
Gopāla-vidyā and Vraja-bhakti: Ascetics, Mantras, and Rebirth among the Gopīs
इस अध्याय में महादेव पार्वती से गोपाल-विद्या का रहस्य और व्रज-भक्ति की महिमा कहते हैं। उग्रतपा, सत्यतपा, हरिधाम, जाबालि आदि तपस्वी कृष्ण-मंत्रों का जप करते हुए काम-बीज के संयोग से सिद्धि, दर्शन और स्वप्न-रूप दिव्य अनुभूति प्राप्त करते हैं; अंततः वे गोकुल/नन्दवन में गोपियों या उनके सेवक-स्वरूप में पुनर्जन्म पाते हैं। दस, पंद्रह, अठारह, बीस और पच्चीस अक्षरों वाले मंत्रों के जप तथा वृन्दावन-केंद्रित ध्यान का वर्णन है—रास, वेणु-नाद, पीताम्बर, वैजयन्ती-माला आदि दिव्य रूप-छवियों सहित। सुनन्दा, भद्रा, रङ्गवेणी जैसी गोपिकाओं के प्रसंग व्रज-सेवा और प्रेममय साधना को पुष्ट करते हैं। एक निर्णायक उपदेश में ‘मैं ब्रह्मविद्या हूँ’ कहने वाली एक तपस्विनी बाला स्वीकार करती है कि कृष्ण के प्रति प्रेम-भक्ति के बिना ज्ञान अपूर्ण है, और वह पूजन-विधि का उपदेश देती है। अंत में पुण्यश्रवा और उसके पुत्र को शिवकृपा से गोपाल-विद्या का दान, तथा ज्योतिर्मय वृन्दावन-द्वीप का मानक ध्यान बताया जाता है। फलश्रुति में पाठ से वासुदेव-धाम की प्राप्ति और मोक्ष का आश्वासन दिया गया है।
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