
The Battle of Suratha’s Sons and the Puṣkala–Campaka Duel
सुरथ की आज्ञा होते ही रणभूमि में भेरियों और शंखों का नाद गूँज उठा; रथों और हाथियों की गड़गड़ाहट से सारा मैदान काँप उठा। सुरथ अपने पुत्रों और विशाल सेना के साथ आगे बढ़ा, और सेनानायक पुष्कल जैसे प्रचण्ड वीरों के विरुद्ध मोर्चे बाँधने लगे। इसी बीच पुष्कल और कम्पक का प्रमुख द्वन्द्व आरम्भ हुआ। दोनों ने एक-दूसरे को ललकारा, अपना-अपना परिचय दिया और भक्ति-भाव भी प्रकट किया—एक ने स्वयं को रामदास, श्रीराम का सेवक बताया। फिर तीव्र धनुर्विद्या और अस्त्र-शस्त्र का घोर संग्राम हुआ; पुष्कल ने ब्रह्मास्त्र छोड़ा, कम्पक ने उसका प्रतिकार किया और अंत में भयानक राम-शस्त्र चलाकर पुष्कल को बन्धन में ले लिया। सेना में भगदड़ मची तो शत्रुघ्न ने हनुमान (मारुति/पवनोद्भूत) को पुष्कल के उद्धार हेतु भेजा। हनुमान और कम्पक का आकाश तथा निकट युद्ध हुआ; प्रहारों से गिरना-उठना और पलटवार चलते रहे। अध्याय के अंत में कम्पक के अनुचर विलाप करते हैं और पुष्कल, कम्पक के फंदे से बँधे एक पुरुष को मुक्त कर देता है।
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