Adhyaya 105
Avanti KhandaReva KhandaAdhyaya 105

Adhyaya 105

इस अध्याय में मुनि मार्कण्डेय ‘राजेन्द्र’ से करञ्जा तीर्थ जाने की विधि और उसका फल संक्षेप में कहते हैं। साधक को उपवास रखते हुए और इन्द्रियों को संयम में रखकर करञ्जा जाना चाहिए; वहाँ स्नान करने मात्र से वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। इसके बाद महादेव का भक्तिपूर्वक पूजन और श्रद्धा से दान करने का विधान बताया गया है। दान में सुवर्ण, रजत, मणि‑मुक्ता‑प्रवाल आदि तथा पादुका, छत्र, शय्या और आच्छादन जैसे उपयोगी पदार्थों का उल्लेख है। इस तीर्थसेवा, शैवपूजा और दानधर्म का फल ‘कोटि‑कोटि‑गुण’ बताया गया है।

Shlokas

Verse 1

श्रीमार्कण्डेय उवाच । करञ्जाख्यं ततो गच्छेत्सोपवासो जितेन्द्रियः । तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र सर्वपापैः प्रमुच्यते

श्री मार्कण्डेय बोले—फिर उपवास करके और इन्द्रियों को वश में रखकर करञ्जा नामक तीर्थ में जाए। हे राजेन्द्र, वहाँ स्नान करने से वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

Verse 2

अर्चयित्वा महादेवं दत्त्वा दानं तु भक्तितः । सुवर्णं रजतं वापि मणिमौक्तिकविद्रुमान्

महादेव की विधिपूर्वक पूजा करके, भक्तिभाव से दान दे—सोना, चाँदी अथवा मणि, मोती और मूँगा आदि।

Verse 3

पादुकोपानहौ छत्रं शय्यां प्रावरणानि च । कोटिकोटिगुणं सर्वं जायते नात्र संशयः

पादुका-उपानह, छत्र, शय्या और प्रावरण आदि जो भी दान दिया जाता है, वह सब कोटि-कोटि गुना फल देता है—इसमें संदेह नहीं।

Verse 105

। अध्याय

यहाँ अध्याय की समाप्ति।