
Rules for Purana Listening and Linga Worship; Worship, Writing, and Correct Reading of the Purana Manuscript
ऋषि सूतजी से प्रार्थना करते हैं कि वे श्रीराम के अद्भुत चरित्र का पुनः वर्णन करें। कथा अयोध्या में पहुँचती है—श्रीराम के दर्शन की इच्छा से शंकर पार्वती सहित आते हैं और कश्यप आदि ऋषियों द्वारा सत्कृत होते हैं। शम्भु स्वयं को हिमालय-देश का एक ब्राह्मण बताकर राम के पास जाते हैं; राम सबका आदरपूर्वक स्वागत करते हुए कहते हैं कि आप सबके आगमन से उनका जीवन और राज्य कृतार्थ हो गया। ऋषि शम्भु को शास्त्र, पुराण और तर्क के परम ज्ञाता के रूप में परिचित कराते हैं। श्रीराम लिङ्ग-पूजा की विधि और उसके भक्ति-फल पूछते हैं, साथ ही विभीषण के बन्धन तथा ‘रामेश्वर’ के अर्थ को लेकर उत्पन्न शंका भी रखते हैं। ऋषि विषय को ‘पुराण-वेत्ता’ शम्भु पर छोड़ देते हैं। तब शम्भु सच्चे पुराणिक के लक्षण, पुराण-हस्तलिखित ग्रन्थ की पूजा (सरस्वती-पूजन सहित), लिपि/अक्षर-रूप और प्रणव के नियम, पुराणों की सूची, तथा शुद्ध, अविरोध पाठ के विधान—पाठ-दोष, अपशकुन और उनके परिहार—इन सबका विस्तार से उपदेश देते हैं।
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