
Janaki’s Vision of the Ganga (Gaṅgā-Darśana and the Prelude to Abandonment)
इस अध्याय में सीता के विषय में लोकापवाद उठता है—नीच जन (धोबी) के कथन से राज्य में निंदा फैलती है। यह सुनकर राम के भ्राता शोक से व्याकुल होकर मूर्छित-से हो जाते हैं। शत्रुघ्न जानकी की निष्कलंकता का दृढ़ समर्थन करता है और गंगा की सर्वपावनता का दृष्टान्त देकर कहता है कि जैसे गंगा सबको शुद्ध करती है, वैसे ही सीता सर्वथा निर्दोष हैं; अतः उनका त्याग न किया जाए। परन्तु राम लोक-निन्दा से बचकर अपनी कीर्ति को निर्मल रखने का निश्चय करते हैं। वे लक्ष्मण को आज्ञा देते हैं कि गर्भवती सीता की इच्छा-पूर्ति के बहाने तपस्विनियों के दर्शन हेतु उन्हें वन ले जाओ और वहीं छोड़ आओ। लक्ष्मण भीतर से टूटता है, फिर भी आज्ञा का पालन करता है। रथ के चलने पर अशुभ शकुन होते हैं—नेत्र फड़कना, अपशकुन पशु-पक्षियों का दिखना, पक्षियों का मार्ग बदलना। अंत में सीता जाह्नवी गंगा के दर्शन करती हैं—दिव्य पावनी के रूप में—और लक्ष्मण उनसे उतरने का निवेदन करता है; यहीं से राजाज्ञा और वन-निर्वासन के बीच की सीमा स्पष्ट हो जाती है।
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