
Suratha’s Victory (Binding of Hanūmān and Battle with Śatrughna)
चम्पक के गिरने पर शोक से व्याकुल होकर भी क्रोध से दहकते राजा सुरथ ने हनुमान् को बुलाकर रण में ललकारा। हनुमान् ने स्वयं को श्रीराम का दास बताया और कहा कि बल से उन्हें सचमुच बाँधा नहीं जा सकता, क्योंकि श्रीराम उन्हें छुड़ा देंगे। फिर घोर युद्ध छिड़ा; हनुमान् ने अनेक धनुष तोड़ डाले और बहुत से रथ चूर-चूर कर दिए। सुरथ ने महास्त्रों का प्रयोग किया—पाशुपत से हनुमान् क्षणभर बँधे, पर श्रीराम-स्मरण से बंधन टूट गया; ब्रह्मास्त्र को हनुमान् ने निगलकर निष्फल कर दिया। अंत में सुरथ ने रामास्त्र छोड़ा; वह स्वामी की शक्ति होने से हनुमान् उसी से बँध गए। इसके बाद पुष्कल ने सुरथ से युद्ध किया और गिर पड़ा; तब शत्रुघ्न का प्रवेश हुआ और अग्नि-वरुण आदि अस्त्र-प्रतिअस्त्र तथा मोह-निद्रा-शर का आदान-प्रदान हुआ। अध्याय का संदेश है कि विजय और रक्षा केवल शौर्य से नहीं, श्रीराम-स्मरण से ही सिद्ध होती है।
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