Adhyaya 215
Avanti KhandaReva KhandaAdhyaya 215

Adhyaya 215

इस अध्याय में श्री मार्कण्डेय का संक्षिप्त उपदेश है कि देहधारी जीवों के लिए मोक्षदायी श्रीङ्गितीर्थ की यात्रा करनी चाहिए। तीर्थ को “मोक्षद” कहा गया है और स्पष्ट आश्वासन दिया गया है कि जो वहाँ देह त्याग करता है, वह निःसंदेह मोक्ष को प्राप्त होता है। इसी स्थान को पितृ-कर्तव्य से भी जोड़ा गया है। वहाँ पिण्डदान करने से मनुष्य पितृऋण से मुक्त (अनृण) हो जाता है; और उस पुण्य के प्रभाव से शुद्ध होकर “गाणेश्वरी गति” नामक, शैव परलोक-व्यवस्था में उच्च स्थिति को प्राप्त करता है। इस प्रकार अध्याय तीर्थयात्रा, मोक्ष और पितृधर्म को एक ही स्थान-आधारित मार्गदर्शन में समेटता है।

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