Adhyaya 44
Patala KhandaAdhyaya 440

Adhyaya 44

The Defeat of the Devas (Hanumān’s Clash with Rudra and the Deva-Host)

शेष वत्स्यायन से रामाश्वमेध के प्रसंग में एक रणकथा कहते हैं। हनुमान रुद्र/महेश्वर से भिड़कर उन्हें धर्म-विरुद्ध आचरण का दोष देते हैं कि वे राम-पक्ष पर आक्रमण कर रहे हैं। फिर भयंकर युद्ध होता है—शिलाएँ, त्रिशूल, शक्ति और गदा चलती हैं; पर हनुमान बार-बार शिव के अस्त्रों को निष्फल कर देते हैं और संकट में हरि का स्मरण कर अडिग रहते हैं। अंत में विनाश नहीं, पहचान और प्रशंसा से समाधान होता है; शिव हनुमान की वीरता सराहकर वर देने को उद्यत होते हैं। हनुमान वर में यह मांगते हैं कि गिरे हुए वीरों की रक्षा और पुनर्स्थापन हो—विशेषतः पुष्कल तथा मूर्छित शत्रुघ्न को जीवन-बल मिले—जब तक वे द्रोणगिरि से संजीवनी औषधि लाने जाएँ। वे द्रोण पर्वत उठाकर लोक-लोकांतर पार करते हैं। पर्वत के देव-रक्षक उन्हें रोकने आते हैं, पर पराजित होकर इन्द्र को समाचार देते हैं। इन्द्र बृहस्पति से परामर्श कर जानता है कि आक्रमणकारी हनुमान हैं, जिन्हें बल से जीता नहीं जा सकता; इसलिए नीति बदलकर शांति-प्रसादन से औषधि प्राप्त करने का उपाय किया जाता है।

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