
Glory of Vaiśākha: Dawn Bathing, the Power of Hari’s Name, and the Subtlety of Dharma
अम्बरीष राजा नारद से पूछते हैं कि स्नान जैसे छोटे-से कर्म से इतना बड़ा फल कैसे मिल सकता है। नारद बताते हैं कि धर्म अत्यन्त सूक्ष्म है—विधि, देश-काल, परिस्थिति और मनोभाव के अनुसार फल बदलता है; भीतर की भावना ही मुख्य है। वे उदाहरण देते हैं—विश्वामित्र का धर्मनिष्ठा से रूपान्तरण, अजामिल का “नारायण” नाम उच्चारण से उद्धार, और अग्नि-चिंगारी की उपमा से यह कि हरि-नाम अप्रत्यक्ष रूप से भी पाप को जला देता है। फिर वैशाख/माधव मास की महिमा आती है—माधव की पूजा और प्रातःकाल गंगा तथा रेवा/नर्मदा में स्नान से असाधारण पुण्य मिलता है। पर भक्ति और शुद्ध संकल्प के बिना केवल उपवास या स्नान निष्फल कहा गया है। अंत में देवाśर्मा और उसकी पत्नी सुमना की कथा-प्रविष्टि से संतोष, लोभ, मोह और परिवार-सम्बन्धों में कर्मबन्धन की शिक्षा आरम्भ होती है।
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