Adhyaya 31
Patala KhandaAdhyaya 310

Adhyaya 31

Description of the Dhenu-vrata (Cow Vow) and the Ethics of Cow-Protection

इस अध्याय में नरक-यात्रा के प्रसंग के साथ कर्म-नीति और धेनु-व्रत का विधान बताया गया है। यमपुरी में एक राजा पूछता है कि अत्यन्त पुण्यवान राम-भक्त भी यम के नगर के निकट क्यों पहुँचता है। धर्मराज समझाते हैं कि पूर्वजन्म में चरती हुई गाय को रोककर उसके चरने में बाधा डाली गई थी; उसी सूक्ष्म पाप-शेष के कारण यमपुरी-समीपता हुई, यद्यपि भक्ति का प्रभाव महान है। फिर कथा धेनु-व्रत की ओर मुड़ती है। सुमति के प्रश्न पर जाबालि गो-पूजा, नित्य गो-रक्षा, सेवा, स्नान-पूजन तथा विधिपूर्वक घास-जल और आहार देने का क्रम बताते हैं। आगे संकट आता है जब रक्षित गाय को सिंह मार देता है; तब प्रायश्चित्त का विचार होता है। उपदेश में स्पष्ट किया जाता है कि जान-बूझकर गो-हिंसा लगभग अप्रायश्चित्त्य है, पर अनजाने में हुई हानि के लिए शान्ति-प्रायश्चित्त संभव है। अन्त में रघुनाथ की आराधना, गौ-रक्षा और ब्राह्मण को सुवर्ण-दान का निर्देश दिया जाता है। सुरभि/कामधेनु राजा ऋतंभर को राम-भक्त पुत्र का वर देती हैं और राजा अंततः हरि-धाम को प्राप्त होता है।

Shlokas

No shlokas available for this adhyaya yet.