Adhyaya 92
Patala KhandaAdhyaya 920

Adhyaya 92

The Narrative of Citrā: The Power of the Vaiśākha Bath and Govinda’s Name

इस अध्याय में यह आश्चर्य प्रकट किया गया है कि पापी भी अल्प-से प्रयत्न से ऊँची गति पा सकता है—विशेषतः माधव मास (वैशाख) में स्नान करने से। कर्म का सूक्ष्म फल-विधान समझाया गया है: हरि-भक्ति और गोविन्द-नाम के साथ जुड़ा छोटा-सा पुण्य भी महान फल देता है, जबकि भाव-रहित कर्म निष्फल हो सकता है। अजामिल का उदाहरण देकर नाम-महिमा प्रतिपादित की गई है। फिर कथा आती है—राजा दिवोदास की पुत्री के पति बार-बार मृत्यु को प्राप्त होते हैं। कुलपुरोहित जातूकरण बताता है कि वह पूर्वजन्म में चित्रा नाम की वेश्या थी, जिसने अनेक विघ्न किए थे। एक ब्राह्मण के सत्संग से उसने वैशाख-व्रत का उपदेश सुना, रेवातट (नर्मदा) में पूरे मास स्नान किया और दान-पुण्य किया; इसलिए वह यम-यातना से बची और शुभ जन्म पाकर दिव्यादेवी बनी। फिर भी शेष कर्म के कारण कुछ शोक का अंश बना रहता है।

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