Adhyaya 152
Avanti KhandaReva KhandaAdhyaya 152

Adhyaya 152

इस संक्षिप्त धार्मिक प्रसंग में मार्कण्डेय तीर्थयात्री को परम पावन भार्गलेश्वर-धाम जाने की प्रेरणा देते हैं। वे शंकर को “जगत का प्राण” बताते हैं और कहते हैं कि उनका केवल स्मरण भी पापों का नाश कर देता है (स्मृतमात्र-अघनाशन)। फिर इस तीर्थ के दो फल बताए गए हैं—(1) जो वहाँ स्नान करके परमेश्वर की पूजा करता है, उसे अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है; (2) जो उसी तीर्थ में प्राणत्याग करता है, वह “अनिवर्तिका गति” पाकर निःसंदेह रुद्रलोक को प्राप्त होता है। अध्याय का संदेश यह है कि शिवभक्ति, पवित्र स्थान और स्मरण—ये मोक्षदायी साधन बनकर पुराणों में विशेष महिमा पाते हैं।

Shlokas

Verse 1

श्रीमार्कण्डेय उवाच । ततो गच्छेद्धरापाल भार्गलेश्वरमुत्तमम् । शङ्करं जगतः प्राणं स्मृतमात्राघनाशनम्

श्री मार्कण्डेय बोले—हे धरापाल! तब उत्तम भार्गलेश्वर के पास जाना चाहिए—जगत् के प्राणस्वरूप शंकर, जो स्मरण मात्र से पाप का नाश करते हैं।

Verse 2

तत्र तीर्थे तु यः स्नात्वा पूजयेत्परमेश्वरम् । अश्वमेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः

जो मनुष्य उस तीर्थ में स्नान करके परमेश्वर की पूजा करता है, वह अश्वमेध यज्ञ के फल के समान पुण्य प्राप्त करता है।

Verse 3

तत्र तीर्थे तु यः कश्चित्प्राणत्यागं करिष्यति । अनिवर्तिका गतिस्तस्य रुद्रलोकादसंशयम्

उस तीर्थ में जो कोई प्राणत्याग करता है, उसकी गति अनिवर्तनीय हो जाती है; रुद्रलोक से उसका लौटना नहीं होता—निःसंदेह।

Verse 152

। अध्याय

“अध्याय”—यह ग्रन्थ में अध्याय-शीर्षक/समाप्ति-सूचक पद है।