Adhyaya 95
Patala KhandaAdhyaya 950

Adhyaya 95

Vaiśākha Observance: Dawn Bathing, Tarpaṇa, and the Procedure for Worship of Mādhava (Keśava)

इस अध्याय में अम्बरीष राजा नारद से पूछते हैं कि वैशाख-व्रत में क्या दान करना चाहिए, प्रातःस्नान कैसे हो और केशव (माधव) की पूजा की विधि क्या है। नारद बताते हैं कि ब्रह्ममुहूर्त में नदी-तट पर या जहाँ जल उपलब्ध हो वहाँ स्नान करना चाहिए, विशेषतः मेष-संक्रान्ति के दिन; संकल्प लेकर गङ्गा-आह्वान और पृथ्वी-शुद्धि के मन्त्रों का स्मरण करना चाहिए। फिर देव, ऋषि और पितरों के लिए तर्पण, यज्ञोपवीत की अवस्थाएँ (उपवीत/निवीत, सव्य-अपसव्य) तथा सूर्य को अर्घ्य और सूर्य-स्तुति का विधान कहा गया है। आगे माधव-पूजा का संक्षिप्त किन्तु तकनीकी विधान आता है—वैदिक, तान्त्रिक या मिश्र पद्धति से—जिसमें प्रतिमा-भेद, न्यास, कलश-स्थापन, उपचार-समर्पण, होम, बलि और उद्वासन तक का क्रम बताया गया है। अंत में उदाहरण दिया है कि पूर्व वेश्या रूपवती/धर्मवती और एक स्वर्णकार ने अक्षया तृतीया के दान तथा वैशाख-स्नान का पालन किया, जिससे उन्हें राजजन्म और मोक्षाभिमुख पुण्य मिला; इससे सिद्ध होता है कि नियमयुक्त उपासना अंततः भक्तियोग में परिणत होती है।

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