
The Origin Narrative of Kuśa and Lava (Sītā’s Exile and Vālmīki’s Refuge)
राम की आज्ञा से सौमित्रि लक्ष्मण सीता को जह्नवी (गंगा) पार कराकर भयावह वन में ले जाता है। काँटों के घाव, दावानल, हिंसक पशु और अशुभ पक्षियों की ध्वनि—सब सीता के भीतर उठते आघात और शोक का मानो दृश्य रूप बन जाते हैं। सीता बार-बार लक्ष्मण से सत्य पूछती है; त्याग का कारण सुनकर वह मूर्छित होती है और लोकापवाद के अन्याय तथा राम के प्रतीत होने वाले विरोधाभास पर करुण विलाप करती है। उसके क्रन्दन को सुनकर महर्षि वाल्मीकि शिष्यों सहित आते हैं, उसे सांत्वना देते हैं और स्वयं को जनक के आध्यात्मिक आचार्य के रूप में बताकर आश्रम में शरण देते हैं। वहाँ सीता राम-भक्ति में स्थित होकर तपस्विनी-सा जीवन बिताती है और समय आने पर दो पुत्रों को जन्म देती है। वाल्मीकि उनके संस्कार करते हैं; कुश और लव नाम कुशा-लव घास के पावन संयोग से पड़ते हैं, और आगे वे वेद, धनुर्वेद तथा रामायण के पाठ में प्रशिक्षित होते हैं।
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