Adhyaya 113
Avanti KhandaReva KhandaAdhyaya 113

Adhyaya 113

इस अध्याय में मārkaṇḍेय राजाओं को यात्रा-मार्ग की भाँति निर्देश देते हैं और कोṭितीर्थ को अनुपम पवित्र तीर्थ बताते हैं। कथा यह स्मरण कराती है कि यहाँ अनेक ऋषियों ने परम सिद्धि प्राप्त की, इसलिए यह स्थान ‘ऋषिकोṭि’ के नाम से भी प्रसिद्ध हुआ। इसके बाद तीर्थ-विशेष से जुड़े तीन पुण्य-उपाय बताए गए हैं—(1) कोṭितीर्थ में स्नान करके ब्राह्मणों को भोजन कराना; एक ब्राह्मण को तृप्त करने का फल ‘कोṭि’ ब्राह्मणों को भोजन कराने के समान कहा गया है। (2) स्नान के बाद पितृदेवताओं का सम्मान/तर्पण-श्राद्ध, जिससे तीर्थयात्रा में पितृधर्म का समावेश होता है। (3) वहीं महादेव की पूजा करने से वाजपेय यज्ञ के समान फल की प्राप्ति बताई गई है। इस प्रकार यह अध्याय कोṭितीर्थ के लिए संक्षिप्त धर्म-चार्टर बनकर स्थान, कर्म और फलश्रुति को स्थापित करता है।

Shlokas

Verse 1

श्रीमार्कण्डेय उवाच । ततो गच्छेत्तु राजेन्द्र कोटितीर्थमनुत्तमम् । ऋषिकोटिर्गता तत्र परां सिद्धिमुपागता

श्री मार्कण्डेय बोले—तब, हे राजेन्द्र, अनुपम कोटितीर्थ में जाना चाहिए। वहाँ ऋषियों की एक कोटि ने परम सिद्धि प्राप्त की॥

Verse 2

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा भोजयेद्ब्राह्मणाञ्छुचिः । एकस्मिन्भोजिते विप्रे कोटिर्भवति भोजिता

उस तीर्थ में जो स्नान करके शुद्ध होकर ब्राह्मणों को भोजन कराए—वहाँ एक विद्वान ब्राह्मण को भोजन कराने से भी मानो एक कोटि को भोजन कराया जाता है॥

Verse 3

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा पूजयेत्पितृदेवताः । पूजिते तु महादेवे वाजपेयफलं लभेत्

उस तीर्थ में जो स्नान करके पितरों और देवताओं की पूजा करे—वहाँ महादेव की पूजा होने पर वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है॥

Verse 113

। अध्याय

इति अध्याय समाप्त।