
इस अध्याय में श्री मार्कण्डेय ऋषि राजा को रेवाखण्ड के अंतर्गत एक संक्षिप्त तीर्थ-उपदेश देते हैं। वे उसे परम प्रसिद्ध भण्डारी-तीर्थ जाने की आज्ञा देते हैं और बताते हैं कि वहाँ का प्रभाव ऐसा है कि उन्नीस युगों तक ‘दारिद्र्य-च्छेद’—गरीबी का नाश—होता है। माहात्म्य का कारण भी कहा गया है—कुबेर (धनद) ने वहाँ तप किया; पद्मसम्भव ब्रह्मा प्रसन्न हुए और उसी स्थान पर अल्प दान से भी धन की रक्षा का वर प्रदान किया। इसलिए नियम बताया गया है कि जो भक्तिभाव से वहाँ जाकर स्नान करे और दान दे, उसके धन में क्षय या बाधा (वित्त-परिच्छेद) नहीं होती; समृद्धि का स्थैर्य संग्रह से नहीं, बल्कि तीर्थ, भक्ति और संयमित दान से होता है।
Verse 1
श्रीमार्कण्डेय उवाच । ततो गच्छेत राजेन्द्र भण्डारीतीर्थमुत्तमम् । दरिद्रच्छेदकरणं युगान्येकोनविंशतिः
श्री मार्कण्डेय बोले—तब, हे राजेन्द्र! उत्तम भण्डारी-तीर्थ को जाना चाहिए। वह उन्नीस युगों तक दरिद्रता का छेदन करने वाला प्रसिद्ध है।
Verse 2
धनदेन तपस्तप्त्वा प्रसन्ने पद्मसम्भवे । तत्रैव स्वल्पदानेन प्राप्तं वित्तस्य रक्षणम्
धनद ने तप करके पद्मसम्भव को प्रसन्न किया; और वहीं अल्प दान से उसने अपने धन की रक्षा प्राप्त की।
Verse 3
तत्र गत्वा तु यो भक्त्या स्नात्वा वित्तं प्रयच्छति । तस्य वित्तपरिच्छेदो न कदाचिद्भविष्यति
जो वहाँ भक्ति से जाकर स्नान करके दान में धन देता है, उसके धन का क्षय कभी भी नहीं होता।
Verse 107
। अध्याय
यह अध्याय समाप्त हुआ।