Adhyaya 22
Patala KhandaAdhyaya 220

Adhyaya 22

Description of the Glory of Nīlagiri (Nīlā/Nīlaprastha) and Puruṣottama’s Saving Vision

गंगा-तट पर एक दिन हरि-स्मरण और कीर्तन में लीन राजा रत्नग्रीव रात में स्वप्न देखता है कि वह चतुर्भुज विष्णु-सदृश रूप धारण कर पुरुषोत्तम की दिव्य सभा का दर्शन कर रहा है। वाडव नामक ब्राह्मण-मार्गदर्शक के साथ वह दान करता है, गंगासागर-स्नान और तर्पण करता है; तभी देव-दुंदुभियाँ बजती हैं और पुष्प-वृष्टि होकर भगवान की स्वीकृति प्रकट होती है। फिर वे तेजस्वी नीलगिरि/नीलप्रस्थ को देखते हैं और रत्न-जटित स्वर्ण-मंदिर में आरूढ़ होकर सिंहासनस्थ पुरुषोत्तम का दर्शन करते हैं। राजा अभिषेक, अर्घ्य-पाद्य, वस्त्र, गंध, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से पूर्ण पूजा करता है और भगवान की परात्परता तथा अवतार-उद्देश्य का प्रतिपादन करने वाला स्तोत्र गाता है। पुरुषोत्तम प्रसाद देकर भविष्य में इस स्तोत्र के पाठकों को भी दर्शन का वर देते हैं; राजा अपने साथियों सहित विमान से वैकुण्ठ को जाता है और नीलगिरि के दर्शन-श्रवण की मोक्षदायिनी महिमा स्थापित होती है।

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