Adhyaya 64
Avanti KhandaReva KhandaAdhyaya 64

Adhyaya 64

इस अध्याय में मार्कण्डेय एक राजा से संवाद करते हुए उसे अवन्ती-खण्ड के अत्यन्त पुण्यदायक तीर्थ “अगस्त्येश्वर” की ओर प्रवृत्त करते हैं। इसे पाप-क्षय का स्थान-आधारित साधन बताया गया है, जहाँ श्रद्धा सहित किया गया आचरण नैतिक दोषों का निवारण करता है। यहाँ मुख्य विधि तीर्थ-स्नान की है, जिसे ब्रह्महत्या जैसे महापातकों की निवृत्ति से जोड़ा गया है। समय-निर्देश भी स्पष्ट है—कार्त्तिक मास, कृष्णपक्ष, चतुर्दशी को स्नान करने से काल, देश और कर्म एक ही धर्म-नियम में संयुक्त हो जाते हैं। आगे कहा गया है कि साधक समाहित चित्त और जितेन्द्रिय होकर घृत से देव का अभिषेक करे। साथ ही दान-विधान—धन, पादुका, छत्र, घृत-कम्बल तथा सबको भोजन कराना—इनसे पुण्यफल की वृद्धि बताई गई है। संदेश यह है कि तीर्थ-यात्रा केवल गमन नहीं, बल्कि नियम, भक्ति और उदारता से युक्त साधना है।

Shlokas

Verse 1

श्रीमार्कण्डेय उवाच । ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र तीर्थं परमशोभनम् । नराणां पापनाशाय अगस्त्येश्वरमुत्तमम्

श्रीमार्कण्डेय बोले—हे राजेन्द्र! तब उस परम शोभन तीर्थ में जाना चाहिए—अगस्त्येश्वर, जो मनुष्यों के पापों के नाश हेतु उत्तम ईश्वर हैं।

Verse 2

तत्र स्नात्वा नरो राजन्मुच्यते ब्रह्महत्यया । कार्त्तिकस्य तु मासस्य कृष्णपक्षे चतुर्दशी

हे राजन्! वहाँ स्नान करने से मनुष्य ब्रह्महत्या के पाप से भी मुक्त हो जाता है; विशेषतः कार्त्तिक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को।

Verse 3

घृतेन स्नापयेद्देवं समाधिस्थो जितेन्द्रियः । एकविंशतिकुलोपेतो च्यवेदैश्वरात्पदात्

समाधि में स्थित और इन्द्रियों को जीता हुआ साधक देव को घृत से स्नान कराए। इससे इक्कीस कुलों का उद्धार करने वाला पुण्य प्राप्त कर वह ऐश्वर्यपद से कभी नहीं गिरता।

Verse 4

धनं चोपानहौ छत्रं दद्याच्च घृतकम्बलम् । भोजनं चैव सर्वेषां सर्वं कोटिगुणं भवेत्

धन, पादुका/जूते, छत्र तथा घृत-भिगोया कंबल दान करे और सबको भोजन कराए; यह सब पुण्य में कोटिगुणा हो जाता है।

Verse 64

। अध्याय

॥ इति अध्याय समाप्ति-सूचक ॥