
The Glory of Vṛndāvana (Hari-nāma and Vaiṣṇava Observances in Kali-yuga)
उमा (पार्वती) पूछती हैं कि कलियुग में विषयों के जाल, गृहस्थी के क्लेश और मन की चंचलता के बीच जीवन कैसे टिके। महेश्वर (शिव) कहते हैं कि इस युग का कठोर किंतु सरल उपाय केवल हरि-नाम है—“हरे राम हरे राम… हरे कृष्ण हरे कृष्ण…” का जप और श्रीराम-श्रीकृष्ण का निरंतर स्मरण ही सब दुःखों का क्षय करता है। फिर नाम-स्मरण से शुद्धि, हरि-नाम लेते हुए गंगा-स्नान, और गोविंद की शरण से महापापों के नाश का वर्णन आता है। आगे व्रत-उत्सवों की विधियाँ बताई जाती हैं—ज्येष्ठ में अभिषेक, एकादशी पर शयन-प्रबोधन के नियम, कार्तिक में दीपदान, तथा ब्राह्मणों और वैष्णव भक्तों को भोजन कराना। शोभायात्रा, डोलोत्सव, सुगंधित लेपन और विविध अर्पणों सहित अंत में व्रज-वृंदावन-भक्ति को सर्वोच्च साधना और परम आश्रय कहा गया है।
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