
Gautama’s Hermitage, the Śiva-liṅga Worship Manual, and the Śiva–Viṣṇu–Hanumān Devotional Drama
राघव एक दिव्य विमान में स्थित तेजस्वी पुरुष को स्त्रियों के साथ देखकर उसके पुण्य-कारण के विषय में शम्भु से पूछते हैं। तब शिव गौतम ऋषि के आश्रम की अद्भुत महिमा और वहाँ की तपोमय, यज्ञमय तथा पूजामय समृद्धि का वर्णन करते हैं। इसके बाद अध्याय शैव-पूजा का विस्तृत विधान बन जाता है—पूजा-स्थान की रचना, सामग्री-संग्रह, अभिषेक, आवरण-तत्त्व, अष्टदल-पत्रिका, रुद्राक्ष-धारण, धूप-दीप-नैवेद्य, नीराजन, ताम्बूल तथा संगीत-नृत्य को भी उपहार रूप में अर्पित करने की विधि बताई जाती है। नारद, बाण, शुक्र, प्रह्लाद, बलि आदि दानव-गण सभा में आकर पूजन करते हैं; फिर मृत्यु और पुनर्जीवन का नाटकीय प्रसंग होकर वरदान प्राप्त होते हैं। कथा में शिव–विष्णु की परस्पर श्रद्धा, दिव्य लीला और हनुमान की आदर्श भक्ति विशेष रूप से उभरती है; साथ ही भस्म-स्नान, मन्त्र-न्यास, वेदी-रेखाचित्र, आसन-ध्यान और धारास्नान द्वारा बाह्य कर्म के साथ आन्तरिक योग-शुद्धि का उपदेश दिया गया है।
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