
Dialogue of Suratha and the Messengers (Embassy over the Aśvamedha Horse)
राम के अश्वमेध यज्ञ के समय शत्रुघ्न को समाचार मिलता है कि यज्ञ का अश्व पकड़ लिया गया है और उसके सैनिकों का अपमान हुआ है। क्रोध उठता है, पर मंत्री सुमति दूत-नीति का स्मरण कराते हैं—जहाँ बल विफल हो, वहाँ दूत का वचन कार्य सिद्ध कर सकता है। तब शत्रुघ्न वानरराज वाली के पुत्र अङ्गद/हरिश्वर को दूत बनाकर निकट की कुण्डलापुरी भेजते हैं, जहाँ धर्मनिष्ठ क्षत्रिय राजा सुरथ राज्य करता है और रामचरण-भक्ति में प्रसिद्ध है। सभा में दूत अपना परिचय देता है; अश्व के विषय में विवाद बढ़ता है और चेतावनी दी जाती है कि अश्व न लौटाने पर घोर युद्ध और विनाश होगा। अङ्गद सुरथ के अभिमान को रोककर शत्रुघ्न के पराक्रम तथा वानरों की राम-निष्ठा का वर्णन करता है और समर्पण तथा अश्व-प्रत्यर्पण की मांग करता है। अध्याय का निष्कर्ष यह है कि राम के प्रति धर्मयुक्त शरणागति ही सर्वोच्च समाधान है और दूत-संदेश द्वारा ही शत्रुघ्न तक निर्णय पहुँचाया जाता है।
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