
The Greatness of Vaiśākha: Compassion and the Gift of Merit that Frees Beings from Hell
इस अध्याय में वैषाख (माधव) माहात्म्य के अंतर्गत यमलोक का प्रसंग आता है। नरक में पीड़ित जीवों को देखकर करुणामय राजा अद्भुत त्याग का संकल्प करता है—वह अपना समस्त पुण्य उन्हें दे देता है ताकि वे स्वर्ग को प्राप्त हों, और यदि आवश्यक हो तो वह स्वयं पीछे रहकर भी उनका उद्धार कराए। तब हरि-दूत कहते हैं कि दया धर्म को बढ़ाती है और करुणा से पुण्य अनेकगुणित हो जाता है। इसके बाद वैषाख के व्रत-आचरणों का वर्णन है—स्नान, दान, जप, होम और पूजन—जिनका फल अनंत बताया गया है। विशेष दानों को विशेष लोकों से जोड़ा गया है—वरुणलोक, सूर्यलोक, ब्रह्मलोक और विष्णुलोक। हरि को साक्षी मानकर तीन बार घोषणा करके पुण्य-समर्पण (पुण्य-दान) करने की विधि बताई गई है। शिबि, दधीचि और सहस्रजित जैसे उदाहरणों से दया को परम धर्म सिद्ध किया गया है। अंत में राजा के पुण्य-दान से नरकभोगी मुक्त होकर दिव्य रथों में प्रस्थान करते हैं और राजा योगियों को भी दुर्लभ परम पद को प्राप्त होता है।
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