Kriyayoga Sara
KriyayogaMeditationSadhana

Kriyā-yoga-sāra Section (Essence of Yoga-through-Action)

The Essence of Kriyayoga

पद्मपुराण का सातवाँ ‘क्रियायोगसार-खण्ड’ कलियुग के लिए उपयुक्त व्यावहारिक धर्म-मार्ग को सामने रखता है। यहाँ मोक्षोन्मुख भक्ति को केवल अंतर्मुख ध्यान नहीं, बल्कि अनुशासित कर्म (क्रिया), श्रवण, और आचार-नीति से युक्त जीवन के रूप में बताया गया है। नारायण की कथा, गुरु-आदर, और धर्म का परम्परागत संचार—इनको उद्धारक साधन के रूप में विशेष महत्त्व मिलता है। इस खण्ड की कथा-रचना परम्परा-प्रमाण को दृढ़ करती है: नैमिषारण्य में सूत का कथन, और भीतर जैमिनि–व्यास आदि के संवाद। इस प्रकार ‘श्रवण-परम्परा’ के द्वारा सिद्धान्तों की पुष्टि होती है और यह दिखाया जाता है कि हरि-कथा सुनना और सुनाना स्वयं साधना है—जो पाप का क्षय और चित्त की शुद्धि करता है। आरम्भ में मङ्गलाचरण के साथ कलियुग की समस्या रखी जाती है—अल्पायु, दरिद्रता, और धर्म-नीति का ह्रास। फिर पुराण का उपाय बताया जाता है: हरि-कथा और वैष्णव-सत्संग को क्रियायोग का सार मानकर, उसे पाप-नाशक और रोग-शमन करने वाली कृपा-भूमि कहा गया है। धर्मशास्त्रीय दृष्टि से यह खण्ड कलियुग में विष्णु की सुलभता को उभारता है—कम साधनों में भी श्रद्धा, उपदेश-सेवा, और पवित्र कथा में विघ्न न डालने से महान पुण्य मिलता है। गुरु-नीति, वैष्णव-आचार, धर्म-प्रसार, और श्रवण-भक्ति—ये प्रमुख विषय हैं, जिनसे साधक का जीवन ही योग और उपासना बन जाता है।

Adhyayas in Kriyayoga Sara

Adhyaya 1

Invocation, the Naimiṣāraṇya Frame, Kali-yuga’s Problem, and the Glory of Hari-kathā

अध्याय का आरम्भ मंगलाचरण से होता है, जहाँ श्रीविष्णु (वराह सहित) तथा लक्ष्मी-सहित वेदव्यास की स्तुति की जाती है। फिर नैमिषारण्य की सभा का प्रसंग आता है, जहाँ ऋषिगण व्यास के शिष्य सूत का आदर करके धर्मकथा सुनने के लिए बैठते हैं। शौनक पूछते हैं कि कलियुग में आचार-भ्रंश, अल्पायु, दरिद्रता और पुण्य-संचय की शक्ति घट जाने पर भी भक्ति और सच्चा कल्याण कैसे उत्पन्न हो? यहाँ उपदेश के नैतिक भार पर बल दिया गया है—सत्पथ दिखाने वाला पुण्य का भागी होता है और कुमार्ग में लगाने वाला पाप का। करुणामय आचार्य केशव-सदृश कहे गए हैं, और वैष्णव-हरिकथा को रोकने या उसका उपहास करने वालों की निन्दा की गई है। अन्त में सूत प्रमाण-परम्परा स्थापित करते हैं कि वे जैमिनि को व्यास द्वारा कही हुई बात सुनाएँगे—कलियुग में भी मोक्ष क्यों सुलभ होता है। हरिकथा को पाप-नाशिनी और क्रिया-योग का सार बताकर आगे के संवाद की भूमिका बाँधी जाती है।

Adhyaya 2

Mahāviṣṇu as Trimūrti: Creation Schema, Madhu–Kaiṭabha Episode, and the Marks of a Vaiṣṇava

इस अध्याय में कहा गया है कि महाविष्णु ही सृष्टि, पालन और संहार के लिए त्रिमूर्ति-रूप से प्रकट होते हैं; इसलिए देवताओं में भेद करके वैर-भाव रखना उचित नहीं। फिर ब्रह्मा की सृष्टि-रचना का वर्णन आता है—पंचतत्त्व, लोक, पाताल, पर्वत, द्वीप और समुद्रों की व्यवस्था; और विशेष रूप से भारतवर्ष को कर्मभूमि बताकर कहा गया है कि यहाँ धर्म का फल शीघ्र मिलता है। इसके बाद भक्ति की सर्वोच्चता और वैष्णव-संग की तारक शक्ति प्रतिपादित होती है। मधु–कैटभ प्रसंग में योगनिद्रा में स्थित विष्णु की स्तुति करते हुए ब्रह्मा, दैत्यों का मोह, उनका वध, और भक्तों को विपत्तियों से मुक्त रखने का वरदान वर्णित है। अंत में वैष्णव के लक्षण संक्षेप में बताए गए हैं—सदाचार, तुलसी, तिलक, शालग्राम-सेवा, एकादशी-व्रत, मंदिर-सेवा, दान और लोककल्याण; तथा पाठ-श्रवण की फलश्रुति भी कही गई है।

Adhyaya 3

Constituents of Kriyā-yoga and the Greatness of Gaṅgādvāra (The Story of King Manobhadra and the Vulture’s Past Lives)

जैमिनि व्यास से क्रिया-योग का सार पूछते हैं और कहते हैं कि मनुष्य-जन्म दुर्लभ है, इसलिए मुक्ति के लिए शीघ्र साधना आवश्यक है। व्यास क्रिया-योग के ठोस अंग बताते हैं—गंगा का आदर-पूजन, धर्म के अनुरूप श्री/समृद्धि, विष्णु-भक्ति, दान, ब्राह्मण-सेवा, एकादशी-व्रत, धात्री (आँवला) और तुलसी की भक्ति, तथा अतिथि-सत्कार। फिर गंगा की तारक शक्ति का विशेष वर्णन होता है—गंगाद्वार, प्रयाग और समुद्र-संगम में स्नान-सेवा का महात्म्य बताया जाता है; यहाँ तक कहा जाता है कि ‘गंगा’ नाम का उच्चारण भी पाप हर लेता है। इसके बाद कथा-प्रसंग में राजा मनोभद्र एक गिद्ध से उसके पूर्वजन्मों का वृत्तांत सुनते हैं—यमराज और चित्रगुप्त की सभा में कर्म-निर्णय, ब्राह्मणों के प्रति कंजूसी और माता-पिता के अपमान के भयंकर परिणाम, तथा गंगा में आकस्मिक मृत्यु से भी अद्भुत मुक्ति का प्रसंग। अंत में फलश्रुति है कि श्रद्धा से सुनने-पढ़ने पर शीघ्र पाप-नाश होता है।

Adhyaya 4

Description of Prayāga (Glory of the Sacred Confluence and Māgha Observances)

जैमिनि, गंगाद्वार का माहात्म्य सुनकर, व्यास से प्रयाग की महिमा पूछते हैं। व्यास संक्षेप में तीर्थ-माहात्म्य बताते हैं—त्रिवेणी-संगम देवताओं द्वारा वंदित है; माघ-स्नान, विशेषतः मकर-सूर्य के समय, अतुल पुण्य देने वाला और वैकुण्ठ-प्राप्ति कराने वाला है, जो प्रसिद्ध दानों और यज्ञों से भी बढ़कर है। फिर उपदेशात्मक कथा आती है—धनवान वैश्य प्रणिधि और उसकी पतिव्रता पत्नी पद्मावती के प्रसंग में एक पापी व्यक्ति उसे बहकाने का प्रयास करता है, पर संगम पर मृत्यु पाकर अद्भुत रूप से शुद्ध हो जाता है। पद्मावती के स्तोत्र से माधव प्रकट होकर “दो पतियों” के धर्म-संकट का समाधान करते हैं और वैकुण्ठ-गमन का वर देते हैं। मार्ग में विष्णुदूत बताते हैं कि गंगा-सागर संगम पर मरने वाले घोर पापी भी परम गति को प्राप्त होते हैं। अंत में अगले प्रसंग हेतु राजा माधव की तपस्या का संकेत दिया जाता है।

Adhyaya 5

Exposition of Vīravara (Virtue Tested by Desire, Fate, and Strategy)

तāladhvajā नगर में राजा विक्रम और रानी हारावती के पुत्र माधव विद्वान् युवराज बनते हैं। शिकार के समय वह स्नान करती चन्द्रकला को देखकर कामवश हो उठता है और अपहरण का विचार करता है; तभी कथा में तीखी नीति कही जाती है कि ऐश्वर्य, मद और काम विवेक का नाश करते हैं, और पर-स्त्रीगमन घोर अधर्म है। चन्द्रकला उसे रोककर समुद्र-पार दूर नगर की राजकुमारी सुलोचना का संकेत, पहचान-चिह्न और वहाँ जाने का उपाय बताती है। माधव समुद्र पार कर गन्धिनी को मध्यस्थ बनाकर सुलोचना से पत्र-व्यवहार करता है। सुलोचना शर्त रखती है कि सार्वजनिक परिक्रमा के बाद जो उसे ‘ले जा सके’ वही उसका पति होगा। पर दैववश माधव के सो जाने पर उसका सेवक प्रचेष्ट सुलोचना का अपहरण कर उसे फुसलाना चाहता है; सुलोचना विवाह-सामग्री लाने के बहाने उसे भेजकर बुद्धि से निकल भागती है। अंत में वह एक पवित्र संगम पर पहुँचकर माया से पुरुष-रूप धारण करती है और “वीरवर” नाम से राजा सुसेण की सभा में प्रवेश करती है, जिससे आगे की कथा का क्रम बनता है।

Adhyaya 6

The Slaying of Bhīmanāda and the Teaching on Gaṅgā–Ocean Confluence, Land-Donation Ethics, and Karmic Consequences

राजसभा में रहने वाला एक रक्षक-वीर राजा के आदेश से भयानक खड्गधारी राक्षस भīमनाद का आतंक मिटाने निकलता है, जो प्राणियों को निगलता था। वह गंगा के समुद्र-संगम के निकट उससे युद्ध कर उसे मार देता है। तभी विष्णु के पार्षदों सहित एक तेजस्वी पुरुष प्रकट होकर कथा को कर्मफल-न्याय की ओर मोड़ देता है। धर्मबुद्धि नामक धर्मात्मा राजा अपने पूर्वकर्मों का वृत्तांत सुनाता है—पाखंडियों के बहकावे में आकर उसने द्विज-धर्म का उल्लंघन किया, विशेषतः आजीविका की मर्यादा और भूमि-दान की नीति में दोष किया; उसी ‘छोटे’ अपराध से राज्य-नाश और घोर नरक-फल प्राप्त हुआ। यमराज की व्यवस्था, चित्रगुप्त का लेखा और भास्करी-देव की साक्षी से पाप-पुण्य का निर्णय स्पष्ट किया जाता है। फिर गंगासागर तीर्थ का विधान बताया जाता है—प्रातः स्नान, नारायण-पूजन, गीत-नृत्य सहित भक्ति, तथा तुलसी-सेवा। वहीं लोगों के लोप, शोक-विलाप और आत्मघात की प्रवृत्ति का वर्णन कर मोह और ‘मेरा-मेरे’ के आसक्ति से बचने की शिक्षा दी जाती है; अंत में गृह-प्रसंग में गंधिनी माधव को फटकारती है।

Adhyaya 7

The Greatness of the Droplets of the Gaṅgā

इस अध्याय में गङ्गा-माहात्म्य का स्तुतिपूर्वक वर्णन है—गङ्गा का नाम-स्मरण, दर्शन, स्नान, तट की रेत या जल की एक बूंद का स्पर्श भी पापों का नाश कर मोक्ष देता है; इसे तप और यज्ञों से भी श्रेष्ठ कहा गया है। फिर त्रेता-युग की कथा आती है। धर्मस्व नामक धर्मपरायण ब्राह्मण गङ्गा के पास जाकर मुक्ति की प्रार्थना करता है। उसी समय कालकल्प नामक घोर पापी, बैल पर क्रूरता आदि पापों के कारण भयंकर मृत्यु को प्राप्त होता है; धर्मस्व करुणावश उसे गङ्गाजल से छिड़क देता है। यमदूत उसे पकड़ने आते हैं, पर विष्णुदूत प्रकट होकर कहते हैं कि गङ्गा की बूंदें समस्त पाप हर लेती हैं और वह हरि-धाम के योग्य हो गया है। संघर्ष के बाद यमदूत भाग जाते हैं; कालकल्प वैकुण्ठ ले जाया जाता है और अंततः परम मुक्ति पाता है। धर्मस्व गङ्गा की स्तुति कर यह वर पाता है कि वह गङ्गा-जल में देह त्यागते समय गङ्गा-नाम का स्मरण कर परम गति को प्राप्त होगा।

Adhyaya 8

The Glory of the Gaṅgā: Merit, Purity Laws, and Liberation at Death

इस अध्याय में गङ्गा का परम माहात्म्य और उसके तट पर रहने‑आने वालों के लिए कठोर आचार‑नियम बताए गए हैं। श्रद्धा से गङ्गाजल का स्पर्श, पान या स्नान महायज्ञ के समान पुण्यदायक कहा गया है; तीर्थयात्रियों को रोकना, उन्हें कष्ट देना या अपमान करना नरक का कारण बताया गया है। इसके बाद शौच‑शुद्धि के नियम तीव्र हो जाते हैं—तट या जल में मल‑मूत्र, उच्छिष्ट, कफ आदि डालना अत्यन्त घोर पाप माना गया है, जिसका प्रायश्चित्त भी कठिन बताया गया। गङ्गा‑तट पर किया गया पाप अन्यत्र जाकर नहीं मिटता—ऐसा भी प्रतिपादित है। उत्तरार्ध में इन्द्र‑शची तथा पद्मगन्धा/क्रौञ्ची की कथा देकर यह दिखाया गया है कि गङ्गा में देहत्याग, विशेषतः अस्थियों का जल में बने रहना, दीर्घ स्वर्ग‑सम्मान और विष्णुलोक की निकटता दिलाता है। अंत में कहा गया है कि मृत्यु के समय “गङ्गा” का उच्चारण या उसके माहात्म्य का स्मरण मोक्ष या महान स्वर्गफल प्रदान करता है।

Adhyaya 9

The Glory of the Gaṅgā: Pilgrimage Discipline, Ancestral Rites, and Liberation

अध्याय का आरम्भ जैमिनि के प्रश्न से होता है—वे व्यास से गङ्गा की परम महिमा सुनाना चाहते हैं। फिर स्तुति-रूप वर्णन आता है कि गङ्गा-तट तक चलकर जाना, उसकी लहरों का श्रवण, उसके जल का आस्वादन और गङ्गा-मृत्तिका का तिलक धारण करना—इनसे इन्द्रियाँ और अंग ‘सफल’ हो जाते हैं। इसके बाद तीर्थयात्रा की मर्यादा बताई गई है—तप, संयम, सत्य-वचन, कलह से दूर रहना, भोग-विलास का त्याग और गङ्गा-नाम का निरन्तर जप। गङ्गा के पास जाकर प्रणाम, स्पर्श, स्नान, मृत्तिका-संग्रह, तिलक-विधि, तर्पण-श्राद्ध, गङ्गा तथा विष्णु-पूजन और रात्रि-जागरण का क्रम भी बताया गया है। उत्तरार्ध में कर्मफल का दृष्टान्त है—राजा सत्यधर्म और रानी विजय ने शरणागत मृग की हिंसा की, इसलिए नरक भोगकर पशु-योनि (मेंढक-दम्पति) में जन्म पाया। गङ्गा-तीर्थ की ओर यात्रा करते हुए कालसर्प से सामना और मार्ग में देहान्त होने पर गङ्गा-प्रसाद से उनका उत्कर्ष, स्वर्गारोहण और अन्ततः मुक्ति होती है; इससे गङ्गा की तारिणी शक्ति और अहिंसा की प्रधानता प्रतिपादित होती है।

Adhyaya 10

Rites and Rewards of Worshipping Viṣṇu in Māgha Month (with the Campaka-Flower Exemplum)

इस अध्याय में जैमिनि व्यास से विष्णु-पूजा का फल पूछते हैं। तब माघ-मास की साधना-योजना बताई जाती है—मांस और मैथुन का त्याग, प्रातःकाल स्नान, सादा आहार, श्वेत वस्त्र, तथा पञ्चमहायज्ञ का पालन। अर्चना-विधि में भगवान को हल्के गरम जल से स्नान कराना, चन्दन का लेपन, पात्रों की शुद्धि, वस्त्र-समर्पण, शीत-निवारण हेतु धूमरहित अग्नि प्रज्वलित करना, और दूध व नारियल-जल से विशेष अभिषेक का विधान आता है। पञ्चमी और एकादशी आदि तिथियों की विशेष महिमा, तथा प्रतिदिन पायस आदि नैवेद्य अर्पण करने का फल कहा गया है; माघ में किए गए कर्मों को ‘अक्षय पुण्य’ देने वाला बताया गया है। फिर उपदेशात्मक कथा में पापी राजा सुवर्ण संयोगवश चम्पक-पुष्प अर्पित कर ‘ॐ नमो नारायणाय’ कह देता है; यमदूतों से उसे विष्णुदूत छुड़ाते हैं और भगवान नारायण उसे स्वीकार करते हैं—जिससे नाम-स्मरण और पुष्प-समर्पण की तारक शक्ति प्रकट होती है।

Adhyaya 11

Procedure for the Worship of Hari (Purity, Preparation, Pūjā Sequence, and Prasāda Theology)

इस अध्याय में वैष्णव की प्रातःकालीन पूजा-प्रणाली क्रमबद्ध रूप से बताई गई है। ब्रह्ममुहूर्त में उठना, मलोत्सर्ग के नियम, शौचाचार, मिट्टी और जल से शुद्धि, तथा दंतधावन और जिह्वा-शोधन के समय‑विधि और निषेध वर्णित हैं। इसके बाद रात्रि-वस्त्र त्यागकर नारायण का स्मरण, और लक्ष्मी सहित श्रीकृष्ण के प्रति जागरण व सेवा-भाव के अंग बताए गए हैं। फिर मंदिर-सेवा का विधान आता है—पुराने अवशेष हटाना, झाड़ू देना, मिट्टी/गोबर से लीपना—जिसे अत्यन्त पुण्यदायक कहा गया है। पात्रों और उपकरणों की शुद्धि, स्नान-शिष्टाचार, पाँव धोकर गर्भगृह में प्रवेश, उचित आसन और दिशा-नियम भी बताए गए हैं। शंख और तुलसी सहित देव-स्नान, दिक्बन्धन, संकल्प, न्यास, श्रीकृष्ण-ध्यान, उपचार, मंत्र-जप, नैवेद्य, प्रदक्षिणा और साष्टांग प्रणाम का क्रम दिया गया है। अंत में प्रसाद-तत्त्व प्रतिपादित है—निर्माल्य, तुलसी की सुगंध, विष्णुपादोदक और नैवेद्य पापों का नाश करते हैं; और पूजा के फल का निर्णायक कारण अंततः भक्ति ही घोषित की गई है।

Adhyaya 12

The Glory of the Aśvattha (Sacred Fig) and Month-wise Offerings to Hari

इस अध्याय में फाल्गुन मास के वैष्णव-पूजन का विधान बताया गया है। प्रतिदिन श्रीकृष्ण की भक्ति से आराधना, घृताभिषेक, तथा मिष्ठान्न, शर्करा, फल आदि का नैवेद्य करने से विष्णुलोक-प्राप्ति, दीर्घ स्वर्ग-सुख और अंततः मोक्ष का फल कहा गया है। फिर चैत्र और वैशाख के नियम आते हैं—मधु से अभिषेक, पुष्प-पूजन, आहार-संयम, स्नान-विधि, दान और जल-दान; इन्हें अक्षय पुण्य देने वाला बताया गया है। अध्याय का केंद्र-तत्त्व यह है कि अश्वत्थ (पीपल) स्वयं भगवान् विष्णु का साक्षात् स्वरूप है। उसकी रक्षा और पूजा परम पुण्यकारी है, और उसका काटना या कटवाना अत्यन्त घोर पाप का कारण कहा गया है। त्रेता-युग की कथा में ब्राह्मण भक्त धनञ्जय द्वारा अश्वत्थ पर प्रहार होने पर उसी वृक्ष से भगवान् प्रकट होते हैं, अज्ञान को क्षमा कर वर देते हैं और अश्वत्थ-पूजा को क्रिया-योग का मार्ग बताकर कल्याण तथा मोक्ष-प्रद सिद्ध करते हैं।

Adhyaya 13

Seasonal and Monthly Worship of Viṣṇu (Jyeṣṭha–Kārtika), Ritual Purity Rules, and the Greatness of the Lotus Offering

इस अध्याय में ज्येष्ठ मास की विष्णु-पूजा का विधान बताया गया है—शीतल अभिषेक, सुगंधित द्रव्यों का प्रयोग, चँवर से पंखा करना, तथा मंदिर/पूजा-स्थान की उपयुक्तता के नियम। फिर मासानुसार क्रम आता है: आषाढ़ में दधि-भात, मक्खन आदि नैवेद्य; श्रावण-भाद्र में पुष्प-फल, भोजन-नियम और निषेध; तथा आश्विन में जल-तर्पण/अर्घ्य देने का उचित समय। इसके बाद शुद्धि और आचार का विस्तृत भाग है—वस्त्र, केश, गृह-प्रतिष्ठा, तिलक, और वैष्णव शस्त्र-चिह्नों (अंकन/धारण) को रक्षक तथा उद्धारक चिह्न कहा गया है। अंत में कार्तिक-व्रत की महिमा—दीपदान, तुलसी-बिल्व पूजन और कमल-समर्पण—विशेष रूप से गाई गई है; एक इतिहासनुसार पूर्व डाकू भी केवल एक कमल विष्णु को अर्पित कर भक्ति से परिवर्तित होकर ज्ञान और मोक्ष प्राप्त करता है।

Adhyaya 14

The Greatness of Worship of the Blessed Lord (Viṣṇu–Lakṣmī Pūjā: Place, Mind, Offerings, and Merit)

इस अध्याय में मार्गशीर्ष मास में अक्षय भगवान विष्णु की महालक्ष्मी सहित वैष्णव-पूजा का माहात्म्य बताया गया है। पूजा के लिए स्थान और संगति की शुद्धि अनिवार्य कही गई है—अशुद्ध भूमि, दुर्गन्धयुक्त स्थान, पतितों के घर, पाखण्डियों या महापापियों की निकटता, तथा रोदन, कलह, उपहास, लोभ और दान-लिप्सा से भरे वातावरण में पूजा निषिद्ध है। फिर मन की भूमिका पर बल दिया गया है—कपट और चित्त-विक्षेप से पूजा निष्फल हो जाती है; समस्त कर्म मन पर आश्रित हैं, और मन की पवित्रता के बिना दीर्घ तप भी व्यर्थ हो जाते हैं। एकाग्र भक्ति, व्यर्थ वाणी से बचना, और यह विश्वास कि पुष्प व ताज़ी सरल सामग्री जैसे छोटे अर्पण भी भगवान स्वीकार करते हैं—ऐसा उपदेश है। उत्तरार्ध में मासानुसार अर्पण और दान का विधान आता है—गन्ने का रस व गन्ने के पदार्थ, दूध/दही सहित अन्न, नये वस्त्रों का दान, तथा मंदिर-सेवा में शंख, घंटा, वाद्य, नृत्य और गीत। इनके फलस्वरूप महान पुण्य, विष्णुधाम की प्राप्ति और अंततः मुक्ति का प्रतिपादन किया गया है।

Adhyaya 15

The Greatness of Rāma’s Name: The Courtesan and the Parrot; Yama’s Edict on Hari-bhaktas

इस अध्याय में वैष्णव-तत्त्व बताया गया है कि समस्त जगत और देवता विष्णु के ही अंश हैं। हरि के नामों का निरन्तर स्मरण समय-देश की किसी सीमा के बिना पापों का नाश करता है। फिर उपदेशात्मक कथा आती है—एक गणिका ऐसा तोता प्राप्त करती है जिसे “राम” बोलने का अभ्यास कराया गया है। उस नामोच्चारण से तोता और गणिका दोनों पवित्र हो जाते हैं। उनके देहान्त पर यमदूत उन्हें पकड़ने आते हैं, पर विष्णुदूत रोकते हैं; संघर्ष में यमदूत पराजित होते हैं। अन्त में यम अपने दूतों को कठोर आदेश देता है कि जो राम, गोविन्द, केशव, हरि, विष्णु, नारायण आदि नामों का स्मरण या उच्चारण करते हैं—विशेषतः एकादशी-व्रत करने वाले और विष्णु-पादोदक धारण करने वाले भक्त—वे दण्डनीय नहीं हैं; उनके पास भी न जाना। अध्याय का उपसंहार राम-नाम की महिमा से होता है—यह मन्त्रों से भी श्रेष्ठ, कर्मों में सिद्धिदायक, यात्रा व भय में रक्षक और मृत्यु-समय परम सहायक है।

Adhyaya 16

The Glory of a Śabara Devotee: Cakrīkā’s Fruit-Offering and Viṣṇu’s Grace

इस अध्याय में बताया गया है कि हरि-भक्ति ही सच्ची श्रेष्ठता का मानदण्ड है। कुल, जाति और कर्मकाण्ड से नहीं, बल्कि भक्तिभाव से मनुष्य महान होता है; इसलिए जो ब्राह्मण भक्तिहीन है वह हीन है, और जो निम्न कुल में होकर भी हरि-भक्त है वह पूज्य है। फिर द्वापरयुग की कथा आती है—शबर-भक्त चक्रीका की। वह सरल प्रेम से विष्णु को फल अर्पित करना चाहता है; शुद्धि-नियम न जानकर वह पहले फल चख लेता है और फिर अर्पण करता है। एक फल उसके कंठ में अटक जाता है; प्रभु को देने की व्याकुलता में वह अपने शरीर को घायल तक कर लेता है। तभी भगवान विष्णु प्रकट होकर उसे अतुल भक्त कहते हैं, स्पर्श मात्र से उसे स्वस्थ करते हैं और उसकी स्तुति स्वीकार करते हैं। चक्रीका कोई सांसारिक वर नहीं मांगता—केवल प्रभु में अचल मन और अंततः मोक्ष चाहता है, और उसे मुक्ति मिलती है। निष्कर्ष यह कि विष्णु धन, स्तोत्र, तप या जप से नहीं, केवल भक्ति से प्रसन्न होते हैं।

Adhyaya 17

Granting of the Boon of an Auspicious Body at Puruṣottama-kṣetra (and the Power of Hari-bhakti and the 108 Names)

जैमिनि के प्रश्न पर व्यास बताते हैं कि पुरुषोत्तम-क्षेत्र में, जहाँ केशव निवास करते हैं, हरि-भक्ति परम पावन और सर्वश्रेष्ठ शुद्धिकारिणी है। कथा में भद्रतनु नामक ब्राह्मण विषयासक्ति में पड़कर वैदिक कर्तव्यों से विमुख हो जाता है और श्राद्ध के दिन भी वेश्या के पास जाने को उद्यत होता है। तभी उसे घोर लज्जा और पश्चात्ताप होता है; वह मार्कण्डेय मुनि की शरण लेकर अपने अपराध स्वीकार करता और कल्याणकारी देह आदि वर माँगता है। फिर दाम्त नामक गुरु उसे क्रिया-योग का व्यावहारिक विधान बताते हैं—दोषों का त्याग, सदाचार, मंदिर-सेवा, पञ्चमहायज्ञ, मंत्र-जप तथा विष्णु के 108 नामों का विनियोग और ध्यान सहित पाठ। पाँच दिन की एकाग्र उपासना के बाद श्रीहरि प्रकट होकर उसकी स्तुति और प्रायश्चित्त-भाव स्वीकार करते हैं, जन्म-जन्मांतर तक अचल भक्ति का वर देते हैं और उससे सख्य स्थापित करते हैं। अंत में दाम्त को भी दर्शन प्राप्त होता है और अध्याय मनुष्य-जन्म तथा भारतवर्ष की दुर्लभता, और यहाँ की उपासना से मोक्ष-प्राप्ति की महिमा का प्रतिपादन करता है।

Adhyaya 18

The Glory of Puruṣottama (Jagannātha’s Sacred Field)

जैमिनि परम तीर्थ के माहात्म्य का संक्षिप्त वर्णन पूछते हैं। व्यास (और आगे पुराणवक्ता) लवण-सागर के तट पर स्थित पुरुषोत्तम-क्षेत्र की स्तुति करते हैं—यह स्वर्ग से भी दुर्लभ और समस्त तीर्थों में श्रेष्ठ है। वहाँ प्रवेश करने से जीव ‘विष्णु-सदृश’ हो जाते हैं, इसलिए दोष-दर्शन और निन्दा का त्याग करने की शिक्षा दी जाती है। क्षेत्र का प्रसाद-भोजन लक्ष्मी द्वारा सिद्ध और हरि द्वारा भुक्त माना गया है; वह पाप का नाश करता और मुक्ति को सुगम बनाता है। इन्द्रद्युम्न, मार्कण्डेय, रोहिणी, श्वेतगंगा तथा समुद्र आदि पवित्र जलों का उल्लेख करके वहाँ स्नान, पितृ-तर्पण, दान, जप, यज्ञ और विष्णु-पूजा को अक्षय फल देने वाला कहा गया है। जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के दर्शन—विशेषतः गुंडिका-यात्रा और पर्व-काल में—मोक्ष तथा लौकिक वरदान प्रदान करते हैं। अंत में पुरुषोत्तम-क्षेत्र को संसार-तरण हेतु सर्वोत्तम तीर्थ घोषित किया गया है।

Adhyaya 19

The Greatness of Devotion to Hari: The Bandit Urvīśu, Naivedya Merit, and What Pleases or Angers Viṣṇu

व्यास जी जैमिनि से कहते हैं कि जो नारायण की शरण लेते हैं, उन्हें कभी अनिष्ट नहीं मिलता; विष्णु की महिमा का वर्णन वैष्णवों के बीच ही करना चाहिए। फिर उदाहरण आता है—उर्वीशु नामक पापाचारी व्यक्ति को कुटुम्बी तिरस्कृत कर देते हैं; वह डाकू बन जाता है। नदी-तट पर वैष्णव ब्राह्मणों को हरि के लिए नैवेद्य-समर्पण की मर्यादा बताते सुनकर उसे स्मरण होता है कि मुरारि को अर्पित वस्तु पवित्र है; इसलिए जिस गुड़ को उसने अर्पण करने का निश्चय किया था, उसे स्वयं नहीं खाता, दान कर देता है। जनार्दन उसके पाप हर लेते हैं; नगरवासी उसे मार भी दें, तो भी वह हरिधाम को ले जाया जाता है। दूसरी कथा में सर्वजनि नामक ब्राह्मण स्वप्न में केशव का दर्शन करता है और पश्चात्ताप-स्तुति करता है। भगवान् विष्णु उसे उसके कर्मों का गुप्त कारण बताते हैं—पूर्वजन्म में पक्षी होकर अनजाने में नैवेद्य-भक्षण से मुक्ति का बीज पड़ा। फिर प्रभु बताते हैं कि कौन-से आचरण उन्हें प्रिय हैं और कौन-से अप्रिय—भक्ति, सेवा, दान, शौच, सत्य और वैष्णवों का सम्मान प्रसन्न करता है; वैष्णव-निन्दा महापाप है। अंत में नित्य वासुदेव-पूजन का उपदेश देते हैं।

Adhyaya 20

The Glory of Charity (Supremacy of All Gifts in Kali Yuga)

इस अध्याय में कलियुग में दान को सर्वोच्च धर्म बताकर तप से भी श्रेष्ठ ठहराया गया है। कहा गया है कि तप कभी-कभी दोष और हिंसा का कारण बन सकता है, पर दान स्वभावतः अहिंसक और पुण्यदायक है; विशेष रूप से अन्नदान और जलदान को प्राणदायी, सर्वश्रेष्ठ दान कहा गया है। हस्तिनापुर में रतिविदग्धा नामक वेश्या, क्षेमंकारी नामक ब्राह्मणी-विधवा और धनवान ब्राह्मण हरिशर्मा—तीनों की मृत्यु के बाद यमदूत उन्हें धर्मपुर ले जाते हैं। वहाँ चित्रगुप्त कर्मों का लेखा जाँचता है; भारी पापों के होते हुए भी वेश्या का अन्नदान और ब्राह्मणी का बाल्यकाल में किया जलदान महान पाप-भार को नष्ट कर देता है, और यम उन्हें विष्णुलोक भेज देता है। हरिशर्मा को सम्मान तो मिलता है, पर कंजूसी के कारण उसे भोजन नहीं मिलता; तब ब्रह्मा समझाते हैं कि जो धन न भोगा जाए न दान किया जाए, वह व्यर्थ नष्ट हो जाता है। अंत में भूमि, गौ, स्वर्ण, ग्रंथ, ज्ञान आदि विविध दानों के फल बताए गए हैं और लक्ष्मीपति को प्रसन्न करने हेतु श्रद्धापूर्वक दान करने की प्रेरणा दी गई है।

Adhyaya 21

The Greatness of Giving Food and Water (and Honoring Brāhmaṇas)

व्यास जी जैमिनि से कहते हैं कि इस अध्याय में हरिशर्मा ब्रह्मा से पूछते हैं—दान का योग्य पात्र कौन है। ब्रह्मा ब्राह्मणों को ‘प्रत्यक्ष देवता’ मानकर श्रद्धा और आदर सहित दान की प्रतिष्ठा करते हैं। साथ ही ब्राह्मण-सत्कार की मर्यादा बताते हैं और यह भी कहते हैं कि किन अवसरों पर प्रणाम करना अनुचित माना जाता है। फिर अन्न और जल-दान की सर्वोच्च महिमा प्रतिपादित होती है। एक उपाख्यान में बताया गया है कि ब्राह्मण के चरणोदक के संस्पर्श से भी घोर पाप शुद्ध हो जाते हैं; पतित पूर्व-राजा शंख नरक-भोग के बाद उसी पुण्य-प्रभाव से मुक्ति पाता है। दूसरे उपदेश में कहा गया है कि परलोक की भूख कंजूसी और पितरों के लिए अर्पण-तर्पण की उपेक्षा से उत्पन्न होती है; इसलिए पुत्रों को पितृ-समर्थन हेतु अन्न-जल का दान करना चाहिए, जिसका निर्देश स्वप्न के माध्यम से भी दिया गया। अंत में निष्कर्ष है कि अन्न-जल-दान के समान कोई दान नहीं, और इसका फल समय-बंधन या कठोर पात्र-परीक्षा के बिना भी प्राप्त होता है।

Adhyaya 22

The Glory of Ekādaśī: Sin, Food-Taboo, Vigil, and the Complete Vrata Procedure

इस अध्याय में शिष्य एकादशी के सम्पूर्ण फल, विधि, समय और आराध्य देवता को जानने की प्रार्थना करता है और इसे सर्वोच्च व्रत कहा गया है। फिर कारण-कथा आती है—भगवान् पापपुरुष की सृष्टि करते हैं, नरकों की व्यवस्था करते हैं, यम के लोक में जाकर पापियों की यातना और करुण विलाप देखते हैं। दया से प्रेरित होकर नारायण एकादशी-तिथि के रूप में प्रकट होते हैं, जिससे पापी भी शुद्ध होकर परम धाम को प्राप्त होते हैं। पापपुरुष विनाश-भय से शरण मांगता है; तब विष्णु उसे एकादशी के दिन “अन्न में” निवास देते हैं—इसी से एकादशी पर अन्न/धान्य-निषेध का आधार बताया गया है। आगे व्रत-विधि विस्तार से दी गई है—दशमी के संयम और आहार-नियम, एकादशी को विष्णु-पूजन, जागरण, मंदिर में ध्वज-दीप-मण्डप-चित्र आदि सेवाएँ, शास्त्र-पाठ, पाखण्ड-वार्ता का त्याग, तथा द्वादशी को उचित समय पर पारण। विधिपूर्वक पालन करने पर मुक्ति का आश्वासन दिया गया है।

Adhyaya 23

The Glory of Ekādaśī: From Vigil Worship to Yama’s Court and the Two Paths

व्यास राजा कोचराश और रानी सुप्राज्ञा को एकादशी-व्रत में निष्ठावान आदर्श वैष्णव बतलाते हैं। वे दशमी के नियमों का पालन कर एकादशी की मध्यरात्रि में जागरण करते हैं—भजन, नृत्य, धूप-दीप, तुलसी-सेवा और सामूहिक कीर्तन से भगवान् हरि की आराधना करते हुए। ब्राह्मण शौरि उनके दुर्लभ आचरण की प्रशंसा कर उनकी पवित्रता का कारण पूछता है। सुप्राज्ञा अपने पूर्वजन्म का रहस्य खोलती है—वह वेश्या-जीवन और नित्योदयनामक दुराचारी पुरुष से संबंध के पापों का वर्णन करती है। उसी जीवन में दुःखवश/अनायास हुआ उपवास, दीप-प्रज्वलन, रात्रि-जागरण और नाम-स्मरण एकादशी के दिन उनके पापों का नाश करने वाला बना। यमलोक में चित्रगुप्त एकादशी की महिमा का प्रमाण देता है; धर्मराज यम उन्हें सम्मानपूर्वक मुक्त कर विष्णुधाम की ओर भेज देते हैं। इसके बाद अध्याय परलोक के दो मार्गों का उपदेश देता है—धर्मात्माओं के लिए शोभायमान, सुखद मार्ग और पापियों के लिए विशाल, यातनापूर्ण मार्ग; साथ ही नरकों और दंडों का वर्णन आता है। अंत में एकादशी को सर्वोत्तम व्रत घोषित कर राजदम्पति की हरि-प्राप्ति के साथ कथा पूर्ण होती है।

Adhyaya 24

The Glory of Tulasī (Holy Basil) and Dhātrī/Āmalakī (Indian Gooseberry)

एकादशी के पुण्य को सुनकर जैमिनि, व्यास से तुलसी की महिमा पूछते हैं। व्यास बताते हैं कि तुलसी स्वयं दिव्य धाम है, जहाँ श्रीविष्णु के साथ समस्त देवगण और तीर्थ निवास करते हैं; इसलिए तुलसी के सान्निध्य में किया गया धर्मकर्म अत्यन्त फलदायी होता है। अध्याय में तुलसी-सेवा के अनेक रूप गिनाए गए हैं—जल देना, छाया करना, संध्या समय दीप अर्पित करना, मूलस्थान की सफाई/मार्जन, रोपण और संरक्षण। इनके फल पाप-नाश, समृद्धि, पुण्यवृद्धि और अंततः मोक्ष बताए गए हैं; साथ ही पत्ते तोड़ने के मंत्र और नियम भी दिए हैं, ताकि विष्णु को “पीड़ा” न हो—अहिंसा और श्रद्धा का विशेष आग्रह है। फिर तुलसी के समान धात्री/आँवला की महिमा कही गई है। दोनों को कर्मकाण्ड की सिद्धि के लिए अनिवार्य बताया गया है—जहाँ ये हों वहाँ दान, पूजा, जप आदि अक्षय फल देते हैं; और जहाँ इनका अभाव हो वह स्थान अशुद्ध तथा आध्यात्मिक रूप से निष्फल माना गया है।

Adhyaya 25

The Greatness of Tulasī and the Merit of Honoring a Guest (Atithi-dharma)

जैमिनि तुलसी की पाप-नाशिनी शक्ति और अतिथि-सत्कार के माहात्म्य का फिर से विस्तार से वर्णन पूछते हैं। सूत के माध्यम से व्यास बताते हैं कि तुलसी स्वयं महालक्ष्मी-स्वरूपा और परम मंगलमयी हैं; मृत्यु के समय तुलसी का संस्पर्श—तुलसी-पत्र से छना/सुगंधित जल, तुलसी-तिलक, तथा मुख, शिर और कानों पर पत्र रखना—महापापियों को भी हरि के धाम तक पहुँचा देता है। फिर अध्याय अतिथि-धर्म पर आता है। पवित्र और आनपत्य ऋषि लोमश का पूर्ण आदर-सत्कार करते हैं; लोमश कहते हैं कि अतिथि में ब्रह्मा, शिव और विष्णु का वास है। ‘अतिथि’ की परिभाषा और आचार-विधि बताई जाती है—अकस्मात आए किसी भी आगंतुक का, वर्ण-भेद से परे और उपेक्षित वर्गों तक का भी, यथाशक्ति सम्मान महान पुण्य देता है; उपेक्षा से संचित पुण्य नष्ट हो जाता है। अकाल के समय एक निर्धन दंपति अतिथि को भोजन कराकर विष्णु-लोक को प्राप्त होता है। अंत में तुलसी-पत्र के स्पर्श और हरि-नाम से एक मरा हुआ चूहा भी मुक्त हो जाता है—तुलसी की तारक शक्ति पुनः सिद्ध होती है।

Adhyaya 26

Duties of the Ages and the Description of Kali-yuga, with the Merit of Hari-Nāma and Offering Actions to Viṣṇu

जैमिनि ने व्यास से पूछा कि जब कठोर कलियुग आएगा तब लोग कैसे आचरण करेंगे। व्यास ने सत्ययुग के गुण बताए—सत्य, करुणा, आरोग्य और नारायण-भक्ति; फिर त्रेता और द्वापर में धर्म का क्रमशः ह्रास, और अंत में कलि में नैतिक उलटाव का वर्णन किया। कलियुग में कामना, क्रूरता, कपट, चोरी, पाखंडी संगति और वर्ण-आश्रम के कर्तव्यों में भ्रम बढ़ता है। फिर व्यास उपाय बताते हैं—कलि के दोषों के बीच भी साधना का फल शीघ्र मिलता है। विशेषकर हरि-नाम का जप-कीर्तन और भक्ति से किए गए समस्त कर्मों को महाविष्णु को अर्पित करना महान पुण्य और सिद्धि देता है। अंत में फलश्रुति है कि इस उपदेश का पाठ, श्रवण, लेखन या पूजन करने से संचित पाप नष्ट होते हैं, इच्छित फल मिलते हैं और श्रीपति की कृपा से मोक्ष प्राप्त होता है।