
Determination of Tilaka and Associated Vaiṣṇava Practices (Śālagrāma, Tīrtha, Etiquette, and Offerings)
इस अध्याय में हरि की साक्षात् उपस्थिति शालग्राम-शिला, पूजा-सामग्री, मण्डल और मूर्ति में कैसे मानी जाती है—यह तत्त्व बताया गया है। गण्डकी-तीर्थ में शालग्राम की उत्पत्ति तथा द्वारावती/द्वारका की महिमा वर्णित है; वहाँ स्नान, दान और पूजन से पुण्य अनेकगुणा बढ़ता है और मुक्ति का फल मिलता है। शालग्राम का क्रय-विक्रय और उसे वस्तु की तरह बरतना निषिद्ध कहा गया है। फिर वैष्णव-परिचय के रूप में द्वादश-नाम तिलक-विधान, शरीर के विभिन्न स्थानों पर उसका विन्यास, ऊर्ध्व-पुण्ड्र की श्रेष्ठता और उसके सही आकार-नियम बताए गए हैं। तुलसी-मिश्रित शंखोदक के ग्रहण-विधि, मंदिर-शिष्टाचार, विष्णु-अपचारों की सूची, क्षमा-प्रार्थना का मंत्र और साष्टांग प्रणाम का विधान आता है। अंत में ऋतु-आहार संबंधी संयम, तुलसी और आँवला के पुण्य तथा मोक्ष-साधक तुलसी-स्तुति के साथ अध्याय पूर्ण होता है।
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