
The Arrival/Meeting with Vatsa (Vatsa-māgama)
इस अध्याय में सत्यवान् राजा का वर्णन है, जो अपने स्वधर्म में अडिग और रघुनाथ श्रीराम की कृपा से प्राप्त दुर्लभ भक्ति से युक्त है। एकादशी-व्रत और भक्त के मस्तक पर तुलसी-दल रखने की अक्षय पवित्रता बताकर यह प्रतिपादित किया गया है कि संचित पुण्य से भी भक्ति श्रेष्ठ है। फिर श्रीराम के अश्वमेध का प्रसंग आता है। यज्ञाश्व शुभ लक्षणों सहित नगर में प्रवेश करता है; प्रजा समाचार देती है। श्रीराम का नाम सुनकर राजा आनन्दित होता है और जानता है कि यह अश्व शत्रुघ्न द्वारा रक्षित है। वह अश्व की सेवा और रामचरणों की सेवा का संकल्प कर कोष-सेना सहित शत्रुघ्न से मिलने चलता है। शरणागति-भाव से सत्यवान् अपना राज्य अर्पित कर देता है। शत्रुघ्न उसकी भक्ति पहचानकर सत्यवान् के पुत्र रुक्म को राजा स्थापित करते हैं। हनुमान् और सुबाहु आदि भक्तों का आलिंगन होता है और अश्व आगे की यात्रा पर बढ़ जाता है।
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