
The Greatness of Vaiśākha: Mādhava Bath, Tulasī Worship, Water-Cow Charity, and Deliverance of Pretas
इस अध्याय में वैशाख-मास के माधव-व्रत की महिमा बताई गई है। प्रातःकाल स्नान करके तुलसी-दलों से माधव (विष्णु) का पूजन, तर्पण, दान और श्राद्ध—ये सब मोक्षदायक माने गए हैं। धर्मराज तुलसी को केशव की परम प्रिय अर्पण-वस्तु बताते हैं; अशुद्धि में तुलसी तोड़ना वर्जित है, और पुष्प न मिलने पर भी तुलसी अथवा सरल उपचारों से पूजा करने की अनुमति दी गई है। अश्वत्थ (पीपल) को जल देना, उसकी प्रदक्षिणा करना, तथा त्रयोदशी, चतुर्दशी और पूर्णिमा को ब्राह्मण-भोजन विशेष फलदायक कहा गया है। कथा-प्रसंग में धनशर्मा को तीन प्रेत—कृतघ्न, विदैवत और अवैशाख—मिलते हैं, जो अपने दुःख का कारण बताते हैं: कृतघ्नता, देव-धर्म का अनादर, और वैशाख-कर्मों की उपेक्षा। धनशर्मा वैशाख-धर्म के अनुसार जल-दान (जलधेनु, जलघट), तिल-और-मधु का दान, तथा ब्राह्मणों को तृप्त कर भोजन कराने से उनके पितृवंश का उद्धार करता है; पाप नष्ट होते हैं और पुनर्जन्म का बंधन घटता है।
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