Adhyaya 103
Patala KhandaAdhyaya 1030

Adhyaya 103

Glorification of Vaiśākha and the Meditation on Śrī Kṛṣṇa in Vṛndāvana

यह अध्याय वैशाख/माधव-मास के माहात्म्य का उपसंहार करते हुए बताता है कि इस कथा का पाठ और श्रवण अत्यन्त पावन है। इसके द्वारा पापों का नाश होता है और श्रीकृष्ण के परम धाम की प्राप्ति होती है—ऐसा फल-श्रुति में कहा गया है। यम–ब्राह्मण संवाद का स्मरण कराते हुए प्रतिवर्ष श्रद्धा-भक्ति से तीर्थ-स्नान, दान और अग्निहोत्र/हवन आदि करने की पुनः प्रशंसा की गई है। इसके बाद ऋषि सूत से पूछते हैं कि माधव (विष्णु/कृष्ण) कैसे प्रसन्न होते हैं; तब ध्यान का प्रसंग आता है। गौतम के प्रश्न पर नारद वृन्दावन-ध्यान सिखाते हैं—कल्पवृक्ष, रत्नमयी वेदी, कमलासन, और गो-गोप-गोपियों, देवताओं, ऋषियों तथा दिव्य गणों से घिरे मुकुन्द के सगुण स्वरूप का मनन। अध्याय यह स्थापित करता है कि विधिपूर्वक व्रत-कर्म और अंतर्मुख ध्यान—दोनों मिलकर साधक को विष्णु के परम पद तक ले जाते हैं।

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