
The Vision of the Renunciate (Yati-darśana)
इस अध्याय में भक्त-राजा रत्नग्रीव गण्डकी की महिमा सुनकर वहाँ स्नान करता है, पितरों को तर्पण देता है, अनेक शालग्राम-शिलाओं का पूजन करता है और दीनों को दान देता है। फिर वह नील पर्वत पर स्थित पुरुषोत्तम के धाम की ओर बढ़ता हुआ गङ्गा–सागर संगम पर एक तपस्वी ब्राह्मण से पूछता है कि नील और हरि का दर्शन कैसे हो। तपस्वी उपदेश देता है कि यहीं ठहरकर पुरुषोत्तम की स्तुति करो और दर्शन होने तक उपवास-व्रत धारण करो। राजा पाँच दिन तक कठोर व्रत रखकर दिन-रात हरि के गुण गाता रहता है। तब करुणावश हरि त्रिदण्डी संन्यासी के वेष में प्रकट होकर पूजन स्वीकार करते हैं और बताते हैं कि मध्याह्न में दुर्लभ दर्शन होगा तथा पाँच साथियों सहित नील पर आरोहण का सौभाग्य मिलेगा; इस प्रकार तीर्थ में निरन्तर स्तुति और व्रत से भगवान् का स्वयं प्राकट्य और संरक्षण सिद्ध होता है।
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