
The Section on Heaven
पद्मपुराण का स्वर्ग-खण्ड तीर्थ-यात्रा और ब्रह्माण्ड-चिन्तन के बीच सेतु का कार्य करता है। इसमें पवित्र भूगोल—तीर्थ, क्षेत्र, नदियाँ, पर्वत—को ऐसी भक्ति-धर्ममीमांसा से जोड़ा गया है जिसमें हरि/विष्णु अन्तर्यामी प्रभु भी हैं और तीर्थों में सजीव, प्रत्यक्ष उपस्थिति भी। पुराण-शैली की कथावस्तु ऋषि-सभाओं और संवादों के माध्यम से चलती है, जिससे श्रोता की श्रद्धा और साधना-भाव दृढ़ होता है। इस खण्ड का प्रमुख प्रतिपादन यह है कि तीर्थ-सेवन मोक्षमार्ग की एक प्रभावी साधना है। पवित्र स्थानों का श्रवण, स्मरण और दर्शन—ये सब पुण्यवर्धक कर्म माने गए हैं, जो भारी पापों का क्षालन कर मन को शुद्ध करते हैं और भक्ति की दिशा में प्रवृत्त करते हैं। फलश्रुति के माध्यम से धर्म, आचार-शुद्धि और भगवद्भक्ति को एक ही मानचित्र में पिरोया गया है। तत्त्वतः स्वर्ग-खण्ड परात्पर विष्णु (अधोक्षज) और इह-स्थित पवित्रता (तीर्थरूप हरि) का समन्वय करता है। तीर्थ केवल स्थान नहीं, बल्कि भगवान की करुणामयी सन्निधि का अनुभव-स्थल है—यह भाव बार-बार उभरता है। इसी क्रम में पुराण-पाठ को भी समस्त तीर्थ-यात्राओं का सार और उनके स्थानापन्न के रूप में महिमामण्डित किया गया है। आरम्भ में वक्ता-परम्परा—हरि → ब्रह्मा → नारद → व्यास → सूत—स्थापित कर ग्रन्थ की प्रामाणिकता सुनिश्चित की जाती है। आगे (सम्पूर्ण खण्ड में) अनेक तीर्थों का वर्णन, उनके माहात्म्य और फलश्रुति, तथा लय/प्रलय जैसे ब्रह्माण्डीय प्रश्नों का संकेत मिलता है—जिससे ‘स्वर्गीय’ पुण्य का मार्ग पृथ्वी पर ही सुलभ बताया जाता है।
Invocation and the Naimiṣa Assembly: Sūta’s Arrival and the Request to Recount the Padma Purāṇa
स्वर्ग-खण्ड का आरम्भ गोविन्द के मङ्गलाचरण से होता है। फिर हिमालय, विन्ध्य, महेन्द्र आदि पवित्र प्रदेशों से आए वेदवेत्ता ऋषि नैमिषारण्य में शौनक के पास पहुँचते हैं; उनका यथोचित सत्कार, आतिथ्य और आसन-व्यवस्था होती है, और वे कृष्ण-केन्द्रित धर्मचर्चा करके बैठते हैं। उसी समय व्यास-शिष्य सूत रोमहार्षण आते हैं। ऋषि उनका सम्मान कर उन्हें वक्ता-आसन पर आमंत्रित करते हैं और निवेदन करते हैं कि हरि की पुराण-कथा का पुनः विस्तार से वर्णन करें। वे कहते हैं कि हरि-विहीन वाणी आध्यात्मिक रूप से निष्फल है और हरि स्वयं तीर्थस्वरूप होकर निवास करते हैं। ऋषि पुण्यदायक तीर्थों, क्षेत्रों, पर्वतों और नदियों के नाम व उत्पत्ति, तथा प्रलय-तत्त्व का उपदेश सुनना चाहते हैं। सूत उनके प्रश्नों की प्रशंसा कर व्यास को प्रणाम करते हैं, पद्मपुराण की रचना-योजना बताते हैं—छः खण्ड और 55,000 श्लोक—और परम्परा (हरि→ब्रह्मा→नारद→व्यास→सूत) का उल्लेख कर श्रवण-फल की महिमा कहकर ‘आदि-खण्ड’ का आरम्भ करते हैं।
Primordial Creation: From Brahman to the Cosmic Egg
अध्याय का आरम्भ सूत के वचन से होता है—आदि-सृष्टि का वर्णन परमात्मा के शाश्वत स्वरूप को समझने का उपाय है। प्रलय के बाद केवल एक ही प्रकाश रहता है, जिसे ब्रह्म कहा गया है। फिर साङ्ख्य-क्रम से प्रधान प्रकट होता है, उससे गुणों के भेद से त्रिविध महत्, और फिर अहंकार के तीन प्रकार उत्पन्न होते हैं। तामस अहंकार से तन्मात्राएँ निकलती हैं और उनसे पंचमहाभूत क्रमशः बनते हैं—आकाश में शब्द, वायु में स्पर्श, अग्नि में रूप, जल में रस और पृथ्वी में गन्ध; प्रत्येक अगले तत्व में नया गुण जुड़ता है। इसके बाद इन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ और मन तथा उनके कार्य बताए जाते हैं, और यह भी समझाया जाता है कि देहधारी प्राणियों की उत्पत्ति के लिए तत्वों का परस्पर संयोग आवश्यक क्यों है। इन समस्त तत्त्वों के संयोग से जल पर स्थित ब्रह्माण्ड-रूपी अण्डा बनता है; उसी में विष्णु ब्रह्मा-रूप धारण कर सृष्टि करते हैं, कल्पों तक पालन करते हैं और अंत में संहार कर सबको अपने में लीन कर लेते हैं—रक्षा और प्रलय के रूपों को धारण करके।
Qualities of the Five Great Elements; Description of Sudarśana-dvīpa and Mount Meru
ऋषियों ने सूत से निवेदन किया कि नदियों, पर्वतों, जनपदों और पृथ्वी के विस्तार का पूरा वर्णन किया जाए। इसके उत्तर में पहले तत्त्व-चिन्तन आता है—पञ्चमहाभूत जगत में व्याप्त हैं और उनके गुण क्रम से बताए जाते हैं: पृथ्वी पाँच गुणों वाली (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध), जल में गन्ध का अभाव, और फिर अग्नि, वायु तथा आकाश में गुणों का क्रमशः लोप। जब प्राणी और तत्त्व अपनी-अपनी मर्यादा नहीं लाँघते, तब समता और व्यवस्था बनी रहती है; मर्यादा-भंग से वैषम्य, देहधारियों में संघर्ष, तथा जन्म-मृत्यु का क्रम चलता है। सूत यह भी कहते हैं कि जो विषय अचिन्त्य हैं, उन्हें केवल तर्क से बाँधकर निश्चित नहीं करना चाहिए। फिर भूगोल-वर्णन में सुदर्शन-द्वीप का वृत्ताकार स्वरूप, समुद्रों और पर्वत-सीमाओं का विधान, पिप्पल-वृक्ष तथा शश-चिह्न का प्रसंग आता है। मेरु को केन्द्र मानकर वर्ष, पर्वत, दिव्य समाजों का विस्तार और गङ्गा के अनेक धाराओं में प्रकट होने का वर्णन किया जाता है।
Description of Uttara-Kuru and the Meru-Flank Regions (Bhadrāśva, Sudarśana Jambū, Solar Attendants)
ऋषियों के पूछने पर सूत जी मेरु पर्वत के उत्तर-पार्श्व का वर्णन करते हैं। वहाँ उत्तर-कुरु सिद्धों से सेवित पवित्र देश है, जहाँ सुगंधित और सदा पुष्पित वृक्ष हैं। ‘क्षीरीण’ नामक कल्पवृक्षों से अमृत-तुल्य दूध निकलता है और उनसे वस्त्र, आभूषण आदि मनोवांछित पदार्थ भी प्राप्त होते हैं। यहाँ कर्म और लोक-व्यवस्था का संबंध बताया गया है—स्वर्गलोक से पतित जीव उत्तर-कुरु में सुंदर, कुलीन मनुष्य बनकर जन्म लेते हैं; वे युगल रूप में सौहार्द से रहते हैं, रोगरहित, दीर्घायु और सदा युवा रहते हैं। भद्राश्व के भद्राशाल वन में काले आमों के रस से उनका यौवन अक्षय बना रहता है। नील और निषध पर्वतों के बीच महान सुदर्शन जम्बू-वृक्ष का उल्लेख है, जिसके कारण इस द्वीप का नाम जम्बूद्वीप प्रसिद्ध हुआ। अंत में ब्रह्मलोक से पतित कुछ जन ब्रह्म-घोषक बनकर सूर्य के परिचर होते हैं; वे सूर्य में प्रवेश करते हैं और सूर्य की ऊष्मा के प्रभाव से आगे चलकर चंद्र में भी प्रवेश करते हैं—ऐसा ब्रह्माण्डीय प्रसंग कहा गया है।
Names of Regions and Mountains: Ramaṇaka, Hiraṇmaya, Airāvata, and the Turn to Vaikuṇṭha
ऋषि सच्ची रीति से वर्षों, पर्वतों और वहाँ रहने वालों के नाम व विवरण पूछते हैं। सूत जी लोक-विन्यास का वर्णन आरम्भ करते हैं—श्वेत पर्वत के दक्षिण और निषध के उत्तर में रमणक नामक वर्ष है, जहाँ मनुष्य कुलीन, गौरवर्ण, निरप्रतिद्वन्द्वी और अत्यन्त दीर्घायु होकर सुख से रहते हैं। फिर नील और निषध के बीच हिरण्मय वर्ष का नाम आता है, जहाँ हैरण्वती नदी बहती है और रत्न तथा सुवर्ण से बने भव्य प्रासाद शोभा पाते हैं। शृङ्गवत के परे ऐरावत वर्ष बताया गया है, जहाँ सूर्य का पथ दिखाई नहीं देता और जरा का स्पर्श नहीं होता; वहाँ के प्राणी कमल-प्रभा, सुगन्धित, संयमी हैं और अन्न के बिना ही स्थित रहते हैं। अन्त में वर्णन वैकुण्ठ की ओर मुड़ता है—वैकुण्ठ में हरि सुवर्ण, मनोवेग-सम रथ पर विराजमान हैं; वही कर्तृत्व-शक्ति, पंचभूत-तत्त्व और यज्ञ-तत्त्व (यज्ञ/अग्नि) के रूप में भी प्रतिष्ठित बताए गए हैं।
The Glory of Bhārata-varṣa: Enumerating Mountains, Rivers, and Regions
इस अध्याय में ऋषि सूत से पूछते हैं कि पुण्यदायी और मोक्ष-प्रद भारतवर्ष का माहात्म्य बताइए। सूत भारत को मित्र और वैवस्वत मनु का प्रिय देश कहकर उसकी पवित्रता का प्रतिपादन करते हैं तथा आदर्श राजाओं और वंश-स्मृति के माध्यम से इसकी महिमा स्थापित करते हैं। फिर वर्णन पवित्र-भूगोल की क्रमबद्ध सूची में प्रवेश करता है—सात प्रमुख पर्वत-श्रेणियों के नाम बताए जाते हैं। इसके बाद नदियों का विस्तृत वर्णन आता है, जहाँ नदियाँ देव-स्वरूप, पापहरिणी और तीर्थरूप पावन शक्तियों के रूप में गायी जाती हैं। अंत में जनपदों और जातियों का उल्लेख, आर्य–म्लेच्छ सीमाओं का संकेत सहित, किया जाता है। निष्कर्ष यह है कि इस विषय का संक्षिप्त ज्ञान भी साधक की क्षमता के अनुसार धर्म, अर्थ और काम—इन त्रिवर्गों में फल देने वाला है।
Yuga Order, Lifespan Measures, and Traits of Beings in Bhārata-varṣa
ऋषियों ने सूत से पूछा कि भारतवर्ष और हिमालय का विस्तार कैसा है तथा यहाँ प्राणियों की आयु, बल और शुभ-अशुभ अवस्थाएँ किस प्रकार होती हैं। सूत ने उत्तर देते हुए भारतवर्ष में युग-व्यवस्था का वर्णन किया—कृत, त्रेता, द्वापर और तिष्य (कलि) युग। उन्होंने आयु-मान बताया—कृत में 4000, त्रेता में 3000, द्वापर में 2000; और तिष्य में आयु अत्यन्त घटकर अस्थिर व दुःखमयी हो जाती है। कृतयुग में प्रजा बलवान, रूपवान; ऋषि तपोनिष्ठ और क्षत्रिय वीर होते हैं। त्रेता में चक्रवर्ती सम्राटों का प्रभुत्व रहता है; द्वापर में तेज तो होता है पर परस्पर-विनाश भी बढ़ता है; और कलियुग में क्रोध, लोभ, असत्य, ईर्ष्या, कपट और द्रोह जैसे दोष प्रबल हो जाते हैं। बीच में संक्षेप से गुणोत्तर, हैमवत और हरिवर्ष का उल्लेख भी द्वापर के मध्य-प्रसंग से जुड़कर आता है।
Description and Measurements of Śākadvīpa (with Oceans, Mountains, Varṣas, and Rivers)
इस अध्याय में सप्तद्वीप-वर्णन आगे बढ़ता है। पहले जम्बूद्वीप की चौड़ाई और जम्बू पर्वत का परिमाण बताया जाता है, फिर उसके दुगुने विस्तार वाले लवण-समुद्र का उल्लेख आता है। इसके बाद जम्बूद्वीप से दुगुने शाकद्वीप का परिचय दिया जाता है, जो क्षीर-समुद्र से घिरा हुआ कहा गया है। फिर शाकद्वीप की आन्तरिक रचना बताई जाती है—रत्नमय पर्वत, जिनमें मेरु आदि के साथ मलय, जलधार, रैवत, श्यामगिरि और दुर्गशैल का वर्णन है; इनके आधार पर वर्ष-विभाग और नाम-परम्परा/वंश-संकेत भी दिए जाते हैं। वहाँ के जन शिव-पूजक हैं, सिद्ध और चारण निवास करते हैं, चोरी का अभाव है और दण्ड-प्रधान राजसत्ता का भी उल्लेख नहीं मिलता। गङ्गा की धाराएँ तथा अनेक पवित्र नदियों के नाम कहे जाते हैं। अंत में ऋषि अधिक विस्तार से सुनने की प्रार्थना करते हैं, जिससे यह अध्याय आगे के विस्तृत वर्णन का द्वार बनता है।
Description of Continents, Oceans, Regions, and the Measure of the World
अध्याय के आरम्भ में सूत उत्तर-द्वीपों का संक्षिप्त प्रसंग सुनाते हैं, फिर भीतर के संवाद में पुलस्त्य द्वारा जगत् की भूगोल-रचना का वर्णन होता है। घृत, दधि-रस, सुरा और क्षीर के समुद्र; समुद्रों से घिरे पर्वत; तथा क्रमशः बढ़ते हुए द्वीपों का क्रमबद्ध निरूपण किया गया है। मनःशिला, कृष्ण, महाक्रौञ्च, गोमन्त आदि पवित्र स्थलों का उल्लेख है और नारायण/केशव को दिव्य रत्नों का अधिष्ठाता तथा रक्षक बताया गया है। सुनामा, सुदुर्धर्ष, हेमपर्वत, कुमुद, पुष्पवान, कुशेशय, हरिगिरि आदि पर्वतों के साथ औद्भिद से लेकर कापिल तक वर्ष-प्रदेशों की गणना की गई है तथा क्रौञ्च आदि पर्वतों से सम्बद्ध क्षेत्रों का विभाजन बताया गया है। कुछ लोकों में मृत्यु, रोग और अव्यवस्था का अभाव तथा आदर्श समाज-व्यवस्था का चित्रण है; ईश्वर को एकधर्म का धारक और लोकों का व्यक्तिगत पालक-राजा कहा गया है। अंत में विशाल विश्व-व्यवस्था-धारक पर्वत और दिशाओं के गजों का वर्णन आता है; इसे सुनने से समृद्धि, तेज की वृद्धि और पितरों की तृप्ति होती है—यह फलश्रुति पर्वणी-क्रिया से जोड़ी गई है।
Inquiry into Sacred Fords and the Merit of Earth-Circumambulation (Narada–Yudhishthira; Entry into the Dilipa–Vasistha Episode)
ऋषियों ने पृथ्वी का परिमाण और नदियों का विस्तार सुनकर संतोष प्रकट किया और सूत से निवेदन किया कि वे समस्त पावन तीर्थों का पूरा वर्णन तथा प्रत्येक तीर्थ के विशेष फल बताएं। सूत ने कहा कि यह प्रश्न अत्यन्त पुण्यदायक है और फिर एक प्राचीन संवाद का प्रसंग आरम्भ किया—वनवास के समय पाण्डवों के पास, धर्म में अडिग द्रौपदी के साथ, नारद का युधिष्ठिर से मिलन। नारद का यथोचित सत्कार हुआ। उन्होंने युधिष्ठिर को वर देने की बात कहकर प्रश्न करने को कहा। तब धर्मपुत्र ने पूछा—जो व्यक्ति तीर्थों में श्रद्धा रखकर सम्पूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करता है, उसे पूर्ण फल क्या प्राप्त होता है? नारद ने उत्तर देते हुए दृष्टान्त के रूप में दिलीप–वसिष्ठ की कथा का प्रवेश कराया—भागीरथी के गंगाद्वार पर दिलीप ने तर्पण और नियत कर्म किए; वसिष्ठ आए, राजा ने उनकी पूजा की, ऋषि प्रसन्न हुए—और आगे तीर्थ-फल का उपदेश देने की भूमिका बनी।
Description of the Fruits of Pilgrimage (Puṣkara Tīrtha Māhātmya)
इस अध्याय में विनय, इन्द्रिय-निग्रह और सत्य को ऐसे गुण बताया गया है जो ऋषि को प्रसन्न करते हैं और जिनसे दिव्य/पितृ-सम्बन्धी दर्शन की योग्यता भी प्राप्त होती है। फिर पृथ्वी-परिक्रमा के फल तथा व्यापक रूप से तीर्थ-धर्म के तत्त्व के विषय में प्रश्न उठता है। उपदेश का निष्कर्ष यह है कि तीर्थयात्रा का ‘सच्चा फल’ केवल संयमी जनों को मिलता है—जो शरीर और मन को वश में रखते हैं, छल और अहंकार से रहित, संतुष्ट, शुद्ध, सत्यनिष्ठ और समदर्शी होकर भक्ति से युक्त रहते हैं। इसके बाद महँगे यज्ञों की तुलना की जाती है, जो निर्धनों के लिए प्रायः दुर्लभ हैं; और कहा जाता है कि तीर्थयात्रा यज्ञ के समान, बल्कि उससे भी श्रेष्ठ पुण्यदायिनी है। पुष्कर को सर्वश्रेष्ठ तीर्थ घोषित किया गया है—उसका स्मरण मात्र पापों को हरता है; वहाँ ब्रह्मा का निवास कहा गया है; देव-पितृ-पूजन, स्नान और एक ब्राह्मण को भोजन कराने से भी अश्वमेध तथा दीर्घकालीन अग्निहोत्र के तुल्य महान् पुण्य प्राप्त होता है।
Pilgrimage Itinerary: Jambū-path and Associated Tīrthas (Merit of Aśvamedha/Agniṣṭoma)
इस अध्याय में स्वर्गखण्ड के अंतर्गत तीर्थ-यात्रा का मार्गदर्शन दिया गया है। वसिष्ठ मुनि राजा से कहते हैं कि शुभ प्रदक्षिणा करके पितृ, देव और ऋषियों से पूजित जम्बू-पथ में प्रवेश करें। आगे क्रम से दुलिका का आश्रम, अगस्त्याश्रम, कन्याश्रम व धर्मारण्य, ययातिपतन, महाकाल, कोटितीर्थ, उमापति का पवित्र स्थान तथा भद्रवट/ईशान-क्षेत्र का वर्णन आता है। यात्रा में संयमित आहार, एकाकी प्रवेश, पितृ-देव पूजन और अल्प उपवास का विधान है; नर्मदा में तर्पण से विशेष पुण्य बताया गया है। इन तीर्थों के सेवन से अश्वमेध और अग्निष्टोम यज्ञ के तुल्य फल, समृद्धि, स्वर्ग में सम्मान तथा शिव-कृपा से गणपति-तुल्य पद की प्राप्ति कही गई है।
Narmadā Māhātmya with the Praise of Amarakantaka Tīrthas
इस अध्याय में वसिष्ठ द्वारा नर्मदा को पाप-नाशिनी तीर्थरूपा कहकर की गई स्तुति का स्मरण कराते हुए यह जिज्ञासा उठती है कि वह सर्वत्र क्यों प्रसिद्ध है। नारद नर्मदा को नदियों में श्रेष्ठ बताते हैं—वह समस्त प्राणियों का उद्धार करती है और पापों का नाश करती है। अन्य नदियाँ कुछ विशेष स्थानों में ही पवित्र मानी जाती हैं या समय के बाद शुद्ध करती हैं, पर नर्मदा सर्वत्र पवित्र है और केवल दर्शन से ही शुद्धि देती है—यह तुलनात्मक नदी-धर्म प्रतिपादित होता है। फिर पश्चिम कलिंग-प्रदेश में स्थित अमरकंटक को त्रैलोक्य-पावन पर्वत कहा गया है, जहाँ ऋषि सिद्धि प्राप्त करते हैं। वहाँ स्नान, एक रात्रि का उपवास, ब्रह्मचर्य, संयम, अहिंसा तथा जनेश्वर और रुद्रकोटि आदि स्थलों पर श्राद्ध-पिण्डदान करने से पितरों को अद्भुत तृप्ति मिलती है और स्वर्गीय फल प्राप्त होते हैं; अंततः रुद्रलोक की प्राप्ति और शुभ पुनर्जन्म का फल बताया गया है।
Origin of Jaleśvara Tīrtha and the Devas’ Appeal to Śiva against Bāṇa/Tripura (Nārada’s Mission)
इस अध्याय में नर्मदा को समस्त पवित्र नदियों में श्रेष्ठ बताकर उसके तट के अनेक तीर्थों का संकेत दिया गया है और फिर प्रसिद्ध जलेश्वर-तीर्थ की उत्पत्ति-कथा का प्रसंग उठाया जाता है। प्राचीन काल में ऋषि, इन्द्र और मरुद्गण, दानव बाण तथा उसकी चलायमान दिव्य नगरी त्रिपुरा के भय से व्याकुल होकर शिव की स्तुति करते हुए शरण माँगते हैं। नर्मदा-तट पर महेश्वर उन्हें आश्वासन देते हैं और त्रिपुरा-वध का उपाय सोचते हुए नारद को बुलाकर शीघ्र त्रिपुरा जाने की आज्ञा देते हैं। नारद रत्नमयी नगरी में प्रवेश करते हैं; बाण उनका सत्कार करता है। नारद गृहजनों को, विशेषकर अनौपम्या को, तिलधेनु-दान, शुभ तिथियों व संक्रान्ति-संधियों में स्त्रियों के व्रत-उपवास आदि पुण्यकर्मों का उपदेश देते हैं। वे व्यक्तिगत उपहार स्वीकार नहीं करते, दीन ब्राह्मणों को दान करने की प्रेरणा देकर लौट जाते हैं; उनके प्रस्थान से त्रिपुरा में एक सूक्ष्म ‘भेद’ उत्पन्न हो जाता है।
The Burning of Tripura and the Sacred Greatness of Amarakāṇṭaka (Jvāleśvara on the Narmadā)
नर्मदा-तट के हरेश्वर में रुद्र त्रिपुर-विनाश की तैयारी करते हैं। देवताओं और वैदिक तत्त्वों से बना दिव्य रथ तथा आयुध-व्यवस्था सजती है; फिर त्रिपुर बाण से विद्ध होकर प्रलय-सी अग्नि में फूट पड़ता है। दिशाएँ जल उठती हैं, अपशकुन होते हैं; पीड़ित जन, विशेषकर स्त्रियाँ, अग्नि को दोष देती हैं। वैश्वानर/अग्नि उत्तर देता है कि वह ईश्वर की आज्ञा से ही कार्य करता है, अपनी इच्छा से नहीं। विनाश के बीच दानव बाण शिव की अद्वितीय सर्वोच्चता पहचानता है। वह सिर पर लिङ्ग धारण कर तोटक-छन्द में स्तुति करता और शरण माँगता है; प्रसन्न शंकर उसे अभय, रक्षा और अवध्यता का वर देते हैं। इसके बाद कथा ब्रह्माण्डीय घटना को तीर्थ-भूगोल में रूपान्तरित करती है—त्रिपुर-पतन से जुड़े अंश/प्राकट्य श्रीशैल और अमरकण्टक में शैव-स्थानों के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं। नर्मदा पर अमरकण्टक में यह ज्वलित स्मृति ‘ज्वालेश्वर’ कहलाती है। ग्रहण-स्नान और अमरकण्टक-यात्रा से महान पुण्य तथा रुद्रलोक-प्राप्ति बताई गई है।
Māhātmya of the Kāverī–Narmadā Confluence (Patreśvara Tīrtha): Sin-Removal and Merit
इस अध्याय में कावेरी–नर्मदा के संगम को जगत्-विख्यात पापहर तीर्थ कहा गया है। युधिष्ठिर-प्रमुख ऋषियों ने ‘इस संगम का सत्य वृत्तान्त क्या है और पापी भी कैसे मुक्त होते हैं’—ऐसा पूछने पर पुलस्त्य मुनि भीष्म से इसका वर्णन करते हैं। कथा में कुबेर इस तीर्थ पर सौ दिव्य वर्षों तक तप करते हैं। प्रसन्न होकर महादेव शिव उन्हें वर देते हैं कि वे यक्षों के आद्य संस्थापक और अधिपति होंगे; फिर कुबेर का अपने कुल में अभिषेक होता है। इसके आधार पर तीर्थ-फल बताया गया है—यहाँ स्नान करके शिव-पूजन करने से अश्वमेध-यज्ञ के समान पुण्य मिलता है और रुद्रलोक की प्राप्ति होती है; दीर्घ स्वर्ग-सुख के बाद पुण्य क्षीण होने पर धर्मपरायण राजा के रूप में पुनर्जन्म होता है। इस जल का पान करने से चान्द्रायण-व्रत के तुल्य पुण्य मिलता है; यह स्थान ‘पत्रेश्वर’ नाम से पाप-नाश में सर्वोत्तम कहा गया है।
Narmadā Tīrtha-Māhātmya: Patreśvara and the Sequence of Sacred Fords
इस अध्याय में नारद तथा पुराणवक्ता राजा (युधिष्ठिर सहित) को नर्मदा के उत्तर तट की तीर्थ-यात्रा का क्रम बताते हैं। आरम्भ पत्रेश्वर से होता है, जो एक योजन-परिमाण का तीर्थ कहा गया है और सर्वपापहर माना गया है। आगे-आगे के तीर्थों में स्नान करने से क्रमशः देवताओं के साथ आनंद, इच्छित रूप की प्राप्ति, दीर्घ दिव्य भोग, ब्रह्मलोक में सम्मान, रुद्रलोक का प्रवेश, गोलोक की प्राप्ति और यहाँ तक कि अपराजेयता जैसे फल बताए गए हैं। इन्द्रजित, मेघराव/मेघनाद, ब्रह्मावर्त, अङ्गारेश्वर, कपिला-तीर्थ, काञ्ची-तीर्थ, कुण्डलेश्वर, पिप्पलेश्वर और विमलेश्वर/देवशिखा आदि अनेक तीर्थों व शिवलिङ्ग-स्थानों का नाम लेकर वर्णन किया गया है। अंत में नर्मदा को रुद्र-सम्भवा और नदियों में श्रेष्ठ बताकर उसकी महिमा गाई गई है; स्तोत्र-खंड में नित्य पाठ से वर्णानुसार लाभ, तथा नर्मदा-स्मरण को निरन्तर पोषण और पवित्रता का स्रोत कहा गया है, जो ब्रह्महत्या जैसे महापाप से भी शुद्धि देता है।
Tīrtha-Māhātmya Sequence: Sacred Fords, Baths, Gifts, and Śrāddha (Narmadā-Belt Itinerary)
इस अध्याय में (स्वर्गखण्ड) नर्मदा-तट के तीर्थों की क्रमबद्ध यात्रा का वर्णन है। पुलस्त्य मुनि राजा/भीष्म से कहते हैं कि एक-एक तीर्थ पर जाकर विधिपूर्वक स्नान, उपवास, दान (स्वर्ण, गौदान, वृषोत्सर्ग) तथा पितृकर्म—पिण्डदान और श्राद्ध—करना चाहिए। स्कन्द-तीर्थ, आङ्गिरस, लाङ्गल, वटेेश्वर, सङ्गमेश्वर, भद्रतीर्थ, अङ्गारेेश्वर, अयोनिसङ्गम, पाण्डवेश्वरक, कम्बोटिकेश्वर, चन्द्रभागा, शक्र-तीर्थ, ब्रह्मावर्त, कपिला-तीर्थ, नर्मदेश्वर, मासेश्वर, नागेश्वर, कालेेश्वर, अहल्या-तीर्थ, सोम-तीर्थ, स्तम्भ-तीर्थ, योधनिपुर (विष्णु-तीर्थ), अमोहक और सिद्धेश्वर/कुसुमेश्वर—इन सबके लिए विशेष विधियाँ और फल बताए गए हैं। इन तीर्थ-सेवाओं से जन्म-जन्म के पाप नष्ट होते हैं, अक्षय पुण्य मिलता है, रुद्र/सोम/सूर्य लोकों में सम्मान प्राप्त होता है, समृद्धि और राज्य-ऐश्वर्य बढ़ता है तथा अभेद्यत्व का वर मिलता है। सिद्धेश्वर की प्रातः-पूजा से मुक्तिदायक फल भी कहा गया है।
The Greatness of Śukla Tīrtha: Bathing, Fasting, Charity, and Śiva Worship
इस अध्याय में पहले साधक को महान पुण्यदायक तीर्थों की ओर प्रेरित किया जाता है, फिर शुक्ल-तीर्थ की उत्पत्ति और उसकी सर्वोच्च महिमा बताई जाती है। हिमालय के दिव्य प्रदेश में उमा सहित महादेव गणों से घिरे विराजमान हैं; वहाँ एक याचक (या मार्कण्डेय) संसार से सरल पार होने का उपाय और पाप-नाशक सर्वोत्तम तीर्थ पूछता है। शिव शुक्ल-तीर्थ की प्रशंसा करते हैं—यहाँ स्नान करने से ब्रह्महत्या जैसे घोर पाप भी नष्ट होते हैं। ग्रहण-काल और पर्व-संधियों में इसका पुण्य विशेष रूप से बढ़ जाता है, और इसकी परिक्रमा एक योजन तक मानी गई है। व्रत-विधान में दिन-रात उपवास, रात्रि-जागरण गीत-नृत्य सहित, प्रातः स्नान, घृत से अभिषेक सहित शिव-पूजन, गुरु को भोजन कराना तथा सत्य-धर्म से दान करना बताया गया है। इससे अक्षय फल, दिव्य भोग, और अंत में पुनर्जन्म से मुक्ति तथा शिवलोक में सम्मान प्राप्त होता है।
Pilgrimage Sequence on Sacred Fords (Narmadā Region): Bhṛgu-tīrtha, Śiva-vratas, and Merit Amplification
इस अध्याय में पुलस्त्य ऋषि भीष्म से नर्मदा-तट के तीर्थों की यात्रा-परंपरा बताते हैं। नरक, गो-तीर्थ, कपिला, गणेश्वर, भृगु-तीर्थ, गौतमीश्वर, एरण्डी, कनखल, ईश-तीर्थ, वराह-तीर्थ, सोम-तीर्थ, रुद्रकन्या, देवतीर्थ और शिखितीर्थ आदि में स्नान, जप-पूजन तथा नियत तिथियों—ज्येष्ठ चतुर्दशी, अङ्गारक-योग, श्रावण कृष्ण-चतुर्दशी, भाद्रपद अमावस्या, द्वादशी और पूर्णिमा—पर व्रत करने का विधान कहा गया है। कपिला-गाय का दान, ब्राह्मण-भोजन, तर्पण और ग्रहण-काल का दान पुण्य को अनेक गुना बढ़ाने वाले माने गए हैं। बीच में भृगु, शिव और पार्वती का प्रसंग आता है, जहाँ भृगु द्वारा गाया गया “करुणाभ्युदय” स्तोत्र सुनकर महादेव प्रसन्न होते हैं। शिव भृगु को वर देते हैं और रुद्र-वेदी प्रदान कर भृगु-तीर्थ की प्रतिष्ठा करते हैं, जिसे पाप-नाशक कहा गया है; वहाँ देहांत भी कल्याणकारी माना गया है। अध्याय बार-बार बताता है कि यहाँ के कर्म अश्वमेध के तुल्य फल देते हैं और साधक को रुद्र-लोक या विष्णु-लोक की पुनरावृत्ति-रहित प्राप्ति होती है।
Narmadā Pilgrimage Itinerary: Sequence of Tīrthas, Rites, and Fruits
इस अध्याय में नारद, राजेन्द्र से पुलस्त्य के वचनानुसार नर्मदा-तट की तीर्थयात्रा का क्रम सुनाते हैं। नर्मदा-मण्डल के अनेक तीर्थों का क्रमशः वर्णन है और वहाँ स्नान, उपवास, दीपदान, पितरों के लिए पिण्ड-तर्पण तथा वृषभदान आदि दानों की विधियाँ बताई गई हैं। प्रत्येक तीर्थ के साथ निश्चित फल जोड़े गए हैं—पापों का क्षय, ब्रह्महत्या आदि महादोषों का नाश, पुत्र-पशु-धन की प्राप्ति, इच्छापूर्ति, नरक-भय से मुक्ति और पुनर्जन्म से निवृत्ति। साथ ही पितृलोक, रुद्रलोक, ब्रह्मलोक की प्राप्ति, इन्द्रतुल्य राज्य-ऐश्वर्य या गणेश्वर-पद की सिद्धि का भी प्रतिपादन है। अंत में विमलेश्वर/सागरेश्वर आदि के प्रसंगों की श्रेष्ठता कही गई है और यह भी कि इस माहात्म्य का श्रवण-पाठ सभी वर्णों के लिए, यहाँ तक कि मंदबुद्धि के लिए भी, अत्यन्त शुभफलदायक है।
Narmadā (Revā) Tīrtha Greatness: The Gandharva Maidens’ Curse Narrative (Acchodā Episode Begins)
अध्याय 22 में सबसे पहले रेवा/नर्मदा की महिमा कही गई है। बताया गया है कि उसके नाम का स्मरण और जल की एक-एक बूँद भी मलिनता को जलाकर पापों का नाश करती है और मोक्ष प्रदान करती है; इसलिए वह परम तीर्थ मानी गई है। राजा के प्रश्न से कथा आगे बढ़ती है। अच्छोदा सरोवर पर गौरी-पूजा में रत पाँच दिव्य कन्याएँ—प्रमोहीनी, सुशीला, सुस्वरा, सुतारा और चन्द्रिका—यौवन, कला और सौंदर्य से युक्त वर्णित हैं। वहीं एक रूपवान ब्रह्मचारी आता है; उसे देखकर वे कामवश उसे अपना बनाने का आग्रह करती हैं, पर वह आश्रम-धर्म और विवाह-क्रिया के उचित समय-नियम का प्रतिपादन कर उन्हें रोकता है। विवाद बढ़ने पर परस्पर शाप होता है—ब्रह्मचारी उन्हें पिशाची होने का शाप देता है और वे भी उसे वैसा ही शाप देती हैं। फलतः सब भयावह अवस्था को प्राप्त होते हैं। यह प्रसंग दिखाता है कि पवित्र स्थान में भी अधर्मजन्य आवेग का परिणाम कठोर होता है और कर्म का विपाक अवश्य प्रकट होता है; यहीं से अच्छोदा-प्रकरण का आरम्भ होता है।
The Greatness of the Revā (Narmadā): Release from the Piśāca Curse
लोमश मुनि के आने पर भूख से पीड़ित पिशाच उनके पास पहुँचते हैं, पर उनके तेज को सह न सककर दूर से ही दण्डवत् प्रणाम करके शरण माँगते हैं। उनमें से एक याचक सत्संग की महिमा बताता है कि साधुओं का संग प्रसिद्ध तीर्थ-स्नान से भी बढ़कर पुण्यदायक है। वे अपना परिचय देते हैं—हम गन्धर्व कन्याएँ और एक ब्राह्मण-पुत्र हैं, जो परस्पर शाप से पिशाच-योनि में पड़े हैं। करुणामय लोमश उन्हें धर्म के द्वारा स्मृति-प्रत्यावर्तन और शाप-नाश का उपाय बताते हैं और एकमात्र प्रायश्चित्त निर्धारित करते हैं—रेवा (नर्मदा) में विधिपूर्वक स्नान। अध्याय में रेवाजी की पाप-नाशिनी और मोक्षदायिनी शक्ति का विस्तार से वर्णन है, अन्य नदियों के फलों की तुलना तथा प्रमुख नदियों की सूची भी आती है। रेवाजल की एक बूँद से ही वे शुद्ध होकर दिव्य रूप पाते हैं, नर्मदा की स्तुति करते हैं, विवाह व पूजन करके विष्णुलोक को प्राप्त होते हैं। इस कथा का श्रवण भी पाप-नाशक कहा गया है।
Pilgrimage Itinerary and Merits: Sindhu–Sarasvatī–Ocean Confluences and Named Tīrthas
इस अध्याय में युधिष्ठिर के प्रश्न पर नारद तथा अंतर्निहित ऋषि-वाणी (पुलस्त्य आदि) के माध्यम से वसिष्ठ द्वारा कथित तीर्थ-माहात्म्य की यात्रा-क्रमावली आगे बढ़ती है। तीर्थयात्री के लिए ब्रह्मचर्य, इन्द्रिय-निग्रह, संयमित आहार और नियमपालन को अनिवार्य बताया गया है। दक्षिण सिन्धु-प्रदेश में क्रमशः चर्मण्वती, अर्बुद, वसिष्ठ-आश्रम, पिङ्गा-तीर्थ, प्रभास, सरस्वती–सागर-संगम, वरदान, द्वारावती, पिण्डारक, तिमी/तिमिरात्र, वसुधारा, सिन्धुतम, ब्रह्मतुंग, रेणुका-तीर्थ, पञ्चनद, भीमा, गिरिकुञ्ज और विमला आदि नामित तीर्थों का वर्णन है। प्रत्येक स्थान पर स्नान, पूजा, प्रदक्षिणा और पितृ-तर्पण के फल बताए गए हैं—महायज्ञों के तुल्य पुण्य, विशाल गो-दान के समान फल, पापों का नाश, स्वर्ग में सम्मान, और अंततः जन्म-मरण से मुक्ति तक की प्राप्ति।
Merits of Vitastā, Devikā, Rudrakoṭī and Sarasvatī Sacred Fords
अध्याय 25 में कश्मीर-प्रदेश की वितस्ता नदी से आरम्भ कर अनेक तीर्थों की यात्रा-परम्परा बताई गई है, जहाँ श्रौत यज्ञों का महत्त्व सरल तीर्थ-सेवा में रूपान्तरित हो जाता है। वितस्ता में स्नान और पितरों का तर्पण वाजपेय यज्ञ के समान फलदायक कहा गया है। आगे मलदा तीर्थ में सायंकाल संध्या-स्नान, तथा सात ज्वालाओं वाले अग्नि में चरु-होम का विधान है; इसे विशाल गोदान और बड़े-बड़े यज्ञों से भी श्रेष्ठ फल देने वाला बताया गया है। फिर रुद्र के धाम में प्रवेश से अश्वमेध का फल प्राप्त होता है। देविका तीर्थ को जगत्-प्रसिद्ध शिव-स्थान कहा गया है और उसे ब्राह्मण-उत्पत्ति से भी जोड़ा गया है। कामाख्या आदि नामित स्थलों के दर्शन से सिद्धि तथा मृत्यु-भय से निर्भयता का वरदान बताया गया है। इसके बाद ‘दीर्घसत्र’ नामक दिव्य याग-सत्र का वर्णन है, जिसका पुण्य केवल यात्रा आरम्भ करने से भी बढ़ता है। सरस्वती के गुप्त होकर पुनः प्रकट होने की धारा को चमसोद्भेद, शिवोद्भेद, नागोद्भेद, शशयान/पुष्करा आदि तीर्थों से जोड़ा गया है; कार्तिक-स्नान, रुद्रकोटी का मुनि-प्रसंग, और अंत में चैत्र की शुभ तिथि पर संगम में जनार्दन-पूजन के साथ अध्याय पूर्ण होता है।
Kurukṣetra and Sarasvatī Tīrthas: Pilgrimage Itinerary and the Sanctification of Rāma-hrada (Paraśurāma’s Lakes)
इस अध्याय में कुरुक्षेत्र और सरस्वती-तीर्थ-परम्परा का क्रमबद्ध यात्रा-विधान बताया गया है। श्रद्धा, संयमित आहार, अवसरानुसार ब्रह्मचर्य और विधिपूर्वक स्नान—इन नियमों से तीर्थयात्रा महायज्ञों के तुल्य फल देती है और सहस्र-गोदान आदि महान दानों के समान पुण्य प्रदान करती है। अनेक तीर्थों (कुछ ‘द्वारपाल’ तीर्थों सहित) का वर्णन कर प्रत्येक के विशेष फल और प्राप्ति-लोक—ब्रह्मलोक, सूर्यलोक, नागलोक, विष्णुलोक आदि—निर्दिष्ट किए गए हैं। मध्य में रामा-ह्रद पर परशुराम (भृगुराम) की कथा जुड़ती है। उनके पितृ उनकी पितृभक्ति की प्रशंसा करते हैं, तपस्या द्वारा प्रायश्चित्त का उपाय बताते हैं और वर देते हैं कि उनके सरोवर जगत्-प्रसिद्ध तीर्थ बनें। वहाँ स्नान और पितृ-तर्पण से दुर्लभ वर, पाप-शुद्धि और कल्याण की सिद्धि होती है—इस प्रकार भूगोल, पितृकर्म और मोक्ष-भावना एक ही भक्तिमय मानचित्र में बंध जाती है।
Tīrtha-Māhātmya of the Sarasvatī Region and the Praise of Kurukṣetra (Pilgrimage Merits)
इस अध्याय में सरस्वती-प्रदेश के तीर्थों और कुरुक्षेत्र की महिमा का क्रमबद्ध यात्रा-वर्णन है। आरम्भ कन्या-तीर्थ तथा ब्रह्मयोनि/ब्रह्मा के धाम से होता है; फिर सोम-तीर्थ और सप्तसारस्वत में मङ्कणक ऋषि की कथा आती है—उनका आनन्दोन्मत्त नृत्य, शिव का हस्तक्षेप, और स्नान के बाद की पूजा की विशेष प्रशंसा। इसके बाद औशनस, कपालमोचन, अग्नि-तीर्थ, विश्वामित्र-तीर्थ, पृथूदक, मधुस्रव, सरस्वती–अरुणा-संगम, शतसहस्रक/साहस्रक, रेणुका-तीर्थ, पंचवट, कुरु-तीर्थ, अस्थिपुर, स्थाणुवट, बदरी, दधीचि, कन्याश्रम, संनिहिती, गङ्गा-ह्रद आदि अनेक प्रमुख तीर्थों का उल्लेख है। स्नान, उपवास, श्राद्ध और देव-पूजा को बार-बार श्रौत यज्ञों के समान फलदायक बताया गया है और अंत में कुरुक्षेत्र की सीमाएँ तथा उसकी परम पवित्रता का विस्तृत स्तवन किया गया है।
Tīrtha-Māhātmya: Dharmatīrtha, Plakṣādevī Sarasvatī, Śākambharī, and Suvarṇa (Kṛṣṇa–Rudra Episode)
यह अध्याय तीर्थ-माहात्म्य के रूप में एक यात्रा-क्रम प्रस्तुत करता है। आरम्भ धर्मतीर्थ से होता है, जो धर्म के तप से प्रतिष्ठित माना गया है; वहाँ स्नान-सेवन से धर्मवृद्धि, मन की स्थिरता और कुल-शुद्धि का फल बताया गया है। आगे कलाप और सौगंधिक वनों का वर्णन है, जहाँ केवल प्रवेश करने से भी पाप नष्ट होते हैं और दिव्य जनों का सान्निध्य मिलता है। इसके बाद सरस्वती को ‘प्लक्षादेवी’ कहकर स्तुति की गई है—वल्मीकों से प्रकट जल तथा ईशानाध्युषित वल्मीकी-तीर्थ/घाट में स्नान-दान का पुण्य अश्वमेध और महान दानों के तुल्य, बल्कि बहुगुणित कहा गया है। फिर सुगंधा, शतकुंभा, पंचयज्ञ, त्रिशूलपात्र आदि तीर्थों का क्रम आता है, जहाँ गणपति के पार्षदों का सान्निध्य और पुण्यवृद्धि बताई गई है। अन्त में राजगृह में देवी शाकम्भरी का माहात्म्य है—तीन रात्रियों का संयमित निवास और शाक-आहार आधारित व्रत का विधान। सुवर्ण तीर्थ में कृष्ण द्वारा रुद्र की आराधना कर वर प्राप्त करने का प्रसंग शैव कृपा के महान फल से जोड़ा गया है; धूमावती और नरथावर्त में प्रदक्षिणा तथा महादेव के अनुग्रह के साथ अध्याय का उपसंहार होता है।
The Greatness of the Kāliṇdī (Yamunā): Merit of Bathing, Charity, and Faith
इस अध्याय में कालीन्दी (यमुना) के तीर्थ-माहात्म्य का वर्णन है। नारद राजा को तीर्थयात्रा और यमुना-तट पर स्नान के लिए प्रेरित करते हैं, और बताते हैं कि वहाँ स्नान करने से दुष्ट भाग्य, पाप और भय से रक्षा होती है तथा आयु, आरोग्य और समृद्धि बढ़ती है। आगे कहा गया है कि यमुना-स्नान का फल पुष्कर, कुरुक्षेत्र और अविमुक्त जैसे प्रसिद्ध तीर्थों के समान या उनसे भी बढ़कर है। श्रद्धा के साथ किए गए कर्म पूर्ण फल देते हैं, जबकि श्रद्धा के बिना किए गए अनुष्ठान अन्यत्र भी केवल आधा फल देते हैं—यह बात अनेक उपमाओं से स्पष्ट की गई है; यमुना को कामधेनु और चिन्तामणि के समान पाप-नाशिनी, मनोवांछा-पूर्ति करने वाली और भक्ति जगाने वाली बताया गया है। मथुरा के साथ उसका संयोग विशेष रूप से मोक्षदायक कहा गया है। अंत में नीति-भाग में बताया जाता है कि कपट, क्रोध, प्रमाद, वाणी की अशुद्धि और अश्रद्धा से धर्म, तप, विद्या, दान, मंत्र और व्रत नष्ट हो जाते हैं; इसलिए समस्त साधना की कुंजी ‘श्रद्धा’ है।
The Legend of Hemakuṇḍala: Charity, Decline of the Sons, and Yama’s Judgment
नारद जी राजा से कृतयुग की एक प्राचीन कथा कहते हैं। निषध देश में वैश्य हेमकुण्डल व्यापार और खेती से अपार धन कमाता है; पर वृद्धावस्था में वह उसी धन को धर्म में लगाता है—विष्णु और शिव के मंदिर बनवाता है, तालाब‑बावड़ियाँ खुदवाता है, उपवन लगवाता है, प्रतिदिन लोगों को भोजन कराता है, यात्रियों का सहारा बनता है और अतिथियों का सत्कार तथा प्रायश्चित्त आदि करता है। अंत में वह वन में जाकर गोविंद की उपासना करता है और वैष्णव लोक को प्राप्त होता है। उसके पुत्र श्रीकुण्डल और विकुण्डल अहंकार व अधर्म में पड़कर संपत्ति को विषय‑भोग में नष्ट कर देते हैं; दरिद्र होकर चोरी करते हैं, देश से निकाले जाते हैं और शिकारी बनते हैं। हिंसक मृत्यु के बाद यमदूत उन्हें यमलोक ले जाते हैं; चित्रगुप्त के लेखे के अनुसार यम एक को रौरव नरक भेजते हैं और दूसरे को स्वर्ग प्रदान करते हैं।
Karma, Non-Violence, Tīrtha & Gaṅgā Merit, Vaiṣṇava Protection, Śālagrāma Worship, and Ekādaśī as Deliverance
वैकुण्डल नामक वैश्य स्वर्ग में पहुँचकर देखता है कि उसका बड़ा भाई नरक में पीड़ित है। वह आश्चर्य से देवदूत से कारण पूछता है। देवदूत बताता है कि प्रत्येक जीव अपने-अपने कर्मों का फल भोगता है; ब्राह्मण से मैत्री और माघ मास में यमुना-तीर्थ पर स्नान जैसे पुण्यकर्मों से वैकुण्डल को स्वर्ग-प्राप्ति हुई। इसके बाद अध्याय में धर्म का विस्तृत निरूपण है—अहिंसा परम धर्म है; हिंसा करने वालों को यम-यातनाएँ और नीच योनियों में जन्म मिलता है। दान, सत्य, संयम, शुद्ध आचरण, तीर्थ-सेवा की मर्यादा, तथा गंगा की अनुपम पावनता का वर्णन है; प्राणायाम और मंत्र-जप को भी शुद्धिकारक कहा गया है। काम-नीति, माता-पिता और गुरु का सम्मान भी बताया गया है। वैष्णवों को यम का भय नहीं होता—यह विशेष रूप से कहा गया है। शालग्राम-पूजा और एकादशी-व्रत को उद्धारक बताया गया है। अंत में वैकुण्डल अपने पूर्वजन्म में संन्यासियों के आतिथ्य से अर्जित पुण्य भाई को अर्पित करता है; भाई नरक से छूटकर दोनों स्वर्ग को जाते हैं। पाठ-श्रवण करने वालों के लिए भी महान पुण्यफल की प्रतिज्ञा की गई है।
Sequential Description of Pilgrimage Fords and Their Merits (Tīrtha-Itinerary)
अध्याय 32 में तीर्थों की क्रमबद्ध यात्रा का उपदेश है। नारद (और पुराण-शैली के उपदेशक वचन) राजा/भारत को संबोधित करके सुगन्ध तीर्थ, रुद्रावर्त, गंगा–सरस्वती संगम, कर्णह्रद (जहाँ शंकर-पूजा का विधान है), कुब्जाम्रक तथा अरुन्धती के वट का वर्णन करते हैं। वहाँ सामुद्रक स्नान और तीन रात्रि का उपवास पुण्यदायक कहा गया है, फिर ब्रह्मावर्त की ओर गमन बताया गया है। इसके बाद यमुना और उसके उद्गम, दर्वी-संक्रमण, तथा सिन्धु के उद्गम का उल्लेख है; सिन्धु-तीर्थ में पाँच रात्रि निवास और सुवर्ण-दान का विशेष फल कहा गया है। ऋषिकुल्या में वसिष्ठ और उशनस् का ‘पुण्य-प्रवाह’, भृगुतुङ्ग में एक मास तक शाकाहार-व्रत, वीरप्रमोक्ष में कार्त्तिक/माघ की महिमा, संध्या-तीर्थ और विद्या-तीर्थ से ज्ञान-प्राप्ति, महालय-संबंधी उपवास-विधियाँ, माहेश्वर-दर्शन से पीढ़ियों का कल्याण, तथा वेतसिका, सुन्दरिका, ब्राह्मणिका और नैमिष में प्रवेश मात्र से पाप-नाश—इन सबका संक्षिप्त किन्तु समग्र माहात्म्य कहा गया है।
The Greatness of Avimukta (Kāśī/Vārāṇasī) and the Doctrine of Liberation-in-One-Life
युधिष्ठिर नारद से वाराणसी (काशी) की महिमा का विस्तृत वर्णन माँगते हैं। नारद उत्तर देते हुए मेरु-शिखर पर हुए प्राचीन संवाद का स्मरण कराते हैं, जहाँ देवी पार्वती ने महादेव से पूछा कि कठिन योग और वैदिक साधनाओं के बिना शीघ्र भगवान का साक्षात्कार कैसे हो—कौन-सा गुप्त उपाय है। शिव बताते हैं कि अविमुक्त/वाराणसी उनका परम गुप्त क्षेत्र है, मानो परम ज्ञान ही; वहाँ निवास, पूजा और विशेषतः वहीं देहत्याग मोक्ष देता है। जीवन के अन्त में शिव स्वयं तारक ब्रह्म का उपदेश करते हैं, जिससे एक ही जन्म में मुक्ति का सिद्धान्त स्थापित होता है। अध्याय में काशी की तुलना अन्य प्रसिद्ध तीर्थों से कर उसे सर्वोपरि कहा गया है; घोर पापियों और प्राणियों तक के पाप-नाश की अद्भुत शक्ति बताई गई है। इसलिए मोक्ष चाहने वालों को अटल संकल्प के साथ मृत्यु तक काशी में रहने की प्रेरणा दी गई है।
The Glory of the Oṃkāra Pañcāyatana Liṅga and Kāśī’s Secret Five Liṅgas
अध्याय का आरम्भ नारद के वचन से होता है, जहाँ वे शुद्ध, दीप्तिमान ओंकार-लिंग की स्तुति करते हैं; उसके स्मरण मात्र से पाप नष्ट होते हैं। आगे स्वर्गखण्ड की वाणी काशी में पञ्चायतन/पाशुपत-ज्ञान की परम महिमा बताती है—यहाँ महादेव पाँच रूपों में विराजमान होकर जीव को मुक्ति प्रदान करते हैं। मत्स्योदरी तट पर ‘गोचर्म-पर्यन्त’ सीमित एक सूक्ष्म तीर्थ को परम ओंकारेश्वर कहा गया है। फिर शम्भु की कृपा से ही ज्ञात होने वाली पाँच गुप्त लिंगों की परिक्रमा का वर्णन आता है—कृत्तिवासेश्वर, मध्यमेश्वर, विश्वेश्वर, ओंकार और कन्दरपेश्वर। इसके बाद कृत्तिवासेश्वर की महत्ता दैत्य-गज प्रसंग से प्रकट होती है: नित्यपूजा करने वाले ब्राह्मणों की रक्षा हेतु शिव प्रकट होकर उस दैत्य का वध करते हैं और उसकी खाल धारण करने से ‘कृत्तिवास’ कहलाते हैं। अंत में वाराणसी के तपस्वियों और वैदिक ब्राह्मणों की प्रशंसा है—शतरुद्रीय का पाठ, अंतर्मुख ध्यान और शिव-निष्ठा। कृत्तिवास की शरण लेने वालों को शीघ्र मोक्ष मिलता है—यह निष्कर्ष दृढ़ता से कहा गया है।
Glorification of Vārāṇasī: Kapardīśvara Liṅga and the Piśācamocana Tīrtha
इस अध्याय में नारद राजा से काशी (वाराणसी) के परम पुण्यदायक कपर्दीश्वर-लिंग और उसके निकट स्थित पिशाचमोचन तीर्थ की महिमा कहते हैं। वहाँ स्नान और पितरों का तर्पण करने से पाप नष्ट होते हैं तथा भोग और मोक्ष—दोनों की प्राप्ति बताई गई है। उदाहरण में एक हिरणी, व्याघ्र-सदृश दैत्य से पीछा किए जाने पर, बार-बार कपर्दीश्वर की प्रदक्षिणा करती है; तब दिव्य प्राकट्य होता है, जिससे उस स्थान की तारक शक्ति प्रकट होती है। आगे शङ्कुकर्ण तपस्वी को एक भूखा पिशाच मिलता है, जो पहले प्रमादी ब्राह्मण था; कपर्दीश्वर का स्मरण करके पिशाचमोचन कुंड में स्नान करने से वह मुक्त होकर दिव्य तेज से स्वर्ग को जाता है। शङ्कुकर्ण रुद्र की उच्च तत्त्वमयी स्तुति करता है; तेजस्वी लिंग प्रकट होता है और वह उसमें लीन हो जाता है; अंत में श्रवण-पाठ का फल कहा गया है।
The Glory of Vārāṇasī: Madhyameśvara and the Mandākinī Rite
इस अध्याय में काशी/वाराणसी की महिमा मध्यमेश्वर (मध्यमेंश) लिंग के द्वारा गाई गई है। वहाँ महादेव देवी सहित रुद्रों के बीच निवास करते हैं। कथा में यह भी कहा गया है कि हृषीकेश/कृष्ण एक वर्ष तक वहीं भस्म-लेपन किए, रुद्र के उपदेश का अध्ययन करते हुए, ब्रह्मचारी शिष्यों के साथ पाशुपत व्रत का पालन करते रहे। तब शिव नीललोहित रूप में प्रकट होकर वर देते हैं—जो विधिपूर्वक गोविन्द की पूजा करते हैं, उन्हें सर्वव्यापी, सार्वभौम ज्ञान और अचल भक्ति प्राप्त होती है। आगे तीर्थ-फल बताया गया है: यहाँ स्नान और शिव-दर्शन तथा मन्दाकिनी में स्नान से कामनाएँ पूर्ण होती हैं, ब्रह्महत्या जैसे महापातक भी नष्ट होते हैं और परम धाम की प्राप्ति होती है। मध्यमेश्वर की उपासना से ज्ञान, दान, तप, श्राद्ध और पिण्ड-दान के फल मिलते हैं; यहाँ किए कर्म सात पीढ़ियों को पवित्र करते हैं, विशेषतः सूर्यग्रहण में आचमन सहित। पुण्य दस गुना बढ़ता है, और श्रद्धा से इस माहात्म्य का श्रवण परम पद देने वाला कहा गया है।
The Glory of Vārāṇasī (Catalogue of Tīrthas and a Liṅga-Installation Episode)
इस अध्याय में वाराणसी का तीर्थ-माहात्म्य श्रद्धापूर्वक कहा गया है। नारद युधिष्ठिर से अनेक तीर्थों का वर्णन आरम्भ करते हैं; फिर प्रयाग, विश्वरूप, गौरी-तीर्थ, कपालमोचन, मणिकर्णी आदि अनेक पवित्र स्थलों का नाम लेकर उनकी महिमा बताई जाती है। मध्य में लिंग-प्रतिष्ठा का प्रसंग आता है—ब्रह्मा प्राचीन लिंग की स्थापना करने आते हैं, पर विष्णु पहले ही उसे प्रतिष्ठित कर देते हैं। ब्रह्मा के पूछने पर विष्णु रुद्र के प्रति अपनी अटल भक्ति प्रकट करते हैं और कहते हैं कि यह लिंग रुद्र के नाम से प्रसिद्ध होगा। अंत में कहा गया है कि वाराणसी के तीर्थ असंख्य हैं; युगों-युगों तक भी उनका पूरा वर्णन संभव नहीं।
The Glory of Gayā and the Pilgrimage Circuit of Allied Tīrthas
इस अध्याय में नारद के प्रश्न पर पुलस्त्य गयाक्षेत्र की महिमा और वाराणसी से आगे विस्तृत तीर्थ-परिक्रमा का वर्णन करते हैं। गयाधाम का स्मरण और दर्शन मात्र अश्वमेध-यज्ञ के समान पुण्य देने वाला कहा गया है; विशेषतः अक्षयवट के समीप स्नान करके पितरों के लिए तर्पण-श्राद्ध करने से वंश का उद्धार और अक्षय फल प्राप्त होता है। इसके बाद अनेक सहायक तीर्थों की शृंखला बताई गई है—ब्रह्मसर/यूप, धेनुक, गृध्रवट, सावित्री-स्थान, योनिद्वार, फल्गु, धर्मपृष्ठ, ब्रह्मतीर्थ, राजगृह, मणिनाग, अहल्या-सरोवर, जनक-कूप, गण्डकी-शालग्राम, माहेश्वर-पद, तीर्थकोटि आदि। इन स्थानों पर स्नान, अभिषेक, भस्म-सहित स्नान, उपवास, तिल-धेनु दान तथा अन्य दानों से वाजपेय, राजसूय, अग्निष्टोम आदि यज्ञों के तुल्य फल और सोम, सूर्य, इन्द्र, विष्णु तथा महेश के लोकों की प्राप्ति बताई गई है।
Account of Various Sacred Tīrthas (Pilgrimage Merits and Prayāga Supremacy)
अध्याय 39 में अनेक तीर्थों—नदियों, संगमों, सरोवरों, वनों और पर्वतों—का क्रमशः वर्णन है। प्रत्येक तीर्थ के साथ त्रिरात्र-व्रत, स्नान, दान, जप आदि के विधान बताए गए हैं और उनके फल अश्वमेध, वाजपेय, अग्निष्टोम, राजसूय जैसे महायज्ञों तथा सहस्र-गोदान, वृषदान आदि दानों के तुल्य कहे गए हैं। इसके बाद प्रयाग का, विशेषतः गंगा–यमुना संगम का, परम माहात्म्य विस्तार से आता है। वहाँ नाम-स्मरण, दर्शन, नमस्कार, स्नान और दान से पुण्य अनेकगुणा होता है, पाप नष्ट होते हैं और पीढ़ियों तक का उद्धार बताया गया है। तुङ्गक वन का प्रसंग वेद-धर्म की पुनः प्रतिष्ठा का संकेत देता है। अंत में नारद और वसिष्ठ से जुड़ा एक संक्षिप्त प्रसंग राजयश (दिलীপ-परंपरा) को जोड़ता है। फलश्रुति में कहा है कि इस अध्याय का पाठ बुद्धि, संपत्ति, संतान, विजय और स्वर्गगति देता है; और यदि यात्रा संभव न हो तो मन से किया गया तीर्थ-सेवन भी मान्य और पुण्यदायक है।
Praise of Pilgrimage (Tīrtha) and Prelude to the Greatness of Prayāga
अध्याय पूर्ववर्ती तीर्थ-सूची का उपसंहार करते हुए कहता है कि सभी तीर्थ ‘विष्णु के शरीर’ हैं और एक ही तीर्थ का संग भी मुक्ति का कारण बन सकता है। कलियुग में तीर्थों का श्रवण और उनकी सेवा को पाप-नाश का प्रधान साधन बताया गया है; फिर भी समस्त तीर्थ-स्नान से भी बढ़कर ब्राह्मण-सेवा को श्रेष्ठ ठहराया गया है। ‘द्विज-पद’—ब्राह्मण के चरण/ब्राह्मण को पवित्र आश्रय मानकर—उसकी नित्य पूजा की संस्तुति की गई है। अश्वत्थ, तुलसी और गौ की प्रदक्षिणा से ‘सर्व-तीर्थ’ का फल मिलने की बात कही गई है। इसके बाद ऋषि प्रयाग का विस्तृत माहात्म्य पूछते हैं। सूत एक प्राचीन संवाद का आरम्भ करते हैं—भारत-युद्ध के बाद शोकग्रस्त युधिष्ठिर के पास मार्कण्डेय आते हैं। युधिष्ठिर प्रायश्चित्त और उच्च ज्ञान की याचना करते हैं; मार्कण्डेय उन्हें सांख्य, योग तथा विशेषतः प्रयाग की ओर प्रवृत्त करते हैं, और प्रयाग को पुण्यात्माओं के लिए सर्वोत्तम तीर्थ कहकर महिमा गाते हैं।
The Glory of Prayāga: Merit of Bathing, Remembrance, and Divine Protection
अध्याय के आरम्भ में युधिष्ठिर पूछते हैं कि प्राचीन काल में प्रयाग तक कैसे पहुँचा जाता था और वहाँ मरने, स्नान करने तथा निवास करने का क्या फल होता है। मार्कण्डेय उत्तर देते हैं कि उन्होंने यह उपदेश पहले ऋषियों के संवाद में सुना था। प्रयाग को प्रजापति का परम पवित्र क्षेत्र कहा गया है; उसके विस्तृत प्रदेश में नागों का निवास है और देवताओं की संयुक्त व्यवस्था से उसकी रक्षा होती है—ब्रह्मा और देवगण, इन्द्र, हरि, सूर्य तथा महेश्वर, विशेषतः वटवृक्ष के निकट। यहाँ उद्धार के क्रमिक साधन बताए गए हैं—प्रयाग का स्मरण, दर्शन, नामोच्चारण, वहाँ की मिट्टी प्राप्त करना, स्नान करना और जलपान करना—ये सब पापों का नाश करते हैं, मनोवांछित वर देते हैं और पीढ़ियों तक शुद्धि का फल पहुँचाते हैं। गंगा-यमुना के बीच स्नान का फल सत्य, अहिंसा और धर्मनिष्ठा से जुड़ा बताया गया है। जो साधक वहाँ नियमपूर्वक रहते हैं—जैसे एक ब्रह्मचारी का एक मास तक निवास—वे अभीष्ट सिद्धि और शुभ जन्म प्राप्त करते हैं।
The Greatness of Prayāga: Fruits of Pilgrimage, Remembrance, and Cow-Gift
इस अध्याय में प्रयाग का परम माहात्म्य बताया गया है। गंगा–यमुना के संगम पर पहुँचकर स्नान करने से पापों का नाश होता है; जो दुःख से पीड़ित होकर भी वहाँ निवास करने जाते हैं, उनका धर्मलाभ नष्ट नहीं होता—ऐसा कहा गया है। संगम पर देह त्यागने वालों के फल वर्णित हैं—दिव्य विमान की प्राप्ति, गंधर्वों और अप्सराओं के बीच सुखभोग, और पुण्य क्षीण होने पर समृद्ध कुलों में पुनर्जन्म। विशेष रूप से ‘स्मरण’ का महत्त्व बताया गया है: केवल प्रयाग का स्मरण भी तीर्थफल देता है, और मृत्यु के समय प्रयाग का स्मरण करने वाला ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है। इसके बाद दान-धर्म का प्रसंग आता है, विशेषतः संगम पर योग्य ब्राह्मण को गो-दान करने की विधि और उसका महान फल। गो-दान से स्वर्ग में महान सम्मान, नरक से रक्षा, और सभी दानों में गो-दान की श्रेष्ठता घोषित की गई है।
Glorification of Prayāga (The Gaṅgā–Yamunā Confluence)
यह अध्याय गंगा–यमुना के संगम पर स्थित प्रयाग को सर्वश्रेष्ठ तीर्थ बताकर उसका माहात्म्य गाता है। कहा गया है कि प्रयाग का नाम सुनने मात्र से या उसकी मिट्टी का स्पर्श करने से भी पाप नष्ट होते हैं। तीर्थयात्रा का धर्मसम्मत विधान बताया गया है—नियमपूर्वक स्नान, सामर्थ्य के अनुसार दान और शुद्ध भाव; लोभ या मोह से किया गया कर्म निष्फल माना गया है। यह भी वर्णित है कि देवता, ऋषि, पितर, नाग और स्वयं हरि प्रयाग में एकत्र होते हैं। अक्षयवट की जड़ का प्रसंग प्रलय-काल की स्मृति और रुद्र-लोक से संबंध को सूचित करता है। प्रतिष्टान, हंसप्रपातन, उर्वशी-तट, कोटितीर्थ और दशाश्वमेधिक आदि उपतीर्थों का नाम लेकर उनके दर्शन-स्नान से अश्वमेध/राजसूय के तुल्य पुण्य कहा गया है। अंत में हरिद्वार, प्रयाग और गंगासागर में गंगा की विशेष तारक शक्ति की प्रशंसा की गई है।
The Greatness of Prayāga (Merits of Māgha Rites and Northern River Fords)
इस अध्याय में प्रयाग-माहात्म्य का विस्तार करते हुए संगम-प्रदेश के अनेक तीर्थों और काल-नियत व्रतों का वर्णन है। उत्तर गंगा-तट पर स्थित ‘मानसा’ घाट का महत्त्व बताया गया है—वहाँ तीन रात्रि का उपवास अत्यन्त पुण्यदायक है, और उसका स्मरण मात्र भी उद्धारक कहा गया है। गंगा में देह त्यागने वालों की परलोक-गति का निरूपण किया गया है—दिव्य भोग, विमान-यात्रा, निश्चित अवधि तक स्वर्ग-वास; और पुण्य क्षीण होने पर समृद्ध कुलों में पुनर्जन्म, कभी राजत्व की प्राप्ति भी। माघ मास में संगम-यात्रा को महान गोदानों के तुल्य बताया गया है तथा माघ-व्रतों में पंचाग्नि तप को अनेक दिनों के स्नान-पुण्य के समान कहा गया है। फिर प्रयाग के दक्षिण में, यमुना के उत्तर तट पर ‘ऋणप्रमोचन’ तीर्थ का उल्लेख है, जहाँ एक रात्रि निवास से ऋण-बंधन कटता है और सूर्यलोक की प्राप्ति बताई गई है।
Glorification of the Yamunā (Yamuna Mahatmya) and Prayāga’s Step-by-Step Aśvamedha Merit
इस अध्याय में प्रयाग-माहात्म्य आगे बढ़ता है। प्रयाग के पाँच योजन के पवित्र परिक्रमा-क्षेत्र में तप और तीर्थयात्रा के “अक्षय फल” का निरूपण किया गया है—यहाँ प्रत्येक कदम पर अश्वमेध-यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है। मार्कण्डेय युधिष्ठिर से कहते हैं कि इन फलों की प्राप्ति का मुख्य साधन श्रद्धा है; श्रद्धा से रोग-नाश, पाप-क्षय तथा पितरों और संतति-परंपरा तक का उद्धार होता है। फिर यमुना-माहात्म्य का वर्णन आता है। यमुना की दिव्य उत्पत्ति को गंगा के स्रोत के समान बताया गया है; उसका नाम दूर से भी स्मरण करने पर पाप हर लेता है। यमुना-जल में स्नान, पान या उससे जुड़े तीर्थों में देह-त्याग करने से शुद्धि, कुल-उन्नति और स्वर्ग-गति मिलती है; अग्नि-तीर्थ, हरवर-तीर्थ तथा विरजा/आदित्य-तीर्थ आदि के विशेष फल बताए गए हैं। अंत में इस कथा के पाठ और श्रवण को तत्काल पाप-नाशक कहा गया है।
Prayāga’s Supremacy Among Tīrthas: Faith, Yoga, Charity, and the Ethics of Attainment
इस अध्याय में युधिष्ठिर ब्रह्मा के वचन का स्मरण करते हैं कि तीर्थ असंख्य हैं। फिर संवाद में यह प्रश्न उठता है कि जब प्रयाग प्रसिद्ध है तो कुरुक्षेत्र को श्रेष्ठ क्यों कहा जाता है, और केवल एक ही तीर्थ की प्रशंसा कैसे उचित है। मārkaṇḍेय बताते हैं कि सत्य को ग्रहण करने के लिए श्रद्धा अनिवार्य है; पाप से घायल मन प्रत्यक्ष सत्य पर भी विश्वास नहीं कर पाता। इसके बाद शास्त्र-प्रमाण से प्रयाग की महिमा कही जाती है—अनेक जन्मों में दुर्लभ योग की प्राप्ति, ब्राह्मणों को रत्न आदि बहुमूल्य दान का विशेष फल, और प्रयाग में देहत्याग से योग-ऐक्य की सिद्धि। ब्रह्म के सर्वव्यापक होने से सर्वत्र पूजा संभव है, फिर भी प्रयाग को ‘तीर्थराज’ कहकर सर्वोपरि बताया जाता है। नीति-उपदेश भी दिए जाते हैं—मुख्य पवित्रताओं की निंदा उन्नति रोक देती है; चोरी करके बाद में दान का आवरण रखने से शुद्धि नहीं होती; पापी नरकगामी होते हैं। अंत में सत्य और असत्य के फलों का वर्णन आगे करने की प्रतिज्ञा की जाती है।
The Greatness of Prayāga: Confluence Theology and the Totality of Tīrthas
इस अध्याय में प्रयाग का परम माहात्म्य कहा गया है। नैमिष, पुष्कर, गो-तीर्थ, सिन्धु-मुख, कुरुक्षेत्र, गया और गंगासागर जैसे प्रसिद्ध तीर्थों की तुलना में प्रयाग को श्रेष्ठ ठहराया गया है। कहा गया है कि असंख्य तीर्थ सदा प्रयाग में निवास करते हैं; इसलिए संगम स्वयं समस्त तीर्थ-फल का संक्षिप्त रूप है। जाह्नवी गंगा को तीन अग्निकुण्डों के मध्य प्रवाहित होकर प्रयाग से ‘प्रवर तीर्थ’ रूप में निकलती हुई बताया गया है; वायु-देववाणी उसे पृथ्वी और अन्तरिक्ष में देवत्व का सार मानकर सार्वभौम रूप से महिमामंडित करती है। आगे उपदेश दिया गया है कि यह माहात्म्य ‘रहस्य’ है, जिसे योग्य पात्र को ही देना चाहिए। प्रयाग का श्रवण-स्मरण पापों का नाश करता है, पूर्वजन्मों की स्मृति जैसी अद्भुत बुद्धि देता है, पितरों का उद्धार करता है और स्वर्ग-प्राप्ति कराता है—यहाँ तक कि अन्य तीर्थ प्रयाग के पुण्य के सोलहवें अंश के भी तुल्य नहीं हैं।
Glorification of Prayāga (Prayāga Māhātmya)
युधिष्ठिर प्रयाग की पवित्र कथा सुनकर मोक्ष देने वाली शिक्षा का निवेदन करते हैं। तब मārkaṇḍeya त्रिमूर्ति का तत्त्व बताते हैं—ब्रह्मा सृष्टि करते हैं, विष्णु पालन करते हैं और रुद्र कल्पान्त में जगत का संहार करते हुए भी अविनाशी रहते हैं। इसके बाद यह सिद्धान्त प्रयाग में प्रतिष्ठित बताया गया है—वहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर का निवास है। प्रयाग की तीर्थ-परिक्रमा पाँच योजन की कही गई है, और मार्ग-मार्ग पर पापहर रक्षक देवताओं की व्यवस्था वर्णित है। ग्रन्थ धर्म की कठोर सूक्ष्मता भी बताता है—प्रयाग में किया गया अल्प पाप भी नरक का कारण कहा गया है, जिससे इस तीर्थ की विशेष मर्यादा प्रकट होती है। प्रयाग को प्रजापति का पावन क्षेत्र, शुद्धि और पुण्य देने वाला बताकर अंत में स्थिर राज्य, एकता और सदाचार का उपदेश दिया गया है।
The Glory of Prayāga (Mahātmyā of the Confluence)
इस अध्याय में सूत पाण्डवों की धर्ममयी मर्यादा का वर्णन करते हैं—ब्राह्मणों, गुरुओं और वृद्धों का आदर-सेवन। फिर वासुदेव का आगमन होता है और युधिष्ठिर का राजधर्म में पुनः दृढ़ अभिषेक-निश्चय प्रकट होता है। मर्कण्डेय का शुभ दर्शन तथा युधिष्ठिर की दानशीलता से कथा का यज्ञ-दानप्रधान नैतिक-धार्मिक आधार स्थापित होता है। इसके बाद प्रयाग-माहात्म्य का उपदेश आता है—प्रयाग का कीर्तन और श्रवण पापों का नाश कर विष्णुलोक की प्राप्ति कराता है; उसका स्मरण मात्र भी तारक है; वहाँ जाना और निवास करना दोनों पवित्र करते हैं। महँगे यज्ञों की दुर्गमता बताकर ‘गुप्त’ तत्त्व कहा गया है कि तीर्थयात्रा के साथ भीतर के गुण—अक्रोध, सत्य, व्रत में स्थिरता, समदृष्टि और अहंकार-त्याग—पूर्ण तीर्थफल देते हैं और यज्ञफल से भी बढ़कर हैं। माघ मास में गङ्गा-भक्ति को जनसाधारण के महान् धर्म के रूप में विशेष महिमा दी गई है।
Praise of Devotion to Viṣṇu (The Supremacy of Hari’s Name over All Tīrthas)
ऋषि पूछते हैं—तीर्थों की सेवा से क्या फल मिलता है, और ऐसा कौन-सा एक कर्म है जिससे समस्त तीर्थों का संयुक्त पुण्य प्राप्त हो जाए। उत्तर में उपदेश बाह्य तीर्थ-सेवा से ध्यान हटाकर हरि-भक्ति पर केंद्रित करता है और कर्मयोग के साथ नाम-स्मरण को सर्वोपरि बताता है। अध्याय बार-बार कहता है कि हरि/कृष्ण का नाम-जप, हरि की परिक्रमा, विष्णु-मूर्ति का दर्शन, तुलसी का सम्मान और विष्णु-प्रसाद (शेष) का ग्रहण—ये सब पापों का नाश करते हैं और सभी पवित्र स्नानों व मंत्रों के फल के समान फल देते हैं। जन्म-भेद से परे भक्तों को वंदनीय कहा गया है, और हरि को अन्य देवताओं के समान मानना आध्यात्मिक रूप से घातक बताया गया है। अंत में कर्मयोग सहित कृष्ण/विष्णु की स्थिर उपासना को कृपा और मोक्ष का सुनिश्चित मार्ग कहा गया है।
Teaching on Karma-yoga (Discipline of Action as Worship)
ऋषियों ने सूत से पूछा कि वह कर्मयोग बताइए जिससे हरि प्रसन्न होते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है। सूत ने उत्तर दिया कि पहले इसी प्रकार तेजस्वी मुनियों ने व्यास से प्रश्न किया था; तब व्यास ने मनु-प्रजापति के सनातन विधान के आधार पर ब्राह्मणों के लिए कर्मयोग का उपदेश दिया। इस अध्याय में आचार-विधि का विस्तार है—उपनयन का समय, ब्रह्मचारी के चिह्न (दण्ड, मेखला, अजिन), यज्ञोपवीत के पदार्थ और धारण-स्थान, उपवीत/निवीत/प्राचीनावीत के प्रयोग, संध्या-वंदन और अग्नि-कार्य। सरल अर्पणों से पूजन, वर्णानुसार अभिवादन-शिष्टाचार, तथा ‘गुरु’ की पहचान और सेवा—माता-पिता, आचार्य, वृद्धजन, और स्त्रियों के लिए पति—का विशेष वर्णन किया गया है। अंत में ब्राह्मण के आशीर्वाद-स्वरूप और वर्णों में गुरु-स्थान को प्रतिपादित कर कहा गया है कि संयमित आचरण धर्म की रक्षा है और हरि को अर्पित कर्म ही भक्ति-रूप कर्मयोग है।
Procedure of Ācamana and Rules of Ritual Purity (Śauca)
अध्याय 52 (पद्मपुराण 3.52) शौच और आचमन की विधि का उपदेश देता है। भोजन, निद्रा, स्नान के बाद, थूकना, मल-मूत्रादि के त्याग, असत्य भाषण, चौराहे/श्मशान आदि के संस्पर्श तथा कुछ सामाजिक संपर्कों के पश्चात पुनः शुद्धि हेतु आचमन या शौच करने की आवश्यकता बताई गई है; साथ ही बैठने की रीति, दिशा-नियम, जल की शुद्धता और मन की सावधानी का विधान किया गया है। फिर हाथ के ‘तीर्थों’ (ब्रह्मतीर्थ आदि) का परिचय देकर आचमन के क्रम में मुख, नेत्र, नासिका, कान, हृदय, शिर, कंधों आदि को स्पर्श करने की विधि बताई जाती है और इन क्रियाओं को विशेष देवताओं की प्रसन्नता से जोड़ा गया है। अंत में अशौच की अवस्था में वस्तुओं के व्यवहार, मल-मूत्र त्याग के निषिद्ध स्थानों तथा सार्वजनिक/पवित्र स्थलों में मर्यादित आचरण के नियम देकर अध्याय समाप्त होता है।
Teaching of Karma-yoga (Student Conduct, Vedic Study, and Gāyatrī Supremacy)
अध्याय 53 में ब्रह्मचारी के आचरण को कर्मयोग के रूप में स्थापित किया गया है। गुरु के प्रति परम श्रद्धा, शरीर‑वाणी का संयम, शुचिता, नम्रता, सेवा‑शिष्टाचार तथा गुरु के साथ अनुचित घनिष्ठता, परिहास या अपमान से बचने के नियम बताए गए हैं। इसके बाद वैदिक अनुशासन आता है—नित्य स्वाध्याय, प्रणव (ॐ) का उचित प्रयोग, चारों वेदों और पुराणों से संबद्ध हवन‑दान आदि का विधान। अंत में गायत्री‑जप की सर्वोच्चता का दृढ़ प्रतिपादन है; उसे वेदों का सार मानकर वेदाध्ययन से भी बढ़कर फलदायी कहा गया है। फिर वेदोपाकरण का समय, ऋतु के अनुसार अध्ययन‑अवधि, और अनध्याय (पाठ‑विराम) के विस्तृत कारण—आँधी‑वर्षा, गर्जन‑विद्युत, अशुभ शकुन, अशौच, तिथि‑विशेष, मृत्यु आदि—गिनाए गए हैं। उपसंहार में अर्थ‑चिंतन के बिना केवल रटंत पाठ की निंदा कर, मनु आदि स्मृतियों के अनुसार जीवनभर संयमित अध्ययन‑अनुष्ठान का उपदेश दिया गया है।
The Duties and Conduct of the Graduate (Snātaka) and the Householder
अध्याय 54 (पद्मपुराण 3.54) स्नातक के लिए वेद‑वेदाङ्ग अध्ययन पूर्ण कर गुरु का सम्मान करके समावर्तन‑स्नान करने और फिर गृहस्थ‑धर्म में प्रवेश करने की संक्षिप्त धर्म‑संहिता प्रस्तुत करता है। इसमें दण्ड, वस्त्र, यज्ञोपवीत, कमण्डलु, शौच‑सज्जा, केश‑श्मश्रु तथा उपयुक्त रंग‑वेश आदि बाह्य आचार का विधान है। इसके बाद सामाजिक कर्तव्य बताए गए हैं—अपने गोत्र से भिन्न योग्य कन्या का चयन, विवाह के लिए उचित समय तथा निषिद्ध तिथियों/चन्द्र‑दिवसों का त्याग, और गृह्याग्नि की स्थापना। कर्तव्यों की उपेक्षा से नरक‑प्राप्ति की चेतावनी देकर संध्या‑वन्दन, श्राद्ध, सत्य, संयम, दया, करुणा, श्रुति‑स्मृति तथा पितृ‑परम्परा के पालन और दाम्पत्य‑निष्ठा पर बल दिया गया है। अंत में क्षमा, दया, विज्ञान और सत्य को प्रमुख गुण कहा गया है तथा सच्चा ज्ञान वही बताया गया है जो विष्णु/हृषीकेश को जानता है। पाठ‑श्रवण‑उपदेश करने वाले को ब्रह्मलोक में मान‑सम्मान की फलश्रुति दी गई है।
Prohibitions and Rules of Right Conduct (Ācāra): Theft, Speech, Purity, Residence, and Social Boundaries
अध्याय 55 में आचार-धर्म का सघन विधान दिया गया है। आरम्भ में अहिंसा, सत्य और अस्तेय जैसे मूल संयम बताए गए हैं, फिर चोरी के सूक्ष्म रूपों तक विस्तार है—तृण, जल आदि का भी पर-स्वत्व हरण—और ब्राह्मण तथा देव-सम्बन्धी धन के अपहरण को अत्यन्त घोर पाप कहा गया है। दान और भिक्षा के नियम, कपटी व्रत और ढोंगी वैराग्य की निन्दा, गुरु और देवताओं के प्रति निष्ठा की महिमा, तथा निन्दा और वेद-अपमान को प्रायश्चित्त से भी कठिन दोष के रूप में बताया गया है। इसके बाद द्विजों के लिए संगति-सीमाएँ, निवास और देश-आचार के नियम, तथा शुद्धि और शिष्टाचार सम्बन्धी अनेक निषेध आते हैं—क्या देखना/कहना/छूना/खाना उचित है, कहाँ रहना चाहिए, इत्यादि। जल, अग्नि, गौ, मन्दिर और वृद्धों के निकट व्यवहार की मर्यादा भी बताई गई है। समग्र उद्देश्य यह है कि वाणी, भोजन, संगति और देह-आचरण पर संयम रखकर धर्म की रक्षा की जाए।
Rules of Edible and Inedible Foods
इस अध्याय में अन्न को शुद्धि और धर्म-परिणाम का माध्यम बताकर भोजन-नियमों का क्रमबद्ध निरूपण किया गया है। द्विजों को आपत्काल को छोड़कर शूद्र-अन्न से दूर रहने की चेतावनी दी गई है; निंदित भोजन से कर्मदोष, सामाजिक अवनति और पुनर्जन्म आदि दुष्फल बताए गए हैं। निषिद्ध दाताओं और निंदित व्यवसायों का उल्लेख है तथा वे स्थितियाँ बताई गई हैं जिनसे अन्न अशुद्ध होता है—पशु-स्पर्श, अशौचावस्था वाले व्यक्तियों का संसर्ग, बासीपन, कीट-लगना और अन्य दूषण। कुछ शूद्र-संबंधी पदार्थों की सीमित स्वीकार्यता बताकर आगे तीखे/खमीरित पदार्थ, कुछ वनस्पतियाँ, पक्षी और पशु आदि के निषेध का विस्तार किया गया है। मांस के विषय में कठोर प्रतिबंध है, केवल यज्ञ-सम्बन्ध या अत्यावश्यकता में संकीर्ण अपवाद संकेतित है; मद्यपान द्विजों के लिए सर्वथा वर्जित कहा गया है। उल्लंघन करने पर रौरव नरक, तथा धर्माधिकार की हानि का निष्कर्ष दिया गया है।
Determination of the Householder’s Dharma (Dāna: Types, Recipients, Timing, and Fruits)
इस अध्याय में गृहस्थ-धर्म का आधार दान बताया गया है। श्रद्धा से योग्य पात्र को दिया गया दान भोग और मोक्ष—दोनों का साधन है। दान के भेद—नित्य, नैमित्तिक (प्रायश्चित्त/अवसर-विशेष), काम्य (इच्छा-प्रेरित) और भगवान की प्रसन्नता हेतु निष्काम ‘विमल’ दान—इनका क्रम से निरूपण है। गृहस्थ को परिवार-पालन के बाद बचे हुए धन से दान करना चाहिए; पात्र वही है जो विद्वान, संयमी, शुद्ध आचरण वाला ब्राह्मण हो—मूर्ख, नास्तिक और पाखंडी को दान प्रशस्त नहीं। भूमि, अन्न, विद्या, सुवर्ण, जल, दीप, गौ, औषधि आदि दानों के विशिष्ट फल बताए गए हैं—लोक में समृद्धि, यश, आरोग्य तथा परलोक में स्वर्गादि और अंततः मुक्ति। दान के देश-काल का भी विधान है—विशेषतः वैशाख-मास के व्रत, अमावस्या/एकादशी/द्वादशी, ग्रहण, संक्रांति और तीर्थ-स्थानों में किया गया दान अत्यंत फलदायक कहा गया है। अंत में राजा और दाताओं को चेतावनी दी गई है कि दुर्भिक्ष में प्रजा का पालन और दान-सहायता का त्याग न करें। लोभ से दान छोड़ना तथा अयोग्य या लोभी व्यक्ति द्वारा दान ग्रहण करना—दोनों निंदनीय और पापकारक बताए गए हैं।
Dharma of the Conduct of the Vānaprastha Āśrama (Forest-Dweller Discipline)
इस अध्याय में वानप्रस्थ को तृतीय आश्रम बताकर कहा गया है कि गृहस्थ-धर्म का पालन कर, संतान-वंश की स्थापना देखकर, शुभ समय में वन को प्रस्थान करना चाहिए। वहाँ पवित्र अग्नि का संरक्षण, देवों और पितरों का पूजन, अतिथि-सत्कार, मिताहार, शौच-नियम, वल्कल आदि धारण, केश-श्मश्रु का संयम, वेदाध्ययन, अग्निहोत्र तथा पञ्च-महायज्ञ, अमावस्या-पूर्णिमा और ऋतु-यज्ञों का विधान किया गया है। ग्राम्य अन्न, उपहार और दान का ग्रहण वर्जित है; अहिंसा, सत्य और रात्रि-नियम पर विशेष बल है। मैथुन को व्रत-भंग करने वाला बताया गया है और होने पर प्रायश्चित्त का निर्देश है। आगे क्रमशः तपस्याओं का वर्णन कर अंत में अंतर्मुख यज्ञ, योग, उपनिषद्-जप तथा मोक्ष हेतु वैकल्पिक आत्म-समर्पण जैसी अंतिम साधनाओं का उपदेश दिया गया है।
Exposition of the Duties of Ascetics (Saṃnyāsa-Dharma)
इस अध्याय में व्यास संन्यास-धर्म का निरूपण करते हैं। वानप्रस्थ के बाद संन्यास को चौथा आश्रम बताया गया है और कहा गया है कि सच्चा संन्यास केवल वास्तविक वैराग्य से ही उत्पन्न होता है, मात्र बाह्य वेश से नहीं। संन्यास-ग्रहण से पूर्व प्राजापत्य, आग्नेय आदि शुद्धिकर संस्कारों/व्रतों का भी संकेत मिलता है। आगे संन्यासियों के तीन भेद बताए गए हैं—ज्ञान-संन्यासी, वेद-संन्यासी (जो एकान्त वेदाध्ययन में रत रहता है) और कर्म-संन्यासी (जो कर्मों का त्याग करता है)। इनमें तत्त्वज्ञ ज्ञाननिष्ठ को सर्वोच्च कहा गया है, जो बाह्य चिह्नों और कर्तव्य-बन्धन से परे होकर सत्य में स्थित रहता है। भिक्षुक-आचार में अभय, अपरिग्रह, समता, ब्रह्मचर्य, अहिंसा, सत्य, सावधानी से चलना, छना हुआ जल, एक वर्ष तक निवास-आसक्ति न रखना तथा संयमित भिक्षा का विधान है। नित्य स्वाध्याय, सन्ध्या में गायत्री-जप, प्रणव-ध्यान और वेदान्त-परायणता से साधक ब्रह्म-ज्ञान के योग्य बनता है।
Dharma of the Renunciant: Alms Discipline, Meditation, and Expiations
इस अध्याय में संन्यासी का धर्म बताया गया है। आजीविका भिक्षा से (या फल‑मूल से) रखने का विधान है और भिक्षा‑आचार की कठोर मर्यादाएँ दी गई हैं—दिन में एक ही बार भिक्षाटन, अल्प वाणी, सीमित घरों से ही लेना, थोड़ी देर खड़े रहना, शौच‑शुद्धि, हाथ‑पैर धोना और आचमन आदि। भोजन के समय सूर्य को अर्पण, प्राण‑आहुतियों के कौर, तथा संध्या‑जप और नियमबद्ध साधना का समन्वय किया गया है। इसके बाद हृदय‑कमल में ध्यान, ओंकार‑पर्यन्त लय और परम ज्योति के तत्त्व का निरूपण आता है। उसी परम प्रकाश को अद्वैत रूप से महादेव/शिव कहा गया है, और मोक्षदायी ध्यान‑विषय के रूप में विष्णु/नारायण का भी स्मरण कराया गया है। फिर काम, असत्य, चोरी, हिंसा और आहार‑भंग जैसे दोषों का उल्लेख कर उनके प्रायश्चित्त—सांतपन, कृच्छ्र, चान्द्रायण, प्राजापत्य—तथा प्राणायाम की गणना बताई गई है। अंत में योग्य शिष्यों को ही यह रहस्य देने और अयोग्य से गोपनीय रखने की आज्ञा है।
Supremacy of Hari-Bhakti in Kali-yuga; Warnings on Sensual Attachment; Praise of Brāhmaṇas, Purāṇa-Listening, and Gaṅgā
इस अध्याय में कलियुग में हरि-भक्ति की सर्वोच्चता बताई गई है। वर्ण-आश्रम के कर्म और सामाजिक कर्तव्य फलदायक होते हुए भी, उद्धार के लिए भक्ति को उनसे बढ़कर कहा गया है; गोविन्द में एकनिष्ठ श्रद्धा, हरि का कीर्तन, श्रवण और स्मरण—ये मुख्य साधन बताए गए हैं। फिर भक्ति के विघ्नों पर चेतावनी दी जाती है—विषयासक्ति, काम-क्रोध, तथा लोक-धर्म का दिखावा मन को चंचल कर देता है। इसलिए वैराग्य जगाकर, अपने धन-सम्पदा और सामर्थ्य को वैष्णव कार्यों में लगाने और निरन्तर हरिनाम-गुणगान करने की प्रेरणा दी गई है। अंत में ब्राह्मणों की महिमा कही गई है—उन्हें विष्णु का प्रत्यक्ष रूप मानकर उनका सम्मान, नमस्कार और भोजन-दान महान पुण्यदायक बताया गया है। नित्य पुराण-श्रवण अग्नि की तरह पापों को जलाता है; गंगा को द्रवरूप विष्णु और भक्ति-प्रदायिनी कहा गया है। अतः ब्राह्मण, पुराण, गंगा, गौ और पीपल में विष्णु के दृश्य स्वरूप जानकर भक्ति बढ़ाने का उपदेश है।
Viṣṇu as the Embodied Purāṇas and the Merit of Hearing the Svarga-khaṇḍa
अध्याय के आरम्भ में सूत विष्णु की तारक महिमा का प्रतिपादन करते हैं। फिर पुराणों का एक दिव्य “अंग-विन्यास” बताया जाता है—विष्णु ही पुराण-प्रकाश का समग्र देह हैं; पद्मपुराण को उनका हृदय कहा गया है और अन्य महापुराणों को उनके अंग, त्वचा, मज्जा और अस्थि के रूप में निरूपित किया गया है। इससे पद्मपुराण को हरि का साक्षात् पावन स्वरूप-प्रवाह माना गया है। इसके बाद फलश्रुति आती है—एक अध्याय का भी श्रवण या उपदेश पापों का नाश करता है, और विशेषतः स्वर्ग-खण्ड का श्रवण घोर पापियों को भी शुद्ध करता है। क्रमशः दिव्य लोकों की प्राप्ति, अंत में ब्रह्मलोक, तत्त्वज्ञान और निर्वाण का फल कहा गया है। उपसंहार में सत्संग, तीर्थ-स्नान, उत्तम धर्मकथा का आश्रय और हरिनाम द्वारा गोविन्द-भक्ति करने की शिक्षा दी गई है।