कुलकोटि के निकट नर्मदा-तट के इसी तीर्थ में प्रायश्चित्त करने पर वे मल से मुक्त हुए। तभी से यह स्थान ‘शुद्धरुद्र’ नाम से त्रिलोकी में ब्रह्महत्या-नाशक परम तीर्थ के रूप में प्रसिद्ध हुआ। अध्याय में नित्य-नियम भी कहा गया है—शुक्ल पक्ष की अमावस्या को विधिपूर्वक स्नान करके पितरों और देवताओं को तर्पण दें तथा अंतःशुद्ध भाव से पिण्ड अर्पित करें। परमेेश्वर का गन्ध, धूप और दीप से पूजन करें; यहाँ के देव ‘शुद्धेश्वर’ कहलाते हैं और शिवलोक में भी पूजित बताए गए हैं। इस तीर्थ का स्मरण और अनुशासन करने से सब पापों से मुक्ति तथा रुद्रलोक की प्राप्ति फलरूप कही गई है।

16 verses

Adhyaya 174

Adhyaya 174

गोपेश्वरतीर्थमाहात्म्य (Gopeśvara Tīrtha Māhātmya) — Lamp-offering and Śaiva Merit on the Northern Narmadā Bank

इस अध्याय में मार्कण्डेय ऋषि राजा को उपदेश देते हैं कि अवन्तीखण्ड में नर्मदा के उत्तरी तट पर स्थित गोपेश्वर तीर्थ का सेवन करना चाहिए। कहा गया है कि वहाँ एक बार स्नान करने मात्र से भी पाप-दोष कटते हैं और मुक्ति का मार्ग खुलता है। फिर पुण्य का क्रम बताया गया है—पहले तीर्थ-स्नान; फिर इच्छानुसार प्राणसंक्षय (स्वेच्छा-मरण) करने पर दिव्य विमान द्वारा शिवधाम की प्राप्ति; शिवलोक में भोग के बाद शुभ पुनर्जन्म, दीर्घायु, ऐश्वर्य और पराक्रम से युक्त राजा-भाव। कार्त्तिक मास की शुक्ल नवमी को व्रत-विधान है—उपवास, शुद्धाचार, दीपदान, गन्ध-पुष्प से पूजन और रात्रि-जागरण। दीपों की संख्या के अनुसार शिवलोक में हजारों युगों तक सम्मान का फल बताया गया है। लिङ्ग-पूरण विधि, कमल-समर्पण, दध्यन्न (दही-चावल) का दान आदि का भी वर्णन है, जहाँ तिल और कमलों की गिनती के अनुसार पुण्य बढ़ता है। अंत में कहा गया है कि इस तीर्थ में किया गया कोई भी दान ‘कोटि-गुणित’ होकर अकल्पनीय फल देता है और यह तीर्थों में अनुपम है।

12 verses

Adhyaya 175

Adhyaya 175

कपिलेश्वरतीर्थमाहात्म्य (Kapileśvara Tīrtha Māhātmya)

मार्कण्डेय ऋषि भृगु-क्षेत्र के मध्य, नर्मदा के उत्तरी तट पर स्थित कपिलेश्वर को पाप-नाशक श्रेष्ठ तीर्थ बताते हैं। यहाँ कपिल को वासुदेव/जगन्नाथ का ही प्राकट्य कहा गया है, और देवता की स्थिति का वर्णन अधोलोकों के क्रम से होते हुए महान सातवें पाताल तक किया गया है, जहाँ प्राचीन परमेश्वर विराजते हैं। कथा में सागर-पुत्रों का कपिल के सान्निध्य में सहसा विनाश स्मरण होता है। वैराग्य-युक्त मन से कपिल उस व्यापक संहार को ‘अनुचित’ मानकर शोक करते हैं और प्रायश्चित्त हेतु कपिल-तीर्थ की शरण लेते हैं। फिर वे नर्मदा-तट पर घोर तप कर अक्षय रुद्र की आराधना करते हैं और परम निर्वाण-सदृश अवस्था प्राप्त करते हैं। अध्याय में विधि-फल भी बताए गए हैं—स्नान-पूजन से सहस्र-गोदान का पुण्य; ज्येष्ठ शुक्ल चतुर्दशी को योग्य ब्राह्मण को दिया दान अक्षय; निर्दिष्ट तिथियों (अंगारक-संबद्ध व्रत सहित) में उपवास-स्नान से सौंदर्य, समृद्धि और कुल-लाभ अनेक जन्मों तक। पूर्णिमा-अमावस्या पर पितृतर्पण से पितर बारह वर्ष तृप्त होकर स्वर्गगामी होते हैं; दीपदान से देह-कांति बढ़ती है; और जो इस तीर्थ में देह त्यागते हैं, वे शिवधाम की ओर पुनरावृत्ति-रहित मार्ग पाते हैं।

20 verses

Adhyaya 176

Adhyaya 176

देवखात-उत्पत्ति एवं पिङ्गलेश्वर-माहात्म्य (Origin of Devakhāta and the Māhātmya of Piṅgaleśvara)

मार्कण्डेय राजा को उपदेश देते हैं कि पृथ्वी पर दुर्लभ और परम पुण्यदायक तीर्थ पिङ्गलावर्त में जाकर पिङ्गलेश्वर के दर्शन-स्पर्श से वाणी, मन और कर्म से उत्पन्न पाप नष्ट हो जाते हैं। वे कहते हैं कि देवखात में स्नान और दान करने से अक्षय फल मिलता है, और युधिष्ठिर के प्रश्न पर उस पवित्र कुण्ड की उत्पत्ति का वर्णन करते हैं। कथा में रुद्र (शिव) कमण्डलु धारण कर देवताओं के साथ त्रिशूल की शुद्धि हेतु विचरते हैं। देवता अनेक तीर्थों में स्नान कर जल एक पात्र में एकत्र करते हैं; त्रिशूल शुद्ध होने पर वे भृगुकच्छ पहुँचते हैं, जहाँ अग्नि के साथ रोगग्रस्त, पिङ्गल नेत्रों वाला पिङ्गल महेश्वर का ध्यान करते हुए कठोर तप में लगा मिलता है। देवता शिव से प्रार्थना करते हैं कि पिङ्गल निरोग हो, ताकि वह हवि-आहुति ग्रहण कर सके; शिव आदित्य-सदृश रूप धारण कर उसकी व्याधि हर लेते हैं और शरीर को नव कर देते हैं। पिङ्गल प्राणियों के कल्याण हेतु शिव के स्थायी निवास की याचना करता है—रोग-शमन, पाप-नाश और मंगल-वृद्धि के लिए। तब शिव देवताओं को आदेश देते हैं कि उनके उत्तर में दिव्य देवखात खोदकर उसमें संचित तीर्थ-जल डालें; वह जल सर्वपावन और रोगनाशक बन जाता है। अध्याय में रविवार-स्नान, नर्मदा-जल से स्नान, श्राद्ध-दान और पिङ्गेश की पूजा की विधियाँ तथा ज्वर, त्वचा-विकार, कुष्ठ-सदृश रोगों के शमन और प्रायश्चित्त के फल बताए गए हैं; विशेषतः बार-बार रविवार को स्नान कर द्विज को तिल-पात्र दान का विधान भी है। अंत में देवखात-स्नान की श्रेष्ठता और पितृकर्म के बाद पिङ्गलेश्वर-पूजन का फल अश्वमेध-वाजपेय जैसे महायागों के तुल्य कहा गया है।

34 verses

Adhyaya 177

Adhyaya 177

Bhūtīśvara-tīrtha Māhātmya and the Taxonomy of Purificatory Snānas (भूतीश्वरतीर्थमाहात्म्यं स्नानविधिवर्गीकरणं च)

इस अध्याय में मार्कण्डेय युधिष्ठिर को भूतीश्वर तीर्थ का माहात्म्य बताते हैं। कहा गया है कि इसके केवल दर्शन से भी पाप क्षीण होते हैं, और इसका नाम इस कारण पड़ा कि शूलधारी शिव ने यहाँ उद्धूलन (भस्म-लेपन) किया था। पुष्य-सम्बन्धी जन्म-नक्षत्र के अवसर पर तथा अमावस्या को यहाँ स्नान करने से पितरों का महान उद्धार होता है। इसके बाद अंग-गुण्ठन/भस्म-लेपन का फलक्रम आता है—शरीर पर जितने भस्मकण टिकते हैं, उतने ही दीर्घकाल तक शिवलोक में मान-सत्कार प्राप्त होता है। भस्म-स्नान को श्रेष्ठ शुद्धिकर्म बताकर स्नानों का क्रमबद्ध वर्गीकरण किया जाता है—आग्नेय, वारुण, ब्राह्म्य, वायव्य और दिव्य। आग्नेय भस्म-स्नान, वारुण जल में अवगाहन, ब्राह्म्य ‘आपो हि ष्ठा’ मंत्र से, वायव्य गो-धूलि से, और दिव्य सूर्य-दर्शन के समय स्नान है, जो गंगाजल-स्नान के समान पुण्य देता है। अंत में स्नान और ईशान-पूजा से बाह्य-आंतरिक शुद्धि, जप से पाप-शोधन और ध्यान से अनन्त की ओर गमन बताया गया है। शिव-स्तोत्र में निराकार परमेश्वर का वर्णन है, और निष्कर्षतः भूतीश्वर में स्नान का फल अश्वमेध यज्ञ के पुण्य के तुल्य कहा गया है।

19 verses

Adhyaya 178

Adhyaya 178

Gaṅgāvāhaka-tīrtha Māhātmya (The Glory of the Gaṅgāvāhaka Ford)

मार्कण्डेय नर्मदा/रेवा में भृगुतीर्थ के निकट स्थित ‘गङ्गावाहक’ नामक श्रेष्ठ तीर्थ का माहात्म्य बताते हैं। यहाँ गङ्गा दीर्घ तप करके जनार्दन-नारायण विष्णु से संवाद करती हैं। वे अपने अवतरण का वृत्तान्त कहती हैं और बताती हैं कि भारी पाप-भार से दबे अनेक लोग उनके जल से शुद्धि चाहते हैं; उन पापों के संचय से वे स्वयं को प्रतीक रूप से ‘तप्त’ अनुभव करती हैं। विष्णु गङ्गा की पीड़ा हरकर वहाँ अपनी विशेष उपस्थिति घोषित करते हैं और गङ्गाधर को सहायक बताते हैं। वे गङ्गा को देहधारी रूप से रेवा में प्रवेश करने की आज्ञा देते हैं, जिससे गङ्गा-रेवा के मिश्रित जल का अद्भुत पावनत्व स्थापित हो। वर्षाकाल में जल-वृद्धि तथा शङ्ख-चिह्न से सम्बद्ध एक विशेष पर्व निर्धारित किया जाता है, जिसे सामान्य काल-सन्धियों से भी श्रेष्ठ कहा गया है। इस तीर्थ में मिश्रित जल में स्नान, तर्पण-श्राद्ध, बाल-केशव की पूजा और रात्रि-जागरण का विधान है। फलस्वरूप पाप-समूह का नाश, पितरों की दीर्घ तृप्ति, और वहाँ देह त्यागने वाले भक्तों के लिए अपरिवर्तनीय शुभ परलोक-गति का प्रतिपादन किया गया है।

35 verses

Adhyaya 179

Adhyaya 179

Gautameśvara-tīrtha Māhātmya (गौतमेश्वरतीर्थमाहात्म्य) — Rituals, Offerings, and Phala

मार्कण्डेय युधिष्ठिर को प्रसिद्ध गौतमेश्वर तीर्थ जाने की विधि बताते हैं। यह तीर्थ पापों का नाश करने वाला माना गया है। गौतम ऋषि के दीर्घ तप से प्रसन्न होकर महेश्वर वहाँ प्रतिष्ठित हुए, इसलिए वे गौतमेश्वर कहलाए। देव, गन्धर्व, ऋषि तथा पितृ-सम्बद्ध देवताओं ने इसी स्थान पर परमेश्वर की आराधना करके उत्तम सिद्धि पाई—ऐसा वर्णन है। इसके बाद साधना-प्रक्रिया बताई जाती है—तीर्थ-स्नान, पितृदेवताओं का पूजन और शिव-पूजा पापमुक्ति के साधन हैं। अनेक लोग विष्णु-माया से मोहित होकर इस महिमा को नहीं जानते, पर शिव वहाँ साक्षात् उपस्थित हैं। ब्रह्मचर्य के साथ स्नान और अर्चना करने से अश्वमेध-सम पुण्य मिलता है; द्विजाति को दिया गया दान अक्षय फल देने वाला कहा गया है। विशेष व्रत-दान भी बताए गए हैं—आश्वयुज कृष्ण चतुर्दशी को सौ दीपों का दान; कार्तिक अष्टमी और चतुर्दशी को उपवास तथा घी, पंचगव्य, मधु, दही या शीतल जल से अभिषेक। पुष्प-पत्र अर्पण में अखण्ड बिल्वपत्र विशेष प्रिय हैं। छह मास तक निरन्तर पूजा करने से इच्छाएँ पूर्ण होती हैं और अंत में शिवलोक की प्राप्ति होती है।

17 verses

Adhyaya 180

Adhyaya 180

Daśāśvamedhika Tīrtha Māhātmya (दशाश्वमेधिकतीर्थमाहात्म्यम्) — Merit of Ten Aśvamedhas through Narmadā Worship

इस अध्याय में राजर्षि-संवाद के रूप में धर्म-तत्त्व का विचार है। मार्कण्डेय नर्मदा-तट पर स्थित ‘दशाश्वमेधिक’ तीर्थ का वर्णन करते हैं, जहाँ नियमपूर्वक उपासना करने से दस अश्वमेध यज्ञों के समान पुण्य प्राप्त होता है। युधिष्ठिर प्रश्न करते हैं कि अश्वमेध तो अत्यन्त खर्चीला और सामान्य जन के लिए दुर्लभ है, फिर उसका फल साधारण साधक कैसे पाए? उत्तर में मार्कण्डेय एक दृष्टान्त-कथा कहते हैं। शिव पार्वती सहित उस तीर्थ पर आते हैं और भूखे तपस्वी-ब्राह्मण का वेश धारण कर लोगों की श्रद्धा और आचार की परीक्षा लेते हैं। बहुत-से लोग उपेक्षा करते हैं, पर एक विद्वान ब्राह्मण वेद–स्मृति–पुराण पर विश्वास रखकर स्नान, जप, श्राद्ध, दान तथा कपिला-दान करता है और अतिथि-धर्म से छिपे हुए शिव का सत्कार करता है। प्रसन्न होकर शिव वर देते हैं; ब्राह्मण तीर्थ में शिव की नित्य उपस्थिति माँगता है, जिससे तीर्थ की पवित्र प्रतिष्ठा स्थिर होती है। फिर आश्विन शुक्ल दशमी का विधान बताया गया है—उपवास, त्रिपुरान्तक शिव-पूजन, तीर्थ में सरस्वती की उपस्थिति का सम्मान, प्रदक्षिणा, गौ-दान, दीपों सहित रात्रि-जागरण, पाठ-कीर्तन-संगीत, तथा ब्राह्मणों और शिव-भक्तों को भोजन। फलश्रुति में पाप-शुद्धि, रुद्रलोक-प्राप्ति, शुभ जन्म, और वहाँ विभिन्न स्थितियों में देहान्त होने पर आस्तिक्य व विधिपूर्वक आचरण के अनुसार भिन्न-भिन्न परलोक-गतियाँ कही गई हैं।

81 verses

Adhyaya 181

Adhyaya 181

Bhṛgutīrtha–Vṛṣakhāta Māhātmya (भृगुतीर्थ–वृषखात माहात्म्य)

यह अध्याय संवाद-रूप में है, जहाँ युधिष्ठिर के प्रश्न पर मārkaṇḍeya नर्मदा-तट के प्रसिद्ध तीर्थ, उसके ‘वृषखात’ नाम और भृगुकच्छ में महर्षि भृगु की उपस्थिति का वर्णन करते हैं। वे भृगु के कठोर तप का प्रसंग कहते हैं और शिव-उमा द्वारा उस तपस्वी को देखने की दिव्य घटना प्रस्तुत करते हैं। उमा पूछती हैं कि वरदान क्यों नहीं दिया जा रहा; शिव समझाते हैं कि क्रोध तप को क्षीण कर देता है और साधना की सिद्धि में बाधक बनता है। इस शिक्षा को प्रत्यक्ष करने हेतु शिव वृष-रूप एक दूत को प्रकट/प्रेषित करते हैं, जो भृगु को उकसाता है। वृष भृगु को नर्मदा में पटक देता है; भृगु तीव्र क्रोध में उसका पीछा करते हैं। भागता हुआ वृष द्वीपों, पातालों और ऊर्ध्व लोकों से होकर जाता है, जिससे अनियंत्रित रोष के व्यापक परिणाम दिखाए जाते हैं। अंततः वृष शिव की शरण लेता है; उमा निवेदन करती हैं कि ऋषि का क्रोध शांत होने से पहले वरदान दिया जाए। शिव उस स्थान को ‘क्रोध-स्थान’ घोषित करते हैं। तब भृगु विस्तृत स्तोत्र (जिसमें ‘करुणाभ्युदय’ नामक स्तुति भी है) से शिव की आराधना करते हैं और शिव वर प्रदान करते हैं। भृगु प्रार्थना करते हैं कि यह क्षेत्र उनके नाम से सिद्धि-क्षेत्र बने और वहाँ देव-सन्निधि स्थिर रहे; अंत में वे श्री (लक्ष्मी) से शुभ स्थान-प्रतिष्ठा के विषय में परामर्श करते हैं, जिससे तीर्थ की पहचान भक्ति और स्थान-निर्माण की धर्म-परंपरा में दृढ़ होती है।

65 verses

Adhyaya 182

Adhyaya 182

Bhṛgukaccha-utpattiḥ and Koṭitīrtha Māhātmya (भृगुकच्छोत्पत्तिः / कोटितीर्थमाहात्म्यम्)

अध्याय 182 में मārkaṇḍेय के कथन के माध्यम से रेवā के उत्तर तट पर भृगुकच्छ की उत्पत्ति बताई गई है। भृगु ऋषि श्री (लक्ष्मी/रमा) के साथ कूर्मावतार कच्छप के पास जाकर चातुर्विद्या-आधारित बस्ती बसाने की अनुमति माँगते हैं; कूर्म अनुमति देते हैं और अपने नाम से दीर्घकाल तक टिकने वाली नगरी होने की भविष्यवाणी करते हैं। फिर माघ मास, शुभ तिथि-नक्षत्र, उत्तर तट के गहरे जल और कोटितीर्थ के संकेतों सहित क्षेत्र का वर्णन तथा नई बस्ती में वर्णों के कर्तव्यों की व्यवस्था कही गई है। लक्ष्मी देवलोक जाकर भृगु को कुंजी-ताला सौंपती हैं; लौटने पर स्वामित्व का विवाद उठता है। निर्णय हेतु बुलाए गए ब्राह्मण भृगु के क्रोध से डरकर मौन रहते हैं और नियम बना देते हैं कि जिसके पास कुंजी है वही अधिकारी है। इससे लक्ष्मी लोभ और सत्य-त्याग को कारण बताकर द्विजों की विद्या, स्थिरता और धर्म-विवेक के क्षय का शाप देती हैं। दुःखी भृगु शंकर की आराधना करते हैं; शिव इस स्थान को ‘क्रोध-स्थान’ कहकर भी भविष्य के ब्राह्मणों की विद्या को अपने अनुग्रह से सुरक्षित बताते हैं और इसे कोटितीर्थ के रूप में पाप-नाशक घोषित करते हैं। शिव स्नान-पूजा को महायज्ञ तुल्य फलदायी, तर्पण को पितरों के हितकारी, तथा दूध-दही-घी-शहद से अभिषेक को स्वर्ग-प्राप्ति देने वाला बताते हैं। ग्रहण आदि अवसरों पर दान-व्रत की प्रशंसा, व्रत-त्याग-संन्यास और इस क्षेत्र में मृत्यु तक को शुभगति का कारण कहा गया है। शिव अम्बिका (सौभाग्यसुन्दरी) सहित वहाँ नित्य निवास की घोषणा करते हैं; भृगु अंत में ब्रह्मलोक चले जाते हैं। अध्याय का उपसंहार श्रवण से पवित्रता और फलश्रुति के साथ होता है।

66 verses

Adhyaya 183

Adhyaya 183

Kedāra-tīrtha Māhātmya on the Northern Bank of the Narmadā (केदारतीर्थमाहात्म्य)

अध्याय १८३ संवाद रूप में है, जहाँ मार्कण्डेय युधिष्ठिर को केदार-संज्ञक तीर्थ का विधान बताते हैं। वे कहते हैं—केदार जाकर श्राद्ध करें, तीर्थ-जल पिएँ और देवदेवेश का पूजन करें; इससे केदार-जन्य पुण्य प्राप्त होता है। तब युधिष्ठिर नर्मदा के उत्तरी तट पर केदार की स्थापना का कारण विस्तार से पूछते हैं। मार्कण्डेय बताते हैं कि कृतयुग के आरम्भ में पद्मा/श्री से सम्बद्ध शाप के कारण भृगु का क्षेत्र अपवित्र और “वेद-विहीन” हो गया। भृगु ने सहस्र वर्षों तक कठोर तप किया, तब शिव पाताल-स्तरों को भेदते हुए लिङ्ग रूप में प्रकट हुए। भृगु ने स्थाणु और त्र्यम्बक की स्तुति कर क्षेत्र की शुद्धि की प्रार्थना की। शिव ने ‘आदि-लिङ्ग’ के रूप में केदार नामक प्रतिष्ठा की और उसके बाद दस अन्य लिङ्ग स्थापित किए; बीच में एक ग्यारहवाँ अदृश्य सान्निध्य बताया जो क्षेत्र को पवित्र करता है। वहाँ बारह आदित्य, अठारह दुर्गाएँ, सोलह क्षेत्रपाल तथा वीरभद्र-सम्बद्ध मातृगण रक्षक-धर्म के साथ निवास करते हैं। फलश्रुति में कहा गया है कि नाघ मास में नियमपूर्वक प्रातः स्नान, केदार-पूजन और तीर्थ में विधिवत श्राद्ध करने से पितर तृप्त होते हैं; पाप नष्ट होते हैं और शोक का विनाश होकर कल्याण प्राप्त होता है।

18 verses

Adhyaya 184

Adhyaya 184

धौतपापतीर्थमाहात्म्यम् (Māhātmya of the Dhoutapāpa Tīrtha)

इस अध्याय में नर्मदा के उत्तर तट पर भृगु-तीर्थ के निकट स्थित धौतपाप (विधौतपाप) तीर्थ का माहात्म्य कहा गया है। मार्कण्डेय बताते हैं कि यह स्थान पाप-प्रक्षालन के लिए प्रसिद्ध है और भृगु मुनि के सम्मान हेतु भगवान शिव यहाँ सदा विराजमान रहते हैं। यहाँ स्नान करने से, संकल्प में दोष होने पर भी, पापों से मुक्ति मिलती है; और विधिपूर्वक स्नान, शिव-पूजन तथा देवों और पितरों के लिए तर्पण-दान करने से सर्वांगीण शुद्धि प्राप्त होती है। युधिष्ठिर पूछते हैं कि ब्रह्महत्या जैसा महादोष यहाँ कैसे प्रवेश नहीं करता या कैसे नष्ट हो जाता है। मार्कण्डेय एक पुराकथा सुनाते हैं—ब्रह्मा के एक शिर का छेदन करने पर शिव पर ब्रह्महत्या का दोष लगा, वह पीछे-पीछे चला; तब धर्म वृषभ-रूप में उसे झटककर दूर कर देता है और धौतेश्वरी देवी ब्रह्महत्या-विनाशिनी शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित होती हैं। ब्रह्महत्या को भयावह रूप में व्यक्त किया गया है जो इस तीर्थ से दूर रहती है। अध्याय में व्रत-काल भी बताया गया है—आश्वयुज शुक्ल नवमी, तथा शुक्ल सप्तमी से तीन दिनों का अवसर; उपवास, ऋग्/यजुः/साम का पाठ और गायत्री-जप प्रायश्चित्त के साधन हैं। फलश्रुति में घोर अपराधों से छुटकारा, संतान-सम्बन्धी वरदान और मृत्यु के बाद उत्तम गति का वर्णन है; साथ ही तीर्थ-तत्त्व के अनुसार यहाँ स्वेच्छा-मरण से भी दिव्य लोक-प्राप्ति का कथन मिलता है।

32 verses

Adhyaya 185

Adhyaya 185

Ēraṇḍī-tīrtha Māhātmya (एरण्डीतीर्थमाहात्म्य) — Ritual Bathing, Upavāsa, and Tarpaṇa on Āśvayuja Śukla Caturdaśī

इस अध्याय में श्री मार्कण्डेय संक्षेप में धर्म-रितु का उपदेश देते हैं। वे महिपाल से कहते हैं कि पूज्य एरण्डी-तीर्थ में जाकर स्नान करे; वहाँ केवल स्नान मात्र से भी महान पापों का क्षय होता है और भारी दोष दूर हो जाते हैं। फिर वे व्रत-काल बताते हैं—आश्वयुज मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को उपवास करके, संयमपूर्वक स्नान कर, पितरों और देवताओं का तर्पण करना चाहिए। फलश्रुति में समृद्धि और सौन्दर्य से युक्त पुत्र, दीर्घायु तथा देहान्त के बाद शिवलोक की प्राप्ति कही गई है; इन फलों में कोई संशय न रखने का दृढ़ वचन दिया गया है।

4 verses

Adhyaya 186

Adhyaya 186

Garuḍa-tapas, Mahādeva-varadāna, and Cāmuṇḍā–Kanakeśvarī-stuti at a Tīrtha

मार्कण्डेय एक तीर्थ-केन्द्रित प्रसंग सुनाते हैं। गरुड़ एक परम पवित्र स्थल पर महेश्वर की कठोर तपस्या और पूजा करते हैं, जिससे शिव प्रकट होकर वरदान-सम्बन्धी संवाद करते हैं। गरुड़ दो दुर्लभ वर माँगते हैं—विष्णु के वाहन बनना और पक्षियों में ‘इन्द्रत्व/द्विजेन्द्रत्व’ अर्थात् सर्वोच्च अधिपत्य। शिव नारायण की सर्वाधारता और इन्द्र-पद की अद्वितीयता बताकर इस मांग की तात्त्विक कठिनाई समझाते हैं, फिर भी सीमित रूप से वर देते हैं—गरुड़ शंख-चक्र-गदा-धारी प्रभु के वाहक होंगे और पक्षियों के प्रधान भी। शिव के अन्तर्धान के बाद गरुड़ उग्र देवी चामुण्डा को, जिनका वर्णन श्मशान-चिह्नों और योगिनी-सम्बन्ध से होता है, प्रसन्न करते हैं और विस्तृत स्तुति करते हैं। स्तुति में वही देवी प्रकाशमयी रक्षिका ‘कनकेश्वरि’ के रूप में पराशक्ति कही गई हैं, जो सृष्टि-स्थिति-प्रलय में सक्रिय है। चामुण्डा गरुड़ को अभेद्यता, सुरों-असुरों पर विजय और तीर्थ के निकट निवास का वर देती हैं। अध्याय का निष्कर्ष तीर्थ-फल से होता है—स्नान-पूजन से यज्ञ-समान पुण्य, योग-सिद्धि और योगिनी-गणों सहित शुभ परलोक-गति प्राप्त होती है।

41 verses

Adhyaya 187

Adhyaya 187

कालाग्निरुद्र-स्वयम्भू-लिङ्गमाहात्म्य (Kālāgnirudra Svayambhū Liṅga Māhātmya)

इस अध्याय में मार्कण्डेय मुनि एक राजा को तीर्थ-यात्रा का क्रम और एक प्रसिद्ध लिङ्ग की आध्यात्मिक महिमा बताते हैं। वे भृगुकच्छ में स्थित जालेश्वर को अत्यन्त प्राचीन स्वयम्भू लिङ्ग कहते हैं, जो ‘कालाग्निरुद्र’ नाम से विख्यात है। यह क्षेत्र ‘क्षेत्र-पाप’ के निवारण हेतु करुणापूर्वक प्रकट हुआ माना गया है और पाप-शमन तथा दुःख-नाश करने वाला पवित्र केन्द्र बताया गया है। कथा के अनुसार पूर्वकल्प में असुरों ने तीनों लोकों को दबा लिया, वेद-यज्ञ और धर्म का ह्रास हुआ। तब कालाग्निरुद्र से आद्य धूम उत्पन्न हुआ और उसी धूम से लिङ्ग प्रकट होकर सात पातालों को भेदता हुआ दक्षिणावट (दक्षिणमुख) गड्ढे सहित प्रतिष्ठित हुआ। साथ ही शिव के पुर-दाह से सम्बद्ध ज्वाला-जन्य कुण्ड और धूमावर्त नामक भँवर-सा स्थल भी वर्णित है। विधि यह है कि तीर्थ तथा नर्मदा-जल में स्नान करें, पितरों के लिए श्राद्ध करें, त्रिलोचन (शिव) की पूजा करें और कालाग्निरुद्र के नामों का जप करें—जिससे ‘परमा गति’ प्राप्त होती है। यह भी कहा गया है कि यहाँ किए गए काम्य अनुष्ठान, शान्ति/अपाय-निवारण कर्म, शत्रु-क्षय के प्रयत्न और वंश-संबंधी संकल्प शीघ्र सिद्ध होते हैं—यह कथन तीर्थ-प्रभाव के रूप में प्रस्तुत है।

10 verses

Adhyaya 188

Adhyaya 188

Śālagrāma-tīrtha Māhātmya (शालग्रामतीर्थमाहात्म्य) — Observances on the Revā/Narmadā Bank

मार्कण्डेय राजा को उपदेश देते हैं कि रेवातट (नर्मदा) पर स्थित शालग्राम नामक पवित्र तीर्थ में जाना चाहिए। यह स्थान समस्त देवताओं द्वारा पूजित है और यहाँ भगवान वासुदेव—त्रिविक्रम तथा जनार्दन रूप में—प्राणियों के कल्याण हेतु निवास करते हैं। तपस्वियों की परम्परा और द्विजों व साधकों के लिए स्थापित धर्मकर्म-भूमि के कारण इसकी महिमा विशेष कही गई है। मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी आने पर रेवामें स्नान करके उपवास करना, रात्रि-जागरण सहित जनार्दन की पूजा करना बताया गया है। अगले दिन द्वादशी को पुनः स्नान कर देवताओं और पितरों का तर्पण करके विधिपूर्वक श्राद्ध सम्पन्न करना चाहिए। सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों का सत्कार कर स्वर्ण, वस्त्र, अन्न आदि दान देना, क्षमा-याचना करना और खगध्वज आदि नामों से भगवान का भक्ति-पूर्वक स्मरण करना भी विधान है। फल यह कहा गया है कि इससे शोक-दुःख का नाश होता है और ब्रह्महत्या सहित घोर पापों से मुक्ति मिलती है। शालग्राम के बार-बार दर्शन और नारायण-स्मरण से मोक्षाभिमुख अवस्था प्राप्त होती है; ध्यान-निष्ठ संन्यासी भी वहाँ मुरारि के परम पद को प्राप्त करते हैं।

14 verses

Adhyaya 189

Adhyaya 189

पञ्चवराहदर्शन-व्रत-फलश्रुति (Vision of the Five Varāhas: Vrata Procedure and Promised Fruits)

मार्कण्डेय युधिष्ठिर को एक परम-शोभन तीर्थ का उपदेश देते हैं, जहाँ वराह-रूप विष्णु को ‘धरणीधर’—पृथ्वी का उद्धारक—कहकर स्मरण किया जाता है। सृष्टि-कथा में हरि क्षीरसागर में शेषशय्या पर योगनिद्रा में रहते हैं; पृथ्वी के भार से डूबने पर देवता व्याकुल होकर उनसे जगत्-स्थैर्य की प्रार्थना करते हैं। तब विष्णु भयानक दंष्ट्राधारी वराह बनकर अपनी दंष्ट्रा पर पृथ्वी को उठाकर स्थिर करते हैं। इसके बाद नर्मदा के उत्तर तट पर वराह के पाँच रूपों का वर्णन आता है—ग्रंथ में बताए गए प्रथम से पंचम स्थलों पर दर्शन-पूजन का विधान है; पाँचवाँ ‘उदीर्ण-वराह’ भृगुकच्छ से संबद्ध बताया गया है। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में, विशेषकर एकादशी को, यात्री हविष्य-आहार, रात्रि-जागरण, नदी-स्नान, तिल-यव से पितृ व देव-तर्पण, तथा योग्य ब्राह्मणों को क्रमशः गौ, अश्व, सुवर्ण और भूमि-दान करता है और प्रत्येक वराह-स्थल पर पूजा करता है। फलश्रुति कहती है कि पाँचों वराहों का एक साथ दर्शन, नर्मदा-विधि और नारायण-स्मरण से बड़े-बड़े पाप नष्ट होते हैं और मोक्ष मिलता है; शंकर-प्रमाण से समय पर लोṭाणेश्वर के दर्शन को देह-बन्धन से मुक्ति का कारण कहा गया है।

43 verses

Adhyaya 190

Adhyaya 190

चन्द्रहास-समतीर्थमाहात्म्य (Chandra-hāsa & Somatīrtha Māhātmya)

यह अध्याय संवाद-रूप में है। युधिष्ठिर मार्कण्डेय ऋषि से पूछते हैं कि देवताओं द्वारा पूजित सोमतीर्थ, जिसे चन्द्रहास भी कहते हैं, वहाँ चन्द्रदेव (सोम) ने परम सिद्धि कैसे पाई। मार्कण्डेय बताते हैं कि दक्ष ने गृहस्थ-धर्म और दाम्पत्य कर्तव्य की उपेक्षा के कारण सोम को क्षय-रोग का शाप दिया; इसी प्रसंग में गृहस्थ के कर्तव्यों, मर्यादा और उनके कर्मफल का नीतिपरक विवेचन आता है। फिर तीर्थयात्रा और तप का विधान बताया गया है। सोम अनेक तीर्थों में भटकते हुए नर्मदा तट पर पहुँचकर बारह वर्षों तक उपवास, दान, व्रत, नियम और संयम का पालन करते हैं और अंततः रोग से मुक्त हो जाते हैं। वे महादेव (शिव) को महापाप-नाशक रूप में प्रतिष्ठित कर पूजन करते हैं और उच्च लोक को प्राप्त होते हैं; साथ ही चन्द्रहास/सोमतीर्थ में स्नान-पूजा, तिथियों, सोमवारों तथा ग्रहण-काल के विशेष अनुष्ठानों के फल—शुद्धि, कल्याण, आरोग्य और दोष-निवृत्ति—का वर्णन किया गया है।

34 verses

Adhyaya 191

Adhyaya 191

सिद्धेश्वर-लिङ्गमाहात्म्यं तथा द्वादशादित्य-तपःफल-प्रशंसा (Siddheśvara Liṅga Māhātmya and the Merit of the Twelve Ādityas’ Austerity)

अध्याय का आरम्भ मार्कण्डेय के उपदेश से होता है। वे तीर्थयात्री को सिद्धेश्वर जाने को कहते हैं और वहीं समीप स्थित स्वयम्भू ‘अमृत-स्रावी’ लिङ्ग का वर्णन करते हैं, जिसके दर्शन मात्र से ही विशेष पुण्य प्राप्त होता है। तब युधिष्ठिर पूछते हैं कि देवताओं ने सिद्धेश्वर में सिद्धि कैसे पाई, और ‘द्वादश आदित्य’ का उल्लेख किस प्रकार है। मार्कण्डेय द्वादश आदित्यों—इन्द्र, धाता, भग, त्वष्टा, मित्र, वरुण, अर्यमन्, विवस्वान, सविता, पूषा, अंशुमान और विष्णु—का नाम लेकर बताते हैं कि सूर्यत्व की कामना से उन्होंने नर्मदा-तट पर सिद्धेश्वर में कठोर तप किया। तपस्या सफल होने पर उसी तीर्थ में दिवाकर की प्रतिष्ठा सूर्य के ‘अंशों’ के विभाजन द्वारा हुई और स्थान की ख्याति बढ़ी। आगे प्रलयकाल में आदित्यों के विश्व-कार्य तथा दिशाओं में सूर्य-शक्तियों की व्यवस्था (दिक्-विन्यास) का भी वर्णन आता है। अंत में तीर्थ-धर्म और फलश्रुति कही गई है—प्रातः स्नान करके द्वादशादित्य-दर्शन करने से वाणी, मन और कर्म के पाप नष्ट होते हैं; प्रदक्षिणा पृथ्वी-परिक्रमा के समान मानी गई है; इस तीर्थ में सप्तमी का उपवास अत्यन्त फलदायक है; बार-बार प्रदक्षिणा से रोग-नाश, आरोग्य, समृद्धि और संतान-लाभ जैसे फल अनुशासित भक्ति से प्राप्त होते हैं।

25 verses

Adhyaya 192

Adhyaya 192

देवतीर्थ-दर्शनम्, नरनारायण-तपः, उर्वश्युत्पत्तिः (Devatīrtha, the Nara–Nārāyaṇa Austerity, and the Origin of Urvaśī)

अध्याय 192 में मार्कण्डेय एक परम पावन देवतीर्थ का वर्णन करते हैं, जिसके दर्शन से पाप नष्ट होते हैं। इसी प्रसंग में युधिष्ठिर पूछते हैं—“श्रीपति कौन हैं, और केशव का भृगुवंश से क्या संबंध है?” मार्कण्डेय संक्षेप में वंश-परंपरा बताते हैं—नारायण से ब्रह्मा, ब्रह्मा से दक्ष और फिर धर्म; धर्म की दस धर्मपत्नीों के नाम आते हैं, और उनसे उत्पन्न साध्यगण के पुत्र नर, नारायण, हरि और कृष्ण कहे जाते हैं—जो विष्णु के अंश माने गए हैं। नर-नारायण गन्धमादन पर्वत पर अत्यन्त कठोर तप करते हैं, जिससे जगत में क्षोभ होने लगता है। उनकी तपःशक्ति से भयभीत इन्द्र काम और वसन्ता सहित अप्सराओं को भेजते हैं, ताकि नृत्य-गीत, सौन्दर्य और विषय-आकर्षण से तप भंग हो जाए। परन्तु दोनों ऋषि अचल रहते हैं—निर्वात दीपक और अक्षुब्ध समुद्र के समान। तब नारायण अपनी जंघा से एक अनुपम स्त्री प्रकट करते हैं—उर्वशी—जो अप्सराओं से भी अधिक मनोहर है। देवदूत नर-नारायण की स्तुति करते हैं। नारायण उपदेश देते हैं कि परमात्मा सर्वत्र व्याप्त है; इसलिए राग-द्वेष और भेदभाव की वृत्तियाँ सम्यक् विवेक वालों में टिक नहीं पातीं। वे कहते हैं कि उर्वशी को इन्द्र के पास ले जाओ, और हमारा तप भोग या देवताओं से प्रतिस्पर्धा के लिए नहीं, बल्कि लोक-मार्ग दिखाने और जगत की रक्षा के लिए है।

96 verses

Adhyaya 193

Adhyaya 193

नारायणस्य विश्वरूपदर्शनम् (Nārāyaṇa’s Vision of the Cosmic Form)

इस अध्याय में श्री मार्कण्डेय के कथन-प्रसंग से गूढ़ तत्त्व का उपदेश होता है। वसन्तकामा और उर्वशी आदि अप्सराएँ बार-बार नारायण को प्रणाम करके प्रत्यक्ष विश्वरूप-दर्शन की याचना करती हैं और कहती हैं कि पूर्व उपदेश से उनका अभिप्रेत सिद्धान्त स्पष्ट हो गया है। तब नारायण उन्हें दिखाते हैं कि समस्त लोक और समस्त प्राणी उनके ही शरीर में स्थित हैं; वहाँ ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र, आदित्य, वसु, यक्ष-गन्धर्व-सिद्ध, मनुष्य, पशु-पक्षी, वृक्ष-लताएँ, नदियाँ, पर्वत, समुद्र, द्वीप और आकाशमण्डल तक का दर्शन होता है। अप्सराएँ विस्तृत स्तुतियों द्वारा नारायण को पंचतत्त्वों और इन्द्रियों का आधार, एकमात्र ज्ञाता-द्रष्टा तथा वह परम स्रोत बताती हैं जिसमें सब प्राणी अंशरूप से सहभागी हैं। दर्शन की तीव्रता से अभिभूत होकर वे विश्वरूप को समेट लेने की प्रार्थना करती हैं; नारायण उस रूप को संहृत कर बताते हैं कि सभी भूत उनके अंश हैं और देव, मनुष्य तथा पशुओं में समदृष्टि (समता) रखने का उपदेश देते हैं। अन्त में मार्कण्डेय राजा से कहते हैं कि सर्वभूतों में स्थित केशव का ध्यान मुक्ति का साधन है; जगत को वासुदेवमय समझने से वैर, द्वेष और भेदभाव क्षीण हो जाते हैं।

72 verses

Adhyaya 194

Adhyaya 194

मूलश्रीपतिवैश्वानरूपदर्शनम् तथा नारायणगिरि-देवतीर्थ-प्रादुर्भावः (Vision of the Vaiśvarūpa, the cult of Mūlaśrīpati, and the arising of Nārāyaṇagiri & Devatīrtha)

मार्कण्डेय युधिष्ठिर से कहते हैं कि देवगण वैष्णव विश्वरूप की घोषणा सुनकर और उर्वशी के प्राकट्य से विस्मित हो उठते हैं। भृगुवंश में जन्मी श्री (लक्ष्मी) नारायण को पति रूप में पाने के लिए व्रत, दान, नियम और सेवा का विचार करके समुद्र-तट पर सहस्र दिव्य वर्षों तक कठोर तप करती हैं। देवता स्वयं विश्वरूप प्रकट करने में असमर्थ होकर नारायण को निवेदन करते हैं; विष्णु श्री के पास आकर उनकी अभिलाषा पूर्ण करते हैं और विश्वरूप का दर्शन कराते हैं। नारायण पाञ्चरात्र-भक्ति के अनुरूप उपासना-उपदेश देते हैं—नित्य पूजा से ऐश्वर्य, यश और मान की वृद्धि होती है; ब्रह्मचर्य को मूल तप कहा गया है; देव का नाम “मूलश्रीपति” बताया गया है। संयम सहित रेवा-जल में स्नान को फलदायक और दान के पुण्य को अनेकगुणित करने वाला कहा गया है। श्री गृहस्थ-आश्रम के धर्ममय आदर्श की स्थापना चाहती हैं; तब नारायण “नारायणगिरि” नाम स्थापित कर उसके स्मरण को तारक बताते हैं। इसके बाद दिव्य विवाह-यज्ञ का वर्णन है—ब्रह्मा और ऋषि पुरोहित बनते हैं, समुद्र रत्न-सम्पदा देते हैं, कुबेर धन प्रदान करते हैं, और विश्वकर्मा मणिमय भवन रचते हैं। अनुशासित ब्राह्मणों का निवास बसाया जाता है। अंत में अवभृथ-स्नान हेतु तीर्थ प्रकट होता है—विष्णु के चरणोदक से निकली पवित्र धारा रेवा में मिलकर “देवतीर्थ” कहलाती है, जो अत्यन्त पावन और अनेक अश्वमेध-अवभृथों से भी श्रेष्ठ फलदायी कही गई है।

81 verses

Adhyaya 195

Adhyaya 195

Devatīrtha Māhātmya and Ekādaśī–Nīrājana Observances (देवतीर्थमाहात्म्य तथा एकादशी-नीराजनविधानम्)

इस अध्याय में युधिष्ठिर देवतीर्थ के नाम, माहात्म्य तथा वहाँ स्नान और दान के फल के विषय में प्रश्न करते हैं। मार्कण्डेय बताते हैं कि देवों और ऋषियों द्वारा पूजित समस्त तीर्थों का विष्णु के चिंतन से देवतीर्थ में एकीकरण होता है; इसलिए यह परम वैष्णव तीर्थ है और यहाँ स्नान करना मानो सभी तीर्थों में स्नान के समान है। ग्रहणकाल में किए गए कर्म ‘अनन्त’ फल देते हैं—यह कहकर सुवर्ण, भूमि, गौ आदि दानों की देवता-संबद्ध महिमा गिनाई जाती है और निष्कर्ष दिया जाता है कि देवतीर्थ में श्रद्धापूर्वक किया गया कोई भी दान अक्षय फल देता है। फिर एकादशी-केंद्रित भक्ति-विधान आता है—स्नान (नर्मदा-जल सहित), उपवास, श्रीपति का पूजन, रात्रि-जागरण और घृत-दीप से नीराजन। द्वादशी की प्रातः ब्राह्मणों तथा दम्पतियों का वस्त्र, आभूषण, ताम्बूल, पुष्प, धूप और अनुलेपन से सत्कार कर दान करने का निर्देश है। दुग्धादि पदार्थ, तीर्थ-जल, उत्तम वस्त्र, सुगंध, नैवेद्य और दीप आदि पूजन-सामग्री बताई गई है; ऐसा साधक वैष्णव-लक्षणों सहित विष्णुलोक को प्राप्त होता है। अंत में नित्य नीराजन की रक्षा व आरोग्य-प्रद महिमा, दीप-शेष का नेत्रों में उपयोग, तथा माहात्म्य के श्रवण-पाठ का पुण्य—और श्राद्ध में पाठ करने से पितरों की तृप्ति—फलश्रुति में कही गई है।

42 verses

Adhyaya 196

Adhyaya 196

हंसतीर्थमाहात्म्य (Hamsa Tīrtha Māhātmya) — Merit of Bathing, Donation, and Renunciation

अध्याय 196 में मार्कण्डेय श्रोता को हंसतीर्थ की यात्रा का निर्देश देते हैं और उसे अनुपम, सर्वोत्तम तीर्थ बताते हैं। इसकी महिमा एक कारण-कथा से स्थापित होती है—इसी स्थान पर एक हंस ने तप किया और ब्रह्मा का वाहन बनने का पद (ब्रह्म-वाहनता) प्राप्त किया; इसलिए यह तीर्थ अत्यन्त प्रभावशाली माना गया। आगे आचार-विधि बताई गई है—जो यात्री हंसतीर्थ में स्नान करके स्वर्णदान (काञ्चन-दान) करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है। फल का वर्णन दिव्य दृश्य-रूप में है—हंसों से जुते विमान में, नवोदित सूर्य के समान तेजस्वी, इच्छित भोगों से सम्पन्न, अप्सराओं के समूहों से सेवित होकर वह गमन करता है। इच्छानुसार सुख भोगकर वह जाति-स्मरण (पूर्वजन्म-स्मृति) सहित पुनः मनुष्य-योनि में आता है, जिससे जन्म-जन्मान्तर की नैतिक निरन्तरता सूचित होती है। अंत में मोक्ष का निष्कर्ष है—जो संन्यास द्वारा देह का त्याग करता है, वह मोक्ष पाता है। तीर्थ-फल को पाप-नाशक, पुण्य-प्रद और शोक-हर कहा गया है।

7 verses

Adhyaya 197

Adhyaya 197

Mūlasthāna-Sūryatīrtha Māhātmya (Glorification of the Mūlasthāna Solar Tīrtha)

इस अध्याय में मार्कण्डेय नर्मदा-तट पर स्थित ‘मूलस्थान’ नामक परम सूर्यतीर्थ का वर्णन करते हैं। यह शुभ ‘मूल-स्थल’ पद्मजा (ब्रह्मा) से सम्बद्ध है और यहीं भास्कर (सूर्य) की प्रतिष्ठा का महात्म्य कहा गया है। व्रती यात्री को संयमित मन से स्नान करके पिण्ड और जल द्वारा पितरों तथा देवताओं का तर्पण करना चाहिए, फिर मूलस्थान-धाम का दर्शन करना चाहिए। विशेष व्रत यह है कि शुक्ल सप्तमी यदि रविवार (आदित्यवासर) को पड़े, तो रेवाजल में स्नान, तर्पण, यथाशक्ति दान, करवीर पुष्प और लाल चन्दन-मिश्रित जल से भास्कर की स्थापना/पूजा, कुन्दा पुष्प सहित धूप, चारों दिशाओं में दीप-प्रज्वलन, उपवास और रात्रि-जागरण भक्ति-गीत व वाद्य के साथ करना चाहिए। फल में घोर दुःखों से रक्षा तथा दीर्घ काल तक सूर्यलोक में निवास, गन्धर्व-अप्सराओं की संगति सहित, बताया गया है।

12 verses

Adhyaya 198

Adhyaya 198

Śūlatīrtha–Śūleśvarī–Śūleśvara Māhātmya (Origin of the Shula Tirtha and the Manifestation of Devī and Śiva)

मार्कण्डेय श्रोता को भद्रकाली-संगम की ओर ले जाते हैं, जो देवताओं द्वारा नित्य सेवित, दिव्य-प्रतिष्ठित और ‘शूलतीर्थ’ के नाम से प्रसिद्ध है। कहा गया है कि वहाँ केवल दर्शन भी, विशेषतः स्नान और दान के साथ, दुर्भाग्य, अपशकुन, शाप-प्रभाव तथा अन्य पाप-दोषों का नाश करता है। तब युधिष्ठिर पूछते हैं कि नर्मदा-तट पर देवी ‘शूलेश्वरी’ और शिव ‘शूलेश्वर’ कैसे कहलाए। मार्कण्डेय माण्डव्य नामक ब्राह्मण तपस्वी की कथा सुनाते हैं। वह मौन और कठोर तप में लीन था; उसके आश्रम में चोर चोरी का माल छिपा देते हैं। राज-सेवक पूछताछ करते हैं, पर मौनी ऋषि उत्तर नहीं देते; अतः वे उसे शूल पर चढ़ाकर दण्डित करते हैं। दीर्घ पीड़ा में भी माण्डव्य शिव-स्मरण से अडिग रहता है। शिव प्रकट होकर शूल काटते हैं और कर्म-विपाक का रहस्य बताते हैं—पूर्व कर्मों से ही सुख-दुःख आते हैं; धर्म-निन्दा किए बिना धैर्य से सहना भी तप है। माण्डव्य शूल के अमृत-तुल्य प्रभाव का कारण पूछकर निवेदन करता है कि शूल के मूल और अग्र पर शिव-उमा सदा विराजें। तत्क्षण शूल-मूल में शिव का लिङ्ग प्रकट होता है और वाम भाग में देवी की मूर्ति; इसी से शूलेश्वर-शूलेश्वरी की प्रतिष्ठा होती है। आगे देवी अनेक तीर्थों में अपने विविध नाम-रूपों का वर्णन करती हैं। अंत में फलश्रुति और विधि दी गई है—पूजा, अर्पण, पितृकर्म, उपवास-जागरण आदि से शुद्धि और शिवलोक-सामीप्य मिलता है; यह तीर्थ ‘शूलेश्वरी-तीर्थ’ के रूप में स्थायी यश पाता है।

118 verses

Adhyaya 199

Adhyaya 199

Aśvinī Tīrtha Māhātmya (The Glory of the Aśvinī Pilgrimage Ford)

मार्कण्डेय तीर्थों के वर्णन-क्रम में अश्विनी तीर्थ का माहात्म्य बताते हैं। यह तीर्थ “कामिक” अर्थात् मनोवांछित फल देने वाला और प्राणियों को सिद्धि प्रदान करने वाला कहा गया है। यहीं दिव्य वैद्य अश्विनीकुमार नासत्यौ ने महान तप किया, जिसके फलस्वरूप उन्हें यज्ञ-भाग का अधिकार मिला और देवताओं की व्यापक स्वीकृति प्राप्त हुई। युधिष्ठिर पूछते हैं कि वे सूर्य के पुत्र क्यों कहलाते हैं। मार्कण्डेय संक्षेप में कथा कहते हैं—एक रानी सूर्य के प्रचण्ड तेज को सह न सकी, इसलिए मेरु-प्रदेश में कठोर तप करने लगी; सूर्य कामवश अश्वरूप धारण कर उसके पास आए; नासिका-मार्ग से गर्भाधान हुआ और प्रसिद्ध नासत्यौ का जन्म हुआ। फिर कथा नर्मदा-तट की ओर लौटती है—भृगुकच्छ के निकट नदी-किनारे दोनों ने दुष्कर तप करके परम सिद्धि पाई। अंत में फलश्रुति है कि जो इस तीर्थ में स्नान कर पितरों और देवताओं को तर्पण देता है, वह जहाँ भी जन्म ले, सौन्दर्य और सौभाग्य प्राप्त करता है।

15 verses

Adhyaya 200

Adhyaya 200

Sāvitrī-tīrtha Māhātmya and Sandhyā–Gāyatrī Discipline (सावित्रीतीर्थमाहात्म्यं तथा सन्ध्यागायत्रीविधानम्)

इस अध्याय में संवाद के रूप में मārkaṇḍeya युधिष्ठिर को सावित्री-तीर्थ की महिमा बताकर उसे परम पवित्र तीर्थ घोषित करते हैं। फिर युधिष्ठिर के प्रश्न पर वे सावित्री के स्वरूप का निरूपण करते हैं—उन्हें वेद-माता, कमल-चिह्नों से युक्त, ध्यान में प्रतिष्ठित देवी मानकर प्रातः, मध्याह्न और सायं—तीनों संध्याओं में समयानुसार भिन्न-भिन्न ध्यान और उपासना-विधि बताते हैं। तीर्थयात्रियों के लिए शुद्धि-क्रम भी दिया गया है: स्नान और आचमन के बाद प्राणायाम द्वारा संचित दोषों का दहन, ‘आपो हि ष्ठा’ मंत्र से प्रोक्षण, तथा अघमर्षण आदि वैदिक मंत्रों से पाप-निवारण। संध्या के पश्चात नियमपूर्वक गायत्री-जप को मुख्य साधना कहा गया है, जिसके फल रूप में पापक्षय और उच्च लोकों की प्राप्ति बताई गई है। साथ ही तीर्थ में पितृकर्म/श्राद्ध तथा अंत्य-आचरण करने पर विशेष फल, मृत्यु के बाद उत्तम गति और आगे शुभ जन्म का आश्वासन देकर अध्याय विधिनिष्ठ आचार की शिक्षा देता है।

28 verses

Adhyaya 201

Adhyaya 201

देवतीर्थमाहात्म्यम् | Devatīrtha Māhātmya (Glorification of Devatīrtha)

इस अध्याय में श्री मार्कण्डेय महिपाल को तीर्थ-उपदेश के रूप में देवतीर्थ का माहात्म्य सुनाते हैं और युधिष्ठिर को धर्मपरायण राजधर्म का आदर्श बताकर स्मरण कराते हैं। यह देवतीर्थ ‘अनुपम’ कहा गया है, जहाँ सिद्धगण तथा इन्द्र सहित देवता निवास करते हैं। यहाँ स्नान, दान, जप, होम, स्वाध्याय और देवता-पूजन जैसे पुण्यकर्म तीर्थ की स्वाभाविक शक्ति से ‘अनन्त’ फल देने वाले माने गए हैं। भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी को विशेष प्रधान बताया गया है, क्योंकि यह तिथि देवताओं के वास से पवित्र मानी गई है। उस दिन स्नान करके विधिपूर्वक श्राद्ध करें और देवताओं द्वारा प्रतिष्ठित वृषभध्वज (शिव) की आराधना करें। इससे समस्त पापों का शोधन होता है और अंत में रुद्रलोक की प्राप्ति का आश्वासन दिया गया है।

5 verses

Adhyaya 202

Adhyaya 202

Śikhitīrtha-māhātmya (The Glory of Śikhitīrtha) / शिखितीर्थमाहात्म्य

मार्कण्डेय शिखितीर्थ नामक परम पवित्र तीर्थ का वर्णन करते हैं, जिसे प्रधान तीर्थ और उत्कृष्ट ‘पञ्चायतन’ उपासना-स्थल कहा गया है। यहाँ हव्यवाहन (अग्नि) ने तप करके ‘शिखा’ प्राप्त की, ‘शिखी’ कहलाए और ‘शिखा’ से संबद्ध नाम वाले शिव—शिखाख्य—की स्थापना की। आश्वयुज मास के निर्दिष्ट चन्द्रकाल में साधक को तीर्थ जाकर नर्मदा-स्नान करना चाहिए, देव-ऋषि-पितरों को तिल-जल से तर्पण देना चाहिए, ब्राह्मण को सुवर्ण दान करना चाहिए और अग्नि का सत्कार/तृप्ति करनी चाहिए। अंत में गंध, माला और धूप से शिव-पूजन करने पर फलस्वरूप रुद्रलोक की प्राप्ति होती है; सूर्यवर्ण विमान में अप्सराओं सहित गन्धर्वों द्वारा स्तुत होकर जाता है, तथा इस लोक में शत्रुनाश और तेज की वृद्धि प्राप्त होती है।

8 verses

Adhyaya 203

Adhyaya 203

कोटितीर्थमाहात्म्य (Koṭitīrtha Māhātmya) — Ritual Efficacy of the Koṭitīrtha

मार्कण्डेय कोटितीर्थ को ‘अतुलनीय’ तीर्थ बताते हैं, जहाँ असंख्य सिद्धों का वास है और अनेक महर्षियों की उपस्थिति से क्षेत्र अत्यन्त पवित्र माना गया है। दीर्घ तपस्या के बाद ऋषियों ने यहाँ शिव की प्रतिष्ठा की और साथ ही देवी को कोटीश्वरी तथा चामुण्डा (महिषासुरमर्दिनी) रूप में स्थापित किया—इस प्रकार यह स्थान शैव-शाक्त दोनों परम्पराओं का संयुक्त पुण्यधाम बनता है। भाद्रपद कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को, जब हस्त नक्षत्र हो, इस तीर्थ को सर्वपापहर और सर्वजनहितकारी कहा गया है। उस दिन तीर्थ-स्नान, तिलोदक अर्पण और श्राद्ध करने से महान फल मिलता है; पितरों की तृप्ति होती है और निश्चित संख्या के लोगों का नरक से शीघ्र उद्धार होने का भी विधान बताया गया है। अन्त में सिद्धान्त दिया गया है कि इस तीर्थ के प्रभाव से स्नान, दान, जप, होम, स्वाध्याय और देवता-पूजन ‘कोटि-गुणा’ फल देने लगते हैं—अर्थात् स्थान-विशेष के कारण साधना और कर्म की शक्ति अत्यधिक बढ़ जाती है।

7 verses

Adhyaya 204

Adhyaya 204

Paitāmaha Tīrtha (Bhṛgu Tīrtha) Māhātmya — ब्रह्मशाप-शमनं, श्राद्ध-फलश्रुति, रुद्रलोक-गति

इस अध्याय में मार्कण्डेय भृगु-तीर्थ को परम पुण्यकारी ‘पैतामह तीर्थ’ बताते हैं, जो पापों का नाश करने वाला है। युधिष्ठिर पूछते हैं कि पितामह ब्रह्मा ने महेश्वर की इतनी तीव्र भक्ति से आराधना क्यों की। तब मार्कण्डेय प्राचीन इतिहासनुसार कहते हैं—अपनी ही पुत्री के प्रति आसक्ति होने पर शिव ने ब्रह्मा को शाप दिया, जिससे उनकी वेद-विद्या क्षीण हुई और लोक में उनकी पूजा-प्रतिष्ठा घट गई। शोकग्रस्त ब्रह्मा ने रेवा (नर्मदा) के उत्तरी तट पर तीन सौ वर्षों तक तप किया, स्नान करके शिव की उपासना की। शंकर प्रसन्न होकर ब्रह्मा की पूज्यता को पर्व-उत्सवों में पुनः स्थापित करते हैं और देवताओं तथा पितरों सहित वहाँ अपनी नित्य उपस्थिति घोषित करते हैं। इसलिए यह तीर्थ ‘पैतामह’ नाम से तीर्थों में श्रेष्ठ प्रसिद्ध हुआ। फिर विधि-काल और फल बताया गया है—भाद्रपद कृष्णपक्ष की अमावस्या को स्नान कर पितरों व देवताओं का तर्पण करने से, अल्प दान (एक पिण्ड या तिल-जल) से भी पितर दीर्घकाल तक तृप्त होते हैं। सूर्य के कन्या राशि में रहने पर श्राद्ध-पालन का विशेष महत्त्व है, और कहा गया है कि समस्त पितृ-तीर्थों का श्राद्ध-फल यहाँ अमावस्या को प्राप्त हो जाता है। अंत में फलश्रुति है—जो स्नान कर शिव-पूजन करता है वह बड़े-छोटे दोषों से मुक्त होता है; और जो संयमित मन से इस तीर्थ में देह त्यागता है, वह रुद्रलोक को जाता है और पुनर्जन्म नहीं पाता।

17 verses

Adhyaya 205

Adhyaya 205

कुर्कुरीतीर्थमाहात्म्य (Kurkuri Tīrtha Māhātmya)

इस अध्याय में श्री मार्कण्डेय राजा से कहते हैं कि वह कुरकुरी नामक अत्यन्त शुभ तीर्थ में जाए, जो समस्त पापों का नाश करने वाला माना गया है। यह तीर्थ पुण्य, मंगल और धर्मवर्धक फल देने वाला बताया गया है। यहाँ की तीर्थ-देवता ‘कुरकुरी’ को इष्ट-प्रदाता कहा गया है—भक्ति से प्रसन्न होकर वह पशु, पुत्र और धन आदि मनोवांछित फल देती है। साथ ही वहाँ ‘ढौण्डेश’ नामक क्षेत्रपाल का निवास बताया गया है, जिसकी पूजा स्त्री और पुरुष—दोनों के लिए कल्याणकारी कही गई है। फलश्रुति में कहा गया है कि दर्शन-पूजन से दुर्भाग्य घटता है, संतानहीनता दूर होती है, दरिद्रता मिटती है और इच्छित उद्देश्य सिद्ध होते हैं। अंत में यह भी स्पष्ट किया गया है कि विधि-पूर्वक तीर्थ का स्पर्श और दर्शन करने से ही ये फल पूर्ण रूप से प्राप्त होते हैं।

6 verses

Adhyaya 206

Adhyaya 206

Daśakanyā-Tīrtha Māhātmya (The Glory of the ‘Ten Maidens’ Sacred Ford)

मार्कण्डेय राजा (क्षोणिनाथ/नराधिप) से कहकर ‘दशकन्या’ नामक अत्यन्त शुभ तीर्थ का निर्देश करते हैं, जो परम सुन्दर और सर्वपाप-नाशक बताया गया है। इसकी प्रतिष्ठा एक शैव कारण-कथा से होती है—इसी तीर्थ पर महादेव का दस सद्गुणी कन्याओं से सम्बन्ध और ब्रह्मा के साथ उनके विवाह की व्यवस्था का प्रसंग आता है; तभी से यह स्थान ‘दशकन्या’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। फिर उपदेशात्मक भाग में कहा गया है कि इस तीर्थ पर अलंकृत कन्या का विवाह में दान (कन्यादान) करने से अपार पुण्य मिलता है—केशों की संख्या जितने वर्षों तक शिव के समीप निवास, फिर दुर्लभ मानव-जन्म और अंततः महान धन-समृद्धि। साथ ही भक्तिपूर्वक स्नान करके शांत ब्राह्मण को स्वर्णदान करने का विधान है; स्वर्ण की अल्प मात्रा भी वाणी, मन और शरीर से हुए पूर्व दोषों को नष्ट कर देती है। फलश्रुति में स्वर्गारोहण, विद्याधरों और सिद्धों में सम्मान, तथा कल्पान्त तक निवास बताया गया है—यह तीर्थ कर्म, सद्भाव और ब्रह्माण्डीय फल को एक सूत्र में बाँधता है।

11 verses

Adhyaya 207

Adhyaya 207

स्वर्णबिन्दुतीर्थमाहात्म्य (Glory of the Svarṇabindu Tīrtha)

मार्कण्डेय स्वर्णबिन्दु नामक पावन तीर्थ का परिचय देते हैं और उसके अनुष्ठान-विधान तथा फल का वर्णन करते हैं। इस अध्याय का केंद्र तीर्थ-स्नान और ब्राह्मण को काञ्चन (सोना) दान है, जिसे अत्यन्त महापुण्यकारी कहा गया है। सोने को अग्नि-तेज से उत्पन्न ‘श्रेष्ठ रत्न’ मानकर दान में उसकी विशेष प्रभावशीलता बताई गई है। कहा गया है कि केशाग्र-परिमाण जितना अल्प स्वर्ण भी यदि इस तीर्थ से सम्बद्ध होकर विधिपूर्वक दान किया जाए, तो वहाँ देहान्त होने पर स्वर्ग-प्राप्ति होती है। दाता विद्यााधरों और सिद्धों में सम्मानित होता है, श्रेष्ठ विमान में कल्पान्त तक निवास करता है, और फिर धनवान कुल में द्विज रूप से उत्तम मानव-जन्म पाता है। इस तीर्थ में स्वर्णदान को मन, वाणी और शरीर से किए गए पापों का शीघ्र नाश करने वाला कर्म-प्रायश्चित्त बताया गया है।

10 verses

Adhyaya 208

Adhyaya 208

पितृऋणमोचनतीर्थप्रशंसा — Praise of the Tīrtha that Releases Ancestral Debt (Pitṛ-ṛṇa-mocana)

इस अध्याय में मार्कण्डेय ऋषि एक नरेश को ‘पितॄणाम् ऋणमोचनम्’ नामक प्रसिद्ध तीर्थ का माहात्म्य बताते हैं, जो तीनों लोकों में पितृ-ऋण से मुक्ति देने वाला माना गया है। विधिपूर्वक स्नान, फिर पितृदेवताओं का तर्पण और दान—इस क्रम से मनुष्य ‘अनृण’ अर्थात् ऋण-मुक्त हो जाता है। आगे पुत्र-प्राप्ति और कर्म-परम्परा का तात्त्विक कारण कहा गया है—पितर पुत्र की कामना करते हैं, क्योंकि पुत्र ‘पुण्णामा’ नरक से उद्धारक माना गया है; इसलिए श्राद्ध-तर्पण आदि का निरन्तर प्रवाह आवश्यक है। ऋण-त्रय का भी निरूपण है: पितृ-ऋण पिण्डदान और जल-तर्पण से, देव-ऋण अग्निहोत्र व यज्ञों से, और मनुष्य/सामाजिक ऋण ब्राह्मणों को वचनबद्ध दान, तीर्थ-सेवा तथा देवालय-कार्य जैसे कर्तव्यों के पालन से चुकता होता है। अन्त में फलश्रुति आती है—इस तीर्थ में किए गए दान-तर्पण और गुरुजन की तृप्ति अक्षय फल देती है, और उसका लाभ सात जन्मों तक दिवंगत पितरों को भी पहुँचता है। इस प्रकार अध्याय वंश-कल्याण और धर्म-कर्तव्य की भावना को दृढ़ करता है।

10 verses

Adhyaya 209

Adhyaya 209

भारभूतीतीर्थ-माहात्म्य / The Māhātmya of Bhārabhūti Tīrtha (Bhāreśvara) on the Revā (Narmadā)

मार्कण्डेय जी क्रमशः नर्मदा-तट के अनेक तीर्थों—पुष्कली, क्षमानाथ आदि—का परिचय देकर रेवातट पर स्थित भारभूति तीर्थ की उत्पत्ति बताते हैं, जहाँ शिव रुद्र-महेश्वर रूप में विराजते हैं। युधिष्ठिर ‘भारभूति’ नाम का कारण पूछते हैं। प्रथम दृष्टान्त में धर्मनिष्ठ ब्राह्मण विष्णुशर्मा सादगी और तप से जीवन यापन करता है; महादेव बटु (विद्यार्थी) बनकर उसके पास अध्ययन करते हैं। भोजन-प्रसंग में अन्य शिष्यों से विवाद होने पर शर्त लगती है; शिव प्रचुर अन्न प्रकट करते हैं और फिर नदी-तट पर शर्त के अनुसार शिष्यों को ‘भार’ सहित नर्मदा में डालकर स्वयं उन्हें बचाते हैं। उसी स्थान पर ‘भारभूति’ नामक लिंग की स्थापना होती है और ब्राह्मण का पाप-भय दूर होता है। द्वितीय दृष्टान्त में एक व्यापारी विश्वास करने वाले मित्र की हत्या कर द्रोह करता है; मृत्यु के बाद वह कठोर दण्ड भोगता है और अनेक योनियों में भटककर धर्मपरायण राजा के घर भार ढोने वाला बैल बनता है। कार्त्तिक में शिवरात्रि के अवसर पर भारेश्वर में राजा स्नान, पूजन-अर्पण, रात्रि के प्रहरों में चार प्रकार से लिंग-पूर्ति, स्वर्ण-तिल-वस्त्र-गोदान आदि दान और जागरण करता है; उससे वह बैल शुद्ध होकर उत्तम गति को प्राप्त होता है। अध्याय का फल यह है कि भारभूति में स्नान और व्रत-पालन से बड़े पाप भी नष्ट होते हैं, अल्प दान भी अक्षय पुण्य देता है; यहाँ मृत्यु होने पर अविच्छिन्न शिवलोक मिलता है, या शुभ जन्म होकर पुनः मोक्ष का मार्ग खुलता है।

186 verses

Adhyaya 210

Adhyaya 210

पुङ्खतीर्थमाहात्म्य (Puṅkha Tīrtha Māhātmya)

इस अध्याय में श्री मार्कण्डेय पुङ्ख तीर्थ का माहात्म्य बताते हैं और उसे “उत्तम” तीर्थ के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। वे पूर्वकाल में इसी तीर्थ पर पुङ्ख द्वारा प्राप्त सिद्धि का स्मरण कराकर इसकी पवित्रता का प्रमाण देते हैं। आगे तीर्थ की ख्याति को जामदग्न्य (परशुराम) के तप से जोड़ा गया है—वे क्षत्रिय-प्रभाव का अंत करने वाले महाबली हैं, जिन्होंने नर्मदा के उत्तरी तट पर दीर्घकाल तक कठोर तप किया। फिर क्रमबद्ध फलश्रुति आती है—तीर्थ-स्नान और परमेश्वर-पूजन से इस लोक में बल तथा परलोक में मुक्ति मिलती है; देवों और पितरों का तर्पण/पूजन करने से पितृ-ऋण से मुक्ति होती है; वहाँ प्राणत्याग करने पर रुद्रलोक तक अविनाशी गति बताई गई है। स्नान से अश्वमेध यज्ञ का फल, ब्राह्मण-भोजन से अत्यधिक पुण्यवृद्धि (एक भोजन का फल भी असंख्य के समान), और वृषभध्वज (शिव) की आराधना से वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है। इस प्रकार यह अध्याय स्थान-विशेष में किए गए शैव-आचरण को उच्च फल देने वाली धर्म-प्रक्रिया के रूप में निर्देशित करता है।

9 verses

Adhyaya 211

Adhyaya 211

Atithi-dharma Parīkṣā on the Narmadā Bank and the Māheśvara Āyatana ‘Muṇḍināma’ (अतिथिधर्मपरीक्षा तथा ‘मुण्डिनाम’ आयतनमाहात्म्यम्)

मार्कण्डेय युधिष्ठिर से नर्मदा-तट पर श्राद्ध-काल की एक घटना कहते हैं। एक ब्राह्मण-गृहस्थ ने ब्राह्मणों को भोजन कराने के लिए बुलाया था। उसी समय महेश्वर कुष्ठी, दुर्गन्धयुक्त ब्राह्मण का वेष धारण कर वहाँ आए और सबके साथ भोजन की याचना की; परन्तु गृहस्वामी और उपस्थित ब्राह्मणों ने उन्हें अशुद्ध मानकर कठोर वचन कहकर लौटा दिया। देव के चले जाने पर भोजन में अद्भुत विकार हो गया—पात्रों में कीड़े पड़ गए और सब चकित रह गए। तब एक विवेकी ब्राह्मण ने इसे अतिथि-अपमान का विपाक बताया और समझाया कि वह आगन्तुक स्वयं परमेश्वर थे, जो धर्म की परीक्षा लेने आए थे। उसने नियम स्मरण कराया कि अतिथि को रूप (सुन्दर/कुरूप), अवस्था (शुद्ध/अशुद्ध) या बाह्य पहचान से नहीं परखना चाहिए; विशेषतः श्राद्ध में उपेक्षा करने से विनाशकारी शक्तियाँ पिण्ड-हवि को ग्रस लेती हैं। सब लोग उन्हें खोजते हुए स्तम्भ-सा निश्चल खड़े उस रूप को पाते हैं और प्रार्थना करते हैं। महेश्वर करुणा से प्रसन्न होकर भोजन को पुनः सिद्ध/प्रदान करते हैं और अपने मण्डल की निरन्तर पूजा का उपदेश देते हैं। अंत में त्रिशूलधारी प्रभु के ‘मुण्डिनाम’ नामक आयतन की महिमा कही गई है—यह शुभ, पाप-नाशक, कार्त्तिक में विशेष फलदायक और पुण्य में गया-तीर्थ के तुल्य है।

23 verses

Adhyaya 212

Adhyaya 212

Dīṇḍimeśvaranāmotpattiḥ (Origin of the Name Dīṇḍimeśvara) / The Etiology of Dindimeshvara

मार्कण्डेय बताते हैं कि महेश्वर भिक्षु-रूप धारण कर भूख-प्यास से व्याकुल होकर एक गाँव में प्रवेश करते हैं। उनके अंग भस्म से लिप्त हैं, गले में अक्षसूत्र है, हाथ में त्रिशूल, जटाएँ और आभूषण हैं; वे डमरू बजाते हैं, जिसकी ध्वनि दिण्डिम (नगाड़े) के समान कही गई है। बच्चों और नगरवासियों से घिरे वे कभी गीत, कभी हास, कभी वचन और कभी नृत्य करते हुए ऐसे विचरते हैं कि देखने वालों को कभी दिखाई देते, कभी ओझल हो जाते हैं। एक चेतावनी भी दी जाती है—जहाँ-जहाँ वे खेल में अपना वाद्य रख देते हैं, वह घर ‘भारग्रस्त’ होकर नष्ट हो जाता है; यह देवता के प्रति असम्मान, पहचान में भूल, या दिव्य-संस्पर्श की असंयमित शक्ति के दुष्परिणाम का संकेत है। जब लोग भक्ति से शंकर की स्तुति करने लगते हैं, तब प्रभु ‘दिण्डिम-रूप’ में प्रकट होते हैं और तभी से उनका नाम दिण्डिमेश्वर प्रसिद्ध होता है। इस रूप/स्थान के दर्शन और स्पर्श से समस्त पापों से मुक्ति का फल कहा गया है।

10 verses

Adhyaya 213

Adhyaya 213

Āmaleśvara-Māhātmya: Śambhu in Child-Form and the Fruit of Worship (आमलेश्वर-माहात्म्य)

श्री मार्कण्डेय एक संक्षिप्त, परन्तु गूढ़ धर्मोपदेशयुक्त प्रसंग सुनाते हैं। वे देव के “महान चरित” का वर्णन करते हुए कहते हैं कि इसका श्रवण मात्र भी समस्त पापों का नाश कर देता है—यही इस अध्याय की फलश्रुति है। कथा में शम्भु (शिव) बालक-रूप धारण कर गाँव के लड़कों के साथ आँवले (आमलक) के फलों से खेलते हैं। लड़के फल फेंकते हैं और शिव क्षणभर में उन्हें उठा कर फिर लौटा देते हैं; खेल दिशाओं-दिशाओं में फैलता जाता है, तब बालक समझते हैं कि यह आँवला ही परमेेश्वर का स्वरूप है। अंत में बताया जाता है कि समस्त स्थानों में श्रेष्ठ तीर्थ “आमलेश्वर” है, जहाँ एक बार भी श्रद्धापूर्वक पूजा करने से परम पद की प्राप्ति होती है।

6 verses

Adhyaya 214

Adhyaya 214

Devamārga–Balākeśvara Māhātmya (कन्थेश्वर–बलाकेश्वर–देवमार्ग माहात्म्य)

इस अध्याय में मार्कण्डेय शैव तीर्थ की उत्पत्ति और महिमा का वर्णन करते हैं। आरम्भ में फलश्रुति है कि इस कथा का केवल श्रवण भी समस्त पापों से मुक्त कर देता है। शिव कपाली/कान्तिक रूप में भैरव-स्वरूप, पिशाच-राक्षस-भूत-डाकिनी-योगिनियों से घिरे, प्रेतासन पर स्थित और घोर तप करते हुए भी तीनों लोकों को अभय देने वाले बताए गए हैं। आषाढ़ी अवसर पर शिव की कन्था (चोगा) जहाँ गिरती है, वहाँ वे ‘कन्थेश्वर’ कहलाते हैं; उनके दर्शन से अश्वमेध-यज्ञ के समान पुण्य कहा गया है। फिर देवमार्ग पर इच्छा और अनुग्रह का उपदेशात्मक प्रसंग आता है। शिव एक वणिक से मिलकर ‘बलाक’ द्वारा लिंग को भरने/ऊँचा करने की परीक्षा रखते हैं; लोभ और मोह में वह अपना संचित धन-सम्पदा खर्च कर देता है। शिव हास्यपूर्वक लिंग को खण्डित कर ‘पूर्णता’ के अभिमान को तोड़ते हैं; वणिक के स्वीकार और पश्चात्ताप पर उसे अक्षय धन का वर देते हैं। बलाकों से अलंकृत वह लिंग लोक-कल्याण हेतु ‘प्रत्यय’ रूप में वहीं प्रतिष्ठित रहता है और स्थान ‘देवमार्ग’ तथा देवता ‘बलाकेश्वर’ के नाम से प्रसिद्ध होते हैं। वहाँ दर्शन-पूजन से पापक्षय होता है; देवमार्ग पर पञ्चायतन-भाव से बलाकेश्वर की आराधना रुद्रलोक देती है, और साधक की वहाँ मृत्यु होने पर रुद्रलोक से पुनरागमन नहीं होता।

18 verses

Adhyaya 215

Adhyaya 215

Śṛṅgitīrtha-Māhātmya (Glory of Śṛṅgī Tīrtha): Mokṣa and Piṇḍadāna

इस अध्याय में श्री मार्कण्डेय का संक्षिप्त उपदेश है कि देहधारी जीवों के लिए मोक्षदायी श्रीङ्गितीर्थ की यात्रा करनी चाहिए। तीर्थ को “मोक्षद” कहा गया है और स्पष्ट आश्वासन दिया गया है कि जो वहाँ देह त्याग करता है, वह निःसंदेह मोक्ष को प्राप्त होता है। इसी स्थान को पितृ-कर्तव्य से भी जोड़ा गया है। वहाँ पिण्डदान करने से मनुष्य पितृऋण से मुक्त (अनृण) हो जाता है; और उस पुण्य के प्रभाव से शुद्ध होकर “गाणेश्वरी गति” नामक, शैव परलोक-व्यवस्था में उच्च स्थिति को प्राप्त करता है। इस प्रकार अध्याय तीर्थयात्रा, मोक्ष और पितृधर्म को एक ही स्थान-आधारित मार्गदर्शन में समेटता है।

2 verses

Adhyaya 216

Adhyaya 216

Aṣāḍhī Tīrtha Māhātmya (Glory of the Aṣāḍhī Sacred Ford)

मार्कण्डेय राज-सम्बोधित श्रोता से कहते हैं कि वह अषाढ़ी तीर्थ के पास जाए, जहाँ महेश्वर “कामिक” (इच्छा-पूर्ति करने वाले) रूप में सन्निहित हैं। फिर वे इस तीर्थ की महिमा बढ़ाते हुए बताते हैं कि यह “चातुर्युग” है—चारों युगों में समान रूप से फल देने वाला—और पवित्र स्थलों में अद्वितीय है। फलश्रुति में कहा गया है कि इस तीर्थ में स्नान करने से मनुष्य रुद्र का परिचर बनता है, अर्थात् शिव-लोक के निकट सेवा-भाग्य प्राप्त करता है। आगे मृत्यु-सम्बन्धी सिद्धान्त बताया गया है कि जो यहाँ देह त्यागता है, उसकी गति अपरिवर्तनीय होती है; निःसंदेह वह रुद्रलोक को प्राप्त होता है। इस प्रकार अध्याय तीर्थ-यात्रा, स्नान-कर्म और मोक्ष-आश्वासन को संक्षेप में धर्मनिष्ठ भक्तों के लिए एक मार्गदर्शक रूप में प्रस्तुत करता है।

3 verses

Adhyaya 217

Adhyaya 217

एरण्डीसङ्गमतīर्थमाहात्म्य (Glory of the Eraṇḍī Confluence Tīrtha)

इस अध्याय में मुनि मार्कण्डेय संक्षेप में तीर्थ-उपदेश देते हैं। वे एरण्डी-संगम को देवों और असुरों द्वारा पूजित, अत्यन्त पवित्र और विशेष संगम-तीर्थ बताकर उसकी महिमा स्थापित करते हैं। यात्री को इन्द्रियों और मन का संयम रखते हुए उपवास करना तथा विधि के अनुसार स्नान करना कहा गया है। इस आचरण से शुद्धि होती है और ब्रह्महत्या जैसे घोर पाप-भार से भी मुक्ति का प्रतिपादन किया गया है। अन्त में फलश्रुति है कि जो भक्त इस तीर्थ में देह त्याग करता है, वह निःसन्देह रुद्रलोक को प्राप्त होकर अनिवर्तिका गति—अर्थात् पुनरावृत्ति-रहित मार्ग—को पाता है।

3 verses

Adhyaya 218

Adhyaya 218

जमदग्नितीर्थ-माहात्म्यं तथा कार्तवीर्यार्जुन-परशुराम-चरितम् (Jamadagni Tīrtha Māhātmya and the Kārtavīrya–Paraśurāma Narrative)

मार्कण्डेय युधिष्ठिर से अत्यन्त प्रशंसित जमदग्नि-तीर्थ का वर्णन करते हैं, जहाँ जनार्दन/वासुदेव की मानव-रूप में कल्याणकारी लीला से सिद्धि का प्रसंग जुड़ा है। आगे हैहय-नरेश सहस्रबाहु कार्तवीर्य अर्जुन शिकार के समय जमदग्नि के आश्रम में आता है। कामधेनु/सुरभि के चमत्कार से ऋषि अतिथि-सत्कार करते हैं; समृद्धि का कारण जानकर राजा उस गाय की माँग करता है और असंख्य साधारण गायें देने पर भी जमदग्नि अस्वीकार कर देते हैं। तब संघर्ष छिड़ता है—जमदग्नि तपोबल से ‘ब्रह्म-दण्ड’ का प्रयोग करते हैं और कामधेनु के शरीर से शस्त्रधारी गण प्रकट होकर युद्ध बढ़ा देते हैं। अंततः कार्तवीर्य और उसके सहायक क्षत्रिय जमदग्नि का वध कर देते हैं; इससे परशुराम प्रतिशोध का व्रत लेते हैं—बार-बार क्षत्रिय कुलों का संहार करते हुए समन्तपञ्चक में पाँच रक्त-सरों की रचना कर पितृ-तर्पण पूर्ण करते हैं। बाद में पितृगण और ऋषि संयम का उपदेश देते हैं और उन सरोवरों के आसपास का प्रदेश पुण्य-क्षेत्र के रूप में प्रतिष्ठित होता है। अध्याय के अंत में नर्मदा–सागर संगम पर कर्म-विधि बताई गई है—प्रत्यक्ष स्पर्श से सावधानी, स्पर्शन के मंत्र, स्नान, अर्घ्य-दान और विसर्जन; तथा यह फल कहा गया है कि जो भक्त जमदग्नि-रेणुका का दर्शन कर श्रद्धा से ये विधियाँ करते हैं, वे पवित्र होते हैं, पितरों का उद्धार करते हैं और दिव्य लोक में शुभ निवास पाते हैं।

57 verses

Adhyaya 219

Adhyaya 219

Koṭīśvara Tīrtha Māhātmya (कोटीश्वरतीर्थमाहात्म्य) — Multiplication of Merit at Koṭīśvara on the Narmadā

इस अध्याय में मुनि मार्कण्डेय नर्मदा के दक्षिण तट पर स्थित परम तीर्थ कोटीश्वर का माहात्म्य और तत्त्व-विचार बताते हैं। यहाँ स्नान, दान तथा सामान्यतः कोई भी कर्म—शुभ हो या अशुभ—‘कोटि-गुण’ होकर, अर्थात् करोड़ गुना फल देने वाला कहा गया है। कोटीतीर्थ की प्रामाणिकता के लिए पूर्व उदाहरण दिए जाते हैं—देव, गन्धर्व और शुद्ध ऋषि यहाँ दुर्लभ सिद्धि को प्राप्त हुए। इसी स्थल पर महादेव ‘कोटीश्वर’ रूप में प्रतिष्ठित हैं; देवादिदेवेश के केवल दर्शन मात्र से भी अनुपम सिद्धि की प्राप्ति बताई गई है। अध्याय में एक दिशात्मक-धार्मिक भूगोल भी स्थापित होता है—दक्षिण मार्ग के तपस्वियों का सम्बन्ध पितृलोक से, और नर्मदा के उत्तर तट के श्रेष्ठ मुनियों का सम्बन्ध देवलोक से माना गया है; इसे शास्त्रीय निर्णय कहा गया है। इस प्रकार यह अध्याय स्थल-माहात्म्य, कर्म-फल की वृद्धि, और नदी-तट की लोक-व्यवस्था को एक साथ जोड़ता है।

6 verses

Adhyaya 220

Adhyaya 220

लोटणेश्वर-रेवासागर-सङ्गम-माहात्म्य (Lotaneśvara at the Revā–Sāgara Confluence: Ritual Procedure and Merit)

मार्कण्डेय राजश्रोता को लोटणेश्वर तीर्थ का निर्देश देते हैं। यह नर्मदा के उत्तरी तट पर स्थित परम शैव तीर्थ है, जिसके दर्शन और पूजन से अनेक जन्मों के संचित पाप भी नष्ट हो जाते हैं। नर्मदा की पावनता सुनकर युधिष्ठिर पूछते हैं कि ऐसा एक कौन-सा श्रेष्ठ तीर्थ है जो सभी तीर्थों का फल दे; उत्तर रेवासागर-संगम पर केंद्रित है—समुद्र श्रद्धापूर्वक रेवा (नर्मदा) का स्वागत करता है और समुद्र में लिंग-प्रादुर्भाव का वर्णन नर्मदा-माहात्म्य को लिंगोत्पत्ति-तत्त्व से जोड़ता है। अध्याय में विधि-क्रम बताया गया है—कार्तिक व्रत, विशेषतः चतुर्दशी का उपवास, नर्मदा-स्नान, तर्पण और श्राद्ध, रात्रि-जागरण सहित लोटणेश्वर-पूजा, तथा प्रातः समुद्र-आवाहन और स्नान के मंत्रों सहित स्नान-विधान। स्नान के बाद एक विशेष ‘लोटन/लुठन’ परीक्षा आती है, जिसमें यात्री लुढ़ककर अपने पाप-कर्म या धर्म-कर्म का संकेत जानता है; फिर विद्वान ब्राह्मणों और लोकपाल-प्रतिनिधियों के समक्ष पूर्व दुष्कृत्यों की स्वीकारोक्ति कर पुनः स्नान करके विधिवत श्राद्ध करता है। फलश्रुति में संगम-स्नान और लोटणेश्वर-पूजन से अश्वमेध-सम पुण्य, दान-श्राद्ध से महान स्वर्गफल, तथा भक्तिपूर्वक श्रवण-पाठ से रुद्रलोक-प्राप्ति और मोक्षाभिमुख फल का प्रतिपादन है।

55 verses

Adhyaya 221

Adhyaya 221

Haṃseśvara-Tīrtha Māhātmya (The Glory of the Haṃseśvara Sacred Ford)

मार्कण्डेय युधिष्ठिर को रेवा (नर्मदा) के दक्षिण तट पर मातृतिर्थ से दो क्रोश दूर स्थित एक श्रेष्ठ तीर्थ बताते हैं—हंसेश्वर, जो मन के वैमनस्य और विषाद को नष्ट करने वाला कहा गया है। इस अध्याय में उसी तीर्थ की उत्पत्ति-कथा आती है। कश्यप-वंश में जन्मा एक हंस, जो ब्रह्मा का वाहन माना जाता था, दक्ष-यज्ञ के उपद्रव के समय भय से बिना आज्ञा भाग गया। ब्रह्मा ने उसे बुलाया, पर वह न लौटा; तब अप्रसन्न होकर ब्रह्मा ने शाप दिया, जिससे हंस का पतन हुआ। शाप से पीड़ित हंस ब्रह्मा की शरण में गया, पशु-स्वभाव की सीमा बताकर अपना अपराध स्वीकार किया और स्वामी-त्याग के लिए क्षमा माँगी। उसने ब्रह्मा की दीर्घ स्तुति की—उन्हें एकमात्र सृष्टिकर्ता, ज्ञान के स्रोत, धर्म-अधर्म के नियन्ता तथा शाप और अनुग्रह की शक्ति का मूल कहा। तब ब्रह्मा ने उपदेश दिया कि तप से शुद्ध होकर रेवा में स्नान-सेवा करे और तट पर महादेव/त्र्यम्बक की स्थापना करे। कहा गया कि वहाँ शिव-प्रतिष्ठा से अनेक यज्ञों और महान दानों का फल मिलता है और भारी पाप भी छूट जाते हैं। हंस ने तप किया, अपने नाम से शंकर की स्थापना कर उन्हें ‘हंसेश्वर’ कहा, पूजा की और उत्तम गति पाई। अंत में फलश्रुति में हंसेश्वर-तीर्थ की यात्रा का विधान है—स्नान, पूजन, स्तुति, श्राद्ध, दीपदान, ब्राह्मण-भोजन तथा समय-नियम से शिव-पूजा। इससे पापों से मुक्ति, निराशा का नाश, स्वर्ग में सम्मान और उचित दानों सहित शिवलोक में दीर्घ निवास का फल बताया गया है।

27 verses

Adhyaya 222

Adhyaya 222

तिलादा-तीर्थमाहात्म्य / Tilādā Tīrtha Māhātmya (The Glory of the Tilādā Pilgrimage Site)

मार्कण्डेय एक श्रेष्ठ तीर्थ ‘तिलादा’ का वर्णन करते हैं, जो एक क्रोश की यात्रा-सीमा में स्थित है। वहाँ जाबालि ‘तिलप्राशन’ और दीर्घ तपस्या से शुद्धि प्राप्त करता है। परन्तु उसका पूर्व जीवन दोषपूर्ण था—माता-पिता का परित्याग, अनुचित कामना, छल-कपट और लोकनिन्दित कर्मों के कारण वह जन-निन्दा और समाज-बहिष्कार का पात्र बना। तब वह तीर्थयात्रा करता हुआ नर्मदा में बार-बार स्नान करता है और अणिवापान्त के निकट दक्षिण तट पर निवास करता है। वहाँ वह तिल (तिल/तिलकण) को आधार बनाकर क्रमशः कठोर व्रत करता है—एकभक्त, एकान्तर, तीन/छह/बारह दिन के नियम, पक्ष और मास के व्रत, तथा कृच्छ्र और चान्द्रायण जैसे महाव्रत; अनेक वर्षों तक यह साधना चलती रहती है। अंततः ईश्वर प्रसन्न होकर उसे पवित्रता और सालोक्य (भगवत्-लोक में सहवास) प्रदान करते हैं। जाबालि द्वारा स्थापित देव ‘तिलादेश्वर’ कहलाते हैं और तिलादा तीर्थ पाप-नाशक के रूप में प्रसिद्ध होता है। अध्याय में विधि भी कही गई है—चतुर्दशी, अष्टमी और हरि के दिन विशेष पूजन; तिल-हवन, तिल-लेपन, तिल-स्नान और तिलोदक का प्रयोग। लिङ्ग में तिल भरना और तिल-तेल का दीप जलाना रुद्रलोक-प्राप्ति तथा सात पीढ़ियों की शुद्धि का फल देता है। श्राद्ध में तिल-पिण्ड देने से पितर दीर्घकाल तक तृप्त रहते हैं और पिता, माता तथा पत्नी—इन तीन कुलों का उद्धार बताया गया है।

16 verses

Adhyaya 223

Adhyaya 223

Vāsava Tīrtha Māhātmya (वसवतीर्थमाहात्म्य) — Foundation by the Eight Vasus and the Merit of Śiva-Pūjā

मार्कण्डेय ने नर्मदा-तट के एक क्रोश-परिमाण क्षेत्र में स्थित परम तीर्थ ‘वासव’ का वर्णन किया, जिसे अष्ट वसुओं ने प्रतिष्ठित किया था। धरा, ध्रुव, सोम, आप, अनिल, अनल, प्रत्युष और प्रभास—ये वसु पितृ-शाप से पीड़ित होकर ‘गर्भवास’ के दुःख में पड़े थे। मुक्ति की कामना से वे नर्मदा के इस तीर्थ पर आए और भवानिपति महादेव की कठोर तपस्या व आराधना करने लगे। बारह वर्ष बाद शिव साक्षात प्रकट हुए, वरदान देकर उन्हें अनुगृहीत किया; वसुओं ने अपने नाम से वहाँ शिव की स्थापना की और आकाशमार्ग से प्रस्थान किया, तब से वह स्थान ‘वासव-तीर्थ’ कहलाया। इस अध्याय में भक्ति-नीति भी कही गई है—इस तीर्थ पर यथाशक्ति शिव-पूजा करें; पत्र, पुष्प, फल, जल आदि जो उपलब्ध हो उससे अर्चना करें, विशेषकर दीप-दान अत्यन्त पुण्यदायक है। शुक्ल पक्ष की अष्टमी को विशेष महत्त्व बताया गया है, या सामर्थ्य अनुसार नियमित पूजा का विधान है। फलश्रुति में शिव-सामीप्य, गर्भवास से रक्षा, दरिद्रता व शोक का नाश, स्वर्ग में सम्मान तथा एक दिन के निवास मात्र से भी पाप-क्षय कहा गया है। अंत में ब्राह्मण-भोजन, वस्त्र-दान और दक्षिणा देने का धर्म बताया गया है।

11 verses

Adhyaya 224

Adhyaya 224

Koṭīśvara Tīrtha Māhātmya (कोटीश्वरतीर्थमाहात्म्य) — The Merit of Koṭīśvara at the Revā–Ocean Confluence

मार्कण्डेय युधिष्ठिर से रेवासागर-संगम के निकट, एक क्रोश-परिसर में स्थित परम तीर्थ ‘कोटीश्वर’ का माहात्म्य कहते हैं। यहाँ स्नान, दान, जप, होम और शिव-पूजन भक्तिपूर्वक किया जाए तो उसका फल ‘कोटि-गुण’ होकर बढ़ जाता है—यही इस अध्याय का मुख्य सिद्धान्त है। रेवाऔर समुद्र के अद्भुत मिलन-दर्शन हेतु देव, गन्धर्व, ऋषि, सिद्ध और चारण भी वहाँ एकत्र होते हैं। विधि यह है कि स्नान के बाद श्रद्धानुसार शिव (कोटीश्वर) की स्थापना कर बिल्वपत्र, अर्क-पुष्प, ऋतु-सम्बन्धी अर्पण, धतूरा, कुश आदि से मंत्रोच्चार सहित उपचार, धूप-दीप और नैवेद्य द्वारा अर्चना की जाए। इस तीर्थ से जुड़े यात्रियों और तपस्वियों को पितृलोक, देवलोक आदि उत्तम गतियों का आश्वासन दिया गया है। पौष कृष्ण अष्टमी विशेष पुण्यदायिनी बताई गई है; साथ ही चतुर्दशी और अष्टमी को व्रत-पूजन तथा योग्य ब्राह्मणों को भोजन कराना प्रशस्त कहा गया है।

12 verses

Adhyaya 225

Adhyaya 225

Alikā’s Austerity at Revā–Sāgara Saṅgama and the Manifestation of Alikeśvara (अलिकेश्वर-माहात्म्य)

मार्कण्डेय युधिष्ठिर से एक तीर्थ-केंद्रित धर्मसंकट और उसके समाधान का वर्णन करते हैं। चित्रसेन-वंश से जुड़ी गन्धर्वी अलिका ऋषि विद्यानन्द के साथ दस वर्ष रहती है, पर किसी कारणवश सोए हुए पति का वध कर देती है। वह पिता रत्नवल्लभ को बताती है, किन्तु माता-पिता उसे कठोर धिक्कार देकर घर से निकाल देते हैं और उसे पतिघ्नी, गर्भघ्नी, ब्रह्मघ्नी आदि पापों से कलंकित मानते हैं। दुःख से व्याकुल अलिका ब्राह्मणों से प्रायश्चित्त-तीर्थ पूछती है। वे रेवासागर-संगम के पापहर तीर्थ का निर्देश देते हैं। वहाँ वह निराहार, व्रत-नियम, कृच्छ्र/अतिकृच्छ्र और चान्द्रायण आदि तप, तथा शिव-ध्यान और पूजन लंबे समय तक करती है। पार्वती की प्रेरणा से प्रसन्न होकर शिव प्रकट होते हैं, उसे शुद्ध घोषित करते हैं और वर देते हैं कि वह वहीं अपने नाम से उनकी स्थापना करे तथा अंत में स्वर्ग को प्राप्त हो। अलिका स्नान कर शंकर की प्रतिष्ठा करती है—यह स्थल ‘अलिकेश्वर’ के रूप में प्रसिद्ध होता है। वह ब्राह्मणों को दान देती है, परिवार से पुनर्मिलन होता है और अंततः दिव्य विमान से गौरी-लोक को जाती है। फलश्रुति में कहा है कि यहाँ स्नान और उमा सहित महादेव-पूजन से मन-वचन-काय के पाप नष्ट होते हैं; द्विज-भोजन और दीपदान से रोग शान्त होते हैं; तथा धूपपात्र, विमान-प्रतिमा, घंटा और कलश का दान उच्च स्वर्ग-प्राप्ति कराता है।

22 verses

Adhyaya 226

Adhyaya 226

Vimaleśvara-Tīrtha Māhātmya (विमलेश्वरतीर्थमाहात्म्य) — The Glory of the Vimaleśvara Sacred Site

मार्कण्डेय अवन्ती-खण्ड में विमलेश्वर नामक एक महातीर्थ का वर्णन करते हैं, जो एक क्रोश-परिसर में स्थित है और स्नान, पूजा तथा तप के द्वारा पाप-शुद्धि और मनोवांछित फल देने वाला माना गया है। इसकी महिमा उदाहरणों से कही गई है—त्वष्टा के पुत्र त्रिशिरा का वध करने के बाद इन्द्र ने यहाँ स्नान कर शुद्धि पाई; एक तपस्वी ब्राह्मण तप से तेजस्वी और निर्मल हुआ; भानु ने कठोर तप और शिव-कृपा से विकृत रोग से मुक्ति पाई। विभाण्डक के पुत्र (ऋष्यशृंग) ने समाज-संग से उत्पन्न अशौच को पहचानकर पत्नी शान्ता सहित रेवा–सागर संगम पर बारह वर्ष का नियम किया; कृच्छ्र और चान्द्रायण व्रतों से त्र्यम्बक को प्रसन्न कर ‘वैमल्य’ प्राप्त किया। दारुवन प्रसंग में शर्वाणी की प्रेरणा से शिव नर्मदा–सागर संगम पर शुद्ध स्थान स्थापित करते हैं और लोक-कल्याणकारी रूप से ‘विमलेश्वर’ नाम का अर्थ बताते हैं। ब्रह्मा द्वारा तिलोत्तमा की सृष्टि से उत्पन्न नैतिक विचलन मौन, त्रिवार स्नान, शिव-स्मरण और संगम-पूजन से शांत होकर पुनः पवित्रता लौट आती है। अंत में विधान दिया गया है—यहाँ स्नान और शिव-पूजा पाप हरकर ब्रह्मलोक तक ले जाती है; अष्टमी, चतुर्दशी और उत्सव-दिनों में उपवास-दर्शन से दीर्घकालीन पाप नष्ट होकर शिवधाम मिलता है; विधिपूर्वक श्राद्ध से पितृऋण उतरता है। स्वर्ण, अन्न, वस्त्र, छत्र, पादुका, कमण्डलु का दान, भक्ति-गीत, नृत्य, पाठ तथा मंदिर-निर्माण (विशेषतः राजाओं के लिए) महान पुण्य कहा गया है।

23 verses

Adhyaya 227

Adhyaya 227

Revā-Māhātmya and Narmadā-Yātrā Vidhi (Expiatory Rules and Yojana Measure)

इस अध्याय में संवाद के रूप में मार्कण्डेय युधिष्ठिर से रेवा/नर्मदा की अद्वितीय पवित्रता का वर्णन करते हैं। वे उसे महादेव की प्रिया, ‘माहेश्वरी गंगा’ तथा ‘दक्षिण गंगा’ कहते हैं और बताते हैं कि अविश्वास, निन्दा और असम्मान से साधना का फल नष्ट हो जाता है। शास्त्रानुसार आचरण और श्रद्धा-युक्त कर्म ही सिद्धिदायक है; मनमानी और कामना-प्रेरित आचरण से अपेक्षित फल नहीं मिलता। इसके बाद नर्मदा-यात्रा की आचार-संहिता दी जाती है—ब्रह्मचर्य, अल्पाहार, सत्य, छल-कपट से दूरी, विनय, तथा हानिकारक संगति का त्याग। तीर्थकर्मों में स्नान, देवपूजन, जहाँ उचित हो वहाँ श्राद्ध/पिण्डदान, और सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मण-भोजन/दान का विधान बताया गया है। फिर प्रायश्चित्त का क्रम आता है—यात्रा की दूरी (विशेषतः 24 योजन) को कृच्छ्र आदि प्रायश्चित्त-फलों से जोड़ा गया है, और संगमों व प्रसिद्ध स्थलों पर फल की वृद्धि गुणित रूप में कही गई है। अंत में अङ्गुल, वितस्ति, हस्त, धनु, क्रोश, योजन आदि मापों की परिभाषा तथा नदियों की चौड़ाई/परिमाण के अनुसार श्रेणीकरण देकर रेवा-यात्रा को एक सुव्यवस्थित शुद्धि-प्रक्रिया के रूप में स्थापित किया गया है।

67 verses

Adhyaya 228

Adhyaya 228

परार्थतीर्थयात्राफलनिर्णयः | Determining the Merit of Pilgrimage Performed for Another

अध्याय 228 में धर्मप्रधान संवाद है। युधिष्ठिर मुनि मार्कण्डेय से पूछते हैं कि किसी दूसरे के हित के लिए (परार्थ) की गई तीर्थ-यात्रा का फल कितना होता है। मुनि कर्म-कर्तृत्व का क्रम बताते हैं—श्रेष्ठ यह कि मनुष्य स्वयं धर्म करे; असमर्थ होने पर अपने समान वर्ण (सवर्ण) या निकट संबंधियों से विधिपूर्वक कराए, पर अनुचित व्यक्ति से करवाने पर फल में कमी आती है। इसके बाद प्रतिनिधि-यात्रा और संयोगवश हुई यात्रा के फल का अनुपात बताया जाता है, तथा पूर्ण यात्रा और केवल स्नान के फल में भेद स्पष्ट किया जाता है। माता-पिता, वृद्धजन, गुरु और विस्तृत कुटुम्ब आदि पात्र बताए गए हैं और संबंध की निकटता के अनुसार पुण्य का अंश निर्धारित है—माता-पिता को अधिक, दूर के संबंधियों को कम। अंत में ऋतु-काल के अनुसार कुछ समय नदियों को ‘रजस्वला’ मानकर जलकर्म में सावधानी का निर्देश है, साथ ही कुछ नदियों/अवसरों के अपवाद भी नाम लेकर बताए गए हैं।

18 verses

Adhyaya 229

Adhyaya 229

नर्मदाचरितश्रवणफलप्रशंसा | Praise of the Fruits of Hearing the Narmadā Narrative

इस अध्याय में मार्कण्डेय ऋषि राजा/भूपाल से उपसंहार-भाव में धर्मतत्त्व कहते हैं कि दिव्य सभा में कही गई, शिव को प्रिय यह पुराण-कथा अब संक्षेप में तुम्हें सुनाई गई है। वे बताते हैं कि नर्मदा के आदि, मध्य और अंत—सर्वत्र असंख्य तीर्थ फैले हुए हैं। फिर फलश्रुति आती है—नर्मदा-चरित का श्रवण विस्तृत वेद-पाठ और बड़े-बड़े यज्ञों से भी अधिक पुण्य देने वाला है, तथा अनेक तीर्थों में स्नान के समान फलदायक है। इससे शिवलोक की प्राप्ति और रुद्रगणों का संग मिलता है; नर्मदा-तीर्थों का दर्शन, स्पर्श, स्तुति या केवल श्रवण भी पापों का नाश करता है। वर्णों और स्त्रियों के लिए भी इसके लाभ बताए गए हैं, और कहा गया है कि घोर पाप भी नर्मदा-माहात्म्य सुनने से शुद्ध हो जाते हैं। अंत में पूजन-उपहारों से सेवा, ग्रंथ लिखकर द्विज को दान देने की प्रशंसा तथा सर्वजन-कल्याण की मंगल-प्रार्थना के साथ रेवा/नर्मदा को जगत्-पावनी और धर्म-प्रदा कहा गया है।

28 verses

Adhyaya 230

Adhyaya 230

Revā-Tīrthāvalī-Prastāvaḥ (Introduction to the Catalogue of Revā Tīrthas)

अध्याय 230 रेवातीर्थों की विस्तृत सूची का कार्यक्रमात्मक प्रस्ताव और संक्षिप्त अनुक्रमणिका है। सूत, मार्कण्डेय के नाम से प्राप्त उपदेश को सुनाते हुए, पूर्व कथा का उपसंहार करते हैं और कहते हैं कि रेवामाहात्म्य का सार पहले ही कहा जा चुका है; अब ओंकार से आरम्भ होने वाली शुभ ‘तीर्थावली’ का वर्णन किया जाएगा। आरम्भ में सोम, महेश, ब्रह्मा, अच्युत, सरस्वती, गणेश और देवी की वंदना करके दिव्य पावनी नर्मदा को विशेष प्रणाम किया जाता है। इसके बाद कथा-विस्तार के स्थान पर तीर्थ-नामों, संगम-स्थलों, आवर्तों, लिंग-स्थापनों तथा पवित्र वन-आश्रमों का घना क्रम तेजी से गिनाया जाता है—यह एक मार्गदर्शक रजिस्टर की तरह है। अंत में पाठ-विधि और फलश्रुति दी गई है: यह तीर्थावली सज्जनों के कल्याण हेतु रची गई है; इसके पाठ से दिन, मास, ऋतु और वर्ष भर के पापों का शमन होता है, श्राद्ध और पूजा में विशेष सिद्धि मिलती है, परिवार-समेत शुद्धि और प्रसिद्ध कर्मकाण्डों के तुल्य पुण्य प्राप्त होता है।

113 verses

Adhyaya 231

Adhyaya 231

Revātīrtha-stabaka-nirdeśaḥ (Enumeration of Tīrtha Clusters on the Revā)

इस अध्याय में सूत, पार्थ को मार्कण्डेय द्वारा संक्षेप में बताए गए ‘रेवातीर्थ-स्तबक’—अर्थात् रेव (नर्मदा) के दोनों तटों पर स्थित तीर्थ-समूहों—का तकनीकी, सूची-शैली में वर्णन सुनाते हैं। रेव को ‘कल्पलता’ कहा गया है, जिसके पुष्प तीर्थ हैं; फिर ओंकारतीर्थ से लेकर पश्चिमी समुद्र तक संगमों की क्रमबद्ध गणना दी जाती है, उत्तर और दक्षिण तट के भेद सहित, और रेव–समुद्र संगम को सर्वोपरि बताया जाता है। आगे कुल संख्याएँ और वर्गीकरण आते हैं—प्रसिद्ध चार सौ तीर्थों सहित—और देवता-प्रकार के अनुसार बड़े शैव-समूहों के साथ वैष्णव, ब्राह्म और शाक्त समूहों का उल्लेख होता है। फिर अनेक संगमों, उपवनों, ग्रामों और प्रसिद्ध स्थलों पर गुप्त व प्रकट तीर्थों की परिमाण-सूचना (सैकड़ों से लेकर लाखों-करोड़ों तक) दी जाती है—जैसे कपिला-संगम, अशोकवनिका, शुक्लतीर्थ, महीष्मती, लुंकेश्वर, वैद्यनाथ, व्यासद्वीप, करंजा-संगम, धूतपाप, स्कन्दतीर्थ आदि—और अंत में कहा जाता है कि इन तीर्थों का पूर्ण विस्तार वर्णन से परे है।

55 verses

Adhyaya 232

Adhyaya 232

रेवामाहात्म्य-समापनम् (Conclusion of the Revā/Narmadā Māhātmya and Phalaśruti)

इस अध्याय में रेवाखण्ड के नर्मदा-माहात्म्य का विधिवत् समापन किया गया है। सूत ब्राह्मणों से कहते हैं कि मार्कण्डेय ने जो उपदेश पहले पाण्डु-पुत्र को दिया था, वही रेवामाहात्म्य उन्होंने यथाक्रम सुनाया है और तीर्थ-समूहों का क्रमबद्ध वर्णन पूर्ण हुआ। रेवाकथा और रेवाजल को अत्यन्त पवित्र, पापहर और कल्याणकारी बताया गया है; नर्मदा को शैव-प्रभव, लोकहित के लिए प्रतिष्ठित दिव्य धारा कहा गया है। रेवा के तीर्थों की घनता और श्रेष्ठता का अतिशय वर्णन करते हुए कहा गया है कि कलियुग में रेवास्मरण, पाठ और सेवा विशेष फलदायी हैं। फलश्रुति में श्रवण-पाठ को वेदाध्ययन और दीर्घ यज्ञों से भी बढ़कर बताया गया तथा कुरुक्षेत्र, प्रयाग, वाराणसी आदि प्रसिद्ध तीर्थों के समान पुण्य देने वाला कहा गया। ग्रन्थ-पूजन की मर्यादा भी बताई गई—लिखित ग्रन्थ को घर में रखना, वाचक और ग्रन्थ का दान-पूजन करना; इससे ऐहिक समृद्धि, समाज-कल्याण और परलोक में शिवलोक-सामीप्य प्राप्त होता है। घोर पाप भी निरन्तर श्रवण से शान्त होते हैं—अन्त में शिव से वायु, ऋषियों और सूत तक की परम्परा पुनः स्थापित की जाती है।

55 verses

FAQs about Reva Khanda

The section emphasizes the glory of the Revā/Narmadā as a purifying sacred presence whose banks and waters are treated as tīrtha-space, integrating hymn, doctrine, and pilgrimage cartography.

The discourse repeatedly frames Revā’s waters and riverbanks as instruments of removing dūrīta (moral and ritual impurity), presenting bathing, remembrance, and reverential approach as merit-generating ethical guidelines.

Chapter 1 introduces the inquiry into Revā’s location and Rudra-linked origin (śrī-rudra-sambhavā), setting up subsequent tīrtha narratives; it also embeds a meta-legend on Purāṇic authority and compilation attributed to Vyāsa and earlier divine transmission.