
The Section on the Netherworld
श्री पद्मपुराण का पाताल-खण्ड एक प्रमुख आख्यानात्मक और तत्त्वचिन्तनात्मक विभाग है, जिसमें पुराण-परम्परा की एक विशिष्ट ‘रामायण-धारा’ सुरक्षित है। इसकी कथा-रचना बहुस्तरीय संवादों से बुनी हुई है—अक्सर सूत से ऋषियों तक, और उसी के भीतर शेष (अनन्त) से वात्स्यायन तक—जिससे श्रवण करने वाले के भीतर श्रद्धा और बोध दोनों जाग्रत होते हैं। इस खण्ड की विशेष पहचान ‘राम-अश्वमेध’ प्रसंग-चक्र है, जहाँ लंका-विजय के बाद श्रीराम के अनुष्ठान, राज्य-स्थापन और राजधर्म की मर्यादा का विस्तार से निरूपण मिलता है। भक्ति के संदर्भ में श्रवण–स्मरण–कीर्तन की शुद्धिकारक शक्ति, तथा धर्म-आधारित शासन और लोक-कल्याण की भावना बार-बार उभरती है। रावण-वध, विभीषण का राज्याभिषेक, पुष्पक-विमान से अयोध्या-प्रत्यावर्तन, नन्दिग्राम की स्मृतियाँ—इन महाकाव्य-घटनाओं को यहाँ केवल इतिहास नहीं, बल्कि श्रीराम की धर्मनिष्ठा के ‘तत्त्व-प्रमाण’ और भक्तों के लिए पुण्य-उत्पादक साधन के रूप में पुनः पढ़ा जाता है। तप, संयम, और मर्यादा-पालन को आदर्श राजत्व और आदर्श भक्ति के अंग के रूप में रखा गया है। पुराण-शैली में फलश्रुति-सदृश प्रतिज्ञाएँ भी प्रमुख हैं—पाप-क्षय, मनोवांछित फल, अन्तःसन्तोष, तथा कथा-श्रवण से प्राप्त आध्यात्मिक उन्नति। इस प्रकार यह खण्ड इतिहास-वृत्त, यज्ञ-धर्म, राज-नीति और भक्ति-साधना को एक ही पवित्र पाठ-परिसर में समेटकर पद्मपुराण की विशाल 55,000 श्लोक-रचना में अपना विशिष्ट स्थान स्थापित करता है।
Bharata’s Austerity at Nandigrāma and Rāma’s Sight of Nandigrāma
इस अध्याय का आरम्भ मंगलाचरण से होता है और कथा की बहुस्तरीय रूपरेखा स्थापित होती है। ऋषि सूत से श्रीराम की पवित्र जीवन-कथा सुनने का अनुरोध करते हैं। सूत स्मरण कराते हैं कि पाताल-खण्ड के प्रसंग में वत्स्यायन ने शेष से शेष पुराण-वृत्तान्तों, विशेषतः राम के अश्वमेध-चरित, के विषय में प्रश्न किया था। शेष भक्तिपूर्ण प्रश्नकर्ता की प्रशंसा करते हैं और बताते हैं कि रामकथा का श्रवण-स्मरण पापों का नाश करने वाला है। रावण-वध के बाद श्रीराम विभीषण को लंका का राज्य सौंपते हैं और सीता सहित पुष्पक विमान से लौटते हैं। मार्ग में वे तीर्थों और आश्रमों का दर्शन कराते हुए अयोध्या के निकट नन्दिग्राम देखते हैं, जहाँ भरत विरह से व्याकुल होकर कठोर तप में रहते और बार-बार रामकथा का जप करते हैं। नन्दिग्राम को देखकर राम वनवास में सीता ने जो कष्ट सहे, उसे स्मरण कर शोक व्यक्त करते हैं।
The Vision of Rāma’s Royal Capital (and the Meeting at Nandigrāma)
इस अध्याय में हनुमान के दूत-धर्म और नन्दिग्राम में भरत के तपस्वी राज्य-रक्षण के माध्यम से मिलन-नीति और राजधर्म का वर्णन है। दीर्घ विरह से व्याकुल श्रीराम हनुमान को भेजते हैं कि भरत को अपने आगमन का समाचार दें। सीता के वचन विरह-रस को और तीव्र करते हैं; वे भरत के शोक से कृश हो जाने का चित्र खींचती हैं। हनुमान सुव्यवस्थित नन्दिग्राम पहुँचकर धर्मपूर्वक संरक्षित राज्य को देखते हैं और वल्कलधारी, जटाधारी, तप से क्षीण भरत को पाते हैं। वे राम के निकट होने का संदेश देते हैं। तब मंत्रीगण और वसिष्ठ राम से मिलने चल पड़ते हैं। राम भरत और मंत्रियों को वल्कल-जटा में देखकर दशरथ की मर्यादा और आदर्श राजधर्म का स्मरण करते हैं। अंत में भरत साष्टांग प्रणाम कर आत्मग्लानि प्रकट करते हैं; राम उन्हें प्रेम से आलिंगन देते हैं। भरत सीता को आदरपूर्वक प्रणाम करते हैं और फिर सब लोग पुष्पक विमान से पितृ-नगर की ओर प्रस्थान करते हैं।
Raghunātha’s Entry into the City (Ayodhyā Festival Preparations and Procession)
शेष वत्स्यायन से कहते हैं कि राम का चिर-प्रतीक्षित राजधानी-दर्शन हुआ और अयोध्या उत्सव-भूमि बन गई। भरत ने मंत्री सुमुख को आज्ञा दी कि मंदिरों को भव्य रूप से सजाया जाए, गलियों में चंदन-सुगंधित जल का छिड़काव हो, पुष्प-ढेर लगाए जाएँ, धूप जलाई जाए, और हाथी-घोड़ों को रंगकर आभूषणों से विभूषित किया जाए। सौभाग्यवती नगर-स्त्रियाँ पूजन-सामग्री सहित आरती करती हैं और ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र—सभी वर्ण—एक साथ आनंदपूर्वक राजा के दर्शन को आते हैं। देवताओं से घिरे और तेजस्वी वानरों के अनुगमन में राम पुष्पक-विमान से उतरकर मानव-वाहन पर आरूढ़ होकर नगर में प्रवेश करते हैं; वाद्य-निनाद और भाटों की स्तुति गूँज उठती है। अटारियों से स्त्रियाँ राम के सौंदर्य का भक्तिभाव से गुणगान करती हैं और पहले दर्शन पाने वालों को धन्य मानती हैं; राम स्नेहपूर्ण दृष्टि से मातृ-गृह की ओर बढ़ते हैं।
Raghuvara’s Royal Consecration (Rāma’s Coronation and Familial Reconciliation)
शेष–वात्स्यायन संवाद के भीतर यह अध्याय श्रीराम के लौटने और राज्याभिषेक के साथ धर्म तथा भाव-जीवन की पुनर्स्थापना का वर्णन करता है। विरह से व्याकुल एक मातृ-स्वरूपा रामागमन का समाचार पाकर जैसे पुनर्जीवित हो उठती है; घर-परिवार के आँसू, रोमांच और स्तब्ध आनंद भक्ति-भाव की कथा-भाषा बन जाते हैं। राम कैकेयी से मिलते हैं; लज्जा से वह मौन रहती है। राम विनयपूर्वक उसे ढाढ़स देते हैं—वनवास का धर्म मैंने पूर्ण किया, मन में कोई द्वेष नहीं। आगे माता-पिता की सेवा, कुल-बंधन का सम्मान और पारिवारिक मेल-मिलाप का नीति-उपदेश आता है; सीता को पतिव्रता कहकर वंश को पावन करने वाली के रूप में आशीर्वाद दिया जाता है। भरत राज्य अर्पित करते हैं, मंत्री ज्योतिषियों से शुभ मुहूर्त पूछते हैं और मंगलमय अभिषेक संपन्न होता है। अंत में राम-राज्य को धर्ममय व्यवस्था के रूप में दिखाया गया है—सज्जनों में हर्ष, दुष्टों में ग्लानि, प्रजा में निर्भयता और समस्त प्राणियों द्वारा राम की आज्ञा का स्वीकार।
The Meeting with Agastya (Rāma Praised by the Gods; Phalaśruti; Ideal Reign; Prelude to Agastya’s Arrival)
रावण-वध और श्रीराम के अभिषेक के बाद ब्रह्मा-इन्द्र आदि देवगण श्रीराम की परम स्तुति करते हैं। वे उन्हें अच्युत विष्णु-स्वरूप मानकर प्रलय-तुल्य महिमा, संसार-दुःख से मुक्ति और भगवान् के नामों की पावन शक्ति का वर्णन करते हैं। इस स्तोत्र की फलश्रुति भी कही गई है—जो इसका पाठ/श्रवण करता है, वह पराजय, दरिद्रता और रोग से सुरक्षित रहता है तथा उसके हृदय में भक्ति जागती है; श्रीराम स्वयं इसका आश्वासन देते हैं। फिर आदर्श राम-राज्य का चित्र आता है—समृद्धि, अकाल-मृत्यु का अभाव और समाज में सौहार्द। आगे चलकर धोबी की निन्दा का प्रसंग उठता है और सीता-त्याग का संकेत मिलता है। अंत में राजसभा में वसिष्ठ आदि ऋषियों के बीच कलशज महर्षि अगस्त्य का आगमन होता है, जिससे अगले प्रसंग की भूमिका बनती है।
The Origin of Rāvaṇa
शेष–वात्स्यायन संवाद में राम के अश्वमेध के प्रसंग पर एक स्वागत-सभा अगस्त्य मुनि का सत्कार करती है और उनके तप व धर्म की प्रशंसा करती है। वहीं राम को भी रावण-वध करने वाले तथा पावन करने वाले के रूप में स्तुति मिलती है। तब राम अगस्त्य से रावण की वास्तविक पहचान और उत्पत्ति पूछते हैं। अगस्त्य पुराणोक्त वंशावली बताते हैं—ब्रह्मा से पुलस्त्य, पुलस्त्य से विश्रवा। विश्रवा की दो पत्नियाँ मन्दाकिनी और कैकसी थीं; मन्दाकिनी से कुबेर (धनद) और कैकसी से रावण, कुम्भकर्ण तथा विभीषण उत्पन्न हुए। आगे ईर्ष्या और पारिवारिक संघर्ष का वर्णन है—कैकसी का क्रोधपूर्ण भाषण और रावण का गर्वित संकल्प कि वह कुबेर से बढ़कर होने हेतु घोर तप करेगा। अध्याय यह भी सिखाता है कि शक्ति का मूल तप है, पर धर्म से रहित शक्ति जगत् को पीड़ित करने वाली बन जाती है।
Ravana’s Austerities, the Gods’ Refuge, and the Decree of Rama’s Incarnation
इस अध्याय में रावण कुम्भकर्ण और विभीषण के साथ घोर तप करता है। देवता प्रसन्न होकर उसे वर देते हैं, और उसी शक्ति के बल पर वह तीनों लोकों को उद्विग्न कर देता है। रावण के अत्याचार से पीड़ित देवगण पहले ब्रह्मा के पास जाकर करुण विलाप करते हुए शरण माँगते हैं। फिर ब्रह्मा के साथ कैलास पहुँचकर नन्दी के माध्यम से शम्भु-महादेव की स्तुति और प्रार्थना करते हैं। शिव देवताओं की पीड़ा सुनकर उनके साथ हरि के पास जाते हैं। विष्णु सबको आश्वासन देकर अवतार-योजना बताते हैं—वे अयोध्या में दशरथ के पुत्र रूप में अवतीर्ण होंगे और रावण का संहार करेंगे; देवता अंशावतार से वानर-भालू आदि रूप धारण कर सहायता करेंगे। अंत में धर्म की पुनः स्थापना और दिव्य राजा के राज्य की प्रशंसा के साथ सभा में भावपूर्ण प्रतिक्रिया दिखाकर प्रसंग की पूर्णता सूचित की जाती है।
Agastya’s Instruction to Raghunātha (Rāma): Sin, Remorse, and the Aśvamedha Remedy
शेष–वात्स्यायन संवाद के भीतर यह अध्याय एक अंतर्निहित प्रसंग में जाता है, जहाँ शोक से व्याकुल श्रीराम मूर्च्छित होकर पड़े हैं। कुम्भजन्मा अगस्त्य उन्हें ढाढ़स बँधाकर होश में लाते हैं। राम कामदोष से उत्पन्न अपने अपराध को स्वीकार करते हुए ब्राह्मण-अपराध और पूज्य ब्राह्मणों के वध का विलाप करते हैं तथा नरक-भय और अशुद्धि के न मिटने की आशंका प्रकट करते हैं। इस प्रसंग में ब्राह्मण को वैदिक धर्म की जड़ मानकर धर्म-तत्त्व का गंभीर प्रतिपादन होता है। अगस्त्य राम को आश्वस्त करते हैं कि उनका अवतार-कार्य दुष्टों का संहार है, इसलिए पाप का लेप उन पर नहीं टिकेगा। पर राम जानबूझकर किए पाप और अनजाने पाप का भेद करते हुए कहते हैं कि संकल्पपूर्वक किए दोष का ठोस प्रायश्चित्त आवश्यक है। तब ऋषि अश्वमेध (वाजिमेध) को उपाय बताते हैं और दिलीप, मनु, सगर, मरुत्त तथा इन्द्र के सौ यज्ञों के उदाहरण देते हैं। राम यज्ञ करने का संकल्प लेते हैं और विधि-प्रक्रिया पूछते हैं; इस प्रकार वे निराशा से निकलकर धर्म-स्थापन की ओर बढ़ते हैं।
Instruction on All Dharma (in the context of Rāma’s Aśvamedha)
इस अध्याय में श्रीराम अगस्त्य से अश्वमेध-यज्ञ की विधि पूछते हैं—उचित घोड़े के लक्षण, पूजन-क्रम, यज्ञ का निर्वाह और शत्रुओं पर विजय का उपाय। अगस्त्य शुभ चिह्नों वाले अश्व का वर्णन करते हैं और बताते हैं कि वैशाख पूर्णिमा को ललाट पर पहचान-पत्र लगाकर उसे रक्षकों सहित छोड़ना चाहिए; यदि कोई उसे पकड़ ले तो बलपूर्वक वापस लाना भी विधि का अंग है। यह यज्ञ वर्षभर के नियम-पालन और दीन-दुर्बलों को निरंतर दान देने के साथ सम्पन्न करने योग्य कहा गया है। राम अपनी अश्वशाला दिखाते हैं; अगस्त्य यज्ञ-योग्य अश्वों को देखकर विस्मित होते हैं और पूर्ण अनुष्ठान का आग्रह करते हैं। सरयू तट पर वसिष्ठ के नेतृत्व में तैयारियाँ होती हैं और श्रेष्ठ ऋषियों को आमंत्रण भेजे जाते हैं। शेष–वात्स्यायन संवाद-परंपरा में आगे धर्म-चर्चा उठती है। ऋषिगण वर्णाश्रम-कर्तव्यों तथा गृहस्थ-आचार के सूक्ष्म नियम (संयम, विवाह-मर्यादा, अतिथि-सत्कार, शौच-शुद्धि और निषेध) बताते हैं और निष्कर्ष देते हैं कि ये धर्म समस्त लोकों के कल्याण हेतु उपदिष्ट हैं।
Instruction to Śatrughna and the Mobilization for Rāma’s Aśvamedha
वसंत के आगमन पर वसिष्ठ राम से कहते हैं कि यह यज्ञ का शुभ समय है और अब पूजित अश्वमेध-घोड़े को छोड़ने का विधान करना चाहिए। वे यज्ञ-सामग्री की तैयारी, श्रेष्ठ ब्राह्मणों का आमंत्रण, दयापूर्वक दान, तथा व्रत-रूप संयम—भूमि पर शयन, ब्रह्मचर्य और त्याग—का निर्देश देते हैं। राम लक्ष्मण को घोड़ा मँगाने की आज्ञा देते हैं; लक्ष्मण सेना को पूर्ण रूप से सज्ज कर सुरक्षा-व्यवस्था स्थापित करते हैं। इसके बाद घोड़े की भव्य यात्रा, सेना की गर्जना और राजसभा की युद्ध-छटा का वर्णन आता है। यज्ञ-मंडप स्थापित होता है, जहाँ वसिष्ठ और अगस्त्य प्रमुख होते हैं; वाल्मीकि अध्वर्यु के रूप में, और कण्व द्वारपाल के रूप में नियुक्त होते हैं। नामोल्लिखित ऋषि द्वारों पर प्रहरी बनकर खड़े किए जाते हैं। अंत में राम शत्रुघ्न को उपदेश देते हैं—घोड़े की रक्षा करो, हिंसा पर संयम रखो और धर्म का पालन करो; विशेषतः निहत्थे, भयभीत, सोए हुए या शरणागत पर प्रहार न करना। आगे वैष्णव नीति का विस्तार होता है—भक्तों के प्रति करुणा, सबमें भगवान का भाव और अद्वैत-भाव से श्रद्धा का प्रतिपादन किया जाता है।
The Meeting with Puṣkala’s Wife
इस अध्याय में रामाश्वमेध की कथा के भीतर राजसभा का विचार-विमर्श, यज्ञ-विधि और गृहस्थ जीवन का कोमल प्रसंग साथ-साथ आता है। राघुनाथ राम सुमंत्र से पूछते हैं कि यज्ञ-अश्व की रक्षा के लिए किन समर्थ रक्षकों को नियुक्त किया जाए; तब अनेक राजाओं और वीरों के नाम, उनकी सेनाएँ तथा अस्त्र-विद्या में निपुणता का वर्णन किया जाता है। राम राजधर्म का उपदेश देते हैं कि निहत्थों, बालकों, स्त्रियों और असावधान जनों पर प्रहार न किया जाए। यज्ञ आरम्भ होने पर आचार्यों और ऋत्विजों को उत्तम दान देने का प्रसंग आता है। वसिष्ठ मंत्रोच्चार और स्पर्श से अश्व को विधिपूर्वक छोड़ते हैं और शुभ शकुनों के साथ सेना प्रस्थान करती है। अंत में पुष्कल अपने गृह में प्रवेश कर अपनी पतिव्रता पत्नी से मिलते हैं, जहाँ कर्तव्य, गृहधर्म और बड़ों के प्रति श्रद्धा का भाव युद्ध-यात्रा के संदर्भ में प्रकट होता है।
Account of Kāmākṣā (Bhavānī) at Āhicchatrā
इस अध्याय में राम के अश्वमेध के प्रसंग से युद्ध-यात्रा और यज्ञ-रक्षा की तैयारी का वर्णन है। मंगलाशीर्वाद, स्मरण-पूजन, तथा रक्षात्मक आयुध-धारण के द्वारा विजय को धर्म और देवकृपा से जोड़कर दिखाया गया है। शत्रुघ्न मंत्रियों और सेना सहित आहिच्छत्रा पहुँचते हैं। वहाँ की रम्य नगरी, वन-प्रदेश और एक तेजस्वी मंदिर देखकर वे सुमति से पूछते हैं। सुमति बताता है कि यह कामाक्षा/भवानी का परम धाम है, जो चारों पुरुषार्थ—धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—प्रदान करने वाली और सर्वत्र पूज्य देवी हैं। फिर राजा सुमद की कथा खुलती है—भयंकर शोक से व्याकुल होकर उसने हेमकूट पर कठोर तप किया। उसके तप से इन्द्र भयभीत हुआ और विघ्न डालने हेतु वसन्त, अप्सराओं सहित कामदेव को भेजता है; यहाँ संयम और प्रलोभन का शाश्वत संघर्ष आरम्भ होता है।
Śatrughna’s Entry into Ahicchatrā (Temptation of Sumada and the Goddess’s Boon)
शेष वत्स्यायन से कहते हैं कि राजा सुमद के कठोर तप से काम के दल की अप्सराएँ—रम्भा, तिलोत्तमा, घृताची आदि—आकर्षित होकर आईं। वे नन्दन-वन के विहार, दिव्य भोग और स्वर्ग-सुख का लोभ दिखाकर तप भंग करना चाहती हैं; पर सुमद विचार करके स्वर्ग को ‘तुच्छ और अनिश्चित’ मानते हैं और जगन्माता अम्बिका की भक्ति में अडिग रहते हैं। काम के बाण, स्त्रियों की कलाएँ और इन्द्र का विघ्न—कुछ भी उन्हें विचलित नहीं कर पाता; अन्ततः इन्द्र भी लज्जित होकर सेवा-भाव को स्वीकार करता है। प्रसन्न होकर महादेवी अम्बिका तेजोमयी रूप में प्रकट होती हैं। सुमद उनकी स्तुति करते हुए उन्हें ज्ञान, माया-शक्ति और जगत् की धारिणी बताते हैं। देवी वर देती हैं; सुमद अपने राज्य की पुनः-प्राप्ति, अविचल भक्ति और मोक्ष माँगते हैं। तब देवी की भविष्यवाणी होती है कि श्रीराम के अश्वमेध-यज्ञ के अश्व की रक्षा करते हुए शत्रुघ्न अहिच्छत्रा आएँगे; सुमद उन्हें अपना राज्य सौंपकर राम-कार्य में पूर्ण समर्पण करेंगे। अध्याय का समापन शत्रुघ्न के सम्मानित प्रवेश और सुमद की राम-परायणता से होता है।
The Episode of Cyavana (Cyavana’s Hermitage and the Power of Tapas)
इस अध्याय में राजा सुमद शत्रुघ्न का राजोचित सत्कार करता है और रघुनाथ के दर्शन की अपनी उत्कट अभिलाषा प्रकट करता है। तीन रात्रियाँ वहाँ ठहरकर शत्रुघ्न सुमद के सहयोग, उपहारों और सुव्यवस्थित अनुचरों सहित नदी-मार्ग से प्रस्थान करता है; मार्ग में मुनियों से भरे प्रदेशों में सर्वत्र श्रीराम के गुणों का गान होता रहता है। यात्रा एक ऐसे आश्रम तक पहुँचती है जहाँ वेदध्वनि, यज्ञ-चिह्न और अहिंसक प्रकृति का अद्भुत वातावरण है। शत्रुघ्न सुमति से पूछता है कि यह किसका आश्रम है; सुमति बताता है कि यह महर्षि च्यवन का है और उनके तेज व महिमा का वर्णन करता है। फिर च्यवन की उत्पत्ति और तप का प्रसंग आता है—भृगु की गर्भवती पत्नी का एक राक्षस अपहरण करता है; गर्भ गिर पड़ता है और अपराधी भस्म हो जाता है। भृगु के शाप से अग्नि पर दोष आता है, पर ऋषि के वरदान से यह सिद्ध होता है कि ‘सर्वभक्षक’ होकर भी अग्नि सदा शुद्ध रहती है। रेवातट पर च्यवन घोर तप करते हैं; एक राजा की पुत्री द्वारा तपस्वी को कष्ट पहुँचने पर भयंकर अपशकुन फैलते हैं, जो तभी शांत होते हैं जब राजा धर्मानुसार कन्या का विवाह/दान कर क्षतिपूर्ति करता है—तप की विश्वव्यापी शक्ति और प्रायश्चित्त की अनिवार्यता प्रतिपादित होती है।
Description of Cyavana’s Austerity and Enjoyment
इस अध्याय में शर्याति की पुत्री सुकन्या का दीर्घकालीन तपस्वी सेवाव्रत वर्णित है। वह वृद्ध और अन्ध मुनि च्यवन की निष्ठापूर्वक सेवा करती हुई स्त्री-धर्म और योगशुद्धि का आदर्श प्रस्तुत करती है। इसी बीच दिव्य वैद्य अश्विनीकुमार आते हैं, उनका सत्कार होता है और वे वर देने को तत्पर होते हैं; सुकन्या अपने पति की दृष्टि (और उनके कल्याण) की याचना करती है। यज्ञ-तत्त्व का प्रसंग भी आता है—च्यवन की सम्मति से अश्विनों को यज्ञ में भाग मिलता है, जिससे उनका अधिकार धर्मतः स्थापित होता है। प्रत्युपकार में वे च्यवन को रूपान्तरित कर यौवन और तेज प्रदान करते हैं; तीन समान रूप से सुन्दर पुरुषों का प्रसंग सुकन्या की पतिव्रता-निष्ठा की परीक्षा बनता है, जिसमें वह अपने पति को ही पहचानती है। अन्त में च्यवन तपोबल और देवकृपा से कामगामी दिव्य विमान तथा रत्नमय, ऐश्वर्यपूर्ण निवास प्रकट करते हैं। अध्याय यह दिखाता है कि तप, धर्म और अनुग्रह से भोग भी प्राप्त होता है और साथ ही निर्भयता व निःशोकता का आध्यात्मिक आश्वासन भी।
The Horse’s Journey (to Cyavana’s Hermitage)
इस अध्याय में शेषजी वात्स्यायन से दो धाराओं में कथा कहते हैं। पहली धारा में च्यवन–सुकन्या का प्रसंग आता है—च्यवन के कठोर तप से इन्द्र का गर्व दबता है, अश्विनीकुमारों को यज्ञ में उनका भाग मिलता है और ब्राह्मण-तेज का सार्वजनिक महात्म्य प्रकट होता है। दूसरी धारा में राम के अश्वमेध की व्यवस्था वर्णित है—यज्ञ-अश्व की यात्रा, शत्रुघ्न का च्यवन-आश्रम पहुँचना, मुनि का राम-यज्ञ में पधारने का संकेत और हनुमान द्वारा दूत रूप से संदेश ले जाना। यहाँ राम-नाम-स्मरण को कर्मकाण्ड से भी बढ़कर पाप-नाशक बताया गया है, और यह भी कि धर्म तथा महर्षि-सान्निध्य से यज्ञ पवित्र और सफल होता है। अंत में राम च्यवन का सम्मान करते हैं और मुनि के संग से यज्ञ शुद्ध घोषित होता है।
Glory of Nīla Mountain and the Prelude to King Ratnagrīva’s Legend
इस अध्याय में शत्रुघ्न च्यवन मुनि के तपोबल से प्रकट हुए योग-वैभव को देखकर विस्मित होते हैं। तत्पश्चात वे अश्वमेध के घोड़े का पुनः अनुगमन करते हुए आगे बढ़ते हैं और मार्ग में राजा विमल द्वारा आदरपूर्वक अतिथि-भाव से ग्रहण किए जाते हैं। यात्रा के प्रसंग में मंत्री सुमति के साथ संवाद भी आता है, जिससे धर्ममार्ग की दिशा स्पष्ट होती है। आगे शत्रुघ्न एक दिव्य, तेजस्वी पर्वत देखते हैं जिसे ‘नील’ कहा गया है—पुरुषोत्तम हरि का धाम, जो केवल पुण्यशील और हरि-परायण जनों को ही दिखाई देता है। इसी के साथ पापाचार, दुराचार और सामाजिक मर्यादा-भंग करने वाले कर्मों का उल्लेख कर यह बताया जाता है कि पवित्र आचरण ही तीर्थ-दर्शन का कारण है। पुलस्त्य भिष्म से कहते हैं कि नील पर्वत पर स्थित पुरुषोत्तम ही परम आराध्य हैं। फिर प्राचीन कथा का आरम्भ होता है—कांची के राजा रत्नग्रीव, धर्मपूर्वक राज्य चलाकर, वृद्धावस्था में सर्वोच्च तीर्थ की अभिलाषा करते हैं। वे एक तपस्वी ब्राह्मण से पूछते हैं; वह रामचन्द्र की स्तुति करता हुआ काशी, कुरुक्षेत्र, द्वारका आदि तीर्थों का वर्णन करता है और अंत में नील पर्वत पर देखे गए एक अद्भुत चमत्कार की ओर कथा को ले जाता है।
Instruction to the Brahmin (The Greatness of Piṇḍa and Prasāda on Mount Nīla)
नीलपर्वत पर—जहाँ गंगा और समुद्र का स्पर्श है—एक ब्राह्मण साक्षी बनकर भिल्ल/किरातों को अद्भुत रूप में देखता है। वे चार भुजाओं वाले हैं और शंख, चक्र, गदा, शार्ङ्ग तथा कमल जैसे वैष्णव चिह्न धारण किए हुए हैं; दृश्य वैकुण्ठ-सा प्रतीत होता है। ब्राह्मण आश्चर्य से उन्हें (और राजा को संबोधित करके) पूछता है कि देवताओं को भी दुर्लभ ऐसा रूप उन्हें कैसे मिला। वे हँसकर कहते हैं कि यह सब पिंड और प्रसाद की महिमा से हुआ। वे बताते हैं कि पहले पृथुक नाम का एक बालक शिखर पर चढ़कर तेजस्वी रत्नमय मंदिर में पहुँचा, जहाँ हरि की देवों और असुरों द्वारा पूजा होती थी। आरती-निराजन और नैवेद्य के बाद देवपूजा का शेष प्रसाद नीचे गिरा; उसे खाकर बालक—और बाद में उनका समुदाय—चार-भुजाधारी वैष्णव-लक्षणों से युक्त हो गया। अध्याय का संदेश है कि अर्पण, पिंड और प्रसाद के माध्यम से प्रकट होने वाली भगवान की कृपा, श्रद्धा और हरि-संपर्क से, सीमांत जनों को भी वैकुण्ठ-चिह्नित उन्नति प्रदान कर देती है।
Ratnagrīva’s Pilgrimage and the Prescribed Procedure for Visiting Sacred Tīrthas
इस अध्याय में पूर्व प्रसंग से उत्पन्न विस्मय के बाद कथावाचक राजा को पुरूषोत्तम और नीलपर्वत की तीर्थ-यात्रा का स्पष्ट अनुशासन बताता है। दर्शन के प्रभाव से चार-भुज रूप की प्राप्ति और पुनर्जन्म से मुक्ति का फल कहा गया है, इसलिए राजा को यात्रा के लिए प्रेरित किया जाता है। मृत्यु की निश्चितता जानकर हरि की शरण लेने, कीर्तन-श्रवण, प्रणाम और पूजा से भक्ति बढ़ाने, सत्संग करने तथा तीर्थों में संयम और वैराग्य रखने का उपदेश है। स्नान, मुंडन (पाप केशों में लगते हैं), यात्री-वेष—दंड, कमंडलु, मृगचर्म—पैदल चलते हुए हरिनाम जपना और साधुओं का सम्मान करना विधि में बताया गया है। फिर कथा नगर-व्यापी आयोजन बन जाती है: राजा समस्त नगर को तीर्थ-यात्रा का आदेश देता है, मंत्री घोषणा करता है, और सभी वर्गों के लोग ‘जय-जय’ के घोष के साथ पुरूषोत्तम की ओर प्रस्थान करते हैं।
The Greatness of the Gaṇḍakī River and the Śālagrāma Stone
एक राजा वैष्णव-कीर्तन के साथ यात्रा करते हुए अनेक तीर्थों में जाता है और अंत में चक्र-चिह्नित शिलाओं से युक्त एक पाप-नाशिनी नदी पर पहुँचता है। वह एक तपस्वी ब्राह्मण से पूछता है कि यह कौन-सी नदी है। मुनि बताता है—यह गण्डकी है; इसके दर्शन, स्पर्श और जल से मन, वाणी और शरीर के पाप जल जाते हैं। फिर शालग्राम-तत्त्व का वर्णन होता है—चक्रांकित शिला स्वयं भगवान् विष्णु का स्वरूप है; उसका पूजन मुक्ति देता है। शालग्राम-स्नान से बना पादामृत क्षणभर में शुद्ध करता है; पूजन के नियम, आवश्यक सामग्री और सावधानियाँ भी कही गई हैं। एक दृष्टान्त में घोर पापी को यमदूत पकड़ लेते हैं, पर करुणामय वैष्णव भक्त तुलसी, “राम” नाम और शालग्राम-स्पर्श के प्रभाव से उसे बचा लेता है। तब विष्णुदूत प्रकट होकर शालग्राम की तात्कालिक तारक शक्ति का प्रतिपादन करते हैं।
The Vision of the Renunciate (Yati-darśana)
इस अध्याय में भक्त-राजा रत्नग्रीव गण्डकी की महिमा सुनकर वहाँ स्नान करता है, पितरों को तर्पण देता है, अनेक शालग्राम-शिलाओं का पूजन करता है और दीनों को दान देता है। फिर वह नील पर्वत पर स्थित पुरुषोत्तम के धाम की ओर बढ़ता हुआ गङ्गा–सागर संगम पर एक तपस्वी ब्राह्मण से पूछता है कि नील और हरि का दर्शन कैसे हो। तपस्वी उपदेश देता है कि यहीं ठहरकर पुरुषोत्तम की स्तुति करो और दर्शन होने तक उपवास-व्रत धारण करो। राजा पाँच दिन तक कठोर व्रत रखकर दिन-रात हरि के गुण गाता रहता है। तब करुणावश हरि त्रिदण्डी संन्यासी के वेष में प्रकट होकर पूजन स्वीकार करते हैं और बताते हैं कि मध्याह्न में दुर्लभ दर्शन होगा तथा पाँच साथियों सहित नील पर आरोहण का सौभाग्य मिलेगा; इस प्रकार तीर्थ में निरन्तर स्तुति और व्रत से भगवान् का स्वयं प्राकट्य और संरक्षण सिद्ध होता है।
Description of the Glory of Nīlagiri (Nīlā/Nīlaprastha) and Puruṣottama’s Saving Vision
गंगा-तट पर एक दिन हरि-स्मरण और कीर्तन में लीन राजा रत्नग्रीव रात में स्वप्न देखता है कि वह चतुर्भुज विष्णु-सदृश रूप धारण कर पुरुषोत्तम की दिव्य सभा का दर्शन कर रहा है। वाडव नामक ब्राह्मण-मार्गदर्शक के साथ वह दान करता है, गंगासागर-स्नान और तर्पण करता है; तभी देव-दुंदुभियाँ बजती हैं और पुष्प-वृष्टि होकर भगवान की स्वीकृति प्रकट होती है। फिर वे तेजस्वी नीलगिरि/नीलप्रस्थ को देखते हैं और रत्न-जटित स्वर्ण-मंदिर में आरूढ़ होकर सिंहासनस्थ पुरुषोत्तम का दर्शन करते हैं। राजा अभिषेक, अर्घ्य-पाद्य, वस्त्र, गंध, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से पूर्ण पूजा करता है और भगवान की परात्परता तथा अवतार-उद्देश्य का प्रतिपादन करने वाला स्तोत्र गाता है। पुरुषोत्तम प्रसाद देकर भविष्य में इस स्तोत्र के पाठकों को भी दर्शन का वर देते हैं; राजा अपने साथियों सहित विमान से वैकुण्ठ को जाता है और नीलगिरि के दर्शन-श्रवण की मोक्षदायिनी महिमा स्थापित होती है।
Account of the Battle of the Princes
राम-अश्वमेध के प्रसंग में पत्र-चिह्नित यज्ञाश्व, यक्ष-चामर से सेवित, शत्रुघ्न और सहायक वीरों की रक्षा में वेग से विचरता है। सुभाहु की वंश-परंपरा से जुड़े नगर में राजकुमार दमन उसे पकड़कर बाँध लेता है; इससे क्षत्रिय-धर्मानुसार संघर्ष का कारण बनता है। दूतों और गुप्तचरों से अश्व-ग्रहण का समाचार मिलते ही सेनाएँ सज्ज हो जाती हैं। दमन और प्रतापाग्र्य के बीच घोर युद्ध छिड़ता है—हाथियों, रथों, घुड़सवारों और पैदल दलों के बीच बाण-वर्षा के साथ पुराणोचित रण-वर्णन होता है। अंत में दमन एक प्रज्वलित निर्णायक अस्त्र छोड़ता है, जिससे प्रतापाग्र्य गिर पड़ता है और उसके लोग उसे उठाकर ले जाते हैं। शत्रु-सेना टूटकर शत्रुघ्न की ओर हटती है; दमन विजयी होकर शत्रुघ्न के आगमन की प्रतीक्षा करता है, जिससे अगले संघर्ष की भूमिका बनती है।
The Victory of Puṣkala (Aśvamedha Battlefield Episode)
अश्वमेध के घोड़े के छीने जाने का समाचार सुनकर शत्रुघ्न क्रोध से भरकर उस रणभूमि की ओर दौड़ पड़े, जहाँ टूटे हुए दलों और पशुओं से भयानक दृश्य फैला था। वहाँ सुभाहु का पुत्र दमन (दमनक) महान अश्व-प्रशिक्षक और शत्रु-संहारक वीर के रूप में सामने आया। भरतपुत्र पुष्कल ने उसे पराजित करने की प्रतिज्ञा की और सेना सहित आगे बढ़ा। मंत्रबल से संचालित अस्त्रों का घोर प्रतिघात हुआ—अग्न्यस्त्र को वरुण के जल ने शांत किया, वाय्वस्त्र को पर्वतास्त्र ने रोक दिया, और वज्र-सदृश प्रहार से एक राजकुमार गंभीर रूप से घायल होकर पीछे हट गया। यद्यपि पुष्कल की स्थिति प्रबल थी, फिर भी उसने श्रीराम की आज्ञा स्मरण कर आगे का आक्रमण रोक दिया और विजय को केवल बल नहीं, धर्म-नियमित आचरण से जुड़ा बताया। अंत में जय-जयकार हुई और शत्रुघ्न ने आनंदित होकर पुष्कल की प्रशंसा की।
The Mustering (Assembly) of Subāhu’s Army
पुराण की बहुस्तरीय कथा-रचना में शेष और वात्स्यायन के संवाद के द्वारा अश्वमेध से जुड़ा संग्राम-वृत्तांत आगे बढ़ता है। यज्ञ-अश्व के आसपास भयंकर युद्ध का समाचार पाकर सुभाहु अपने पुत्र दमन के आचरण और पराक्रम को लेकर व्याकुल हो उठता है। दमन बार-बार विजय प्राप्त करता है, पर अंततः शत्रुघ्न-पक्ष से संबद्ध एक प्रबल अस्त्र के प्रहार से वह गिर पड़ता है। इस दृश्य से सुभाहु का शोक क्रोध में बदल जाता है और वह पूर्ण सेना-संचालन का आदेश देता है। हाथी, घोड़े, रथ और पैदल—चारों अंगों वाली सेना पृथ्वी को कंपाती हुई आगे बढ़ती है; सुकेतु, चित्रांग, विचित्र आदि प्रमुख वीर अपने-अपने स्थान ग्रहण करते हैं। तभी दमन पुनर्जीवित होकर गर्वपूर्ण वाणी में चुनौती देता है। सुभाहु दुर्जेय ‘क्रौञ्च’ व्यूह रचने की आज्ञा देता है; नाम लेकर स्थान-निर्धारण के साथ उसे सावधानी से सजाया जाता है, ताकि शत्रुघ्न की सेनाओं से होने वाले महासंघर्ष की तैयारी पूर्ण हो सके।
The Club-Fight (Mace Combat Episode)
राम के अश्वमेध-अभियान में शत्रुघ्न चक्राङ्का नगर के निकट एक प्रचण्ड चतुर्विध सेना से सामना करते हैं। सुमति वहाँ के राजा सुबाहु का परिचय देकर उसकी धर्मनिष्ठ राजधर्म-पालना की प्रशंसा करती है—विष्णुभक्ति, सत्य-शील, न्यायपूर्ण कर-व्यवस्था और वैष्णव ब्राह्मणों का सत्कार। फिर क्रौञ्च-व्यूह में दोनों पक्षों की युद्ध-रेखाएँ बनती हैं और शत्रुघ्न पुष्कल, रिपुताप, नीलरत्न, उग्राश्व, वीरमर्दन आदि वीरों को व्यूह-भेदन हेतु भेजते हैं। उधर लक्ष्मीनिधि का द्वंद्व सुकेतु से होता है। तीव्र बाण-वर्षा में सुकेतु का रथ और ध्वज क्षत-विक्षत हो जाते हैं, तब युद्ध गदा-युद्ध में बदलता है; आगे चलकर मल्लयुद्ध, आलिंगन-प्रहार और मुष्टि-युद्ध तक पहुँचता है। कोई भी सहजता से पराजित नहीं होता; दोनों की अद्भुत सहनशक्ति और बल देखकर दर्शक दोनों योद्धाओं के पराक्रम और राजोचित तेज की समान रूप से प्रशंसा करते हैं।
The Slaying of Citrāṅga
राम के अश्वमेध-प्रसंग में चित्राङ्ग रणभूमि में आगे बढ़कर भरत-पुत्र पुष्कल से भिड़ता है। दोनों के बीच तीव्र बाण-वर्षा, रथ-चातुर्य और अस्त्र-कौशल का घोर द्वंद्व होता है; पुष्कल बार-बार चित्राङ्ग के रथों को तोड़कर उसे संकट में डाल देता है। युद्ध के बीच संवाद होता है—चित्राङ्ग पुष्कल की वीरता स्वीकार कर प्रतिज्ञा करता है, जिससे संघर्ष केवल बल का नहीं, धर्म-सत्य के दावे का बन जाता है। तब पुष्कल श्रीराम-भक्ति और पतिव्रता-धर्म पर आधारित सत्य-क्रिया का आह्वान कर निर्णायक बाण छोड़ता है। शत्रु प्रत्युत्तर में अस्त्र चलाता है, पर सत्यबल से युक्त बाण चित्राङ्ग का सिर काट देता है; उसकी सेना घबरा कर भागती है और पुष्कल व्यूह में घुसकर विजय प्राप्त करता है—धर्म-समर्थ वीरता के रूप में।
The Defeat of Subāhu (within the Rāma-Aśvamedha account)
इस अध्याय में राम-अश्वमेध प्रसंग के भीतर रणभूमि और यज्ञ का संकट उभरता है। युद्ध में एक राजा अपने गिरे हुए पुत्र को देखकर अत्यन्त विलाप करता है; अन्य पुत्र और वीर उसे शोक छोड़कर क्षत्रिय-धर्म का स्मरण कराते हैं और रण में लौटने को प्रेरित करते हैं। फिर सुभाहु हनुमान से भिड़ता है। बाण टूटते हैं, रथ पकड़े जाकर चूर किए जाते हैं, और हनुमान के प्रहार से राजा गिरकर मूर्छित हो जाता है। मूर्छा में उसे स्वप्न-दर्शन होता है—अयोध्या में श्रीराम देवताओं, ऋषियों, अप्सराओं और देहधारी वेदों द्वारा स्तुत हैं; तब उसे बोध होता है कि यह संघर्ष साधारण नहीं, दिव्य सत्ता से सामना है। होश में आकर वह पूर्व शाप और मुनि असिताङ्ग की सीख याद करता है—राम परब्रह्म हैं और सीता चिन्मयी; केवल तर्क से यह रहस्य नहीं पकड़ा जाता। अध्याय का अंत संयम, प्रतिकार-त्याग, और श्रीराम की परम स्थिति की पुनः स्वीकृति की ओर जाता है।
The Departure of Śatrughna along with Subāhu (Rāma’s Aśvamedha Cycle)
इस अध्याय में श्रीराम के अश्वमेध-यज्ञ के प्रसंग में अत्यन्त अलंकृत यज्ञ-अश्व को राजचिह्नों, सेवकों और अपार धन-वैभव सहित सजाकर आगे भेजने का वर्णन है। मार्ग में अनेक राजा और याचक विनय तथा शरणागति के स्वर में श्रीरामचन्द्र को भेंट-उपहार अर्पित करते हैं और अपने पुत्रों व अनुचरों की वापसी की प्रार्थना करते हैं। शत्रुघ्न सुबाहु सहित अन्य राजाओं को स्वीकार कर उनके निवेदन सुनते हैं। वे अश्व को पकड़ने/हड़पने से जुड़ा अपना अपराध स्वीकार कर क्षमा माँगते हैं। ग्रंथ स्पष्ट करता है कि श्रीराम देवताओं से परे परमेश्वर हैं। साथ ही क्षत्रिय-धर्म—युद्ध की तत्परता, राज्य-स्थापन, अन्त्येष्टि और शासन—को भक्ति-रस से जोड़कर राम-दर्शन की लालसा, राम-नाम की मुक्ति-शक्ति और श्रीराम के कमल-मुख के दर्शन से अयोध्या की धन्यता का गुणगान करता है।
Janaka’s Liberation of Beings in Hell (within the Satyavād Narrative; Rama’s Aśvamedha Context)
इस अध्याय में राम के अश्वमेध का घोड़ा तेजःपुर नामक नगर में पहुँचता है। वह नगर धर्म-प्रकाश से दीप्त, देवालयों से समृद्ध, तपस्वियों से भरा और गृहस्थों के अग्निहोत्र-धूम से पवित्र बताया गया है। शत्रुघ्न मंत्री सुमति से वहाँ के शासक के विषय में पूछते हैं; सुमति राजा ऋतंभऱ का परिचय देता है, जिनकी वंश-परंपरा सत्य और गो-सेवा के व्रतों से जुड़ी है। फिर उपदेश आता है कि संतान-प्राप्ति के लिए विष्णु की कृपा, गोमाता का आशीर्वाद या शिव का अनुग्रह साधना चाहिए। गो-पूजा का विधान किया गया है और गायों को कष्ट देने, तिरस्कार करने या उपेक्षा करने के दोष बताए गए हैं। इसके बाद प्राचीन कथा में राजा जनक का वर्णन है। वे योगबल से देह त्यागकर नरक के निकट पहुँचते हैं; उनके शरीर से उठती वायु से वहाँ के प्राणी की यातनाएँ शान्त होने लगती हैं। करुणावश जनक धर्मराज यम से उन पापियों की मुक्ति की याचना करते हैं। धर्मराज दण्ड-व्यवस्था समझाते हैं और यह भी बताते हैं कि पुण्य—विशेषतः ‘राम, राम’ नामोच्चारण से उत्पन्न—दान करके दूसरों को दिया जा सकता है। जनक अपना संचित पुण्य दान करते हैं और वे सभी जीव तत्काल दिव्य देह पाकर मुक्त हो जाते हैं।
Description of the Dhenu-vrata (Cow Vow) and the Ethics of Cow-Protection
इस अध्याय में नरक-यात्रा के प्रसंग के साथ कर्म-नीति और धेनु-व्रत का विधान बताया गया है। यमपुरी में एक राजा पूछता है कि अत्यन्त पुण्यवान राम-भक्त भी यम के नगर के निकट क्यों पहुँचता है। धर्मराज समझाते हैं कि पूर्वजन्म में चरती हुई गाय को रोककर उसके चरने में बाधा डाली गई थी; उसी सूक्ष्म पाप-शेष के कारण यमपुरी-समीपता हुई, यद्यपि भक्ति का प्रभाव महान है। फिर कथा धेनु-व्रत की ओर मुड़ती है। सुमति के प्रश्न पर जाबालि गो-पूजा, नित्य गो-रक्षा, सेवा, स्नान-पूजन तथा विधिपूर्वक घास-जल और आहार देने का क्रम बताते हैं। आगे संकट आता है जब रक्षित गाय को सिंह मार देता है; तब प्रायश्चित्त का विचार होता है। उपदेश में स्पष्ट किया जाता है कि जान-बूझकर गो-हिंसा लगभग अप्रायश्चित्त्य है, पर अनजाने में हुई हानि के लिए शान्ति-प्रायश्चित्त संभव है। अन्त में रघुनाथ की आराधना, गौ-रक्षा और ब्राह्मण को सुवर्ण-दान का निर्देश दिया जाता है। सुरभि/कामधेनु राजा ऋतंभर को राम-भक्त पुत्र का वर देती हैं और राजा अंततः हरि-धाम को प्राप्त होता है।
The Arrival/Meeting with Vatsa (Vatsa-māgama)
इस अध्याय में सत्यवान् राजा का वर्णन है, जो अपने स्वधर्म में अडिग और रघुनाथ श्रीराम की कृपा से प्राप्त दुर्लभ भक्ति से युक्त है। एकादशी-व्रत और भक्त के मस्तक पर तुलसी-दल रखने की अक्षय पवित्रता बताकर यह प्रतिपादित किया गया है कि संचित पुण्य से भी भक्ति श्रेष्ठ है। फिर श्रीराम के अश्वमेध का प्रसंग आता है। यज्ञाश्व शुभ लक्षणों सहित नगर में प्रवेश करता है; प्रजा समाचार देती है। श्रीराम का नाम सुनकर राजा आनन्दित होता है और जानता है कि यह अश्व शत्रुघ्न द्वारा रक्षित है। वह अश्व की सेवा और रामचरणों की सेवा का संकल्प कर कोष-सेना सहित शत्रुघ्न से मिलने चलता है। शरणागति-भाव से सत्यवान् अपना राज्य अर्पित कर देता है। शत्रुघ्न उसकी भक्ति पहचानकर सत्यवान् के पुत्र रुक्म को राजा स्थापित करते हैं। हनुमान् और सुबाहु आदि भक्तों का आलिंगन होता है और अश्व आगे की यात्रा पर बढ़ जाता है।
Narration of the Heroic Vow (Aśvamedha Horse Seizure and the Warriors’ Oaths)
अश्वमेध-यात्रा आगे बढ़ रही थी कि अचानक भयंकर अँधेरा छा गया। आकाश धूल से ढक गया, मेघ गरजे, दुर्गन्धयुक्त वर्षा होने लगी—ऐसे अपशकुनों से सब ओर घबराहट फैल गई। इसी अवसर पर पाताल से रावण का सहायक राक्षस विद्युनमाली लोहे के विमान में आया और यज्ञ का अश्व चुराकर वेग से भाग गया। अश्व-हरण का समाचार पाकर शत्रुघ्न क्रोध से उबल पड़ा और उसने मंत्री सुमति से पूछा कि किन-किन वीरों को भेजा जाए। सुमति ने पुष्कल, लक्ष्मीनिधि, हनुमान तथा अन्य वानर और मानव योद्धाओं को आगे करने की सलाह दी। तब वीरों ने सभा में सत्य, धर्म और श्रीराम-भक्ति को साक्षी मानकर कठोर प्रतिज्ञाएँ कीं और विष्णु-शिव में भेद करने वाले मत का खण्डन किया। अंत में सेना अश्व-चोर का पीछा करने और प्रतिज्ञा पूर्ण करने हेतु तैयार हो गई।
Vidyunmālī and the Defeat of the Demon (Amarā/Amarā-like foe): Battle over Rāma’s Aśvamedha Horse
शेषजी वत्स्यायन से कहते हैं—रावण के पक्ष से जुड़ा राक्षस-नायक विद्युनमाली राम के अश्वमेध-घोड़े को रोकने/छीनने आए राघव-पक्ष के रक्षकों के सामने आकर प्रतिशोध की गर्जना करता है और राम के सहायकों का रक्त पीने की धमकी देता है। तब राघव-पक्ष का वीर सेवक पुष्कल क्षात्र-धर्म के अनुसार उत्तर देता है कि शौर्य का निर्णय वाणी से नहीं, शस्त्रों से होता है। इसके बाद भयंकर युद्ध छिड़ता है—भाले, त्रिशूल, गदा और बाण-वर्षा से दोनों ओर प्रहार होते हैं। पुष्कल घायल होकर मूर्छित हो जाता है। तभी हनुमान जी प्रवेश कर राक्षस-सेना का संहार करते हैं और त्रिशूल को दाँतों से काटकर चूर-चूर कर देते हैं। विध्युनमाली भयावह माया रचता है—अंधकार, रक्त-वृष्टि और कटे सिरों की वर्षा। तब शत्रुघ्न आते हैं, राम का स्मरण कर मोहनास्त्र से उस माया को नष्ट करते हैं। उनके प्रत्यस्त्रों से राक्षस भाग खड़े होते हैं; विद्युनमाली अंग-भंग होकर मारा जाता है। शेष राक्षस शरणागत होकर घोड़ा लौटा देते हैं और विजय-ध्वनि गूँज उठती है।
The Dialogue of Lomaśa and Āraṇyaka (Forest-Hermitage Episode) — Supreme Rāma-Bhakti and Meditation
विध्युनमालिन नामक प्रचण्ड दैत्य का वध करके शत्रुघ्न ने अश्वमेध का घोड़ा पुनः प्राप्त किया। उसके प्रभाव से जगत में शुभता लौट आई—नदियाँ शुद्ध हुईं, सूर्य और पवन प्रसन्न हुए। वीरों के आग्रह पर राजा ने घोड़े को उत्तर दिशा की यात्रा के लिए फिर छोड़ दिया। रेवा (नर्मदा) प्रदेश में पहुँचकर शत्रुघ्न ने पलाश-पत्तों की कुटिया वाला आश्रम देखा। मंत्री सुमति के साथ वे वनवासी ऋषि आरण्यक के पास गए। आरण्यक ने कहा कि भोग-सामग्री से सम्पन्न यज्ञ सीमित और नश्वर पुण्य देते हैं; उनके मुकाबले हरि/राम की भक्ति श्रेष्ठ, स्थायी और परम फल देने वाली है। इसके बाद लोमश ऋषि के उपदेश का प्रसंग आता है। एक साधक पूछता है—संसार-सागर कैसे पार हो? लोमश गुप्त और पात्रता-संरक्षित सिद्धान्त बताते हैं कि राम ही परम देव हैं; राम-स्मरण, जप, पूजा और ध्यान व्रत, योग और यज्ञ से भी बढ़कर हैं। अंत में अयोध्या में सिंहासनारूढ़ श्रीराम का विस्तृत ध्यान-विधान साधना के रूप में बताया गया है।
Narration of Rāma’s Deeds (with calendrical chronology of key events)
शिष्य-भाव से किए गए प्रश्न—“आप जिस राम का ध्यान करते हैं, वे कौन हैं और वे क्यों अवतरित हुए?”—के उत्तर में लोमश बताते हैं कि श्रीराम करुणा से, दुःख में डूबे प्राणियों के उद्धार हेतु अवतरित हुए। वे रामायण की मुख्य घटनाएँ संक्षेप में कहते हैं—ताड़का-वध, अहल्या-उद्धार, विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा, सीता-विवाह, वनवास, सीता-हरण, लंका-अभियान/सेतु-बंधन और अंततः रावण-वध। इस अध्याय की विशेषता यह है कि अनेक प्रसंग तिथि, पक्ष और मास के साथ अंकित हैं, जिससे कथा एक प्रकार की धार्मिक काल-पंजिका बन जाती है। अंत में भक्ति-फल बताया गया है—श्रीराम के कमल-चरणों का स्मरण और पूजन ही संसार-सागर से पार लगाने वाला साधन है। साथ ही रामाश्वमेध की रूपरेखा से पुनः संबंध जोड़ते हुए अगस्त्य का उपदेश, अश्व का एक आश्रम तक पहुँचना और अयोध्या में ऋषियों द्वारा राम-कथा का वर्णन भी कहा गया है।
The Sage Kamu’s (Kamo’s) Journey to Viṣṇu’s World
शेष–वात्स्यायन संवाद के भीतर मुनि श्रीराम-कथा की अद्भुतता और उसे सुनने मात्र से होने वाली पवित्रता का वर्णन करते हैं। अगस्त्य की आज्ञा से श्रीराम ब्रह्महत्या-दोष के शमन हेतु एक महान यज्ञ/अनुष्ठान करते हैं; इसी प्रसंग में हनुमान और वनवासी ऋषि आराण्यक (वाडवेन्द्र) की भक्ति-लीला प्रकट होती है। शत्रुघ्न अपने साथियों सहित ऋषि के आश्रम में आते हैं। राम-दर्शन की तीव्र आकांक्षा से हर्षित ऋषि को अयोध्या ले जाया जाता है, जहाँ सरयू-तट पर दानरत राम को मुनियों के बीच देखकर वह कृतार्थ होता है। श्रीराम की अनुपम नम्रता तब दिखती है जब वे ऋषि के चरण धोकर उस चरणामृत को मस्तक पर धारण करते हैं। आराण्यक उपदेश देते हैं कि राम-नाम ही समस्त पापों का नाशक है, ब्रह्महत्या तक को हर लेता है। अंत में भक्त-ऋषि का तेज श्रीराम में लीन होकर सायुज्य को प्राप्त होता है; दिव्य वाद्य, पुष्प-वृष्टि और देव-गान से यह सिद्धि सुशोभित होती है।
Shatrughna’s Vision of the Yoginīs and the Recovery of the Horse (Marriage/Boons from the Waters)
वात्स्यायन की राम-गुण सुनने की अतृप्त इच्छा देखकर शेष (अनन्त) अश्वमेध का प्रसंग सुनाते हैं। रेवातीर्थ के गहरे कुंड में यज्ञ का घोड़ा अचानक लुप्त हो जाता है। शत्रुघ्न वहाँ पहुँचकर स्तब्ध सैनिकों से पूछताछ करते हैं और मंत्रियों की सलाह से हनुमान तथा पुष्कल के साथ जल में उतरकर पाताल की ओर जाते हैं। पाताल में उन्हें एक तेजस्वी नगरी दिखती है और रत्नजटित स्वर्ण-स्तंभ के पास घोड़ा बँधा मिलता है। वहाँ एक अत्यन्त शक्तिशाली स्त्री योगिनियों के साथ है; उसकी सेविकाएँ आगंतुकों को भक्षण करने की बात करती हैं। संवाद में शत्रुघ्न-पक्ष घोड़े को रामभद्र का बताकर उसे मुक्त करने की याचना करता है; संघर्ष और मोह का वातावरण बनता है। अंततः हनुमान सर्वोच्च वर माँगते हैं—जन्म-जन्म में श्रीराम की नित्य दास्य-भक्ति। देवी वरदान देती है, भविष्य के विवाह-संबंध का संकेत करती है और शत्रुघ्न को योगिनी-प्रदत्त अस्त्र प्रदान करती है। शत्रुघ्न घोड़ा लेकर रेवातट पर लौटते हैं; सेना आनंदित होती है और समस्त वृत्तांत सुनकर रेवातीर्थ की पवित्रता का स्मरण करती है।
The Seizing of the Sacrificial Horse by Maṇiputra
नागों और शिव के तेज से जुड़ी मणि-निर्मित दिव्य नगरी की ओर एक भव्य यात्रा बढ़ती है। वहाँ राजा वीरणिम और उनके पुत्र रुक्माङ्गद का परिचय होता है; रुक्माङ्गद छह ऋतुओं से सुशोभित वन में स्त्रियों और भोग-विलास के बीच क्रीड़ा करता है। उसी समय स्वर्ण-पत्र पर लिखे लेख से चिह्नित एक अत्यन्त सुंदर घोड़ा आ पहुँचता है। स्त्रियाँ अपने स्वामी को उसे पकड़ लेने को उकसाती हैं; रुक्माङ्गद घोड़े को पकड़कर नगर लौटता है और रामभूमि के राजा पर अपनी श्रेष्ठता का दावा करता है। यह कर्म धर्म की दृष्टि से संदिग्ध माना जाता है और बात चन्द्रचूड़ शिव तक पहुँचती है। शिव आने वाले संघर्ष को श्रीराम के कमल-चरणों के दर्शन का अवसर बताते हैं, साथ ही क्षत्रिय-धर्म, प्रजा-रक्षा और अपने ही स्वामी के विरुद्ध युद्ध की मर्यादा समझाते हैं। अंत में शिव की शरण में युद्ध का निश्चय होता है।
Vīramaṇi’s Resolve to Fight (and the Seizure of the Aśvamedha Horse)
राम के अश्वमेध-यज्ञ में शत्रुघ्न की सेना को ज्ञात होता है कि यज्ञ-अश्व का अपहरण हो गया है। राजा सेवकों से पूछता है; वे बताते हैं कि वन में किसी ने उसे उठा लिया, और कुशल खोजी भी उसके पदचिह्न नहीं पा सके—इससे तत्काल रणनीतिक चिंता बढ़ जाती है। शत्रुघ्न बुद्धिमती सुमति से परामर्श करता है। सुमति देवपुर का वर्णन करती है—शिव-रक्षित, लगभग अजेय नगरी, जिसके पराक्रमी राजा वीरमणि हैं। तभी नारद आते हैं, उनका सत्कार होता है; वे बताते हैं कि अश्व का हर्ता वीरमणि का पुत्र है और आगे भयंकर युद्ध होने की भविष्यवाणी करते हैं। वीरमणि युद्ध-नगाड़े से नगर-व्यापी जुटान का आदेश देता है और अवज्ञा पर दंड की घोषणा करता है। कवच-शस्त्रों से सुसज्जित श्रेष्ठ योद्धा एकत्र होते हैं; दोनों पक्ष व्यूह रचते हैं और कथा धर्म, भक्ति तथा राजधर्म से संचालित निकटवर्ती संग्राम की ओर बढ़ती है।
Defeat and Puṣkala’s Victory (The Episode of Rukmāṅgada)
राम-अश्वमेध की कथा-धारा में शत्रुघ्न के योद्धा वीरमणि की सेना में घुस पड़ते हैं और रणभूमि और भी विकराल हो उठती है। मरे हुए हाथियों और टूटे रथों से मैदान भर जाता है। अपने पक्ष की हानि देखकर रुक्माङ्गद क्रोध से भरकर रत्नजटित रथ पर चढ़ता है और शत्रुघ्न-पक्ष को ललकारता है; उसी समय पुष्कल भी प्रत्यक्ष संग्राम में उतर आता है। दोनों में तीव्र बाण-विनिमय के साथ द्वंद्व चलता है, जिसकी उपमा कुमार और तारक के युद्ध से दी गई है। पुष्कल अपनी श्रेष्ठ धनुर्विद्या से रुक्माङ्गद के रथ को तोड़ देता है—घोड़े, सारथि और ध्वज को गिराकर अंत में राजकुमार को भी बेध देता है; वह धरती पर गिर पड़ता है और चारों ओर विलाप उठता है। फिर मंत्र-बल से युक्त अस्त्रों का प्रचंड प्रयोग होता है। एक भयानक बाण रथ को एक योजन तक धकेलकर आकाशमार्ग से सूर्य की ओर ले जाता है, जहाँ वह जलकर भस्म हो जाता है; दग्ध योद्धा लौटकर मूर्छित हो पड़ता है। तब क्रुद्ध वीरमणि स्वयं पुष्कल से भिड़ने आगे बढ़ता है और पृथ्वी काँप उठती है—शत्रु-बल के मनोबल पर पुष्कल की विजय का यह निर्णायक संकेत बनता है।
Defeat/Overthrow (Parābhava): Puṣkala’s Battle and the Vīramaṇi Episode
अध्याय 42 ‘पराभव’ में अश्वमेध से जुड़ा युद्ध-प्रसंग तीव्र होता है। सेनाएँ जुटती हैं और हनुमान राजा पुष्कल की ओर बढ़ते हैं। पुष्कल हनुमान के बल को ललकारता है और वीरमणि राजा से तुलना करके अपना पराक्रम प्रकट करता है; साथ ही कथा में भक्ति का आश्वासन आता है—रघुनाथ का स्मरण शोक-सागर को सुखा देता है और श्रीराम की कृपा से दुस्तर भी तरा जा सकता है। हनुमान उतावलेपन से बचने की सीख देते हुए वीरमणि को वीर और संरक्षित बताते हैं, फिर भी रथों पर द्वंद्व आरम्भ होता है। क्षत्रिय-नीति के अनुसार आयु बनाम शक्ति, युवाओं पर दया, और मर्यादा-पालन जैसे धर्म-विचार बाणों की वर्षा के बीच उठते हैं। आगे पुराणोचित भयावह युद्ध-चित्र—योगिनियाँ, पिशाच, सियार—दिखते हैं। अंततः पुष्कल की रणनीति और भक्ति-युक्त दृढ़ता से विरोधी मूर्छित होकर पीछे हटता है, और पुष्कल की विजय वीर-रस के साथ भक्ति-भाव में स्थापित होती है।
The Defeat of Śatrughna (and the fall of Puṣkala)
रामाश्वमेध के प्रसंग में हनुमान का वीरसिंह तथा उसके सहायक योद्धाओं से संघर्ष धीरे-धीरे शत्रुघ्न की सेना सहित व्यापक युद्ध में बदल जाता है। इस संग्राम में पुष्कल प्रधान वीर बनकर उभरता है; वह शिव के गणों से भिड़ता है और फिर वीरभद्र के साथ कई दिनों तक अत्यन्त घोर, हाथों-हाथ युद्ध करता रहता है। अंततः वीरभद्र त्रिशूल से पुष्कल का शिरच्छेद कर देता है, जिससे शत्रुघ्न के शिविर में भय और शोक फैल जाता है। शोकाकुल शत्रुघ्न से रुद्र स्वयं वचन कहते हैं; फिर कथा शत्रुघ्न–शिव के प्रत्यक्ष द्वन्द्व पर आ जाती है। दोनों ओर से अस्त्र-शस्त्रों की वर्षा होती है और दिव्य दर्शक विस्मित होते हैं। बारहवें दिन शत्रुघ्न ब्रह्म-नामक अस्त्र छोड़ता है, जिसे शिव निष्फल कर देते हैं; इसके बाद शत्रुघ्न मूर्छित होकर गिर पड़ता है। अध्याय के अंत में हनुमान पुनः आगे बढ़कर राम-स्मरण से सैनिकों में उत्साह जगाते हैं।
The Defeat of the Devas (Hanumān’s Clash with Rudra and the Deva-Host)
शेष वत्स्यायन से रामाश्वमेध के प्रसंग में एक रणकथा कहते हैं। हनुमान रुद्र/महेश्वर से भिड़कर उन्हें धर्म-विरुद्ध आचरण का दोष देते हैं कि वे राम-पक्ष पर आक्रमण कर रहे हैं। फिर भयंकर युद्ध होता है—शिलाएँ, त्रिशूल, शक्ति और गदा चलती हैं; पर हनुमान बार-बार शिव के अस्त्रों को निष्फल कर देते हैं और संकट में हरि का स्मरण कर अडिग रहते हैं। अंत में विनाश नहीं, पहचान और प्रशंसा से समाधान होता है; शिव हनुमान की वीरता सराहकर वर देने को उद्यत होते हैं। हनुमान वर में यह मांगते हैं कि गिरे हुए वीरों की रक्षा और पुनर्स्थापन हो—विशेषतः पुष्कल तथा मूर्छित शत्रुघ्न को जीवन-बल मिले—जब तक वे द्रोणगिरि से संजीवनी औषधि लाने जाएँ। वे द्रोण पर्वत उठाकर लोक-लोकांतर पार करते हैं। पर्वत के देव-रक्षक उन्हें रोकने आते हैं, पर पराजित होकर इन्द्र को समाचार देते हैं। इन्द्र बृहस्पति से परामर्श कर जानता है कि आक्रमणकारी हनुमान हैं, जिन्हें बल से जीता नहीं जा सकता; इसलिए नीति बदलकर शांति-प्रसादन से औषधि प्राप्त करने का उपाय किया जाता है।
The Meeting with Śrī Rāma
इन्द्र को भय होता है कि एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण दिव्य ‘पात्र’ छीना जा सकता है। वह समझ लेता है कि हनुमान श्रीराम के कार्य में प्रवृत्त हैं, इसलिए बृहस्पति के नेतृत्व में देवगण हनुमान को प्रसन्न करने हेतु उनके चरणों में प्रणाम करते हैं। हनुमान के तीव्र प्रतिज्ञा-वचनों के बाद देवता जीवनदायिनी सञ्जीवनी औषधि प्रदान करते हैं। हनुमान रणभूमि में लौटकर पहले पुष्कल को और फिर शत्रुघ्न को जीवित करते हैं; यहाँ सत्य-वचन और ब्रह्मचर्य की शक्ति का संकेत मिलता है। पुनर्जीवित वीर पुनः युद्ध में उतरते हैं और अस्त्र-प्रतिअस्त्र का क्रम बढ़ता जाता है—आग्नेय, वारुण, वायव्य, पर्वतास्त्र तथा वज्र आदि। जब शिव के प्रहार से शत्रुघ्न संकट में पड़ते हैं, वे श्रीराम की शरण में प्रार्थना करते हैं। तब रणभूमि में श्रीराम का साक्षात् प्राकट्य होता है और अध्याय का केंद्र युद्ध-संकट से दिव्य उपस्थिति की ओर परिवर्तित हो जाता है।
The Departure of the Aśvamedha Horse
इस अध्याय में शेष–वात्स्यायन संवाद के भीतर रामाश्वमेध का प्रसंग चलता है। श्रीराम के आगमन पर शत्रुघ्न उनका स्वागत करते हैं; हनुमान की उपस्थिति से भक्तों में श्रद्धा जागती है और राम को भक्तों के रक्षक रूप में स्वीकार किया जाता है। इसके बाद स्तोत्र-शैली में परम पुरुष का वर्णन है—जो प्रकृति से परे होकर भी सृष्टि, पालन और संहार करता है; साथ ही शिव-समन्वित त्रिकर्म-भाव भी संकेतित होता है। प्रायश्चित्त और कर्मकाण्ड की सीमाएँ बताकर कथा का रुख समन्वय की ओर मुड़ता है। पार्वती के माध्यम से चेतावनी दी जाती है कि शिव और विष्णु में भेद मानना नरक का कारण है; दोनों की एकता का उपदेश दिया जाता है। शिव राजा वीरमणि और उसके पुत्रों को जीवित करते हैं, उन्हें राम के चरणों में प्रणाम करने को कहते हैं; राजा राज्य त्याग देता है। अश्वमेध का घोड़ा छोड़कर उसका अनुगमन होता है; रत्नजटित रथ से राम अंतर्धान हो जाते हैं। अंत में कहा गया है कि इन लीलाओं का श्रवण संसार-शोक का नाश करता है।
Recital of the Curse (Cause of the Hayastambha and Release through Kīrtana)
राम के अश्वमेध का घोड़ा हेमकूट पर्वत के निकट एक अत्यन्त रमणीय उपवन में पहुँचते ही सहसा स्तम्भ-सा जड़ हो गया—हयस्तम्भ। पहरेदारों, पुष्कल और पराक्रमी हनुमान तक ने उसे हिलाने का प्रयत्न किया, पर वह तनिक भी न चला; तब सबको ज्ञात हुआ कि यह केवल बल से नहीं, किसी गूढ़ कर्मबन्धन से रुका है। शत्रुघ्न ने मंत्री सुमति से परामर्श किया। सुमति ने कहा कि किसी विवेकी महर्षि से कारण पूछना चाहिए। वे गङ्गा-स्नान से पवित्र, तप और अग्निहोत्र से दीप्त शौनक-मुनि के आश्रम पहुँचे। शत्रुघ्न ने विनयपूर्वक शौनक से हयस्तम्भ का कारण पूछा; मुनि ने पूर्वकथा—तप, अहंकार, ऋषि-शाप और राक्षसत्व की प्राप्ति—का रहस्य बताने का वचन दिया। अध्याय का मुख्य उपदेश यह है कि रामकथा का श्रवण तथा पवित्र कीर्तन शाप के प्रभाव को नष्ट कर देता है; उसी से घोड़ा मुक्त होकर पुनः धर्ममार्ग में चल पड़ता है।
The Liberation of the Horse (Haya-nirmukti)
इस अध्याय में कर्म की जटिलता पर आश्चर्य से आरम्भ करके पापकर्मों और उनके फलों का क्रमबद्ध वर्णन किया गया है। तामिस्र, अन्धतामिस्र, रौरव, महाराौरव, कालसूत्र, अवीचि, कुम्भीपाक आदि नरकों का उल्लेख, यम के दण्ड-विधान, तथा उसके बाद नीच योनियों में जन्म और शरीर/समाज पर दिखने वाले ‘चिह्न’—जो पूर्व पाप का संकेत देते हैं—इन सबका निरूपण होता है। फिर उपदेश मोक्ष की ओर मुड़ता है—हरि/राम की स्तुति को पाप-क्षालन करने वाली पवित्र धारा कहा गया है, जबकि हरि-निन्दा शुद्धि के मार्ग को रोक देती है। अंत में राम-अश्वमेध प्रसंग में हनुमान यज्ञाश्व के पास रामकथा का पाठ करते हैं; उससे एक दिव्य प्राणी का उद्धार होता है और अश्व की उचित गति/नियति पुनः स्थापित होती है—कथा-श्रवण की मुक्तिदायिनी शक्ति प्रकट होती है।
King Suratha Captures the Aśvamedha Horse
राम का अश्वमेध-घोड़ा कई महीनों तक भारतवर्ष में विचरता है; राम के पराक्रम से सुरक्षित रहता है और जहाँ-जहाँ जाता है वहाँ के राजा उसका आदर करते हैं। वह कुण्डला (सुरथ की नगरी) पहुँचता है, जो तुलसी-अश्वत्थ की नित्य-पूजा, राम-मंदिरों, सत्यनिष्ठा और कलह-रहित जीवन के कारण आदर्श भक्तिराज्य के रूप में वर्णित है। राम-दर्शन पाने के लिए राजा सुरथ घोड़े को पकड़ने का संकल्प करता है। उस नगर में यम के दूत प्रवेश नहीं कर पाते; तब यम (अन्तक) मुनि-वेष धारण कर आता है और कर्म के नश्वर फलों तथा राम-भक्ति के अक्षय फल पर विवाद छेड़ता है। सुरथ राम-सेवा से हटने को तैयार नहीं होता, भक्ति-विरोधी मत को फटकारता है और परीक्षा में अडिग रहता है। यम प्रसन्न होकर वर देता है कि राम-दर्शन से पहले मृत्यु सुरथ को नहीं ले जाएगी और राम उसके प्रयोजन सिद्ध करेंगे। इसके बाद सुरथ घोड़े को पकड़कर पुत्रों और सेना को एकत्र करता है तथा होने वाले संघर्ष के लिए तैयारी करता है।
Dialogue of Suratha and the Messengers (Embassy over the Aśvamedha Horse)
राम के अश्वमेध यज्ञ के समय शत्रुघ्न को समाचार मिलता है कि यज्ञ का अश्व पकड़ लिया गया है और उसके सैनिकों का अपमान हुआ है। क्रोध उठता है, पर मंत्री सुमति दूत-नीति का स्मरण कराते हैं—जहाँ बल विफल हो, वहाँ दूत का वचन कार्य सिद्ध कर सकता है। तब शत्रुघ्न वानरराज वाली के पुत्र अङ्गद/हरिश्वर को दूत बनाकर निकट की कुण्डलापुरी भेजते हैं, जहाँ धर्मनिष्ठ क्षत्रिय राजा सुरथ राज्य करता है और रामचरण-भक्ति में प्रसिद्ध है। सभा में दूत अपना परिचय देता है; अश्व के विषय में विवाद बढ़ता है और चेतावनी दी जाती है कि अश्व न लौटाने पर घोर युद्ध और विनाश होगा। अङ्गद सुरथ के अभिमान को रोककर शत्रुघ्न के पराक्रम तथा वानरों की राम-निष्ठा का वर्णन करता है और समर्पण तथा अश्व-प्रत्यर्पण की मांग करता है। अध्याय का निष्कर्ष यह है कि राम के प्रति धर्मयुक्त शरणागति ही सर्वोच्च समाधान है और दूत-संदेश द्वारा ही शत्रुघ्न तक निर्णय पहुँचाया जाता है।
The Battle of Suratha’s Sons and the Puṣkala–Campaka Duel
सुरथ की आज्ञा होते ही रणभूमि में भेरियों और शंखों का नाद गूँज उठा; रथों और हाथियों की गड़गड़ाहट से सारा मैदान काँप उठा। सुरथ अपने पुत्रों और विशाल सेना के साथ आगे बढ़ा, और सेनानायक पुष्कल जैसे प्रचण्ड वीरों के विरुद्ध मोर्चे बाँधने लगे। इसी बीच पुष्कल और कम्पक का प्रमुख द्वन्द्व आरम्भ हुआ। दोनों ने एक-दूसरे को ललकारा, अपना-अपना परिचय दिया और भक्ति-भाव भी प्रकट किया—एक ने स्वयं को रामदास, श्रीराम का सेवक बताया। फिर तीव्र धनुर्विद्या और अस्त्र-शस्त्र का घोर संग्राम हुआ; पुष्कल ने ब्रह्मास्त्र छोड़ा, कम्पक ने उसका प्रतिकार किया और अंत में भयानक राम-शस्त्र चलाकर पुष्कल को बन्धन में ले लिया। सेना में भगदड़ मची तो शत्रुघ्न ने हनुमान (मारुति/पवनोद्भूत) को पुष्कल के उद्धार हेतु भेजा। हनुमान और कम्पक का आकाश तथा निकट युद्ध हुआ; प्रहारों से गिरना-उठना और पलटवार चलते रहे। अध्याय के अंत में कम्पक के अनुचर विलाप करते हैं और पुष्कल, कम्पक के फंदे से बँधे एक पुरुष को मुक्त कर देता है।
Suratha’s Victory (Binding of Hanūmān and Battle with Śatrughna)
चम्पक के गिरने पर शोक से व्याकुल होकर भी क्रोध से दहकते राजा सुरथ ने हनुमान् को बुलाकर रण में ललकारा। हनुमान् ने स्वयं को श्रीराम का दास बताया और कहा कि बल से उन्हें सचमुच बाँधा नहीं जा सकता, क्योंकि श्रीराम उन्हें छुड़ा देंगे। फिर घोर युद्ध छिड़ा; हनुमान् ने अनेक धनुष तोड़ डाले और बहुत से रथ चूर-चूर कर दिए। सुरथ ने महास्त्रों का प्रयोग किया—पाशुपत से हनुमान् क्षणभर बँधे, पर श्रीराम-स्मरण से बंधन टूट गया; ब्रह्मास्त्र को हनुमान् ने निगलकर निष्फल कर दिया। अंत में सुरथ ने रामास्त्र छोड़ा; वह स्वामी की शक्ति होने से हनुमान् उसी से बँध गए। इसके बाद पुष्कल ने सुरथ से युद्ध किया और गिर पड़ा; तब शत्रुघ्न का प्रवेश हुआ और अग्नि-वरुण आदि अस्त्र-प्रतिअस्त्र तथा मोह-निद्रा-शर का आदान-प्रदान हुआ। अध्याय का संदेश है कि विजय और रक्षा केवल शौर्य से नहीं, श्रीराम-स्मरण से ही सिद्ध होती है।
The Meeting with Raghunātha (Śrī Rāma)
राम-अश्वमेध के प्रसंग में रणभूमि पर बिखरी हुई सेनाओं के बीच सुग्रीव का सामना राजा सुरथ से होता है। सुरथ तीखे बाणों से प्रत्युत्तर देता है, पर सुग्रीव अद्भुत बल दिखाकर “राम” नामक भयानक अस्त्र से उसे आहत कर बाँध देता है और फिर उसे श्रीराम का सेवक जान लेता है। हनुमान आदि भी बँधे हुए और पीड़ित दिखते हैं; सभा में उपदेश होता है कि रघुनाथ का स्मरण ही एकमात्र उद्धारक है। समीरज हनुमान अत्यन्त भक्ति से रामचन्द्र की प्रार्थना करते हैं। तब श्रीराम पुष्पक विमान से लक्ष्मण, भरत और व्यास-प्रमुख ऋषियों सहित शीघ्र आते हैं, हनुमान को मुक्त करते हैं और अपनी दृष्टि से गिरे हुए वीरों को पुनर्जीवित कर देते हैं। सुरथ दण्डवत् प्रणाम कर राज्य अर्पित करना चाहता है; अश्वमेध के घोड़े की रक्षा में क्षत्रिय-धर्म निभाने के लिए उसकी प्रशंसा कर आशीर्वाद दिया जाता है। आगे शत्रुघ्न और सेना के साथ अश्वमेध की यात्रा बढ़ती है और कथा वाल्मीकि-आश्रम की ओर अग्रसर होती है।
The Binding of the Horse by Lava
राम के अश्वमेध यज्ञ के समय जानकी-पुत्र लव ऋषियों के पुत्रों के साथ समिधा लाने वन में जाता है। वहाँ वह स्वर्ण-पट्टिका से चिह्नित, दिव्य सुगन्धियों से अभिषिक्त, दीक्षित यज्ञ-अश्व को देखता है। आश्रमवासी उसके आने का कारण पूछते हैं; लव पास जाकर पट्टिका पर लिखी घोषणा पढ़ता है, जिसमें सूर्यवंश की महिमा और राम के यज्ञ का प्रयोजन बताया गया है। इसी बीच कुछ लोगों की चुनौती और गर्वोक्तियाँ सुनकर—जो राम और शत्रुघ्न का तिरस्कार करती हैं—लव क्रोधित हो उठता है। वह ऋषिपुत्रों की चेतावनी की परवाह न करके अश्व को बाँध देता है। शत्रुघ्न के सेवक अश्व छुड़ाने आते हैं, पर लव बाणों से प्रहार कर उनके भुजाएँ काट देता है। वे जाकर शत्रुघ्न को समाचार देते हैं; इससे अश्वमेध-विवाद का अगला उग्र चरण, राजसत्ता, धर्म और बाल-क्षत्रिय-वीर्य की सीमा-परीक्षा के रूप में, उपस्थित होता है।
The Examination of Spies (Testing Public Opinion of Rāma)
इस अध्याय में पहले सीता-परित्याग के कारण और आगे चलकर उनके पुत्रों की गति के विषय में प्रश्न उठता है। फिर शेष जी अयोध्या में श्रीराम के धर्ममय शासन का वर्णन करते हैं। सीता के गर्भवती होने का प्रसंग आता है और घर में राम उनके दोहद पूछते हैं; सीता तपस्विनी स्त्रियों के दर्शन और पूजन की इच्छा प्रकट करती हैं। उसी रात राम प्रजा की वास्तविक धारणा जानने के लिए गुप्तचर भेजते हैं। वे अनेक घरों में स्त्री-पुरुषों को राम के देवत्व, पुण्य, और रक्षक-राजा के रूप में प्रशंसा करते सुनते हैं; दूध पिलाने, प्रेम-विनोद, और पासे खेलने जैसे साधारण कर्मों में भी राम-स्मरण जुड़ा दिखता है। परन्तु एक धोबी का कठोर कथन—कि जो पत्नी पराये घर रही हो उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए—लोक-चर्चा का कारण बनता है। गुप्तचर राम की आज्ञा से हिंसा नहीं करते और उस दुष्ट वचन को रिपोर्ट न करने का निश्चय करते हैं।
Bharata’s Counsel (Bharatavākya)
प्रातःकर्म और सभा-कार्य पूर्ण करके राघव राजा एकान्त में जाकर छद्मवेशधारी गुप्तचरों से प्रजा की धारणा सुनते हैं। पाँच चर उनके यश और पराक्रम की प्रशंसा करते हैं; छठा अनिच्छा से कारीगरों की चर्चा बताता है—एक धोबी कहता है कि राक्षस-गृह में रहकर आई सीता को राम ने स्वीकार किया, इसलिए वह अपनी पत्नी को भी नहीं रखेगा। यह सुनकर राम शोक से मूर्छित हो जाते हैं। चेतना लौटने पर वे भरत को बुलाते हैं। भरत अग्निपरीक्षा, लंका में सीता की मर्यादा और ब्रह्मा के प्रमाण-वचन का स्मरण कराकर उनकी पवित्रता सिद्ध करता है। फिर भी राम लोकापवाद के भय से, राजधर्म और प्रतिष्ठा के भार को प्रधान मानकर, सीता के निर्दोष होने को जानते हुए भी त्याग का कठोर निश्चय करते हैं।
Sītā and the Parrot Pair: Prophecy of Rāma, Rāma’s Form, and the Curse Causing Separation
इस अध्याय में वात्स्यायन पूछते हैं कि भगवान ने जानकी के वचन-प्रकट होने और उसके पाठ का विधान कैसे किया। शेष/अनन्त उत्तर देते हुए कथा को मिथिला में जनक के राज्य में स्थापित करते हैं और सीता के भूमिजा रूप से प्राकट्य तथा नामकरण का प्रसंग बताते हैं। फिर सीता को एक दिव्य शुक-युगल मिलता है। उनके वचन में भविष्यवाणी है—राम का भावी राज्याभिषेक, सीता की पहचान, और वाल्मीकि-आश्रम में आगे चलकर रामायण का पाठ। वे राम की वंश-परंपरा और उनके भ्राताओं का परिचय देते हैं तथा राम के शुभ, तेजस्वी स्वरूप का भक्तिपूर्वक वर्णन करते हुए कहते हैं कि भाषा उनके गुणों का पूर्ण वर्णन नहीं कर सकती। जब सीता शुकी को रोक लेती हैं, तब विरह, शोक और क्रोध से स्थिति तीव्र हो जाती है और एक शाप निकलता है, जो आगे राम-सीता-वियोग का पुराणोक्त कारण बनता है। अंत में वाणी और क्रोध के दुष्परिणामों से सावधान करने वाली शिक्षा दी जाती है।
Janaki’s Vision of the Ganga (Gaṅgā-Darśana and the Prelude to Abandonment)
इस अध्याय में सीता के विषय में लोकापवाद उठता है—नीच जन (धोबी) के कथन से राज्य में निंदा फैलती है। यह सुनकर राम के भ्राता शोक से व्याकुल होकर मूर्छित-से हो जाते हैं। शत्रुघ्न जानकी की निष्कलंकता का दृढ़ समर्थन करता है और गंगा की सर्वपावनता का दृष्टान्त देकर कहता है कि जैसे गंगा सबको शुद्ध करती है, वैसे ही सीता सर्वथा निर्दोष हैं; अतः उनका त्याग न किया जाए। परन्तु राम लोक-निन्दा से बचकर अपनी कीर्ति को निर्मल रखने का निश्चय करते हैं। वे लक्ष्मण को आज्ञा देते हैं कि गर्भवती सीता की इच्छा-पूर्ति के बहाने तपस्विनियों के दर्शन हेतु उन्हें वन ले जाओ और वहीं छोड़ आओ। लक्ष्मण भीतर से टूटता है, फिर भी आज्ञा का पालन करता है। रथ के चलने पर अशुभ शकुन होते हैं—नेत्र फड़कना, अपशकुन पशु-पक्षियों का दिखना, पक्षियों का मार्ग बदलना। अंत में सीता जाह्नवी गंगा के दर्शन करती हैं—दिव्य पावनी के रूप में—और लक्ष्मण उनसे उतरने का निवेदन करता है; यहीं से राजाज्ञा और वन-निर्वासन के बीच की सीमा स्पष्ट हो जाती है।
The Origin Narrative of Kuśa and Lava (Sītā’s Exile and Vālmīki’s Refuge)
राम की आज्ञा से सौमित्रि लक्ष्मण सीता को जह्नवी (गंगा) पार कराकर भयावह वन में ले जाता है। काँटों के घाव, दावानल, हिंसक पशु और अशुभ पक्षियों की ध्वनि—सब सीता के भीतर उठते आघात और शोक का मानो दृश्य रूप बन जाते हैं। सीता बार-बार लक्ष्मण से सत्य पूछती है; त्याग का कारण सुनकर वह मूर्छित होती है और लोकापवाद के अन्याय तथा राम के प्रतीत होने वाले विरोधाभास पर करुण विलाप करती है। उसके क्रन्दन को सुनकर महर्षि वाल्मीकि शिष्यों सहित आते हैं, उसे सांत्वना देते हैं और स्वयं को जनक के आध्यात्मिक आचार्य के रूप में बताकर आश्रम में शरण देते हैं। वहाँ सीता राम-भक्ति में स्थित होकर तपस्विनी-सा जीवन बिताती है और समय आने पर दो पुत्रों को जन्म देती है। वाल्मीकि उनके संस्कार करते हैं; कुश और लव नाम कुशा-लव घास के पावन संयोग से पड़ते हैं, और आगे वे वेद, धनुर्वेद तथा रामायण के पाठ में प्रशिक्षित होते हैं।
Defeat of the Army and the Death of the Commander Kāla-jit
शेष–वात्स्यायन संवाद के अंतर्गत इस अध्याय में बताया गया है कि बालक लव द्वारा अश्वमेध का घोड़ा पकड़े जाने के बाद संघर्ष और तीव्र हो जाता है। पहले हुए भारी नुकसान से चकित शत्रुघ्न की सेना सेनापति कालजित के नेतृत्व में आगे बढ़ती है। कालजित लव के पास कूटनीति और आश्चर्य के साथ पहुँचता है; वह बालक में दिव्यता का संकेत देखकर भी युद्ध से पीछे नहीं हटता। लव वाल्मीकि के स्मरण और जानकी की कृपा से अद्भुत पराक्रम दिखाता है—वह शस्त्र तोड़ देता है, घोड़ों और हाथियों को निष्क्रिय कर देता है और अंततः कालजित का वध कर देता है। सेनाओं में भगदड़ मच जाती है; बचे हुए सैनिक शत्रुघ्न को समाचार देते हैं। शत्रुघ्न क्रोध और अविश्वास से पूछता है कि ‘काल को जीतने वाला’ सेनापति एक बालक से कैसे मारा गया, और आगे की रणनीति का निर्णय करने को उद्यत होता है।
The Fall (Feigning/Collapse) of Hanumān
राम-अश्वमेध के प्रसंग में शत्रुघ्न यह जानने निकलते हैं कि यज्ञ का अश्व किसने पकड़ा है। वे वाल्मीकि-आश्रम के निकट पहुँचते हैं, जहाँ क्षत्रियों की उपस्थिति को अनुचित बताया गया है। वहीं लव निर्भय होकर आगे बढ़ती संयुक्त सेना का सामना करता है, प्रचण्ड बाण-वर्षा से बहु-वलय व्यूह को तोड़ देता है। पुष्कल लव को ललकारता है और रथ देने का प्रस्ताव करता है; पर लव धर्म का स्मरण कर उसे अस्वीकार करता है—युद्ध के लिए दान लेना पाप और क्षत्रिय-धर्म के विरुद्ध है। वह पुष्कल का रथ चूर कर उसे पराजित कर देता है। तब हनुमान (मारुति) वृक्षों और शिलाओं से आक्रमण करते हुए युद्ध में उतरते हैं, किन्तु लव के तीक्ष्ण बाणों से रोके जाते हैं और अंत में गिर पड़ते हैं—इसे वरदान के कारण मूर्छा या कपट-पतन कहा गया है। अध्याय का उपसंहार ‘हनुमान का पतन’ नाम से होता है।
Lava’s Fainting (The Battle with Śatrughna in the Aśvamedha Cycle)
पातालखण्ड के रामाश्वमेध प्रसंग में रण का वर्णन चलता है। मारुति (हनुमान) के मूर्छित होने का समाचार सुनकर शत्रुघ्न विचलित हो उठता है और फिर बालक होते हुए भी राम-सदृश तेज वाले लव के सामने आता है। दोनों में चुनौती, परिचय-प्रश्न और युद्ध-निश्चय का संवाद होता है। इसके बाद दीर्घ धनुर्विद्या-युद्ध छिड़ता है। लव का अक्षय शर-पंजर आकाश-पृथ्वी को भर देता है, और शत्रुघ्न विशाल बाण-वृष्टि को काट-काटकर प्रतिकार करता है। लव बार-बार शत्रुघ्न का धनुष तोड़ देता है और उसके रथ को भी निष्क्रिय कर देता है। तब सुरथ, विमल, वीरमणि, सुमद, रिपुताप आदि सहायक राजा अनुचित रीति से लव को घेरते हैं, पर लव दस-दस बाणों से सबको रोक देता है। अंत में शत्रुघ्न चेतना पाकर गर्वपूर्वक भयंकर अस्त्र चलाता है। कुश का स्मरण करते हुए लव काल-सदृश बाण से आहत होकर सहसा मूर्छित हो जाता है—यही अध्याय का चरम बिंदु है, जिससे आगे पहचान और अश्वमेध-संघर्ष की कथा नया मोड़ लेती है।
Śatrughna’s Fainting (The Victory of Kuśa)
रामा के अश्वमेध-परिक्रमण के समय युद्ध में लव मूर्छित होकर पकड़े गए। यह समाचार व्याकुल बालिकाओं द्वारा सीता को मिला; उन्होंने एक बालक से राजा का युद्ध अन्याय है कहकर विलाप किया और शोक से मूर्छित हो गईं। उज्जयिनी में महाकाल की पूजा करके लौटे कुश ने लव के बंधन का वृत्तांत सुना तो उन्हें छुड़ाने की प्रतिज्ञा की। सीता ने आशीर्वाद देकर दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए और उन्हें रणभूमि की ओर भेजा। दोनों भाइयों ने सेना को विपरीत दिशाओं में खदेड़ दिया। तब शत्रुघ्न ने कुश से सामना कर परिचय पूछा; सीता-पुत्र जानकर भी उसने युद्ध किया। अग्नि के विरुद्ध वर्षा, वायु के विरुद्ध पर्वत, वज्र तथा नारायणास्त्र तक—अस्त्र-प्रत्यस्त्र का घोर संग्राम हुआ। अंत में कुश ने तीन बाणों से शत्रुघ्न को गिराने की शपथ लेकर प्रहार किया और शत्रुघ्न धराशायी हो गए। इस प्रकार कुश की विजय हुई, इसलिए यह अध्याय ‘कुशजय’ कहलाता है।
Sainyajīvana — The Life/Conduct (and Revival) of the Army
शेष–वात्स्यायन संवाद के भीतर इस अध्याय में अश्वमेध-क्षेत्र का युद्ध तीव्र हो उठता है। सुरथ कुश पर आक्रमण करता है, पर कुश उसे गिरा देता है। हनुमान कुश से भिड़ते हैं; प्रचण्ड अस्त्र से आहत होकर वे मूर्छित हो जाते हैं। फिर सुग्रीव आक्रमण करते हैं, किंतु कुश के वरुण-पाश से बँध जाते हैं। लव अनेक वीरों को पराजित कर कुश के साथ आ मिलते हैं। दोनों भाई मुकुट-आभूषण समेटकर बँधे हुए हनुमान और सुग्रीव को आश्रम की ओर ले जाते हैं। सीता/जानकी बंदियों को देखकर मुस्कराती हैं और उन्हें छोड़ने को कहती हैं, साथ ही राम के यज्ञ-अश्व को पकड़ने की निन्दा करती हैं। कुश-लव क्षत्रिय-धर्म और आज्ञापालन का आधार बताकर अपने कर्म का समर्थन करते हैं, फिर बंदियों और अश्व को मुक्त कर देते हैं। अंत में राम-भक्ति पर आधारित सत्य-कर्म से राजा के प्राणों की रक्षा का विधान होता है और यह प्रतिपादित होता है कि केवल शौर्य से बढ़कर भक्ति की महिमा है।
Sumati’s Report (Account of the Horse’s Wanderings and Return)
युद्ध में शत्रुघ्न के मूर्छित हो जाने और सेना के विखर जाने पर करुणा से यज्ञाश्व लौटा दिया जाता है, ताकि अश्वमेध यज्ञ निर्विघ्न पूर्ण हो सके। फिर सब लोग राम के पास लौटते हैं; सरयू-तट पर राजकीय शोभायात्रा, उत्सव की तैयारियाँ, मंडप, वेद-पाठ और अतिथियों के लिए अन्न-जल की प्रचुर व्यवस्था का वर्णन आता है। राम शत्रुघ्न से भावपूर्ण मिलन करते हैं और पुष्कल तथा सहायक राजाओं का यथोचित सम्मान करते हैं। इसके बाद वे मंत्री सुमति से पूछते हैं कि अश्व किस मार्ग से गया और किन-किन नरेशों से सामना हुआ। सुमति विनयपूर्वक क्रमबद्ध विवरण आरम्भ करते हैं—अश्व की यात्रा, राजाओं का समर्पण, अहिच्छत्रा का प्रसंग, सुभाहु की नगरी की घटना, रेवा-सरोवर पर मोहनास्त्र की प्राप्ति, देवपुर का वृत्तान्त; और अंत में वाल्मीकि-आश्रम में राम-सदृश एक युवक द्वारा अश्व को पकड़कर सेना को पराजित करने तथा फिर उसे लौटा देने की कथा।
The Recitation of the Ramayana
इस अध्याय में बताया गया है कि सीता के वन-त्याग के बाद वाल्मीकि-आश्रम में पले-कुश और लव वेद, धनुर्विद्या और संगीत में निपुण होकर रामायण के गायक के रूप में प्रसिद्ध हो जाते हैं। उनके गान से वरुण तथा लोकपाल भी मुग्ध होते हैं और सीता की पवित्रता का धर्मसम्मत प्रतिपादन करते हुए उसके पुनर्स्थापन का आग्रह करते हैं। वाल्मीकि के निर्देश पर श्रीराम लक्ष्मण को सीता और दोनों पुत्रों को लाने भेजते हैं। लक्ष्मण पश्चात्ताप से भरे हुए आश्रम पहुँचते हैं; सीता दुःख के साथ भी अपनी मर्यादा और सत्यनिष्ठा बनाए रखती हैं—पुत्रों को पिता के सम्मान हेतु भेज देती हैं, पर स्वयं तपस्या में स्थित रहने का व्रत चुनती हैं। राजसभा में दोनों बालक रामायण का गायन करते हैं; राम उन्हें पहचान लेते हैं। अंत में वत्स्यायन पूछते हैं कि वाल्मीकि ने कब और क्यों रामायण की रचना की—जिससे क्रौंच-पक्षी की घटना और ब्रह्मा/सरस्वती की प्रेरणा का प्रसंग आरम्भ होता है।
Commencement of Rāma’s Aśvamedha Sacrifice
इस अध्याय में श्रीराम के अश्वमेध यज्ञ का विधिपूर्वक विस्तार वर्णित है। सौमित्रि लक्ष्मण वाल्मीकि-आश्रम से सीता को लाकर अयोध्या पहुँचाते हैं; सीता मेल-मिलाप स्वीकार कर राजमाताओं के आशीर्वाद पाती हैं और राम के साथ यज्ञ-मण्डप में विराजती हैं। नगर में उत्सव छा जाता है और ऋषि तथा राजा यज्ञ में एकत्र होते हैं। वसिष्ठ बताते हैं कि ब्राह्मण-पूजन और दान से यज्ञ पूर्ण होता है। तब राम अगस्त्य, व्यास, च्यवन आदि महर्षियों का सत्कार कर स्वर्ण, वस्त्र, गौ आदि का महादान करते हैं; सब लोग यज्ञ की सिद्धि की प्रशंसा करते हैं। यज्ञ के बीच दीक्षित शस्त्र के स्पर्श से अश्व से एक तेजस्वी देव प्रकट होता है। वह अपने पूर्वजन्म के कपट, दुर्वासा के शाप से पशु-योनि, और राम-स्पर्श से मुक्ति का वृत्तान्त कहता है। अंत में यह प्रतिपादित होता है कि हरि/राम का स्मरण—even अपूर्ण भक्ति से आरम्भ होकर भी—अत्यन्त उद्धारक है; फिर वसिष्ठ कर्पूर मँगवाकर देवताओं के आवाहन सहित आहुतियाँ चलाने को कहते हैं।
Description of the Merit of Hearing and Reciting (Rāma-kathā)
इस अध्याय में राम-अश्वमेध यज्ञ की कथा का समापन बताया गया है। देवताओं की उपस्थिति के बीच भी विधिपूर्वक आहुतियाँ, ब्राह्मणों को दान, और सरयू तट पर अवभृथ-स्नान द्वारा यज्ञ की पूर्णता स्थापित होती है। वसिष्ठ अंतिम कर्मों का निर्देश देते हैं और जनसमुदाय को आशीर्वाद देते हैं; राम सीता, ऋषियों, राजाओं और उत्सव-समूह के साथ सरयू में स्नान कर महोत्सव-वैभव में प्रशंसित होते हैं। फिर फलश्रुति आती है—राम की मंगलमयी कथा का श्रवण और पाठ करने से ब्रह्महत्या जैसे महापाप भी नष्ट हो जाते हैं। इससे पुत्र, धन, आरोग्य, समृद्धि, मुक्ति और परम धाम की प्राप्ति होती है। गोदान, वस्त्र-दान, अन्न-दान, गुरु-सम्मान तथा राम-सीता की स्वर्ण-प्रतिमा का दान इस पुण्य को स्थिर और पूर्ण करने वाला कहा गया है।
The Greatness of Vṛndāvana: Gokula as a Thousand-Petalled Lotus and the Sacred Map of Vraja
ऋषि कृष्ण के परम माहात्म्य को सुनना चाहते हैं। तब सूत एक अंतःसंवाद का प्रसंग लाते हैं, जहाँ पार्वती शिव से पूछती हैं कि श्रीकृष्ण का सबसे प्रिय और सर्वोच्च धाम कौन-सा है। महादेव बताते हैं कि वृन्दावन/गोकुल ही परम रहस्य-धाम है, जो ब्रह्माण्ड-कोश से परे है; वैकुण्ठ आदि लोक उसके केवल आंशिक प्रतिबिम्ब मात्र हैं। इसके बाद अध्याय मथुरा और व्रज का पवित्र मानचित्र कमल-रचना में प्रस्तुत करता है—हजार-पंखुड़ी का कमल, उसकी कर्णिका/सिंहासन-छवि, तथा दिशानुसार व्यवस्थित पंखुड़ियाँ जिनमें लीला-स्थल, सिद्ध-पीठ और तीर्थ क्रम से बताए गए हैं। यमुना के दोनों तटों पर स्थित बारह वनों का भी विभाजन सहित वर्णन आता है। अंत में धाम के आनंदमय स्वभाव, मंत्र-योग से गोविन्द के दिव्य रूप के दर्शन, और ‘धूलि-स्पर्श’ मात्र से मुक्ति देने वाली महिमा का प्रतिपादन होता है; साथ ही राधा को कृष्ण की आद्य-प्रिय शक्ति के रूप में सर्वोच्च बताया जाता है।
Description of Govinda’s Divine Assembly: Rādhā, Attendants, Vyūhas, and Mantra-Bhakti
इस अध्याय में गोविन्द के दिव्य धाम और उनकी सभा का दर्शन वर्णित है। गोविन्द राधा सहित सिंहासन पर विराजमान हैं; ललिता आदि प्रमुख शक्तिरूप सेविकाएँ प्रकृति-तत्त्व से जोड़ी गई हैं और राधिका को मूल-प्रकृति कहा गया है। दिशाओं, द्वारों और परिकरों में सखियों के समूह, असंख्य गोपियाँ तथा दिव्य स्त्रियाँ कृष्ण-विरह की तड़प में भी प्रेम-रस में निमग्न दिखाई देती हैं। आगे स्वर्णमय मण्डप, प्राकार, उद्यान, कल्पवृक्ष आदि से युक्त मंदिर-सदृश विराट रचना का चित्रण आता है। फिर वासुदेव तथा अन्य व्यूह-स्वरूपों का, उनकी सहचरी देवियों सहित, प्रकाशन होता है और शुद्ध-सत्त्वमय वैष्णव श्रेष्ठ जनों की उपस्थिति बताई जाती है। अंत में अंतर्मुखी भक्ति और ‘मन्त्र-चूडामणि’ को मन्त्रों की जननी बताकर उपदेश दिया गया है; पाठ करने और सुनने वालों को गोविन्द-प्रेम का परम आनन्द फलरूप कहा गया है।
The Greatness of Śrī Rādhā and Kṛṣṇa
पार्वती के प्रश्न से प्रेरित होकर महादेव एक उपाख्यान सुनाते हैं। कृष्णावतार का समाचार पाकर नारद गोकुल आते हैं, बालकृष्ण और व्रजवासियों की निष्कपट भक्ति देखकर आनंदित होते हैं। फिर वे गोप-गृहों में लक्ष्मी की लीला-प्रकटता को खोजने लगते हैं। भानु के घर में उन्हें एक अद्भुत स्त्री-तत्त्व का आभास होता है और वे दीर्घ स्तुति करते हैं—उसे शक्ति, महामाया और हरि की प्रिया बताकर, विश्व-शक्ति और व्रज-रस की मधुरता का संगम दिखाते हैं। आगे वह कन्या मनोहर यौवन-रूप धारण करती है; सखियाँ नारद को गोवर्धन के पास कुसुम-सरोवर के निकट अशोक-लता पर मध्यरात्रि के मिलन-स्थल का संकेत देती हैं। वहाँ अशोकमालिनी अपने वसन्तोत्सव-पूजन का वर्णन कर हरि-भक्ति का मार्ग बताती है और हरि-प्रिया के गूढ़ रहस्य की ओर नारद को अंतर्मुख करती है। वह समझाती है कि भक्ति और दर्शन दुर्लभ हैं और केवल कृपा से प्राप्त होते हैं।
Gopāla-vidyā and Vraja-bhakti: Ascetics, Mantras, and Rebirth among the Gopīs
इस अध्याय में महादेव पार्वती से गोपाल-विद्या का रहस्य और व्रज-भक्ति की महिमा कहते हैं। उग्रतपा, सत्यतपा, हरिधाम, जाबालि आदि तपस्वी कृष्ण-मंत्रों का जप करते हुए काम-बीज के संयोग से सिद्धि, दर्शन और स्वप्न-रूप दिव्य अनुभूति प्राप्त करते हैं; अंततः वे गोकुल/नन्दवन में गोपियों या उनके सेवक-स्वरूप में पुनर्जन्म पाते हैं। दस, पंद्रह, अठारह, बीस और पच्चीस अक्षरों वाले मंत्रों के जप तथा वृन्दावन-केंद्रित ध्यान का वर्णन है—रास, वेणु-नाद, पीताम्बर, वैजयन्ती-माला आदि दिव्य रूप-छवियों सहित। सुनन्दा, भद्रा, रङ्गवेणी जैसी गोपिकाओं के प्रसंग व्रज-सेवा और प्रेममय साधना को पुष्ट करते हैं। एक निर्णायक उपदेश में ‘मैं ब्रह्मविद्या हूँ’ कहने वाली एक तपस्विनी बाला स्वीकार करती है कि कृष्ण के प्रति प्रेम-भक्ति के बिना ज्ञान अपूर्ण है, और वह पूजन-विधि का उपदेश देती है। अंत में पुण्यश्रवा और उसके पुत्र को शिवकृपा से गोपाल-विद्या का दान, तथा ज्योतिर्मय वृन्दावन-द्वीप का मानक ध्यान बताया जाता है। फलश्रुति में पाठ से वासुदेव-धाम की प्राप्ति और मोक्ष का आश्वासन दिया गया है।
Narration of the Glory of Vṛndāvana and the Sacred Places Beginning with Mathurā
इस अध्याय में आरम्भ में यह कहा गया है कि देवता भी कभी-कभी मोह में पड़ जाते हैं; फिर रहस्य-उपदेश की परम्परा से कथा आगे बढ़ती है। भक्त राजा अम्बरीष बदरी-आश्रम में एक मुनि के पास जाकर विष्णु-धर्म पूछते हैं। वहाँ ब्रह्म का स्वरूप सच्चिदानन्द बताया जाता है और ‘मन की परम गति’ को अत्यन्त गोपनीय विषय के रूप में समझाया जाता है। तपस्या से प्रसन्न होकर श्रीहरि भक्त को दर्शन देते हैं और व्रज का दिव्य दृश्य प्रकट होता है—वृन्दावन के कदम्ब-कुञ्ज में गोपाल-रूप श्रीकृष्ण, यमुना, गोवर्धन और गोपियाँ। इसके बाद व्रज-तत्त्वों का प्रतीकात्मक अर्थ भी बताया जाता है, जैसे गोपियों को वेद-ऋचाओं के समान माना गया है। यज्ञ-आदर में त्रुटि/अवमानना से उत्पन्न कर्मफल का एक नैतिक-कारणक प्रसंग भी आता है। अंत में मथुरा-माहात्म्य विस्तार से कहा गया है और यह प्रतिपादित होता है कि हरि-भक्ति के साथ शिव (भूतेश्वर) का सम्मान अनिवार्य है। पाठ-श्रवण की फलश्रुति में मुक्ति का आश्वासन दिया गया है।
Arjuni’s Entreaty: The Secret Vision of the Supreme Abode and Devī-mediated Access to Kṛṣṇa-līlā
इस अध्याय में गोविन्द के परम क्रीड़ा-धाम का रहस्य बहु-स्तरीय संवाद के रूप में प्रकट होता है। प्रश्न उठता है कि वह लोक कहाँ है जहाँ गोविन्द गोपियों के साथ नित्य विहार करते हैं; पर कहा जाता है कि वह ब्रह्मा और देवताओं को भी अदृश्य है, केवल वर्णन से नहीं, अनुभव से ही जाना जाता है। अर्जुन विनम्र होकर उसी दर्शन की याचना करता है। देवी त्रिपुरसुन्दरी/परमेश्वरी यहाँ मध्यस्थ अधिकारिणी बनती हैं। अर्जुन तीर्थ-स्नान, न्यास, मुद्रा, मन्त्र-जप और पुरश्चरण-सदृश साधनाएँ करके ‘परम विद्या’ प्राप्त करता है; देवी उसे गोलोक से भी ऊपर नित्य वृन्दावन में ले जाती हैं जहाँ निरन्तर रास-लीला होती है। भगवान की माया से अर्जुन ‘अर्जुनी’ रूप में सखी-भाव धारण करता है; व्रज की सखियाँ उसे स्वीकार कर नाम-समूह बताती हैं और गोकुलनाथ-सम्बन्धी मन्त्र-व्रत-विधियाँ सिखाती हैं। अंत में वह कृष्ण-लीला में गुप्त रूप से सहभागी बनता है और गोपनीयता की प्रतिज्ञा दोहराता है; इस अध्याय के श्रवण-पाठ से हरि में रति उत्पन्न होने का फल कहा गया है।
The Glory and Secret Theology of Vṛndāvana (in the context of Nārada’s supplication)
पार्वती शिव से पूछती हैं कि वृन्दावन का रहस्य सुनकर नारद ने अपना “सच्चा स्वरूप” कैसे पाया। शिव रहस्य-परम्परा बताते हैं—ब्रह्मा श्रीकृष्ण के पास जाकर ‘बत्तीस वनों’ वाले वृन्दारण्य के विषय में पूछते हैं, जहाँ जीव साक्षात् दिव्य भाव से रहते हैं और वहाँ देह त्याग करने से कृष्ण-सान्निध्य प्राप्त होता है। फिर कथा में नैमिषारण्य के शौनक आदि ऋषियों को नारद का उपदेश, तथा गौतम ऋषि के साथ उनका प्रसंग आता है। महाविष्णु की आज्ञा से नारद अमृत-सरोवर में स्नान करते हैं, स्त्री-रूप धारण कर धाम-सेवा के अंतरंग भाव में प्रवेश पाते हैं; ललिता-देवी कृष्ण-लीला में पुरुष-स्त्री तत्त्व की अभिन्नता/अत्यन्त एकता का रहस्य प्रकट करती हैं। साथ ही कठोर गोपनीयता का विधान है—अयोग्य को यह रहस्य बताने से अपराध और शाप का भय; और इस अध्याय के श्रवण-पठन से परम सिद्धि का फल कहा गया है।
The Liberation of Vraja (Vṛndāvana Māhātmya: Kṛṣṇa grants Vaikuṇṭha to Nanda’s Vraja)
शिशुपाल के वध के बाद दन्तवक्त्र मथुरा आकर श्रीकृष्ण से युद्ध करता है। भगवान वासुदेव उसे रण में मारकर यमुना पार करते हैं और नन्द के व्रज में लौट आते हैं। वहाँ वे माता-पिता और वृद्धजनों को प्रणाम कर सांत्वना देते हैं, वस्त्र-आभूषण बाँटते हैं और कालिन्दी (यमुना) के रमणीय तट पर गोपियों के साथ तीन रात्रियों तक क्रीड़ा करते हैं। श्रीकृष्ण की कृपा से नन्द, समस्त व्रजवासी अपने परिवारों सहित, यहाँ तक कि पशु भी दिव्य रूप धारण कर विमान में आरूढ़ होते हैं और वैकुण्ठधाम को प्राप्त करते हैं। फिर भगवान द्वारावती में प्रवेश करते हैं, जहाँ यदुवंशियों और अपने पार्षदों द्वारा नित्य पूजित होकर रानियों के साथ राजसी-दिव्य लीला का आस्वाद करते हैं। अंत में अध्याय मोक्ष-तत्त्व पर ठहरता है—व्रज और द्वारका के जनों को परम पद में प्रतिष्ठित कर श्रीकृष्ण सबके लिए उपदेश का आरम्भ करते हैं।
Description of the Form of Śrī Kṛṣṇa (Vṛndāvana Vision and Rādhā’s Manifestations)
पार्वती महादेव से दिव्य नामों, उनके अर्थों, ईश्वर के स्वरूप और पवित्र धामों की महिमा का विस्तार से वर्णन करने की प्रार्थना करती हैं। आरम्भ में एक अंतःप्रश्न भी उभरता है—विष्णु का परम धाम, हरि के व्यूह और निर्वाण का तत्त्व क्या है। तब ईश्वर वृन्दावन का रहस्य प्रकट करते हैं—वह आनन्द-वन है जहाँ श्रीकृष्ण रत्न-वैभव से दीप्त सिंहासन पर विराजमान हैं, गोपियों से घिरे हुए, उत्सव-रस और उल्लास से परिपूर्ण। इसके बाद अध्याय कृष्ण-तत्त्व का गहन चित्र प्रस्तुत करता है—वे गुणातीत हैं, उनका रूप भौतिक नहीं, नित्य और अविनाशी है; उनकी सत्ता अपरिमेय है। राधा वृन्दावनेश्वरी तथा प्रधान-शक्ति के रूप में प्रकट होती हैं; उनके अनेक नाम और विविध प्राकट्य वृन्दावन, द्वारका, वाराणसी, पुरुषोत्तम-क्षेत्र आदि तीर्थों और नगरों में बताए जाते हैं। अंत में ध्यान-उपदेश दिया जाता है कि स्मरण, नाम-जप/नाम-स्मरण और मन को आनन्द देने वाले गीत-कीर्तन से शुद्ध प्रेम (प्रेम) का उदय होता है।
Determination and Worship of Śālagrāma (Vaiṣṇava Purifications and Fivefold Pūjā)
इस अध्याय में पार्वती वैष्णवों के उस धर्म को पूछती हैं जिससे वे संसार-सागर को पार कर जाते हैं। ईश्वर वैष्णव-शुद्धि का उपदेश देते हैं और बताते हैं कि भक्ति ही घर, शरीर, वाणी और इन्द्रियों की सच्ची शुद्धि है—प्रदक्षिणा, चरण-प्रक्षालन, पुष्प-संग्रह, नाम-कीर्तन तथा हरि की लीलाओं और उत्सवों के श्रवण-दर्शन से पवित्रता बढ़ती है। फिर पूजा को पाँच भागों में व्यवस्थित किया गया है—अभिगमन (मन्दिर-गमन, शुद्धि व मार्जन), उपादान (पूजा-सामग्री का संग्रह), योग (अन्तर्मन से ध्यान), स्वाध्याय (अर्थ सहित जप, स्तोत्र और संकीर्तन), तथा इज्या (विधिपूर्वक अर्चना)। आगे शालग्राम-पूजा का विधान आता है—आयुध-क्रम के अनुसार केशव, नारायण, माधव, गोविन्द आदि नामों का निर्धारण, नमस्कार, शिला-चिह्नों से व्यूह/अवतार-लक्षण की पहचान, सहायक देवताओं की स्थापना, और अंत में पुरुषार्थों की प्राप्ति का फल बताया गया है।
Determination of Tilaka and Associated Vaiṣṇava Practices (Śālagrāma, Tīrtha, Etiquette, and Offerings)
इस अध्याय में हरि की साक्षात् उपस्थिति शालग्राम-शिला, पूजा-सामग्री, मण्डल और मूर्ति में कैसे मानी जाती है—यह तत्त्व बताया गया है। गण्डकी-तीर्थ में शालग्राम की उत्पत्ति तथा द्वारावती/द्वारका की महिमा वर्णित है; वहाँ स्नान, दान और पूजन से पुण्य अनेकगुणा बढ़ता है और मुक्ति का फल मिलता है। शालग्राम का क्रय-विक्रय और उसे वस्तु की तरह बरतना निषिद्ध कहा गया है। फिर वैष्णव-परिचय के रूप में द्वादश-नाम तिलक-विधान, शरीर के विभिन्न स्थानों पर उसका विन्यास, ऊर्ध्व-पुण्ड्र की श्रेष्ठता और उसके सही आकार-नियम बताए गए हैं। तुलसी-मिश्रित शंखोदक के ग्रहण-विधि, मंदिर-शिष्टाचार, विष्णु-अपचारों की सूची, क्षमा-प्रार्थना का मंत्र और साष्टांग प्रणाम का विधान आता है। अंत में ऋतु-आहार संबंधी संयम, तुलसी और आँवला के पुण्य तथा मोक्ष-साधक तुलसी-स्तुति के साथ अध्याय पूर्ण होता है।
The Glory of Vṛndāvana (Hari-nāma and Vaiṣṇava Observances in Kali-yuga)
उमा (पार्वती) पूछती हैं कि कलियुग में विषयों के जाल, गृहस्थी के क्लेश और मन की चंचलता के बीच जीवन कैसे टिके। महेश्वर (शिव) कहते हैं कि इस युग का कठोर किंतु सरल उपाय केवल हरि-नाम है—“हरे राम हरे राम… हरे कृष्ण हरे कृष्ण…” का जप और श्रीराम-श्रीकृष्ण का निरंतर स्मरण ही सब दुःखों का क्षय करता है। फिर नाम-स्मरण से शुद्धि, हरि-नाम लेते हुए गंगा-स्नान, और गोविंद की शरण से महापापों के नाश का वर्णन आता है। आगे व्रत-उत्सवों की विधियाँ बताई जाती हैं—ज्येष्ठ में अभिषेक, एकादशी पर शयन-प्रबोधन के नियम, कार्तिक में दीपदान, तथा ब्राह्मणों और वैष्णव भक्तों को भोजन कराना। शोभायात्रा, डोलोत्सव, सुगंधित लेपन और विविध अर्पणों सहित अंत में व्रज-वृंदावन-भक्ति को सर्वोच्च साधना और परम आश्रय कहा गया है।
The Mantra-cintāmaṇi of Kṛṣṇa and the Dhyāna of Rādhā-Kṛṣṇa in Vṛndāvana (Provisional Title)
ऋषि सूतजी की स्तुति करके कृष्ण-लीला का दिन-प्रतिदिन वर्णन माँगते हैं और विशेष रूप से गुरु, शिष्य तथा मंत्र की पहचान और विधि पूछते हैं। सूतजी यमुना-तट की अंतर्कथा सुनाते हैं, जहाँ नारद जगद्गुरु सदाशिव के पास जाकर रहस्य पूछते हैं। शिव ‘मंत्र-चिन्तामणि’ नामक गोपनीय कृष्ण-मंत्र का उपदेश देते हैं—उसके पाँच-पद, दशाक्षर और षोडशाक्षर रूपों का संकेत करते हुए, एक बार जप से भी सिद्धि और फल की आश्वस्ति देते हैं। ग्रंथ भक्ति के आधार पर व्यापक अधिकार बताता है, परंतु अश्रद्धालु और अभक्त को मंत्र-दान निषिद्ध करता है। फिर ऋषि, छंद, देवता, विनियोग, बीज-शक्ति, न्यास और पूजन आदि सहायक अंगों का क्रम बताकर वृन्दावन में राधा-कृष्ण के ध्यान का विस्तृत वर्णन करता है। मंत्रार्थ को ‘युगलार्थ’ और पूर्ण शरणागति के रूप में समझाया गया है—सब कुछ दिव्य युगल के लिए ही है।
Initiation Rite, the Five Vaiṣṇava Saṃskāras, and the Dharma of Surrender (within the Greatness of Vṛndāvana)
यह अध्याय वैष्णव दीक्षा और शरणागति के मार्ग का क्रमबद्ध निरूपण करता है। जगत की अनित्यता और त्रिविध दुःख को देखकर वैराग्य उत्पन्न होता है; तब साधक सत्य गुरु की शरण ग्रहण करता है। गुरु-शिष्य के लक्षण बताए गए हैं और दीक्षा के चिह्नों सहित वैष्णव ‘पञ्च-संस्कार’ समझाए गए हैं—शंख-चक्र का अंकन, ऊर्ध्व-पुण्ड्र धारण, मंत्र-ग्रहण, दास-नाम की प्राप्ति, तथा याग/आराधना जो गुरु और वैष्णवों की पूजा-सेवा के रूप में मानी गई है। फिर शरणागति-धर्म सिखाया गया है—हरि पर एकान्त निर्भरता, प्रतिद्वन्द्वी देवता-पूजा का त्याग, और वैष्णवों के प्रति कठोर श्रद्धा व आदर। अंत में वृन्दावन-माहात्म्य के प्रसंग में शिव को कृष्ण का दिव्य दर्शन होता है; कृष्ण रुद्र को गूढ़ तत्त्व, निर्गुण-सगुण के रहस्य और राधा-भाव की सर्वोच्चता बताते हैं। अंततः शिव को परम ‘युगल-मंत्र’ दीक्षा-विधि सहित प्रदान किया जाता है।
The Glory of Vṛndāvana and the Daily Līlā of Hari
इस अध्याय में नारद ‘भाव का अनुत्तर मार्ग’ पूछते हैं। महेश्वर एक गोपनीय उपदेश देकर उन्हें हरि की नित्य-लीला के विस्तार हेतु वृन्दा के पास भेजते हैं। वृन्दा इसे रक्षित रहस्य बताकर वृन्दावन में श्रीकृष्ण-राधा की सुव्यवस्थित दिनचर्या सुनाती हैं—प्रातः जागरण, शृंगार-प्रसाधन, भोजन, गौचारण हेतु प्रस्थान, वन में मिलन, जलक्रीड़ा, विविध क्रीड़ाएँ (पासा, परिहास, आलिंगन आदि), व्रज में वापसी, संध्या के व्यवहार, और रात्रि का रहस्यमय मिलन होकर विश्राम तक। कथा को साधना में बदला गया है—श्रोता को ब्राह्ममुहूर्त से अपने को सेवक-स्वरूप मानकर अंतः-बाह्य सेवा करने और मन में लीला-चिन्तन करने की आज्ञा है। अंत में फलश्रुति आती है कि श्रवण-पाठ से पवित्रता, पुण्य और विष्णुधाम की प्राप्ति होती है; तथा परम्परा-प्रमाण भी बताया गया है—कृष्ण से रुद्र, रुद्र से नारद और आगे कथावाचकों तक।
Description of Meditation on the Lord (Twofold Dhyāna: Nirguṇa and Saguṇa)
ऋषि सूतजी की कृष्ण-कथा की प्रशंसा करके उनसे व्रत, दान, पूजा-विधि और पूर्व-स्नान के नियमों का भी उपदेश माँगते हैं। सूतजी भक्ति की मोक्षदायिनी शक्ति बताकर एक नई पवित्र कथा आरम्भ करते हैं—मथुरा में नारदजी का राजा अम्बरीष से मिलना और अम्बरीष का यह पूछना कि परम तत्त्व निराकार होते हुए भी साकार कैसे होता है तथा कौन-सी उपासना सभी पुरुषार्थ देती है। नारदजी हरि-भक्ति को सर्वोच्च धर्म बताते हैं और केवल कर्मकाण्ड से उसकी श्रेष्ठता दिखाते हुए वैष्णव आचारों का क्रमबद्ध वर्णन करते हैं—सदाचार-व्रत, मनोनिग्रह, सत्यवचन, नाम-जप और स्मरण आदि। वे यह भी कहते हैं कि स्त्रियाँ और शूद्र भी आगमिक पूजा और भगवान के नाम के द्वारा सहज ही भक्ति प्राप्त कर सकते हैं। अंत में वे दो प्रकार के ध्यान का उपदेश देते हैं—निर्गुण ध्यान, जो दीपक की उपमा से स्थिर अंतःप्रकाश उत्पन्न कर कैवल्य देता है; और सगुण ध्यान, जिसमें शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी चतुर्भुज विष्णु का अलंकारों सहित ध्यान करने से शुद्धि और विष्णुलोक की प्राप्ति होती है।
The Glory of Vaiśākha (with a Classification of Bhakti)
अध्याय के आरम्भ में अम्बरीष भक्ति का स्वरूप, उसके साधन और विधि पूछते हैं। गुरु बताते हैं कि भक्ति मन, वाणी और शरीर—तीनों से होने वाली बहुरूपी साधना है। वे भक्ति-आचरण को लौकिक, वैदिक और आध्यात्मिक—तीन प्रकार का कहते हैं, और यह भी कि जब प्रत्येक कर्म का लक्ष्य विष्णु हों, तब वही कर्म पवित्र होकर अर्पण-रूप बन जाता है। आगे साङ्ख्य को तत्त्व-विचार और योग को नियम, प्राणायाम, ध्यान आदि अनुशासन के रूप में ‘अन्तर्भक्ति’ बताया गया है, जिसका फल भगवान का दर्शन और चित्त की एकाग्रता है। फिर वैशाख (माधव) और गङ्गा की महिमा आती है—शुक्ल सप्तमी जैसे दुर्लभ शुभ समय में गङ्गा-स्नान, पूजन, दान, श्राद्ध और गङ्गा-स्मरण को पाप-नाशक और अक्षय फल देने वाला कहा गया है। ब्राह्मणों का सम्मान हरि के साक्षात् देहधारी रूप का सम्मान मानकर विशेष रूप से प्रशंसित है।
Glorification of the Month of Vaiśākha (Mādhava’s Month)
नारदजी का उपदेश सुनकर राजा अम्बरीष पूछते हैं कि वैशाख—जिसे माधव का महीना कहा गया है—सब पवित्र महीनों में सर्वोत्तम क्यों है, और इसमें पूजा, दान तथा तप के क्या नियम हैं, किस देवता की विशेष आराधना करनी चाहिए। पहले धर्म-उपदेश की महिमा बताई जाती है—कर्म करने वाला, सिखाने वाला, सलाह देने वाला, अनुमोदन करने वाला और प्रेरित करने वाला, सब पुण्य के भागी होते हैं; दूसरों को स्नान-धर्म या व्रत-क्रिया में प्रवृत्त करने से भी साझा पुण्य मिलता है, और राजा/नेता समाज के लिए आचरण-मानक बनाते हैं। फिर नारदजी मनुष्य-जन्म की दुर्लभता, स्वधर्म-पालन और विशेषतः वासुदेव-भक्ति की श्रेष्ठता बताते हुए वैशाख की विष्णु को अत्यन्त प्रियता प्रकट करते हैं। गंगा, रेवा, यमुना आदि तीर्थों में मासभर स्नान, जप, दान और विष्णु-पूजा को पाप-नाशक, समृद्धि-दायक और अंततः हरि-धाम-प्रद कहा गया है। आरम्भ की विधि, तिल-दान, मधु-दान, गो-दान आदि तथा अंत में उद्यापन/समापन-कर्म का विधान भी बताया गया है।
Glory of Vaiśākha: Dawn Bathing, the Power of Hari’s Name, and the Subtlety of Dharma
अम्बरीष राजा नारद से पूछते हैं कि स्नान जैसे छोटे-से कर्म से इतना बड़ा फल कैसे मिल सकता है। नारद बताते हैं कि धर्म अत्यन्त सूक्ष्म है—विधि, देश-काल, परिस्थिति और मनोभाव के अनुसार फल बदलता है; भीतर की भावना ही मुख्य है। वे उदाहरण देते हैं—विश्वामित्र का धर्मनिष्ठा से रूपान्तरण, अजामिल का “नारायण” नाम उच्चारण से उद्धार, और अग्नि-चिंगारी की उपमा से यह कि हरि-नाम अप्रत्यक्ष रूप से भी पाप को जला देता है। फिर वैशाख/माधव मास की महिमा आती है—माधव की पूजा और प्रातःकाल गंगा तथा रेवा/नर्मदा में स्नान से असाधारण पुण्य मिलता है। पर भक्ति और शुद्ध संकल्प के बिना केवल उपवास या स्नान निष्फल कहा गया है। अंत में देवाśर्मा और उसकी पत्नी सुमना की कथा-प्रविष्टि से संतोष, लोभ, मोह और परिवार-सम्बन्धों में कर्मबन्धन की शिक्षा आरम्भ होती है।
Glory of Vaiśākha: The Debt-Bound / Enemy-Son Typology and the Turn to Detachment
इस अध्याय में सुमना ‘ऋण-सम्बद्ध पुत्र’ की धारणा बताती हैं—ऐसा संबंध जो कर्तव्य और कर्म-ऋण के बंधन से जुड़ा रहता है। आगे ‘शत्रु-पुत्र’ का कठोर चित्रण है: बाहर से पुत्र/भाई/पिता/मित्र जैसा निकट, पर भीतर से दुष्ट—भोग-लोलुप, जुए का आसक्त, चोरी करने वाला, कटुवचन बोलने वाला, माता-पिता पर क्रूर और हिंसक; और उनके देहांत के बाद श्राद्ध तथा दान भी नहीं करता। फिर धर्म का निर्देश आता है—स्नेहपूर्वक पालन-पोषण, अनुशासन व शिक्षा, माता-पिता का सम्मान, पिण्ड-दान सहित श्राद्धकर्म, तथा देव-ऋषि-पितृ—इन तीन ऋणों का निर्वाह। अंत में माया के कारण परिवार और संपत्ति पर ‘मेरा’ कहने की भ्रांति पर प्रश्न उठाकर वैराग्य, असंगता और अपरिग्रह की ओर मोड़ दिया गया है; वैशाख-माहात्म्य के प्रसंग में अध्याय-समाप्ति होती है।
The Episode of Devaśarmā: Virtuous Progeny, Greed, and Viṣṇu’s Grace (within Vaiśākha-māhātmya)
इस अध्याय में (पातालखण्ड, वैशाख-माहात्म्य) ब्राह्मण गृहस्थ देवशर्मा अपनी पत्नी सुमना के कहने पर धन नहीं, बल्कि ऐसा एक सद्गुणी वैष्णव पुत्र चाहता है जो वंश का उद्धार कर सके। वह ऋषि वसिष्ठ के पास जाकर पूछता है—दरिद्रता क्यों आती है और संतान होकर भी सुख क्यों नहीं मिलता। वसिष्ठ पहले संबंधों के बंधन का स्वरूप बताते हैं और ‘योग्य पुत्र’ के लक्षण गिनाते हैं—सत्य, वेदाध्ययन, दान, संयम और भगवान विष्णु की भक्ति। फिर उपदेश कर्म-निदान की ओर मुड़ता है। वसिष्ठ देवशर्मा को उसके पूर्वजन्म का वृत्तांत सुनाते हैं—लोभ, दान से इनकार, श्राद्ध-पूजा की उपेक्षा, और संकट में भी संग्रह की आसक्ति; इन्हीं कारणों से गरीबी और संतान-सुख का निष्फल होना होता है। अंत में निष्कर्ष यह है कि गृहस्थ का कल्याण, पत्नी और संतान—सब विष्णु के प्रसाद पर निर्भर हैं, केवल मानवीय प्रयास पर नहीं।
The Devaśarmā Episode in the Glorification of Vaiśākha
देवशर्मा अपने पूर्वजन्म का पाप स्वीकार करता है—शूद्र होकर उसने अनुचित रीति से धन जोड़ा था, फिर भी आगे चलकर उसे ब्राह्मणत्व कैसे मिला, इसका कारण वह पूछता है। वसिष्ठ बताते हैं कि निर्णायक पुण्य यह था कि उसने एक अकेले वैष्णव ब्राह्मण तीर्थयात्री का अतिथि-सत्कार किया—उसे ठहराया, चरण-प्रक्षालन कराया, मालिश की, और दूध-दही आदि का दान दिया। इसके बाद उसने परिवार सहित वैशाख-व्रत किया—प्रातः स्नान और माधव की पूजा-आराधना। अध्याय में मनुष्य-जन्म, ब्राह्मणत्व और पतिव्रता साध्वी पत्नी की दुर्लभता का वर्णन है तथा आदर्श स्त्री-गुण—पातिव्रत्य, शौच, दया, सत्य, गृहधर्म-पालन, अतिथि-सेवा आदि—गिनाए गए हैं। साथ ही चेतावनी दी गई है कि दान के बिना केवल स्नान-पूजा करने से लोभ बना रहता है; फल की सिद्धि के लिए दान अनिवार्य है। अंत में वैशाख और कार्तिक में दामोदर-पूजन की प्रशंसा करते हुए ब्रह्मा के वचन से माधव-स्नान की पाप-नाशक शक्ति बताई जाती है, और नारद इस प्रसंग का उपसंहार करते हैं।
Glorification of the Month of Vaiśākha (Mādhava Month)
नारद–अम्बरीष संवाद के प्रसंग में यह अध्याय देवाśर्मा के कणखल में गंगा-तट पर किए गए वैशाख-व्रत का वर्णन करता है। मेष-राशि में सूर्य होने पर माधव मास में वह नियमपूर्वक स्नान करता है, मधुसूदन की पूजा करता है, यम–नियम का पालन, ब्रह्मचर्य, और सामर्थ्य के अनुसार दान करता है; कृच्छ्र आदि तप भी करता है। वह मधु और तिल अर्पित करता है, ब्राह्मणों को भोजन कराता है, दक्षिणा सहित गौ-दान देता है और तीर्थ में निरंतर स्नान का सौभाग्य माँगता है। उसकी पतिव्रता पत्नी भी सेवा और केशव-पूजन द्वारा उसी भक्ति-चर्या का अनुसरण करती है। इस पुण्य से उन्हें धन, सद्गुणी पुत्र, स्थायी कीर्ति प्राप्त होती है और अंततः माधव-भक्ति से परम धाम की प्राप्ति होती है। अध्याय के अंत में माधव मास की महिमा, जो मधुसूदन को अत्यंत प्रिय है, प्रशंसित की गई है।
The Narrative of Citrā: The Power of the Vaiśākha Bath and Govinda’s Name
इस अध्याय में यह आश्चर्य प्रकट किया गया है कि पापी भी अल्प-से प्रयत्न से ऊँची गति पा सकता है—विशेषतः माधव मास (वैशाख) में स्नान करने से। कर्म का सूक्ष्म फल-विधान समझाया गया है: हरि-भक्ति और गोविन्द-नाम के साथ जुड़ा छोटा-सा पुण्य भी महान फल देता है, जबकि भाव-रहित कर्म निष्फल हो सकता है। अजामिल का उदाहरण देकर नाम-महिमा प्रतिपादित की गई है। फिर कथा आती है—राजा दिवोदास की पुत्री के पति बार-बार मृत्यु को प्राप्त होते हैं। कुलपुरोहित जातूकरण बताता है कि वह पूर्वजन्म में चित्रा नाम की वेश्या थी, जिसने अनेक विघ्न किए थे। एक ब्राह्मण के सत्संग से उसने वैशाख-व्रत का उपदेश सुना, रेवातट (नर्मदा) में पूरे मास स्नान किया और दान-पुण्य किया; इसलिए वह यम-यातना से बची और शुभ जन्म पाकर दिव्यादेवी बनी। फिर भी शेष कर्म के कारण कुछ शोक का अंश बना रहता है।
The Citra Narrative: The Power of Vaiśākha Dawn-Bathing, Dāna, and Hearing Mādhava’s Hymn
इस अध्याय में नारद अपने अनुभव के रूप में राजा दिवोदास और महर्षि जाटूकरण के संवाद का वर्णन करते हैं। दिवोदास पूछते हैं कि किसी स्त्री को दुःख और क्लेश से कैसे मुक्ति मिले। तब जाटूकरण एक अत्यन्त पुण्यदायक, पर प्रायः “अप्रसिद्ध” उपाय बताते हैं—वैशाख के आरम्भ में, सूर्य के मेष में प्रवेश के समय, प्रातःकाल स्नान, तीर्थ-स्नान, दान तथा हरि/माधव की स्तुति का श्रवण-कीर्तन। अध्याय में उपमाओं द्वारा कहा गया है कि इन व्रत-आचरणों से पाप ऐसे भागते हैं जैसे हरि या गरुड़ के सामने सर्प। इन नियमों के प्रभाव से स्त्री का दुःख दूर होता है, दाम्पत्य-सुख पुनः प्राप्त होता है और वंश में सुदेव का जन्म फलरूप से बताया जाता है। अंत में रेवा में स्नान से शुद्ध हुई कन्या के विवाह की व्यवस्था करने का राजोपदेश देकर, इसे वैशाख-माहात्म्य के अंतर्गत ‘चित्रा-आख्यान’ कहा गया है।
Pacification/Removal of Sin — The Preta Narrative (Vaiśākha Māhātmya)
राजा अम्बरीष नारद से ऐसा पाप-शमन स्तोत्र पूछते हैं जिसके श्रवण मात्र से पाप नष्ट हो जाए। नारद कहते हैं कि हरिकथा और वैष्णव-संवाद का पुण्य वैशाख-स्नान से भी बढ़कर है और वह पापों का क्षय करता है। फिर एक अंतर्कथा आती है—माधव/वैशाख मास में मुनिशर्मा ऋषि रेवा (नर्मदा) में स्नान करने जाते हुए पाँच घोर पापियों को मुक्ति-याचक पाते हैं। मार्ग में उन्हें विकृत, भयावह प्रेत-सम प्राणी मिलते हैं, जो बताते हैं कि अन्न का अपमान, अश्रद्धा, और विधि-भंग जैसे दोषों से उन्हें यह दुर्दशा मिली। मुनिशर्मा उन पाँचों और प्रेतों को रेवा-तट ले जाकर वैशाख-स्नान, नामोच्चारण और विष्णु के पाप-प्रशमन स्तोत्र का पाठ कराते हैं। इस साधना से प्रेत मुक्त होते हैं, पापी शुद्ध होते हैं; अध्याय का निष्कर्ष है कि इस स्तोत्र का पाठ/श्रवण पापों का नाश कर विष्णु-धाम की प्राप्ति कराता है।
Vaiśākha Observance: Dawn Bathing, Tarpaṇa, and the Procedure for Worship of Mādhava (Keśava)
इस अध्याय में अम्बरीष राजा नारद से पूछते हैं कि वैशाख-व्रत में क्या दान करना चाहिए, प्रातःस्नान कैसे हो और केशव (माधव) की पूजा की विधि क्या है। नारद बताते हैं कि ब्रह्ममुहूर्त में नदी-तट पर या जहाँ जल उपलब्ध हो वहाँ स्नान करना चाहिए, विशेषतः मेष-संक्रान्ति के दिन; संकल्प लेकर गङ्गा-आह्वान और पृथ्वी-शुद्धि के मन्त्रों का स्मरण करना चाहिए। फिर देव, ऋषि और पितरों के लिए तर्पण, यज्ञोपवीत की अवस्थाएँ (उपवीत/निवीत, सव्य-अपसव्य) तथा सूर्य को अर्घ्य और सूर्य-स्तुति का विधान कहा गया है। आगे माधव-पूजा का संक्षिप्त किन्तु तकनीकी विधान आता है—वैदिक, तान्त्रिक या मिश्र पद्धति से—जिसमें प्रतिमा-भेद, न्यास, कलश-स्थापन, उपचार-समर्पण, होम, बलि और उद्वासन तक का क्रम बताया गया है। अंत में उदाहरण दिया है कि पूर्व वेश्या रूपवती/धर्मवती और एक स्वर्णकार ने अक्षया तृतीया के दान तथा वैशाख-स्नान का पालन किया, जिससे उन्हें राजजन्म और मोक्षाभिमुख पुण्य मिला; इससे सिद्ध होता है कि नियमयुक्त उपासना अंततः भक्तियोग में परिणत होती है।
Vaiśākha Māhātmya: Supremacy of Mādhava-month, Yama’s Dharma Teaching, and Ekādaśī Praise
ऋषि सूतजी की स्तुति करके उनसे आगे धर्मकथा सुनाने का अनुरोध करते हैं। सूतजी एक प्राचीन संवाद का प्रसंग उठाते हैं, जिसमें जगत्पालक भगवान् द्वारा मासों में वैशाख (माधव) की श्रेष्ठता बताई गई है—इस मास में स्नान, पूजन, दान और श्राद्ध का फल यज्ञों के फल से भी बढ़कर कहा गया है। फिर यमधर्मराज और ब्राह्मण यज्ञदत्त का उपदेशात्मक संवाद आता है। यम कर्मफल के नियम को समझाकर नरक के कारण गिनाते हैं—विशेषतः विष्णुभक्ति की उपेक्षा, अनैतिक आचरण और धर्मभंग। इसके बाद वे स्वर्गप्रद सद्गुणों का वर्णन करते हुए एकादशी-व्रत (द्वादशी-संयम सहित) की अत्यन्त प्रशंसा करते हैं, तथा तीर्थ-सेवा और पुण्य-क्षेत्र में देहत्याग के महात्म्य को भी बताते हैं।
The Greatness of the Month of Vaiśākha (Mādhava Month): Charity, Tīrthas, and Hari-Nāma
इस अध्याय में सूत कहते हैं कि एक ब्राह्मण कर्मफल का नियम बताकर यम/धर्मराज से पूछता है—कलियुग में ऐसा कौन-सा सरल धर्म है जिससे थोड़े प्रयास में महान पुण्य मिले और पाप नष्ट हो जाए। वह धर्मराज को जगत्-धारक और नीति-नियन्ता मानकर उनकी स्तुति करता है और समस्त धर्मों का एक सार माँगता है। प्रसन्न होकर यम ‘परम रहस्य’ बताते हैं—पुराणों में भिन्न-भिन्न कथन दिखें, फिर भी सिद्धान्त यह है कि एकमात्र भगवान् नारायण/विष्णु ही हैं; हरि का पूजन और स्मरण तीर्थों की शक्ति को जाग्रत करता है। फिर दान का पाँच प्रकार से क्रम, बिना दान किए भोजन करने की निन्दा, तथा नित्य और नैमित्तिक दान की विधि कही जाती है। तीर्थ की परिभाषा भी विस्तृत होती है—केवल प्रसिद्ध नदियाँ ही नहीं, जहाँ हरि-नाम, वेद-पाठ और विष्णु-कीर्तन/पाठ होता है, वह स्थान भी तीर्थ है। अंत में वैशाख (माधव) मास में स्नान और ब्राह्मण-सम्मान को यमदण्ड-निवारक और अपार पापराशि को भस्म करने वाला बताया गया है।
The Greatness of Vaiśākha: Mādhava Bath, Tulasī Worship, Water-Cow Charity, and Deliverance of Pretas
इस अध्याय में वैशाख-मास के माधव-व्रत की महिमा बताई गई है। प्रातःकाल स्नान करके तुलसी-दलों से माधव (विष्णु) का पूजन, तर्पण, दान और श्राद्ध—ये सब मोक्षदायक माने गए हैं। धर्मराज तुलसी को केशव की परम प्रिय अर्पण-वस्तु बताते हैं; अशुद्धि में तुलसी तोड़ना वर्जित है, और पुष्प न मिलने पर भी तुलसी अथवा सरल उपचारों से पूजा करने की अनुमति दी गई है। अश्वत्थ (पीपल) को जल देना, उसकी प्रदक्षिणा करना, तथा त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा को ब्राह्मण-भोजन विशेष फलदायक कहा गया है। कथा-प्रसंग में धनशर्मा को तीन प्रेत—कृतघ्न, विदैवत और अवैशाख—मिलते हैं, जो अपने दुःख का कारण बताते हैं: कृतघ्नता, देव-धर्म का अनादर, और वैशाख-कर्मों की उपेक्षा। धनशर्मा वैशाख-धर्म के अनुसार जल-दान (जलधेनु, जलघट), तिल-और-मधु का दान, तथा ब्राह्मणों को तृप्त कर भोजन कराने से उनके पितृवंश का उद्धार करता है; पाप नष्ट होते हैं और पुनर्जन्म का बंधन घटता है।
Counsel to King Mahīratha: Lust, Impermanence, and the Saving Power of the Vaiśākha (Mādhava) Observance
इस अध्याय में राजा महीरथ को पूर्व-पुण्य से समृद्ध होते हुए भी कामासक्ति के कारण पतित और राज्य-धर्म से विमुख दिखाया गया है। वह शासन का भार दूसरों पर डालकर विषय-भोग में डूब जाता है। साथ ही पुरोहित/गुरु की जवाबदेही बताई गई है—जो गुरु राजा को रोकने का प्रयत्न नहीं करता, वह भी पाप का भागी होता है; पर जो राजा उपदेश सुनकर भी नहीं मानता, उसका दोष मुख्यतः उसी पर रहता है। इसके बाद नीति और वैराग्य का उपदेश आता है: धन, यौवन और सुख क्षणभंगुर हैं; इन्द्रिय-निग्रह आवश्यक है; मृत्यु के समय केवल धर्म ही साथ जाता है। देह की अशुचिता और नश्वरता का विचार कर काम-मोह को तोड़ने की शिक्षा दी जाती है। अंत में उद्धार का उपाय बताया गया है—माधव (वैशाख) मास में प्रातः उठना, स्नान करना और विष्णु-पूजन करना महान पापों का भी नाश करता है तथा भक्त को हरि-धाम तक पहुँचाता है।
The Mādhava (Vaiśākha) Bath: Sādhu-saṅga, Instruction Ethics, and the Vaiśākha Observance
इस अध्याय में राजा मुक्तिदायक उपदेश के लिए कृतज्ञता प्रकट करता है और साधु-संग को परम तीर्थ बताकर उसकी महिमा कहता है—जो पाप का नाश करता है, संसार-रोग को हरता है और भक्ति को पुष्ट करता है। फिर वह माधव/वैशाख-व्रत के विषय में पूछता है—क्या दान देना चाहिए, कहाँ और कैसे स्नान करना चाहिए, किसकी पूजा करनी चाहिए और कौन-से नियम अपनाने चाहिए। यम कश्यप को करुणामय गुरु के रूप में स्थापित करते हैं और कश्यप उपदेश-नीति बताते हैं—पात्र को ही उत्तर देना, वाणी की रक्षा करना; फिर भी श्रद्धालु शिष्य/उत्तराधिकारी को बिना पूछे भी हितकारी सलाह देना। इसके बाद ‘माधव-स्नान’ की विधि आती है—प्रातःकाल स्नान, अर्घ्य, हरि-पूजन और नैवेद्य-समर्पण। इसे प्रति वर्ष करने से हरि-धाम की प्राप्ति का आश्वासन दिया गया है। अंत में चेतावनी है कि पवित्र मास का त्याग होने पर काम और वासनाएँ मनुष्य को फिर विषय-भोग में खींच लेती हैं, इसलिए वैशाख-अनुष्ठान में दृढ़ रहना चाहिए।
Glorification of the Month of Vaiśākha (Mādhava): Dawn Bathing, Compassion, and Release from Sin
इस अध्याय में विषय-भोग में लिप्त एक राजा काल की दृष्टि से मृत्यु को प्राप्त होकर यमदूतों द्वारा पकड़ा जाता है और अपने पापों पर विलाप करता है। तभी विष्णु के दूत आकर उसे धर्मात्मा बताते हैं और हरि-धाम की ओर ले चलने लगते हैं; कहा जाता है कि वैशाख में प्रातःकाल स्नान करने से उसके पाप क्षीण हो गए। परन्तु भगवान् विष्णु की आज्ञा से वे दूत उसे नरक-मार्ग के निकट ले जाते हैं, जहाँ नरक में पकते प्राणियों की भयानक चीखें सुनाई देती हैं। दूत पापियों की दुर्गति, अधर्म से पतन, निषिद्ध कर्मों—विशेषतः परस्त्रीगमन—और नरक की विविध यातनाओं का वर्णन करते हैं। राजा का हृदय करुणा से भर उठता है; वह दूसरों के दुःख में वृद्धि नहीं चाहता और सज्जन-हृदय की कोमलता की प्रशंसा करता है। अंत में वैशाख-व्रत का सार—प्रभात स्नान और विष्णु-पूजन—पापराशि को भस्म करने वाला बताकर राजा की मुक्ति का कारण घोषित किया जाता है।
The Greatness of Vaiśākha: Compassion and the Gift of Merit that Frees Beings from Hell
इस अध्याय में वैषाख (माधव) माहात्म्य के अंतर्गत यमलोक का प्रसंग आता है। नरक में पीड़ित जीवों को देखकर करुणामय राजा अद्भुत त्याग का संकल्प करता है—वह अपना समस्त पुण्य उन्हें दे देता है ताकि वे स्वर्ग को प्राप्त हों, और यदि आवश्यक हो तो वह स्वयं पीछे रहकर भी उनका उद्धार कराए। तब हरि-दूत कहते हैं कि दया धर्म को बढ़ाती है और करुणा से पुण्य अनेकगुणित हो जाता है। इसके बाद वैषाख के व्रत-आचरणों का वर्णन है—स्नान, दान, जप, होम और पूजन—जिनका फल अनंत बताया गया है। विशेष दानों को विशेष लोकों से जोड़ा गया है—वरुणलोक, सूर्यलोक, ब्रह्मलोक और विष्णुलोक। हरि को साक्षी मानकर तीन बार घोषणा करके पुण्य-समर्पण (पुण्य-दान) करने की विधि बताई गई है। शिबि, दधीचि और सहस्रजित जैसे उदाहरणों से दया को परम धर्म सिद्ध किया गया है। अंत में राजा के पुण्य-दान से नरकभोगी मुक्त होकर दिव्य रथों में प्रस्थान करते हैं और राजा योगियों को भी दुर्लभ परम पद को प्राप्त होता है।
Glorification of Vaiśākha and the Meditation on Śrī Kṛṣṇa in Vṛndāvana
यह अध्याय वैशाख/माधव-मास के माहात्म्य का उपसंहार करते हुए बताता है कि इस कथा का पाठ और श्रवण अत्यन्त पावन है। इसके द्वारा पापों का नाश होता है और श्रीकृष्ण के परम धाम की प्राप्ति होती है—ऐसा फल-श्रुति में कहा गया है। यम–ब्राह्मण संवाद का स्मरण कराते हुए प्रतिवर्ष श्रद्धा-भक्ति से तीर्थ-स्नान, दान और अग्निहोत्र/हवन आदि करने की पुनः प्रशंसा की गई है। इसके बाद ऋषि सूत से पूछते हैं कि माधव (विष्णु/कृष्ण) कैसे प्रसन्न होते हैं; तब ध्यान का प्रसंग आता है। गौतम के प्रश्न पर नारद वृन्दावन-ध्यान सिखाते हैं—कल्पवृक्ष, रत्नमयी वेदी, कमलासन, और गो-गोप-गोपियों, देवताओं, ऋषियों तथा दिव्य गणों से घिरे मुकुन्द के सगुण स्वरूप का मनन। अध्याय यह स्थापित करता है कि विधिपूर्वक व्रत-कर्म और अंतर्मुख ध्यान—दोनों मिलकर साधक को विष्णु के परम पद तक ले जाते हैं।
Rules for Purana Listening and Linga Worship; Worship, Writing, and Correct Reading of the Purana Manuscript
ऋषि सूतजी से प्रार्थना करते हैं कि वे श्रीराम के अद्भुत चरित्र का पुनः वर्णन करें। कथा अयोध्या में पहुँचती है—श्रीराम के दर्शन की इच्छा से शंकर पार्वती सहित आते हैं और कश्यप आदि ऋषियों द्वारा सत्कृत होते हैं। शम्भु स्वयं को हिमालय-देश का एक ब्राह्मण बताकर राम के पास जाते हैं; राम सबका आदरपूर्वक स्वागत करते हुए कहते हैं कि आप सबके आगमन से उनका जीवन और राज्य कृतार्थ हो गया। ऋषि शम्भु को शास्त्र, पुराण और तर्क के परम ज्ञाता के रूप में परिचित कराते हैं। श्रीराम लिङ्ग-पूजा की विधि और उसके भक्ति-फल पूछते हैं, साथ ही विभीषण के बन्धन तथा ‘रामेश्वर’ के अर्थ को लेकर उत्पन्न शंका भी रखते हैं। ऋषि विषय को ‘पुराण-वेत्ता’ शम्भु पर छोड़ देते हैं। तब शम्भु सच्चे पुराणिक के लक्षण, पुराण-हस्तलिखित ग्रन्थ की पूजा (सरस्वती-पूजन सहित), लिपि/अक्षर-रूप और प्रणव के नियम, पुराणों की सूची, तथा शुद्ध, अविरोध पाठ के विधान—पाठ-दोष, अपशकुन और उनके परिहार—इन सबका विस्तार से उपदेश देते हैं।
The Greatness of Sacred Ash (Bhasma) and Rules for Śrāddha: Śiva Instructs Rāma
इस अध्याय में मुनि सूत से पावन कथा का अनुरोध करते हैं। तब शम्भु श्रीराम को एक प्रसंग सुनाते हैं जिसमें काम‑क्रोध से उत्पन्न उथल‑पुथल और कृत्या का प्राकट्य होता है; इसके बाद राम और शम्भु लोकालोक तक जाते हैं और तेजोमय नारायणपुर में पहुँचते हैं। वहाँ विष्णु उनका सत्कार करते हैं और राम के एकपत्नी‑व्रत की परोक्ष परीक्षा होकर उसकी प्रशंसा होती है। फिर शिव धर्म‑निर्देश देते हैं—सूतक आदि अशौच, अमावस्या, अपराह्न, तिथि की वृद्धि‑क्षय तथा कुतुप‑काल जैसी स्थितियों में श्राद्ध कब स्थगित हो, कब पुनः किया जाए, और कब किसी अन्य से कराया जाए। पूजन‑काल की उपयुक्तता और फल भी बताए जाते हैं। इसके बाद भस्म‑माहात्म्य का विस्तार से वर्णन है—भस्म की व्युत्पत्ति, धारण के स्थान, पाप‑नाश और रक्षा‑शक्ति, तथा धनञ्जय‑वंश, अरुन्धती‑दधीचि और हरि‑शंकर‑समागम की कथाएँ। अंत में फलश्रुति सुनने वालों की शुद्धि और शिवधाम‑प्राप्ति का आश्वासन देती है।
The Glory of Vibhūti (Sacred Ash)
शुचिस्मिता पूछती है कि भस्म (विभूति) का सेवन या स्पर्श आयु कैसे बढ़ाता है और परलोक में शुभ गति कैसे देता है। दधीचि एक प्राचीन कथा सुनाते हैं, जिसमें चित्रगुप्त और यम के दरबार में कर्मों का निर्णय होता है। एक विद्वान ब्राह्मण काम-दोष से पतित हो जाता है। बाद में वह शिव-पूजा करके अनेक पापों का नाश कर लेता है, पर एक अलग अपराध कर बैठता है—शिव के दीपक का घी खा लेना। यम कहते हैं कि इस अपराध का कर्म-शेष असाधारण रूप से टिकाऊ है; इसलिए उसे नरक और फिर बार-बार कुत्ते की योनि का दंड मिलता है। उसकी पत्नी अव्यया, नारद के मार्गदर्शन से, प्रायश्चित्त और पतिव्रता-धर्म की साक्षी के रूप में अग्नि-प्रवेश करती है और स्वर्ग को प्राप्त होती है, जबकि ब्राह्मण का शेष पाप बना रहता है। अंत में कुत्ते के रूप में वह दधीचि के आश्रम के पास पवित्र विभूति में गिरकर मरता है; शिव की आज्ञा से विभूति में/विभूति द्वारा मरने वाले भक्त यम के अधिकार में नहीं आते। वीरभद्र उसे शिव के पास ले जाते हैं और वह गणों में स्थान पाता है।
The Greatness of Sacred Ash: Vīrabhadra Revives Gods and Sages
शुचिस्मिता पूछती है कि पवित्र भस्म ने कश्यप, जमदग्नि और देवताओं की रक्षा कैसे की। दधीचि बताते हैं कि शोकर पर्वत पर एक भयंकर अग्नि प्रकट हुई, जिसने ऋषियों और देवों को जला कर भस्म कर दिया। तब वीरभद्र वहाँ आए, अग्नि से सामना किया और भारती/सरस्वती के उपदेश से उसे वश में किया; फिर भस्म और मृत्युञ्जय मंत्र के द्वारा सब गिरे हुए देव-ऋषियों को पुनर्जीवित कर दिया। इसके बाद भी संकट समाप्त नहीं होता—एक विशाल नाग और एक शक्तिशाली राक्षस पुनर्जीवित जनों को सताने लगते हैं। राक्षस की तपस्या के बीच शिव उसे वर देते हैं, पर अंततः उसके अहंकार का नाश होकर उसका पराभव होता है और सबकी रक्षा पुनः स्थापित होती है। अध्याय के अंत में वीरभद्र-स्मरण का जप-विधान बताया गया है, जो राक्षस, ब्रह्मराक्षस और पिशाच-पीड़ा को दूर करता है; फलश्रुति में भस्म को आयुवर्धक और पापनाशक कहा गया है।
Procedure for the Origin and Preparation of Sacred Ash (Bhasma)
श्रीराम ने शम्भु (शिव) से पूछा कि भस्म की उत्पत्ति क्या है, उसका माहात्म्य क्या है, और उसे धारण करने तथा दान देने से कौन-सा पुण्य मिलता है। शिव ने उत्तर में सृष्टि-तत्त्व का आधार बताकर कहा कि त्रिगुण ही जगत्-प्रवृत्ति के कारण हैं; गुण-कार्य के अनुसार ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर प्रकट होते हैं, पर शिव के ज्ञान-बल के बिना वे गुणों को स्थिर नहीं रख पाते—इसलिए भस्म शिवतत्त्व से सम्बद्ध परम पावन वस्तु है। फिर भस्म-निर्माण की विधि आती है—गोमय और गोमूत्र को निर्दिष्ट मंत्रों से संस्कारित कर अग्नि में होम किया जाता है, चाहें तो कई दिनों तक यह कर्म बढ़ाया जा सकता है। तत्पश्चात मंत्रों से भस्म ग्रहण कर उसे गंगाजल/दूध और सुगंधित द्रव्यों के साथ मिलाने का विकल्प बताया गया है। साधक पाँच ब्रह्म-मंत्रों (ईशान, तत्पुरुष, अघोर, वाम, सद्योजात) से न्यासवत् अभिषेक कर “नमः शिवाय” के साथ त्रिपुण्ड्र धारण करता है; इससे शुद्धि होती है और यह उपदेश वक्ता-श्रोता दोनों के पापों का नाश करने वाला कहा गया है।
The Greatness of Sacred Ash (Vibhūti) and the Saving Power of Śiva Worship
शिव राम से पाप-नाशक कथा कहते हैं। इक्ष्वाकु नाम का एक विद्वान किंतु भोगासक्त ब्राह्मण यज्ञ, दान, वेद-अध्यापन और पुराण-श्रवण का त्याग कर देता है। मृत्यु के बाद वह यम के दरबार में पहुँचता है; वहाँ उसे दीर्घ नरक-यातना का भय दिखाकर प्रायश्चित्त हेतु थोड़े समय के लिए शरीर में लौटा दिया जाता है। वह शिवभक्त मुनि जाबालि की शरण लेता है। जाबालि बताते हैं कि अल्पायु में दीर्घ तप-व्रत कठिन हैं, इसलिए श्रेष्ठ उपाय है—शिवलिङ्ग-पूजन, नित्य पुराण-श्रवण और विभूति (भस्म) धारण। कथा में मन्दर की दिव्यपुरी और शिव की योगसभा का रूपक आता है, जहाँ यम-नियम, प्राणायाम, ध्यान और समाधि सेवक-रूप में वर्णित हैं। इक्ष्वाकु आठ दिन तक पूजा कर प्राणों को शिव में अर्पित करके देह त्याग देता है। शैव दूत यमदूतों से विवाद कर उसे छुड़ा लेते हैं; शिव फल प्रदान करते हैं, पर पूर्व में लिङ्ग-निन्दा के दोष का एक शारीरिक चिह्न भी रहने देते हैं। अंत में इस अध्याय के श्रवण-पाठ की महिमा बताई गई है।
The Greatness of Śiva-Worship: From Grief and Anger to Śiva’s Grace (Agniśikha/Jvālāmukha Origin)
श्रीराम शिव से पूछते हैं कि अग्निशिखा नामक ज्वलंत गण कौन है और उसकी उत्पत्ति कैसे हुई। शिव उदाहरणों के माध्यम से बताते हैं—एक क्षत्रिय राजा ऋण, राज्य-हानि और पुत्र-मृत्यु के शोक से टूट जाता है; उसे समझाया जाता है कि शोक और क्रोध को वश में कर स्थायी कल्याण का मार्ग अपनाओ। वह वाराणसी में वसिष्ठ के पास जाता है; वसिष्ठ उसे विश्वेश्वर शिवलिंग की पूजा का उपदेश देते हैं और बताते हैं कि सरल-से सरल अर्पण भी मुक्ति का कारण बन सकता है। इसी क्रम में लुब्धक (शिकारी) की अनियमित पर अत्यन्त तीव्र भक्ति और आत्म-समर्पण से शिव प्रकट होते हैं; वह अपने कुटुम्ब सहित शिवलोक को प्राप्त करता है। राजा भी मंदिर-सेवा से पुनः राज्य पाता है, पर बाद में क्रोध में आकर मंदिर-दहन कर बैठता है; तब प्रायश्चित्त और पुनः शिव-पूजा द्वारा उसका शोधन होता है—यह कर्म की निरन्तरता और भक्ति की सुधारक शक्ति दिखाता है। एक अन्य प्रसंग में वेश्या-विषयक आरोप, दण्ड और वध की कथा आती है; फिर वीरभद्र की घोषणा से ज्वालामुख/अग्निशिखा का प्रादुर्भाव होता है। अध्याय का उपसंहार क्षमा को इस लोक और परलोक के सुख का मार्ग बताकर करता है और नित्य श्रवण करने वालों को शिवलोक-प्राप्ति का फल घोषित करता है।
The Greatness of Śiva’s Names and the Suspension of Yama’s Jurisdiction
राम ने महेश्वर के नामों की महिमा और उनसे जुड़े भक्ति-कर्म—पूजा, नमस्कार, दर्शन तथा जल, धूप, दीप आदि अर्पण—के विषय में पूछा। शम्भु ने कहा कि उनकी महिमा अपरिमेय है, फिर भी संक्षेप में एक उपाख्यान द्वारा उसका बोध कराया। विदृध्त नामक बाल-राजा ने बड़ों का तिरस्कार कर दुष्ट संगति अपनाई, लुटेरा और क्रूर नरभक्षी बन गया और अंत में मर गया। यमदूत जब उसे पाश-दंड से बाँधने लगे तो उनके पाश और दंड रहस्यमय शक्ति से टूट गए; स्वयं मृत्यु (यम) आया और वीरभद्र तथा वह्निमुख के साथ संघर्ष हुआ। तब शिव ने हस्तक्षेप कर यम और उसके दूतों को मुक्त किया और सिद्धांत घोषित किया—मरण-क्षण में भक्तों के साथ मेरा नाम रहता है; अपूर्ण उच्चारण भी शिवलोक का मार्ग देता है। पंचाक्षरी व शतरुद्रीय के जपकर्ता, रुद्राक्ष-भस्म धारण करने वाले, तथा काशी आदि पुण्य-क्षेत्रों में देह त्यागने वाले यम के अधिकार से सुरक्षित हैं; इस कथा का नित्य श्रवण पाप-नाशक और शिव-प्रद कहा गया है।
The Greatness of Śiva’s Name: The Tale of Kalā and Śoṇa, Soma-vrata (Monday vow), and the Testing of Guest-Feeding
इस अध्याय में शम्भु शिव-नाम की महिमा का उदाहरण देते हैं। देवरात की पुत्री कला का विवाह ऋषि शोन से होता है। धन से भरे घड़े के मिलने पर परामर्श, शंका और उसे छिपाने की बात उठती है; फिर राक्षस मारीच शोन का रूप धरकर कला को छल से हर लेता है। कला पतिव्रता बनी रहती है, अंतःकरण में उमा-शिव का स्मरण करती हुई हिंसक मृत्यु को प्राप्त होती है; शिवदूत उसे शिवलोक ले जाते हैं और पार्वती उसे दिव्य परिचारिका का पद प्रदान करती हैं। शोन और अन्य ऋषि कैलास पहुँचकर शिव से निवेदन करते हैं। शिव बताते हैं कि उनके नाम का उच्चारण यम के लेखे को भी पलट देता है और अकाल-मृत्यु से ग्रस्त जन का उद्धार कर सकता है। आगे सोम-व्रत (सोमवार-व्रत) की विधि, पूजन-मंत्र और अतिथि-सेवा का पुण्य बताया गया है; ब्राह्मण-अतिथि के रूप में परीक्षा द्वारा यह सिद्ध किया जाता है कि अतिथि-पूजन और दृढ़ पातिव्रत्य परम धर्म हैं।
Gautama’s Hermitage, the Śiva-liṅga Worship Manual, and the Śiva–Viṣṇu–Hanumān Devotional Drama
राघव एक दिव्य विमान में स्थित तेजस्वी पुरुष को स्त्रियों के साथ देखकर उसके पुण्य-कारण के विषय में शम्भु से पूछते हैं। तब शिव गौतम ऋषि के आश्रम की अद्भुत महिमा और वहाँ की तपोमय, यज्ञमय तथा पूजामय समृद्धि का वर्णन करते हैं। इसके बाद अध्याय शैव-पूजा का विस्तृत विधान बन जाता है—पूजा-स्थान की रचना, सामग्री-संग्रह, अभिषेक, आवरण-तत्त्व, अष्टदल-पत्रिका, रुद्राक्ष-धारण, धूप-दीप-नैवेद्य, नीराजन, ताम्बूल तथा संगीत-नृत्य को भी उपहार रूप में अर्पित करने की विधि बताई जाती है। नारद, बाण, शुक्र, प्रह्लाद, बलि आदि दानव-गण सभा में आकर पूजन करते हैं; फिर मृत्यु और पुनर्जीवन का नाटकीय प्रसंग होकर वरदान प्राप्त होते हैं। कथा में शिव–विष्णु की परस्पर श्रद्धा, दिव्य लीला और हनुमान की आदर्श भक्ति विशेष रूप से उभरती है; साथ ही भस्म-स्नान, मन्त्र-न्यास, वेदी-रेखाचित्र, आसन-ध्यान और धारास्नान द्वारा बाह्य कर्म के साथ आन्तरिक योग-शुद्धि का उपदेश दिया गया है।
The Greatness of the Purāṇas and the Rite of Sacred Listening (Śravaṇa-vidhi)
इस अध्याय में श्रीराम और शम्भु (शिव) के संवाद द्वारा पुराण-प्रवचन की महिमा और पुराण-श्रवण की विधि बताई गई है। आरम्भ में कहा गया है कि दुष्ट-संग पाप को बढ़ाता है, परन्तु सच्चे पुराण-ज्ञाता के पास जाने से दीर्घकाल से संचित पाप भी नष्ट हो जाते हैं। वसिष्ठ और एक अमर राक्षस का दृष्टान्त देकर ऋषि की रक्षण-शक्ति और विवेक का प्रभाव दिखाया गया है। फिर श्रवण-विधि का विधान आता है—तिथि, नक्षत्र, करण, लग्न आदि शुभ समय, उचित स्थान, वक्ता का सम्मान-पूजन, और प्रतिदिन निरन्तर पाठ। यह भी कहा गया है कि महापातकों तक का प्रायश्चित्त-फल पुराण-श्रवण से प्राप्त होता है। अंत में अयोग्य वक्ता/ग्रन्थ के लक्षण, उपयुक्त दान, तथा पुराण और उपपुराणों की सूची देकर कलियुग में पुराण-श्रवण को पूर्ण मोक्ष-साधन के रूप में स्थापित किया गया है।
Narration of the Primeval-Aeon Ramayana
इस अध्याय में सूत जी कहते हैं कि गौतमी तट पर श्रीराम संध्यावंदन करके सभा बुलाते हैं। वहाँ ‘भिन्न रचना वाले रामायण’ को लेकर विवाद उठता है। तब ब्रह्मा की परंपरा से प्राप्त ‘प्राचीन रामायण’ सुनाने की अनुमति पाकर जाम्बवान कथा आरम्भ करते हैं। वे दशरथ के अभियानों तथा एकादशी-द्वादशी के व्रत-पूजन की महिमा, पुत्रकामेष्टि यज्ञ और चारों राजकुमारों के जन्म-नामकरण का वर्णन करते हैं। ब्रह्मराक्षस की कथा में गंगा-स्नान और बिल्वपत्र से शिव-पूजन द्वारा प्रायश्चित्त बताया जाता है; वसिष्ठ का दशरथ को उपदेश भी आता है। शिक्षा, विवाह-व्यवस्था और मुहूर्त-विवाद में नारद, गार्ग्य और विदेह-नरेश के संवाद के बाद सूर्य के ‘देशानुसार नियम’ से निर्णय होता है। जनक शिव से वर माँगते हैं; अजगव धनुष की प्रतिज्ञा के कारण राम द्वारा धनुष-भंग से सीता-विवाह सिद्ध होता है। आगे वनवास, वाली-वध पर धर्म-विचार, तारा का संवाद, सुग्रीव-हनुमान के साथ लंका-योजना, हनुमान का दूतकार्य, लंका-युद्ध, शिव-स्तोत्र, समुद्र-लांघने में अजगव का साधन, रावण-वध, विभीषण की नीति-समझाइश और राज्याभिषेक संक्षेप में आते हैं। अंत में इस कथा के श्रवण-पाठ से पाप-नाश और मुक्ति का फल बताया गया है।
Rama’s Liberation (Ritual Dharma, Atithi-Test, and Śiva’s Revelation)
अध्याय 117 की शुरुआत आश्रम और निवास-स्थानों के मनोहर वर्णन से होती है। इसके बाद श्रीराम भगवान शंकर से शुद्ध पूजा-विधि और अशुद्ध/अधर्म से प्राप्त सामग्री से किए गए अर्पण के कर्मफल का उपदेश माँगते हैं। शिव जी आकथा–सुशोभना, रूपक–सम्पाति तथा गण-उत्पत्ति से जुड़े प्रसंगों के माध्यम से बताते हैं कि पूजन केवल धर्मपूर्वक अर्जित और निर्मल द्रव्यों से ही करना चाहिए; दूषित सामग्री से किया गया उपासना-कर्म दोषकारक होता है। मुख्य कथा में श्रीराम कौसल्या के मासिक श्राद्ध का अनुष्ठान करते हैं। तभी एक वृद्ध, अत्यन्त मांगलिक अतिथि आकर विधि में विघ्न डालता है और कठोर माँगों द्वारा अतिथि-धर्म की चरम परीक्षा लेता है। अंत में वह अतिथि स्वयं शिव के रूप में प्रकट होता है; पार्वती अक्षय अन्न प्रकट कर ‘अन्नदान’ की महिमा दिखाती हैं और देव-तृप्ति का संकेत देती हैं। अध्याय के अंत में शिव–राघव संवाद के श्रवण-पाठ का पुण्य तथा पुराण-वाचक को दान देने की प्रशंसा कही गई है।