
इस अध्याय में श्री मार्कण्डेय संक्षेप में तीर्थ-माहात्म्य बताते हैं। नर्मदा (रेवा) के दक्षिण तट पर स्थित ‘रामेश्वर’ नामक अनुपम तीर्थ को पाप-हर, पुण्य-प्रद और सर्व-दुःख-नाशक कहा गया है। विधान यह है कि जो भक्त इस तीर्थ में स्नान करके महेश्वर—महादेव, महात्मा—की पूजा करता है, वह समस्त किल्बिष (दोष/अशुद्धि) से मुक्त हो जाता है। इस प्रकार स्थान, क्रम (स्नान के बाद पूजा) और फल (अशुद्धि-क्षय) को जोड़कर तीर्थ-यात्रा का संक्षिप्त मार्ग बताया गया है।
Verse 1
श्रीमार्कण्डेय उवाच । नर्मदादक्षिणे कूले रामेश्वरमनुत्तमम् । तीर्थं पापहरं पुण्यं सर्वदुःखघ्नमुत्तमम्
श्री मार्कण्डेय बोले—नर्मदा के दक्षिण तट पर अनुपम रामेश्वर है; वह उत्तम तीर्थ पवित्र है, पापों का नाश करने वाला और समस्त दुःखों का परम निवारक है।
Verse 2
तत्र तीर्थे तु ये स्नात्वा पूजयन्ति महेश्वरम् । महादेवं महात्मानं मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः
उस तीर्थ में जो स्नान करके महेश्वर—महादेव, महात्मा प्रभु—की पूजा करते हैं, वे समस्त कल्मषों और पापों से मुक्त हो जाते हैं।
Verse 134
। अध्याय
अध्याय। (अध्याय-चिह्न)