Adhyaya 130
Avanti KhandaReva KhandaAdhyaya 130

Adhyaya 130

इस अध्याय में ऋषि मार्कण्डेय नर्मदा (रेवा) के दक्षिण तट पर स्थित ‘देवतीर्थ’ नामक अनुपम पुण्य-तीर्थ का वर्णन करते हैं। देवगण वहाँ एकत्र होते हैं और परमेश्वर उस स्थान पर प्रसन्न होते हैं—इस दिव्य परंपरा से तीर्थ की पवित्रता और महिमा स्थापित की जाती है। साथ ही यात्री की नैतिक योग्यता बताई गई है: तीर्थ-स्नान काम (वासनाओं) और क्रोध से रहित होकर, शुद्ध मन से करना चाहिए। ऐसा स्नान करने वाले को गो-सहस्र दान के समान निश्चित पुण्य प्राप्त होता है—फलश्रुति द्वारा यह संदेश दिया गया है कि बाह्य स्नान तभी पूर्ण है जब अंतःकरण में संयम और शांति हो।

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