Adhyaya 73
Patala KhandaAdhyaya 730

Adhyaya 73

Narration of the Glory of Vṛndāvana and the Sacred Places Beginning with Mathurā

इस अध्याय में आरम्भ में यह कहा गया है कि देवता भी कभी-कभी मोह में पड़ जाते हैं; फिर रहस्य-उपदेश की परम्परा से कथा आगे बढ़ती है। भक्त राजा अम्बरीष बदरी-आश्रम में एक मुनि के पास जाकर विष्णु-धर्म पूछते हैं। वहाँ ब्रह्म का स्वरूप सच्चिदानन्द बताया जाता है और ‘मन की परम गति’ को अत्यन्त गोपनीय विषय के रूप में समझाया जाता है। तपस्या से प्रसन्न होकर श्रीहरि भक्त को दर्शन देते हैं और व्रज का दिव्य दृश्य प्रकट होता है—वृन्दावन के कदम्ब-कुञ्ज में गोपाल-रूप श्रीकृष्ण, यमुना, गोवर्धन और गोपियाँ। इसके बाद व्रज-तत्त्वों का प्रतीकात्मक अर्थ भी बताया जाता है, जैसे गोपियों को वेद-ऋचाओं के समान माना गया है। यज्ञ-आदर में त्रुटि/अवमानना से उत्पन्न कर्मफल का एक नैतिक-कारणक प्रसंग भी आता है। अंत में मथुरा-माहात्म्य विस्तार से कहा गया है और यह प्रतिपादित होता है कि हरि-भक्ति के साथ शिव (भूतेश्वर) का सम्मान अनिवार्य है। पाठ-श्रवण की फलश्रुति में मुक्ति का आश्वासन दिया गया है।

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