
Description of the Form of Śrī Kṛṣṇa (Vṛndāvana Vision and Rādhā’s Manifestations)
पार्वती महादेव से दिव्य नामों, उनके अर्थों, ईश्वर के स्वरूप और पवित्र धामों की महिमा का विस्तार से वर्णन करने की प्रार्थना करती हैं। आरम्भ में एक अंतःप्रश्न भी उभरता है—विष्णु का परम धाम, हरि के व्यूह और निर्वाण का तत्त्व क्या है। तब ईश्वर वृन्दावन का रहस्य प्रकट करते हैं—वह आनन्द-वन है जहाँ श्रीकृष्ण रत्न-वैभव से दीप्त सिंहासन पर विराजमान हैं, गोपियों से घिरे हुए, उत्सव-रस और उल्लास से परिपूर्ण। इसके बाद अध्याय कृष्ण-तत्त्व का गहन चित्र प्रस्तुत करता है—वे गुणातीत हैं, उनका रूप भौतिक नहीं, नित्य और अविनाशी है; उनकी सत्ता अपरिमेय है। राधा वृन्दावनेश्वरी तथा प्रधान-शक्ति के रूप में प्रकट होती हैं; उनके अनेक नाम और विविध प्राकट्य वृन्दावन, द्वारका, वाराणसी, पुरुषोत्तम-क्षेत्र आदि तीर्थों और नगरों में बताए जाते हैं। अंत में ध्यान-उपदेश दिया जाता है कि स्मरण, नाम-जप/नाम-स्मरण और मन को आनन्द देने वाले गीत-कीर्तन से शुद्ध प्रेम (प्रेम) का उदय होता है।
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